सोमवार, 22 अप्रैल 2019

मुक़म्मल नहीं, खूबसूरत सफर हो (भाग 2) : पराग मांदले

6
दिल्ली आने के बाद वह पहला दिन था जब मैं ऑफिस नहीं गई थी। बीती रात जब ऑफिस से लौट रही थी तो तेज़ बारिश शुरू हो गई। दिल्ली में आने के बाद यह पहली बारिश थी। मैंने घर से बहुत पहले ही ऑटो छोड़ दिया और बारिश में भीगते हुए पैदल घर की ओर चल पड़ी। हालाँकि मौसम में अच्छी खासी ठंडक हो गई थी और कुछ ही देर में पूरी तरह से भीगने के बाद शरीर में कँपकँपी छूट रही थी मगर मैं इससे घबराकर बारिश की बूँदों से भीगने के अपने आनंद को छोड़ नहीं सकती थी। घर पहुँचने की कोई हड़बड़ी करने की जगह मैं बहुत धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ा रही थी।
जिस जगह मैं रह रही थी, चार मंजिला मकान था वह। ग्राउंड फ्लोर पर मकान मालिक, पहले और दूसरे फ्लोर पर किरायेदार। तीसरे फ्लोर पर सिर्फ एक कमरा, एक किचन और टॉयलेट-बॉथ। बाकी सारी खुली छत। वही मेरा आशियाना था। घर पहुँची तो मारे छींकों के बुरा हाल था। बारिश की बूंदों ने शरीर की गर्मी ही नहीं, ताकत भी जैसे छीन ली थी। किसी तरह चाय बनाई और आधी चाय पीकर ही निढाल होकर बिस्तर पर गिर गई। आधी रात को नींद खुली तो बदन बुरी तरह से टूट रहा था। तेज भूख भी लगी हुई थी। बड़ी हिम्मत जुटाकर मैगी बनाई और खाने के बाद बर्तन वैसे ही छोड़कर फिर बिस्तर पर जा गिरी।
अगली सुबह नींद खुली तो बदन भट्टी की तरह तप रहा था। उठने की कोशिश की मगर लड़खड़ाकर फिर वहीं गिर पड़ी। इसके बाद जैसे होश ही नहीं रहा। किसी के हिलाने से आँख खुली तो देखा, सागर सर मुझे जगाने की कोशिश कर रहे थे। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने ध्यान से उन्हें देखने की कोशिश की। क्या सचमुच सागर सर मेरे सामने थे या फिर मैं कोई सपना देख रही थी। मैंने खुद को पिंच करके देखना चाहा मगर हाथ थे कि उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मैंने अपनी आँखें सागर सर के चेहरे पर जमानी चाही मगर अचानक मेरी आँखों के सामने तेज़ रोशनी के दो गोले चमकने लगे। कुछ पल तो उस चमकती रोशनी में मुझे कुछ भी नज़र नहीं आया। कुछ देर बाद जब आँखें उस रोशनी की अभ्यस्त हुईं तो देखा सामने सफेद बादलों का सैलाब आया हुआ था। रोशनी के दोनों गोले मेरे आगे-आगे बढ़ने लगे। तेजी से घूमते हुए वे उस सैलाब को काटते हुए जगह बना रहे थे। मैं उनकी बनाई पगडंडी पर दौड़ने लगी। सफेद बादलों की जमीन, सफेद बादलों की ही दीवार और सफेद बादलों की ही छत। फिर पगडंडी ऊपर की ओर उठने लगी। थोड़ी ही देर में मैं सफेद बादलों के उस सैलाब के ऊपर थी। हवा में तैरती हुई। मुझे अपने से कुछ दूरी पर सागर सर जाते हुए दिखाई दिए। मैं आवाज़ लगाते हुए उनके पीछे दौड़ी। मेरी आवाज़ से चौंककर सागर सर ने पीछे मुड़कर देखा। सागर सर के चेहरे पर बुद्ध की तरह शांति छाई हुई थी। उन्होंने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया। निशिगंधा की महक का एक तेज़ झौंका मेरे करीब आया। उस महक के रूपहले तेज ने मुझे चारों ओर से घेर लिया। मेरे पाँवों के नीचे उस महक के दो चक्के चलने लगे थे। मैं उन चक्कों पर सवार तेजी से सागर सर की ओर बढ़ी। सागर सर ने अपनी बाँहों को फैलाया और मुझे अपनी गोद में उठा लिया। मैं एक नीली पारदर्शी नाव में सवार थी जो उस दूधिया सागर के ऊपर तैर रही थी। सागर सर के हाथ चप्पुओं की जगह उस नाव को आगे धकेल रहे थे। मगर उनका चेहरा मुझे दिखाई नहीं दे रहा था। फिर एक हाथ नाव की बगल से निकल कर ऊपर उठा। उस पर से पानी की हरी बूंदे नीचे टपक रही थीं। सागर सर ने वह हाथ मेरे चेहरे पर फेरा। जलते तवे पर जैसे पानी की बूंदे छनक गई थीं। अचानक नीली हवा चलने लगी। उसने सारे वातावरण को एक अजीब-सी ठंडक से भर दिया था।
मैं कमल के एक विशाल पत्ते पर लेटी किसी सरोवर में तैर रही थी। मेरे पास ही एक विशाल कमल-पत्र पर सागर सर आँखें बंद किए हुए बैठे थे। किसी योगी-सा वेश था उनका। सिर पर घनी जटाएं। दोनों कमल-पत्र एक-दूसरे से सटे हुए थे। उस सरोवर के किनारे पर बर्फ से ढँके पहाड़ों पर रूपहली रोशनी फैली हुई थी। मेरा मन अचानक श्रद्धा से लबालब भरकर छलकने लगा। मैं उठ बैठी। मैंने हाथ बढ़ाकर एक कमल का पुष्प तोड़ा और उसे सागर सर के शीश पर रख दिया। सिर पर रखते ही जैसे कमल के पुष्प में एक विस्फोट हुआ। सागर सर की जटाएं अचानक खुल गईं और ऊपर आकाश की ओर उठ गईं। जटाएं आकाश में तेजी से उठती जा रही थीं। इतनी तेजी से कि मेरे लिए अपनी आँखों को उन पर टिकाए रखना मुश्किल हो रहा था। ऊपर उठते हुए वे जटाएं चांद तक जा पहुँची थीं। उन्होंने कुछ ही क्षणों में चांद को ढँक लिया। जैसे ही चांद उन जटाओं की ओट में हुआ, जटाओं ने असंख्य तारों का रूप ले लिया। किसी आकाशगंगा की तरह से लगने लगी थीं जटाएं। मैंने सागर सर की ओर देखा। सागर सर का पूरा शरीर तेज-पुँजों में बदल गया था। वे तेजकण यदि किसी मानव शरीर की धुंधली-सी आकृति ना बना रहे होते तो शायद मैं जान ही नहीं पाती कि सागर सर सामने बैठे हैं। मैं उन तेज कणों में सागर सर का चेहरा खोजने लगी। चेहरे के आकार में चमकते तेजकणों में मुझे सागर सर का चेहरा नहीं दिख रहा था। मैंने अपनी दृष्टि को उस आकार पर केंद्रित किया मगर मेरी लाख कोशिशों के बाद भी मुझे स्पष्ट रूप से चेहरा नहीं दिखाई दिया। मेरी आँखें नींद से बोझिल होने लगीं।

