बुधवार, 13 दिसंबर 2023

विरह विगलित कदंब: पुष्पा भारती

विरह विगलित कदंब
पुष्पा भारती


साहित्य सहवास में चारों ओऱ बड़े करीने से हरियाली उग आई थी। अपनी मेहनत की सफलता पर खुश भी थे भारती जी कि सहसा उनका वही मूल भागवत-प्रेम उनके मन में हिलोरें लेने लगा और जाने कहाँ भटक-भटककर ले आए कदंब वृक्ष का पौधा, खुद उसकी देखरेख की। बालकनी में खड़े होकर उसकी बढ़त देखते और प्रसन्न होते रहते। कुछ वर्ष बाद जब उस वृक्ष में पहली बार फूल आए तो उनके आह्लाद का कोई छोर नहीं था। लरजती आवाज़ में दसियों मित्रों को फोन किए गए, निमंत्रण दिए गए- कदंब के फूल खिले देखने के लिए। मित्र ही नहीं, रास्ता चलते अपरिचित लोग भी ठिठककर फूल देखते थे उन दिनों। उन्हीं दिनों भारती जी ने लिखी थी 'कदंब-पोखऱ' नाम की कविता। और याद है मुझे कदंब से जुड़ा एक मीठा-मीठा झगड़ा भी।

