गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

बहुरि अकेला : मालती जोशी

◆ बहुरि अकेला
◆ मालती जोशी

स्टाफ़रूम में गरमागरम बहस चल रही थी। मुझे देखकर क्षणभर को सन्नाटा खिंच गया। मुझे लगा कि कहीं बहस का मुद्दा मैं ही तो नहीं हूँ। तभी मिसेज झा ने कहा, "लो ये आ गई मिस स्मार्टी। इन्हें भेज दो। बहुत काबिल आयटम है। कैसी भी सिच्यूएशन हो ब्रेवली हैंडल करती हैं।"

मिसेज सक्सेना मुँह बनाकर बोली, "वे दिन गए मिसेज झा। अब तो ये मिस प्रिविलेज्ड हैं। इन्हें कोई हाथ भी नहीं लगा सकता।"
"क्या हुआ भई! सुबह-सुबह मुझ पर इतनी कृपादृष्टि क्यों हो रही है?" मैंने आखिर पूछ ही लिया।
"अरे हम गरीब क्या कृपादृष्टि करेंगे। कृपादृष्टि तो आप पर मैम की है। इसीलिए तो आपको कोई असाइनमेंट नहीं दिया जा सकता।"
"खासकर संडेज को।" मिसेज सक्सेना कुटिलता से आँखें नचाकर बोलीं।
"कुछ पता भी तो चले कि माजरा क्या है।" मैंने कुर्सी खींचते हुए कहा। उत्तर में सब ने एक साथ बोलना शुरू किया। बड़ी देर बाद मेरी समझ में जो आया उसका सार यह था कि शुक्रवार को एम.ए. फ़ाइनल की लड़कियाँ अजंता-एलोरा जा रही हैं। पर इंचार्ज मिसेज गुप्ता के श्वसुर जो आज अचानक कूच कर गए। अब सवाल यह है कि उनके स्थान पर किसे भेजा जाए। सबकी अपनी परेशानियाँ थीं। मिसेज सक्सेना की बिटिया वायरल में पड़ी थी।

रविवार को किरण के देवर की सगाई थी। मिसेज कृपाल की सास पैर में प्लास्टर बँधवाकर पड़ी थीं। खंडेलवाल के पूरे दिन चल रहे थे। दासगुप्ता के दोनों बच्चों के सोमवार से टर्मिनल्स शुरू हो रहे थे और बिसारिया पहले से छुट्टी पर थीं।

स्टाफ में दो तीन अति बुजुर्ग सदस्य थीं जिन्हें इस मिशन पर भेजना बेकार था। एकाएक मुझे याद आया- "विभा तो जा रही है न! या उसके यहाँ भी कोई प्रॉब्लम है?"
"विभा तो जा रही है पर वह तो खुद बच्ची है। लड़कियों को क्या सँभालेगी? कोई ज़िम्मेदार व्यक्ति भी साथ होना चाहिए।"
"और तुम्हें कोई हाथ नहीं लगा सकता। मैडम की चहेती जो हो। उनकी सख़्त हिदायत है कि अंजु शर्मा को छुट्टी के दिन कोई काम न सौंपा जाए।"
"देर से शादी करने का यही तो फ़ायदा है। सबकी सिम्पैथी मिल जाती है।"

मैं चकित-सी देखती रह गई। ये सबकी सब मेरी 'कुलीग्स' थीं, सालों से हम साथ काम कर रहे थे। हमेशा कैसी शहद घुली बातें करती हैं। आज पता चला कि सबके मन में कितना ज़हर भरा हुआ है। उन सबके पास व्यस्तताओं की एक लंबी लिस्ट थी। एक मैं ही फालतू नज़र आ रही थी पर उनके शब्दों में 'प्रिविलेज्ड' थी। इसलिए सबकी ज़बान पर जैसे काँटे उग आए थे।
भला हो मिसेज देशपांडे का। मेरा पक्ष लेते हुए बोलीं, "अभी तक तो यही बेचारी सारी बेगार ढो रही थी। अब इसके साथ मैडम थोड़ी 'सिम्पैथेटिक' हो गई है तो तुम लोगों को जलन हो रही है। अरे यह तो सोचो कि इतनी देर से उसने शादी की है। पति भी साथ नहीं रहते। एक छुट्टी के दिन ही मेल-मुलाक़ात हो पाती है, वह भी तुम लोगों से देखी नहीं जाती।"

उनकी बुजुर्गियत का ख़याल करके सब चुप हो गई। पर सबके चेहरे पर यह भाव था कि इसने देर से शादी की है तो उसका ख़मियाज़ा हम क्यों भुगतें। मिसेज सक्सेना से तो आखिर रहा नहीं गया। बोलीं, "आँटी। अब सालभर तो हो गया। इतना तो कोई नई नवेली बहू को भी नहीं सहेजता।"
मेरा तो जैसे खून खौल गया, "आप लोग यही चाहती हैं न कि इस बार मैं लड़कियों के साथ जाऊँ। तो चली जाऊँगी। उसके लिए इतने तानों-उलाहनों की क्या ज़रूरत है?"
"और मिस्टर हबी? उनका क्या होगा?"
"उसकी चिंता आपको क्यों हो रही है? दैट इज माय प्रॉब्लम!"

उसी तैश में मैं मैडम के कमरे में चली गई और कह दिया कि मिसेज गुप्ता के न आने से कोई परेशानी हो रही हो तो मैं तैयार हूँ। वे कुछ देर तक मुझे देखती रहीं। फिर बोली, "इट इज व्हेरी स्पोर्टिंग ऑफ यू। दरअसल मैं तुम्हें बुलाने को सोच ही रही थी। अकेली विभा पर तो भरोसा नहीं किया जा सकता ना।"
"तो आप इतना संकोच क्यों करती है मैम। यू आर द बॉस। आप जिसे कहेंगी उसे जाना ही पड़ेगा। आप नहीं जानतीं, आपके इस सौजन्य का लोग कितना ग़लत अर्थ निकालते हैं।"
"आय डोंट केयर। मैं तो सिर्फ़ शर्मा जी के बारे में सोच रही थी।"

मैं चार-पाँच बार उन्हें बतला चुकी हूँ कि वे मि. कश्यप हैं, शर्मा नहीं। पर उन्हें याद ही नहीं रहता। अब तो मैंने टोकना भी छोड़ दिया है। इसलिए उनके सुर में सुर मिलाकर कहा, "आप शर्मा जी की चिंता न करें। मैं उन्हें फ़ोन कर दूँगी। वे भी सरकारी नौकर हैं, ड्यूटी का मतलब समझते हैं।"
"ओ.के. एंड गुड लक टू यू।"

घर लौटते समय बहुत हलका महसूस कर रही थी। अच्छा लगा कि मेरे प्रस्ताव के बाद मैडम के चेहरे पर राहत के भाव उभरे थे। पर ईमानदारी की बात यह थी कि उनसे भी ज़्यादा राहत का अहसास मुझे हो रहा था। पिछले दो हफ़्ते श्रीमान जी नहीं आए थे। आख़िरी बार जिस मूड में यहाँ से गए थे, लगता था इस बार भी नहीं आएँगे। दो रविवार लगातार मैं स्नेही पड़ोसियों की प्यार भरी पूछताछ से तंग आ गई थी। इस हफ़्ते फिर वही सब दोहराना संकट लग रहा था। शायद इसलिए आगे बढ़कर मैंने यह ज़िम्मेदारी ले ली थी। मुझे एक बहाना चाहिए था, सो मिल गया।

कभी-कभी लगता है मैंने नाहक शादी की। ज़िंदगी अच्छी भली गुज़र रही थी। न कोई तनाव था न पछतावा। बस एक शादी की चिंता थी जो मुझसे ज़्यादा मेरे भाइयों को खाए जा रही थी। अपनी भरी-पूरी गृहस्थियों के बीच बेचारे एक अपराध बोध के साथ जी रहे थे। बड़े भैया की पिंकी के बी ए़ क़र लेने के बाद तो सबके सब जैसे एकदम व्यग्र हो उठे। कम से कम उसकी शादी से पहले मेरी हो जाना लाज़मी था। सो श्रीमान कश्यप को घेरा गया। दस और बारह साल के दो बच्चों के बाप से शादी करना मेरे लिए कतई रोमाँचक नहीं था पर भाई आश्वस्त थे कि मुझे अपना एक घर मिल गया है।

पर उस घर से जुड़ कहाँ पाई, किसी ने मौका ही नही दिया। शादी के बाद चार पाँच दिन रही थी। बाद में दीपावली पर लक्ष्मीपूजन के लिए गई थी बस। छुटि्टयों में वे मुझे एकाध महीना घुमाने ले गए थे। एक महीना मुझे भाइयों के पास रहने के लिए कह दिया था। भाइयों के पास तो हर छुट्टी में जाती थी। पर इस बार का अनुभव नया था। पीहर आई बहन-बेटी का स्वागत सत्कार। लाड दुलार पहली बार ही पाया था। शादी के बाद भी मैं तो उसी घर मैं बनी रही। पर हाँ मिस्टर कश्यप को ज़रूर एक अतिरिक्त घर मिल गया था। उनकी सारी छुटि्टयाँ यहीं गुज़रतीं। केंद्र सरकार की नौकरी थी। शनिवार, रविवार छुट्टी होती। वे भोपाल से शुक्रवार को इंटरसिटी से आते और सोमवार की सुबह उसी ट्रेन से लौट जाते। साल भर से मेरा दांपत्य जीवन इसी साप्ताहिक तऱ्ज पर चल रहा था।

उस रविवार की रात को भी वे घड़ी में अलार्म भर रहे थे कि मैंने कहा, "सुबह चले जाएँगे?"
"जाना तो पड़ेगा ही। कल सोमवार है, भूल गई क्या?"
"सोमवार को कैसे भूल सकती हूँ, मुझे भी तो कॉलेज जाना है। पर मुझे और भी कुछ याद आ रहा है।"
"क्या?"
"कल शाम मैंने कुछ लोगों को खाने पर बुला लिया था।"
"कल क्यों? आज ही बुला लेतीं न।"
"यों ही बुलाना अच्छा नहीं लगता। कोई मौका भी तो हो।"
"तो कल क्या है?"
"आपकी याददाश्त तो इतनी अच्छी है। आपको यहां बैठकर भी अपने बच्चों के ही नहीं, भांजे-भतीजों के, मामा मौसियों के जन्मदिन याद आ जाते हैं।"
"कल तुम्हारा जन्मदिन है?"
"नहीं, मेरा जन्मदिन तो कब से आकर चला गया। जिन्हें याद था उन्होंने मना भी लिया। आपके लिए मुझे सौ-सौ बहाने गढ़ने पड़े। एक साड़ी अपनी ओर से ख़रीदकर आपके उपहार के तौर पर पेश करनी पड़ी। मेरा जन्मदिन आपको याद नहीं रहा, कोई बात नहीं। पर कल की तारीख तो आपको याद रखनी चाहिए या कि उसका भी आपके निकट कोई महत्व नहीं है- न चाहते हुए भी मेरी आवाज़ थोड़ी तल्ख हो गई थी।"
उन्होंने कैलेंडर की ओर नज़र डाली, "ओह! कल ११ नवंबर है। मतलब अपनी शादी को एक साल पूरा हो गया।"
"धन्य भाग्य! आपको याद तो आया। पर आपने इस तरह मुँह क्यों लटका लिया? मैंने स्र्कने के लिए कहा ज़रूर है पर कोई समस्या हो तो रहने दीजिए। सेलिब्रेशन का मूड अगर है तो मैं साथ चली चलती हूँ नहीं तो उसकी भी कोई ज़रूरत नहीं है।"

"तुम चलना चाहो तो ज़रूर चलो," उन्होंने कहा, पर स्वर मैं कोई आग्रह नहीं था, "ऐसा है कि बच्चों की परीक्षाएँ चल रही हैं। मंगलवार को शौनक का गणित का पेपर है इसीलिए मेरा कल जाना ज़रूरी है।"
"सेलीब्रेशन से मेरा मतलब किसी पार्टी से नहीं था। हम सब मिलकर बाहर खाना खा सकते थे या एकाध पिक्चर देख सकते थे। बच्चों की परीक्षाएँ चल रही हैं तो कोई बात नहीं। हम लोग दिनभर साथ ही रह लेते। यह प्रस्ताव आपकी ओर से आता तो मैं उतने ही में खुश हो जाती। पर आपको तो याद ही नहीं था। आपको अम्माजी के ठाकुरजी तक की याद रहती है। पिछली रामनवमी और जन्माष्टमी पर श्रृंगार का सारा सामान यहीं से ले गए थे। बस आपको मेरा जन्मदिन या अपनी शादी की सालगिरह याद नहीं रही।"
"बार-बार बच्चों का, अम्मा का ताना क्यों दे रही हो? वे लोग मेरी ज़िम्मेदारी हैं।"
"और मैं क्या हूँ? सिर्फ़ ज़रूरत?"
"कैसी ज़रूरत?"
"यह भी बताना पड़ेगा?"

कुछ देर तक कमरे में भीषण स्तब्धता छाई रही। फिर मैंने ही कहा, "आप बच्चों के सामने एक आदर्श पिता बने रहना चाहते हैं। इसीलिए मुझे तरजीह नहीं देते, जानती हूँ। इसीलिए आज तक आपने मेरे स्थानांतरण के लिए प्रयत्न नहीं किया। आश्चर्य तो यह कि अम्माजी ने भी कभी इसके लिए ज़ोर नहीं दिया।"
"प्लीज़ लीव्ह माय मदर अलोन।"
"मैं कोई उन्हें गाली थोड़े ही दे रही हूँ, एक बात कह रही हूँ। कोई भावुक महिला होती तो कहती, बहू, तुम आकर जल्दी से अपना घर-बार सम्हालो और मुझे छुट्टी दो। पर वे बड़ी प्रैक्टिकल हैं। उन्हें यही व्यवस्था रास आ गई है। घर में उनका एकछत्र शासन भी बना रहता है और बेटे को कोई परेशानी भी नहीं होती। वह आदर्श बेटा बना रहता है। आदर्श पिता बना रहता है और उसकी साप्ताहिक आनंद-यात्रा भी निर्विघ्न चलती रहती है।"
"आनंद यात्रा? वाह! तुम क्या सोचती हो तुम कोई हुस्नपरी हो जिसके लिए मैं दीवाना हो चला आता हूँ।"

ठक्क! लगा जैसे किसी ने कलेजे पर एक घूँसा जड़ दिया हो। बड़ी मुश्किल से मैं उस पीड़ा को जज़्ब कर पाई। फिर अत्यंत कसैले स्वर में कहा, "मैं हुस्नपरी होती तो चौंतीस साल तक अनब्याही न बैठी रहती। और न ही दो बच्चों के बाप से शादी करती।"

यह बात कहने के साथ ही मैं दीवार की ओर मुँह करके लेट गई थी इस कारण उनका चेहरा नहीं देख पाई। पर वह ज़रूर स्याह पड़ गया होगा। वे उस रात कब कहां सोए मैं नहीं जानती। सुबह अलार्म बजा था पर मैं नहीं उठी। उन्होंने शायद अपने से ही चाय बनाई थी। पर मैं दम साधे पड़ी रही। जाते समय उन्होंने मुझे आवाज़ दी भी हो तो पता नहीं।

सुबह उठी तो लगा जैसे एक भयानक स्वप्न देखकर जागी हूँ।
उसके बाद आज तीसरा शुक्रवार है, जनाब की कोई खबर नहीं। रूठकर गए हैं, सोचा होगा मना लेगी। पर हम मिट्टी के नहीं बने हैं। बल्कि गुस्सा तो हमें आना चाहिए था। अपमान तो हमारा हुआ है।
सच तो यह है कि उनके न आने से मुझे राहत ही मिली थी। क्यों कि मुझे लग रहा था कि अब मैं उस व्यक्ति का स्पर्श या सामीप्य सहन नहीं कर पाऊँगी।

सुबह बैग भर रही थी कि फ़ोन खड़का, "मैं बोल रहा हूँ।"
मैं? कितना ज़बरदस्त अहम है। जैसे आवाज़ सुनते ही पहचान लिए जाएँगे।
"अच्छा आप हैं? कहिए।"
"हम लोग रात को नौ बजे तक पहुँच रहे हैं। फ़ोन इसलिए किया कि खाना बनाकर रख सको।"
पिछले दो शुक्रवार से मेरा खाना बरबाद हो रहा था। पर मैंने उसका ज़िक्र न करते हुए कहा, "हम लोग मतलब?"
"बच्चे भी साथ आ रहे हैं। इसीलिए बस से आ रहा हूँ। ट्रेन बहुत लेट पहुँचती है।"

मैं पसोपेश में पड़ गई। मेरी चुप्पी से वे भी थोड़े विचलित हो गए, "क्या हुआ? कोई समस्या? कहो तो बच्चों को न लाऊं। बड़ी मुश्किल से उन्हें राज़ी किया था।"
"बच्चे आ रहे हैं तो दे आर मोस्ट वेलकम। लेकिन सचमुच एक समस्या आ गई हैं। मैं आज शाम को अजंता-एलोरा जा रही हूँ।"
"प्रोग्राम बदल नहीं सकतीं?"
"नहीं। क्यों कि ये प्लेजर ट्रिप नहीं है। कॉलेज की लड़कियों के साथ इंचार्ज बनकर जा रही हूँ।"
"पर तुम्हीं क्यों?"
"मैं क्यों नहीं? पिछले सालभर से तो उन्होंने मुझसे कोई काम नहीं लिया। मेरे सारे संडेज़ फ्री रक्खे। कॉलेज में इतनी परीक्षाएँ होती हैं पर कभी इनविजीलेशन की ड्यूटी भी नहीं दी। पर किसी की सदाशयता का ज़्यादा फ़ायदा उठाना अच्छा थोड़े ही लगता है। आख़िर ये मेरी नौकरी है।"

इस बार उधर चुप्पी छाई रही।
"फिर दो हफ़्ते से आप आए नहीं थे तो मैंने सोचा इस बार भी नहीं आएँगे।"
"मैं दो हफ़्तों से नहीं आया तो तुमने कोई खोज ख़बर भी तो नहीं ली। एक बार फ़ोन ही कर लेतीं।"
"कारण मुझे मालूम था इसीलिए फ़ोन नहीं किया।"
"मैं बीमार भी तो हो सकता था।"
"बीमार होते तो फ़ोन करते। आप तो नाराज़ थे। मैं तो आज भी आपकी आशा नहीं कर रही थी। शायद अम्माजी ने. . .।"
"हर बार अम्मा को बीच में क्यों ले आती हो?"
"बहुत श्रद्धायुक्त अंत:करण से कह रही हूँ कि शायद अम्माजी ने ही समझाया होगा कि कमाऊ बीबी से बनाकर चलना चाहिए।"

उधर से फ़ोन पटकने की आवाज़ आई। मैंने भी परवाह नहीं की। अगर आप कड़वी बात कहते हो तो सुनने का भी हौसला रखो। जब सुन नहीं सकते तो कहते क्यों हो?
कॉलेज से लौटते हुए अचानक ख़याल आया कि सफ़र के लिए कुछ ज़रूरी चीज़ें ले लूँ। घर की ओर मुड़ने की बजाए मैं बाज़ार की ओर मुड़ गई। वह शायद मेरी होनी ही थी जिसने मुझे इस बात के लिए प्रेरित किया था। क्यों कि उस ओर मुड़ते ही एक स्कूल बस मेरे सामने आ गई। उसे बचाने के लिए मैं सड़क के इतने किनारे चली गई कि गिर ही पड़ी। क्षणभर को आँखों के सामने अँधेरा छा गया। पलभर में वहाँ भीड़ जुड़ आई थी।

चार सहृदय लोगों ने मुझे स्कूटर के नीचे से निकाला और पास के अस्पताल में पहुँचाया। मैंने तुरंत एक फ़ोन पड़ोस में किया और एक कॉलेज में। नीतू और उसकी मम्मी फ़ौरन दौड़ी चली आई और पूरे समय मेरे साथ बनी रहीं। कॉलेज में फ़ोन करने का मेरा उद्देश्य सिर्फ़ यह था कि लोग मेरे भरोसे न रहें। पर ख़बर मिलते ही प्रिंसीपल मैडम भी दो तीन लोगों के साथ आ गई और जाते समय अपनी कार वहीं छोड़ गई। रात दस बजे जब घर लौटी तो मेरे बाएँ हाथ में प्लास्टर था बाएँ पैर की पिंडली में 6-7 टाँके थे और घुटने और कंधे पर खरौंचें थी। सौभाग्य से सिर पर कोई चोट नहीं थी पर वह बेतरह घूम रहा था।

घर आते ही पस्त होने से पहले मैंने बड़े भैया को फ़ोन लगाया। मेरे कुछ कहने से पहले वे ही बोल उठे, "अरे इतनी देर तुम कहाँ थी? मैं कब से फ़ोन लगा रहा हूँ।"
उनके स्वर में उल्लास फूट पड़ रहा था। मैंने अपनी बात कुछ देर को मुल्तवी कर के कहा, "थोड़ा बाज़ार तक गई थी। पर आप मुझे क्यों ढूँढ़ रहे थे?"
"अरे वो बीकानेरवाले पिंकी को देखकर गए थे न! उनके यहाँ से हाँ आ गई है।"
"अरे वाह! बधाई।"
"लड़का तीन महीने के लिए जापान जा रहा है। इसलिए माँ के साथ एक बार मिलने आ रहा है। मेरी इच्छा थी कि कल तुम दोनों भी आ जाते तो लड़के को देख लेते।"
"दरअसल क्या है भैया कि मैं कॉलेज की लड़कियों के साथ टूर पर जा रही थी तो इन्हें आने के लिए मना कर दिया था।"
"कब जा रही हो?"
"आज ही जाना था पर पता नहीं कैसे स्कूटर से गिर पड़ी। पट्टी वगैरह करवाकर अभी लौटी हूँ।"
"ज़्यादा चोट तो नहीं आई?"
"चोट तो ज़्यादा नहीं है पर आना ज़रा मुश्किल लग रहा है।"
"ख़ैर कोई बात नहीं। टेक केअर। इन लोगों से निपट लूँ फिर आता हूँ।"
नीतू मुझे देखती रह गई- "यह क्या? आपने ठीक से बताया क्यों नहीं?''
"वे बिटिया का रिश्ता तय कर रहे हैं इस समय मैं उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहती।"
"जीजाजी को तो फ़ोन कर दिया होता।"
"नहीं रे। यहाँ नहीं आना था इसलिए उन्होंने टूर प्रोग्राम बना लिया था। घर पर अम्माजी और बच्चे अकेले होंगे। इतनी रात को फ़ोन करूँगी तो परेशान हो जाएँगे।"
"जीजाजी के पास मोबाइल नहीं है?"
"यही तो सोच रही हूँ इस जन्मदिन पर उन्हें प्रेजेंट ही कर दूँगी। बहुत परेशानी होती है। अच्छा नीतू, आज की रात तुम मेरे पास रह जाओगी। कल से मैं वासंती को बोल दूँगी।"
"कैसी बात कर रही हो? आज तो मुझे रहना ही है। अपने घर पर ख़बर की भी होती तो सुबह से पहले कोई आता थोड़े ही।"

वह रात बड़ी मुश्किल से कटी।
उपचार के समय उन्होंने ज़रूर कोई निश्चेतक दवा दी होगी। उसका असर धीरे-धीरे कम हो रहा था और दर्द अपना अस्तित्व जताने लगा था। यों तो दर्द निवारक गोलियाँ भी दी गई थीं। पर उन्हें कारगर होने में थोड़ा समय लगता ही था। घर का कोई साथ में होता तो मैं उसे सारी रात सोने नहीं देती। पर पराई लड़की को परेशान कैसे करती सो सहनशीलता का नाटक करना ही पड़ा। दर्द के घूँट पीते हुए मैं बारबार उस एक व्यक्ति को कोस रही थी - मि. कश्यप! आपने सालभर में कोई और तोहफ़ा तो नहीं दिया। पर शायद बद्दुआएँ दिल खोलकर दी हैं। उसी को भुगत रही हूँ। नहीं तो दस साल से गाड़ी चला रही हूँ। कभी एक खरौंच भी नहीं आई।

बमुश्किल तमाम रात के तीसरे पहर थोड़ी-सी आँख लगी। पर नीतू ने सात बजे ही चाय के लिए जगा दिया। उसका कहना भी ठीक था। बोली, "आप हाथ मुँह धोकर तैयार हो जाइए। अड़ोस-पड़ोस में ख़बर लगते ही आने वालों का ताँता शुरू हो जाएगा। आप परेशान हो जाएँगी।"

फिर उसी ने मेरे मुँह हाथ धुलवाए, बाल ठीक किए। उसी की मदद से मैंने कपड़े बदले। फिर उसने मेरे हाथ में कॉर्डलेस थमा कर मुझे सोफे पर लाकर बिठा दिया। आसपास तकिए लगाकर ऐसी व्यवस्था कर दी कि मैं अधलेटी रह सकूँ। बोली कि हर किसी को बेडरूम तक लाना ठीक नहीं लगता।
उसका तर्क ठीक था और जैसा कि उसने कहा था। आठ बजे से आने वालों का सिलसिला जो शुरू हुआ- दस साढ़े दस तक चलता ही रहा। बेचारी नीतू नहाने धोने घर भी न जा सकी। ग्यारह बजे मैंने उसे ज़बरदस्ती घर भेजा। कहा कि दरवाज़े में चेन लगा दो। आने वाला अपने आप खोल लेगा।