7
नींद खुली तो मैं किसी अनजान जगह पर थी। सुरूचिपूर्ण ढंग से सजा हुआ कमरा। एक ओर की दीवार पर तीन पेंटिंग लगी हुई थीं। एक किसी स्त्री का पोर्ट्रेट और दो लेंडस्केप्स। कमरे के एक ओर एक बड़ी बुकशेल्फ थी, जिसमें करीने से किताबें सजी हुई थीं। उसके ठीक सामने की दीवार से लगा ठीक बीचो-बीच एक डबल बेड था, जिस पर मैं लेटी हुई थी। उसके दोनों ओर दो साइड टेबल्स थीं। एक पर एक कलात्मक नाइटलेम्प रखा हुआ था और दूसरे पर पानी से भरा काँच का एक जग और एक गिलास। साथ में कुछ दवाएं रखी हुई दिख रही थीं। मैंने दिमाग पर बहुत जोर डालने की कोशिश की, मगर मुझे कुछ भी याद नहीं आया कि मैं यहाँ कैसे पहुँची। मुझे तो यह भी याद नहीं आया कि यहाँ पहुँचने के पहले मैं कहाँ थी और मेरे साथ क्या हुआ था।
कुछ भी जानने-समझने के लिए पहले उठना जरूरी है, मैंने सोचा। शरीर पूरी तरह से शक्तिहीन महसूस हो रहा था। मैंने अपनी पूरी ताकत और हौंसले को समेट-सहेजकर उठने की कोशिश की।
“अरे...अरे....उठो मत, लेटी रहो ऐसे ही।” एक मुलायम स्त्री आवाज़ उभरी।
मैंने आवाज़ की दिशा में चेहरा घुमाया तो देखा सामने दरवाज़े से हाथ में फलों की तश्तरी लिए हुए एक स्त्री प्रवेश कर रही थी, जिसे जाहिर है, मैं जानती नहीं थी। मगर उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वह मेरी बहुत पुरानी परिचित हो। मैंने गौर से देखा। उम्र तीस-पैंतीस के बीच थी कुछ। छरहरा बदन। कुछ साँवला-सा रंग। तीखे नयन-नक्श। लम्बी नोकदार नाक। होंठ जैसे करीने से छाँटे हुए। बदन पर कॉटन का कुर्ता और सलवार। हाथों में सोने की दो चूडियां, गले में एक चांदी की मोटी-सी चेन। शायद अभी कुछ देर पहले ही नहायी थी, इसलिए गीले बाल कंधों पर बिखरे हुए थे। कुल मिलाकर प्रभावी व्यक्तित्व, सादगीपूर्ण किंतु अभिजात।
उन्होंने साइड टेबल पर फलों की तश्तरी रखी और पास रखा एक स्टूल पलंग के पास खिसकाकर बैठ गयीं।
“मैं कविता ...... हम पहली बार मिल रहे हैं मगर तुम्हारे बारे में बहुत सुन रखा था मैंने।” मुस्कुराकर उन्होंने कहा।
कविता.....कविता...... कहीं सुना हुआ-सा नाम लग रहा है। मैंने दिमाग़ पर जोर डालते हुए सोचा। लेकिन जानकारी का कोई सिरा हाथ में नहीं आ रहा था।
“सागर अभी कुछ देर पहले ही सोने गया है। शाम को तुम्हारे घर से ले आया था तुम्हें। बुरी तरह से तप रही थी तुम बुखार में। डॉक्टर आकर देख गए थे। बुख़ार कम नहीं हो रहा था इसलिए रातभर तुम्हारे सिरहाने बैठकर ठंडे पानी की पट्टियां बदलता रहा था वह। अभी कुछ देर पहले ही मैंने भेजा उसे सोने के लिए। एक-आध घंटा सो लेगा तो कुछ काम कर पाएगा ऑफिस में।” एक स्नेहिल मुस्कान लगातार उनके चेहरे पर बनी हुई थी।
ओह......तो ये हैं कविता......सागर सर की पत्नी........मतलब मैं सागर सर के घर में हूँ। अचानक सारे उलझे हुए सिरे एक साथ सुलझ गए थे।
“मुझे तो कुछ पता ही नहीं कि कब सागर सर मेरे यहाँ पहुँचे और कब मुझे यहाँ लेकर आए।” मैं पीछे सरककर थोड़ा-सा उठी। कविता ने तुरंत मेरी पीठ के पीछे एक तकिया लगाया।
“तुम्हें कैसे पता चलता। तुम तो बेहोश-सी पड़ी थी। तुम कल ऑफिस नहीं पहुँची और कोई फोन भी नहीं किया। सागर ने तुम्हारे मोबाइल पर कॉल की तो वह स्वीचऑफ था। इसलिए ऑफिस से तुम्हारा एड्रेस लेकर वह शाम को तुम्हारे घर पहुँचा। वहाँ देखा तो तुम लगभग बेहोश पड़ी थी। अब यहाँ दिल्ली में तुम्हारी देखभाल करने वाला है ही कौन, इसलिए वह तुम्हें यहाँ ले आया।”
“मेरी वजह से सागर सर को और आपको नाहक परेशानी हुई।” मैंने कुछ सकुचाकर कहा।
“बीमार हो, वरना इस बात पर एक थप्पड़ लगाती तुम्हें। अरे तुम कोई परायी हो क्या। यह ठीक है कि हम इससे पहले कभी मिले नहीं। कोई संयोग ही नहीं बन पाया ऐसा। मगर तुमसे जरा भी अपरिचित नहीं हूँ मैं। सागर अक्सर तुम्हारी बातें करता है। तुम्हारी मेहनत, तुम्हारी लगन, तुम्हारी प्रतिभा की बहुत तारीफ़ करता है। और मेरे बारे में भी कुछ ना कुछ तो बताया ही होगा तुम्हें उसने।” कविता की बातों में या स्वर में कहीं भी औपचारिकता नहीं थी।
“हाँ, थोड़ा-बहुत तो बताया है सर ने।” मैंने कहा।
“थोड़ा ही बताया होगा। मैं जानती हूँ। ऑफिस में उसे सिवाय अख़बार के कुछ सूझता नहीं है। कई बार तो वह यह भी भूल जाता है कि उसकी शादी हो चुकी है और उसका एक घर भी है, जहाँ उसकी बीवी रहती है।” कविता खिलखिलाई। चमेली के फूल झरे जैसे।
“वैसे उसे दोष देने का अधिकार मुझे है नहीं। जब मैं किसी पेंटिंग को पूरा करने के जुनून में डूबी हुई होती हूँ तो मेरा भी यही हाल रहता है। मुझे भी तब न घर का कोई होश रहता है और न ही सागर का। फिर अक्सर अपनी एक्जिबिशन के सिलसिले में बाहर भी रहती हूँ मैं। मगर वह कभी कोई शिकायत नहीं करता।”
“आप क्या कह कर पुकारती हैं सर को?” जिस तरह से कविता सागर सर का उल्लेख कर रही थीं, शायद उसी से प्रेरित होकर यह सवाल आया था मेरे मन में।
“मैं...... सागर ही कहती हूँ उसे ......क्यों तुम्हें क्या लगा कि मैं उसे ऐ जी, ओ जी, सुनो जी जैसे सम्बोधनों से पुकारती हूँ?” कविता जोरों से हँसी।
मैं झेंप गई। “नहीं...... आप जिस तरह से उनका उल्लेख कर रही हैं, वह मेरे लिए नया है।”
“ओह...... हाँ, कई लोगों के लिए नया होता है। मगर सागर मेरा अच्छा मित्र है। पति होने के पहले से। और हमारे बीच औपचारिक सम्बोधन की दीवार बहुत पहले ही टूट गई थी, शादी से बहुत पहले। तो शादी के बाद भी सब कुछ उसी तरह रहा। पति होने का मतलब यह थोड़े ही होता है कि कोई मित्र ही ना रहे।”
“अच्छा.... आपकी पहली मुलाकात कहाँ हुई थी?” ना जाने क्यों मेरे भीतर अचानक उन दोनों की पहली मुलाकात को लेकर उत्सुकता जाग उठी थी।
“पेंटिंग एक्जीबिशन में ही मिले थे पहली बार हम। एक पहली बार उसमें यह भी था कि वह चार नये चित्रकारों की पेंटिंग्स की एक्जीबिशन थी, चारों पहली बार ऐसी किसी एक्जीबिशन का हिस्सा बने थे और मैं उनमें से एक थी।” कविता ने बताया।
“ओह.....मतलब सागर सर की भी पेंटिंग में रूचि है।” यह मेरे लिए नयी जानकारी थी।
“अरे वह बहुत अच्छा आर्ट क्रिटिक है। इधर उसने इस फील्ड को थोड़ा नज़रअंदाज़ किया हुआ है वरना आर्ट सर्कल में एक क्रिटिक के रूप में उसकी अच्छी-खासी इज्जत रही है लम्बे समय तक।” कविता ने इस बीच बातें करते हुए एक सेब छील कर उसके टुकड़े कर दिए थे। उन्होंने वह प्लेट मेरी ओर बढ़ाई।
मैं थोड़ा सकुचाई। इस पर उन्होंने सेब का एक टुकड़ा उठाकर मेरे मुँह में भर दिया। मैं अरे...अरे ही करती रह गई।
“देखो, फिलहाल तुम मेरी कस्टडी में हो। और अगले दो-चार दिन तो तुम्हें रिहाई की कोई गुंजाइश दिखती नहीं है। इसलिए इतना समझ लो कि तुम्हें सिर झुकाकर मेरी हर बात माननी पड़ेगी। बहुत सख्त जेलर हूँ मैं। अपनी आज्ञा की जरा भी अवहेलना बर्दाश्त नहीं कर सकती।” कविता ने झूठ-मूठ का गुस्सा ओढ़ा चेहरे पर।
मैं मुस्कुरा दी। साथ में वह भी।
“तो पेंटिंग्स ने मिलाया आपको।” मैंने बात का टूटा हुआ सिरा फिर से थामा।
“हाँ, हम अक्सर किसी ना किसी एक्जिबिशन में टकरा जाते थे। कभी-कभी उनमें मेरी भी पेंटिंग्स हुआ करती थीं। उसे मेरी पेंटिंग्स पसंद आती थीं। और फिर धीरे-धीरे मैं भी पसंद आने लगी।” कविता ने मुस्कुराकर कहा।
“और आपको कब पसंद आये वो?” मेरी उत्सुकता इस कहानी में बढ़ने लगी थी।
“तुम जिस तरह से पूछ रही हो, उस तरह से तो बहुत बाद में। दरअसल मैं बहुत आत्मकेंद्रित और महत्वाकांक्षी रही हूँ। एक लम्बे समय तक मैं सिर्फ अपनी पेंटिंग्स की दुनिया में ही खोयी रही थी। प्यार या शादी जैसे ख़्याल भी मुझे छूते नहीं थे। लेकिन सागर की दोस्ती मुझे पसंद थी। उसे किसी की निजता को ठेस लगाए बिना उसकी ज़िन्दगी का हिस्सा बनना आता है।”
“तो फिर पहल किसने की?” मुझे बहुत कुछ जानना था उनके बारे में।
“मैं तो उसके बारे में इस तरह से सोचती ही नहीं थी, सो पहल करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। जाहिर है, उसने ही पहल की थी।” कविता ने शरारत से कहा।
“और आपने क्या कहा तब?”
“पागल हो गया है क्या बे!”
मेरे चेहरे पर कुछ असमंजस के भाव उभरे।
“ठीक यही वाक्य कहा था मैंने उसे।” कविता ने खिलखिलाते हुए कहा। “उस समय तो मैंने उसकी बात को हवा में उड़ा दिया था। मगर वह अपनी बात पर टिका रहा। तब मैंने शर्तों की एक लम्बी लिस्ट उसको थमा दी।”
“अच्छा.... कौन-सी शर्तें?” यह कहानी मेरी सुनी-पढ़ी प्रेम कहानियों से बहुत अलग लग रही थी।
“उसमें सबसे पहली शर्त तो यह थी कि वह शादी के बाद भी पति के किसी भी तरह के अधिकार का दावा नहीं करेगा। मुझसे खाना पकाने या घर को साफ रखने की उम्मीद नहीं करेगा। मेरे कहीं भी आने-जाने पर किसी तरह की रोक-टोक नहीं करेगा। मैं जब पेंटिंग बनाऊंगी या किसी भी वजह से अकेली रहना चाहूँगी तो वह मेरे अकेलेपन में किसी तरह की दखलअंदाजी नहीं करेगा। मेरी मर्जी के खिलाफ़ मुझसे किसी भी प्रकार के शारीरिक सम्बन्ध का आग्रह नहीं करेगा। और मुझसे बच्चा पैदा करने का आग्रह नहीं करेगा।”
“बाप रे!”  मेरे मुँह से निकला। “और उन्होंने आपकी शर्तें मान लीं?”
“हाँ, मानी ही नहीं, उसे पिछले सात सालों में पूरी तरह से निभाया भी है। इनमें से बस एक ही शर्त ऐसी थी, जिस पर उसने कहा कि इस बारे में हमें चर्चा करनी चाहिए।”
“कौन-सी शर्त थी वह?” मेरी उत्सुकता चरम पर थी।
“उसे बच्चों से बहुत प्यार है। वह चाहता था कि चाहे जब भी हो, मगर हमारा एक बच्चा जरूर रहे।”
“फिर आप इससे सहमत हुईं?”
“मैंने उससे साफ कहा कि अगले दस-पंद्रह साल मेरे करियर की दृष्टि से, मेरी उर्जा और मेरी सृजनात्मकता की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, इसलिए तब तक तो मैं बच्चे के बारे में किसी भी तरह से सोच ही नहीं सकती।”
“लेकिन क्या तब तक इसके लिए देर नहीं हो जाएगी?” मुझे पता था कि इस समय सागर सर की उम्र चालीस के करीब थी और कविता शायद उनसे पाँच ही साल छोटी थीं।
“हाँ, मैं जानती हूँ कि 42-45 की उम्र में तो मेनोपाज़ करीब आ जाता है। उस उम्र में बच्चा पैदा करना उतना आसान नहीं होता। मगर बात बच्चे की थी। वह हमारे द्वारा ही पैदा किया हुआ हो, यह कहाँ जरूरी था। हम दोनों में से किसी का भी यह आग्रह नहीं था। इसलिए यह तय हुआ कि जीवन में जब भी कभी हम दोनों को यह महसूस होगा कि अब हम बच्चे को संभाल सकते हैं, हम कोई बच्चा अडॉप्ट कर लेंगे।” कविता ने बहुत सहजता से कहा।
मैं आश्चर्य से उनकी ओर देखती ही रह गई।
“लेकिन हर स्त्री का यह सपना होता है कि वह माँ बने। आपने नहीं देखा कभी यह सपना?” न चाहते हुए भी मैं यह सवाल करने से अपने-आप को रोक नहीं सकी।
मगर कविता के चेहरे की सहजता ज्यों की त्यों बनी रही। “यह सपना हर स्त्री का है, यह किसने भरा हमारे मन में, क्या कभी सोचा है तुमने? क्या संपूर्ण स्त्री जन्म की सार्थकता एक सिर्फ इसी उपलब्धि में है? और फिर जिन्हें किसी वजह से बच्चे ना हो सकते हों, क्या उन स्त्रियों का जन्म पूरी तरह से निरर्थक है? क्यों एक स्त्री शादी करने को, बच्चे पैदा करने को और एक पतिव्रता नारी बनकर घर संभालने को ही अपने जन्म और जीवन का कुल हासिल समझे? मेरे जन्म का, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, लक्ष्य क्या है और सार्थकता किसमें है, यह मेरे लिए भी बहुत बड़ा, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण सवाल रहा है सालों से। मगर इसका वह जवाब मैं मान्य नहीं कर सकती, जो सदियों से हर माँ-बाप और समाज लड़कियों के मन में भरने की कोशिश करता रहा है। बच्चे पैदा करना और एक पतिव्रता पत्नी बनकर चूल्हे-चौके तक सीमित रहकर अपनी जीवन की सार्थकता खोजना मेरी राह नहीं। जिन्हें इसमें अपने जीवन की सार्थकता लगती है, उन्हें किसी भी तरह से हेय दृष्टि से नहीं देखती हूँ मैं। मगर मुझे पता है कि मैं इसके लिए नहीं जन्मी। कैनवास, ब्रश और रंग मेरी राह है, मेरे साधन हैं, अपने-आप की खोज के। इस खोज की यात्रा में मेरी निजता में हस्तक्षेप किए बिना, मुझ पर अपने विचार या इच्छाएं लादे बिना साथ चलने वाला हमसफर मुझे मिला इसलिए मैंने शादी की, वरना मेरे लिए यह कतई जरूरी नहीं थी। घर, परिवार या पति से ज्यादा जरूरी और महत्वपूर्ण मेरे लिए मेरी कला है। यह कला या तो मेरे पिछले किसी जन्म की साधना का फल है या फिर ईश्वर की कृपा। और कला कोई भी हो, पूरा समर्पण चाहती है। अपना कुछ भी बचाने की छोटी-सी चाह रखे बिना अपना सब कुछ झोंक देने की माँग करती है। यह मेरा सत्व है। जब तक मैं इसे पूरा का पूरा अपने आप को नहीं दूंगी, मैं खुद अपना साक्षात्कार नहीं कर पाऊंगी। यह एक ऐसा लक्ष्य है, एक ऐसी चाह है जिसके सामने घर-परिवार-बच्चे जैसी हर चाह दोयम है।”
मैं मुँह फाड़े बस कविता की ओर देखती रही।
“मेरी बातों को तुम कितना समझ पा रही हो, मुझे नहीं पता। मैं शायद अभी तुम्हें ठीक से समझा भी नहीं पाऊंगी अपना पक्ष या अपनी सोच। मगर मेरे लिए इस कला को साधना भी ठीक ईश्क की तरह है..... जो इक आग का दरिया है और डूबकर जाना है।” कविता मुस्कुराई।
मैंने सिर्फ उनकी दोनों हथेलियों को थामा और भींचकर अपने सीने से लगा लिया।

