रविवार, 24 नवंबर 2019

जीतेन्द्र पांडेय : वशिष्ठ नारायण सिंह

*बाबू वशिष्ठ नारायण सिंह के बहाने*

महान गणितज्ञ प्रो. वशिष्ठ नारायण सिंह का जाना  राष्ट्रीय क्षति है । संभवतः इसे जनता और ऊँचे पदों पर बैठे हुक्मरान न समझें । विराट मेधा के धनी वशिष्ठ जी जोड़-तोड़ और जुगाड़ की राजनीति से परे थे । उनकी दुनिया छल-छद्म से विलग निहायत सादगी भरी थी । उनका जाना राजधर्म पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है साथ ही हम सभी को अपने-अपने गिरेबान में झाँकने को मजबूर कर देता है ।
        नासा जैसे प्रतिष्ठित अमेरिकी संस्थान में अपनी सेवाएँ देने वाले वशिष्ठ बाबू अप्रवासी भारतीयों की भी जिम्मेदारी थे । उनका कर्तव्य बनता था कि वे भारतीय सरकार पर दबाव डालकर इस वैश्विक रत्न का जीवन बचा लेते । आज भी प्रतिभा संपन्न अनेकों हस्तियां विदेशी सुख-सुविधा को ठोकर मारकर अपने देश की सेवा करना चाह रही होंगी । उनकी भी सुध रखना अप्रवासी भारतीयों का नैतिक दायित्व बनता है ।
         अब आइए, सरकारों की बात करते हैं । इलाज और सुविधा के अभाव में प्रो. वशिष्ठ नारायण सिंह जैसी शख़्सियत की मौत वर्तमान सरकार के गाल पर जोरदार थप्पड़ है । फिल्मी सितारों के स्वास्थ्य की चिंता करने वाली सरकारें अपने रीयल हीरो को गुमनामी में जीने के लिए छोड़ देती हैं । दुनिया के साथ कदमताल करने की हड़बड़ी में वे भूल जाती हैं कि उन्हें भी अपने देश की बौद्धिक विरासत का पालन-पोषण और संरक्षण करना होता है । इस संदर्भ में अमेरिका के महान गणितज्ञ जॉन नैश का नाम लेना प्रासंगिक है । उन्हें भी बाबू वशिष्ठ वाली बीमारी हुई थी जिसे सिजोफ्रेनिया के नाम से जाना जाता है । अमेरिका ने अपने इस बौद्धिक टैंक के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया । नौ वर्षों तक जॉन नैश अस्पताल में रहे । स्वस्थ होकर उन्होंने पुनः गणित में शोध कार्य प्रारंभ किया । वर्ष 1994 में गणित के क्षेत्र में 'गेम थ्योरी' के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला । एक हमारी सरकार है जो जंगल-पहाड़ काटकर शहरों को संघाई बनाना चाहती है । थिंकर टैंक उन्हें ही अधिकृत किया जाता है जो जुगाड़ में दक्ष और विशेष विचारधारा से संबंध रखते हैं । यह अलग बात है कि ऐसे विचारक सरकार बदलते ही अपनी विचारधारा बदल देते हैं । बाबू वशिष्ठ नारायण सिंह जैसे अनगिनत गणितज्ञ और वैज्ञानिक दम तोड़ रहे हैं किंतु इस देश में वही फल-फूल और फैल रहा है जो प्रभावशाली और जुगाड़ू है । उसी में भारत की समृद्ध परंपरा और विरासत बसती है । वही हमारे मूल्यों और संस्कृति का संवाहक है, भले ही उसका व्यक्तिगत जीवन विवादास्पद हो ।
             वशिष्ठ जी की ज़िल्लत भरी जिंदगी की सबसे बड़ी गुनाहगार बिहार और देश की जनता भी है । यह वही जनता है जिनके रहमोकरम पर जेलों में कैद खतरनाक अपराधी चुनाव जीत जाते हैं । ये मंदिर-मसजिद के नाम पर कटते-मरते हैं और आरक्षण को लेकर चक्का जाम कर देते हैं । कहा जाता है 'ये पब्लिक है, सब जानती है' , तो ऐसा क्या हुआ कि इसने उनको भुला दिया जिन्होंने कभी अल्बर्ट  आइंस्टाइन के सापेक्षता सिद्धांत को चुनौती दी थी ? अपोलो स्पेस सेटेलाइट लॉन्चिंग मिशन के नायक को सब कुछ जानने वाली जनता ने विस्मृत क्यों कर दिया ? चाहती तो अपने इस सरस्वती पुत्र के समुचित इलाज के लिए सरकार को घुटनों के बल ला देती लेकिन यह ऐसा क्यों करने लगी ? अपने पीठ पर वोटों की फसल ढोने वाली जनता जनार्दन तो व्यक्तिगत स्वार्थ को पहले और सामूहिक हित बाद में रखती है । चंद सिक्कों के लिए अपना ईमान बेचने वालों को वशिष्ठ नारायण से क्या लेना-देना ? 
              सेलिब्रिटीज की खाँसी-बुखार को राष्ट्रीय हलचल बना देने वाली मीडिया ने इस महान गणितज्ञ के मामले में हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा । उनके लिए यह मसालेदार खबर नहीं थी जो टीआरपी बढ़ा दे । भला हो, सोशल मीडिया का जिसमें बाबू वशिष्ठ नारायण सिंह के मृत्यु की खबर आग की तरह फैली । देखते-ही-देखते शासन-प्रशासन दंड बैठक करने लगे  । सबकी सदिच्छाएँ उमड़ने लगीं । मीडिया ने भी इस खबर को हाथों-हाथ लिया । दर्ज़नों लेख लिखे जाने लगे (यह लेख भी अपवाद नहीं) । निहितार्थ यह 'का वर्षा जब कृषि सुखाने' । 
             यह दुर्भाग्य है कि हमने अपने समय का आर्यभट्ट खो दिया । इससे भी दुःखद यह कि आज हमारे देश में न जाने कितने आइंस्टाइन, चाणक्य, रामानुजन, रवींद्रनाथ टैगोर, सी.वी. रमन जैसी प्रतिभाएं अभावग्रस्त जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं । आखिर, उनके भरण-पोषण और संरक्षण की जिम्मेदारी कौन निभाएगा ! उम्मीद है उन्हें भी देश के नागरिक सम्मान देंगे । राष्ट्र उनकी सेवाओं से विश्वगुरु की ओर कदम बढ़ाएगा । बिना खुशामद और बिना कूटनीति के वे भी चर्चा के केंद्र में रहेंगे । उनकी सादगी की तपिश से सारे षड्यंत्र गल जाएंगे । उनकी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और देशसेवा सर्वोपरि होगी । बाबू वशिष्ठ नारायण सिंह के बहाने यदि ऐसा कुछ होता है तो देश अधिक समर्थ और प्रतिभा संपन्न होगा ।

- डॉ. जीतेन्द्र पाण्डेय

शनिवार, 23 नवंबर 2019

साँकल, सपने और सवाल ( नवनीत में स्वीकृत )

सामाजिक संरचना की साँकलों का इतिहास बहुत पुराना है। मनु स्मृति के एक विवादास्पद श्लोक में स्त्रियों की स्वतंत्रता के विषय में जो सलाह दी गयी थी वह आज भले ही पूरी तरह अप्रासंगिक हो चली हो किन्तु उसका प्रभाव मानव समाज के तमाम तबकों में अब भी मौजूद है। हाँ ये अवश्य माना जा सकता है कि पिछले डेढ़ दशकों में ये साँकलें ढीली अवश्य पड़ी हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता स्त्री सशक्तिकरण का एक अत्यंत आवश्यक हथियार है। हमारी सामाजिक संरचना इसमें भी बाधा पहुँचाती है। विवाह के बाद बहुत सी स्त्रियों को नौकरी और व्यवसाय से दूरी बनाकर घर, परिवार और गृहस्थी को पूरा वक़्त देना पड़ता है। ऐसी स्थिति में आर्थिक रूप से उसे पुनः पराश्रित होना पड़ता है।

'साँकल, सपने और सवाल' प्रतिष्ठित रचनाकार, विचारक और स्त्रियों की सशक्त पक्षधर सुधा अरोड़ा के चुनिन्दा आलेखों का महत्वपूर्ण संचयन है।