खैर, झगड़े, मान मनौवल की बात यहीं छोड़कर मैं आपको बताऊँ कि कदंब का वृक्ष धीरे-धीरे बहुत विशाल वृक्ष बन गया था। खूब ढेर सारे बड़े-बड़े फूलों की शोभा देखते ही बनती थी। उसे खूब सराहना मिली तो भारती जी को कृष्ण से संबंधित 'छितवन' वृक्ष की याद आती- छितवन की छाँह में नटवर नागर कृष्ण कन्हैया जब तमाम गोपियों के साथ शरत पूर्णिमा की रात में रास रचाते थे उसे महारास कहा जाता था, क्यों कि उस रात भगवान के नृत्य की गति इतनी तेज़ होती थी कि हर गोपी यही समझती थी कि कृष्ण केवल उसी के साथ नाच रहे हैं। जाने कहाँ-कहाँ भटका था इस पौधे की खोज में। दसियों जगह की खाक छानने के बाद पता चला कि 'सप्तपर्णी' नाम से जाना जानेवाला यह वृक्ष दिल्ली की एक नर्सरी में उपलब्ध है। अविलंब लाया गया और अपनी स्टडी के पिछवाड़े से सटी ज़मीन पर उसे रोप दिया गया। जैसी सँवार की गई, उससे वह भी शीघ्र ही पौधे से वृक्ष बन गया। शाख-दर-शाख दनादन फूटने लगी और एक गझिन छायादार वृक्ष खड़ा हो गया। हर शाख पर सैंकड़ों पत्तियाँ ऐसे निकलतीं कि सात-सात पत्तियों का एक संपुट-सा बन जाता और शरद ऋतु आते-आते उन पत्तियों के बीच में सैंकड़ों कलियाँ फूट आती थीं और शरत पूनो पर तो आलम यह होता था कि पत्तियाँ नज़र ही नहीं आती थीं। पूरा-का-पूरा वृक्ष नन्हे-नन्हे फूलों के गुच्छों से भर जाता था। महक ऐसी तेज़ और नशीली कि सारे वातावरण को मदहोश बना दे। उस नशीली सुगंध का भरपूर आनंद लेने के लिए 'शाकुंतल' में रहनेवाले हमें सातों परिवार शरत पूर्णिमा की चाँदनी में इमारत की छत पर इकट्ठा होते थे, बच्चियाँ नृत्य करती थीं, कोई गाना गाता, कोई कविता सुनाता और सब मिलकर मेरी बनाई खीर खाते। बड़ी सुहानी यादें हैं छितवन की।कदंब और छितवन के अतिरिक्त कृष्ण कथा से जुड़े फरद के वृक्ष की बात भी सुनिए। सन १९५६ की बात है। हम लोग पहले कोणार्क में सूर्य मंदिर के दर्शन करने गए, फिर वहाँ से सड़क के रास्ते जगन्नाथ पुरी की ओर चले। रास्ते में हमने एक गाँव में देखा, सड़क के दोनों ओर फरद के पेड़ लगे थे, जिन पर डहडह लाल रंग के कटोरीनुमा फूल खिले थे। फूल तोड़ नहीं सकते थे, क्यों कि पेड़ खासे ऊँचे थे। लेकिन नीचे ज़मीन फूलों से पटी पड़ी थी। मैंने ताज़े-ताज़े फूल चुनकर-बटोरकर अपने आँचल में भर लिए। पुरी पहुँचकर सीधे मंदिर गए और जब जगन्नाथ जी के दर्शन किए तो आँचल के दोनों छोर पकड़कर ढेर-के-ढेर फूल मैंने विग्रह पर बरबस बरसा दिए। पुजारी भी विहँस उठा था। भारती जी को मेरी वह भंगिमा इतनी भी गई थी कि उसकी याद में फरद का वृक्ष भी लगाया गया। साहित्य सहवास में बड़ा वृक्ष लगाने की उपयुक्त जगह नहीं बची थी- भारती जी का कुछ लालच यह भी था कि वृक्ष ऐसी जगह लगे जहाँ अपने घर में बैठे-बैठे हमें वह दीख सके। सो घर के सामने वाली बिल्डिंग के पीछे की ज़मीन पर उसे रोप दिया। पेड़ बड़ा हुआ। मौसम आने पर वही दहकते लाल-लाल फूल खिलने लगे। थोड़ी-सी ही दूरी पर यहाँ एक बर्ड सैंक्चुअरी हैं, जहाँ से ढेरों तोते हमारी कॉलोनी के वृक्षों की फुनगियों पर आकर बैठते हैं। एक बार हमने देखा कि कुछ तोते फरद के फूलों में अपनी चोंच डालकर रस पी रहे हैं। लाल-लाल फूल हरे-हरे तोते! ऐसा मनभावन दृश्य था कि भारती जी ने सड़क की ओर खुलनेवाली खिड़की को तुड़वाकर वहाँ बड़े-बड़े काँच की पारदर्शी दीवार जैसी खिड़की बनवा दी, सुबह वहीं बैठकर चाय पीते और अख़बार पढ़ते थे।गुलमोहर, अमलतास, शेषनाग, रक्त-अशोक, बाँस, आम, बादाम, शिरीष, चंपा, चमेली, रातरानी, मधुमालती, गंधराज, हरसिंगार, कचनार वगैरह-वगैरह सैंकड़ों जातियों के फल-पत्तों से सजे साहित्य सहवास की बाकी सब हरियाली की बात छोड़कर अब कृष्ण से संबंधित इन्हीं तीन वृक्षों की वह बात बताती हूँ जो सिर्फ़ मैं जानती हूँ। ४ सितंबर, १९९७ की रात को भारती जी सोए तो हमेशा के लिए सो गए। सुबह केवल शरीर था, आत्मा विलग हो चुकी थी। उन्होंने अपने हाथों से, बड़े प्यार से इन तीनों वृक्षों को रोपा था, अपनी पूरी ममता देकर सींचा और सँवारा था। उन कदंब, फरद और छितवन ने उनके जाने का सोग जिस तरह अपने ऊपर झेला कि मैं खुद पर शर्मिंदा होती हूँ कि मैं ज़िंदा कैसे हूँ।बंबई में जून के महीने में बरसात आती है। बरसात के एक पखवारे पहले से कदंब में गोल-गोल गुठलियों की शक्ल की कलियाँ दिखाई देने लगती थीं और बारिश के तीन-चार दिन पहले उन गुठलियों पर वासंती आभा लिए सैंकड़ों रेशे निकल आते थे और पूरा पेड़ इतना सज जाता था कि अगर संवेदनाएँ गहरी हैं तो कल्पना में कृष्ण की बाँसुरी भी सुनाई दे जाए। पर क्या भारती जी के देहावसान के बाद जो जून आई तो बरसात आ गई, पर पूरे विशाल वृक्ष पर आठ-दस ही फूल खिले, बाकी कलियाँ यों ही गुठलियों की शक्ल में नीचे गिर गईं। धीरे-धीरे तो वे गुठलियाँ निकलनी भी कम हो गईं। फूल भी इक्का-दुक्का ही दिखाई देते थे। अब दस बरस बाद तो लोग भूलने ही लगे हैं कि इस पेड़ पर कभी फूल आते थे- कोई कहता है, हमारे कदंब को नज़र लग गई, कोई कहता है, पता नहीं क्या बीमारी लग गई है, पर किससे बताऊँ कि... यह घर है, पर भारती जी नहीं- कदंब का वृक्ष है, पर फूल नहीं।जगन्नाथ जी पर हुलसकर फूल बरसाने का साक्षी वह फरद भी अगले बरस आई एक दिन तेज़ आँधी और बरसात में पूरा-का-पूरा वृक्ष अरअराकर सड़क पर गिरा। तोतों को क्या मालूम कि जिन हाथों ने उसे इतने प्यार से लगाया था, उन उँगलियों का और अपनी ओर निहारती आँखों का वियोग नहीं सहन कर पाया और अपना वह रस और लाल दहकते फूल लिए-लिए चला गया, शायद उनकी खोज में कहीं...।------१८ जुलाई, १९८९ को भारती जी को बहुत भयंकर दौरा पड़ा दिल का। क्लीनिकल डैथ भी हो गई थी, पर बड़े चमत्कारिक ढंग से डॉक्टर बोर्जेस ने उन्हें बचा लिया और वे लगभग तीन महीने अस्पताल में रहे- ठीक होकर जब घर आए तब भी डॉक्टर ने पूर्ण आराम की सलाह दी थी। ज़िद की कि मेरा बिस्तर स्टडी में ही लगा दो- यहाँ से गदराया हुआ छितवन दिखाई देता है। उसकी खुशबू बहुत सुकून देती है। वही किया गया- छितवन की छाँह में उन्होंने आराम किया और धीरे-धीरे पूरी तरह स्वस्थ हो गए।फिर उस बरस यानी १९९७ में भी छितवन के पेड़ पर वैसे ही गुच्छे-गुच्छे फूल खिल आए थे- वैसी ही सुहानी खुशबू बगरी हुई थी, पर सबकुछ यों ही छोड़कर ४ सितंबर को भारती जी ने हमेशा के लिए विदा ले ली थी। हम इनसानों का रोना-कलपना और आँसू तो सबने देखे, पर कोई नहीं देख पाया कि छितवन अपनी हज़ार-हज़ार आँखों से कितना रोया, कितना रोया कि उसकी आँखों के आँसू भी सूख गए होंगे, तभी न आठ-दस दिन बाद जब शरत पूर्णिमा आई तब हमारी इमारतवाले लोगों ने देखा कि अरे, इस बार फूल खिलने की बजाय मुरझाने क्यों लगे हैं? खुशबू में कसैलापन क्यों आ गया है? लोगों को फिर वही अफसोस लगा कि इस पेड़ को भी लगता है, जड़ में कहीं कीड़े लग गए हैं। मैं किसी को क्या बताती? केवल श्रीमती लीला बांदिवडेकर को बताया कि कदंब की ही तरह यह भी विरह-विगलित है। अगले वर्षों में कदंब की तरह ही इसमें भी धीरे-धीरे फूल आने बंद हो गए। कदंब तो फिर भी दो कमरे दूर था, पर यह तो स्टडी में एकदम करीब बैठे उनको देखता रहा होगा, इसलिए और भी ज़्यादा तड़प उठा होगा। कदंब में कम-से-कम पत्तियाँ तो निकलती हैं, पर यह तो धीरे-धीरे सूखने लगा और देखते-देखते एकदम ठूँठ हो गया। पिछले दो सालों से छत से भी ऊँचा उठा वह विशाल वृक्ष अपनी नंगी शाखाओं की बाँहें पसारे ठूँठ बनकर खड़ा था, एकदम सूख गया था। बारिश आनेवाली है। कभी यह ठूँठ टूटकर गिरा तो बड़ा नुकसान हो सकता है, इसलिए कल ५ जून को उसे कटवा दिया गया है। जब वह काटा जा रहा था, उस समय अचानक बड़ी तेज़ हवा चलने लगी थी। खिड़की-दरवाज़े खड़खड़ा रहे थे और धूल-मिट्टी के गुबार घरों में प्रवेश कर रहे थे। अचानक भारती जी की स्टडी पर लगी जाली टूटकर गिरी और बाहर जाकर जो मैंने देखा तो ऊपर की साँस ऊपर, नीचे की नीचे और मैं जड़वत हो गई। हवा तेज़ थी ज़रूर, पर पेड़ तो बालकनी की तरफ़ लगा था, यह टूटी शाखा वर्तुलाकार उड़कर इस खिड़की पर दस्तक देने कैसे आ गई?  यह सच है कि कल न उसके पहले चली थीं वैसी हवाएँ, न बाद में चली हैं। क्या तेज़ हवाएँ इसीलिए चली थीं कि इस शाख को उड़ाकर लाना था? उसने खिड़की पर दस्तक दी, जाली से टकराई और खिड़की की मुँड़ेर पर जाकर गिर गई है। अभी भी वहीं पड़ी है। उसकी ओर आँसू से लबालब आँखों से देख रही हूँ। जानती हूँ कि भारती जी की आत्मा तो अब भी इसी स्टडी में बसती है, क्या शाख की बाँहें बढ़ाकर छितवन का वह वृक्ष उनसे अंतिम विदा लेने आया था- या शायद शिकायत करने आई थी यह शाख कि तुमने हमें लगाया था, ये आज काटे ते रहे हैं। या शायद यह मेरे साथ अपनी पीड़ा बाँटने आई थी, उनका स्पर्श प्रतिपल अपने साथ महसूस करती जीती रही हूँ, सो जाते-जाते वह वृक्ष इस टहनी की बाँह बढ़ाकर उन्हें छूने आया था, दुलराने आया था, बतियाने आया था भारती जी से। बार-बार पूछ रही हूँ मुँड़ेर पर लेटी इस शाखा से- मिले वह? छू सकीं उन्हें तुम? देख सकीं? बोल- बतिया सकीं?मेरी पहुँच से दूर पड़ी है वह। वहाँ तक मेरा हाथ नहीं पहुँच सकता, पर जी हो रहा है, उस शाख को एक बार छू लूँ और महसूस कर लूँ उसे, जिसकी तलाश में वह आई है- प्राणपण से भागी आई है। साझे का दुःख भोगा है हमने। वह तो जड़ से कटकर मुक्त होकर मिलन के लिए आई थी। मैं हूँ कि अभी भी जड़ों से जुड़ी जी रही हूँ। कल से बिना खाए-पिए गुमसुम रो-रोकर जीती रही हूँ- पता नहीं कितना और जीना है उनके बिना।