8
मुझे ठीक होने में तीन दिन लगे। तीन दिनों में मैं उठकर चलने की स्थिति में आ गई थी। मगर डॉक्टरों ने मुझे चार दिन और ऑफिस ना जाने की हिदायत दी। और इनमें से तीन दिन मुझे कविता दी ने घर नहीं जाने दिया। जिस दिन मैं ऑफिस जाने वाली थी, उसके एक दिन पहले शाम को कविता दी खुद मुझे घर पहुँचाने आईं। घर की साफ-सफाई की और फिर पास के बाज़ार जाकर जरूरत का ढेर सारा सामान भी ले आईं, ताकि मुझे अगले कुछ दिन कोई परेशानी ना उठानी पड़े।
कविता दी ने पहले ही दिन मुझे अपनी बातों से बहुत सहज कर दिया था। इतना कि मैंने सीधे उनसे ही पूछ लिया कि मैं उन्हें क्या कहकर पुकारूँ। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “कितना तो प्यारा नाम है कविता। तुम्हारे अपने नाम का सहोदर-सा। कविता कहकर ही पुकारो।”
“क्या बात करती हैं आप, कितनी बड़ी हैं मुझसे उम्र में। आपका नाम लेकर कैसे पुकार सकती हूँ मैं।” मैंने तुरंत विरोध प्रकट किया था।
“कितनी बड़ी हूँ? ज्यादा से ज्यादा दस साल। इससे क्या होता है। कला जगत के मेरे कई दोस्त मुझसे पंद्रह या बीस साल बड़े हैं। मगर मैं उन्हें उनके नाम से ही पुकारती हूँ।” उन्होंने मुस्कुराकर कहा।
“मगर मैं आपको आपके नाम से नहीं पुकार सकती।” मैंने दृढ़ता से मना किया।
“तो फिर क्या आंटी कहने का इरादा है? ” उन्होंने खिलखिलाकर पूछा।
मैं भी जोरों से हँस पड़ी, कहा, “नहीं, अभी बस दीदी से काम चला लेती हूँ।”
इस सम्बोधन से खुश नहीं थीं वह, मगर आखिर में मेरी जिद मान ली उन्होंने।