नीतू गए मुश्किल से दस मिनट हुए होंगे कि दरवाज़ा अपने आप खुल गया। मैं तो चकित थी कि न दस्तक, न घंटी, ऐसे औचक कौन आ गया। पर जब आगंतुक को देखा तो देखती रह गई। कमर पर दोनों हाथ रखे, दरवाज़े में खड़े होकर श्रीमान मुझे घूर रहे थे। उस दृष्टि में रोष था, उपालंभ था, उपहास था और शायद तिरस्कार भी।
"आय न्यू इट। मुझे मालूम था, तुम्हें कहीं आना-जाना नहीं था। सिर्फ़ मुझे टालने के लिए बहाना बनाया गया था। आय वॉज डेड श्योर।" 

वे जिस तरह मुझे घूर रहे थे, मैं भी एकटक उन्हें देख रही थी। मेरी आँखों में उपालंभ की मात्रा शायद ज़्यादा गहरी थी। क्यों कि थोड़ी देर बाद उन्होंने अपनी नज़रें फेर लीं। उनकी नज़रें हटते ही मैंने कॉर्डलेस पर पड़ोस का नंबर मिलाया, "सॉरी नीतू डार्लिंग, तुम्हें फिर से कष्ट दे रही हूँ। पर क्या है कि तुम्हारे जीजाजी आ गए हैं। एक कप चाय बनाकर दे जाओगी तो अच्छा रहेगा।"
"मेरे लिए पड़ोसियों को कष्ट देने की कोई ज़रूरत नहीं है।" उन्होंने कसैले स्वर में कहा। अब वे दरवाज़ा छोड़कर सामने कुर्सी पर बैठ गए थे। "अगर घर में चाय बनाने में कोई प्रॉब्लम है तो मैं बाहर पी सकता हूँ। वैसे भी मैं यहाँ रुकने वाला नहीं हूँ। सिर्फ़ देखने चला आया था।"

मैं भी उन्हें चाय पिलाने के लिए बहुत व्यग्र नहीं थी। बस चाहती थी कि इस समय हम दोनों के बीच में कोई तीसरा आकर बैठ जाए। मुझे पता था कि जीजाजी का नाम सुनते ही नीतू दौड़ी चली आएगी।
और वही हुआ। पाँच मिनट में नीतू दो कप चाय लेकर हाज़िर हो गई।
"हाय जीजाजी।" नीतू ने चहककर स्वागत किया और हुलसकर पूछा, "आपको कैसे पता चला? दीदी तो फ़ोन ही नहीं कर रही थीं।"
"पता करने वाले पता कर ही लेते हैं।" इन्होंने कुटिल मुस्कान के साथ कहा। बेचारी नीतू! इनका मंतव्य समझ नहीं पाई। अपनी ही रौ में बोली, "मम्मी यही तो कह रही थीं कि दिल से दिल को राह होती है। फ़ोन करने की क्या ज़रूरत है।"
फिर इन्हें चाय पकड़ाते हुए मुझसे बोली, "दीदी! अब आप भी उठकर ज़रा-सी चाय पी लो। सुबह से बोल-बोलकर दिमाग़ चकरा गया होगा।"

वो मुझे सहारा देकर उठाने लगी और इनके चेहरे का रंग बदलने लगा। मेरी अधलेटी मुद्रा को वे अनादर का प्रदर्शन समझ रहे थे। अब उन्हें कुछ-कुछ समझ में आ रहा था। उठने की प्रक्रिया में जब मेरा शॉल कंधे से खिसक गया तो उनकी प्लास्टर पर नज़र पड़ी, "अरे! ये हाथ को क्या हो गया?"
"गनीमत है कि सिर्फ़ हाथ ही टूटा है। आप खुशकिस्मत है जीजाजी कि ये सही सलामत बच गई। वरना क्या से क्या हो जाता।"
"तुम्हें मैं सही सलामत नज़र आ रही हूँ?"
"अरे हाथ ही तो टूटा है। सब लोग कर रहे थे कि किस्मतवाली थी जो सड़क के किनारे गिरीं। अगर बीच में गिरती तो सोचो क्या होता?"
उस कल्पना मात्र से ही मुझे झुरझुरी हो आई। मैंने नीतू से कहा, "थोड़ी हेल्प कर दोगी तो भीतर जाकर थोड़ा लेट लूँगी।"
"हाँ, अब आप बिल्कुल आराम करो। कोई आएगा तो जीजाजी निपट लेंगे।"
बिस्तर पर लेटते हुए मैंने कहा, "बसंती को दो दिन की छुट्टी दे दी थी। अगर किसी के हाथ ख़बर भिजवा दोगी तो वे आ जाएगी। दो रोटी ही डाल जाएगी।"
"बसंती को मैं ख़बर कर दूँगी। पर आप रोटी की इतनी चिंता क्यों कर रही हैं? हम लोग क्या इतना भी नहीं कर सकते?"
"तुम्हीं लोग तो कर रहे हो।"
"पड़ोसी और होते किसलिए हैं?"
नीतू जब चली गई तो ये कमरे में आकर बोले, "इतना सब हो गया तो क्या मुझे फ़ोन नहीं कर सकती थी?"
मैंने एक क्षण उनकी ओर देखा और कहा, "फ़ोन कर भी देती तो क्या आप विश्वास कर लेते? या इसे भी एक बहाना समझते?"

वे चुप हो गए। फिर बड़ी देर तक एक मौन हम दोनों के बीच पसरा रहा। फिर कुछ देर बाद फ़ोन बजा। मेरा कॉर्डलेस बाहर ही छूट गया था इसलिए फ़ोन इन्हें ही उठाना पड़ा। शायद बड़े भैया का था, "मेरा हालचाल पूछ रहे थे। मैं जब तक उन्हें सावधान करती वे सब ब्यौरा दे चुके थे। फिर तो मेरी पेशी होनी ही थी।"
"ये क्या कर बैठीं तुम? और रात को मुझे बताया क्यों नहीं? मैं उसी समय चला आता।"
"मुझे मालूम था इसीलिए नहीं बताया। आप आ भी जाते तो सुबह फिर मेहमानों के लिए भागना पड़ता अब आपकी उम्र इतनी भागदौड़ करने की नहीं है। वैसे चिंता की कोई बात नहीं है। पड़ोसी बहुत अच्छे हैं, और अब तो ये भी आ गए हैं।"
"हाँ, अभी फ़ोन पर उनकी आवाज़ सुनकर थोड़ा संतोष तो हुआ। अच्छा तो हम लोग सुबह आते हैं। टेक केअर।"

भैया के फ़ोन के बाद फिर से सन्नाटा छा गया। ये पेपर पढ़ते रहे, मैं सोने की कोशिश करती रही। नीतू दोनों की थालियाँ लेकर आई तभी यह नीरवता भंग हुई।
नीतू बोली, "मम्मी तो कह रही थीं जमाई जी को यहीं बुला लो। ठीक से खा लेंगे। पर मैंने कह दिया कि दीदी अकेली बोर हो जाएँगी। वो अच्छी हो जाएँ फिर दोनों को एक साथ बुलाकर खूब ख़ातिरदारी कर लेना।"
"एक बात और। जाते हुए मैं बाहर से ताला डालकर जा रही हूँ। नहीं तो मोहल्ले भर की आँटी लोग तंग करने आ जाएँगी। रातभर की जागी हो, थोड़ा आराम कर लो।"
"खोलोगी कब?"
"चार बजे चाय लेकर आऊँगी न!"

और सचमुच वह हमें ताले में बंद करके चली गई। वह जब तक रहती है पटर-पटर करती रहती है। घर भरा-भरा लगता है। उसके जाते ही एक निचाट सूनेपन ने घेर लिया। उस असहज एकांत से निजात पाने के लिए मैंने कहा, "आप तो आज ही जाने वाले थे न! तो दिन में निकल जाते। रात में ठंड से परेशान हो जाएँगे।"
वे एक क्षण मुझे घूरते रहे। फिर बोले, "मुझे क्या इतना गया-गुज़रा समझ लिया है कि तुम्हें इस हाल में छोड़कर चला जाऊँगा।"

एक तरह से बात यहीं पर एक अच्छे बिंदु पर समाप्त हो जानी थी। पर मेरे मन में तो प्रतिशोध की आग धधक रही थी। वह हुस्नपरी वाला डायलॉग मेरे कलेजे में कील की तरह गड़ा हुआ था। उसी ने मुझे चुप नहीं बैठने दिया। मैंने बड़े नाटकीय अंदाज़ में कहा, "मेरी ऐसी हालत है तभी तो कह रही हूँ, रुककर क्या करेंगे।"
वे अवाक होकर मुझे देखते रह गए, "व्हॉट डू यू मीन?"
"कुछ नहीं। एक पुरानी बात याद आ गई। एक बार आए थे और मैं -(संकोच के मारे मैं क्षणभर को चुप रह गई) उस दिन आप कितना नाराज़ हुए थे। कहा था कि फ़ोन तो कर देतीं। बेकार में दो ढाई सौ रुपए को चूना लग गया।"
उनका चेहरा फक पड़ गया। डूबती सी आवाज़ में बोले, "उस बात को अब तक गाँठ बाँध बैठी हो?"
"यही क्यों? और भी बहुत-सी हैं। सारी गाँठे खोलने बैठूँगी तो सुबह से शाम हो जाएगी।"
"तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे मैं तुम पर बहुत अत्याचार करता रहा हूँ।"
"प्रचलित मायनों में जिसे अत्याचार कहते हैं वह तो आप कर नहीं सकते थे क्यों कि मैं उतनी बेचारी नहीं हूँ। आपका तरीका बड़ा सोफिस्टिकेटेड है और एप्रोच बहुत ही प्रेक्टिकल। बहुत आसानी से आप सामने वाले की भावनाओं को अनदेखा कर देते हैं।"
"मसलन?"
"मसलन - अब कहाँ से शुरू करूँ। चलिए शुरू से करते हैं। याद है जब शादी के बाद पहली बार हम लोग इस घर में आए थे। मेरी सहेलियों ने घर को बहुत कलात्मक ढंग से सजाया था। हमारा स्वागत भी बहुत शानदार हुआ था। हार-फूल, संगीत, उपहार, मिठाई - और लोग इतने कि पैर रखने को जगह नहीं थी। उसके बाद जब हम अकेले हुए तो आपका प्रश्न था- फ्लैट तो बहुत सुंदर है, कितने का पड़ा?"
"क्या मुझे यह पूछने का हक नहीं था?"
"ज़रूर था पर आपकी टाइमिंग गल़त हो गई। उस निभृत एकांत की अवहेलना कर आप इंदौर और भोपाल की कीमतों की तुलना करते रहे। बातों-बातों में आपने यह भी पूछ लिया कि मैंने लोन बैंक से उठाया था या जी प़ी ए़फ स़े लिया था? और यह भी कि किश्तें पट गई हैं या कि अभी बाकी है!"
"मेरे ख़याल से मुझे यह भी पूछने का हक नहीं था।"
"हक सौ फीसदी है। पर यह विषय उस दिन के लिए नहीं था। मुझे मालूम है मेरी शादी में मेरी नौकरी, मेरा वेतन, मेरा फ्लैट प्लस पाइंटस थे। पर वे ही अहम मुद्दा होकर रह जाएँगे और मैं गौण हो जाऊँगी यह नहीं सोचा था। अगली बार आप जब आए तो आपने नॉमिनेशन के बारे में पूछा था। मैंने दोनों भाइयों के बेटों को फ्लैट और जीपीएफ के लिए नॉमिनेट किया था। आपने कहा कि अगर नामाँकन बदलना है तो फुर्ती करनी होगी। नहीं तो बाद में बहुत परेशानी होती है।"
"इसमें गल़त क्या था। सरकारी दफ़्तर में काम करता हूँ। रोज़ देखता हूँ कि लोग बाद में किस तरह परेशान होते हैं।"
"मैं भी जानती हूँ। पर महीने भर पहले ब्याही औरत भविष्य के सपने देखती है। उसे वसीयत के बारे में सोचना ज़रा अच्छा नहीं लगता। बदली हुई परिस्थिति में शायद मैं खुद इस विषय में पहल करती। पर आपकी उतावली देखकर वितृष्णा हो आई।"
"इसके बाद तो शोषण का एक अनवरत सिलसिला शुरू हो गया। मेरे टेलीफ़ोन का बिल दुगुना तिगुना आने लगा। सब लोग छेड़ते कि रात-रात भर मियाँ से बात करती होगी। उन्हें क्या पता कि मियाँ ने घर पर बात करने के लिए एकदम मना किया हुआ है। और दफ़्तर में बात करना मुझे अच्छा नहीं लगता। उन्हें कैसे बताती कि यहाँ आकर श्रीमान को सारे दोस्तों के, भाई भतीजों के जन्मदिन याद आ जाते हैं। सारे रिश्तेदारों की मिजाज़पुरसी और मातमपुरसी यहाँ से होती है।"
"यह तो शायद तुम्हें भी पता होगा कि लांग डिस्टेंस कॉल्स संडेज़ को सस्ती पड़ती है। और अक्सर संडेज़ को मैं यही होता हूँ।"
"हाँ, मुझे पता है और मुझे यह भी पता है कि इंदौर का कपड़ा मार्केट बहुत अच्छा है। इसलिए चादरें और परदे यहीं से ख़रीदना चाहिए। यहाँ के रेडीमेड गारमेंट्स की मंडी भी बहुत मशहूर है इसलिए बच्चों के जन्मदिन के कपड़े यहीं से लेना चाहिए। यहाँ जब तब गरम कपड़ों की 'सेल' लगती है इसलिए अम्माजी के लिए शाल और स्वेटर यहीं से जाएगा। इसके अलावा और भी फर्माइशी चीजे हैं। जैसे फरियाली सामान, नमकीन, राहुल के लिए कैमरा, एटलस, रीना के लिए बार्बी का सेट, कलर बॉक्स वगैरह- और मुझे यह भी मालूम है कि आपने घर पर यह कभी नहीं जताया होगा कि ये फ़र्माइश कौन पूरी कर रहा है।"
"देखो ज़्यादा एहसान जताने की ज़रूरत नहीं है। हिसाब लगाकर रखना, अगली बार आऊँगा तो सब चुकता कर जाऊँगा।"
"हिसाब करने की ज़रूरत नहीं, क्यों कि यह सब मैंने अपने घर के लिए, अपने बच्चों के लिए किया था। जिस तरह शादी के बाद यह घर आपका हो गया, मैंने सोचा कि वह घर भी अब मेरा ही है। इसलिए एहसान की कोई बात नहीं है। बात अधिकार की है। राहुल को जन्मदिन पर डांस करना था, आप यहाँ का म्यूज़िक सिस्टम ले गए। बच्चों को गर्मियों में पिक्चर्स देखनी थीं, आप यहाँ से वीसीडी प्लेयर ले गए, बार-बार बिजली गुल होने से बच्चों की पढ़ाई हर्ज़ होती है इसलिए मेरा इमर्जेंसी लैंप भी भोपाल पहुँच गया- मैं शिकायत नहीं कर रही हूँ। आपको अधिकार था और आपने उसका उपयोग किया। पर यह तो वन-वे ट्रैफिक हो गया। मुझे तो कोई अधिकार मिला ही नहीं। मेरा तो सिर्फ़ एक्सप्लायटेशन किया गया।"
"वाह?"
"सुनने में बुरा लगता है न? शोषण कहूँगी तो और भी बुरा लगेगा। पर मेरे साथ यही हो रहा था और वह मेरी समझ में भी आ रहा था। पर मैंने मन को बहला लिया था कि मैं घर की किश्तें चुका रही हूँ। घर- जिसकी मुझे अरसे से तलाश थी। घर जो रिश्तों की मज़बूत ज़मीन पर खड़ा हो, घर जो आपसी सामंजस्य और सद्भाव के सहारे टिका हो। पर वह घर तो मुझे मिला नहीं। आपने दिया ही नहीं।"
"देखो, तुम्हारी तरह मैं साहित्यिक भाषा तो बोल नहीं सकता। लेकिन. . ."
"आप खूब बोल सकते हैं। आपका हुस्नपरी वाला जुमला तो अब तक मेरे कलेजे में गड़ा हुआ है। कल रातभर मैं दर्द के मारे सो नहीं पाई थी। पर यह दर्द उस दर्द के मुक़ाबले कुछ नहीं था जो उस रात आपने मुझे दिया। ये घाव तो कल को भर भी जाएँगे पर यह घाव ताउम्र हरा रहेगा।"
"और आज तो आपने कमाल ही कर दिया?"
"आज? आज मैंने क्या किया?" वे हैरान थे। "आज आप सिर्फ़ मेरे सच को परखने यहाँ चले आए। मान लो मैं चली ही गई होती तो- तो आपकी क्या इज़्ज़त रह जाती? या मेरी ही क्या इमेज बनती? आपकी तो यह दूसरी शादी है। इतना तो आप भी समझते होंगे कि दांपत्य का आधार होता है विश्वास- और मिस्टर कश्यप, आपने उसे ही नकार दिया। फिर शेष क्या रहा?"

तभी दरवाज़ा खड़का, नीतू शायद चाय लेकर आई थी। हम दोनों अच्छे बच्चों की तरह चुपचाप बैठ गए। वैसे भी बोल-बोल कर मैं इतना थक गई थी कि कुछ देर आँख बंद करके लेटने को जी चाह रहा था। और चाय पीकर मैं सचमुच लेट गई। नीतू बोली, "जीजा जी! शाम को क्या खाना पसंद करेंगे बताइए।"
व्यंग्यपूर्ण मुस्कुराहट के साथ वे बोले, "मैं ग़रीब क्या बताऊँगा, अपनी दीदी से पूछो। गेस्ट ऑफ ऑनर तो वो हैं" और इतना कहकर वे बाथरूम में घुस गए। नीतू थोड़ी देर बैठी बतियाती रही पर मेरी ओर से कोई प्रोत्साहन न पाकर चुपचाप उठकर चली गई।
वे फ्रेश होकर आए और बालों में कंघी फेरते हुए बोले, "अच्छा मैं निकल रहा हूँ।"
मैंने प्रश्नार्थक नज़रों से उनकी ओर देखा।
"रतलाम वालों के आने तक रुकने का इरादा था। पर देखता हूँ उसकी कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है। तुम्हारे अड़ोसी-पड़ोसी बहुत अच्छे हैं। खूब अच्छी सेवा टहल कर रहे हैं। मेरी वजह से बल्कि असुविधा ही हो रही है।
"-और हाँ, तुम्हारी सारी चीज़ें अगली बार ले आऊँगा, अगर आया तो वरना किसी के हाथ भिजवा दूँगा।"
मैंने उठने का उपक्रम किया तो बोले, "लेटी रहो। मेरे लिए फॉर्मेलिटीज़ करने की ज़रूरत नहीं है। वैसे भी आदर मान बहुत हो चुका है।"
"सी ऑफ करने के लिए न सही, दरवाज़ा बंद करने के लिए तो उठना होगा।"

मैं लड़खड़ाते हुए उठ खड़ी हुई। लंगड़ाते हुए जब तक दरवाज़े पर पहुँची, ये दो मंज़िल उतरकर बिल्डिंग के गेट तक पहुँच चुके थे। खिड़की से मैं उन्हें जाते हुए देखती रही।
फिर मैंने बहुत मुश्किल से दरवाज़ा बंद किया। इतने से श्रम से भी मैं हांफ गई थी। देर तक बंद दरवाज़े के सामने वहीं खड़ी रही जहाँ से मैंने उन्हें जाते हुए देखा था। मुझे लगा, वे मेरे घर से ही नहीं जीवन से भी चले गए हैं।

"अलविदा मि. कश्यप" मैंने कहा, "आज से मेरे घर और मेरे मन के, दरवाज़े आपके लिए बंद हो चुके हैं। घर का दरवाज़ा तो शायद कभी मजबूरी में खोलना भी पड़ेगा क्यों कि इस शादी को इतना आसानी से मैं नकार नहीं सकती। इसके लिए मेरे भाइयों ने बहुत सारा श्रम और पैसा खर्च किया है, इसलिए इस शादी को तो मुझे ढोना ही पड़ेगा। पर मेरे मन का दरवाज़ा अब आपके लिए कभी नहीं खुलेगा, कभी नहीं।"

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

दूब-धान : उषाकिरण खान

◆ दूब-धान : उषाकिरण खान

मंजिल से पहुंचने से पहले गाड़ी की रफ्तार तेज हो गई थी, और अब एक तीखी आवाज सीटी की अर्थात् स्टेशन नजदीक है. वैसे तो केतकी ने जब से गांव आने का कार्यक्रम बनाया, तभी से उसकी नींद उड़ गई थी लेकिन छोटी लाइन की गाड़ी पर चढ़ते ही आंखों ने थकान का अनुभव भी भुला दिया था. प्रसन्नता के अतिरेक में केतकी बावरी हो गई थी. रात के लगभग एक बज रहे थे जब गाड़ी स्टेशन पर पहुंच रही थी. कितने वर्षों के बाद केतकी अपने गांव की दहलीज पर आ रही थी. यह अवसर बड़ी मुश्किल से मिला था. चार भाइयों की डेउढ़ी में अकेली लड़की केतकी अपनी भतीजियों-भतीजों की हमउम्र थी. पिता के दो विवाह हुए थे. पहली पत्नी से मात्र चार लड़के थे, दूसरी से केतकी. केतकी माता और पिता के लिए राहु बनकर अवतरित हुई थी. पिता का स्वर्गवास तभी हो गया था जब केतकी गर्भ में थी और किशोरी माता के संबंध में सुनने में आता है कि विवाह होने के बाद वे केतकी को जन्म देने के लिए ही मात्र जीवित थीं. बड़ी भाभी ने केतकी को अपनी बेटी की तरह पाला था. पालन-पोषण में कोई कमी नहीं आने दी थी. पंद्रह वर्ष की केतकी ब्याहकर ससुराल चली गई थी. उसके श्वसुर महानगर में रहते थे. गांव-घर से कोई मतलब ही नहीं था. केतकी भी वहीं चली गई. गांव के एक-एक पंछी से बिछुड़ते केतकी का हृदय फटता था, किंतु नये वातावरण का आकर्षण उसे जीवित रखे था. इस बीच में कितने परिवर्तन आए. केतकी के भाई लोगों का मकान शहरों में बन गया. सभी भाई नगराभिमुख हो गए. सबसे बड़े भाई चीफ इंजीनियर के पद तक पहुंच गए हैं. सभी ब्याह शादियाँ शहरों में ही हुईं. मुहल्ले की शादियों की तरह केतकी आती और ब्याह का न्योता पूरा कर चली जाती. पशु-पक्षियों और ग्रामीण जन से अधिक घुली-मिली यह दीवानी लड़की यदि गांव के संबंध में कुछ पूछती भी तो माकूल उत्तर नहीं मिल पाता. एक बार बड़ी भाभी से कहा भी था इसने--"भाभी, गांव में कोई समारोह करिए, काफी दिन हो गए."
तो भाभी ने उत्तर दिया था--" गांव में सड़कें बन रही हैं, घर तैयार हो रहे हैं, फिर देखूंगी."

केतकी ने यूं ही कई बार अपने पति से भी कहा था कि एक बार अपने गांव जाने का मन करता है. उन्होंने यह कहकर टाल दिया था कि गांव में कौन रहता है? केतकी क्या कहे कि गांव में कौन रहता है उसका. भाई-भाभी और भतीजे-भतीजियाँ नहीं रहते हैं तो क्या, पूरे का पूरा गांव उसका अपना है. वह एक क्षण के लिए भी गांव को भूल नहीं पाती है. बच्चों की छुट्टियों में संपूर्ण भारत का भ्रमण भी उसको संतुष्ट नहीं करता, महानगर के पास के साफ-सुथरे कंक्रीट की सड़क वाले गांव उसे नहीं भाते. लोगों द्वारा ‘केतिकी’ पुकारना याद आता और याद आता कोसी का मिट्टी-पानी, कोर-कछार. उसके समय में जो नवगछुली बंबई और मालदह आम की लगी थी वह कितना विस्तृत हो गई होगी, यह सोचकर केतकी प्रसन्न होती. थोड़ा सा भी समय मिलेगा तो वह जरूर उस पर झूला लगवा लेगी. क्या हुआ माघ है तो, अब झूला लगाने के लिए कोई सावन का इंतजार तो नहीं करने देगा केतकी को. देखा तुमने, बड़ी भाभी की चिट्ठी आई है कि अबकी समीर के बेटों का जनेऊ गांव में ही करेंगी. केतकी ने कहा था. अच्छा तो है, अब उनके गांव तक सड़कें चली गई हैं, घर भी ठाट का बन गया है. ऐसी ही सड़कें?   और नहीं तो क्या, पगली! केतकी क्षण भर को उदास हो गई थी. फिर सोचा था अच्छा ही तो है, अब गाड़ी सीधे दरवाजे पर पहुंचेगी. पहले बैलगाड़ी और नाव की सवारी करनी पड़ती थी. उसे याद आया कैसे गौने के बाद उसकी बारादरी उठाकर नाव पर रखी गई थी और वह नदी पार कर अपनी ससुराल के घर में देवी को शीश नवाने पहुंची थी. चार दिन की विधि पूरी करने के बाद ही उसकी सास उसे लेकर महानगर चली गई थीं. तब से केतकी ने कभी इधर का मुख नहीं किया. अपने दरबे से नीचे उतरकर सामने कोसी नहीं देखी, सुनहरी-रुपहली अबरकों वाली सिकता नहीं देखी, कास और पटेर के जंगल नहीं देखे, आम की पीपें घिसकर सीटी नहीं बजाई. केतकी ने सींकी की डलिया में मुढ़ी-लाई नहीं खाए और न ही सींकी के बने कंगन, बाजूबंद खेल-खेल में सबुजनी से बनवाकर पहने. क्या सबुजनी जिंदा होगी. केतकी सोचती है और उसका मन दौड़कर धुनिया टोली पहुंच जाता है. गोरे-चिट्टे धुनिया मजदूर और गुलाबी रंगतों वाली उनकी औरतें. केतकी उन्हें देखती ही रह जाती. और यह सबुजनी कितनी सुंदर थी. गांव की बेटी थी, गांव में ही बस गई थी. सो वह घर-घर मुंह उघारकर घूमती रहती थी. गहरे काले बाल, नीले-हरे-बैंगनी मारकीन के चूने लिखे चूनर, गोरे मुखड़े पर लाल कान और कान में ऊपरी छोर से क्रम से लटकती पांच-पांच बालियां चांदी की. छम-छम करते गहने जौसन-बाजू तक और रुपैया का छड़ा जहां बैठती झन-झन बजता. सबुजनी की बड़ी पूछ बड़े घरों में थी. वह सींकी की रंग-बिरंगी सुंदर-सुंदर डलिया बनाती थी. उससे सीखने वालों का तांता लगा रहता. सबुजनी की दो बेटियां फूल और सत्तो ब्याहकर ससुराल जाने-आने लगी थीं और बेटा रहीम कुदाल कंधों पर रखने लगा था. उसी से केतकी सींकी का बाला-झुमका बनवाकर पहनती थी और फिर तोड़कर फेंक देती थी. सबुजनी लाड़ भरी झिड़की देकर फिर रंगी सींकी से केतकी के लिए कंगना बनाने लगती थी. केतकी को सबुजनी का जोर से ‘कतिकी..ई़़...ई़़’ पुकारना याद आता है. उसे याद आता है कैसे इस्लाम धर्म मानते हुए भी सबुजनी जीतिया और छठ करती थी. छठ की डलिया में सिर्फ फल-फूल देखकर एक बार केतकी ने टोका तो उसने कहा था- " मैं मुसलमान हूं न, मेरे हाथ का पकाया हुआ भोजन सूर्य देवता कैसे पाएंगे, इसलिए फल-फूल लेकर अर्घ्य चढ़ाती हूं."