पुष्पा भारती
१३ जुलाई २००९


प्रस्तुति: गंगाशरण सिंह

शनिवार, 21 अक्तूबर 2023

जिज्ञासाओं में समरेश बसु

 समरेश बसु कालकूट बाँग्ला के बड़े कथाकार थे। उनके अनेक बहुचर्चित उपन्यास एवं कहानियों पर फ़िल्में बनीं। उनकी कहानी पर गुलज़ार साहब के किरदार धारावाहिक का एक एपिसोड 'मुखबिर' भी केन्द्रित था जिसमें ओम पुरी और इरफ़ान खान की भूमिकाएँ थीं। उन्हीं समरेश बसु का यह साक्षात्कार पाठकों के लिए प्रस्तुत है।


समरेश बसु






सादर

गंगा शरण सिंह

शनिवार, 15 जुलाई 2023

जीवनपुरहाट जंक्शन: अशोक भौमिक, प्रस्तावना: गंगा शरण सिंह

अशोक भौमिक की तस्वीरों में ज़िन्दगी के जितने रंग दिखाई देते हैं उससे कहीं ज्यादा इन स्मृति आख्यानों में। इस किताब में शामिल इन बाइस 

समृति-आख्यानों में ज़िन्दगी इस कदर साँस लेती है कि काग़ज़ के पन्नों पर लिखी हुई तहरीर अचानक उनकी तस्वीरों की तरह ही हमारे सामने जीवन्त हो उठती है। ज़िन्दगी के तलघर में जाने कितनी कहानियाँ और क़िरदार छुपे रहते हैं किन्तु इन्हें पहचानने और कहने का हुनर सबको नहीं मिलता। अशोक भौमिक के इन आख्यानों में निहित संवेदना, मर्म और मानवीय सरोकार उनके इसी हुनर का कमाल हैं।