उन छः दिनों में, जब मैं उनके घर रही, कविता दी मुश्किल से तीन-चार बार घर से बाहर गईं। यदि वे कुछ काम ना कर रही होतीं तो ज्यादातर समय हम बातें करते रहते। ढेर सारी। दुनिया जहान की। जब उन्हें लगता कि मुझे कुछ आराम करना चाहिए तो मुझे जबरदस्ती लेटाकर वे कुछ देर के लिए अपने कमरे में चली जातीं। फिर लौटकर मेरे पास बैठी कोई किताब या पत्रिका पढ़ती रहतीं। सागर सर से मुलाकात दिन में बस दो बार ही होती। एक तो सुबह ऑफिस जाने से पहले वह आकर मेरी खोज़-ख़बर लेते। फिर रात को जब ऑफिस से लौटते तो फ्रेश होकर मेरे कमरे में आ जाते। फिर देर तक हम तीनों बातें करते रहते। ज्यादातर रात का खाना भी वहीं खा लिया जाता।
सागर सर और कविता दी के व्यवहार में इतना अपनत्व और सहजता थी कि मुझे यह महसूस ही नहीं हुआ कि मैं किसी और के घर में हूँ। सालों से होस्टल में रहने की आदत थी। उन छः दिनों में सालों बाद मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं घर में हूँ।

कविता दी अपनी शर्तों पर जीने वाली महिला थीं। आकाश में उड़ने वाला स्वच्छंद परिंदा। जो उड़ान भरता तो फिर ना दिन देखता, ना रात, ना ही दूरी। जब तक पंखों में ताकत होती और मन में हौंसला, उसकी उड़ान जारी रहती। और अपने मन की उड़ान को पूरी करने के बाद वह लौटकर जिस पेड़ पर आता, वह सागर सर थे। वह परिंदा उस पेड़ से बंधा नहीं था। न ही उस पेड़ ने कभी किसी भी तरह से प्रलोभन से उसे अपने से बांधे रखने की कोशिश की। फिर भी वह परिंदा लौटकर उसी पेड़ पर आता था, क्योंकि उस पेड़ पर लौटना उसे भाता था। क्योंकि उस पेड़ पर लौटकर भी उसे वही सुकून और वही आनंद मिलता था, जो अपनी उड़ान में मिलता था।

उन छः दिनों में कविता दी के सामने मैंने अपनी पूरी जीवन-कथा कह दी। मगर इसके विपरीत कविता दी ने अपने-आप के बारे में बहुत कम बताया। अपनी निजी बातों को सहजता से किसी के भी सामने व्यक्त करना उनके स्वभाव में नहीं था। मगर इसके विपरीत वह अपनी सोच में जितनी स्पष्ट थीं, उतनी ही स्पष्टता से उसको अभिव्यक्त भी कर देती थीं। इस मामले में उनके भीतर किसी भी तरह का संकोच नहीं था। पेंटिंग उनकी बातों का मूल और मुख्य विषय था। इस विषय के इर्द-गिर्द बातें बुनना शुरू करती वह एक बार तो फिर सारी दुनिया ही उसकी जद में आ जाती। पेंटिंग के बाद उनका पसंदीदा विषय सागर सर थे। सागर सर के बारे में बोलते हुए उनकी आँखों में एक अलग ही चमक आ जाती और बातों में एक अलग-सा उत्साह। उनके बारे में बिन थके, बिन रूके वह घंटों बातें कर सकती थीं।
“जानती हो काव्या, यह प्यार जो है ना, वह कबीर की उलटबाँसियों की तरह होता है। इस पर हमारी दुनिया के सामान्य व्यावहारिक नियम लागू नहीं होते। अब मुझे ही लो, सागर ने कभी मुझे बांधने की कोशिश नहीं की। पुरुषों की फितरत होती है, शादी से पहले वे तमाम तरह के वादे करते हैं, कसमें खाते हैं। तब उनसे ज्यादा समर्पित और अहंशून्य कोई दूसरा नहीं होता। मगर एक बार शादी हो जाए तो फिर सारे वादे, सारी कसमें हवा हो जाती हैं। उनका पुरुषी अहंकार अपने स्वाभाविक रूप में जागृत हो जाता है। इसलिए शादी से पहले इस बात का वचन लेने के बावजूद कि वह मेरी निजता में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगा या मुझ पर किसी तरह का कोई बंधन रखने की कोशिश नहीं करेगा, यह आशंका मेरे मन में थी कि क्या सागर अपने इस वचन को पूरा कर सकेगा। कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि एक बार मुझे शादी के बंधन में बांध लेने के बाद सागर का वह रूप सामने आएगा, जो अब तक अनजान है। मगर सच तो यह है कि सागर ने मेरी उम्मीदों से बहुत ज्यादा इस वचन को निभाया है।” कहते हुए कविता दी के चेहरे पर असीम संतोष के भाव थे।
“मुझे नहीं पता कि दुनिया में किसी और स्त्री को ऐसा पति मिला है या नहीं, मगर मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं कि मैं दुनिया की उन दुर्लभ स्त्रियों में से एक हूँ, जो अपने जीवन साथी के समक्ष अपने मन को पूरी तरह से खोलकर रख सकती हैं, बिना किसी डर या दुविधा के। गलत समझ लिए जाने की किसी भी तरह की आशंका के बगैर। सागर के सामने मैं हमेशा वही होती हूँ, जो मैं हूँ।”
मेरी आँखों में प्रश्न चिह्न थे।
“अरे ऐसे अजूबे की तरह क्या देख रही हो। इस बात को इस तरह से समझो कि यदि कल को किसी पर मेरा क्रश हो जाए तो इस बात को सागर से कहने में मुझे जरा भी संकोच नहीं होगा। हालाँकि इस बात को सागर से कहना है या नहीं कहना है, यह पूरी तरह से मेरी इच्छा पर निर्भर है। मुझे ऐसी हर बात उसे बतानी ही चाहिए, यह जरूरी नहीं है। मगर यदि मैंने उसे यह बताया तो मैं जानती हूँ कि वह इसका कोई इश्यू नहीं बनाएगा, इसे बहुत सामान्य ढंग से लेगा।”
“क्या सचमुच ऐसा हो सकता है? ” मेरी आँखों का आश्चर्य मेरे स्वर में भी उतर आया था।
“मेरे साथ तो यकीनन ऐसा ही होता है।” कविता दी मुस्कुरायीं। “पता है, एक बार दिल्ली में एक नये आर्टिस्ट की एक्जिबिशन लगी थी, जिसका नाम सुजीथ है। उसकी पेंटिंग देखकर मैं इतनी मंत्रमुग्ध हुई थी कि उससे मिले बिना रह नहीं सकी। और मिलते ही सबसे पहले मैंने क्या किया था जानती हो? ”
कविता दी के स्वरों में नाटकीयता आ गई थी। मेरी आँखों में उत्सुकता की एक लहर दौड़ गई थी।
“मैंने उसे बाँहों में भरकर चूम लिया था। उसने भी यह उम्मीद नहीं की थी कि कोई इस तरह का व्यवहार भी कर सकता है। मगर उससे मिलकर मुझे जो लगा, मैंने वही किया। घर आकर मैंने सारा किस्सा सागर को बताया। जानती हो सागर ने क्या कहा? वह बोला कि दरअसल मुझे पहले सुजीथ से पूछ लेना चाहिए था कि क्या मैं उसे चूम सकती हूँ। आखिर यह उसका अधिकार था कि वह अपने साथ ऐसा किया जाना पसंद करता है या नहीं। मुझे भी सागर की बात ठीक जान पड़ी और मैंने अगले दिन जाकर बाकायदा सुजीथ से इस बात के लिए माफी मांगी।”
“और वह क्या बोला?”
“वह एक दिन पहले के मुकाबले ज्यादा संकोच से भर उठा। फिर जब मैंने उसे सारा किस्सा सुनाया तो वह समय निकालकर मेरे साथ घर आया, खास तौर पर सागर से मिलने के लिए। अब वह हम दोनों का ही अच्छा दोस्त है।”
“आप किसी व्यक्ति को इतनी सहजता से किस कर सकती हैं?” मेरे मुँह से पहले सवाल निकला और फिर मुझे महसूस हुआ कि शायद मैंने गलत प्रश्न पूछ लिया है।
“अरे, इसका यह मतलब नहीं है कि मैं किसी को भी किस करती फिरूं। मगर यदि कभी मुझे किसी के लिए ऐसा लगे और उसे भी इसमें कोई आपत्ति ना हो तो फिर दिक्कत क्या है। किस करना भी अपने भावों की अभिव्यक्ति का ही एक प्रकार है, मुस्कुराने, हाथ मिलाने जैसा। बस भावनाओं की सघनता इसमें ज्यादा होती है।” कविता दी ने बहुत सहजता से मेरे असहज प्रश्न का उत्तर दिया था।
“पता है, मैं उस समय पंद्रह साल की थी जब मेरी एक सहेली ने मुझे बताया कि आज उसने अपने बॉयफ्रेंड को किस किया है। मैंने अपनी सहज जिज्ञासा में उससे पूछ लिया कि कैसा लगता है किस करके। उस पर वह हँसकर बोली कि खुद करके देख लेना, पता चल जाएगा। बस वह दिन था, जब मैंने तय कर लिया था कि मैं किसी भी ज्ञान के लिए दूसरों के अनुभवों पर निर्भर नहीं रहूँगी। मुझे जो जानना होगा, खुद करूंगी और जान लूंगी।”
“बाप रे, आप तो बहुत खतरनाक व्यक्ति हैं दी।” मैंने हँसते हुए कहा।
“क्यों, क्या तुमने कभी किसी को किस नहीं किया अब तक?” कविता दी ने शरारत से पूछा।
एक बारगी मेरा पूरा चेहरा लाल हो उठा। फिर सामान्य होते हुए मैंने कहा, “ना दी, मैंने खुद कभी नहीं किया ऐसा। हाँ, एक बार स्कूल में एक लड़के ने ऐसा करने की कोशिश की थी और अपने गाल पर एक झन्नाटेदार तमाचा खाया था। उसके बाद किसी ने इतनी हिम्मत नहीं की।”
“लो, तब तो मुझसे ज्यादा ख़तरनाक तुम हो।” कविता दी हँसी।