"ऐसे देवता को क्यों अर्घ्य चढ़ाते हो जो तुम्हारे मुसलमान होने के कारण छूत मानते हैं? मत चढ़ाओ.." केतकी ने आवेश में कहा था. जीभ काटकर कान पकड़ते हुए सबुजनी ने ऐसा बोलने से मना किया. और डांट भी बताई. कहा, क्षमा मांग लो, देवता-पितर के बारे में ऐसा नहीं कहते. तब लाख यह समझाने पर कि वह कैसे जानती है भगवान् किसका खाते हैं, किसका नहीं, वह कुछ सुनने को तैयार नहीं हुई थी. जैसे ही निर्मल सौंदर्य की स्वामिनी थी वैसा ही हृदय भी था उसका. जाने अब यदि यह जीवित होगी भी तो कैसी होगी. होगी भी या नहीं कौन जाने. उनके पास कोई अपनी जमीन तो होती नहीं थी कि एक स्थान पर टिके रहें, जहां रोजी मिली होगी, चली गई होगी. नैहर की मिट्टी खाकर थोड़े कोई जी सकता है. खाएगा तो अनाज ही. जमीन वाले ही कौन अब जमीन पकड़कर बैठे रहते हैं. उससे असीमित आवश्यकताएं कहां पूरी पड़ती हैं. केतकी के ही एक भाई चीफ इंजीनियर हैं, दूसरे डॉक्टर और बाकी दो बड़े ठेकेदार. सबकी कोठियां राजाधानी में बनी हैं. बच्चों की शादियां भी वैसी ही हुई हैं और केतकी के पति भी तो उतनी बड़ी संस्था के विज्ञापन मैनेजर हैं. मोटी तनख्वाह, गाड़ी, महानगर में अपना मकान. मैट्रिक पास केतकी ने महानगर में ही रहकर एम़ए़, पीएच.डी कर ली. देश-विदेश घूमने से ही फुरसत नहीं मिलती. छुई-मुई सी केतकी फूल की तरह कोमल अब गदराकर भव्य महिला हो गई है. गांव जाना है, यह सुनकर ही उतावली हो आई थी केतकी. अपने वार्डरोब में देखा एक भी सूती प्रिंट या तांत की साड़ी नहीं थी. यहां सिंथेटिक के सिवा कोई सूती पहनता भी नहीं. महरी भी सूती साड़ियां धोना नहीं जानती. हाउस-कोट तक केतकी के पास इंपोर्टेड थे. पति के ऑफिस जाने के बाद सीधी वह राजस्थान इंपोरियम चली गई और कुछ सूती रंग-बिरंगी चूनरें खरीद लाई. बड़े स्टील के तह वाले बक्से के नीचे रखी हुई थी उसकी वह पीली विष्णुपुरी साड़ी. उसे निकालकर बहुत देर तक हाथ फेरती रही उस पर. लगा, कैशोर्य के कोमल सपनों को सहला रही है. इसे ही जनेऊ के दिन पहनेगी केतकी. आलता-बिछुआ और लौंग पहनकर कैसी लगेगी इस विष्णुपुरी साड़ी में. कल्पना में देर तक डूबी रही थी केतकी. उसे बहुत धुंधली याद है, छोटे चाचा का गौना था, बहू आने वाली थी. घर-आंगन लग रहा था जैसे खिल-खिल हंस रहा हो. कोठरियां और चौबारे, दालान और खलिहान सब गोबर से लिपा-पुता था. कोहबर में बारादरी में बैठे वर-कनिया, पुरइन के धड़, बांसवन, केले के थंब, नाग-नागिन के जोड़े तथा शुक-शुकी के रूप में विध-विधाता, चावल के घर और लाल-हरे सुग्गे चटख रंगों से लिखे गए थे. नीचे फर्श पर भी अइपन में चटाई लिखी हुई थी. चारों कोनों पर केले और बांस की सच्ची टहनियां गड़ी हुई थीं. मोथी की सच्ची चटाई कोहबर में बिछी हुई थी. कोहबर से लेकर चौबारे तक अष्टदल और सीताराम के पदचिह्नों का अइपन था. और कर्णपुर वाली नाउन कटोरी में रंग घोलकर सभी कनियों बहुआसिनों का पैर रंग रही थी. महानगर में यह सब कहां? केतकी की अपनी ननद का ब्याह हुआ था तो नैना-जोगिन बड़े कागज के पन्ने पर लिख गया था, सैलो टैप से वाल पेपर के ऊपर चिपका दिया गया था, अभी भी उसे हंसी आती है कैसे मिसेज चावला और बचानी ने कहा था कि यह डिजाइन तो बेहद मॉडर्न है, दो-एक उन्हें भी लिवाएं. केतकी को सचमुच बड़ी हंसी आती है.. कैसे उनके ग्रामीण संस्कार का वह अविभाज्य अंग, वह अइपन और पुरहर अब कोहबर से उठकर ड्राइंगरूम तक चला गया है. नहीं, गलत सोचती है केतकी. वह तो विश्वप्रसिद्ध हो गया है. मिट्टी के हाथी पर रखी गौरी की पूजा करती हुई केतकी की ननद का झुंझलाया हुआ चेहरा याद आता है जब उसकी एक विदेशी मित्रा ने उससे कहा था कि कितना सुंदर टेराकोटा आर्ट है. यह सब देखकर केतकी मुस्कुराने के सिवा और कुछ नहीं कर पाती. गाड़ी स्टेशन पर आ गई है. चांदनी रात है, लेकिन घनी धुंध जमी है. स्टेशन की इमारत भव्य लगती है. पहले यूं ही सी थी. नई बनी है लगता है. इस इलाके के कई प्रभावशाली नेता-मंत्री बनते रहे हैं. तो यह भी न हो. गाड़ी लेकर एक चचेरा भाई आया है. कुछ वर्ष पहले यह फटी चादर और धोती के सहारे जाड़ा काटता था, किंतु अभी ऊनी कोट-पैंट पहने है. गाड़ी में सामान रखकर उसने पूछा कि क्या इतनी रात को गांव चलना ठीक होगा? केतकी चाहे तो सर्किट हाउस भी रिजर्व कराया गया है, वहीं रह जाए. लेकिन केतकी को उतावली थी, उसने बेसाख्ता कहा नहीं-नहीं, अभी गांव जाऊंगी. गाड़ी है, कितनी देर लगेगी. गांव पहुंचकर देखा एक कतार में एक ही डिजाइन के चार मकान हैं. चारों मकानों को चारों ओर से ऊंची दीवार ने घेर रखा है और बड़ा सा लोहे का दरवाजा है जहां ठीक शहरी तरीके का दरबाननुमा जीव बैठा है. रात और धुंध के कारण और अधिक कुछ न देख सकी. चचेरे भाई ने पहले मकान का कोने वाला कमरा स्वयं खोला और केतकी का सामान रख दिया. तुम लोग सो जाओ, सुबह सबसे मुलाकात होगी,कहकर चला गया. केतकी ठगी सी रह गई. गौने के बाद यह दूसरी बार गांव आई हूं. गांव में इतना परिवर्तन. बड़ा चचेरा भाई स्वयं कमरा खोलकर बहन और जीजा जी को सो जाने को कह रहा था, बेटी के आने पर प्रतीक्षारत बैठे कहां गए स्वजन-पुरजन, कहां है जुड़ाने को रखा हुआ बड़ी-भात और कहां गई वह परंपरा जिसमें पहले देवी की विनती किए बिना किसी घर में पैर नहीं रखा जा सकता था. पथराई-सी खड़ी केतकी पति के टोकने पर सामान्य हुई. कई दिनों-रातों का जागरण और मकड़ी की तरह स्वयं के सत्व द्वारा बुने जाते तारों का खंडित दंश केतकी को बेहद थका गया था. वह जो सोई सो काफी दिन उठ आने के बाद जग सकी. जल्दी-जल्दी कमरे के अटैच्ड बाथरूम में स्नान कर बाहर निकली.
"वाह, साले लोगों ने तो मकान बड़ा कंपफर्टेबल बना लिया है. इसमें तो रवि-हनी भी आकर रह सकता है." पति ने प्रशंसात्मक नजरों से चारों ओर देखते हुए कहा.
" हां, बिलकुल सही, बल्कि ज्यादा अच्छा है. इतने खूबसूरत टाइलों और ग्रिलों वाले मकान शहरों में भी कम हैं."
हंसते हुए पति भी बाथरूम की ओर बढ़ गए. भैया ने सारी सुविधाएं दे रखी हैं इस कमरे में, सोचती है केतकी. यह तो सर्किट हाउस या डाकबंगले से कम नहीं है. उसे अब संकोच हो रहा था कैसे अंदर की ओर जाए? किधर से जाए? उसे लिवाने कोई नहीं आ रहा है. तभी दरवाजे की घंटी बजी. उठकर देखा तो एक बारह-चौदह वर्ष की बच्ची थी. "आप ही कतिकी दीदी हैं?"

सुंदर चटख जांघों से ऊपर फ्रॉक और उलझे बाल, यह शायद काम करने वाली है कोई. उसे देखकर केतकी मुस्कुराई --" हाँ "
"तो चलिए, बड़ी काकी बुला रही हैं." लगा पक्षियों का कलरव सुन रही है केतकी.
चल!  झट से खड़ी होकर लगभग दौड़ती हुई उस बालिका के पीछे चल पड़ी. ग्रिल से घिरे हुए बरामदे को पार करती हुई केतकी ने देखा बड़े से हॉलनुमा कमरे में भाभियां बैठी थीं. केतकी ने बारी-बारी सबों के पैर छुए. चाय पीते हुए उसने गौर किया, जाड़े में भी घर की नवीन सदस्या मसृण लिबास पहने हुए है, ऊपर का शरीर शॉल से ढका हुआ है, यही गनीमत.
" तुम रात देर से आई, मैंने रामविलास को कह दिया था कि तुम लोगों को गेस्टरूम में ठहरा दे. कोई परेशानी तो नहीं हुई. नींद तो आई?" बड़ी भाभी ने औपचारिक आत्मीयता से पूछा. 
"आपके राज में कोई कमी नहीं, भाभी!" कहकर केतकी नवागंतुकाओं से परिचय पाने में व्यस्त हो गई. गाजे-बाजे और रोशनी सब कुछ था. कहीं कोई झंझट नहीं. कोई काम किया जा रहा था, ऐसा नहीं लग रहा था. ऐसा लगता था मानो सारा काम आप से आप हो रहा हो. सागर की लहरें जैसे आती और चली जाती हैं, वैसे ही सारे रस्म-रिवाज, संस्कार.
" यह केतकी है? " एक वृद्धा ने नजदीक आकर पूछा.

"हां, मैंने पैर छुए थे आपके." केतकी ने सफाई दी.
"कम दीखता है, बेटी!" एक बेदांती वृद्धा ने कहा.
"बेटी, तुम्हें जमाय बाबू मानते हैं न." उसकी आंखों में संदेह लहरा रहा था. वह चुटकियों में इसकी साड़ी पकड़े हुए थी.
" हां, क्यों?" केतकी भी अचंभित हो उठी.
" तूने कैसी साड़ी पहन रखी है? देख तो वे सब कैसी पहने हैं. फिर तू तो बड़े घर-वर से ब्याही थी. अब केतकी को लगा कि उसने सचमुच गलती की, भड़कदार आधुनिक साड़ियां नहीं लाई. भाभी लोगों के सामने तो आंखें चुरा ही रही थी, गांव की इन वृद्ध काकी के सामने भी लज्जित हो गई.  शुभ-शुभ कर यज्ञोपवीत का कार्यक्रम समाप्त हुआ. केतकी अपने गांव को देखने की लालसा को न्योत लाई.
" भाभी, जरा गांव देखती."
केतकी ने बड़ी भाभी से पूछे बिना कभी घर से पैर बाहर नहीं निकाला था.
वह मुस्कुराईं. " ठीक है, देख आओ, तुम बदली नहीं जरा भी."

केतकी ने उसी छोटी लड़की को साथ लिया और चल पड़ी. बड़ी सी चहारदीवारी के बाहर भी चौड़ी कंकरीट की सड़क. चंद कदमों पर पन-बिजली निकालने वाला विशाल यंत्र, विद्युत-ग्राम. अब उसे यज्ञोपवीत के दिन की वह शहरी पार्टी याद आई. सचमुच उस दिन उतनी सारी कास्मोपॉलिटन स्त्रियों को देखकर मन दुखी हुआ था. यह सब शो गांव में नहीं होना चाहिए था, इसने सोचा, लेकिन एक प्रश्न अवश्य मन में उठा था कि इतने सारे कास्मोपॉलिटन लोग कहां से आए?

 " दीदी, यहां बिजली बनाते हैं, देखती हैं न, सब जगह गांव में बिजली है." साथ की लड़की पुलकित थी.
" तुझे बिजली अच्छी लगती है?"

" हां बहुत. खूब इजोत होता है."

केतकी मेड़ों के सहारे खेत में उतर गई. मटर और तीसी का खेत. सफेद, नीले और गहरे गुलाबी खेत. आगे सरसों और तोरी का खेत, पीले-पीले फूलों वाले खेत. केतकी कुछ सोचती हुई नीचे उतरती रही. प्रकृति के पास सबसे अनूठे रंग हैं.

" केतिकी दीदी, इधर गांव नहीं है फुलवारी है." साथ की लड़की ने कहा.
" मैं फुलवारी ही जाऊंगी." और थोड़ी देर में केतकी पुरानी अमराई में पहुंच चुकी थी. फुलवारी कई चहारदीवारियों में बंटी थी, कई नए वृक्ष लगे थे. लड़की ने बताया कि चारों भाइयों की फुलवारी है. चलती हुई केतकी बीच में पहुंच गई. एक पुराना महुआ का पेड़ कटा पड़ा था, पास ही विशाल आम का पेड़ था.

 "दीदी, यह आप ही का पेड़ है." लड़की ने याद दिलाया.

"तुझे कैसे मालूम?" केतकी ने पूछा.

" सभी कहते हैं कि कतिकी दाई का पेड़."
ओ, अच्छा. इसी पेड़ के नीचे केतकी, संज्ञा, कालदी, बुच्ची और रमा खेला करती थीं. लड़कों का झुंड बगल वाले महुए के पास जमता था. लड़कों ने एक बार महुए का ताजा फल लाकर केतकी की नाक में रगड़ दिया था. केतकी बेहोश हो गई थी. बाद में इसी बात पर चिढ़ाया भी करता था समीर कि केतकी महुए की गंध से ही बेहोश हो गई थी. पेड़ कितना ऊंचा और छायादार है, केतकी सोच रही थी. आम का यह पेड़ सबसे पहले फलता है. लाल-लाल सिनुरिया आम पक-पककर आप ही चूने लगते हैं. अधिक पके आम धरती पर गिरते ही फट जाते हैं, छिलका और बीज अलग-अलग. केतकी और उसकी सहेलियां इधर-उधर देखकर साड़ी खोल लेतीं, मात्र पेटीकोट और ब्लाउज में साड़ी के दोनों छोर पकड़कर पेड़ के नीचे खड़ी हो जातीं. हवा चलती तो एकाध छोटे-छोटे आम उसमें गिरते. आहा, कितने सुगंधित आम होते थे! गोपी सुपक्व गछपक्व, रस कितना मधुर, जैसे मधु. केतकी का गाल सिनुरिया आम की तरह दहक उठा. समीर का ममेरा भाई हर छुट्टियों में आ जाता. उस दिन केतकी की साड़ी खोलने की पारी थी. वह अकेला ही समीर को खोजता हुआ पहुंच गया था. झपाके से शरमाकर केतकी बैठ गई थी. कई दिनों तक उसके सामने नहीं गई. एक लंबी सांस खींचती है केतकी. गौने जाने के पहले जब वह एक बार आया था तो कैसे सहज भाव से कह गया था कि वह केतकी से ब्याह करना चाहता था. केतकी ने अपनी गहरी आंखों से उसे देखा भर था, कुछ पूछा नहीं था. 
" तुम पूछोगी, यह अब क्यों कह रहा हूं? तो उसका उत्तर है कि मैं साधारण गरीब घर का लड़का, तुम्हारे यहां मेरी बुआ ब्याही है, तुम्हारा हाथ कौन मेरे हाथ में देगा. फिर भी मैंने अपनी मां से कहा था विवाह के समय, मुझे मार पड़ी थी और जबरदस्ती विवाह कर दिया गया था."
उस समय केतकी को मात्र आश्चर्य हुआ था, सचमुच यह किस प्रकार मुझसे विवाह करता? कोई संवेदना नहीं जगी थी. लेकिन इस वृक्ष के नीचे खड़ी होकर उसे उस दिन का दृश्य याद आ गया. भावानुभूति-सी हुई, सारे शरीर में एक पुलकन व्याप गई. अपने मन के सब मालिक होते हैं. उस पर दूसरे का क्या वश! जोर की आवाज से ध्यान भंग हुआ. चहारदीवारी से निकलकर देखने लगी केतकी, कौन दहाड़ा इतनी जोर से. देखा सरसों, तीसी, मटर के खेतों के पार वाले खेत में ट्रैक्टर चल रहा है. दूर-दूर तक कहीं बैल-हल नहीं दीखते. बड़का काका का खेत है, मकई के लिए तैयार हो रहा है.

 "मेरा बाबू डिरेवर है." लड़की ने गर्व से बताया. अचानक दहाड़ जैसे स्वर से वातावरण की तरह केतकी का ध्यान भी भंग हुआ. कलेजा धक-धक कर रहा था. कलेजा संभालते हुए पूछा उस लड़की से -- "तुम किसकी बेटी हो?"

" फ्रामप्रीत की."
" बैजू तुम्हारा दादा था?
" हां. "  केतकी को स्मरण हो आया, बैजू उन लोगों का अगला हलवाहा था. सिरपंचमी के दिन पसेरी धान के बिना हल ही नहीं उठाता था, जब तक हल का फाल धान में पूरी तरह नहीं डूबे. उसके लिए अइपन का थड़ बड़ा बनाना पड़ता था. पीठ पर पिठार सिंदूर का थप्पा लिए दिन भर घूमता रहता. कहता केतकी दाई का असिरवादी है. मन में आया पूछे कि क्या ट्रैक्टर भी सिरपंचमी में अइपन चढ़ता है? फिर स्वयं ही अपने आप पर हंसी आई. वह मन ही मन नचारी गुनगुनाने लगती है अमिय चूबिय भूमि खसत, बाघंबर जागत है आहे होयत बाघंबर बाघ, बसहा धरि खायत है. शिव को पार्वती नृत्य करने को कहती हैं, शिव अपना डर पार्वती से बताते हैं कि उनके नाच से अमृत-बूंदें बाघंबर पर गिरेंगी, बाघंबर बाघ बन जाएगा और बसहा बैल को खा जाएगा. विज्ञान के शिव का तांडव. अमृत-बूंद से जगा यंत्रा-व्याघ्र गरज रहा है खेतों में. लील गया बैल.

लौट पड़ती है केतकी.

" कल चलते हैं न हम लोग? " रात को पति से कहा.
" क्यों, तुम तो कुछ और रुकने वाली थीं?"
पति ने प्रतिप्रश्न किया.

" नहीं, चलूंगी."
" ठीक है. मुझे क्या एतराज हो सकता है."
दूसरे दिन केतकी के जाने की सारी तैयारी हो गई. भाई-भाभियों का चरण-स्पर्श कर सूखी आंखों से केतकी गाड़ी में बैठ गई. रामविलास आगे था, केतकी और उसके पति पीछे. गाड़ी थोड़ी देर में ही हवेली छोड़कर आगे बढ़ गई. गांव के पास आ पहुंची केतकी. कंक्रीट की ऊंची सड़क के किनारे मिट्टी के टीले पर बसा जाना-पहचाना गांव. ऊखल-मूसल चलाती औरतें. आनंगे बच्चे, नाक बहाते बच्चे, गाय-बैलें.

" रामविलास भैया, गाड़ी रोकिए न!"  केतकी उतावली होकर कह उठी. गाड़ी रोककर रामविलास पीछे देखने लगा.
"गोड़ लागू पैंया पड़ू भैया रे कहरिया पल एक दियउ बिलमाय. मैं जरा गांव में जाऊंगी." वह झट से उतरकर सड़क से जुड़ी पगडंडी से उतर गई. पीछे-पीछे रामविलास मुस्कुराता हुआ चला. पहला ही घर तो सबुजनी दीदी का है. सामने खजूर की चटाई पर बैठी थी सबुजनी. के है? मोतियाबिंद उतरी आंखों पर तलहथी देकर देखने लगी.
" दीदी, मुझको नहीं पहचाना?"

" दीदी, केतकी है," पीछे से आगे आकर रामविलास ने कहा.
जरा भी नहीं बदली. केतकी के मन में तूफान उठ खड़ा हुआ. इन्हीं से मिलने तो वह आई थी, इन्हीं के लिए मन व्याकुल था.
" बाबू कतिकी समीर बौआ के बेटा के जनउ में आई है?"
केतकी बोल नहीं पा रही थी. रामविलास ने ही कहा-- " हां अभी लौटकर जा रही है."
सबुजनी के गोरे झुर्रीदार चेहरे पर हर्ष की लहर दौड़ गई.
" अच्छा हुआ, गाम-समाज को देखने आ गई. तू बिना मां की बेटी! हम सबकी बेटी. अरे, कहां गई सुलेमान की कनिया, जरा सोना-सिंदूर ले आ, केतकी की मांग भर. एक चुटकी धान-दूब ले आ, खोइंछा भर दे."
भीड़ जैसा समा हो गया था. एक बहू दौड़कर अंदर से सारा सामान ले आई. भाभी तो खोइंछा देना भी भूल गई थीं. रेशमी आंचल की खूंट आप से आप खुल गई. दूब-धान के लिए मन उदास था.
" मेहमान कहां हैं बेटी?" सबुजनी ने पूछा.

" गाड़ी में हैं. " अब रामविलास चिढ़ने लगा था. ट्रेन छूट जाएगी.

 "अच्छा-अच्छा. जैनबी, जा, तूने जो नया-सींकी का पौती बुना है, ले आ. और सुन, गिलास मांजकर पानी और गुड़-भेली भी ले आ. कमर से निकालकर दो रुपए का लाल मुड़ा-तुड़ा नोट पौती में बंद कर केतकी के हाथों में थमा दिया.

 "यह मेहमान का सलामी है, दे देना. गुड़ खा ले बेटा, पानी पी ले. जरा ठीक से. हां, जा, गाड़ी को देर हो रही है. देख लिया तुझे, सुख-चैन से मरूंगी."  आगे बढ़कर सबुजनी गले मिलने को हुई कि उद्भ्रांत-सी केतकी ने सिर टेक दिया और इतने दिनों का जमा आंसुओं का बांध टूट पड़ा. सबुजनी हौले-हौले पीठ सहलाती जा रही थी.
" रो ले, बेटी, रो ले, मन में कुछ न रखना, कहा-सुना छिमा करना, गांव- जवार को असीसती जाना. लाल रंग डोलिया सबुज रंग ओहरिया, आब बेटी जाइ छुइ बिदेस."

केतकी बड़ी मुश्किल से अलग हुई. खूंट में बंधे चुटकी भर दूब-धान को मुट्ठियों में भींचे पगडंडी पार करने लगी.