अपने जीवन-अनुभवों और स्मृतियों के तलघर से तमाम ऐसे किरदारों को ढूँढकर उन्होंने इन कहानियों का पात्र बनाया जो सभ्य समाज द्वारा हाशिये पर धकेल दिये गये हैं और जिन्दा रहने की जद्दोजहद ने जिनके चेहरों पर अमिट निशान छोड़ दिये हैं।


'जीवनपुरहाट जंक्शन' के ये स्मृति आख्यान मर्म और संवेदना का एक ऐसा अद्भुत जहान रचते हैं जिनकी गूँज पाठकों के जेहन में लम्बे अरसे तक कायम रहेगी।

छोटे हमीद का वह मासूम सा क़िरदार, चौरासी के दंगों में अपना बहुत कुछ गँवाकर कथाकार के गले लगकर रोता सुरजीत, बेहद गरीब किन्तु खुद्दारी की हद तक ईमानदार शरफुद्दीन, आजाद हिंद फ़ौज का वह सिपाही, जिसे जीवन यापन के लिए चौकीदारी करनी पड़ रही थी, जैसे यादगार चरित्रों और छल, कपट , विश्वासघात की अनेक दास्तानें हमारी चेतना को हिलाकर रख देती हैं। किसी कहानी को पढ़ते समय यदि उसकी सच्चाई पर सन्देह हो तो यह बात ध्यान रखें कि इस दुनिया में अमानवीयता का स्तर किसी भी रचनाकार की लेखन सीमा से कई गुना ज्यादा है और कुछ सत्य विश्वनीयता के अन्तिम छोर के बाद शुरू होते हैं।


© गंगा शरण सिंह


 [ पेपरबैक संस्करण का फ्लैप ]

बुधवार, 25 जनवरी 2023

तमाचा: गोविंद सेन

दिनेश आज असहज थे । कई दिनों से वे मन ही मन इस दिन का सामना करने की तैयारी कर रहे थे । आखिर वह दिन आ ही गया था । कितने ही भाव उनके मन में उमड़-घुमड़ रहे थे ।
"सर, आप अभी जाना मत।" मोहन ने थोड़ा झुकते हुए कहा। उसके साथ महेश, रेमसिंग, इंदरसिंग, नारायण, कैलाश आदि चतुर्थ श्रेणी के सभी कर्मचारी थे ।
"हाँ, पर क्यों?"
"बस, हमारा निवेदन है सर।" मोहन के इस आग्रह को दिनेश ने सहज ही शिरोधार्य कर लिया। वे चुप्पी लगाकर स्टाफ रूम में बैठ गए।

वे इस चुप्पी के सहारे धीरे-धीरे भीतर उतरने लगे। चालीस बरस ऐसे गुजर गए जैसे कल की ही बात हो। जब नौकरी में आए थे तो अच्छे खासे बाइस-तेईस साल के  जवान थे । आँखें स्वप्निल थीं । सिर पर चिकने लम्बे काले बाल थे । उस जमाने के फैशन के मुताबिक लंबे बाल रखा करते थे । बालों से कान ढँक जाते थे । कान दिखाई ही नहीं देते थे । अब तो आइना डराने लगा है । बाल अब नाममात्र के रह गए । जैसे बालों को किसी ने नोच लिया हो । लोग उन्हें आराम से टकला या चँदला कह सकते थे । चेहरे पर झुर्रियाँ दिखाई देने लगीं थीं। त्वचा उतनी कसी हुई नहीं रह गई थी । ढीली पड़ती जा रही थी । लगता था कि उन्हें समय ने गुठली की तरह चूसकर फेंक दिया हो । नौकरी उनसे उनका सर्वश्रेष्ठ ले चुकी थी । उन्होंने पढ़ाने में कभी कोताही नहीं की । कठिन पाठों को सरल और रोचक बनाने की भरसक कोशिश करते रहे । घर से पाठ पढ़कर जाते थे । जब भी शहर जाने का मौक़ा मिलता, वे अपने अध्ययन के लिए कई किताबें भी ख़रीद लाया करते थे। ज्ञानार्जन की उनमें भूख थी । वे विषय की  मूल अवधारणाओं  को समझने की कोशिश करते रहते थे । पहले खुद खूब तैयारी करते तब उन्हें बच्चों के लिए ग्राह्य बनाकर प्रस्तुत करते । श्यामपट्ट का उपयोग खूब किया करते थे । पीरियड से निकलने के बाद उनके हाथों पर सफ़ेद डस्ट लगी होती थी । उनके इस शिक्षकीय पेशे में उन्होंने अपने हाथ काले नहीं किए, सर्वथा सफ़ेद बनाए रखने की ही कोशिश की थी । यही कारण है कि साथी शिक्षक उन्हें भले ही न याद करते हों पर उनसे पढ़ चुके कई विद्यार्थी उन्हें याद करते हैं ।