9
जीवन कई बार किसी चौराहे पर आकर ठिठक जाता है। मगर कई बार ऐसा भी होता है कि जीवन में किसी दोराहे, तिराहे या चौराहे से पहले ही जिस दिशा की ओर चेहरा किए आप आगे बढ़ रहे होते हैं उसी दिशा से मदहोश करने वाली सुगंध की कोई लहर उठती है। आप उस लहर के पीछे मंत्रमुग्ध से चल देते हैं। राह में कौन-सा दोराहा, तिराहा या चौराहा था जहाँ से आप जीवन की कोई और डगर पकड़ सकते थे, इसका आपको अहसास तक नहीं होता है। वह सुगंध आपको एक ऐसे घने जंगल में ले जाती है जो आकर्षित भी करता है और डराता भी है। मगर उस सुगंध का मोह आपके मन-मस्तिष्क पर इस कदर छाया होता है कि डर को आप अनदेखा करते हैं। अपने अचेतन विवेक की इस चेतावनी को भी अनदेखा करते हैं कि शायद यह सुगंध आपको किसी भीषण ख़तरे के आगोश में ले जाकर खड़ा कर सकती है। मन पर उस सुगंध की ऐसी परत चढ़ी हुई होती है जो किसी चेतावनी, किसी आशंका को दर्ज ही नहीं करती।
कई बार यह भी होता है कि जिसे आप अपने अचेतन के विवेक का नाम देते हैं, वह दरअसल सदियों से की जा रही आपके मन की कंडीशनिंग का परिणाम होता है। जो केवल उसी तरीके से सोचता है, जिसका आपको अभ्यास रहा है। यह अभ्यास आपकी समझ को एक चश्मा देता है। आप ही नहीं, आपके दायरे के बहुतांश लोग उस चश्मे के माध्यम से दिखने वाले दृश्य को ही सच मानते और समझते हैं। फिर किसी दिन आपकी आँखों से वह चश्मा हटता है और आपको लगता है कि चश्मे या बगैर चश्मे से देखे हुए दृश्य ही नहीं, सच दरअसल कई बार वह भी होता है, जहाँ तक आपकी दृष्टि पहुँच नहीं पाती।

दिल्ली आए हुए मुझे कोई एक साल होने आया था। इस पूरी अवधि के दौरान यदि किसी एक व्यक्ति का मुझ पर बेतहाशा प्रभाव था तो वह निश्चित ही सागर सर थे। अपने एकांतप्रिय स्वभाव के कारण ऑफिस से बाहर मेरे परिचय की दुनिया बेहद सीमित थी। यहाँ तक कि मैं जिस मकान में रहती थी, वहाँ के मकान मालिक या दो किरायेदारों से भी मेरा परिचय सिर्फ हाय-हलो या मुस्कराहटों के आदान-प्रदान तक ही सीमित था। ऑफिस के भीतर भी अपने विभाग के कुल जमा चार लोगों के अलावा मेरा संपर्क सबसे ज्यादा यदि किसी से था तो वह कैंटीन वाला देवीप्रसाद था।
मगर इन तमाम लोगों के मुकाबले उन दिनों यदि मेरी पूरी दिनचर्या किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटी हुई थी तो वह निश्चित रूप से सागर सर थे। उनकी विद्वत्ता, उनका परिश्रम, उनकी सौजन्यता, उनकी लगन, उनकी प्रतिभा - सबका मुझ पर नशे की तरह असर था। दरअसल उन्हें लेकर मैं अपने भीतर वैसा ही किशोरवयीन आकर्षण अनुभव करती थी, जैसा उस उम्र में कोई छात्र अपनी किसी युवा शिक्षिका के प्रति महसूस करता हो। मगर इसके बावजूद उनके और मेरे बीच में एक हल्की-सी मगर अनुलंघनीय दूरी थी, जो लगातार बरकरार रही। मगर मेरी अप्रत्याशित बीमारी ने, और उसके बाद उनके घर मेरे छः दिनों के निवास ने सब कुछ सिरे से बदल दिया।
एक बड़ा परिवर्तन तो यह हुआ कि उनके अलावा लगभग उनके ही समान महत्व रखने वाली एक और व्यक्ति मेरे जीवन में आ गई – कविता दी। कविता दी ने अपने सहज व्यवहार और अपनत्व से, अपने स्पष्ट विचार और बातों से इतनी तेजी से मेरे जीवन में अपनी जगह निर्माण की कि मैं स्वयं भी आश्चर्यचकित रह गई। इसी वजह से मैं बहुत जल्द ही सागर सर और कविता दी के जीवन का, और घर का भी मानो एक अभिन्न हिस्सा हो गई। बहुत कम समय में कविता दी ने मेरे जीवन को इस कदर व्याप लिया कि वह मेरी अभिभावक, मेरी बड़ी बहन, मेरी सबसे निकटस्थ मित्र – सब कुछ बन गईं।
उनका घर मेरी अपनी रहने की जगह से ज्यादा मेरा अपना घर बन गया था। किसी दिन उनका फोन आता, ऑफिस से यहीं चली आ। कई बार सागर सर साथ होते, कई बार वह किसी काम से ऑफिस में ही रूके हुए होते और मैं उनके घर चली जाती। फिर बिना खाना खाये लौटने का तो सवाल ही नहीं होता। रात को सागर सर और कविता दी मुझे छोड़ने मेरे घर तक आते। कई बार ऐसा भी होता कि कविता दी आग्रह करके मुझे वहीं रोक लेतीं। फिर सागर सर गेस्ट रूम में जाकर सोते और मैं कविता दी के साथ देर रात तक गप्प लड़ाने के बाद उनके बेड पर ही सो जाती। कुछ ही समय बाद साप्ताहिक अवकाश वाला दिन मैं कविता दी के साथ ही बिताने लगी। शुरू के कुछ समय तक अलग साप्ताहिक अवकाश के कारण सागर सर उस दौरान ऑफिस में रहते थे। मगर बाद में हम दोनों का साप्ताहिक अवकाश एक ही दिन हो गया। मगर इससे मेरे उनके यहाँ जाने पर कोई फर्क नहीं पड़ा। साप्ताहिक अवकाश के दिन ज्यादातर समय सागर सर अपने कमरे में किताबों के बीच खोये रहते या फिर अपने ब्लाग पर कोई नया लेख डालते। कभी वह हम दोनों के साथ बातचीत में शामिल हो जाते। कभी हम तीनों कोई मूवी देखने या कहीं घूमने निकल जाते।
कविता दी के साथ मेरी निकटता जहाँ परवान चढ़ रही थी वहीं बहुत नामालुम तरीके से सागर सर मेरे मन में अपनी एक अलग जगह बनाते जा रहे थे। कविता दी की बातों ने सागर सर के प्रति मेरी भक्ति को और दृढ़ कर दिया था। मेरे साथ उनके व्यवहार में परले दर्जे की सहजता थी। मगर जितना उनका व्यक्तित्व मेरे मन को व्यापने लगा था, मैं उनके साथ के सहज पलों में भी कुछ गुलाबी-से अहसास खोजने लगी थी। और यह सब बहुत नामालुम तरीके से हो रहा था।
किसी दिन कविता दी कुछ सामान लेने के लिए हम दोनों को बाज़ार भेज देतीं। कभी हम तीनों कहीं घूमने के लिए निकले होते। ऐसे समय में कई बार रास्ता पार करते समय सागर सर मेरा हाथ थाम लेते। ऐसे समय में मैं जैसे सारी दुनिया से परे हो जाती। जब तक वह मेरा हाथ थामे रहते, मेरे हाथों के जरिये एक अजीब-सी झनझनाहट मेरे पूरे बदन में दौड़ती रहती। उनके हाथ छोड़ देने के बाद भी एक अदृश्य हथेली मेरे हाथ को थामे रहती।
ऑफिस में मेरी बैठने की जगह सागर सर के ठीक सामने थी। ऐसा कई बार होता कि सागर सर कम्प्युटर पर किसी काम में गुम रहते और मैं बड़ी देर तक एकटक उन्हें देखते रहती। काम में डूबे हुए सागर सर किसी ध्यानमग्न तपस्वी की तरह तन्मय और निर्लिप्त दिखाई देते। घर पर कई बार ऐसा होता कि वह किसी मुद्दे पर अपनी राय दे रहे होते और मैं मंत्रमुग्ध उन्हें देखती-सुनती रहती।
ऐसा नहीं है कि ऐसे समय मेरे अचेतन में बैठा कोई मुझे लगातार चेतावनी ना देता था। मगर कई बार हम जानबूझकर उन चेतावनियों को अनदेखी-अनसुनी करते रहते हैं। और यह इतनी बार होता है कि फिर हमारा ध्यान भी उन चेतावनियों की तरह नहीं जाता। कितनी अजीब बात है ना, बिलकुल विरोधाभासी भी कि अध्यात्म पथ पर चलने वाले भूत या भविष्य की स्मृति या कल्पना से परे सिर्फ उपस्थित क्षणों को जीने की साधना करते हैं। आसान नहीं होता यह। मोह से परे होना पड़ता है पूरी तरह से इसके लिए। और इसके विपरीत मोह में सरापा डूबा हुआ व्यक्ति भी कई बार भूत या भविष्य की कल्पना या चिंता से परे सिर्फ वर्तमान के अपने मोहपूर्ण क्षणों को पूरी शिद्दत के साथ जी रहा होता है।