'कम से एक दरवाजा' शीर्षक आलेख में पिछले दिनों घटी आत्महत्या की कुछ विक्षुब्ध करने वाली घटनाओं की विवेचना करते हुए सुधा अरोड़ा सिद्ध करती हैं कि बहुत बार ऐसा होता है कि लोग अवसाद के कठिन क्षणों से जूझ रहे होते हैं किंतु उनके चेहरे और आचरण में यह हरगिज़ नज़र नहीं आता। अवसाद के इन चिह्नों को जब तक वे या उनके परिजन पहचानें तब तक बहुत विलंब हो चुका होता है।

इस किताब के सात खण्डों में समाहित कुल छब्बीस आलेख विविध विषयों की सार्थक पड़ताल करते हैं। सरल, सहज भाषा में लिखे गए ये आलेख रोचक एवं पठनीय तो हैं ही, पाठक को कहीं गहरे तक उद्वेलित भी करते हैं।

प्रेम में निरन्तर आती प्रतिहिंसा की भावना और एसिड अटैक की बढ़ती घटनाएँ, समलैंगिक एवं थर्ड जेंडर: सहानुभूति के साथ स्वीकृति की ज़रूरत, भारतीय समाज में स्त्री की देह मुक्ति के सही मायने, धर्म के शिकंजे में स्त्रियों को फँसाए रखने की परंपरा, स्त्री शक्ति की भूमिका, स्त्री हिंसा के ढेरों दृश्य-अदृश्य कोने: जहाँ हिंसा के निशान प्रत्यक्ष नहीं दिखते, स्त्री की दैहिक शुचिता और विवाह की अवधारणा, स्त्री और संपत्ति अधिकार, स्त्री विमर्श के नाम पर साहित्य में फैला प्रदूषण, लेखक और कलाकार के मुखौटे ओढ़े लम्पट लोग, अंगारों भरी डगर पर नंगे पाँव चलने के लिए बाध्य कलाकारों की पत्नियाँ, महिलाओं के जीवन में धर्म का ख़लल और कुरान की नारीवादी व्याख्या, जैसे अत्यंत गंभीर, समसामयिक एवं ज्वलंत सामाजिक विषयों पर केन्द्रित ये आलेख इनमें वर्णित विसंगतियों की सटीक विवेचना के साथ ही निराकरण की तार्किक संभावनाओं एवं रास्तों के बारे में बताते हैं।

सुधा अरोड़ा कथनी और करनी के स्तर पर दोहरे चरित्र वाले राजेन्द्र यादव जैसे सम्पादकों को भी कठघरे में लेने से नहीं चूकतीं और उनके क्षद्म महिला विमर्श पर शालीन किन्तु तीक्ष्ण प्रहार करती हैं। इस विषय पर लिखते हुए उनकी लेखिका पत्नी मन्नू भंडारी के प्रति राजेन्द्र यादव के ग़लत रवैये के साथ ही प्रेमचंद द्वारा स्थापित 'हंस' जैसे प्रतिष्ठित नाम के साथ किये जा रहे खिलवाड़ पर भी आपत्ति दर्ज करती हैं। 
सुधा अरोड़ा पारिवारिक विघटन के विश्वव्यापी चिन्ता जनक परिदृश्य के बावजूद आशान्वित हैं कि भारत में बड़े महानगरों में चाहे जैसे तनाव हों किन्तु समाधान की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

किताब के अंतिम अध्याय 'औरत की दुनिया बनाम दुनिया की औरत' में शामिल लेख 'तीन इंच के स्वर्ण फूल' चीन की एक यातनादायक प्रथा का मार्मिक वर्णन है। हम सुनते आए थे कि चीनी देश की औरतों के पाँव भी उनकी आँखों की ही तरह छोटे होते हैं। दरअसल पाँवों का यह छोटापन प्राकृतिक नहीं था। कुछ अमानवीय तरीकों से पाँवों को बढ़ने से रोक दिया जाता था।

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

धर्मवीर भारती

माखनलाल चतुर्वेदी जी ने धर्मवीर भारती के किसी आरंभिक कहानी संग्रह की भूमिका में लिखा था कि "भारती घास की कलम से नहीं, साँस की कलम से लिखते हैं।"
जब आप धर्मवीर भारती के समग्र लेखन पर नज़र डालते हैं तो उनके लिए कही गई माखन दादा की ये पंक्तियाँ पूर्णतया प्रासंगिक लगने लगती हैं। धर्मवीर भारती की बहुआयामी रचनात्मकता के इतने छोर हैं कि यदि उनके समग्र लेखन का अवलोकन करने बैठें तो सहसा विश्वास ही नहीं होता कि किसी एक व्यक्ति के लिये अपने जीवन काल में इतना सब कर पाना कैसे सम्भव हो सकता है वह भी तब जबकि उसके जीवन के अधिकांश सक्रिय वर्ष एक पत्रिका के सम्पादन की भेंट चढ़ गए हों! धर्मवीर भारती का उदात्त रचनाकर्म उन्हें काल और विधा की सीमाओं से ऊपर एक ऐसे मकाम पर ले जाता है जहाँ पहुँचने का स्वप्न हर रचनाकार देखता है।

'गुनाहों का देवता' भारती जी की सबसे चर्चित रचना है। यह उपन्यास जितना सकारात्मक कारणों से चर्चित रहा उतना ही विवादों के कारण। कुछ विद्वानों द्वारा सिरे से खारिज़ किये जाने के बावजूद अब तक हुए सौ से अधिक संस्करण इस उपन्यास की सर्वकालिक लोकप्रियता की कहानी खुद कहते हैं और कुछेक नकारात्मक प्रतिक्रियाओं के बावजूद यह किताब आज भी सबसे ज़्यादा बिकने वाली चार पाँच शीर्ष साहित्यिक किताबों में शामिल है। प्रौढ़ावस्था की दहलीज पर खड़े तमाम पाठक स्वीकार करते हैं कि ये किताब किशोरावस्था के दिनों में  सदैव उनके सिरहाने रहा करती थी। रहा भारती जी का पक्ष तो अपने पहले उपन्यास की अपरिपक्वता और कमजोरियों को उन्होंने 'गुनाहों का देवता' के आरम्भ में स्वयं स्वीकार किया है।

भारती जी के इस उपन्यास के ठीक विपरीत धरातल पर खड़ा है उनका दूसरा और अंतिम उपन्यास-- 'सूरज का सातवाँ घोड़ा।' हिन्दी साहित्य में प्रयोगात्मक स्तर पर जो उपन्यास लिखे गए हैं उनमें सबसे पहले 'सूरज का सातवाँ घोड़ा' की चर्चा होती है क्योंकि भारती जी ने इस उपन्यास के कहन हेतु सर्वथा नए किस्म की भावभूमि और अनूठे शिल्प का सृजन किया था।
इस उपन्यास में निम्न मध्यवर्ग के जीवन, आर्थिक संघर्ष और नैतिक उथलपुथल आदि का सटीक और प्रभावी चित्रण हुआ है। धर्मवीर भारती के इस उपन्यास पर कई दशकों बाद श्याम बेनेगल द्वारा बनाई गयी फ़िल्म भी बहुचर्चित रही। 
इस उपन्यास का समापन अंश उल्लेखनीय है। भारती जी जिस उदात्त जीवन दर्शन के लिए जाने जाते हैं, उसे यहाँ स्पष्ट देखा जा सकता है---
" कोई न कोई ऐसी चीज है जिसने हमें हमेशा अँधेरा चीरकर आगे बढ़ने, समाज व्यवस्था को बदलने और मानवता के सहज मूल्यों को पुनः स्थापित करने की ताकत और प्रेरणा दी है। चाहे उसे आत्मा कह लो, चाहे कुछ और। विश्वास, साहस, सत्य के प्रति निष्ठा, उस प्रकाशवाही आत्मा को उसी तरह आगे ले चलते हैं जैसे सात घोड़े सूर्य को आगे बढ़ा ले चलते हैं।"