वे अपने आदर्शवाद के कारण कुछ ही महीनों में पुलिस की नौकरी छोड़ कर आ गए थे । पिताजी और अन्य परिजनों ने उन्हें खूब लताड़ा था । इतनी अच्छी नौकरी छोड़कर आना उन्हें बिलकुल नहीं सुहाया । उनका विचार था कि उन्होंने खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है । भला ऐसा भी कोई करता है । पर उन्होंने अपने दिल का कहा मानकर वह पुलिस की नौकरी छोड़ दी । संयोग से बाद में वे शिक्षक बन गए थे । यदि शिक्षक नहीं बन पाते तो उनका क्या होता ! वे अकेले में आज भी सोचते हैं तो सिहर जाते हैं । पर तब जोश अधिक था और होश बहुत कम । पुलिस महकमे में बहुत भ्रष्टाचार है किंतु भ्रष्टाचार किस महकमे में नहीं है ! उन्हें लगता था कि शिक्षक की नौकरी उनके लिए एक आदर्श नौकरी है । इसमें कितना सम्मान और शांति है पर समय के साथ उनका मोह भंग होता गया था। समाज सेवा और खूब पढ़ाने का जज्बा ठंडा पड़ने लगा था। अब उम्र के इस पड़ाव पर आकर तो उन्हें लगता है कि यह नौकरी भी दूसरी नौकरियों की तरह एक नौकरी ही है । यहाँ भी आदर्शों की बहुत गुंजाइश नहीं है । हालांकि उनके विद्यार्थी और अन्य शिक्षक साथी उन्हें जब 'सर' से संबोधित करते हैं तो उन्हें अच्छा लगता है । वैसे उनकी सरलता को लेकर वे पीठ पीछे उनका मजाक भी उड़ाते थे । उनका रहन-सहन एकदम सादा है । ज़रा भी तड़क-भड़क नहीं । वे शर्ट को पैंट में इन नहीं करते थे इसीलिए उन्हें वे 'बिना इन वाला मास्टर’ कहकर हँसा करते थे ।

दीवार पर लगी घड़ी का बड़ा काँटा यांत्रिक गति से आगे बढ़ता जा रहा था । पहला पीरियड ख़त्म होने वाला था । स्कूल यथावत चल रहा था । सब अपने-अपने काम में जुटे थे। हूटर बजते ही कोई डस्टर लेकर जा रहा था तो कोई डस्टर लेकर आ रहा था। कमरों में से बच्चों की आवाजों का शोर उठने लगा था । सब उनसे सायास या अनायास नज़रें चुरा रहे थे । वे चुपचाप और कुछ अनमने-से स्टाफ़ रूम में बैठे थे । ऐसा लगता था कि वे अब इस स्कूल का हिस्सा नहीं रहे। अवांछित हो गए जैसे किसी दीवार के पलस्तर की मियाद ख़त्म होने पर ईंटों के लिए पलस्टर अवांछित हो जाता है । दीवारें प्लास्टर को छोड़ देती हैं । उन्हें अब किसी क्लास में पढ़ाने नहीं जाना है । इसका कोई दबाव उन पर नहीं है । वे मुक्ति का अनुभव कर रहे थे पर यह मुक्ति उन्हें बहुत अजीब लग रही थी । उन्हें ऐसी किसी मुक्ति की आदत नहीं थी ।

सप्ताह में एक दिन मंगलवार भी आता है । लेकिन उनके लिए यह मंगलवार ख़ास था । स्कूल में बतौर शिक्षक आज उनका आखिरी दिन है । उन्हें सेवानिवृत्ति का पत्र थमा दिया गया था । इस हायरसेकंडरी स्कूल में अभी पाँच साल पहले ही आए थे । उनके पिछले पैंतीस वर्ष एक ही ग्रामीण स्कूल में ही कटे हैं । शायद पूरा सेवाकाल उनका वहीं गुज़र जाता पर वे ऊब चुके थे और कुछ त्रस्त भी । उन्हें कई प्रभार सौंप दिए गए थे । दूसरी ओर उनको गेहूँ में घुन की तरह कई बीमारियाँ लग चुकी थीं । दिक्कत होने लगी थी । आने-जाने में  थकावट महसूस करने लगे थे । इसीलिए उन्होंने शहर के हायरसेकंडरी स्कूल में अपना तबादला करवा लिया था । यहीं उनका निवास भी था। हालांकि इसके लिए उन्हें अपने एक महीने के वेतन के बराबर की राशि ऊपर भेंट करनी पड़ी थी। 

यह एक बड़ा स्कूल था । एक-एक क्लास में सौ के लगभग बच्चे । हालाँकि क्लास में कम ही बच्चे आते । नब्बे प्रतिशत बच्चे कोचिंग जाते थे । उनका स्कूल पर विश्वास नहीं था । केवल अपनी उपस्थिति लगवाने के लिए स्कूल में हाज़िर होते थे । हाज़िरी लगते ही फुर्र हो जाते । इसमें शिक्षकों की मौन सहमति होती थी। रेसेस के बाद तो बीस-तीस फ़ीसदी बच्चे ही बचते। लेकिन उन्होंने अपने काम में कोई कोताही नहीं बरती । जितने पीरियड दिए गए वे पढ़ाते रहे । हालाँकि उन्हें  मालूम था कि कुछ व्याख्याताओं और शिक्षाकर्मियों के पास तीन पीरियड से अधिक नहीं थे । कुछ के पास तो सिर्फ़ दो ही पीरियड थे और कोई प्रभार भी नहीं था। ये भेदभाव उन्हें अच्छा तो नहीं लगता था पर उन्होंने कोई विरोध भी नहीं किया। 

सितंबर का यह महीना भी उनकी नौकरी का आखिरी महीना था । उन पर कई चिंताएँ भी सवार थीं । जो सुनने और देखने को मिलता था, वह भयावह था । उनके उसूलों के ठीक उलट । वे कैसे यह सब हेंडल कर पायेंगे ! नियम कुछ बोलते हैं पर हकीकत में होता कुछ और है । चिंता थी उनके सारे क्लेम निपटेंगे या नहीं । समय पर पेंशन मिलेगी या नहीं । जीपीफ,बीमा,ग्रेज्यूटी,अर्निंग लीव वग़ैरह । वही तो उनकी ज़िंदगी भर की कमाई होगी । आगे का जीवन बहुत कुछ उन्हीं पैसों पर ही तो निर्भर होगा । इस बीच उन्हें हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना ‘भोलाराम का जीव’ याद आ जाती थी जिसमें भोलाराम की पेंशन का निपटारा उसकी मृत्यु तक भी नहीं हो पाया था क्योंकि भोलाराम ने फाइल पर वजन नहीं रखा था। इस व्यंग्य रचना को वे एक बार फिर पढ़ गए थे । उन्हें फ़ाइल पर वज़न धरना ही होगा अन्यथा उनका हश्र भी भोलाराम जैसा ही होगा। मृत्यु के बाद भी उनका जीव पेंशन की फ़ाइलों में ही अटका रहेगा। 