मैं एक अंधी गली की ओर बेतहाशा दौड़ रही थी। अचेतन की चेतावनियों की सारी बेड़िया तोड़ के। बिना यह जाने या सोचे कि इस दौड़ का अंत क्या होगा। भला होगा या बुरा होगा। एक तरफ मैं भविष्य की परवाह किए बिना मोह के उन तत्क्षणों को जी रही थी। दूसरी ओर मेरी कल्पनाओं ने एक नयी दुनिया की रचना शुरू कर दी थी। एक ऐसी दुनिया जिसमें कभी मैं सागर सर के हाथ में हाथ डालकर किसी पेड़ों से घिरी हुई और ढेरों फूलों से ढँकी हुई पगडंडी पर चल रही होती। कभी किसी नदी किनारे पानी में पाँव डालकर उनसे सटकर बैठी हुई होती। कभी अपनी गोद में रखे उनके चेहरे पर अपने बालों को फैलाये झुक रही होती। कभी उनके सीने से लगी मीठी नींद सो रही होती।
लेकिन ये सारी तस्वीरें बड़े दिनों तक श्वेत-श्याम रहीं। मैं लाख मोह में डूबी हुई थी, मगर अपने अहसासों के एकतरफा होने की अनुभूति के चलते इनमें कभी रंग नहीं भर पाती थी। मगर फिर कुछ ऐसा हुआ कि मेरी कल्पनाओं के ब्रश के सिरों को रंग आ-आकर छूने लगे।
उस दिन मैं ऑफिस से निकल ही रही थी कि कविता दी का फोन आया। बोलीं कि उन्होंने नयी मूवी के तीन टिकट ऑनलाइन बुक कर लिए हैं। ऑफिस से सीधे मैं सागर सर के साथ थियेटर पर पहुँच जाऊँ। कविता दी भी अपनी एक जरूरी मीटिंग निपटाकर सीधे थियेटर पर पहुँच जाएंगी।  सागर सर और मैंने थियेटर पहुँचकर टिकट कलेक्ट कर लिए। मूवी शुरू हो गई, मगर कविता दी नहीं पहुँची। जब सागर सर ने उन्हें फोन किया तो उन्होंने कहा कि उनकी मीटिंग कुछ लम्बी खींच गई है, इसलिए सागर सर और मैं मूवी देख लूँ। यदि मीटिंग जल्दी निपट गई तो वे थियेटर पहुँच जाएंगी वरना फिर मूवी के बाद वह पास ही के एक मशहूर रेस्तरां में मिलेंगी, जहाँ हम अक्सर जाया करते थे।
मूवी के दौरान किसी समय मैंने सीट के हत्थे पर अपना हाथ रखा तो मुझे एक झटका-सा लगा क्योंकि वहाँ सागर सर ने पहले से ही अपना हाथ रखा हुआ था। होना तो यह चाहिए था कि उसी क्षण मैं अपना हाथ हटा लेती, मगर उस त्वरित प्रतिक्रिया पर न जाने कैसे मेरा मोह हावी हो गया। मैंने अपना हाथ वैसे ही रहने दिया और स्क्रीन पर अपनी नज़रें जमा लीं। हालाँकि मेरा सारा ध्यान सागर सर की प्रतिक्रिया पर था। सागर सर ने उम्मीद के मुताबिक चौंककर मेरी ओर देखा। मैंने ऐसे जताया जैसे मेरा ध्यान उस ओर गया ही नहीं। कुछ पल सागर सर मेरी तरफ देखते रहे, फिर उन्होंने अपना चेहरा फिर स्क्रीन की ओर कर लिया। मगर उन्होंने अपना हाथ मेरी हथेली के नीचे से हटाया नहीं।
उसके बाद मूवी में क्या हुआ, मुझे कुछ पता नहीं था। मेरी आँखें चाहे स्क्रीन को देख रही थीं मगर मैं वहाँ कहीं नहीं थी। अपनी कल्पनाओं में सागर सर एक पेड़ थे और मैं किसी लता में तब्दील होकर उनके चारों ओर लिपटी हुई थी।
मूवी खत्म होने के बाद हॉल से बाहर निकलते हुए पहली बार मैंने खुद होकर सागर सर की बाँह थाम ली। सागर सर ने फिर मेरी ओर देखा मगर मैं उनकी बाँह थामे पूरी स्वाभाविकता से आगे बढ़ती रही।
इसके बाद कुछ भी सामान्य नहीं रहा।

दुस्साहस के दीर्घकालीन फल चाहे जितने पीड़ादायी होते हों, ऐसे मामलों में, ऐसे रिश्तों में, मगर उनकी तात्कालिक मुधरता की कोई तुलना नहीं हो सकती। मैं उस मधुरता से अपने मन-प्राण को ओतप्रोत कर लेना चाहती थी। जिस अंधी गली में मैं बेहिचक और बेतहाशा दौड़ रही थी, उसके प्रवेश द्वार पर सागर सर कुछ हिचकिचाते हुए, कुछ असमंजस में खड़े हुए मुझे दिखाई दे रहे थे। मेरे श्वेत-श्याम सपनों में किसी एक अन्य रंग के प्रवेश की मानो यह शुरुआत थी।
कई बार होने और न होने के बीच की चौखट पर खड़े-खड़े आप सालों गुजार देते हैं। इस दुविधा में कि होने की ओर जाना चाहिए या नहीं। उस ओर कोई आपका स्वागत करने वाला है या नहीं। लेकिन एक बार यदि किसी तरह इस दुविधा पर काबू पा लिया जाए तो फिर उस होने के इर्द-गिर्द घटनाएं इस तरह से घटने लगती हैं कि कुछ ही दिनों में आपको यह आश्चर्य होने लगता है कि जिस होने के अस्तित्व को लेकर आप असमंजस में थे, वह असमंजस तो पिछली सदी की बात लगने लगा है। समय को जैसे पंख लग गए थे। सब कुछ इतनी तेजी से बदल रहा था कि खुद मुझे उस पर आश्चर्य हो रहा था। मैं एक ऐसे नशे में थी, जिससे उबरने की कोई मेरी कोई इच्छा नहीं थी। इस नशे में मेरे हाथों ने कब सागर सर का हाथ थामा और फिर कब मेरे होठों ने उनके होठों को छुआ, मुझे पता ही नहीं चला। मैं उनके सीने से लगकर उनके दिल की धड़कने गिनने लगी थी।