छठवें दशक में धर्मयुग के सम्पादक का निमंत्रण आने तक उनके खाते में कई कहानी संग्रह, काव्य नाटक 'अंधा युग' और खण्डकाव्य 'कनुप्रिया' सहित कई चर्चित कविता संग्रह उनके खाते में दर्ज हो चुके थे। महाभारत के अन्तिम दिन की घटनाओं पर आधारित 'अंधायुग' को यदि हम गहन वैचारिकता और मानवीय मूल्यों की दृष्टि से देखें तो संभवतः यह उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना है। सामान्य पाठकों के साथ ही साहित्य जगत के तमाम आलोचकों और विद्वानों ने इसे सराहा है।
अंधायुग की भूमिका आकार में छोटी किन्तु उतनी ही मानीखेज़ है। यहीं पर अंधायुग की रचना प्रक्रिया के बारे में बताते हुए भारती जी लिखते हैं-- " एक स्थल पर आकर मन का डर छूट गया था। कुण्ठा, निराशा, रक्तपात, प्रतिशोध, विकृति, कुरूपता, अंधापन -- इनसे क्या हिचकिचाना! इन्हीं में तो सत्य के दुर्लभ कण छिपे हुए हैं, तो इनमें क्यों न निडर धँसूँ! हम न मरैं, मरिहैं संसारा!
अगली ही पंक्ति में वे इस विचार के प्रतिपक्ष में खड़े दिखते हैं-- " पर नहीं, संसार भी क्यों मरे? एक धरातल ऐसा भी है जब 'निजी' और 'व्यापक' का बाह्य अन्तर मिट जाता है।"
समष्टि के प्रति उनका यह चिंतन और प्रतिबद्धता ही 'अंधायुग' का मूल स्वर है। हालाँकि इसे लिखने के बाद भी धर्मवीर भारती की रचनात्मक छटपटाहट शान्त नहीं हुई। अंततः 'कनुप्रिया' के अंतिम अंशों में वे इस अधूरेपन का अंत 
करते हैं। 'कनुप्रिया' सामान्यतः कृष्ण और राधा के प्रणय प्रसंगों पर आधारित लम्बी कविता मानी जाती है किन्तु मादकता और सुख-दुःख की सरल मार्मिक अभिव्यक्ति के समानान्तर एक ऐसी धारा भी इस किताब में प्रवहमान है जिसके केंद्र में समष्टि के लिए चिन्ता, मनुष्यता के प्रति गहन आस्था और सहानुभूति है। युद्ध के औचित्य/अनौचित्य और इस विभीषिका में कृष्ण की भूमिका पर राधा द्वारा किये गए प्रश्न इस काव्य कृति को माँसलता और मादकता से परे एक अलग धरातल पर ले जाते हैं।


धर्मवीर भारती की कुछ रचनाओं की अपार प्रसिद्धि के कारण ज्यादातर समय चर्चा के केन्द्र में वही रचनाएँ रहीं और इसी कारणवश उनकी कुछ श्रेष्ठ रचनाओं पर सम्यक परिचर्चा न हो सकी। बतौर उदाहरण सबसे पहले उनकी कहानियाँ याद आती हैं। 'गुलकी बन्नो' का शुमार निस्संदेह हिन्दी की श्रेष्ठतम कहानियों में होता रहा है और लगभग हर प्रतिनिधि कहानी संग्रह में ये शामिल होती रही किन्तु 'बंद गली का आख़िरी' जैसी कई कहानियाँ उनके विशिष्ट प्रशंसकों और पाठकों तक ही सीमित रह गईं। साथ ही आरम्भिक कहानी संग्रह भी बरसों अनुपलब्ध रहे। भारती जी की मृत्यु के बाद पुष्पा भारती जी ने उनकी समस्त कहानियों को एकत्र कर उनकी सम्पूर्ण कहानियों का एक संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कराया।

1960 में भारती जी टाइम्स समूह के आमंत्रण को स्वीकार कर मुम्बई आये और यहीं से धर्मयुग के सम्पादक के रूप में एक नई और युगांतरकारी भूमिका का सूत्रपात हुआ। उनके कुशल नेतृत्व में धर्मयुग ने सर्वथा नई ऊँचाइयों को छुआ और फिर एक समय ऐसा भी आया जब इस पत्रिका की बिक्री ने लाखों प्रतियों की संख्या पार कर ली। सत्तर और अस्सी के दशक के अनेक महत्वपूर्ण लेखकों, कवियों और शायरों को उनके आरंभिक दिनों में भारती जी का स्नेह और प्रोत्साहन मिला। धर्मयुग की गुणवत्ता और पूरे देश में उसकी पहुँच का ये आलम था कि इस पत्रिका में छपते ही कोई भी नवोदित रचनाकार रातों रात एक चर्चित नाम बन जाया करता था।
आज हमारे समय के कई प्रतिष्ठित लेखक धर्मयुग में प्रकाशित अपनी रचनाओं के कारण ही जाने गए। टाइम्स समूह से लम्बे अरसे तक जुड़े रहे और इन दिनों नवनीत पत्रिका के यशस्वी सम्पादक के रूप में कार्यरत विश्वनाथ सचदेव जी ने किसी वार्तालाप में एक आवश्यक संयोग की तरफ ध्यान दिलाया कि धर्मवीर भारती के समय धर्मयुग में अपने पत्रकारिता कैरियर की शुरुआत करने वाले ज्यादातर पत्रकार आगे जाकर बड़े सम्पादक बने। इस पत्रिका ने उनके संपादकत्व में ऐसे कई कीर्तिमान बनाये हैं जिनके आसपास क्या, बहुत दूर दूर तक कभी कोई अन्य पत्रिका न पहुँच सकी। उस समय के पाठक बताते हैं कि पत्रिका का कोई भी नया अंक ज्यों ही घर पहुँचता था , सारे सदस्यों में छीना झपटी मच जाती थी। इन संस्मरणों के आधार पर जब पाठकों से कुछ प्रश्न किये गए तो लोगों ने बताया कि धर्मयुग मात्र साहित्यिक पत्रिका नहीं थी। इसमें फ़िल्म और क्रिकेट जैसे लोकप्रिय विषयों पर भी चुनिन्दा सामग्री होती थी और यही कारण था कि हर आयु वर्ग के पाठक इसके दीवाने थे।

तनावपूर्ण और कठिन जिम्मेदारियों वाली इस भूमिका में भारती जी के लेखन पर असर पड़ना ही था। उनके सक्रिय जीवन की लगभग एक चौथाई सदी ऐसी गुज़री जब किसी कविता संग्रह, नाटक या उपन्यास का सृजन उनकी कलम से न हो सका। हालाँकि यह मान लेना भी नितान्त अनुचित है कि इन वर्षों में भारती जी की लेखनी पूरी तरह थम गई थी। इस अवधि में उन्होंने देश विदेश की जितनी महत्वपूर्ण यात्राएँ की, उन यात्राओं के संस्मरण का एक बेहतरीन संग्रह वाणी प्रकाशन से 'यात्रा चक्र' नाम से प्रकाशित हुआ। साहित्य, कला और संस्कृति को समर्पित विभिन्न हस्ताक्षरों पर केन्द्रित 'कुछ चेहरे कुछ चिन्तन' पढ़कर उनके प्रौढ़, परिपक्व और सरस लेखन का सहज अनुभव किया जा सकता है। उन दिनों धर्मयुग में उनका एक नियमित स्तम्भ होता था- 'शब्दिता'। पत्रिका के पुराने पाठक आज भी बताते हैं कि अंक हाथ में आते ही सबसे पहले वे भारती जी का यह स्तम्भ पढ़ते थे और फिर कहानियों या धारावाहिक उपन्यासों का रुख करते थे। देश , विदेश की किसी भी विशिष्ट किताब, शहर या लेखक पर केन्द्रित उनके इन आलेखों को पढ़कर कई पीढ़ियाँ समृद्ध हुई हैं। इन समस्त आलेखों का संग्रह कालांतर में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'शब्दिता' में हुआ।

धर्मवीर भारती की संगिनी पुष्पा भारती जी उन्हें याद करते हुए बड़े अनुराग से बताती हैं कि " मैं भारती जी से प्रायः ये शिकायत किया करती थी कि धर्मयुग के रूप में अच्छी सौतन आपने मेरे सिर बाँध दी है जिससे निस्तार नहीं।" इन चुलबुली स्मृतियों के साथ ही वे पूरी गंभीरता से यह भी बताती हैं कि अनेक सहायक संपादकों और स्वयं पुष्पा जी द्वारा स्वीकृत होने के बाद भी हर कहानी भारती जी की नज़रों से गुजरने के बाद ही प्रकाशित होती थी। संभवतः उनकी यही ज़िद, लगन और प्रतिबद्धता थी जिसने एक पत्रिका को शिखर पर पहुँचाया। पुष्पा भारती जी का ये कहना कि " धर्मयुग को उनकी तमाम बहुचर्चित रचनाओं के समानांतर रखा जाना चाहिए। सबसे ज़्यादा समय लेने वाला धर्मयुग भी उनकी महत्वपूर्ण और कालजयी रचना है" पूरी तरह अर्थवान प्रतीत होता है।
धर्मयुग के सम्पादन के दौरान बीते पच्चीस तीस वर्षों के कालखण्ड में भारती जी का कोई कविता संग्रह भले ही न आया हो किन्तु ऐसा भी नहीं था कि उन्होंने इन बरसों में कविताएँ बिल्कुल नहीं लिखीं। छिटपुट ही सही किन्तु कविताएँ लिखी जाती रहीं और धर्मयुग से सेवानिवृत्त होने के बाद उनकी इन अप्रकाशित कविताओं का एक यादगार संग्रह वाणी प्रकाशन से आया जिसका नाम था- 'सपना अभी भी'। स्मृति शेष होने से पूर्व यही उनका अन्तिम प्रकाशित कविता संग्रह रहा जिसे प्रतिष्ठित व्यास सम्मान भी प्राप्त हुआ था।