स्कूल में केवल एक-दो शिक्षकों से ही उनका मन मिल पाया था । फिर भी सबसे बिछड़ जाने के डर ने उनके मन को थोड़ा कच्चा कर दिया था । सालों तक साथ रहते-रहते सबकी आदत पड़ चुकी थी। कुछ हँसी-मज़ाक़ भी चलता रहता था। इसलिए महीना ख़त्म होने से पहले एक दिन चुनकर उन्होंने पूरे स्टाफ़ को रेसेसे में अल्पाहार करवा दिया था । उन्हें तसल्ली हुई थी कि उस दिन सिर्फ़ दो को छोड़कर सभी उपस्थित थे। स्टाफ़ से अपनी भूल-चूक के लिए सबसे औपचारिक माफ़ी भी माँग ली थी । उसी दिन उन्होंने  प्रिंसिपल साहब से उनके सभी प्रकरणों को जल्दी निपटाने का निवेदन भी कर दिया था ।

उनके जीपीफ के प्रकरण को अभी तक महालेखाकार  कार्यालय नहीं भिजवाया गया था जबकि तीन महीने से उनके वेतन से जीपीफ कटना बंद हो चुका था। उनका जितना जीपीफ कटना था वह तो कट ही चुका था । अब तो उन्हें जीपीफ में जमा पैसा वापस लेना था । जीपीफ का अंतिम हिसाब कर प्रकरण भिजवा दिया जाना चाहिए था । वे चिंतित थे। बाबू ने धीरे से कहा था कि साहब दस हज़ार की माँग कर रहे हैं । पहले सुना था प्रिंसिपल साहब स्टाफ से प्रकरण के पैसे नहीं लेते हैं । शायद यह बात सच नहीं थी ।  सत्ताईस सितंबर को बाबू का फ़ोन आया कि साहब ऑफ़िस में हैं । आप आकर साहब के साइन करवा लो। फिर वे निकल जायेंगे । उस दिन दिनेश सूचना मिलते ही तुरंत स्कूल पहुँचे थे । उन्होंने प्रकरण पर साइन करने के निवेदन के साथ ही प्रिन्सिपल साहब के हाथों में रुपयों का लिफाफा भी रख दिया था । वे मुस्कुराकर बोले थे-“अरे सर, पैसे की क्या ज़रूरत है।” लेकिन लिफाफा रख लिया था।  

हायरसेकंडरी स्कूल में शिक्षकों की कईं श्रेणियाँ थीं। नियमित, शिक्षाकर्मी और अतिथि शिक्षक। नियमित में वे व्याख्याता थे जिन्हें अस्सी से नब्बे हजार प्रतिमाह वेतन मिलता था । उच्च श्रेणी शिक्षक ओहदे में व्याख्ताओं से नीचे आते थे । उन्हें सत्तर के करीब हर महीने मिलते थे । शिक्षाकर्मी भी नियमित ही थे । शिक्षाकर्मियों में वर्ग 1 और 2 थे । इन्हें भी अच्छा खासा वेतन मिलता था। पचास हजार से कम किसी का वेतन नहीं था । इनमें नब्बे प्रतिशत शिक्षकों की खेती भी थी यानी डबल इनकम । दो शिक्षकों की तो पत्नियाँ भी शिक्षिकाएँ थीं । सबसे कम इनकम चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की थी । ये सबसे छोटे कर्मचारी थे पर सबसे ज्यादा मेहनत करते थे । सबसे पहले स्कूल आते थे और सबसे बाद में स्कूल जाते थे।  

दिनेश अंग्रेज़ी पढ़ाते थे । हिंदी हो या अंग्रेज़ी, भाषाओं के पीरियड वैसे भी अन्य विषयों की तुलना में अधिक होते हैं । परीक्षाओं की कापियाँ भी उन्हें ही अधिक जाँचनी पड़ती है । दो वर्ष तो उन्होंने क्लास टीचर होने के बावजूद पाँच पीरियड भी लिए थे । उनका पहला पीरियड तो सिर्फ़ हाज़िरी लेने में ही ख़र्च हो जाता था । चाहते तो क्लास टीचर होने से इंकार कर सकते थे पर यह सोचकर कि आख़िरी समय में कौन इनसे लड़ाई मोल ले, वे चुप्पी साध गए थे । वैसे भी उन्होंने ‘ना' कहना सीखा ही नहीं था। उनकी यही सरलता उनकी सबसे बड़ी दुश्मन थी। उन्हें सेवानिवृत्त होने में महज़ पाँच वर्ष बचे थे इसलिए वे ये सब वे झेल गए थे ।