10
जिस घटना ने मुझे सातवें आसमान से उतार जमीन पर ला खड़ा किया। जिस घटना ने मुझे अपनी मदहोशी से निकलकर वास्तविकता का भान कराया। या उसके बारे में गंभीरता से विचार करने पर मजबूर किया, उस घटना की शुरुआत कितनी मनमोहक, कितनी स्वप्निल, कितनी रोमहर्षक थी।
सागर सर के घर जाना शुरू होने के बाद वह पहला दिन था, जब मैं कविता दी की अनुपस्थिति में उनके घर में थी। कविता दी शहर से दो दिनों के लिए बाहर गई थीं, किसी सेमिनार के सिलसिले में। ऑफिस से घर लौटते समय हम खाना एक रेस्तरां से ले आये थे और खा भी चुके थे। सागर सर बेड पर तकिये से पीठ टिकाए बैठे थे और मैं पास ही एक कुर्सी पर बैठी थी। उस दिन पहली बार हम दोनों ने बड़ी देर तक एक-दूसरे को अपने अब तक के जीवन की कई कहानियां सुनाईं। बातों ही बातों में, बातों के बीच में, बातों में गुम मैं कब सागर सर के करीब जा बैठी, खुद मुझे ही पता नहीं चला। कुछ ही देर में मैं उनके सीने से लगी हुई थी और धीरे-धीरे मन और बदन की कई गाँठें खुलने लगी थीं।
उस दौरान मैं लगभग मौन ही रही थी। मेरे मन के भाव या तो मेरे शरीर की सिंहरन, कँपकँपी या मेरे होठों और बाँहों की जकड़न से अभिव्यक्त हो रहे थे या फिर मेरी आँखों की भंगिमाओं से। उस दौरान जब मेरी छाती पर दुबके दो खरगोश अनावृत्त हुए तो सागर सर स्तब्ध होकर बड़ी देर तक उन्हें देखते रहे। फिर बड़ी कोमलता से उनको अपनी हथेलियों से ढँककर आँखें बंद किए बहुत समय तक न जाने किस भाव में गुम रहे।
“किस सोच में गुम हैं आप? ” मैंने पूछा था।
“यह महसूस कर रहा हूँ कि किसी पुरुष के सामने पहली बार अनावृत्त किसी कुँवारी लड़की के स्तनों से पवित्र और कुछ नहीं होता। उन्हें इस तरह से छूना चाहिए जैसे भक्तिभाव से भरकर पूजा कर रहा हो कोई।” किसी अनिर्वचनीय तृप्ति के समुद्र में गुम होकर बुदबुदाए थे सागर सर।
उसके बाद हम एक-दूसरे के शरीरों पर लगे तमाम वर्जित फलों को चखते रहे। शरीर के तमाम आवरणों को हमने किसी अपवित्र वस्तु की तरह अपने से दूर कर दिया था। कभी मैं नदी बन जाती, जिसकी धाराओं में तैरते आगे बढ़ते सागर सर। कभी वह नदी बन जाते और मैं बेभान उसमें आगे बढ़ने के लिए हाथ-पैर चलाती। उस समय सारा संसार अस्तित्वहीन हो गया था। उन कुछ मिनटों में हमने ब्रह्मांड की ना जाने कितनी आकाशगंगाओं को पार किया था। ना जाने कितने तारों को हथेलियों में मसलकर एक-दूसरे की देह पर मला था।
आनंद की एक श्वेत धारा में तैरते-उतराते हम नदी के अंतिम छोर तक पहुँच गए थे, जिसके आगे आनंद अमृत का सागर लहलहा रहा था। अचानक सागर सर सिंहरे और उठ बैठे। मैंने उन्हें अपनी ओर खींचते हुए पूछा, “क्या हुआ?”
“कुछ नहीं। पर अब हमें ठहरना चाहिए।”
अमृत गंगा से निकालकर मुझे अचानक जैसे किसी ने संशय की जलती लपटों के बीच खड़ा कर दिया था।
सागर सर ने अपनी हथेलियों के बीच मेरे चेहरे को थामा और मेरे माथे पर एक दीर्घ चुंबन अंकित करने के बाद बोले, “तुम्हारा और मेरा यह जो भी रिश्ता है, यह इतना सुंदर, इतना पवित्र और इतना मनोहारी है, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। इसे यदि इसी स्वरूप में रखना है तो इससे आगे बढ़ना अनुचित होगा।”
मैं हजारों हजार सवालों से भरी निगाहों से उनकी ओर ताक रही थी। जीवन के पहले सहवास के द्वार पर जाकर इस तरह अचानक ठहर जाना। मेरे भीतर की आकाशगंगाओं में लगातार विस्फोट हो रहे थे। उन विस्फोटों की लपटों से मेरा तन, मेरा मन, मेरी आँखें सब कुछ झुलस रहे थे। मगर सागर सर के चेहरे पर ना कोई तनाव था, ना बेचैनी, ना असमंजस..... थी तो बस शांति।
“इससे आगे सिर्फ स्खलन है काव्या! मैं हमेशा इस रिश्ते के शिखर को अनुभव करना चाहता हूँ, इसके स्खलन को नहीं। जानती हो, स्त्री हमेशा एक चुनौती की तरह होती है किसी भी पुरुष के लिए। स्त्री का मन एक ऐसी पहेली है, जिसे कोई भी पुरुष लाख कोशिश कर ले, कभी सुलझा नहीं सकता। ऐसे में स्त्री का शरीर ही एकमात्र ऐसी चुनौती होती है, जिसे पार करना चाहता है पुरुष। और इस बिंदू को पार करके वह फिर कभी पहले जैसा नहीं रह जाता। यह स्त्री और पुरुष की मूल जड़न-घड़न का भेद है। स्त्री इस बिंदू को पार करके अक्सर किसी पुरुष से पहले की तुलना में और अधिक जुड़ जाती है। मगर पुरुष इस बिंदू के बाद अपनी ऊर्जा, अपनी उष्मा खो देता है। शिखर को पार करने के बाद का खालीपन भर जाता है उसके भीतर। उसके बाद बस उतरना होता है। उसके बाद स्त्री का शरीर एक ऐसे राज्य की तरह हो जाता है, जिसे जीता जा चुका है। भावनाओं की भूलभुलैया या विकल्पहीनता के चलते चाहे वह बार-बार लौट आए शरीर के इस मोहजाल में, मगर वह फिर कभी वही नहीं रहता, जो इस बिंदू को पार करने के पहले था।”
“मगर ......... ” मैंने कुछ कहना चाहा।
“एक बात और है काव्या........ ”, सागर सर ने बीच में ही रोका मुझे, “हमारे बीच उम्र के इतने अंतर के बावजूद अपने आज में मुझे इस तरह से शामिल करके तुमने मेरा मान बढ़ाया है। मैं अनुग्रहित हूँ इसके लिए। मगर मैं तुम्हारा भविष्य नहीं हूँ। हो भी नहीं सकता। तुम्हारा भविष्य किसी और के साथ जुड़ा होगा। और जिसके साथ तुम्हारा भविष्य जुड़ा होगा, शरीर से जुड़े आनंद का वह अंतिम मुकाम तुम्हें उसके साथ तय करना चाहिए।”
“लेकिन मेरी निगाहों को तो आपके सिवा कुछ और दिखता ही नहीं है अब।”
“बहुत मूल्यवान है यह भावना। बहुत प्यारी। बहुत कोमल। मगर यकीन जानो, यह स्थायी नहीं है।”
“यह आप कैसे कह सकते हैं?” मैंने प्रतिकार किया।
“यदि गंभीरता से अपने भीतर झाँकोगी तो तुम भी इस नतीज़े पर पहुँच सकती हो। मगर मैं जानता हूँ कि इस क्षण यह संभव नहीं होगा। मैं, जिसे जीवन का इतना अनुभव है, वह भी जब एक मदहोशी में बहकर कुछ समय के लिए इस वास्तविकता को भूल बैठा था तो तुम तो अभी बहुत छोटी हो।”
“कहना क्या चाहते हैं आप?” मेरे स्वर में कुछ रोष उभर आया था।
“मुझे आश्चर्य हो रहा है अपने-आप पर कि मैं कैसे इस रिश्ते में इतने आगे तक बढ़ गया। मेरे प्रति तुम्हारा आकर्षण जितना स्वाभाविक है, तुम्हारे लिए मेरा आकर्षण उतना स्वाभाविक नहीं है। पर शायद जीवन का कोई गहरा अभाव था, जिसकी पूर्ति तुमने मेरे जीवन में आकर कर दी थी। कुछ परिस्थितियों से अपनी जद्दोजहद के कारण और कुछ अपने स्वभाव के कारण अपनी किशोरावस्था को, और युवावस्था के शुरुआती लम्हों को मैं उस तरह से जी नहीं पाया था जैसे जीना चाहता था। कविता मेरे जीवन में आयी तब तक 30 साल का हो गया था मैं। मगर तब भी प्रेमी मैं बना था, वह नहीं। मैं जितना भावुक था, वह उतनी ही व्यावहारिक। यहाँ तक कि शादी के बाद भी उसके व्यवहार में एक प्रकार का बड़प्पन हमेशा बना रहा। बहुत संयत, बहुत शांत। इसके कारण मेरे भीतर जो एक किशोरवयीन भावुक प्रेमी था, वह मुरझा गया था, दब गया था मन के भीतर की गहराइयों में कहीं। तुमने आकर उसे फिर पल्लवित, फिर जागृत कर दिया।”
“तो क्या आपको अफसोस है इस बात का?” मेरे स्वर में गहरी पीड़ा थी।
“कतई नहीं। एक पल को भी मुझे इसके लिए कोई अफसोस नहीं है। मेरी दृष्टि में तुम्हारा मेरे जीवन में आना, मेरे लिए ईश्वर की सबसे बड़ी नेमत है। तुम्हारा और मेरा रिश्ता ताउम्र मेरे लिए बहुत प्यारा, बहुत कीमती बना रहेगा। यह कभी सूखा हुआ वह फूल नहीं होगा, जो किसी किताब में सालों दबा रह जाता है। यह मेरे लिए मेरे आँगन में खिला हुआ ऐसा बाग रहेगा जो पूरा मेरे जीवन के आखिरी लम्हें तक मुझे सुंगधित करता रहेगा।”
“तो फिर अचानक यह परदादारी का ख्याल कैसे आया आपके भीतर?” मैंने पूछा।
“परदादारी कहाँ है इसमें कुछ भी? एक स्त्री और एक पुरुष एक-दूसरे को जितना खुला देख सकते हैं, उतना हम इस वक्त एक-दूजे के सामने हैं। एक स्त्री और एक पुरुष एक-दूसरे के जितना अधिकतम निकट आ सकते हैं, उतना निकट हम हैं। इस समय ना मेरे तन पर कोई आवरण है और न मन पर। बात केवल उन चंद पलों की है, जिसके बाद सारा आवेश, सारा आवेग खत्म हो जाता है। फिर बचती है थकान और विरक्ति। चाहे वह कुछ घंटों या कुछ मिनटों की ही क्यों ना हो। मैं नहीं चाहता कि इस प्यारे से रिश्ते में कभी वह मुकाम आए। एक स्त्री और एक पुरुष के शरीर के बीच का जो केलि-व्यापार होता है, उसमें सारा आनंद, सारी उत्तेजना, सारा उत्साह तो उन चंद पलों के पहले का होता है। वास्तव में, एक-दूसरे के साथ होना, बिना किसी आवरण के इतने पास होना, अपने ऊर्जवान भावों को शरीर के रोम-रोम से एक-दूसरे के रोम-रोम तक संप्रेषित करना, इससे अधिक सुंदर इस पूरे संसार में दूसरा कुछ भी नहीं है।
आज इस क्षण तुम्हें एक पल को एक झटका-सा लगा है, क्योंकि इस पल मैं तुम्हारी सोच या तुम्हारी आकलन शक्ति से परे की बात कह रहा हूँ या व्यवहार कर रहा हूँ। मगर कुछ सालों बाद, जब तुम अपने किसी साथी के साथ उन चंद पलों के भी पार जाओगी तो तुम इस बात को महसूस करोगी कि मेरे कहने में कितनी सच्चाई है, कितना गहरा अर्थ है।” सागर सर ने मेरे हाथ को अपनी दोनों हथेलियों में भरकर चूम लिया था।
सच कहूँ तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया था। सागर सर की बातें मेरे लिए एक ऐसी भाषा में कही गई बातें थीं जिनसे मेरा कोई परिचय नहीं था। मैं अजीब-सी उलझन में थी, जिसमें मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि अब मेरी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए।
सागर सर ने मेरे चेहरे के भावों को, मेरी उलझनों को शायद समझ लिया था। मुझे उससे बचाने के लिए ही उन्होंने मुझे अपने आगोश में लिया और मुझ पर फिर एक बार चुंबनो की बौछार कर दी। मैं दिग्भ्रमित-सी उनकी बाँहों में सिमट गई।