© उषाकिरण खान

रविवार, 26 अप्रैल 2020

गाँधी सिंड्रोम : प्रदीप जिलवाने

कुछ होगा 
कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा
न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का,
मेरे अन्दर एक कायर टूटेगा।
- रघुवीर सहाय

उन तीन तेजतर्रार नवयुवकों ने जब बिसेसर बाबू को जान से मारने की धमकी देते हुए अपना तमंचा उन पर तान दिया था, तब भी वे जरा नहीं घबराए। बल्कि वे तो उन तीनों की आँखों में झाँकते हुए बोले, -‘मुझ बुढ़े को इस उम्र में मारकर क्या हासिल होगा तुम्हें?’ वे तीनों के तीनों क्षण भर के लिए भौंचक रह गए। फिर बिसेसर बाबू जो गाँधी प्रतिमा के ठीक नीचे अपनी पत्नी के साथ अन्न-जल त्याग कर अनशन पर डटे हुए थे, गाँधीजी की प्रतिमा की तरफ देखते हुए बोले, -‘वे भी तुम्हारे जैसे ही कुछ नौजवान थे, जो एक अस्सी साल के बुढ़े को गोलियों से मारना चाहते थे।’ फिर बिसेसर बाबू के मुँह से अचानक यह ब्रह्मवाक्य निकला, -‘वे हत्यारे भी नहीं जानते थे कि बुढ़े को गोलियों से नहीं मारा जा सकता था! बल्कि गोलियाँ मारकर तो उन्होंने उसे सदा के लिए अमर कर दिया!’
यदि यह घटना इस लेखक के सामने न घटी होती तो यकीन जानिए यह लेखक बिसेसर बाबू जैसे भोले जीव पर कथा लिखने का जोखिम कतई न करता। बहरहाल भोला होना, मूर्ख होना नहीं होता है। हमारे बिसेसर बाबू भोले हैं। इतने भोले कि कईं बार तो उनका भोलापन मूर्खता की सीमारेखा में दाखिल हो जाता है। लेकिन वे जो ऐसे भोले और भले जीवों को मूर्ख समझने की भूल कर बैठते हैं या कहें कि भोलेपन और मूर्खता में फर्क नहीं कर पाते हैं, वास्तव में वे ही मूर्ख हैं। ठीक इसी तरह हमारे बिसेसर बाबू भोले जरूर हैं, लेकिन कमजोर नहीं हैं। बिसेसर बाबू कभी किसी से झगड़ा वगड़ा नहीं करते। उनके पूरे जीवनकाल में, जहाँ तक विश्‍वस्‍त सूत्रों से जानकारी प्राप्त है, उन्होंने कभी किसी से किसी बात को लेकर शारीरिक रूप से कभी लड़ाई या झगड़ा नहीं किया है। तो जिस तरह भोला होना, मूर्ख होना नहीं है, उसी तरह भोला होना, कमजोर होना भी नहीं है। कमजोर वे हैं, जो ऐसी कमजोर धारणाएँ पाल कर बैठे हैं।
बिसेसर बाबू के बेटे राकेश ने अपने पिता को खेतों में हाड़-तोड़ श्रम करते देखा था। वे अनाज की भारी-भरकम बोरियों को सालों तक अपनी पीठ पर लादकर बैलगाड़ियों और ट्रेक्टरों पर लादते रहें थे, उतारते रहे थे। खेतों में उनकी मेहनत बैल से कम नहीं होती थी! राकेश को अब भी याद है कि अँधड़-तूफान की वज़ह से एक बार उसके खेत के रास्ते जिसे वे गुवाड़ कहते थे, पर एक बड़ा और मोटा-सा सिंदोसड़े का सूखा झाड़ आड़ा पड़ गया था। खेत पड़ोसी रामेसर काका और उसका वरसूद्या (बंधुआ मजदूर) दोनों मिलकर भी उसे हटाना तो दूर, हिला भी नहीं पा रहे थे। तब उसके पिताजी ने उस पेड़ को हटाने के लिए जो जुगत लगाई थी और अपना शारीरिक बल दिखाया था, वह राकेश की स्मृति में जस का तस टँका रह गया है। पेड़ हट जाने के बाद रामेसर काका ने कहा था, ‘तेरे में तो हाथी जैसा बल है रे बिसेसर! दस हाथ का काम था, इस झाड़ को हटाना!’
अपने पिता की प्रशंसा में कहे रामेसर काका के ये शब्द राकेश की स्मृति में इसलिए भी टँके रह गए हैं, क्योंकि उसके पिता के बारे में ऐसी प्रशंसा का अकाल उसके पूरे जीवनकाल में रहा है। कितना तो सादा और सरल रहा है उसके पिता का जीवन! लेकिन आज वह अपने पूरे ज्ञान और अनुभव के हासिल पर इतना तो जरूर कह ही सकता है कि जीवन में सादा व सरल बना रहना ही सबसे कठिन है।
यानी राकेश के पिता बिसेसर बाबू, न कमजोर थे, न मूर्ख थे, वे भोले थे। वे बलवान थे और बुद्धिमान थे। और बिसेसर बाबू के जीवन में ऐसे कईं अवसर आये और आये भी होंगे, जब वे अपने इस अतुलनीय बल का उपयोग कर सकते थे या उन्हें करना चाहिए था, मगर उन्होंने कभी नहीं किया था। यह भी राकेश के बचपन का ही एक किस्सा है, जब गाँव के ही रतन ठाकुर के बेटों ने उसे स्कूल में बेबात के ही पीट दिया था। स्कूल भी उसके घर से ज्यादा दूर नहीं था। मालूम होते ही बिसेसर बाबू दौड़े चले आये थे। उन्हें आता देखकर ठाकुर के लड़कों ने तत्काल मारपीट बंद कर दी थी। राकेश को यकीन था कि उसके पिता ने भी दूर से ही सही लेकिन उसे एकाध लात या घूँसा खाते तो देखा ही होगा! लेकिन बिसेसर बाबू ने रतन ठाकुर के दोनों लड़कों को एक शब्द भी नहीं कहा था, उल्टे घर जाकर राकेश को ही सीख दी थी कि, ‘लड़ना-झगड़ना ठीक नहीं है। स्कूल पढ़ाई के लिए होता है। तुम्हें सिर्फ पढ़ने पर ध्यान देना चाहिए।’
ऐसे और भी कईं किस्सें हैं, घटनाएँ हैं, जब बिसेसर बाबू को अपना शक्ति-प्रदर्शन करने का अवसर था या वे कर सकते थे, लेकिन उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया था। जब उनके शरीर में इतनी शक्ति और इतना बल था तो वे क्यों किसी की दुत्कार या फटकार तक सुन लेते थे। किसी के भी कहे सुने पर क्योंकर उन्हें क्रोध नहीं आता था ? ये ऐसे प्रश्‍न थे, जो बरसों राकेश के मन को मथते रहे हैं, जिनपर कईं कईं बार राकेश खुद से ही उलझा है। बहरहाल ये सब तो कुछ समय पहले तक की बातें हैं, अब की बात कुछ और है। और जैसे कि हर बेटे के लिए उसका पिता हीरो होता है। राकेश के पिता भी उसके हीरो हैं। ये और कि वे शाहरूख टाइप के हीरो न सही, लेकिन फारूख जैसे तो हैं ही! और फारूख शेख भी राकेश की पसंद का हीरो है!
मेरे लिए सबसे दिलचस्प यह जानना रहा है कि बिसेसर बाबू ने प्रेमविवाह किया था। उस दौर में प्रेमविवाह कितने साहस का विषय है, कल्पना की जा सकती है। यह बात राकेश को थोड़ी समझदारी की उम्र आते-आते तक मालूम पड़ चुकी थी और शेष अवान्तर कथाएँ भी धीरे-धीरे बाद की उम्र में उसे मालूम होती चली गई। बिसेसर बाबू की प्रेम कहानी में ‘विलेन’ की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनके धैर्य, प्रेम और इरादों के आगे सारे ‘विलेन’ आखिर में चित हुए थे।
बिसेसर बाबू के बेटे राकेश ने जैसा मुझे बताया, उसके मुताबित दरअस्ल हुआ ये था कि जब बिसेसर बाबू युवा और कुँवारे थे, तब वे अपने ताऊ के साथ खरगोन के सुप्रसिद्ध नवग्रह मेले में गए थे। खरगोन शहर में लगने वाले इस सालाना मेले में घर परिवार के साथ घूमने-फिरने और खाने पीने के लिए बहुत कुछ होता था और आज भी होता है। सजे सँवरें और रंगीन लाइटों से दमदमाते दर्जनों तरह के झूलें, मनोरंजन के लिए सर्कस, नौटंकी, तम्बु सिनेमा यानी टूरिंग सिनेमा, खाने पीने के लिए ढेरों होटल, चाट मसालों के ठेले, तड़क-भड़क से भरपूर बच्चों के खेल-खिलौनों की सैकड़ों दुकानें, घर परिवार के सामानों व उपकरणों की दुकानें, महिलाओं की जरूरत के सामानों की दुकानें। सब कुछ। और दूर तक फैले इस मेले के अंत में मेले के समानान्तर पूरे माह चलने वाला एक बड़ा सा पशु मेला भी होता है। वे भी इस पशु मेला से अपने कुछ पशु बेचने और कुछ खरीदने आए थे। और यह कोई एक या दो दिन का काम नहीं था। अच्छे दाम के इंतजार में हफ्ताभर भी लग सकता था या उससे ज्यादा दिन भी।
यूँ यह नवग्रह मेला मकर संक्रांति के पर्व पर लगता है और लगभग एक माह तक इसकी छटा बरकरार रहती है। इसे अब यूँ भी कह सकते हैं कि मकर संक्रांति यानी चौदह जनवरी से वेलेन्टाइन डे चौदह फरवरी तक यह मेला चलता है। खैर तब वेलेन्टाइन-डे वाली नौटंकी भारतीय बाज़ारों में और मेले-ठेलों में दाखिल नहीं हुई थी।
मेले के दौरान फूरसत के क्षणों में युवा बिसेसर बाबू मेले में घूमने निकल पड़ते और इस उस दुकान पर घूम फिर आते थे। इसी मेले में उनके पड़ोस के गाँव वाले छोगा काका, जो कि बाद में उनके ससुर और राकेश के नाना बनें, ने भी चाय नास्ते की होटल खोल रखी थी। अब चूँकि मेला पूरा एक महीना चलता है तो ज्यादातर दुकानदार जो बाहर के होते हैं, वे अपने परिजनों को भी संग-साथ रख लेते हैं। इससे दुकान-धंधे में एक किस्म की सहायता भी रहती है। तो ऐसे ही किसी अवकाश के समय युवा बिसेसर घूमते-घामते अपने पड़ोस के गाँव वाले छोगा काका की होटल पर जा पहुँचे। उनकी होटल पर उस दिन उनकी पत्नी के अलावा बेटे-बेटियाँ भी मौजूद थीं। बेटियाँ, दुकान-धंधे में हाथ बटाने नहीं, मेला घुमने के मकसद से आई हुई थीं।
सुनते हैं कि युवा बिसेसर बाबू ने छोगा काका की बड़ी बेटी सुमित्रा को पहले पहल यहीं देखा था। परिवारजनों की मौजूदगी के बावजूद दोनों की आँखें किस तरह चार हुई होंगी, ये तो सही सही मालूम नहीं, लेकिन दूसरे ही दिन उन दोनों को मेले में साथ घूमते हुए सुमित्रा के भाइयों ने देख लिया था और भरे मेले में युवा बिसेसर की जमकर धुनाई कर दी थी। इस पर भी बाद में देख लेने की धमकी अलग से दे रखी थी।
लेकिन बिसेसर बाबू तो बिसेसर बाबू हैं। वे आसानी से हार मान जायें तो इस कहानी के हीरो कैसे? मेला खत्म होने के बाद भी किसी न किसी बहाने से महज डेढ़ कोस की दूरी पर बसे सुमित्रा के गाँव उससे मिलने या उसे बस देखने भर चले जाते थे। लेकिन मिलना कभी कभी ही हो पाता था। और जब उनके इस प्रेम प्रसंग की खबरें हवा में और ज्यादा फैलने लगी तो दोनों को मेले में सुमित्रा के भाइयों द्वारा दी गई ‘बाद में अलग से देख लेने वाली धमकी’ भी याद आई थी। मगर बिसेसर बाबू मैदान में डटे रहे। उनकी प्रेयसी सुमित्रा अक्सर उनसे अपनी चिंता जाहिर करती और हमेशा चिंता में रहती थी। तब युवा बिसेसर बाबू ने एक अचूक रामबाण नुस्खा अपनाया था, जिससे वे न केवल अपनी सात जन्मों की साथिन को सदैव सदैव के लिए पाने में कामयाब हुए, बल्कि हिंसा के मंडराते घने बादलों से भी मुक्ति मिल गई थी।
नुस्खे की युक्ति के अनुसार इधर पहले तो बिसेसर बाबू ने अपने ताऊ को पटा-पुटाकर अपने संग मिला लिया और फिर अपने पिता के आगे जिद लेकर बैठ गये कि वे उनके विवाह के लिए लड़की वालों के घर जाएँ, फिर भले ही वहाँ कुछ भी हो। उनकी जिद उनकी तरह ही मजबूत थी। जैसे उन्होंने कोई प्रतीज्ञा कर ली हो कि वे विवाह करेंगे तो सिर्फ सुमित्रा से, नहीं तो जीवन भर कुँवारे रहेंगे।
कहते हैं, तब युवा बिसेसर बाबू तकरीबन बारह तेरह दिन तक भूखे प्यासे घर में ही पड़े रहे। अपने पिता की हजार तरह की बातें, सौ तरह की दलीलें, पचासों तरह की जलालतें, यहाँ तक कि अनगिनत गालियाँ भी खाईं, मगर वे अपने पिता को आखिरकार किसी तरह राजी कर गये कि वे पड़ोस के गाँव में सुमित्रा का हाथ माँगने उसके घर जायेंगे, फिर कुछ भी हो जाये। बिसेसर बाबू के पिता की सबसे बड़ी दुविधा यह थी कि एक आड़ी (पराई) जाति के व्यक्ति के घर रिशते की बात करने आखिर किस तरह जाया जाए? यहाँ ताऊ काम आए। बिसेसर बाबू ने अपने ताऊ को यूँ ही तो अपने पक्ष में करके नहीं रखा था! ताऊ ने अपने भाई को पता नहीं कौन सी घुट्टी पिलाई कि फिर वे सब अंदेशे छोड़कर लड़की वालों के घर जाने को राजी हो गये थे।
उधर सुमित्रा भी अपने घर में अन्न-जल का त्याग कर अपने पिता और भाइयों के सामने मैदान में डटी रही थी। कितनी प्रताड़ना! कितना गुस्सा! कितनी मारपीट! तब सुमित्रा ने सही होगी, ये तो सिर्फ सुमित्रा ही जानती होगी! बहुत सम्भव है कि उन दोनों ने मिलकर यह सबकुछ पहले से तय किया होगा!
खैर बिसेसर बाबू के अनशन के तेरहवें दिन उनके पिता अपने बड़े भाई को लेकर लड़की वालों के यहाँ मिलने जुलने के बहाने से पहुँच गये। स्वाभाविक था कि लड़की वाले इस प्रस्ताव के लिए कहीं से कहीं तक तैयार नहीं थे और ना ही तैयार हुए। अलग अलग जात-बिरादरी का मामला था। इसमें लोकनिंदा और जगहँसाई होना तय था। लड़की वालों के घर से निराश होकर वे वापस आ गये।
बिसेसर बाबू को यह अंदेशा पहले से था कि ऐसा ही होगा। लेकिन तब तक उनका काम हो चुका था। यानी एक तरह से बिसेसर बाबू ने यह जुगत बैठाई थी कि किसी तरह से उनके परिवार वाले एक बार उनका रिश्‍ता लेकर सुमित्रा के गाँव में सुमित्रा के घर चले जायें। और दूसरी तरफ उसने अपने कुछ मित्रों की मदद से लड़की वालों के गाँव में यह खबर खूब प्रचारित करवा दी कि सुमित्रा से उनके रिश्‍ते की बात चल रही है और बात पक्की करने के लिए लड़के वाले, लड़की वालों के घर भी आ रहे हैं।
सुमित्रा के परिवार वालों ने उस समय भले ही विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया था, लेकिन पूरे गाँव में इस प्रेम प्रकरण और सम्भावित विवाह को लेकर दस मुँह की दस बातें बन गई थी, जिससे थककर हारकर आखिरकार लड़कीवालों को भी अपने हाथ टेकने पड़े थे।

बहरहाल बिससेर बाबू से जुड़े ये सारे किस्से काफी पुराने हैं, परन्तु बिसेसर बाबू की इस कथा के ये अनिवार्य हिस्से हैं, जिनके बगैर बात नहीं बनती है।
बिसेसर बाबू के बेटे राकेश ने मुझे बताया कि उनके पिता अभी दो महीने पहले ही पचहत्तर के हुए हैं। उनकी देह भले ही थक गई है, मगर इस उम्र में भी न उनसे अखबार छूटा है, न रोज की तरह सुबह-शाम घुमना फिरना और ना ही रामचरित मानस का पाठ!
बिसेसर बाबू के घर में शाम को नियमित रामचरित मानस का पाठ होता है। वे जब रामचरित मानस का पाठ करते हुए उसके भावार्थ को समझाते हैं, तो पूरा घर उनके ज्ञान, मानस के अध्ययन और जीवन-जगत से जुड़े विषयों पर उनकी पकड़ का कायल नज़र आता है। राकेश की पत्नी ममता और किशोरवय की ओर बढ़ती बेटी लोरी और बेटा दैविक भी बैठ के सुनते हैं। और कभी कभी राकेश भी, जब कभी वह घर में मौजूद होता है। बिसेसर बाबू मानस पढ़ते हुए चौपाइयों, दोहों की सटीक व्याख्या उनके संदर्भ और प्रसंग सहित बताते हैं और कईं दफे तो इस क्रम में वे कथा से जुड़ी अवान्तर कथाओं और मिथकों के बारे में भी रोचक बातें बताते हैं। इस तरह बिसेसर बाबू ने एक तरह से अपनी अगली पीढ़ी को परम्परा से हासिल अपने आध्यात्मिक संस्कार और मान्यताएँ भी दी हैं।
चूँकि अब वे बरसों से अखबार रोज ही पढ़ते हैं तो इस बहाने उनके ज्ञान-विज्ञान और सोच-विचार में काफी विस्तार और खुलापन आ गया है। वे चीजों और स्थितियों पर बेहद तार्किक होकर और आधुनिक रंग-ढंग से सोचने विचारने लगे हैं। हाँ, अगर किसी चीज का अफसोस है तो सिर्फ अपने गाँव के छूटने का है। गाँव अब भी उनके सपनों में आता है। वे अपने सपनों में गाँव को वहीं से देखते, जहाँ से उसे हमेशा के लिए छोड़ा था, यानी बीस साल पहले वाला गाँव! जबकि इस बीच गाँव की दशा और दिशा लगभग पूरी की पूरी बदल गई है, और उन्होंने भी इसे हमेशा नोटिस किया है, जब जब किसी अवसर पर उन्हें गाँव लौटने का मौका मिला है। गाँव में उनका पैतृक घर और खेत अब भी कायम हैं। घर खाली और सुनसान पड़ा है, जबकि खेत को उन्होंने अपने किसी रिश्‍तेदार को सालाना मुनाफे (बटाई) पर दे रखा है। वे ही खेती का सब लेना-देना देखते हैं। बिसेसर बाबू के परिवार को सालाना एकमुश्‍त तय राशि दे दी जाती है।
बिसेसर बाबू जब भी गाँव जाते, उनका मन खुश भी हो जाता और दुःखी भी। खुशी गाँव में कुछ समय के लिए लौटने की और गाँव के लोगों को अपनी आँखों से देखने की, अपने लोगों से मिलने और बातें करने की होती। और दुःख होता तो गाँव के छूटने का, गाँव की सरल जीवन शैली में घुस आए नए बदलावों का। वे गाँव के विकास से तो खुश होते थे, मगर गाँव का जो गाँवपन और लोकजीवन है, उसका जो शहरीकरण हुआ है, उससे कतई सहमत नहीं है।
बिसेसर बाबू दुखी हो जाते, जब सुबह से देर शाम तक कभी न खाली रहने वाले चबुतरे पर सन्नाटा पसरा हुआ देखते। काम की तलाश में या नौकरी-पानी के चक्कर में गाँव से चले गए अपने पहचानवालों या रिश्‍तेदारों के लिए भी उन्हें दुःख होता है, लेकिन वे जानते हैं कि जिस तरह उन्हें भी अपने इकलौते बेटे की नौकरी और इच्छाओं के आगे झूकना पड़ा है, जरूर ऐसी ही बड़ी मजबूरी हर किसी की रही होगी! वर्ना कौन अपने घर-द्वार को छोड़ता है! वे तो हनुमान मंदिर के आगे वाले उस इमली के पेड़ के लिए भी दुःखी हुए हैं, जिसे सड़क की चौड़ाई बढ़ाने के लिए उखाड़ दिया गया था। वे गाँव की काँकड़ पर सिंदूर पुते काँकड़ देवता के लिए भी दुःखी हुए हैं, जो गाँव की बढ़ती काँकड़ की वजह से कहीं गायब हो गए थे!
दरअस्ल अब इसे इस गाँव की अच्छी किस्मत कहिए या बुरी! मगर यह गाँव शहर जाने वाले मुख्य मार्ग से लगा हुआ है और शहर से ज्यादा दूर भी नहीं है। शहर जाने वाला यह मार्ग जबसे फोर लेन हाई-वे घोषित हुआ है, तब से तो पता नहीं गाँव की हवा ही पलट गई है। गाँव से लगे खेत महँगे दामों पर फटाफट बिक रहे हैं या बिकने को तैयार हैं। कभी कभी तो रात से सुबह तक में जमीन का भाव सवाया हो जाता है! जिस गाँव को बड़े बड़े प्राचीन पीपल के पेड़ों के लिए जानते-पहचानते थे, अब दूर से ही उसे चारों तरफ से घेरे मोबाइल टॉवर्स से पहचाना जाता है! बिसेसर बाबू अब जब-जब गाँव जाते हैं, उनके भीतर कुछ टूटता है! कुछ दरकता है! चूँकि पूरे गाँव की जमीनों के भाव लालच की सीमाओं को पार करते हुए बढ़ रहे हैं! तो स्वाभाविक है कि बिसेसर बाबू की जमीन का भाव भी बढ़ रहा है! इसलिए कईं दलाल, एजेन्ट्स, ब्रोकर्स टाइप लोग बिसेसर बाबू के घर और उनके बेटे राकेश के दफ्तर तक के चक्कर लगा चुके हैं। उन्हें अपनी जमीन बेचने के लिए तरह-तरह के लुभावने ऑफर तक दे चुके हैं! लेकिन बिसेसर बाबू अपनी जमीन किसी भी कीमत पर बेचने को तैयार न थे, न हैं। जबकि बिसेसर बाबू के खेत से लगी ज्यादातर जमीनें पूँजीपतियों का निवाला बन चुकी है। एक तरह से आप कह सकते हैं कि बिसेसर बाबू की जमीन अब शहर की बेखौफ पूँजी की आँखों में खटक रही है और वह इस जमीन के टुकड़े को निगल जाने के लिए आतुर है!
शैवाल की तरह बढ़ते पूँजी के शहरी अतिक्रमण की चपेट में बिसेसर बाबू के गाँव का आना, अब कुछ ही समय में तय माना जा रहा है। बिसेसर बाबू दुःखी होते कि उनके गाँव के खेतों में भी अब मल्टियाँ उगेंगी! गाँव भी अब शहर की तरह अपने पड़ोस से अनजान होगा या अनजान होने का दिखावा करेगा! दुनिया एक बंद मुट्ठी में होगी, एक ऐसी बंद मुट्ठी में जिसमें पाँचों उंगलियों का एक दूसरे से सीधे सीधे कोई परिचय या ताल्लुक नहीं होगा! और एक हाथ से दूसरे हाथ तक की दूरी, दो ग्रहों जितनी होगी, जिन्हें कोई ऑप्टीकल फायबर एक दूसरे को जोड़े रखेगी। बिससेर बाबू अक्सर अपने शहरी दोस्तों को बताते हैं कि पहले गाँव में जब कोई बाहरी व्यक्ति आता था, तो पता पूछने पर लोग उसे सम्बन्धित व्यक्ति के घर तक छोड़ आते थे! या गाँव में किसी के घर कोई मेहमान आता था, तो पूरे गाँव को यह पता होता था। गाँव के किसी एक के घर का जमाई, पूरे गाँव का जमाई हो जाता था! और किसी एक का मामा, पूरे गाँव का मामा! शहरों में ऐसी आत्मीयता, दूर्लभ है। बीस सालों के इस शहरी प्रवास में बिसेसर बाबू ने शहरों में ऐसी आत्मीयता को खूब खंगाला, लेकिन वे ज्यादातर निराश हुए। अपने बेटे राकेश की शहरी मित्र मण्डली को भी वे देखते तो निराश ही होते कि ज्यादातर रिश्‍ते तो महज व्यावसायिक और दिखावटी ही हैं!
बिसेसर बाबू जब देखते कि उनकी किशोरवय पोती जो बमुश्किल सत्रह की है, उसकी सहेलियाँ जिस भाषा और संस्कार में जीती और खुद को प्रस्तुत करती हैं, वह उनके मन में आने वाले समय के प्रति अंदेशें भरता है। हालाँकि वे यह देखकर और जानकर खुद के मन को समझा लेते हैं कि कम से कम उन्होंने तो अपने बेटे, बहू और पोते-पोती के जीवन में आदर्श और संस्कार दिये हैं और सबसे अच्छा है कि उन्होंने उन्हें कुछ अच्छी स्मृतियाँ दी हैं, जो उन्हें समय के साथ मनुष्य बने रहने के लिए जरूरत पड़ने पर जरूरी आत्मबल और नैतिक साहस देगी! किसी व्यक्ति से उसकी स्मृतियाँ छिन लेना, उसका परिचय छिन लेना है! स्मृतिहीन मनुष्य, और एक चट्टान में कोई खास फर्क नहीं होता है! बिसेसर बाबू अक्सर ऐसा सोचते हैं!
बिसेसर बाबू को जब जब अपने गाँव में लगने वाले मेले की याद आती या बात निकलती तो वे मेले में लगने वाले तम्बु सिनेमा यानी टूरिंग टॉकिज के दौर को भी याद करते हैं, जो अब मेलों से डायनासोर की तरह विलुप्त हो गया है! एक बार वे अपनी पोती को टूरिंग सिनेमा के बारे में बता रहे थे कि कैसे उनका पूरा का पूरा कुनबा मेले में बैलगाड़ियों पर बैठकर मेले में घूमने-फिरने और खरीददारी करने जाता था। और फिर मेले में तम्बु सिनेमा में साथ बैठकर सिनेमा देखा जाता था, वो भी नीचे जमीन पर दरियाँ या कोई बिछौना बिछाकर और तो और ये बिछौना भी सिनेमा देखने वाले दर्शक अपने अपने घर से लेकर आते थे। फिर वे उसे बताते कि कैसे सिनेमा शुरू होने से पहले आरती गाई जाती थी। मेले में कैसे कैसे नौटंकी-खेला, सर्कस वगैरह उन दिनों होते थे! इस तरह पुराने किस्सों के जरिए पुरानी स्मृतियों में खोकर बिसेसर बाबू अपने समय को जीकर फिर लौट आते हैं! ऐसा भी नहीं है कि बिसेसर बाबू इस आधुनिकता के घोर शत्रु हैं। इस बीस साला शहरी जीवन ने उन्हें तकनीक की जरूरत और समाज के लिए उसकी अनिवार्यता के अनेकों पाठ देखने, सुनने और समझने को मिले हैं। इसीलिए उन्हें अपनी जवान होती पोती लोरी के हाथ में मोबाइल, घर में टीवी की उपस्थिति और अपनी बहू एवं पोते-पोती के कभी कभी थोड़े आधुनिक पहनावों पर कभी कोई आपत्ति नहीं रही है। और ना ही उनकी पत्नी सुमित्रा को रही है। हालाँकि उनकी बहू ममता खुद ही बहुत समझदार है और अपने पहरावे और संस्कार के प्रति सजग और चौकन्नी है।
समय के साथ सुमित्रा भी बिसेसर बाबू के रंग-ढंग में पूरी तरह रंग चुकी है। वैसे भी उन्होंने तो विवाह के पूर्व ही बिसेसर बाबू के सिद्धान्तों और विचारों को जीना सीख लिया था! इसीलिए तो उन्होंने बिसेसर बाबू की उस अहिंसक भूख हड़ताल वाली योजना में अपना पूरा पूरा सहयोग दिया था, जिसकी बदौलत उनकी शादी सम्भव हो पाई थी!
खैर बिसेसर बाबू किसी भी तरह से अपनी जमीन बेचने को तैयार नहीं है, जबकि शहर का आक्रमण उनके गाँव की ओर तेजी से बढ़ रहा है। खेती की जमीन को शहरी हाथों में बेचने या सौंपने का तुक उनकी समझ से परे है! उन्हें तो समझ नहीं आ रहा है कि अधिकांश गाँव वालों को लालच ने क्या इतना अँधा कर दिया है कि वे अपने गाँव की अच्छी भली उपजाऊ और सिंचित जमीनों को कंक्रीट में तब्दील करने पर तुले हुए हैं! कृषि भूमि को गैर कृषि मकसद में गँवा रहे हैं!
कभी कभी बिसेसर बाबू गाँव के करीब से निकले हाई-वे को भी कोसने लगते हैं! वे अनुमान लगाने लगते कि उनके देखते देखते शहर की सीमा कितनी बढ़ गई है! फिर वे थोड़ा और आगे का अनुमान लगाकर देखते कि आने वाले दस बीस साल में शहर की सीमाएँ कहाँ तक पहुँच जाएँगी! फिर वे थोड़ा और समय की सीमारेखा को उल्लांघते तो देखते कि शहर दूर दूर तक फैले सारे गाँवों को अजगर की तरह औखा निकल चुका है! सोचते सोचते वे घबराने लगते और फिर समय की सीमारेखा को और आगे खींचना उनके साहस की सीमा से परे हो जाता, क्योंकि वहाँ एक शहर का दूसरे शहर की सीमा तक असमाप्त सिलसिला होता! इस तरह पूरा देश शहर हो जाता हुआ दिखता! गाँव कहीं नहीं होता! पूरे देश में शहर ही शहर! सिर्फ शहरों वाला देश! पूरी दुनिया में सिर्फ शहर ही शहर! सिर्फ शहरों वाली दुनिया! गाँव बचा हुआ है सिर्फ किताबों में! और किताबें सिर्फ डिजीटल फार्मेट में!
बिसेसर बाबू ऐसे बेतरतीब खयालों और ख्वाबों को देखकर या सोचकर ही दहल जाते! क्योंकि वे शहरी निर्दयता और क्रूरता से भली तरह वाकिफ हो चुके हैं! वे जिन अखबारों को पढ़ने के आदी हो चुके हैं, उनमें आधी खबरों पर तो लुभावने बाज़ार का कब्जा होता है और शेष आधी खबरों में चोरी, डकैती, रेप, छेड़खानी, हिंसा, उपद्रव, लूट, तरह तरह की दुर्घटनाएँ, भ्रष्टाचार, घोटालें, दंगें, मॉब लिंचिंग वगैरह वगैरह ही छपा होता है। कईं बार तो उन्हें अखबार से भी घृणा होने लगती है, जैसे उन्हें टीवी के समाचार चैनलों से हो चुकी है!
एक बार अखबार पढ़ते पढ़ते उन्होंने अपने बेटे राकेश से अचानक पूछ लिया, -‘ये इतने सारे रंगीन विज्ञापन किस बात के हैं बेटा! इधर देख तो! रोज आते हैं!’’ राकेश ने अखबार में देखा तो वे विज्ञापन ‘दोस्ती’ के थे! फोन पर दोस्ती के विज्ञापन! मोबाइल लगाओ और लड़कियों से दोस्ती करो! राकेश जानता था कि इन विज्ञापनों के जरिए दोस्ती की आड़ में क्या और कैसा गोरखधंधा होता है! और कैसी दोस्ती की बातें होती हैं! चाहे जैसी बातें करो! चाहे जितनी बातें करो! बस  आपके जेब और मोबाइल में बेलेन्स खुटना नहीं चाहिए! खैर तब राकेश ने बिसेसर बाबू को जो और जितना हो सका, विज्ञापन के बारे में बताया था।
बिसेसर बाबू दुःखी रहने लगे हैं कि आज नहीं तो कल, उनकी जमीन भी शहर लील जाएगा! वे इस भयावह कल्पना से भी डर जाते कि उनके खेत वाली जमीन पर एक बड़ा-सा सीमेन्ट और लोहे का पहाड़ खड़ा हो जाएगा! फिर उन्हें खयाल आता कि उनके खेत के पीछे जो खोदरा (बरसाती नाला) बहता है, उसके पीलु के पेड़ पर जो किसन्या की आत्मा रहती है, क्या वह आसपास बसने वालों को तब चैन से सोने देगी ? किसन्या, बिसेसर बाबू के गाँव का ही था,  और उस समय उनका हमउम्र भी था और अपनी जवानी के दिनों में ही उसने उसी पीलु के पेड़ पर फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। और वे जानते थे कि किसन्या जब जिंदा था, तब भी बहुत खुरापाती और गुस्सैल स्वभाव का था! फिर उन्हें ठीक इसका उलट खयाल भी आया कि क्या वह पीलु का पेड़ ही तब बच पाएगा, जिसपर किसन्या रहता है? और अगर वह पीलु भी विकास की भेंट चढ़ गया, तब किसन्या की आत्मा क्या करेगी ? कहाँ रहेगी ?
खैर बिसेसर बाबू अपनी जमीन के भविष्य को लेकर आशंकित, चिंतित और दुःखी तो हैं, लेकिन उन्हें अपने बेटे राकेश पर भी उतना ही यकीन है! वे जानते हैं कि उनका बेटा, उनके बाद भी उनकी सीख और विचारों को आगे बढ़ाएगा। यही उनके जीवन की सच्ची कमाई है और सच्चा सुख भी, जो उनके हर दुःख पर भारी है।
राकेश ने भी अपने पिता की तरह ही ममता से प्रेम विवाह किया था। दरअस्ल पढ़ाई के सिलसिले में राकेश जब शहर को आया था, तो फिर शहर का ही होकर रह गया था। कॉलेज में उसके साथ पढ़ने वाली ममता से उसका प्रेम कॉलेज के दिनों में ही सार्वजनिक हो चुका था। बसेसर बाबू की प्रेम कहानी की तरह उनके बेटे राकेश की प्रेम कहानी में भी विलेन कमजोर नहीं था! लेकिन गाँव के ‘विलेन’ और शहर के ‘विलेन’ में बहुत फर्क होता है! शहर के विलेन ने, गाँव की विलेन की तरह राकेश को भरे कॉलेज में पीटा या पिटवाया नहीं, और ना ही धमकाया, बल्कि शहर के विलेन ने राकेश को कॉलेज से ही निकलवा दिया! वह जिस क्षेत्र में किराये की खोली में रहता था, उस खोली से भी निकलवा दिया और उस क्षेत्र में उसके लिए मकान मिलना तक मुश्किल कर दिया। वो ऐसे दिन थे, जब राकेश टूट सकता था! लेकिन उसे इस मुश्किल समय से बाहर निकालकर लाए थे, उसके पिता बसेसर बाबू!
राकेश ने बताया कि अपने उन कठिन दिनों में जब राकेश सब तरह निराश और हताश होकर उम्मीद के सब रास्ते खो चुका था, तब किसी कच्ची नींद में उसके पिता उसके सपने में आए थे और उन्होंने उसे अपने प्रेम विवाह की कहानी फिर से सुनाई थी। अपने पिता की इस पहले से ज्ञात कहानी में राकेश को जाने कौन-सा नया सूत्र मिल गया था कि उसने अपने बचे खुचे आत्मविश्‍वास को फिर से खंगाला, इकट्ठा किया और आगे के लिए एक दमदार योजना बना डाली!