धर्मवीर भारती स्वयं हिन्दी के रचनाकार थे किंतु अन्य भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य पर भी सदैव नज़र रखते थे। बांग्ला सहित अन्य भाषाओं की अनेक बेहतरीन रचनाओं के अनुवाद धर्मयुग में लगातार छपते थे। विमल मित्र के कई बाँग्ला उपन्यास धर्मयुग में प्रकाशित होने के कारण हिन्दी पाठकों तक पहुँच सके और धीरे धीरे हिन्दी के पाठकों ने उन्हें जैसे इसी भाषा का लेखक मान लिया। बांग्ला देश मुक्ति संग्राम के समय धर्मवीर भारती ने इस देश का दौरा किया और एक प्रभावी रचनाकार की हैसियत से बांग्लादेश के नागरिकों के लिए हरसंभव प्रयास करते रहे। वे न सिर्फ़ एक बड़े लेखक बल्कि एक स्वप्नदृष्टा एवं सजग, सचेत विचारक भी थे। उनका साहित्यिक और सांस्कृतिक अवदान इतना बड़ा है कि समकालीन रचनाधर्मिता की हर परिचर्चा उनके ज़िक़्र के बगैर अधूरी रहेगी।

शनिवार, 26 अक्तूबर 2019

विज्ञान की दुनिया : देवेन मेवाड़ी

किताब : विज्ञान की दुनिया
लेखक : देवेंद्र मेवाड़ी
प्रकाशक: नवारुण, सी-303, जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर- 9, वसुंधरा, ग़ाज़ियाबाद-201012 ( उ.प्र.)
मूल्य: ₹ 150


विज्ञान जैसे दुरूह समझे जाने वाले विषय को अपने सरल, सरस लेखन द्वारा बच्चों और सामान्य पाठकों के बीच लोकप्रिय बनाने में देवेंद्र मेवाड़ी का उल्लेखनीय योगदान है। 
'विज्ञान की दुनिया' की भूमिका में बच्चों को सम्बोधित करते हुए देवेंद्र मेवाड़ी जी लिखते हैं कि "बच्चों के मन में जिज्ञासा जागनी चाहिए ताकि वे प्रश्न पूछें। जो लोग सवाल नहीं पूछते वे कही सुनी बातों पर आँख मूँदकर विश्वास कर लेते हैं।"

इस पुस्तक में विभिन्न विषयों पर कुल तीस आलेख संग्रहीत हैं। देवेंद्र जी आदि मानव युग से आरम्भ करते हुए आग की उत्पत्ति, अंतरिक्ष यान और वायुयान जैसे आविष्कारों, ब्रह्मांड, सौरमंडल, मंदाकिनी और प्रकाश वर्ष से जुड़े अनेक तथ्यों पर प्रकाश डालते हैं।
इसी क्रम में धूमकेतु, सुनीता विलियम्स, चंद्रयान, सुरक्षा कवच अर्थात ओजोन की परत, रोबोट, डायनासोर, मनुष्यों के साथ हिल मिल जाने वाले तमाम पशु पक्षियों, कुछ निराले मौसमी पंछियों, कोयल, सारस, दीमक, रंग बिरंगे फूलों, पर्यावरण, आम, त्यौहार और इनसे जुड़े जेवनारों, शैवाल और फफूँदी का संगम-लाइकेन, नीला कुरिंजी, महान खगोल वैज्ञानिकों, परी कथाओं, विज्ञान कथाओं, प्रकृति के कुछ अनसुलझे रहस्यों और आगामी कल की दुनिया जैसे तमाम गूढ़ विषयों पर महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्रस्तुत करते हैं। 

4.6 अरब पहले विविध प्राकृतिक तत्वों के संयोग से हुए पृथ्वी के निर्माण की रोचक जानकारी 'कैसे बनी हमारी पृथ्वी' नामक अध्याय में दी गयी है। 'इस धरती का क्या होगा' शीर्षक आलेख में मानव द्वारा पर्यावरण को पहुँचाई जा रही क्षति से अव्यवस्थित होते प्राकृतिक कारोबार पर चिन्ता करते हुए लिखते हैं कि जब यह पृथ्वी रहने योग्य नहीं रहेगी तो मनुष्य और बाकी जीव कहाँ रहेंगे?
'जिन्होंने अंतरिक्ष की राह बनाई' नामक आलेख में मनुष्य से पूर्व अंतरिक्ष में भेजे गए मूक प्राणियों और उपग्रहों से सम्बंधित घटनाओं का संक्षिप्त और मार्मिक वर्णन है।

देवेंद्र मेवाड़ी की भाषा और शिल्प बनावटीपन से दूर बेहद सरल और सम्प्रेषण की दृष्टि से कारगर है। किस्सागोई के अंदाज़ में लिखी गयी यह किताब न सिर्फ़ बच्चों बल्कि विज्ञान की दुनिया को करीब से समझने की इच्छा रखने वाले हर पाठक के लिए उपयोगी है। विषयानुसार प्रयुक्त चित्रों के कारण यह पुस्तक आकर्षक और संग्रहणीय बन पड़ी है। 'नवारुण' की प्रकाशकीय गुणवत्ता भी उच्चस्तरीय है।

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2019

अस्तित्व : ज्ञानप्रकाश विवेक

कुछ विरोधाभास जीवन भर साथ रह जाते हैं। प्रयास करने पर भी कुछ आदतें नही जातीं। ऐसी ही एक समस्या है पढ़ते समय झपकी आ जाने की। अधिकतर पढ़ना यात्रा के दौरान होता है और किताब हाथ में लेने के कुछ देर बाद नींद की दस्तक भी निश्चित है।

हालाँकि कभी कभी कुछ किताबें अपवाद बनकर साथ हो लेती हैं और जब ऐसा होता है तो यक़ीनन ये किसी लेखनी का जादू ही होता है। पिछले महीने एक व्यक्तिगत संगोष्ठी से वापस लौटते समय मैंने ज्ञानप्रकाश विवेक जी का उपन्यास "अस्तित्व" पढ़ना शुरू किया तो वक़्त जैसे थम सा गया। गंतव्य पर पहुँचने के बाद समय देखा तो मालूम पड़ा कि लगभग 55 मिनट की इस यात्रा के दौरान मैंने लगातार पढ़ते हुए 50 पृष्ठ पूरे कर लिए थे। पहले एक बाप-बेटी की दिनचर्या और बाद में एक छोटे से प्रेम प्रसंग को जिस खूबसूरत भाषा और संवेदना से विवेक जी ने दर्शाया है वो इस पुस्तक का सबसे सुन्दर भाग बन कर रह गया है। यूँ लग रहा था जैसे शब्दों और भावनाओं के किसी अलग लोक में तैर रहे हों।
शब्दों, भावनाओं और संवेदना की उस यात्रा में कुछ अंश रेखांकित हुए थे।
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● तुमने कभी सोये हुए बच्चे को मुस्कराते देखा है? दुनिया की सबसे अच्छी, निष्कपट, और मासूम मुस्कान वही होती है।

● साँझ मुझे अच्छी लगती। जैसे दिन की पाठशाला के सारे शिक्षक चले गए हों। जैसे दिन भर की थकान ने किसी नहर में अपने पैर धोये हों और मंदिर में जाकर घंटियाँ बजायी हों।

● मछेरे का समन्दर से क्या रिश्ता है? मैं इस रिश्ते का नाम अब तक नहीं ढूँढ सका। समन्दर जीवन है और समन्दर उसके जीवन का सबसे बड़ा संकट भी। मृत्यु भी समंदर है। किसान का मिट्टी से अव्यक्त सा रिश्ता होता है। लेकिन होता है। हम रिश्तों के नाम न रखें तो अच्छा होगा। नाम रखने से दिक्कत आएगी क्योंकि नाम की अपनी सरहद होती है।