पिछले साल का विदाई समारोह का दृश्य उन्हें याद आया । अलावा सर सेवानिवृत्त हुए थे । वे उच्च श्रेणी शिक्षक थे । यानी ओहदे में उन्हीं के समकक्ष शिक्षक । उन्हें धूमधाम से विदाई दी गई थी । साफ़ा पहनाकर एक खुली जीप में उन्हें पूरे नगर में ऐसे घुमाया गया था मानो किसी नेता का विजय जुलूस निकाला जा रहा हो । जुलूस के आगे ढोल बज रहा था । उनकी सेवनिवृत्ति के दो माह पहले ही से विदाई समारोह की चर्चा और तैयारी शुरू हो गई थी। तब इस समारोह के लिए ख़ूब चंदा भी वसूला गया था । इस कार्यक्रम के अगुआ बने एके ने सभी शिक्षकों को इस समारोह के लिए ख़ूब मोटीवेट किया था । किसी भी काम के लिए मोटीवेट करने में उनका कोई सानी नहीं था । अलावा सर के नाम पर सब मोटीवेट भी बख़ूबी हो गए थे । भाषणों में उनके अनेक गुण प्रकट किए गए थे । उन्हें एक श्रेष्ठ आदर्श शिक्षक, मिलनसार और अपने विषय का विशेषज्ञ भी निरूपित किया गया । वे हिंदी पढ़ाते थे पर हिंदी की चार लाइन भी सही नहीं लिख पाते थे । गाइडों से प्रश्नोत्तर लिखवा दिया करते थे या गाइड में ही निशान लगवा देते थे। फिर भी उनकी तारीफ़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता था । कभी-कभी सुरापान भी कर लेते थे । वे स्कूल की हर ज़िम्मेदारी को बहुत ग़ैर ज़िम्मेदारी से निभाते थे । इसके लिए उनमें कोई हीन भाव भी नहीं था । वे ट्राइबल के थे । भाषणों में उनके निंदनीय गुणों को दरकिनार कर दिया गया था । उस दिन सभी वक्ताओं को उनके गुण ही गुण दिखायी दे रहे थे। ये गुण ख़ासतौर से उन्होंने अधिक प्रकट किए थे जो पीठ पीछे उनकी जमकर बुराई किया करते थे । दाल-बाफले-लड्डू की पार्टी रखी गई थी । रात में सुरापान भी हुआ था । किसी शिक्षक का ऐसा भव्य विदाई समारोह उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था । 

इससे पहले नंदा मैडम सेवानिवृत्त हुईं थीं । उनकी विदाई को लेकर पहले भले ही काफ़ी खींचतान रही हो, पर अंत में उन्हें भी शानदार विदाई पार्टी दी गई । अख़बारों में उसकी बढ़िया रिपोटिंग भी छपी । उस समय शुरुआत में एके ने ख़ास रुचि नहीं दिखाई थी । चंदा इकट्ठा न हो सका था । कुछ लोग नंदा मैडम की बाल की खाल निकालने की आदत से खफ़ा थे । पर वे नाराज़गी को सतह पर नहीं आने देते थे। वे कहा करतीं- “उस परीक्षा में मेरी ड्यूटी क्यों नहीं लगाई जिसमें पैसे मिलने थे । मेरी फोकट के काम में ड्यूटी क्यों लगा दी ! यह क्लास मैं नहीं लूँगी । मैं क्लास टीचर नहीं बनूँगी ।” वह समय पर कभी स्कूल भी नहीं आती थीं । पर सभी हँस-हँस कर उसकी बात मान लेते थे । पीठ पीछे ख़ूब भड़ास निकाली जाती पर सामने शालीनता से पेश आते । नंदा मैडम में लाख बुराइयाँ सही पर एक गुण ज़रूर था कि उनकी बहन क्षेत्र की विधायक थीं । अब ऐसे एक गुण होने पर तो  सारे अवगुण माफ़ हो ही जाते हैं बल्कि इतनी अकड़ का तो उन्हें अधिकार बनता ही है ।

विधान सभा का चुनाव हुआ । नंदा मैडम की बहन को इस बार टिकट नहीं मिला था । हालाँकि उनके बहन के विधायक रहने तक वे सेवानिवृत्त हो चुकी थीं । अब विधायक प्रेमसिंग थे जो अलावा सर के साले थे । यह संयोग ही था कि दोनों को ही राजनैतिक पृष्ठभूमि होने का भरपूर फ़ायदा मिला । इन दोनों के बरक्स दिनेश जी ख़ुद को नखदंत विहीन पाते हैं । न वे आर्थिक रूप से सबल हैं न राजनैतिक रूप से । उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनकी सेवानिवृत्ति पर ऐसा कोई भव्य आयोजन होगा । इसकी कोई उम्मीद भी उन्होंने नहीं पाली थी । 

स्कूल में कुछ लोगों की ही तूती बोलती थी जिनमें तीन ‘के' प्रमुख थे -एके, बीके और पीके, यह उनके नामों का संक्षिप्त रूप था । पीके यानी प्रिंसिपल साहब । एके और बीके व्याख्याता थे । तीनों के अनुसार ही कार्यक्रम आयोजित होते थे । रूपरेखाएँ बनती थीं । एके कहा करता था कि वह तो उनकी सेवानिवृति से ख़ुद को अनाथ महसूस करेगा। कहता था-“मैं तो आपके स्कूल के गेट पर लोट जाऊँगा और तुम्हें घर नहीं जाने दूँगा।” बीके भी कहा करता था कि आपका विदाई समारोह बढ़िया करेंगे सर। आप हमारे सम्मानीय हैं सर, सबसे वरिष्ठ । फिर पता नहीं उनकी सेवानिवृत्ति पर उनके पीछे स्टाफ़ में क्या बातें चलती रहीं, वे नहीं जानते। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनके लिए भव्य या शानदार कहे जाने वाला विदाई समारोह होगा, ऐसा तो वे चाहते भी नहीं थे, पर एक सादे समारोह की क्षीण-सी अपेक्षा तो उनके मन में ज़रूर थी । यदि उनसे पूछा जाएगा तो जरूर कहेंगे कि ऐसा सादा कार्यक्रम हो जिसमें ख़र्च कम से कम हो । भव्यता उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं । हालाँकि उनके सादा जीवन और उच्च विचार के फ़लसफ़े को कौन पसंद करेगा! फिर भी वे अपनी ओर से कहेंगे तो ज़रूर कि फ़ालतू ख़र्चा न हो । सिर्फ़ एक छोटा कार्यक्रम हो जिसमें मन के कुछ आत्मीय भाव प्रकट किए जाएँ और बाद में अल्पाहार । मूल तो भाव हैं । भाव प्रकट करने में पैसा नहीं लगता किंतु भव्यता का आहार पैसा ही है । जहाँ भव्यता होती है वहाँ भाव तो छिप ही जाते हैं । भव्यता में प्रदर्शन अधिक होता है, भावना कम ही होती है ।