अब चूँकि विलेन शहर का था, तो भावी योजना भी शहर के विलेन के हिसाब से होनी थी। राकेश सबसे पहले तो अपने कॉलेज के प्रिंसिपल से मिला और अपने किये के लिए क्षमा माँगी। इससे वह अपनी शिक्षा की शेष अवधि पूरी करने और परीक्षा में बैठने की अनुमति माँगने में सफल रहा। फिर घर आकर उसने दो पत्र लिखे। एक ममता को और एक उसके पिता को। ममता को राकेश ने माफी माँगते हुए लिखा कि, -‘हो सके तो मुझे माफ कर देना ममता! मैं यहाँ अपने पिता के सपनों और अपने अतीत के अभावों से मुक्ति के लिए पढ़ने आया था। यदि पढ़ नहीं पाया तो निश्‍चय ही कुछ बन भी नहीं पाऊँगा। मुझे विश्‍वास है, ऐसा तुम भी नहीं चाहोगी! मुख्य परीक्षा को महज कुछ ही समय शेष हैं। और मैं बेहतर परिणाम को लेकर आश्‍वस्‍त हूँ। यदि विश्‍वास के साथ मेरी प्रतीक्षा कर सको तो मैं सदैव तुम्हारा हूँ। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में मुझे तुमसे दूरियाँ बनाकर रखना पड़ेगी और तुम्हें भी इसमें मेरा साथ देना होगा। - तुम्हारा राकेश।’’
फिर दूसरा पत्र राकेश ने ममता के पिता को लिखा कि, -‘श्रीमान यादवजी, मैं अपने किये पर शर्मिन्दा हूँ और यदि मेरे कारण आपकी लोकनिंदा हुई हो तो हृदय से क्षमा चाहता हूँ। कॉलेज में अब आपको मेरी ओर से कोई शिकायत नहीं मिलेगी, ऐसा विश्‍वास रखें। मैं अपने पिता के सपनों को पूरा करने का संकल्प लेकर घर से निकला हूँ और अपने इस संकल्प पर प्रतिबद्ध हूँ। जीवन में कुछ बन पाया तो निश्‍चय ही आपसे मिलने का साहस कर पाऊँगा। और मैं विश्‍वास से भरा हूँ कि भविष्य मुझे ऐसा अवसर अवश्‍य देगा। फिलहाल मेरे शब्दों पर भरोसा रखें। पुनः क्षमा याचना सहित- राकेश।’
कॉलेज में परीक्षाओं के बाद से ही स्थाई रोजगार की तलाश में राकेश ने जी जान लगा दी और बहुत हाथ-पैर मारने के बाद आखिरकार साल भर के भीतर ही उसे पोस्ट ऑफिस में बाबू की सरकारी नौकरी मिल चुकी थी। नौकरी मिलते ही सबसे पहले उसने अपने पिता बिसेसर बाबू को शहर लाने का अभियान चलाया। बिसेसर बाबू को गाँव से शहर लाना इतना आसान भी न था। लेकिन अंततः अपने बेटे की जिद और उन्हीं दिनों सुमित्रा के इलाज के लिए वे लम्बे प्रवास पर शहर आए तो फिर राकेश ने उन्हें गाँव वापस जाने ही नहीं दिया था।
अपने पिता को शहर लाने की इस एक बड़ी योजना से सफल हुआ तो फिर राकेश के लिए दूसरी योजना पर काम करने का समय आ गया था। अपनी मंशा और योजना के अनुसार अपनी प्रेमिका ममता को दिये वचन को निभाने के लिए राकेश ने ममता के पिता से मुलाकात करने के बारे में सोचा। और वह मिला भी। लेकिन ममता के पिता नहीं माने थे। बावजूद इसके कि वह अब एक अच्छी भली नौकरी करने लगा था। खैर राकेश को अपने पिता की प्रेम विवाह वाली कहानी याद थी और उस कहानी से मिली सीख भी!
ममता ने भी कॉलेज की शिक्षा खत्म होने के बाद शहर में ही रंगमंच से जुड़ी एक संस्था से जुड़कर अभिनय करना शुरू कर दिया था। कॉलेज में शौकिया तौर पर नाटक वगैरह करने वाली ममता अब रंगमंच और अभिनय के प्रति गम्भीर हो गई थी। राकेश ने भी उसी रंगमंच संस्था की सदस्यता ले ली। फिर कुछ ही दिनों बाद ममता और राकेश ने ढेर सारे नाटकों में साथ-साथ अभिनय किया। उनकी जोड़ी को रंगमंच पर बहुत सराहना मिलने लगी थीं। इस बीच राकेश ने एक नए रोमांटिक नाटक की अभिकल्पना की और उसकी स्क्रीप्ट वगैरह सभी कुछ खुद ही फाइनल किया। इस नाटक के लिए उसने अपना और ममता का एक जोड़े की तरह खींचा गया एक विशेष और आकर्षक चित्र बनवाया और उसके बड़े-बड़े बैनर, पोस्टर बनवाकर पूरे शहर भर में लगवाए। राकेश ने अपने इस बहुप्रतीक्षित नाटक के कुछ बड़े बड़े पोस्टर्स ममता के घर की तरफ वाले इलाके में जानबूझकर लगवाए। और एक सबसे बड़ा पोस्टर तो ममता के घर के वाली गली के मुहाने पर ही लगवाया था, इस तर्क के साथ कि इससे नाटक को स्थानीय लोकप्रियता हासिल होगी।
इस पोस्टर काण्ड का ममता के पिता पर गहरा असर हुआ। और इस बीच ममता भी अपने पिता के आगे पीछे उन दिनों लगातार जिद करती रही थी कि राकेश के लिए वे अपनी सहमति दे दें।
यह कैसे सम्भव था कि बिसेसर बाबू को राकेश के प्रेम प्रसंग की भनक भी न लगती। जब बिसेसर बाबू को पता लगा तो वे स्वयं ममता के पिता से मिलने सीधे उनके पास चले गए। ममता के पिता पर एक किस्म से चौतरफा दबाव तो पहले से ही था, पूरे शहर भर में लगे पोस्टर्स से सौ तरह की बातें उनके कान तक अलग से आई थीं। उस पर बिसेसर बाबू ने ऐसी ज्ञान की घुट्टी पिलाई कि शहरी विलेन मान गया था। बाद में कभी कभी राकेश अपने पिता से पूछता भी था कि उन्होंने आखिर ऐसा क्या कहा था, तो बिसेसर बाबू हमेशा की तरह सिर्फ मुस्करा भर देते थे। ज्यादा इसरार करने पर एक दफे उन्होंने सिर्फ इतना बताया था कि, -‘मैंने ममता के पिता से सिर्फ इतना पूछा कि ये बच्चे हमसे हमारी इच्छा और सहमति चाहते हैं। क्या ये बड़ी बात नहीं है! क्या होता, अगर ये हमारी इच्छा के विरूद्ध घर से भाग जाते और कुछ समय बाद गोद में बच्चे को लेकर आते? तब की स्थितियाँ तो शायद और भी बदतर होती!’ अब ये तो भगवान ही जाने कि ये बसेसर बाबू की बातों का असर था या परिस्थितियों की नजाकत का या शहरी विलेन की क्रूरता में अचानक आई मंदी का असर था! खैर उस समय ममता से राकेश का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ था।
खैर राकेश के विवाह की यह कथा भी एक तरह से बिसेसर बाबू के कथा की वैचारिक पृष्ठभूमि को पुख्ता करने के प्रयास में कही गई है।