● हमारी बगीची में जब सबसे पहला फूल खिलता तो वह क्षण हमारे लिए उत्सव जैसा होता।

● लम्हों का पानी बह जाता है। किसी टकसाल में लम्हों के सिक्के नही बनाये जा सकते। ऐसा होता तो मैं उन्हें ज़िन्दगी की गुल्लक में रख लेती और कभी न खर्च न करती।

● कमरे में मौन था किसी सृजन की तरह। जिसमें हमारी साँसों की ध्वनियाँ प्रकाशित होती महसूस होती थीं। मुझे पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि मौन में भी संगीत होता है जो हमारी चेतना का स्पर्श करता है।

● स्मृतियाँ किसी के लिए मूर्खता हो तो हो। किसी के लिए यह जीवन शिल्प भी तो हो सकता है। भागते दौड़ते समय को स्मृतियों में ही तो बचाकर रखा जा सकता है। अकेलेपन में स्मृतियाँ एक दोस्त की तरह होती हैं। बाहर के संसार के समानांतर- एक अलग दुनिया ।

● कितना त्रासद होता है जब मनुष्य का अपने ही शरीर पर कोई अधिकार नही रहता। एक पलंग ही जिसकी सम्पूर्ण दुनिया बन जाए, उस मनुष्य के लिए जीने के क्या अर्थ होंगे?
रिश्ते क्या केवल स्वस्थ लोगों के बीच ही हो सकते हैं? स्त्री-पुरुष के बीच यदि कोई बीमार हो तो क्या रिश्ते ख़त्म हो जाएँ?

● सरलता और सादगी का अपना एक गुण है। लेकिन सादगी के पीछे दृढ़ता ज़रूरी है।
रेत की दीवार की तरह भुरभुराते चले जाना जीवन का अपमान है।
ज़िन्दगी अनुभवों की प्रयोगशाला है। प्रयोग असफल हो जाय तो इसका यह अर्थ नही होता कि ज़िन्दगी समाप्त हो गयी।

● दस्तक कितना खूबसूरत शब्द है। हवाओं की उंगलियाँ जब दरवाजों पर दस्तक पड़ती है तो ऐसा महसूस होता है जैसे आसमान बाहर खड़ा हो । दस्तकें पड़ती रहें तो दरवाजे जिन्दा रहते हैं और घर जवान। दस्तकें अपनेपन की तरह होती हैं। किसी को जब आना हो तब दस्तकों का इंतज़ार कितना व्याकुलता भरा होता है।

नोट:- कृपया ध्यान दें। ये किसी प्रकार की समीक्षा या आलोचना न होकर विशुद्ध पाठकीय प्रतिक्रिया है। अतः सहमति या असहमति के प्रति सम्मान होने के बावजूद यहाँ किसी वाद विवाद की गुंजाइश नही है।

शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

◆कछु अकथ कहानी : कविता वर्मा

चौड़ी चिकनी सड़क पर बस पूरी ताकत लगा कर जितनी गति पकड़ सकती थी उस गति से दौड़ी चली जा रही थी।  बस के काँच यात्रा के धक्के खाकर पकड़ ढीली कर चुके थे उनके खड़खड़ाने का शोर बस के अंदर भरा हुआ था। काँच अंदर से यात्रियों के सिर के थपेड़े खाकर और बाहर से बारिश पानी धूल  मिटटी खाकर दोनों ओर से अपारदर्शी हो चले थे। खिड़की के मटमैले काँच को भेद कर सूरज की किरणें झेमरिया की आँखों पर पड़ीं उसने अचकचा कर आँखें खोल दीं। आँखें मिचमिचा कर उसने अपने आसपास की स्थिति का जायजा लेकर खुद कहाँ है यह जाँचा। अपने कंधे पर टिके बगल वाले आदमी का सिर धका कर सीधा करते अनायास उसका हाथ अपनी कमर पर बँधी गाँठ पर चला गया। उसने घबरा कर बुशर्ट का किनारा उठाकर धोती की गाँठ में बँधे पैसे और फिर पेट पर हाथ से टटोल कर बंडी में रखे पैसों की थाह लेते लंबी साँस ली। अब उसने थोड़ा आगे झुक कर पैरों के पास रखी अपनी पोटली टटोली जो बस के धक्के से सीट के नीचे थोड़े पीछे चली गई थी। झेमरिया ने उसे खींच कर आगे अपने पैरों के पास रखा और नींद में पैर से उतर गई चप्पलों को टटोल कर पैरों के सामने रखा। 
सब सामान ठीक ठाक होने की तसल्ली के बाद अब झेमरिया ने धुंधले काँच से बाहर देखकर पता लगाने की कोशिश की कि बस कहाँ पहुँची ? अब तक बस जाग चुकी थी। खड़खड़ाते काँचों की आवाज़ लोगों की आवाज़ों से सहम कर मानों चुप सी हो गई थीं। झेमरिया ने बस के अंदर देखने की कोशिश भी नहीं की कि उसमें जान पहचान का कौन है ? वह तो धुँधले काँच से आँखें चिपकाये बस के बाहर के खेत खलिहान पेड़ झोपड़े देखते जानने की कोशिश कर रहा था कि और कितनी देर लगेगी गाँव पहुँचने में। सभी खेत और पेड़ एक से दिख रहे थे। दूर दूर बनी झोपड़ी भी अपनी कोई अलग पहचान धारण नहीं किये थीं। झेमरिया को बैचेनी सी होने लगी। उसने बस के अंदर नज़रें घुमाते दूसरी तरफ के काँच से बाहर कोई बस्ती या मकान देखने की कोशिश में गर्दन को उचकाया लेकिन असफल रहा। कुछ काँच के धुँधलेपन की वजह से तो कुछ किसी भी प्रकार की विशिष्ट पहचान के ना होने से। 
उकता कर झेमरिया बस के अंदर बैठे लोगों को देखने लगा। मटमैले सफ़ेद से बुशर्ट या कुरता पहने मजदूर जिन्होंने कमर में धोती के नाम पर एक दुशाला सा लपेट रखा था जो प्रायः मैरून या हरा था जिनकी कोई अलग पहचान नहीं थी। वे सब मजदूर थे जो बड़ौदा से खेतों में मजदूरी कर फसल कटने के बाद अपने अपने गाँवों को लौट रहे थे। ये सभी मजदूर बारिश के पहले अपने खेतों के पट्टे ढोर डंगर ठीक करके अपने बूढ़े माता पिता या पत्नी को सौंप कर बड़ौदा के बड़े जमींदारों के यहाँ उनके खेतों में मजदूरी करने या बँटाई पर लेने चले जाते हैं। क्वाँर के पहले फसल काट कर अपने घर वापस आ जाते हैं। 
इस समय वे अपने छोटे बड़े पट्टे से हुई फसल काट बेच कर नदी कुँए तालाब में पानी की उपलब्धता देखकर आगे की योजना बनाते हैं। 
झेमरिया भी बड़ौदा में एक जमींदार के तीस एकड़ खेत को अपने काका उनके लड़के और अपने बेटे के साथ बटाई पर लेता है। जितने लोग उतने हिस्सेदार। अब तो उसका बेटा भी जवान हो गया है और इस साल तो वह भी एक हिस्सेदार बन गया है। सभी हिस्सेदार मजदूर भी हैं मालिक भी और हिसाब जमींदार करता है सबका बराबरी से। अपने हिस्से की फसल बेच कर ये लोग बारी बारी से घर आते हैं। झेमरिया के पास गाँव में छोटे से पट्टे पर एक झोपड़ी है उसी में एक छोटी आटा चक्की डाल रखी है एक गाय और दो तीन बकरे बकरी मुर्गी जिनकी संख्या घटती बढ़ती रहती है। अभी वह अपने हिस्से की फसल बेचकर घर जा रहा है उसका विचार लड़के की शादी तय करने का भी है उसकी शादी कर देगा तो बड़ौदा में रोटी थापने से निरात मिलेगी। अभी तो गाँव से खबर आई है उसके नाम कोरट का कागज आया है इसलिए वह भागते हुए घर जा रहा है। 
झेमरिया ने बैचेनी से फिर बाहर झाँका। दूर तक फैली नर्मदा की घाटी दिखाई देने लगी। उसने देखा नर्मदा अपने भरपूर दिनों में है बाँध में पानी भरने के कारण बहाव थम सा गया है मटमैला पानी साफ़ काँच नीर हो गया है। दूर तक फैली घाटी में मिटटी के ऊँचे नीचे कटाव वाले टीले थे जिनके बीच तक पानी भरा था। मिटटी के इन टीलों पर जंगली बबूल उगे थे तो कहीं कहीं जहाँ पानी उतर चुका था भैसों की आवाजाही से दलदल सा बन गया था। उसने दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगाये और काँच की फ्रेम में ऊँगलियाँ फँसा कर खिड़की खोलने की कोशिश की पर असफल रहा। वह काँच में आँखें लगाकर नर्मदा को देखता रहा। इस साल बारिश अच्छी हुई इसकी खबर तो उसे आने जाने वालों से मिलती रही थी। बस पुल से गुजर रही थी एक दो खिड़कियाँ जो खुली थीं उनसे एकाध सिक्का फेंका गया जो रेलिंग से टकरा कर गिरा पुल पर या नदी में वह यह ना जान सका।तभी काँच के सामने से धूल सी उड़ती दिखी शायद आगे की किसी खुली खिड़की से मछलियों के लिए लाइ परमल फेंकें गए थे। पम्पिंग स्टेशन के सामने से गुजरते झेमरिया ने उसके अंदर रखी बड़ी बड़ी मोटरों को देखने की कोशिश की बस एक झलक ही देख पाया। नर्मदा को घरों घर पहुँचाने के लिए कितने जतन किये हैं सरकार ने लेकिन कमाने खाने के जतन घर में कर देती तो ऐसे परिवार छोड़ परदेश नहीं जाना पड़ता। झेमरिया ने गहरी साँस ली और सिर को दाएँ बाएँ घुमाकर मन में आई उदासी को झटका , थोड़ी देर में वह पहुँच तो रहा है परिवार के पास। 
दूसरी तरफ की खिड़की से साँवरियाँ सेठ के मंदिर का कलश दिखा उसने पैरों में चप्पल पहन कर पोटली उठाकर गोद में रख ली। बस एक दो ब्रेकर पर उचकती धीमी हुई और रुक गई। सभी को उतरने की जल्दी थी यहाँ से दूसरी बस पकड़ कर गाँव पहुँचने में अभी एक घंटा और लगेगा। सूरज चढ़ रहा था बारिश से धुले पुँछे आसमान में सूरज की किरणे अपनी पूरी प्रखरता के साथ फैली थीं। बस से उतरते ही झेमरिया की आँखें चौंधिया गईं। सामने ही पाटी जाने वाली जीप खड़ी थी झेमरिया जल्दी से गाड़ी में चढ़ गया।
हवा के झोंकों के साथ झेमरिया के विचार भी गति पकड़ने लगे। इस बार इतवारी हाट में माई बापू के लिए कपडे लेगा घरवाली को भी इस बार लुगड़ा दिलवाएगा और उसको खर्ची के लिए पैसे भी दे आएगा। पिछली दफा उसने मांगे थे लेकिन उसके पास किराये पूर्ति पैसे ही बचे थे इसलिए नहीं दे पाया। इस बार फसल अच्छी हुई है उसके पास पैसे भी हैं लेकिन कोरट का कागज़ भी तो आया है , उसकी याद आते ही झेमरिया चिंता में पड़ गया। पंद्रह दिन पहले उसके बापू ने काका के हाथ खबर भिजवाई थी कि कोरट का कागज आया है पैसा की व्यवस्था करके आ जाओ। झेमरिया तो तुरंत आना चाहता था लेकिन फसल कटने में छह आठ दिन की देरी थी। काका बाबा के लड़कों के पास भी पैसे नहीं थे इसलिए उसने खबर भिजवा दी थी कि सरकारी बाबू से कैसे भी करके मोहलत माँग ले। पता नहीं उसमे कितना खर्चा होगा उसके बाद पैसे बचेंगे या नहीं सोच कर झेमरिया उदास हो गया। उसने जैसे थाह सी पाने के लिए जीप के पीछे खड़े लोगों के बीच से मुँह बाहर निकाल लम्बी साँस ली और इस लम्बी गहरी साँस के साथ उसने अपनी विवशता को भी पी लिया। जीप रुक गई झेमरिया को अपने फलिया तक पहुँचने के लिए अभी आधे कोस पैदल चलना था। उसने जीप की तरफ पीठ कर सावधानी से बुशर्ट की जेब से खुल्ले पैसे निकाले जो उसने चलते समय ही खुल्ले करवा लिए थे। वह बड़े नोट नहीं तुड़वाना चाहता था पता नहीं कैसी जरूरत हो पैसे बचाकर रखना ही ठीक है। फलिये की ओर बढ़ते उसने देखा झोपड़ी से धुँआ उठ रहा है बाहर खाट पर उसके बापू बैठे हैं पास ही दो बकरियाँ और तीन मेमने चर रहे थे और आठ दस मुर्गी दाना चुग रही थीं। 'बोकड़ी और मोरगी बढ़ी गई' उसने ख़ुशी से खुद से कहा और तेज़ी से झोपड़ी की तरफ बढ़ने लगा। 