11

जीवन अधूरे क्षणों का समुच्चय होता है।
कुछ बातें अपने अधूरेपन में ही संपूर्ण होती हैं। कुछ अपनी संपूर्णता में भी अधूरी रह जाती हैं।
सागर सर यकीनन वैचारिक रूप से बहुत परिपक्व थे, बहुत संवेदनशील भी थे, मुझे लेकर शायद जरूरत से ज्यादा प्रोटेक्टिव थे....... मगर फिर भी मुझे समझने में कहीं चूक कर बैठे थे। प्रणय के सर्वोच्च क्षणों के अपने पहले ही अनुभव का वह अधूरापन फिर ताउम्र पूरा नहीं हुआ। सागर सर के प्रति मेरी भावनाएं उम्र का क्षणिक आवेग नहीं था। मुझे निजता के उन सर्वोच्च क्षणों को जीने के लिए किसी और की चाहत या प्रतीक्षा नहीं थी। मैं उस समय सागर सर से यह सब कह नहीं पाई। उस समय तो छले जाने की एक दुर्दम्य भावना से भरी हुई थी मैं।
उस घटना के बाद मेरे जीवन में कुछ भी सहज-सामान्य नहीं रह गया था। मैं बार-बार उस रात को, उस रात की घटनाओं को, उस रात को सागर सर की कही हुई बातों को याद करती। सागर सर जिस शिखर पर बने रहने की बात कर रहे थे उस रात, मुझे तो लगता था कि उन्होंने ही मुझे उस शिखर से नीचे धकेल दिया था। और जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, मैं अपने-आप को और-और नीचे लुढ़कता अनुभव कर रही थी। यह सब कुछ मेरे लिए बहुत पीड़ादायी था और मेरी विडंबना यह थी कि मैं इस बारे में किसी से बात भी नहीं कर सकती थी। पिछले लम्बे समय से मेरा जीवन केवल दो ही व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ था। सागर सर और कविता दी। और मैं दोनों से इस बारे में कुछ कह नहीं सकती थी। मैं अचानक बहुत खामोश हो गई थी। मैं देख रही थी कि मेरी चुप्पी ने सागर सर को बहुत व्यथित कर दिया था। उन्होंने कई बार मुझसे बात करने की कोशिश की, मगर मैं किसी भी तरह की बात करने की मानसिकता में नहीं थी।
फिर मैं न उस अख़बार में ठहर सकी ज्यादा दिन और न दिल्ली में।
अपने जीवन के पहले प्यार के पूरे और अधूरे क्षणों की स्मृतियों के साथ मैं मुंबई चली आई।
मेरे कोमल मन पर लगा वह घाव बहुत समय तक टीस देता रहा। आज उस घाव का कोई नामोनिशान नहीं है। अगर कुछ है तो मन में बसा हुआ एक चेहरा है, जो सालों पहले इस दुनिया से लुप्त हो गया था और ठहरा हुआ एक पल है, जो अंतिम समय तक मेरे संग रहेगा।
कुछ बातें अधूरी रह गईं, अधूरी ही रह जाएंगी, मगर इस अधूरेपन में ही मेरी पूर्णता है। मेरा सफ़र अपनी संपूर्ण संभावनाओं में मुकम्मल चाहे ना हुआ हो, मगर अधूरेपन के सौंदर्य से भरा हुआ है। कोई इस सौंदर्य की बात पूछे तो शायद मैं भी मी टू कह पाऊं।

रतिनाथ का पलंग: सुभाष पंत

◆रतिनाथ का पलंग ◆सुभाष पंत बावन साल की उमर में रतिनाथ की जिन्दगी में एक ऐसा दिन आया जब वह बेहद खुश था और अपने को दुनिया का सबसे सुखी प्राणी ...