बिसेसर बाबू नियमित रामचरित मानस का पाठ भी करते रहे है, पाठ के साथ भावार्थ बताते हुए भी अक्सर वे अपनी इसी विचारधारा के उदाहरण दिया करते हैं। जब लोरी और दैविक किसी प्रसंग या व्याख्या को समझ नहीं पाते या तार्किकता की कसौटी पर उन प्रसंगों को बूझ नहीं पाते हैं तब उनका नियमित अखबार का अध्ययन काम आता है। ऐसे ही जब एक दफे लोरी ने रामचरित मानस के पाठ के दौरान बिसेसर बाबू से पूछ लिया था कि, -‘तुलसी बाबा ने पूरे मानस में महिलाओं को लेकर इतनी तुच्छ टिप्पणियाँ क्यों लिखी हैं ?’  तो बिसेसर बाबू चौंके नहीं, बल्कि वे खुश हुए कि लोरी ने एक जरूरी और अच्छा प्रश्‍न पूछा है।
उस दिन बिसेसर बाबू ने रामचरित मानस के अरण्यकाण्ड का यह सोरठा पढ़ा था, -‘सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ। जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय।’ जिसका भावार्थ पढ़ते हुए वे बोले, -‘नारी तो अपने सहज स्वभाव से ही अपावन होती है, वह अपने पति की निस्वार्थ सेवा कर अच्छी गति को प्राप्त करती है। तुलसीदास जी कहते हैं कि ...।’ लोरी रामचरितमानस की उन पंक्तियों के भावार्थ पर कुछ क्षणों के लिए ठिठक गई। सम्भवतः वह असमंजस में रही कि दादा से इस बारे में पूछे कि नहीं पूछे ? फिर भी लोरी ने अपने मन की उत्कंठा में आकर अपने दादा से भावार्थ के बीच में ही टोकते हुए पूछा था।
हालाँकि यह कोई पहली बार नहीं था, जब मानस पाठ के दौरान ऐसी कोई पंक्ति आई थी, बल्कि रामचरितमानस के बालकाण्ड और अयोध्याकाण्ड में भी ऐसी कईं पंक्तियाँ आई हैं जिनमें तुलसी बाबा ने नारी को अत्यन्त हीन, दीन और कहीं कहीं तो पाप की जड़ तक बताया है। लोरी के स्कूल में भी एक बार एक वाद-विवाद की एक प्रतियोगिता के दौरान किसी प्रतियोगी ने रामचरित मानस के सुंदरकाण्ड की एक चौपाई बोली थी, जिसपर खूब बहस हुई थी, वह उसे आज भी याद है, ‘ढोल गँवार सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।’ 
बिसेसर बाबू ने लोरी को समझाते हुए बताया कि, -‘तुलसी बाबा ने शायद उस समय और काल के परिप्रेक्ष्य में और तात्कालीन समाज व्यवस्था के संदर्भ में ऐसा लिखा होगा। समाज में स्त्री की जैसी दशा और स्थान होता है, उसका सच्चा विवरण करना भी तो लेखक के लिए जरूरी होता है। फिर एक दूसरा पक्ष यह भी कि रामचरित मानस तुलसी का वैचारिक आधार ग्रंथ है और सीता जो इसकी नायिका है, मूलतः एक आदर्श विवाहिता की तरह इसमें प्रस्तुत है। तो यह भी सम्भव है कि अपने प्रमुख पात्र के चरित्र को ध्यान में रखते हुए तुलसी बाबा ने नारी को इस तरह चित्रित किया हो!’
लोरी को बिसेसर बाबू की कुछ बातें समझ आई, कुछ नहीं आई, लेकिन वह बोली कुछ भी नहीं। जब उसने और कुछ नहीं पूछा तो फिर अपनी ही बात के समर्थन में बिसेसर बाबू ने आगे समझाते हुए बताया कि, -‘मानस में अधिकांश जगहों पर तुलसी बाबा ने सिर्फ ऐसी नारियों को गरियारा है जो पतिव्रत धर्म और स्वभाव से व्याभिचारी हैं। इससे ज्यादा तो तुलसी बाबा ने माता सीता और इस रामचरित मानस की सूत्रधार माता पार्वती के दैवीय रूप और शक्तियों का बखान किया है। उन्हें भी तो इसी के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।’
लोरी अपने दादा के तर्क से अब सहमत नज़र आई। राकेश और ममता बिसेसर बाबू के ज्ञान और मानस पर उनकी पकड़ से यूँ तो पहले से ही वाकिफ हैं, फिर भी उस दिन जिस तरह वे लोरी को समझा रहे थे, उससे वे मन ही मन और अधिक प्रसन्न हो रहे थे। हैरत में तो लोरी भी थी। इसका एक बड़ा कारण तो यह भी था कि वह जानती थी कि उसके दादा ने बहुत ज्यादा शिक्षा हासिल नहीं की थी। उसी रात लोरी ने अपने पिता राकेश से पूछा भी था, -‘‘पापा! दादाजी जब इतने पढ़े लिखे नहीं हैं तो इतनी गहरी बातें कैसे बूझ और समझ लेते हैं ?’
राकेश अपनी बेटी लोरी की जिज्ञासा को समझ रहे थे और उसकी हैरानी पर खुश भी हो रहे थे। उसने लोरी को समझाते हुए बोला, -‘बेटा! स्कूली शिक्षा और विवेक दो भिन्न चीजें होती हैं। जैसे मेरी माँ यानी तुम्हारी दादी तो बिल्कुल भी पढ़ी लिखी नहीं है। इसका ये मतलब तो नहीं कि वे अज्ञानी हैं। तुम्हारी दादी शायद हमसे ज्यादा लोक-व्यवहार और दुनियादार है।’
-‘पापा, आपकी बात तो सही है। लेकिन यह तो एक किस्म से स्कूली शिक्षा के औचित्य को खारिज करना हुआ ?’ लोरी ने अपने मन में उठी अपनी शंका जाहिर की।
-‘स्कूली शिक्षा की आवश्‍यकता है बेटा! खासकर इस नए जमाने में। इसका मकसद हमारे दिमाग को विकसित करना है, दुनिया के ज्ञान को हासिल करते हुए अपनी सोच को व्यापक बनाना है। यह स्कूली शिक्षा से आसानी से सम्भव है, यह एक माध्यम है, लेकिन सिर्फ स्कूली शिक्षा से ही यह सम्भव है, ऐसा नहीं है। स्कूली शिक्षा प्राप्त करना एक अलग बात है और दुनियावी विवेक होना और हासिल करना दूसरी चीज है।’ राकेश ने भरसक अपनी लाड़ली बेटी को समझाते हुए कहा था।
-‘अच्छा चलो इस चेप्टर को यहीं क्लोज़ करो! अगले बुधवार को दादाजी का पचहत्तरवाँ जन्मदिन है! क्या प्लानिंग है बताओ!’ लोरी ने अचानक विषयांतर करते हुए कहा, इस कारण राकेश भी थोड़ा चौंक गया।
-‘हूँऽऽ ... तुम बताओ ?’ राकेश को तत्काल कुछ न सूझा।
-‘ठीक है, मैं मम्मी से डिस्कस करके फिर बताती हूँ।’ कहकर लोरी चली गई।
लेकिन बिसेसर बाबू के पचहत्तरवें जन्मदिन से ठीक एक दिन पहले जो घटना हुई, उसने पूरे घर को तनाव से भर दिया। दरअस्ल उस दिन दोपहर में राकेश से मिलने दो लोग उसके दफ्तर में आए थे।
-‘मि. राकेश! मेरा नाम डी. के. सक्सेना है।’ अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए जब एक शख्स ने राकेश को अपना परिचय दिया तो राकेश उसे पहचान नहीं पाया। मि. सक्सेना शक्लोसूरत से अच्छे खासे खाते-पीते घर का लग रहा था और उसके पहरावे से भी लग रहा था कि वह खासी कमाई करने वाला व्यक्ति होगा।
-‘जी कहिए!’ राकेश अपनी सीट से उठा और हाथ मिलाते हुए बोला। फिर उसने मि. सक्सेना के साथ आए उस दूसरे व्यक्ति से भी हाथ मिलाया, जो मि. सक्सेना की बगल में हाथ बाँधे सिर्फ खड़ा हुआ था, जैसे वह मि. सक्सेना का कोई बॉडीगार्ड हो।
-‘मि. राकेश। क्या सोचा कुछ आपने ?’ मि. सक्सेना ने ऐसे पूछा जैसे राकेश उसके कहे के आशय को आसानी से समझ जाएगा। लेकिन शायद राकेश समझने के बावजूद अंजान बना रहा या अंजान बनने की कोशिश करता रहा, इसलिए झट पूछा, -‘किस बारे में मि. सक्सेना ? मैं कुछ समझा नहीं!’
-‘आपकी गाँव वाली जमीन के बारे में ? आपसे हमारे मैनेजर विकास ने इस बारे में कईं बार बात की होगी ?’ मि. सक्सेना ने अपने आने के मकसद को स्पष्ट किया।
-‘ओऽऽ हाँ! तो विकासजी आपके लिए काम करते हैं ?’ राकेश ने मामूली अचरज प्रकट करते हुए कहा।
-‘सिर्फ विकास ही नहीं! हमारे कुछ एजेन्ट्स भी आपसे लगातार मिलते रहे हैं! लेकिन आप अभी तक उन सबको टालते ही रहे हैं! मजबूर होकर मुझे खुद आपसे मिलने आना पड़ा!’ मि. सक्सेना कुछ इस तरह रौब से बोले, जैसे उसका यहाँ आना उसके जीवन की बहुत बड़ी घटना हो!
-‘मेरा तो अब भी वही जवाब है!’ राकेश ने संक्षिप्त में ही जवाब दिया।
-‘मि. राकेश! आप तो जानते ही हैं कि हमने आपके पास वाले दोनों खेत खरीद रखे हैं। और आपके खेत के पीछे वाले खेत की डील भी हमने अभी दो दिन पहले ही फायनल की हैं।’ मि. सक्सेना अबकी बार बिना पलक झपकाए राकेश की आँखों में आँखें डालकर बोला। फिर अपनी आवाज को भरसक मोटी करते हुए बोला, -‘और मैं आपको उन दोनों खेत से ज्यादा दाम देने को तैयार हूँ। फिर से सोच लेंगे तो सबके लिए बेहतर होगा ?’ मि. सक्सेना ने यह कुछ इस तरह कहा था कि उसके कहे में धमकी वाली टोन अपने आप चली आई, जिसका कि वह आदी हो चुका था।
-‘बहुत अच्छी तरह सोच चुका हूँ मैं मि. सक्सेना! और विकासजी को में इस बारे में पहले ही सब कुछ बता चुका हूँ। आप अपना वक्त बर्बाद कर रहे हैं सिर्फ!’ राकेश ने रूढ़ होते हुए तो नहीं कहा था लेकिन उसके कहे में सख्त लहजा स्पष्ट था।
-‘ऐसा है मि. राकेश! वो जमीन लेना हमारे लिए कोई बड़ा मुशिकल काम भी नहीं है! लेकिन जब तक सीधी उँगली से घी निकल रहा हो तो उँगली टेढ़ी ही क्यों की जाए?’ मि. सक्सेना ने अबकी कहा तो राकेश ने उन्हें हाथ जोड़कर कह दिया, -‘मुझे अभी बहुत सारा काम है मि. सक्सेना। आप फिर कभी आ जाइएगा।’
मि. सक्सेना को पहले से ही राकेश से ऐसे जवाब की उम्मीद रही होगी, इसलिए उसने राकेश की बात का उतना भी बुरा नहीं माना, बल्कि वह एक क्रूर मुस्कुराहट के साथ बोला, -‘एक छोटा-सा किस्सा है। वो जरूर सुन लीजिए। फिर आप भी अपना काम कीजिएगा और मुझे जो करना है, वो तो मैं करूँगा ही!’
राकेश जब प्रत्युत्तर में कुछ नहीं बोला तो मि. सक्सेना ही बोले, -‘हमारे इंदौर वाले प्रोजेक्ट में भी ऐसे ही एक प्लॉट बीच में आ रहा था। जानते हैं, क्या हुआ था उसमें ? उसकी जमीन में एक हनुमानजी की मूर्ति निकली और बाद में वह प्लॉट वाला खुद हमें जमीन बेचने आया था!’’ राकेश को मि. सक्सेना का किस्सा पूरी तरह समझ नहीं आया, और मि. सक्सेना ने भी हाव-भाव से यह ताड़ लिया कि उसे और अधिक स्पष्ट होने की जरूरत है! मि. सक्सेना बात को थोड़ा स्पष्ट करते हुए बोले, -‘दरअस्ल! जब वो प्लॉट वाला किसी तरह मान नहीं रहा था तो हमने उसके प्लॉट को एक धार्मिक मसले में उलझा दिया। हमने एक मंदिर के पुजारी को पैसे दिए और उसे कहा कि वो घोषणा करे कि उसने एक सपना देखा है कि इस प्लॉट वाली जगह पर हनुमानजी की मूर्ति दबी हुई है और यह जगह हनुमान मंदिर के लिए है। ऐसा हनुमान जी ने खुद उसे सपने में आकर कहा है। फिर उस पुजारी ने वैसा ही किया और हमारे लोगों ने वहाँ के रहवासियों के सामने जब उस प्लॉट की खुदाई की तो उसमें से हनुमान जी की एक प्राचीन मूर्ति निकली, जिसे हमारे ही लोगों ने उस प्लॉट में पहले से खोदकर रख दिया था।’ मि. सक्सेना ने जब इस घटना को सुनाया तो एक बारगी राकेश को भी थोड़ा झटका लगा। फिर उसने मि. सक्सेना की आँखों में देखकर गहरे अर्थों से पूछा, -‘तो आपका आशय है, हमारे खेत में भी ऐसा ही होगा ?’
-‘हो सकता है, ऐसा ही हो मि. राकेश! या हो सकता है कि कोई मज़ार भी निकल जाए?’ कहकर मि. सक्सेना अपने ही मजाक पर खुद हँस दिया। फिर तत्काल वापस गम्भीर होते हुए लगभग एक एक शब्द को चबाकर बोला, -‘और ये भी हो सकता है मि. राकेश कि आपके खेत में कोई लाश निकल जाए। लाश जिसका ताजा ताजा कत्ल हुआ हो ?’
मि. सक्सेना की इस धमकी ने राकेश को एकदम घबरा दिया। उसे कुछ नहीं सूझा। लेकिन वह कुछ नरम पड़ते हुए बोला, -‘मि. सक्सेना! मैं अपने पिताजी बात करके आपको बाद में बताता हूँ।’
मि. सक्सेना जानते थे कि राकेश इस तरह मामले को टालना चाह रहा है, इसलिए वे आगे बोले, -‘अच्छी तरह सोच लीजिए मि. राकेश! क्योंकि अब मैं जब जब आपसे मिलने आऊँगा, तब तब आपके खेत में एक लाश भी दबाई जा सकती है! आप समझदार हैं, सोचकर जवाब दीजिएगा। और फिर मैं जमीन की जो कीमत दे रहा हूँ, वो भी कुछ कम नहीं है!’ सक्सेना ने कहा और राकेश को क्षणभर के लिए घूरा फिर अपने साथ आए उस शख्स के साथ वापस लौट गया।
मि. सक्सेना से आज हुई इस मुलाकात ने राकेश को भीतर से हिलाकर रख दिया था। राकेश चाहता तो यही था कि वह अपने पिता को मि. सक्सेना से हुई बातचीत के बारे में न बतलाए, लेकिन न बतलाए जाने पर समस्या का कोई हल निकलता भी उसे नज़र नहीं आ रहा था। पुलिस के पास जाने और मि. सक्सेना के विरूद्ध रिपोर्ट लिखाने का तुक भी उसे समझ नहीं आया। मि. सक्सेना अपने बयान से भी बदल सकता था और यदि नहीं बदलता है तो भी वह अपने रसूख से मामले को और ज्यादा मुश्किल कर सकता है। शाम को पूरा वाकिया सुनकर बिसेसर बाबू भी गम्भीर सोच में डूब गए। फिर भी अपने बेटे का हौंसला रखते हुए बोले, -‘ठीक है! सोचते हैं कुछ इस बारे में। अभी तुम फिक्र मत करो। मैं कुछ देखता हूँ।’ बिसेसर बाबू ने कह तो दिया लेकिन हाल-फिलहाल में उनके खुद के पास इस समस्या का कोई हल नहीं था। उस रात बिसेसर बाबू ने देश के प्रधानमंत्री के नाम एक लम्बी चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्होंने विशेषतौर पर प्रधानमंत्री को यह सलाह दी कि कृषि योग्य भूमियों की खरीदी-बिक्री सिर्फ कृषि प्रयोजन के लिए ही होनी चाहिए, ऐसा अध्यादेश शीघ्र लाएँ।
खैर बिसेसर बाबू के जन्मदिन के ऐन एक दिन पहले आ खड़ी इस समस्या की वजह से पूरे घर का माहौल बदल गया। और दूसरे दिन बिसेसर बाबू का पचहत्तरवाँ जन्मदिन एक औपचारिकता बनकर रह गया। हालाँकि लोरी और दैविक ने अपने प्यारे दादाजी के जन्मदिन को खास बनाने के लिए घर में भगवान सत्यनारायण की कथा का आयोजन किया था और राकेश ने भी शाम को बिसेसर बाबू के कुछ मिलने जुलने वाले उनके हमउम्रों को दावत पर भी बुलाया था।
अगले दिन लोरी अपने कोचिंग सेंटर से जब देर शाम तक नहीं लौटी तो पूरे घर की साँसें ऊपर-नीचे होने लगी। यूँ बारहवीं में पढ़ने वाली लोरी अपनी उम्र से अधिक समझदार है और दिखने में भी वह अपनी उम्र से अधिक ही लगती है। अमूमन लोरी कोचिंग सेंटर से सवा छः बजे के आसपास तक लौट आती है। लेकिन उस दिन जब अपने समय से नहीं लौटी और उसका फोन भी लगातार स्वीच ऑफ आता रहा तो ममता ने बिसेसर बाबू को चिंता जताते हुए कहा, -‘लोरी अभी तक नहीं आई बाबूजी! जरा कोचिंग सेंटर से फोन करके पूछिए ना!’
बिसेसर बाबू ने पहले तो अपनी बहू ममता को समझा दिया कि थोड़ी देर और प्रतीक्षा कर लेते हैं, फिर वे फोन लगाकर पूछेंगे।
बिसेसर बाबू ने कह तो दिया, मगर सब्र तो उस दिन उनके पास भी नहीं था। उन्होंने कोचिंग सेंटर फोन किया जो बताया गया कि लोरी तो ट्यूशन पढ़ने वहाँ आई ही नहीं है। कोचिंग सेंटर से जवाब सुनकर बिसेसर बाबू ही नहीं, सुमित्रा और ममता के भी होश उड़ गए। वे दोनों अत्यधिक घबरा गईं। यूँ भी दो दिन से घर के माहौल में बेचैनी पहले से घुली हुई थी, उस पर लोरी का इस तरह कोचिंग सेंटर न पहुँचना और अभी तक न लौटना ऐसी वज़हें थीं कि उनका परेशान होना लाजमी था।
राकेश भी दफ्तर से लौट चुका था और लोरी की सभी सहेलियों के घर फोन लगा लगाकर पूछ रहा था। चूँकि वक्त देर शाम का था इसलिए उनकी फिक्रें अँधेरे के साथ और अधिक गहराती जा रही थी। बिसेसर बाबू ने राकेश से कहा कि, ‘सबसे पहले तो हमें पुलिस को सूचना दे देनी चाहिए, वर्ना ज्यादा देर हो जाने के बाद रात में और परेशानी बढ़ सकती है।’
लोरी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाकर जब तक वे थाने से लौटे, साढ़े आठ बज चुके थे। सुमित्रा और ममता दोनों सास-बहुओं का रो रोकर बुरा हाल हो रहा था। इस तरह की विपदा उनके परिवार पर पहले कभी नहीं आई थी। आस-पड़ौस में भी हल्ला तो मच ही चुका था, लेकिन अपने अपने द्वीपों में तब्दील हो चुके पड़ोस के ज्यादातर घर इस खबर के बाद ज्यादा चौकन्ने हो गए, मगर लोरी को ढूँढने और चिंता जताते की कोशिश महज एक दो पड़ौसियों ने ही की। शेष आए - न आए, पूछा - न पूछा और अपने अपने घरों में जाकर मोबाइल, टीवी और इंटरनेट की दुनिया में खो गए!
तकरीबन रात दस बजे के आसपास जब राकेश के मोबाइल पर लोरी का कॉल आया, तब कहीं जाकर पूरे परिवार की साँसों में साँसें आई। लोरी ने सुबकते हुए अपने पिता को बताया कि वह नये बस स्टेण्ड के पास है और इतना कहकर फोन कट गया। बिसेसर बाबू को साथ लेकर राकेश तत्काल बस नए स्टेण्ड पहुँचा तो उसे थोड़ी ही खोज करने पर लोरी एक जगह बैठी दिख गई। अपने पिता को देखकर लोरी उनसे जा लिपटी और जोर जोर से रो पड़ी।
लोरी कोचिंग क्लास के लिए जब घर से निकली थी, तब उसने जिंस और पिंक कलर का टॉप पहन रखा था और यही उन्होंने पुलिस रिपोर्ट में भी लिखवाया था। जबकि इस समय लोरी के शरीर पर पुराना और मैला सा एक नाईटी जैसा वस्त्र था। उसके बदले हुए पकड़े देखकर ही राकेश और बिसेसर बाबू स्थिति की गम्भीरता को भाँप गये थे। बिसेसर बाबू भी लोरी से मिलकर रो पड़े। वहाँ उस समय उन दोनों ने लोरी से कुछ भी नहीं पूछा। और ना ही रास्ते में कुछ भी पूछा। पूरे रास्ते और घर लौटने के बाद भी लोरी लगातार रोती और सुबकती ही रही। राकेश ने घर पहुँचने के बाद पुलिस को फोन लगाकर लोरी के लौट आने की सूचना दे दी थी।
ममता और सुमित्रा दोनों ही, लोरी को देखकर उससे लिपट लिपट कर रोती रही। जब रोना-धोना कुछ कम पड़ा तो राकेश ने लोरी से बहुत आहिस्ते से पूछा, -‘कुछ बताओ लोरी ? क्या हुआ था ? तुम कोचिंग क्लास क्यों नहीं गई थी ? और कहाँ थी ?’
अपने पिता के सवालों को सुनकर लोरी फिर से फूट पड़ी और कुछ भी न बोल पाई। मुश्किल से रुकी रुलाई फिर से शुरू हो चुकी थी। ऐसे समय में ममता ने स्थिति को सम्भाला और इशारे से राकेश को एक तरफ बुलाकर बताया कि वह लोरी से अकेले में पूछताछ करके थोड़ी देर बाद बता देगी। बाद में ममता ने अपनी बेटी को खोर खोर पूछा तो उससे जो घटनाक्रम और कहानी सामने आई, वो कुछ इस प्रकार है।
लोरी जब रोज की तरह चार बजकर पैंतालीस मिनट पर अपने घर से निकली थी तो बस स्टॉप के पहले ही एक वेन ठीक उसके सामने आकर रुकी और वेन का दरवाजा खोलकर दो लड़कों ने जबरन उसे अन्दर खींच लिया और तत्काल वेन आगे बढ़ा दी। यह सब इतना तेजी से और हड़बड़ी में हुआ था कि न तो लोरी को सम्भलने या और कुछ समझने का अवसर मिला और ना ही बस स्टॉप के आसपास के लोग ही उस समय कुछ कर पाए। जब तक वह चिल्लाती, तब तक वेन में बिठाकर उसका मुँह एक कपड़े से बाँध दिया गया था। वह वेन उसे लेकर शहर से बाहर की तरफ लेकर तेजी से चलती चली जा रही थी। इस बीच जब लोरी ने बाहर निकलने की छटपटाहट में हाथ-पैर चलाए तो उसके हाथ और पैर भी बाँध दिए थे। कुछ ही देर में वह वेन उसे लेकर शहर से बाहर की तरफ जा चुकी थी और जब शाम ढलने लगी, तब उन लोगों ने उस वेन को एक घने जंगल में ले जाकर रोक दिया। उस वेन में तीन लड़के थे। एक लड़का गाड़ी चला रहा था और दो लड़के पीछे थे। उन दोनों ने ही लोरी को बस स्टॉप से खींचकर वेन में बैठाया था।
फिर वे तीनों बारी बारी से लोरी के साथ गलत काम करते रहे। लोरी के मुँह पर कपड़ा बँधा हुआ ही था और वह लगातार रो रही थी, गिड़गिड़ाए जा रही थी। लोरी के साथ उन तीनों की इस जबरजस्ती में लोरी के सारे कपड़े पूरी तरह फट चुके थे। और लोरी का मोबाइल कहीं गिरकर खो चुका था। लोरी के साथ गलत काम करने के बाद लौटते समय उन्होंने लोरी को कहीं से पुरानी नाईटी जैसी ड्रेस लाकर पहनने के लिए दे दी थी। फिर उन तीनों ने लोरी को वापस शहर के नए बस स्टेण्ड के पास छोड़ दिया। जहाँ लोरी ने एक बुढ़े पान-गुटखे की दुकानवाले से फोन माँगकर अपने पिता को फोन लगाया था।

बहुत सोच विचार के बाद राकेश और बिसेसर बाबू ने सुबह जाकर पुलिस में अज्ञात अपराधियों के खिलाफ बलात्कार और अपहरण की रिपोर्ट लिखवाई, क्योंकि लोरी उन तीनों लड़कों को बिल्कुल भी नहीं जानती थी और उस पर से अचानक हुई इस घटना की वजह से वह इतनी दहशत में थी कि उसने न तो उस वेन का नम्बर नोट किया, और ना ही और कोई ज्यादा महत्वपूर्ण सुराग दे पाई।
अगले दो दिन लोरी के लिए बहुत भारी गुजरे। बार बार की पुलिस पूछताछ और मीडिया के लोगों के कारण लोरी की दहशत और अधिक बढ़ गई थी। लेकिन पुलिस रिपोर्ट लिखाने का फायदे यह हुआ कि पुलिस ने तत्काल कार्रवाई शुरू कर दी थी और शहर से बाहर जाने वाले मार्गों के सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगालने और घटना वाले बस स्टॉप से मिली सूचनाओं की मदद से महज अड़तालीस घण्टे के भीतर अपराधियों को पकड़ लिया था। अगले दिन जब लोरी को पुलिस ने उन गिरफ्तार किए गए लड़कों की शिनाख्‍त के लिए बुलाया था तो लोरी ने दो लड़कों को तो पहचान लिया, मगर तीसरे को वह नहीं पहचान पाई बल्कि बोली, -‘तीसरा लड़का जो गाड़ी चला रहा था, वो कोई और था। और इन दोनों की तरह गुण्डे टाइप का नहीं था, बल्कि किसी अच्छे घर बार का लग रहा था। और वो ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे वह इन दोनों का बॉस हो।’
लोरी की गवाही तो पुलिस ने दर्ज कर ली, मगर उस तीसरे गिरफ्तार लड़के को भी नहीं छोड़ा था।
उसी दोपहर को जब लोरी अपने कमरे में अकेली थी, तो उसके मन में बार बार एक किस्म का अपराधबोध सा महसूस होने लगा और उसके साथ हुए हादसे की स्मृतियों के आवेश में आकर उसने अपना कमरा बंद कर पंखे पर अपने दुपट्टे से फाँसी का फंदा बनाने लगी। ठीक तभी उसके कमरे के दरवाजे पर बिसेसर बाबू ने दस्तक दी थी। दरवाजा खोलने की हड़बड़ी और घबराहट में लोरी का दुपट्टा पंखे पर ही टंगा रह गया।
बिसेसर बाबू जब लोरी के कमरे में दाखिल हुए और छप पंखे पर टंगे फंदे पर उनकी नज़र गई तो एक पल को बुरी तरह घबरा गए थे और उनकी बुढ़ी हड्डियाँ काँप गई थीं। उन्होंने अपनी लाड़की पोती को गले से लगा लिया और दोनों दादा-पोती कमरे के उस एकांत में बैठकर देर तक रोते रहे। फिर जब कुछ सम्भले तो बिसेसर बाबू उस कमरे की छत पर लटके पंखे को घूरते हुए बोले, -‘भगवत गीता का एक श्लोक है लोरी! नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।’ इस श्लोक का सामान्य भावार्थ तो यही है कि आत्मा को न कोई शस्त्र काट सकता है, न ही आत्मा को आग जला सकती है। आत्मा को जल भी गला नहीं सकता और वायु भी सुखा नहीं सकती। लेकिन अगर थोड़ा गहराई में जाकर सोचो और समझने की कोशिश करो तो इसका भावार्थ यह भी है कि यह जो देह हमें ऊपर ऊपर दिखाई दे रही है, यह मात्र हमारी आत्मा के कपड़े हैं। इस देह के मलिन होने से कुछ नहीं होता। यह तो पानी से धुलकर फिर साफ हो जाती है। महत्वपूर्ण है आत्मा! और आत्मा की शुद्धि!’
बिसेसर बाबू कहकर कुछ क्षण के लिए रुके, मगर वे एकटक उसी पंखे को घूरे जा रहे थे जिसपर कुछ देर पहले फंदे के लिए लोरी ने अपना दुपट्टा टांग रखा था। लोरी बगल में बैठी अपने दादा की कही बातें सुन रही थी, मगर उसका सुबकना पूरी तरह बंद भी नहीं हुआ था।
-‘बेटा! किसी के छूने या कुछ भी कर देने से तुम्हारी शुचिता खत्म नहीं हो जाती है। क्योंकि कोई भी तुम्हारी इच्छा के बगैर तुम्हारी आत्मा की शुचिता को नहीं भेद सकता है। हाँ, जिन्होंने तुम्हारे साथ गलत किया है, उन्होंने जरूर अपनी आत्मा को मलिन कर लिया है। तो दूसरों के अपराध के लिए खुद को सजा देना तो ठीक नहीं है ?’
बिसेसर बाबू की बातें सुन रही लोरी को उसके दादा की कही बातों से बहुत हौंसला मिला। उसका हल्का-हल्का सुबकना भी अब बंद हो चुका था। मगर वह कुछ नहीं बोली, न और कुछ पूछा। बस अपने दादा की कही बातों पर सोचती रही और शायद मन ही मन फिर एक दफा और हैरान हो रही थी कि एक सामान्य सी शिक्षा पाने वाले उसके दादा यौन शुचिता जैसे गम्भीर विषय पर कितनी सुलझी हुई और समझदारी भरी बातें कह रहे हैं!
-‘हमेशा याद रखना बेटी! तुम्हारी शुचिता तुम्हारी योनी में नहीं, बल्कि तुम्हारी आत्मा में है। कभी इसे मैली मत होने देना!’ बिसेसर बाबू ने कहा और अपनी प्यारी पोती के सिर पर देर तक हाथ फेरते रहे, जब तक कि वह उनकी गोद में सर रखकर सो नहीं गई।
दो दिन बाद जब पुलिस थाने और मीडिया वगैरह से कोई नहीं आया तो बिसेसर बाबू का परिवार थोड़ी राहत महसूस करने लगा। लगा जैसे जिंदगी फिर वापस धीरे धीरे पटरी पर आ जाएगी और चीजें समय के साथ फिर से सम्भल जाएँगी। मगर तीसरे दिन जब थाना इंचार्ज ने खुद उसे उनके घर बुलवाया तो पटरी पर आती उनकी दुनिया फिर पटरी से उतर गई। और चीजें फिर बिखर गईं।
दरअस्ल थाना इंचार्ज पाटील साहब ने राकेश को मोबाइल लगाकर जब बताया कि वे उससे उनके घर पर अकेले में कुछ जरूरी बात करना चाहते हैं तो राकेश गहरे असमंजस में पड़ गया कि ऐसी क्या बात हो सकती है कि थाना इंचार्ज ने उसे मिलने के लिए उनके घर पर बुलाया है। अमूमन तो कोई भी काम होने पर वे फोन लगाकर या थाने के हवलदार वगैरह को भेजकर थाने बुलवा लेते थे। जब तक वह थाना इंचार्ज पाटील साहब के घर नहीं पहुँचा और मिला नहीं तब तक उसकी धड़कनें असामान्य ही बनी रही।
थाना इंचार्ज पाटील साहब ने राकेश को बताया कि उनकी पोस्टिंग अब किसी और थाने में कर दी है। यह सब अभी अभी आनन-फानन में हुआ है। राकेश के लिए यह हैरत की खबर तो थी लेकिन उसे इससे ज्यादा हैरत इस बात पर थी कि इस खबर को बताने के लिए पाटील साहब ने उसे अपने घर पर क्यों बुलवाया था। राकेश की ऊहापोह को ताड़ते हुए थाना इंचार्ज पाटील साहब ने कहा, -‘दरअस्ल मैं आपको इस केस से जुड़ी कुछ खास बातें बताना अपना फर्ज समझता हूँ। हालाँकि मैं शर्मिन्दा हूँ कि मैं अब इस केस में आपकी कोई मदद नहीं कर पाऊँगा। लेकिन फिर भी इस केस से जुड़ी कुछ बातें ऐसी हैं, जिनका पता हमें भी इस केस की इन्वेस्टिगेशन के दौरान अभी अभी लगा है।’
पाटील साहब की रहस्यभरी बातें सुनकर राकेश के दिल की धड़कन बहुत तेज हो गई थी। अपनी उत्कंठा को वह बहुत मुश्किल से काबू किए हुए था। उसने मुँह से बमुश्किल निकला, -‘सर! साफ-साफ कहिए ना! बात क्या है ?’
-‘लोरी को अपहृत करने और बलात्कृत करने वाला वो तीसरी लड़का विनीत सक्सेना है। मि. डी. के. सक्सेना का बेटा!’ पाटील साहब ने जैसे ही कहा, राकेश के सिर पर जैसे पहाड़ गिर पड़ा। उसे समझ नहीं आ रहा था, पाटील साहब के सामने वह कैसे अपने मन की भावनाओं को सम्भाल कर रख सके। घबराहट में उसके मुँह से सिर्फ ‘क्या ?’ निकला।
-‘मैंने खुद इस केस की इन्वेस्टीगेशन अपने हाथ में ले रखी थी। दरअस्ल मि. सक्सेना ने अपने रसूख और पैसे के दम पर एक अन्य बेगुनाह लड़के को रुपयों का लालच देकर गुनाह कबूलवा दिया था। मगर जब लोरी ने उस तीसरे लड़के को पहचानने से इंकार कर दिया तो फिर नए सिरे से जाँच पड़ताल हुई और जब उस तीसरे लड़के से थोड़ी बहुत सख्ती से पूछताछ की गई तो वह कबूल गया कि उसने पैसे लेकर यह गुनाह अपने सर लिया है। इस तरह सारा मामला सामने आया। विनीत सक्सेना को अभी पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पाई है, क्योंकि वो अभी फरार है।’ थाना इंचार्ज पाटील साहब ने विस्तार से पूरा मसला राकेश को समझाया।
‘एक दूसरी बात और राकेश जी!’ थाना इंचार्ज पाटील साहब फिर आगे बोले, -‘मैंने खुद मि. सक्सेना से पर्सनल मिलकर इस बारे में कल बात की, तो उन्होंने मुझे बताया कि वे तो सिर्फ यह चाहते थे कि लड़की (लोरी) को उठाकर कुछेक घण्टे बंधक बनाकर छोड़ दिया जाए। इससे उनका परिवार कुछ देर के लिए बेचैन हो जाएगा और दबाव में आकर वे अपनी जमीन बेचने पर मजबूर हो जाऐंगे। मगर उनके बेटे विनीत और उसके दो कौड़ी के मवाली दोस्तों ने मौके का फायदा उठाकर और जवानी के जोश में आकर लड़की के साथ बलात्कार कर डाला, जिससे मामला उलझ गया।’
राकेश जो अब तक चुप ही बैठा था, अब पूरा मसला समझ चुका था। वह बोला, -‘अब क्या किया जा सकता है ?’
-‘दरअस्ल एसपी साहब ने खुद मुझे पर्सनली फोन कर यह कहा है कि मैं आपको पूरी स्थितियाँ समझा दूँ!’
-‘मैं कुछ समझा नहीं सर!’ राकेश ने अनभिज्ञता जाहिर करते हुए पूछा। यूँ अचानक एसपी साहब जैसे बड़े अधिकारी की सहज कृपा मिलना अचरज का विषय तो है ही!
-‘यानी मैं तुम्हें अच्छी तरह बता दूँ कि इस केस का अब बाहर ही कहीं सेटलमेंट हो सके तो सबके लिए अच्छा रहेगा। इसलिए मैंने तुम्हें पूरे केस की जानकारी ईमानदारी के साथ दे दी है।’
-‘लेकिन फिर आपको थाने से और इस केस से क्यों हटाया गया है, जबकि आप खुद अब सेटलमेंट की बात कर रहे हैं ?’ राकेश ने अपने मन का संदेह प्रकट किया।
-‘क्योंकि मैं बिकूँगा नहीं!’ थाना इंचार्ज पाटील साहब ने यह कहा तो राकेश फिर असमंजस में आ गया। पाटील साहब भी राकेश के असमंजस को भाँप गए थे, इसलिए आगे बोले, -‘दरअस्ल एसपी साहब इस केस में इंटरेस्टेड हैं और चाहते हैं कि केस का सेटलमेंट बाहर ही हो जाए! और माफ कीजिएगा राकेशजी! लेकिन मेरी सलाह भी हाल-फिलहाल में तो आपको यही होगी कि आप इस केस को यहीं छोड़ दें। इससे आपको दो फायदे तो होंगे ही। पहला तो यह कि मि. सक्सेना अब आप पर उस जमीन को खरीदने के लिए प्रेशर नहीं बनाएगा। प्रेशर तो क्या वह अब कोशिश भी नहीं करेगा। दूसरा फायदा यह कि इस केस के सेटलमेंट के लिए आप मनचाही कीमत भी पा सकते हैं।’
थाना इंचार्ज पाटील साहब ने यह बात भले ही सहजता से कही थी, लेकिन राकेश के मन को ठेस लग गई। वह बिना कुछ कहे सीट से खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर जाने की विदा माँगी। पाटील साहब ने उसे रोका तो नहीं, मगर उसे जाते जाते बोले कि -‘देख लीजिएगा मि. राकेश। मैं आपको सही सलाह दे रहा हूँ।’ राकेश ने पलटकर भी नहीं देखा, उसकी आँखें उस समय डबडबा रही थीं।
राकेश ने जब बिसेसर बाबू को थाना इंचार्ज पाटील साहब से हुई बातचीत बताई तो बिसेसर बाबू जैसे शान्त स्वभाव के व्यक्ति को भी बात चुभ गई।
बिसेसर बाबू और राकेश बाद में थाने में गए तो नए थाना इंचार्ज से उनका सामना हुआ। नए थाना इंचार्ज ने उन दोनों को यह कहते हुए उस समय टरका दिया कि वह अभी अभी आया है और जब तक केस को थोड़ा स्टडी नहीं कर लेता, कुछ भी नहीं कर पाएगा। बिसेसर बाबू उस समय तो थाने से लौट आए मगर लौटते लौटते नए थाना इंचार्ज को यह सूचित भी करते हुए आए कि दो दिन बाद वे फिर आएँगे और अगर उनकी माँग नहीं सुनी गई तो फिर वे मीडिया में जाएँगे और मि. सक्सेना और उनके बेटे का सब किया धरा उजागर कर देंगे।
इस बीच लोरी की जिंदगी वापस पटरी पर आने लगी। उसने फिर से स्कूल जाना और कोचिंग जाना भी शुरू कर दिया। किन्तु महज तीसरे ही दिन कोचिंग से लौटते समय वह एक अनियंत्रित कार की चपेट में ठीक उसी बस स्टॉप पर फिर से आ गई, जहाँ से कभी उसका अपहरण हुआ था। लोरी को इस दुर्घटना में गम्भीर चोटें आई हुई हैं।
आज पाँच दिन हो गए हैं, लोरी जिला अस्पताल के आईसीयु वार्ड में भर्ती है। जिंदगी और मृत्यु के बीच उसका संघर्ष जारी है। वार्ड के बाहर उसके माता-पिता और लोरी का छोटा भाई दैविक अपनी समस्त पवित्र प्रार्थनाओं के साथ किसी अच्छी खबर की उम्मीद में आस बाँधें बैठे हैं।
इधर थाने में जब कभी लोरी के एक्सीडेंट वाले केस के बारे में पूछा जाता है, तब एक ही जवाब मिलता है कि केस की जाँच चल रही है।
विनीत सक्सेना अभी भी फरार ही बताया जाता है। मि. सक्सेना अपने बेटे के किये धरे पर लिपा-पोती करने में और ऊपर से नीचे तक सेटिंग करने में व्यस्त हैं, इसलिए बिसेसर बाबू वाली उस जमीन को लेकर वे फिलहाल नहीं सोच रहे हैं, लेकिन यह सिर्फ हाल फिलहाल के लिए है। यानी योजना सिर्फ स्थगित हुई है, खत्म नहीं हुई है। और फिर मि. सक्सेना नहीं तो और कोई ? आवारा पूँजी की गिद्ध नज़रें उस जमीन के टुकड़े पर गड़ी हुई हैं!
और इधर अब मीडिया को इतने समय बाद इस केस में कुछ ‘एक्सक्लुसिव’ नज़र नहीं आ रहा है। मैं आपको यह कहानी तो बता रहा हूँ, किन्तु मैं अपना भी सच जानता हूँ और आपको बताता हूँ कि मैंने लोरी के केस पर कईं बार अपने न्यूज़ चैनल के लिए ‘स्टोरी’ बनाई है, मगर मेरे चैनल हेड को इसमें कुछ सनसनी नज़र नहीं आई या शायद वे इसे चैनल पर चलाने की रिस्क नहीं लेना चाहते हैं!
और उधर बिसेसर बाबू सुमित्रा के साथ जब कल अस्पताल से निकले तो जिला कलेक्टर कार्यालय परिसर के बगीचे में स्थापित गाँधी प्रतिमा के सामने अन्न जल त्याग कर अनशन पर बैठ गए हैं। इस लेखक को यह विश्‍वास है कि उनके अनशन में धीरे धीरे और लोग भी शामिल होते चले जाएँगे, क्योंकि जिस बुढ़े की प्रतिमा के सामने वे बैठे हैं, उस सिन्ड्रोम से सिर्फ बिसेसर बाबू ही नहीं, दुनिया के बहुत से लोग ग्रसित हैं।
मैं आज ही से उनके अनशन में शामिल हुआ हूँ, हो सके तो आप भी आइए। हमें आपकी जरूरत है।
होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए,
इस परकटे परिन्दे की कोशिश तो देखिए।
- दुष्यन्त कुमार