घड़ी का बड़ा काँटा तीन पर पहुँच चुका था । वे उद्विग्न थे । तभी उन्हें लेने के लिए मोहन और इंदरसिंग उनके सामने हाजिर हो गए। विनम्रता से बोले-“चलो, सर कमरा नंबर एक में चलते हैं।” कमरा नंबर एक कुछ ऐसा सजा हुआ था मानो कोई कार्यक्रम किया जा रहा हो । उन्हें बीच की कुर्सी पर आदरपूर्वक बैठाया गया। सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी उन्हें अपनी ओर से विदाई दे रहे थे । टूटे-फूटे शब्दों में अपने भाव व्यक्त कर रहे थे। मोहन कह रहा था कि सर ने औरों की तरह उन्हें चपरासी नहीं समझा । कई बार खुद ही अपने हाथ से पानी पी लिया करते थे । कभी अन्य शिक्षकों की तरह हम पर रौब नहीं झाड़ा । हमारी हारी-बीमारी में हमारे साथ खड़े रहे । मदद की । मेरे लड़के राम को सर ने फ्री में पढ़ाया । वो अंग्रेजी में कमजोर था पर सर की कृपा से उसकी नैया पार हो गई । सर माथा देखकर तिलक लगाने वालों में से नहीं हैं । सर का आशीर्वाद सदैव हम पर बना रहे। फिर मोहन, इंदरसिंग, कैलाश, नारायण आदि सभी ने उनके गले में गेंदे के फूलों का माला पहनायी । दिनेश के पाँव सबने छुए । दिनेश माला उतार कर टेबल पर रखने लगे तो सब ने ऐसा न करने के लिए कहा । चमकीले रंगीन रैपर में लिपटे गिफ्ट आइटम उन्हें दिए गए । अंत में सभी को मिठाई और नमकीन का अल्पाहार करवाया गया । सबसे पहले दिनेश को मिठाई खिलायी गई । उनकी आत्मीयता से दिनेश की आँखें डबडबा आईं थीं । वे बड़ी मुश्किल से भर्राए गले से जैसे-तैसे आभार ही व्यक्त कर पाए थे।

मोहन सहित सभी चपरासी उन्हें लंबे गलियारे से घुमाते हुए सम्मानपूर्वक गेट तक ले गए । सभी शिक्षक यह सब देखते जा रहे थे और आँखें भी चुराते जा रहे थे । प्रिंसीपल साहब अपने कक्ष से बाहर नहीं निकले। एके और पीके छुट्टी पर थे। शायद जान-बूझकर । जिस काम को साठ-सत्तर हजार पाने वाले शिक्षक और प्रिंसिपल नहीं कर पाए वह इन मामूली सा वेतन पाने वाले चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों ने कर दिखाया था । उपस्थित सभी शिक्षकों को लग रहा था कि उनके गालों पर किसी ने तमाचा मार दिया हो । वे मन ही मन तिलमिला रहे थे । दिनेश मन में शंकित भी थे कि स्कूल के ये शिक्षकगण बाद में इन बेचारों से बदला न लें । इन्हें उनका कोपभाजन न बनना पड़े । उनका यह विदाई समारोह शिक्षकों को चुभ रहा है, यह तो उन्हें दिख ही रहा था । पर चींटियाँ हाथियों से कब डरी हैं! दिनेश ने उनके साहस की मन ही मन सराहना की।

जब दिनेश सबसे विदा ले कर मोटर साइकिल की ओर मुड़े तो मोहन ने रोक दिया । उसने  दिनेश से कहा-“सर,आज आप मोटरसाइकिल चलाकर नहीं जाओगे। हम खुद आपको घर तक छोड़ने जायेंगे।” 

दिनेश अभिभूत थे । उनकी गरदन फूल मालाओं से लदी थी । मोहन मोटर साइकिल चला रहा था । वे पीछे की सीट पर बैठे हुए थे । पीछे चार मोटरसाइकिल चल रही थीं । कुल नौ चपरासी उन्हें छोड़ने के लिए उनके घर की ओर एक रैली की शक्ल में रवाना हो गए थे । सबके हाथों में उनके लिए लाए गए चमकीले रैपर में लिपटे गिफ़्ट आयटम थे । काफ़िला उनके घर की ओर बढ़ता जा रहा था।

दिनेश की आँखें भर आईं । वे भीतर तक भीग गए थे ।  वे कृतज्ञता से झुके जा रहे थे । उन्हें अब तक मालूम ही नहीं था कि इन छोटे समझे जाने वाले लोगों के दिल में उनके लिए कितना प्यार भरा था । दूर कही गूँज रहा था-“तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो, जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता।”
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रतिनाथ का पलंग: सुभाष पंत

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