उसके बापू थावरिया ने किसी को झोपड़ी की ओर आते देखा तो आँखों को चुँधियाने से बचाने के लिए एक हाथ माथे पर रख दूसरे हाथ से कमर को सहारा दे खड़ा हो कर देखने लगा और उसे पहचान कर ख़ुशी से चिल्लाया झेमरू हो। जवाब में उसने भी हाथ उठाकर जोर से कहा हो। 
चाय पीकर झेमरिया खाट पर बैठा बापू के साथ बातें कर रहा था माई पास ही जमीन पर बैठी थी वातावरण में मक्की की रोटी की खुशबू फ़ैल रही थी जो उसकी घरवाली मकुन चूल्हे पर बना रही थी।झोपड़ी के आसपास से उदासी उड़ गई थी। बापू ने बिजली के बिल के साथ कोरट का कागज दिखाया जिस पर लिखे अक्षर काले धब्बों से उसकी आँखों के सामने नाचने लगे। उसने सिर उठाकर देखा सूरज चढ़ आया था। अचानक उसे तेज़ गर्मी लगने लगी वह कागज़ हाथ में लिए खड़ा हो गया और गमछे से पसीना पोंछने लगा। 
"क्वाँर की धूप कड़ी हुई गी हे" कहते हुए थावरिया ने खटिया उठा कर छप्पर के नीचे डाल दी। झेमरिया ने एक लोटा पानी पिया फिर कागज़ लेकर खटिया पर बैठ गया। 
"केतरा क बिल है बताया नहीं लेन मेन ने ?"  झेमरिया ने पूछा हालाँकि उत्तर सुनने के इंतज़ार में उसका दिल डूबा जा रहा था। 
"बतायो तो कई नी योज़ कियो के बिल जादा हे नी भरयो तो जेल हुई जावेगी। झेमरिया के केजो के जल्दी करे।" बापू ने चिंतित स्वर में कहा। 
"लेन मेन अई गयो होवेगो हूँ जई ने पता करूँ।" कहते हुए वह उठ कर खड़ा हो गया। 
"रोटड़ा खई जाता," माई ने कहा तो वह सौंधी महक फिर उसके नथुनों में घुसी लेकिन कागज़ की चिंता ने उसे बाहर निकाल फेंका। 
"बाद मs वह झोपड़ी के अंदर घुसा उसकी नज़र आटा चक्की पर पड़ी जाने क्यों उसके मुँह का स्वाद कसैला हो गया। उसने अंदर कोने में रखी लोहे की पेटी की तरफ देखा उसमे ताला लगा था। वह चाबी के लिए आवाज़ लगाने की सोच ही रहा था तब तक मकुन अंदर आ गई। उसने गले में पड़े लाल धागे को निकाला जिसमे चाबी बंधी थी और पेटी का ताला खोल दिया। झेमरिया ने बुशर्ट की जेब से रुपये का बण्डल निकाल कर मकुन को थमा दिया। 
"केतरा हे ?"
"पता लगेगो जरूरत पूरती है के नी।" उसने अनमने से जवाब दिया और वहीँ बैठ गया। मकुन ने धीरे से उसकी जाँघ पर हाथ रखा "हो जायसी, म्हारी राखड़ी रख कर पिसा उठा लेसी तम होसला रखो।" 
'राखड़ी रख देईस तो छुड़ाई कसे ?' झेमरिया ने मन में सोचा पर बोला कुछ नहीं दोनों कुछ देर खामोश बैठे रहे फिर झेमरिया बाहर निकल गया। 
बापू ने कहा "तेरसिंग के साथ लई जा" सुनकर वह ठिठका अकेले जाने में वह डर ही रहा था सरकारी कागज का डर बिल की रकम का डर और सरकारी दफ्तर का डर। झेमरिया ने बगल की टेकरी पर बनी झोपड़ी की तरफ देख कर आवाज़ लगाई "हो भाया" झोपड़ी से उसके काका का लड़का तेरसिंग बाहर निकला और आवाज़ की दिशा में देखने लगा। 
"लेन मेन से मिलने जाना है तू साथ चल।" बिना कुछ बोले तेरसिंग साथ चल पड़ा। 
"तू वापस कब जायेगा ?" झेमरिया ने पूछा। 
"आज रात की बस से।" 
मुख्य सड़क पर आकर दोनों रुक गए अब किस दिशा में जाएँ दोनों को ही समझ ना आया। तीन टपरों के फलिया में कोई बिजली ऑफिस तो था नहीं। दोनों सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे बैठ गए  
और विचार करने लगे। सूरज सिर पर चढ़ गया था पेड़ की छाँव देखते तेरसिंग ने कहा "दस बजी गया होगा लेन मेन एतरा टेम ही जाये हे। थोड़ी देर देखी लां।" दोनों सड़क के मोड़ तक टकटकी लगाए बैठे रहे। बीच बीच में झेमरिया पेड़ की छाँव पर भी नज़र डाल लेता। 
"केतराक बिल आया है?"
" बापू कह रहा था बहुत ज्यादा है, इसलिए सरकारी कागज आया है।" 
"नहीं भर पाया तो ?"
झेमरिया खाली खाली नज़रों से सूनी सड़क पर देखने लगा। "कई जाने काय होगा ? पोलिस रपट तो नी होगी ना ?" उसने लाचारी से तेरसिंग से पूछा। 
"लेन मेन अच्छा आदमी है उससे पता चलेगा। धीर रख सब ठीक होगा।"
"दो साल पहले भी बिल भरने बिजली आफिस गया था वहाँ का साब और बाबू भोत खोटा बोला था।"
"बिल कब से नहीं भरा ?"
"बरसात के पहले भरा था फिर मैं गुजरात चले गया।"
"थोड़ा थोड़ा करके भरते रहना चाहिए" तेरसिंग ने धीरे से कहा। 
लगभग आधे घंटे के इंतज़ार के बाद एक मोटर सायकिल की आवाज़ सुनाई दी। तेरसिंग उठ कर देखने लगा , उसने हाथ देकर गाड़ी को रोका। इलाके का लेन मेन था तेरसिंग थोड़ी देर उससे बात करते रहा फिर उसने झेमरिया को बुलाया। लाइन मेन ने बिल और नोटिस देखा और कहा कल तक बिल भर दो। 
"केतराक बिल है ?" झेमरिया ने डरते हुए पूछा। इस प्रश्न के जवाब पर उसकी मकुन और माँ बापू की ढेर सारी उम्मीदें टिकी थीं। उसका दिल जोरों से धड़क रहा था कान मानों सुन्न हो रहे थे। लाइनमेन ने एक नज़र बिल पर डाली फिर झेमरिया को ऊपर से नीचे तक देखा। चेहरे पर डर और चिंता की लकीरें खिचड़ी बाल गले में पड़ा मैला गमछा धुल धुल कर छिरछिरि हो गई मटमैले सफ़ेद रंग की  बुशर्ट कमर में लिपटा हरे रंग का शाल और पैरों में प्लास्टिक के जूते जो अपने जीवन की दुश्वारियाँ खुद बयान कर रहे थे। झेमरिया की यह हालत देख कर लाइनमेन को भी बिल की राशि बताने में संकोच हो आया। वह बीस साल से इस इलाके में था और सभी की आर्थिक स्थिति जानता था। झेमरिया और तेरसिंग बिना पलकें झपकाये मुँह खोले लाइनमेन को ताक रहे थे। 
लाइनमेन ने धीरे से कहा "आठ हजार दो सौ रुपये " जवाब के इंतज़ार में खुले मुँह अब सदमे और आश्चर्य में बदल गए। 
"तुम कल बड़वानी ऑफिस चले जाना साहब से मिल लेना जो भी कम हो सकता है वह कर देंगें।" लाइनमेन ने सान्तवना भरे शब्दों में कहा। 
"केतराक काम हो जायेगा ?" डूबती आवाज़ में उसने पूछा। 
"यो तो नहीं बताई सकूँ पन साब भला आदमी हैं जो भी करि सकाँगा करि देगा। तम घबराओ मति कल जरूर चला जाजो।"
लाइनमेन के जाने के बाद भी दोनों देर तक सड़क किनारे बैठे रहे। इस साल पानी अच्छा बरसा बीज खाद सभी अच्छे पड़े तो फसल भी खूब हुई। बेटा भी एक बँटाईदार हो गया। तेरसिंग के बाप की तबियत अब ठीक नहीं रहती वह हट गया छोटे काका उसका बेटा और तेरसिंग सहित कुल पाँच बँटाईदार हैं और जमींदार तो है ही। इस साल झेमरिया की कमाई दुगुनी हुई है लेकिन इस साल उसे बेटे की शादी करना है झोपड़ी बनवाना है गाँव में थोड़ी सी जमीन खरीदना है।कितनी बड़ी बड़ी बातें    सोच रखी थीं उसने लेकिन यह बिजली का बिल सब ख़त्म कर देगा। क्या करे चक्की बंद कर दे क्या ? फिर तो बस गुलुप जलेगा इतना बिल नहीं आएगा लेकिन फिर ऊपरी खर्च कैसे चलेगा ? आसपास के दस बारह फलिये में उसके यहाँ चक्की है अच्छा पिसान आता है ऊपरी खर्च निकल आते हैं। नहीं नहीं चक्की बंद नहीं करूँगा अब से हर महीने बिल भरूँगा उसने सोचा। लेकिन कल तो आठ हजार दो सौ रुपये निकल जायेंगे सोच कर ही उसका मन बैठ गया।  