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

यारेग़ार : दिव्या विजय

●यारेग़ार
●दिव्या विजय

चौदह जनवरी का दिन, गुलाबी ठण्ड और गुलाबी शहर। आसमान पतंगों से अटा था और हर तरफ ‘वो काटा, वो मारा’ की आवाज़ें आ रही थीं। मैं और अद्वैत पुराने शहर के बीचोंबीच चौगान स्टेडियम आये थे। चौगान स्टेडियम यानी पतंगबाज़ों का अड्डा। जितने रंग ज़मीन पर, उस से ज़्यादा रंग आसमान में खिलते हैं आज के दिन। हर आकार की सैकड़ों पतंगें इतराती हुईं गुत्थमगुत्था हो रही थीं। पतंगबाज़ी...अद्वैत का पसंदीदा खेल, बचपन से अब तक। जितने दिन देश के बाहर रहे, उतने दिन यही इकलौता त्योहार था जब अद्वैत को उदास घेर लेती। अरसे बाद आज के दिन हम अपने देश में हैं तो यहाँ चले आए। यहाँ हैरान कर देने वाला ख़ूबसूरत नज़ारा था। लक-दक करते रंगीन कपड़ों में लोग, बच्चों से लेकर बड़ों तक के हाथ में अलग आकार की पतंग। जो पतंग उड़ाना नहीं जानते, वे अपने साथी की चरखी पकड़े बराबर उसका साथ दे रहे थे। कुछ ऐसे भी लोग थे जो कटी हुई पतंगें इकट्ठी करने के लिए इधर से उधर भाग रहे थे। वे पतंग लूटने के अभ्यस्त थे। कूदते-फाँदते, भीड़ के बीच जगह बनाकर वे क्षण भर में वहाँ पहुँच जाते जहाँ कटी हुई पतंग जा गिरी होती। कुछ लोग ऐसे भी थे जो कुछ नहीं कर रहे थे। बस आसमान में लड़ी जा रही लड़ाई की निशानदेही कर रहे थे। कौन-सी पतंग को कौन-सी पतंग काटेगी और कौन-सी पतंग पहले धराशायी होगी इसका कयास लगाते हुए टिप्पणी में व्यस्त थे। उनकी सारी इन्द्रियाँ जैसे आँखों में सिमट आई थीं। समय उनकी आँखों में आ ठहर गया था, आसमान उनकी आँखों में आ सिमट गया था।

‘‘देखो निशि, वो मालाधारा पतंग देख रही हो, उसे काटते हैं। तुम बस चरखी ठीक से पकड़ना।‘‘ अद्वैत ने हुलस कर कहा।

मैं आसमान में अद्वैत की बताई पतंग ढूँढ़ने की कोशिश कर रही थी। जिस पतंग के ऊपरी सिरे पर पट्टी बनी हो वह पतंग हुई मालाधारा। पतंगों के ये नाम मुझे अद्वैत ने ही सिखाये थे। जिस पतंग पर जो आकृति, उस से मिलता-जुलता उसका नाम। आँख बनी हो तो आँखधारा, बीच में एक चौखाना हो तो चौपड़धारा।

‘‘अगर आपको उज्र न हो तो आप मेरी बात सुनेंगे?‘‘ भारी मर्दाना आवाज़ सुनाई दी। मैंने पलट कर देखा तो एक लम्बा आदमी अपने कंधों को झुका कर कुछ कह रहा था।

‘‘जी, मैं आप ही से मुख़ातिब हूँ।‘‘ उसने अद्वैत की ओर इशारा किया।

‘‘आप उस पतंग पर निशाना साधिये जिस पर चाँद की शक्ल बनी हुई है।‘‘

‘‘चाँदधारा की बात कर रहे हैं आप?‘‘

‘‘जी, आप के यहाँ शायद इसे यही कहते हैं। बात ये है कि हवा का रुख़ इस ओर का है तो जिस पतंग को आप काटना चाह रहे हैं वो ऐन वक़्त पर अपना भार आपकी पतंग पर डाल देगी और आपकी पतंग कट जायेगी।‘‘

मैंने आश्चर्य से आसमान की ओर नज़रें घुमाई। अद्वैत की पतंग डोर का साथ छोड़ चुकी थी और डगमगाती हुई नीचे आ रही थी। वहाँ इतनी दूर क्या होने वाला है, इस आदमी को सब मालूम है। वह आदमी मुझे भविष्यवक्ता से कम नहीं लगा। मैंने दिलचस्पी से उसको देखा। ख़ालिस सफ़ेद कोट पैंट यहाँ के वातावरण के लिए मुफ़ीद भले ही न हो पर छः फुट लम्बे उस आदमी पर बहुत जँच रहा था। उसके चेहरे की लकीरों का उसके उम्रदराज़ दिखने से कोई रिश्ता नहीं था। वहाँ कुछ और था जिसने उसकी आँखों की रंगत बदल दी थी। हलके हरे रंग की झाईं आँखों से झाँक रही थी।

‘‘वाह, आपको तो बहुत जानकारी है। क्या आप पतंग उड़ाना चाहेंगे?‘‘ कहते हुए अद्वैत ने एक पतंग उसकी ओर बढ़ाई। वह चिहुँक कर दूर हटा जैसे पतंग अस्पृश्य हो।

‘‘नहीं, मैं अब पतंग नहीं उड़ाता।‘‘

मेरी सुई ‘अब’ पर जाकर टिक गयी। मतलब पहले पतंग उड़ाते थे। मैं उनसे कोई प्रश्न कर पाती वह तब तक आगे बढ़ चुके थे। बाक़ी लोगों को सलाह देते हुए वह जैसे किसी समाजसेवा में रत थे।

‘‘चलो, चाय पीकर आते हैं। वापस आकर पतंग उड़ायेंगे।" एक और पतंग कटवा कर, अद्वैत और मैं स्टॉल की तरफ़ बढ़ चले। रास्ते में वह हमें फिर दिखे। मैदान में बैठे एक छोटे बच्चे को पतंग उड़ाने के गुर सिखाते हुए। बच्चे की आँखें कंचे के भीतरी भाग जैसी चमक रही थीं। लेकिन पतंग को हाथ उन्होंने तब भी नहीं लगाया था।
अद्वैत उन्हें देखते ही ख़ुशमिज़ाजी से बोले, ‘‘चलिए, आपको चाय पिला कर लाते हैं।‘‘

उम्मीद के खिलाफ़ वह एक ही बार में खड़े हो गए। ‘‘चलिए, चाय की तलब तो मुझे भी महसूस हो रही है। बहुत देर हो गयी।‘‘

‘‘आप क्या यहाँ बहुत देर से हैं?‘‘ मैंने सवाल पूछा।

उन्होंने इसका जवाब बहुत दूर कहीं शून्य में देखते हुए गर्दन हिलाकर दिया जिसका मतलब हाँ भी हो सकता था और न भी। मैं ग़ौर से उन्हें देखा। आँखों में अधीरता थी।

‘‘कौन से इलाके में रहते हैं आप?‘‘

‘‘मेरा पक्का ठिकाना नहीं है। कारोबार के सिलसिले में कभी यहाँ तो कभी वहाँ।‘‘

‘‘फिर भी, मूलतः कहाँ से हैं?‘‘

"जहाँ से मैं हूँ, वहाँ का अब नहीं रहा।"
यह कहकर वह चुप हो गए। चुप बाहर से ज़्यादा भीतर बज रही थी। उनकी चुप, चुप भर नहीं थी...एक भरा-पूरा जीवित व्यक्ति थी जिसका एक अंश हमारे सामने बैठा था। देर तक उनकी चुप्पी टंकार करती रही। मैंने देखा उनकी आँखों में दो रंग ओवरलैप होकर एक रंग में बदल रहे थे। पूरी दुनिया को लाँघते हुए वहाँ हिन्दू कुश कोहसार आ खड़ा हुआ। वहीं थी हिन्दू कुश की सबसे ऊँची चोटी…तिरिच मीर। सुफ़ेद बर्फ से ढकी...ऐसा सुफ़ेद जो देखने भर से मैला हो जाए। ऐसा सुफ़ेद जो आँखों पर सुकून के फ़ाहे रख दे। बर्फ़ जो गद्दों से ज़्यादा गदबदी और मोगरे की मानिंद नर्म थी।

हिंदू कुश से आ रही काबुल नदी शहर के बीचोंबीच बह रही थी। वहीं थे काबुल के बाज़ार...केसर की मीठी गंध, मसालों की तेज़ महक, पुदीने की कच्ची ख़ुशबू में लिपटे, रेशमी लिबासों की सरसराहट से भरे। ताज़ा माँस, रसीले फलों और उबलती चाय के साथ थी वहाँ पतंगों की फरफराहटें। महल, मस्जिद और बाग़-बगीचे पुराने दिनों की शान-ओ-शौकत की गवाही दे रहे थे।

लेकिन आज...आज पुल-ए-ख़िश्ती पर ये कैसी भगदड़ मची थी! सब जल्द से जल्द घर पहुँच कर अपने घर के औरतों-बच्चों को ख़बर दे देना चाहते थे। हुजूम के हुजूम बसों में लटके हुए इस पर बहस कर रहे थे। राह चलते लोग मुबाहिसों में उलझे थे। आसमान में नारे थे। आवाज़ों को चुप करातीं चीखें थीं।

‘‘हमें घर के अन्दर रहने में तकलीफ़ नहीं है लेकिन बच्चों के पसंदीदा खेल...उन पर रोक लगाकर क्या हासिल होगा।‘‘ एक औरत नाक सुड़कते हुए कह रही थी। नाक...लाल, नुकीली नाक। जैसे सुफ़ेद रंग में लाल गुलाब का अर्क मिला दिया गया हो। मेरी नज़र सामने बैठे आदमी की आँख से होते हुए नाक पर टिक गयी। यह नाक उस नाक की तरह शोख़ नहीं थी। चाय की भाप के साथ यहाँ संजीदगी जमी हुई थी।

‘‘अली और फ़रहाद को समझा देना अफ़शीन। ऊल-जुलूल काम छोड़कर पाँचों वक़्त नमाज़ अदा करने की आदत डाल लें। दिन भर की आवारागर्दी की आदत से निजात पा लें तो उन्हीं के लिए बेहतर होगा।‘‘ आदमी ने खिड़की पर परदे लगाते हुए कहा। उसकी आवाज़ नर्म होते हुए भी लहज़ा सख़्त था।

‘‘हामिद, लेकिन सुनिए तो...‘‘

‘‘ताश, शतरंज, किताबें, फ़िल्में सब एक जगह इकट्ठा कर देना। शाम तक सब ठिकाने लगा दूँगा।‘‘ हामिद नाम का वह आदमी डरा हुआ था और एक ज़िद भी उसकी आवाज़ में झाँक रही थी। नजीबुल्लाह और उसके भाई को गोली मार दी गयी। दो मुर्दा जिस्मों को ट्रक से बाँध कर सरेआम गलियों में घसीटा गया और आज उनके बेजान बदन को नुमाइश के लिए रखा गया। जिन्हें अल्लाह का ख़ौफ़ नहीं, जो इस हद तक जा सकते हैं, वे कुछ भी कर सकते हैं। वह किसी हालात में अपने अजीज़ों को नहीं खो सकता। अफ़शीन ख़ौफ़ की ज़द में न आ जाए इसलिए हामिद ने असल वजह नहीं कही।

‘‘क्या आप वाकई…?‘‘ अफ़शीन को ताज्जुब हुआ। उसका ख़ाविंद...किताबों और फ़िल्मों का शौकीन। कई दफ़ा वह भी उसकी तवज्जो के लिए झगड़ बैठती थी। वही आज एक एलान से डरकर सब ख़त्म कर रहा है। लेकिन अफ़शीन ने वह नहीं देखा था जो हामिद देख कर आ रहा है। ख़ून में लिथड़े दो मुर्दा जिन्हें एलानिया तौर पर एक खम्भे से लटका दिया गया। बहुत सारे लोग ख़ुश थे लेकिन उसे आने वाले दिनों की दहशत का अंदाज़ा हो चला था। नजीबुल्लाह की नीतियों से बहुत ख़ुश वह भी नहीं था लेकिन आदमी कैसा भी हो मौत के बाद यह बर्ताव वहशियाना है...बेहद वहशियाना। दोनों को नामर्द बना दिया गया था। जिस्मानी अज़ीयत की इन्तेहाँ उनके जिस्म पर नमूदार थी। कितने बदतरीन और बददिमाग़ हैं वे। सोच कर हामिद काँप गया।

‘‘देखो अफ़शीन...मैं कायदे से बाहर नहीं जाना चाहता। तुम लोगों की सलामती से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं है।‘‘ हामिद का सख़्त लहज़ा सुन अफ़शीन मुड़ गयी थी।

‘‘और हाँ अली-फ़रहाद का पतंग से जुड़ा जो भी सामान हो लेती आना।‘‘

आह! अभी कुछ दिन पहले ही तो हामिद दोनों को पतंगबाज़ी के गुर सिखा रहे थे। पतंग उड़ाना दोनों के लिए तफ़रीह का ज़रिया नहीं है। जान बसती है दोनों की, इस खेल में। घंटों तक भूखे-प्यासे रहकर इस खेल में डूबे रहते हैं दोनों भाई। दोनों का ख़्वाब है कि क़ाबिल पतंगबाज़ बनें। दोनों को इतनी सी उम्र में इस खेल के कितने राज़ मालूम हैं। इस खेल की ढेरों बातें उनकी कॉपी में लिखी हुई हैं। पहले उसे लगता था कि यह सब वक़्त की बर्बादी है लेकिन दोनों की संजीदगी देख उसने रोकना-टोकना बंद कर दिया था। वे सब कुछ छोड़ सकते हैं लेकिन पतंग उड़ाना नहीं। दोनों भाई दो साल छोटे-बड़े पर दोनों को जुदा करना नामुमकिन। एक दूसरे के ऐसे साथी कि अच्छे-अच्छे रश्क कर उठें। पतंग के सिवा उनका कोई तीसरा दोस्त न था।

(उस शख़्स की आँखों में अज़ीयत की परछाई थी।)

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‘‘अलीSS क्या कर रहा है? चरखी ठीक से पकड़। ध्यान कहाँ है तेरा? ढील दे, ढील दे। देख वो पीली वाली पतंग दिख रही है? उसे काटेंगे।‘‘ फ़रहाद की नज़र आसमान में जमी हुई थी। पीछे खड़े अली से बात करते हुए, सैकड़ों मील दूर से पतंग की निगहबानी कर रहा था। पतंग उड़ाने में दोनों का कोई सानी नहीं था। दोनों स्कूल से भागकर पतंग उड़ाने मैदान में चले आते। छुट्टी के बाद घर की छत दोनों का अड्डा बन जाती।

‘‘वो तुक्कन है तुक्कन। उसे सम्भालने के लिए नौ तार का माँझा लगता है। हमारा माँझा कमज़ोर है फ़रहाद। वो हमारे माँझे से नहीं कटेगी।‘‘ अली की नज़र और समझ दोनों तेज़ थीं।

‘‘अब्बा जान से कहकर हम नौ तार का माँझा मँगवाएंगे। सबकी छुट्टी हो जायेगी।‘‘ फ़रहाद ने हिम्मत नहीं हारी थी। लेकिन चील पतंग को पटखनी देने के चक्कर में वो अपनी पतंग कटवा बैठा।

‘‘नहीं भाईजान... बारह तार का मंगवाएंगे। उसके आगे अच्छे-अच्छे पानी भरेंगे।‘‘ अली ने पास पड़े पत्थर पर बैठते हुए कहा। सूरज की रोशनी उसकी पेशानी को चूम रही थी।

‘‘चमन-ए-बबराक चलेंगे इस बार अम्मी-अब्बू के साथ। तू बनेगा चरका गिर और मैं गुड़ीपरन बाज़। जंग होगी जंग।‘‘ फ़रहाद उचक कर मैदान के चबूतरे पर जा चढ़ा।

‘‘ओये, इतना ऊँचा सोचने से पहले अपने मोहल्ले का शर्ती का ख़िताब तो ले लीजिये।‘‘ अली ने उसके पंख कतरे। ‘‘उधर देखिये, फरफरा...उसको काटते हैं।‘‘ कहते हुए अली अफ़गानिस्तान ज़िंदाबाद लिखी पतंग में तंग डालने लगा। ‘‘इस पतंग को नहीं कटने देंगे।‘‘

‘‘छोड़ यार। शुर बाज़ार चलते हैं। नूर चचा से चार पर्चे वाली पतंग लाते हैं।‘‘

‘‘अफ़गानी हैं?‘‘

‘‘नहीं। तेरे पास?‘‘

‘‘मेरे पास भी नहीं। चल घर चलते हैं। वहाँ से चलेंगे।‘‘

दोनों अपना सामान समेट कर घर की तरफ़ चल पड़े। लेकिन आज कुछ अलहदा बातें उनके इंतज़ार में थीं। दुनिया में रहकर भी उस से बेख़बर हों वे थे अली और फ़रहाद। उनकी दुनिया तो आसमान में बसती थी।

(परछाई का रंग रुपहला हो चला था।)