अगले दिन सुबह तक झेमरिया घर के खर्च और पैसों का तारतम्य बैठाता रहा कभी आठ हजार रुपये के साथ कभी उसके बिना। 

"साब" कमरे में झाँकते उसने धीरे से कहा। 
"हाँ अंदर आ जाओ " बड़ी सी टेबल के पीछे माध्यम कद मंझोले शरीर का एक व्यक्ति सामने फैली फाइलों में नज़र गड़ाये बैठा था। उसके सामने ना देखने के कारण झेमरिया ने हिम्मत करके उनके चेहरे पर एक भरपूर दृष्टी डाली और तुरंत नज़रें हटा लीं। एतना बड़ा साहब के ऐसो घूरनों काई अच्छो लगे उसने मन में सोचा। 
"बैठो" बिना उसकी तरफ देखे साहब ने कहा तो वह असमंजस में पड़ गया "कूण जाने साब ने देख्यो नहीं महारा जैसा आदमी के कुर्सी पर बैठालेगा कई ?
कोई आहट ना पाकर साहब ने ऊपर देखा और कुर्सी की तरफ इशारा करके बोले "बैठो बस दो मिनिट।"
हतप्रभ से झेमरिया ने इस बार कुर्सी को और एक बार साब को देखा। बिल की बड़ी रकम , धूप में गाँव से बड़वानी तक का सफर सरकारी ऑफिस में बड़े साहब के कमरे में उनके सामने बैठना कितना बिल माफ़ होगा की धुकधुकी झेमरिया के पाँव काँप रहे थे मुँह सूख रहा था वह धीरे से कुर्सी खींच कर उसके किनारे बैठ गया। बैठ क्या गया समझो बस टिक गया। लगभग पाँच मिनिट बाद साहब ने सारे कागज और फ़ाइल एक तरफ सरकाई और घंटी बजाते हुए उसकी तरफ भरपूर नज़र डालते हुए पूछा "क्या काम है ?"
धड़कते दिल से उसने बिल निकाल कर साहब की तरफ बढ़ा दिया तभी एक आदमी फाइलें उठाने कमरे में आया "ये फाइलें बड़े बाबूजी को देना है। पानी भिजवाओ " साहब ने उसे देखते हुए कहा। पानी सुनते ही उसने अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। साहब ने बिल सीधा किया और देखने लगे। 
"आटा चक्की का कनेक्शन है ?"
"हओ साब"
"इतने महीने से बिल क्यों नहीं भरा ?"
"साब हूँ गुजरात गयो थो म्हारा डोकरा से अवाये नी।" (बूढ़े पिता से आते नहीं बनता )
"छह महीने से बिल नहीं भरा है इसलिए तो इतना बिल हो गया है। तुम लोग कनेक्शन लेते हो तो बिल भरने की व्यवस्था करके क्यों नहीं जाते गुजरात ?"
"गरीब मानुस हूँ साब आप ही कई करी सको हो" उसने हाथ जोड़ लिए। चेहरे पर पसरी लाचारी काँपते कटे फटे धूप से तपे हाथों तक उतर आई थी। 
"कब गए थे गुजरात ?"
"तीन चार महीना हुई गया।"
एक बाई ने पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया वह फिर दुविधा में पड़ गया उठाये या नहीं उठाये ? किसी सरकारी दफ्तर में इतने बड़े साब के कमरे में कुर्सी पर बैठने का ही पहला मौका था उस पर काँच के चमचमाते गिलास में पानी पीना। प्यास पानी को देखकर और तेज़ हो गई थी और उसकी कश्मकश भी। 
"पानी लो" साहब ने उसकी मदद की और उसने हाथ बढ़ाकर गिलास उठा लिया। पानी पीकर उसकी जान में जान आई खाली गिलास धीरे से टेबल पर रखते हुए वह धीरे से कुर्सी पर पीछे खिसक कर  बैठ गया। यह मेज के उस पार बैठे साहब की सज्जनता से उपजा विश्वास था। 
"तुम्हारे झोपड़े के आसपास कितने मकान हैं किसी ने तार तो नहीं टाँगा ?" 
"नहीं साब तार तो नी टांग्यो, बगल में दो झोपड़ा हैं दोनों म्हारा सगा काका छे।"
"तार नहीं टाँगा तो फिर इतना बिल कैसे आ गया ?" साहब की आवाज़ में अविश्वास की बू आई उसे। झेमरिया ने अचकचा कर दोनों पैर सिकोड़ लिए बड़ा साब सरकारी दफ्तर का डर फिर उस पर हावी हो गया।
"कांई बोलूं साब हउ तो यां थो ज नी" ( मैं तो यहाँ था नहीं )
"ठीक है एक आवेदन लिख देते हैं कि तुम तीन चार महीने से बाहर थे तुम्हारे कनेक्शन से बिजली चोरी हुई है इससे बिल थोड़ा कम हो जायेगा। सच बोल रहे हो ना ?"
"हओ साब सच बोलूं। केतराक पिसा कम होयेगा साब ?"
"कितने हैं तुम्हारे पास ?"
झेमरिया ने क्षणांश में हिसाब लगाया और बोला "चारेक हजार हैं।" बोलते हुए उसका कलेजा मुँह को आ गया कहीं बहुत कम तो नहीं बोल दिया। आठ हजार का बिल इतना कम थोड़ी हो पायेगा। अगर नहीं हुआ तो कहीं पूरा ही बिल ना भरना पड़े। 
"बस चार हजार ? इतने से क्या होगा ? कहीं से पैसे की व्यवस्था करो बिल नहीं भरा तो केस कचहरी में जायेगा जेल हो जाएगी। "
झेमरिया का कलेजा काँप गया जेल हो गई तो उसकी बँटाई चली जाएगी कमाई आधी हो जाएगी क्या करे ? मोहलत ले के घर पर विचार करे कल फिर आये ? उसने काँपती आवाज़ में पूरी दीनता से कहा "आप ही कई कर सको हो साब भोत गरीब मानुस हूँ।" 
हूँ कहते हुए साहब ने बिल के पीछे कुछ हिसाब लगाया एक खाली कागज पर कुछ लिखते हुए उन्होंने फिर घंटी बजाई। झेमरिया उन्हें देखते हुए सोचने लगा पता नहीं बिल केतरा काम होयगा ? साब तो कई बोली नी रिया। कूण जाने हउ कमती तो नी बोली दियो ? आठ हजार को बिल चार हजार कैसे होयगो ? साहब की चुप्पी झेमरिया को परेशान कर रही थी। पता नहीं साब ने उसकी बात का भरोसा किया या नहीं ? वे कागज पर कुछ लिख रहे थे तभी एक आदमी अंदर आकर टेबल के पास खड़ा हो गया। उसने एक बार झेमरिया को देखा तो वह सकुचा गया। 
कागज और बिल उस आदमी की ओर बढ़ाते हुए साहब ने कहा "ये इनका बिल कम कर दिया है इस आवेदन पर इनका अँगूठा लगवा लेना और इसे बड़े बाबू को कहकर बिल के साथ फाइल में लगवा लेना।" उसकी तरफ देखते हुए साहब ने कहा "साढ़े चार हजार का बिल है ठीक है? देखो यहाँ किसी से थोड़े पैसों का इंतज़ाम कर लो और बिल भर दो। " 
"साब थोड़ो ओर कमती नी हो सके गरीब आदमी हूँ साब।" ना जाने क्यों मुकुन का चेहरा झेमरिया की आँखों में घूम गया इस बार उसे खर्ची जरूर देकर जायेगा। थोड़ा रो गिड़गिड़ा कर अगर दो पाँच सौ रुपये और कम हो जाएँ तो कोशिश कर ले। 
साहब ने एक नज़र उसकी तरफ देखा खिचड़ी बाल झुके कंधे चेहरे की बेचारगी और निस्तेज आँखें। वह हाथ जोड़े खड़ा था जिस पर खाद की बोरी का बना घिसा हुआ झोला झूल रहा था। साहब ने अपनी जेब से एक पाँच सौ का नोट निकाल कर उस आदमी की तरफ बढ़ाया। "चार हजार इनके पास हैं ये मिलाकर बिल भरवा दो। अब से हर महीने बिल भर दिया करो।"
कुर्सी धीरे से खिसका कर अवाक वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो गया ? आठ हजार का बिल आधा हो गया। उसने चार हजार रुपये बताये तो साहब ने अपनी तरफ से पाँच सौ रुपये दे दिए। मतलब बिल इससे कम नहीं हो सकता था नहीं तो साब कर देते। वह उस आदमी के पीछे पीछे बाहर चला गया। अँगूठा लगा कर बिल भरने में झेमरिया को ज्यादा समय नहीं लगा। उसके बाद वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया। कल से जारी बैचेनी अब बिल आधा होने और बिल भरा जाने के बाद ख़त्म हो जानी चाहिए थी लेकिन वह अब भी बैचेन था। 
तेरसिंग ने कहा था लेन मेन ने बिल कम करने को कियो है लेकिन तू बिल बरोबर पैसे ले जाजे। कदी कम नी हुआ तो फेरती चक्कर नी लगेगा। उसने एक जेब में चार हजार और दूसरी में साढ़े चार हजार रुपये रख लिए थे। साहब ने पूछा तो उसने कम वाले पैसे ही बता दिए। साब ने उसकी बात का विश्वास करके अपनी जेब से पैसे भर दिए। अपनी ही बात को काट कर साब के सामने उससे बोला ना गया। केतरा भला मानस छे साब। लेन मेन ठीकज केतो थो। जिनगी में पेली बार एतरा बड़ा आफिस में कुर्सी पर बैठाडी चमचम गिलास में पानी पीवाडो। ए झेमरिया तू कई एतरा भला मानस के धोको देवेगो ? उसने खुद को धिक्कारा। अब क्या करे ? साब का पैसा वापस करके खुद को झूठा साबित कर दे कि रहने दे साब को धोके में कि उसके पास पैसे नहीं हैं। इन पाँच सौ रुपये में मुकुन के लिए बढ़िया लुगड़ा और पायल भी आ जाएगी। वह उसे थोड़े पैसे हाथ खर्च के दे देगा। क्या करे क्या नहीं की कशमकश में वह देर तक पेड़ के नीचे बैठा रहा। सूरज सिर पर आ गया झेमरिया उठ कर खड़ा हो गया उसने देखा उसकी छाँव छोटी हो गई है। उसने गले में पड़े गमछे से पसीना पोंछा जेब में रखे रुपये देखे उसमे से पाँच सौ का नोट निकाल कर बाकी रुपये सँभाल कर रखे और साहब के कमरे की तरफ चल दिया।

रतिनाथ का पलंग: सुभाष पंत

◆रतिनाथ का पलंग ◆सुभाष पंत बावन साल की उमर में रतिनाथ की जिन्दगी में एक ऐसा दिन आया जब वह बेहद खुश था और अपने को दुनिया का सबसे सुखी प्राणी ...