उन्नीस सौ छियानवे का सितम्बर। सर्दियाँ अभी आई नहीं थीं लेकिन रात की तपिश ज़रा कम हो गयी थी। बन्दूक और बारूद यहाँ की हवा में बरसों से घुले थे लेकिन अब हवा का भारीपन बढ़ गया था। आती हुई घुटन की दस्तक हर गली, हर मोड़ पर थी। साँस लेना मुहाल पहले से था, अब ज़िंदा रहने की तरकीबें करनी थीं। कंधार से चलकर तालिबानी काबुल आ पहुँचे थे। बहुत-से लोगों ने उनका इस्तक़बाल किया था। उन्हें बेहतरी की उम्मीद थी कि कम्युनिस्ट और मुजाहिद्दीनों ने मुल्क का जो बेड़ा ग़र्क़ किया था वो अब ख़ुश दिनों में बदल जायेगा। दिनों के बदलने की शुरुआत हो चुकी थी। गाड़ियाँ पाबंदियों का एलान करती घूमने लगी थीं। वे कहाँ जानते थे जिन लोगों की जड़ें नहीं होतीं वे मुल्क की जड़ों को भी खोखला कर देते हैं।

‘‘अली, फ़रहाद और शीर ध्यान से सुनो। हुकूमत बदली है। नए हुक्मरानों के अपने दस्तूर हैं। हम उन्हें बदल नहीं सकते, उनके खिलाफ़ नहीं जा सकते। शीर तुम अम्मी के काम में हाथ बँटाओगी।‘‘

‘‘लेकिन मेरा स्कूल?‘‘ एक कमज़ोर मगर मीठी आवाज़ गूँजी।

आठ साल से बड़ी लड़कियों को स्कूल भेजना मना हो चुका था। लेकिन हामिद बच्चों के आगे ये नहीं कहना चाहता था। शीर के मन में फ़र्क न आये इसलिए हामिद ने जी सख़्त कर एक और फ़ैसला लिया था। अली और फ़रहाद को स्कूल न भेजने का। यूँ भी ऐसी फ़िज़ाँ में वह अपने बच्चों को आँख के आगे रखना चाहता था।

‘‘अली, फ़रहाद तुम मेरे साथ दुकान पर चलोगे।‘‘ हामिद ने शीर के सवाल को नज़रअंदाज़ करते हुए दोनों लड़कों से कहा।

सुनते ही दोनों के मुँह लटक गए। अब्बा जान के साए तले रहना मतलब सख़्त पहरे में रहना। उन्होंने इल्तिज़ा करती निगाहों से अम्मी को देखा। अफ़शीन ने निगाहों में ही मुस्कुरा गर्दन हिला दी। दोनों मुतमइन हो गए कि चलो अम्मी तो हमारे साथ हैं। लेकिन बेचारी शीर...सिर्फ़ आठ साल की उम्र में उसे घर में बंद हो जाना पड़ेगा। उन्होंने शीर के सर पर हाथ फिराया और उसे दूसरे कमरे में ले जाकर खेलने लगे। उन्हें मालूम था शीर को पढ़ने का कितना शौक़ था। ख़ुद से ज़्यादा उदास वे शीर के लिए थे।

आने वाली शाम उनके घर का बहुत-सा सामान आग के सुपुर्द हो गया। लेकिन अली और हामिद की उम्मीद अभी ख़त्म नहीं हुई थी, उनका शौक अभी बचा था, हसरतें अभी मरी नहीं थीं। अपनी पतंगें, चरखियाँ, माँझे सब उन्होंने अम्मी को यक़ीन में ले छिपा दिए थे।

‘‘हम पतंग उड़ाना जारी रखेंगे। फ़न को बार-बार अमल में नहीं लायेंगे तो फ़न भी हमसे बेपरवाह हो जाएगा।‘‘ फ़रहाद ने अली को सीख दी।

‘‘हाँ, थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा। सब ठीक नहीं भी हुआ तो पतंग से कौन हमेशा के लिए दूर रह सकता है। अगले जुम्मे ही देखना...पेंच लड़ने शुरू हो जायेंगे।‘‘ अली न सिर्फ़ अपने भाई पर यक़ीन करता था बल्कि अपने भाई के यक़ीन को और पुख़्ता करता चलता था।

फ़रहाद ने अपने भाई को मुहब्बत से देखा और कहा, ‘‘आमीन।‘‘

अगले से अगला जुम्मा और फिर कई जुम्मे गुज़र गए लेकिन कुछ नहीं बदला। शीर घर का काम सीखते-सीखते अपने स्कूल को याद करती। अली-फ़रहाद ने मन मार कर दुकान का रुख़ कर तो लिया लेकिन पतंगबाज़ी का ख्व़ाब हर लम्हा दोनों के साथ रहता। गोश्त छीलते-काटते दोनों पतंग की बातें करते। पतंग की क़िस्मों से लेकर अहम् तवारीख़ों तक पर तज़किरा होता।

उस रोज़ अम्मी की तबियत नासाज़ थी तो उनका ख़याल रखने के लिए अब्बा जान उन्हें घर छोड़ गए। अम्मी ऐसे हाल में भी उदास-सी ऊन और सलाईयों में उलझी हुई थीं। शीर कहीं से उड़ कर आ गए फटे पन्ने पर छपी कहानी पढ़ने के बाद आगे क्या होगा के क़यास लगा रही थी। दोनों ने आँखों ही आँखों में कुछ इशारा किया और बुखारी में छिपाई पतंग-चरखी ले छत पर जा पहुँचे। पतंग को छूते ही उनके ज़ेहन में ख़ुशी का ऐसा दरिया बहा कि आसमान भी डूब गया। दोनों पतंग को अलग-अलग कोण से छू कर देखते और रोने-हँसने के बीच की कोई आवाज़ दोनों के गले से फूट पड़ती। दोनों पतंग को गले लगा कर देर तक बैठे रहे। हवा ने दोनों के साथ मिलकर जैसे कुछ तय किया और थमी हुई हवा अब चलने लगी। वे पतंग में तंग डालने लगे। अली ने छुट्टी देने के लिए पतंग पकड़ी ही थी कि अफ़शीन ऊपर आ गयी।

‘‘क्या कर रहे हो?‘‘ उनके हाथ में पतंग देख अफ़शीन आशुफ़्तगी से भर गयी।

‘‘कुछ भी तो नहीं अम्मी।‘‘ हँसते हुए फ़रहाद ने कहा। दोनों ने पतंग छिपाने की ज़हमत भी नहीं उठायी थी। उन्हें यक़ीन था अम्मी अभी थोड़ी-सी नसीहत देकर नीचे चली जायेंगी।

हँसते-मुस्काराते लड़कों पर अफ़शीन को एक लम्हे के लिए प्यार आया। फ़रहाद का कद अब उसके कंधे छूने लगा था। कुछ दिनों में ही उस से ऊँचा निकल आएगा। कितने दिनों बाद उसे हँसते देखा है। नहीं तो सारा दिन दुकान के काम में ग़ाफ़िल होकर थके-हारे घर आकर सो जाते हैं। इनकी उम्र ही क्या है भला। उसने हामिद को कहा था शीर न सही, इन दोनों को तो स्कूल भेजे। हामिद मान भी गया था लेकिन मालूम हुआ कि स्कूल ही बंद हो गया। पढ़ाने वाली सब उस्तानियाँ थीं और औरतों के काम करने पर रोक लगा दी गयी थी। जब तक कोई और इंतज़ाम नहीं हो जाता यही हालात रहने वाले हैं। उसने उदासी से दोनों को देखा जो उसकी तरफ़ रोशन निगाहों से देख रहे थे। उसने हाथ बढ़ाया तो लड़कों ने उसे भी अपने खेल में शरीक समझ पतंग उसके हाथ में दे दी। उसने पतंग फाड़ दी। दोनों उसे फटी निगाहों से तब तक देखते रहे जब तक वह उन्हें नीचे आने की ताक़ीद कर ज़ीने में गुम न हो गयीं। अफ़शीन ने पिछले हफ़्ते हामिद के साथ बाज़ार जाते वक़्त दो बच्चों को पतंग उड़ाने के ‘जुर्म’ में बेरहमी से पिटते देखा था। अभी तक सब रोज़मर्रा की क़वायद समझने वाली अफ़शीन को तब मामले की संजीदगी का अहसास हुआ था।

लेकिन अली और फ़रहाद की हैरत चंद लम्हों की मेहमान थी। अम्मी के क़दमों की आहट जैसे ही मद्धम हुई वैसे ही दोनों के मन फिर उड़ने लगे।

‘‘अब क्या करें? ‘‘

‘‘घर में पतंग उड़ाना नामुमकिन है और बाहर जाकर उड़ाना उस से भी मुश्किल।‘‘

‘‘पतंग उड़ाना छोड़ देंगे तो जीतना भूल जायेंगे।‘‘

‘‘मुश्किलों को जो हरा दे उस का नाम है फ़रहाद और उसका साथी कहलाता है अली।‘‘ बॉलीवुड के दीवाने फ़रहाद ने फ़िल्मी अंदाज़ में कहा।

‘‘दुकान के पास एक ख़ाली घर है जिसकी छत बम धमाकों में उड़ गयी थी। कल अब्बा खाना खाने घर आयेंगे तो हम पीछे से वहाँ चलेंगे।‘‘

‘‘और पतंग?‘‘

‘‘नूर चचा हैं न।‘‘

अली का चेहरा खिल उठा। दोनों रात भर मंसूबे बाँधते रहे। अंत में जब नींद आई तो दोनों के ख़्वाब में भी पतंगें ही थीं।

सुबह दोनों ने दुकान की ओर क़दम बढ़ाये तो उन्हें लगा वे पतंग की तरह उड़ रहे हैं। हर पल वे दोपहर का इंतज़ार कर रहे थे। आज की दोपहर बड़े दिनों बाद ख़ुशनुमा होने वाली थी। आख़िरकार खाने का वक़्त हुआ तो हामिद उनको दुकान ठीक से देखने की हिदायत दे निकल गए। इधर हामिद गए, उधर आसिफ़ चचा को दुकान सँभालने को कह वे भी नौ-दो ग्यारह हो गए। वे जितनी तेज़ी से भाग सकते थे, उतनी तेज़ी से भागते हुए नूर अहमद की दुकान पर पहुँचे। पर यह क्या, दुकान तो बंद थी। वे सकते में थे। नूर चचा की दुकान भी बंद हो सकती है, उन्होंने तो सोचा ही नहीं था। थोड़ा आगे जाकर देखा तो शुर बाज़ार की वह पतली तंग गली जो पतंगों से गुलज़ार हुआ करती थी, अब सूनी पड़ी थी।

‘‘चल किसी से पूछते हैं।‘‘ फ़रहाद ने अली को कोहनी से खींचते हुए कहा।

‘‘चचा नूर कहाँ हैं?‘‘ उन्होंने कालीन बेचने वाले एक शख़्स से पूछा।

‘‘होंगे कहाँ? अपने घर होंगे। किसी का कारोबार बंद हो जाए तो वो कहाँ हो सकता है?‘‘ शख़्स ने कालीन पर से धूल झाड़ते हुए कहा।

‘‘क्या?‘‘ दीन-दुनिया एक तरफ और नूर चचा की पतंगें एक तरफ़। दुनिया इधर से उधर हो जाए, यह दुकान बंद नहीं हो सकती।

‘‘अरे मियाँ, कौन सी दुनिया में रहते हो? हुक्म नहीं सुना तुमने?‘‘ एक ख़फा-सी आवाज़ अन्दर से आई।

‘‘सुना तो है।‘‘ बुझे मन से दोनों एक साथ बोले पर उस हुक्म का असर नूर चचा की दूकान पर होगा, दोनों का इसका अंदाज़ा नहीं था। नूर अहमद, नूर अहमद नहीं पतंगों की दुनिया के रहनुमा हैं। हाथ से पतंग बनाने वाले नूर अहमद अच्छी-अच्छी मशीनों को मात देते हैं। ख़ानदानी पेशा है ये उनका जिसकी मशाल अकेले अपने दम पर जला रखी है। बेगम उनकी भरी जवानी में ही मर-खप गयीं। बच्चे जो हुए, बचे नहीं। बचे नूर अहमद और उनकी क़ाबिल पतंगें जो हवा के बोसे के साथ ही आसमान को गले लगा लेती हैं।

‘‘उनके घर चलते हैं।‘‘ फ़रहाद ने झट फैसला लिया। अली पल भर के लिए हिचका लेकिन तुरंत फ़रहाद का हाथ पकड़ कर गली के दूसरे सिरे पर दौड़ लगाने लगा। गली से निकल कर दो सड़क पार कर आएगा नूर चचा का घर। रास्ते में थे ग़श्त लगाते तालिबानी। ज्यादा बड़े तो नहीं लगते। पड़ोस वाले मुस्तफ़ा भाईजान जितने। इनका मन नहीं होता होगा पतंग उड़ाने का। लेकिन उनके चेहरे पत्थर की तरह सख़्त थे। दोनों उन नज़रों की ज़द में आये बिना निकल जाने चाहते थे। उनकी लाल आँखों से उन्हें डर लगा। अगर उन्होंने पूछ लिया कहाँ जा रहे हो तो वे क्या कहेंगे। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे चुपचाप निकल कर नूर के घर तक आ पहुँचे।

नूर अहमद सर झुकाए घर के बाहर बैठे थे। उनका घर एक छोटी कोठरी में समाया था जिसका दरवाज़ा गली में खुलता था। वहीं गली और घर के बीच एक चबूतरे पर बाँस की कुछ खपच्चियों को उँगली में फँसाए बैठे थे। कोई आहट, कोई सरगोशी उन पर असर नहीं कर रही थी। उनके सफ़ेद बाल मुरझा गए थे। उनके हाथों की जिल्द अपनी रौनक खो बेजान सफ़ेद-सी हो चली थी।

‘‘चचा।‘‘ धीरे से फ़रहाद ने कहा। लेकिन वो उसी तरह बैठे रहे।

इस बार अली ने उनके क़रीब जाकर उनके कंधे पर हाथ रख कहा, ‘‘चचा, पतंग चाहिए।‘‘

पतंग शब्द ने जैसे जादू का काम किया। उन्होंने सर झट से ऊपर उठाया। ग़मगीन आँखों में ख़ुशी की सतर चमक उठी और तुरंत बुझ गयी।

‘‘उड़ाओगे कहाँ पतंग छोटे मियाँ?‘‘

‘‘हमें कुछ महफ़ूज़ जगह मालूम हैं। वे इस ज़मीन पर अपना हक़ भले ही जता लें, आसमान को काबू में कर सकते हैं क्या?‘‘ कहीं सुनी हुई बार फ़रहाद ने दोहरा दी। अली ने गर्दन हिलाई जैसे सब समझता हो।

‘‘लेकिन, नज़र तो उनकी आसमान पर भी रहती है बच्चे।‘‘ नूर अहमद ने मुस्कुरा कर कहा।

दोनों पशोपेश में आ गए कि क्या जवाब दें।

‘‘वादा करो कि हिफाज़त से रहोगे। इसी शर्त पर पतंग दूँगा। दुकान का सारा सामान तो कमीनों ने जला दिया लेकिन मैंने नयी पतंगें बनायीं हैं...छिपा कर रखी हैं।‘‘ नूर अहमद सरगोशी करते हुए अपनी कोठरी के भीतर जाने के लिए उठे। उनकी चाल में बच्चों का सा जोश आ गया था।

‘‘हाँ चचा, आप फ़िक्र न कीजिये। हम अपना ख़याल रखेंगे।‘‘ उनके पीछे दोनों क़दम से क़दम मिला कर चल पड़े। दोनों के अन्दर रोमांच और ख़ुशी का सोता फूट रहा था।

नूर अहमद ने अपनी कोठरी की छत पर से सीमेंट का एक टुकड़ा हटाया और टटोल कर करीब आठ-दस पतंगें निकाली। आहा! रंग-बिरंगी पतंगें। गुड्डी, डेढ़ कन्नी, तुक्कल सब उनके सामने थीं। दोनों उन पर ऐसे झपट पड़े जैसे उनके सामने किसी ने शीर ख़ुरमा परोस दिया हो। उन्होंने आधे पर्चे वाली सबसे छोटी तीन पतंगें उठा लीं।

‘‘ये भी ले जाओ।‘‘ बाक़ी पतंगों की ओर उन्होंने इशारा किया।

‘‘हमारे पास इतने अफ़गानी नहीं हैं।‘‘ हसरत से दोनों पतंगें देख रहे थे।

‘‘नहीं अफ़गानी देने की ज़रुरत नहीं है बच्चे, यूँ ही ले जाओ। जितनी भी उम्र बची है उसमें दो समय का खाने लायक अल्लाह ने दे रखा है। ख़ुदा ने चाहा तो वक़्त बदलेगा और ख़ूब पतंगें उडाई जायेंगी।‘‘ उन्होंने ऊपर कहीं देख कर कहा।

दोनों कुछ समझे, कुछ नहीं।

‘‘पेंच किस से लड़ाओगे।‘‘ नूर अहमद ने बात बदली।

दोनों चुप। किस से लड़ायेंगे पेंच भला। नूर अहमद मुस्कुराये।

‘‘तुम दो हो न? आपस में पेंच लड़ाओ। बिना पेंच लड़ाए भला पतंगबाज़ी में क्या मज़ा। जंग नहीं लड़ोगे तो जीतोगे कैसे?‘‘ उन्हें अपनी जवानी के दिन याद आ गए। अब तो जिस्म में इतनी ताक़त ही नहीं बची कि पतंग उड़ा सकें। उन दिनों जब तक चार-पाँच पतंग न काट दें खाना हज़म नहीं होता था। उन्होंने अपना संदूक खोला। ‘‘ये कुछ चरखियाँ ले जाओ। अभी तक तुम में से एक चरकागिर होता होगा। अब से अपनी-अपनी चरखी खुद सँभालना। देखो ऐसे।‘‘ कहते हुए नूर अहमद ने बाएँ हाथ की कोहनी में चरखी दबा कर दिखाई। ये करतब देख दोनों के मुँह से वाह निकल गया। यह तो अब्बा ने बताया ही नहीं था। अब उनमें झगड़ा नहीं होगा कि कौन चरखी पकड़ेगा और कौन पतंग उड़ाएगा। ज़्यादा ख़ुश तो अली था जिसे अक्सर चरकागिर बनना पड़ता था। वह नए सामान को उलट-पलट कर देख ही रहा था कि नूर चचा ने कपड़े का एक बड़ा थैला आगे बढ़ा दिया।

‘‘सारा सामान इसमें रख लो। रास्ते में मत खोलना। किसी महफ़ूज़ जगह जाकर ही खोलना। कोई पूछे तो दिखा मत देना।सीधे भागते हुए घर पहुँच जाना भले ही थैला छोड़ देना पड़े।‘‘

उन्होंने हाँ में गर्दन हिलाई और सोचा थैला तो वे हरगिज़ नहीं छोड़ेंगे।

‘‘तुम नहीं छोड़ोगे तो वे वैसे भी छीन लेंगे।‘‘ नूर अहमद जैसे उनका दिमाग पढ़ रहे थे। ‘‘तुम ख़ुद की हिफाज़त करना। पतंग जाने का ग़म न करना। पतंगें जाती हैं तो जाएँ, मैं और पतंगें बना दूँगा तुम्हारे लिए। मैं न मिलूँ तो तुम्हें मालूम ही हैं कि पतंगें कहाँ से लेनी हैं।‘‘ छत की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा। दोनों ने हाँ कहा और अपनी दूकान की ओर दौड़ चले। जल्द पहुँचना था...अब्बा के आने का समय हो चला था। दोनों बच्चों की पीठ स्याह रात के बीच फ़लक का सितारा थीं और नूर अहमद की आँखें जुगनू हो चली थीं।

वहाँ पहुँचे तो आसिफ़ चचा गोश्त जल्दी-जल्दी दुकान के अन्दर रख, दुकान बंद करने की तैयारी में थे।

‘‘क्या हुआ आसिफ़ चचा।‘‘

‘‘फ़रमान आया है बाज़ार आज बंद रहेगा।‘‘

‘‘क्यों?‘‘

‘‘यूँ ही। तुम लोग सीधे घर जाओ। तुम्हारे अब्बा भी आकर लौट गए हैं।‘‘ क्या कहते कि बदकारी के जुर्म में आज एक औरत पर पथराव होगा। उस औरत का धड़ ज़मीन के नीचे होगा और सर बाहर। सब उस पर तब तक पत्थर फेंकेंगे जब तक वो मर नहीं जाए। ‘‘अल्लाह, कैसे दिन आ गए।‘‘ उन्होंने मन ही मन मरने वाली के लिए फ़ातिहा पढ़ा।

अली और फ़रहाद घर न जाकर सीधे खंडहर हो चुके मकान में जा पहुँचे। सुना था बम गिरने से सोते हुए लोगों के चिथड़े उड़ गए थे। ऊपर की मंज़िलें नीचे वालों पर आ गिरी थीं और आह तक भरने का समय दिए बग़ैर मौत निगल गयी थी उस मकान की हँसी। जो घर किसी की किलकारियों से गुलज़ार रहता था आज एक आहट तक के लिए मुन्तज़िर था। मकान की छतें थी नहीं, फ़र्श दरका हुआ था। जाने कैसे दीवारें बची रह गयी थीं...कुछ निशानों के साथ। उसी मलबे के बीच जगह बनाते हुए फ़रहाद एक जगह आ ठहर गया। यह शायद खुला सहन रहा होगा।

‘‘अली तू उस कमरे से पतंग उड़ाना। मैं इस कमरे से।‘‘ फ़रहाद ने मकान को परखते हुए इशारा किया।

फ़रहाद की बात अली के लिए हुक्म। वो भागा दूसरे कमरे में।

दोनों ने जल्दी-जल्दी तंग डाली, डोर बाँधी और खुला छोड़ दिया पतंग को। वे आज कई दिनों बाद पतंग उड़ा रहे थे। लगता था जैसे पतंग नहीं वे ख़ुद उड़ रहे हों। उस समय उनके चेहरे की ख़ुशी कोई देखता तो दोनों को ढेर सारी दुआएँ दे डालता। कौन लोग हैं जो कहते हैं कि पतंग उड़ाना इस्लाम में गुनाह है, यह तो ख़ुदा के नज़दीक जाता रास्ता है। पतंग आसमान में पहुँचकर डोर की मदद से धूप दोनों के चेहरे पर छिड़क रही है। देखा नहीं...कैसा आईने की मानिंद चेहरा चम-चम चमक रहा है।

दोनों कुछ देर तक पतंग उड़ाते रहे कि एक वहशी शोर ने ख़लल डाला। ज़लज़ले-सा शोर, कानों को फाड़ता हुआ। वे डर गए...शायद कोई आ रहा है। उन्होंने झटपट डोर पतंग से अलग की और बाक़ी सामान उसी बड़े थैले में भरकर एक गड्ढे में डाल मलबे से भर दिया। नूर चचा ने कहा था जब भी ख़तरा महसूस हो यही करना। लालच मत करना...पतंग जाने देना।



पतंग जाने का अफ़सोस तो था पर फ़िलवक़्त ख़ौफ़ उस से बढ़कर था। धीरे-धीरे शोर बढ़ता हुआ उनके कान चीरने लगा। सैकड़ों लोगों की आवाज़ें। क्या ये भीड़ उनके पतंग उड़ाने की वजह से आ जुटी है? क्या उनका गुनाह इतना बड़ा था? भीड़ संगदिल होती है। फ़रहाद ने नन्हे अली को देखा। पहली बार उसे अली ख़ुद से छोटा लगा। उसने सरपरस्त की तरह उसे अपनी बाँहों के घेरे में ले लिया। अली...उसका प्यारा छोटा भाई। उसे कुछ नहीं होने देगा वो। उसकी आँखों का ख़ौफ़ पानी बनने लगा था। हिम्मत जुटा कर वे दबे पाँव चलते हुए मैदान के ओर वाली दीवार के पास आ गए। इतने लोग! सबके हाथ में पत्थर! सबकी आँखों में ख़ून उतरा था। उनकी नज़रों ने भीड़ की नज़रों का पीछा किया। एक औरत...औरत का चेहरा...ख़ून वहाँ भी था। दोनों जैसे वहीं जम गए। नज़रें फेरना चाहते हुए भी नहीं फेर पाए। भीड़...बेतहाशा भीड़। निगाहें फिसलते हुए कई चेहरों पर अटकी। क्या पहचाने हुए चेहरे भी भीड़ बन जाते हैं? पहला पत्थर एक बच्चे से फिंकवाया गया था। बच्चे ने डरते हुए पत्थर फेंका और हर ओर से पत्थरों की बौछार शुरू हो गयी। दोनों की पीठ में कुछ सरसराया फिर एक लम्हे में सब थम गया। खेल का मैदान मक़तल हो गया था।

फ़रहाद ने गीली आवाज़ में कहा। ‘‘चल।‘‘ एक बार फिर दोनों की हथेलियाँ गुँथी हुई थीं।

सारा रास्ता ख़ामोशी से बीता था। वे दौड़ना चाहते थे अपने घर के सुकून की तरफ़ लेकिन पैरों में जान न थी। एक मन ये भी चाहता था कि लौट कर देखें उस औरत का क्या बना लेकिन डर की ज़ंजीरों ने पैर बाँध लिए।

‘‘हम कभी पकड़े गए तो हमारे साथ क्या सुलूक होगा?‘‘ अली ने रास्ते में पूछा।

‘‘तू अब भी पतंग उड़ाना चाहता है अली?‘‘ फ़रहाद ने उसकी हथेलियाँ कस ली थीं।

‘‘तो हम कभी पतंग नहीं उड़ायेंगे?‘‘ ये सवाल था कि जवाब।

दोनों चुपचाप ख़ाली सड़क पर आगे बढ़ते रहे। घर पहुँचे तो अम्मी परेशान थीं। अब्बा शायद उन्हें ढूँढ़ने जाने के लिए तैयार खड़े थे। शीर अपने खिलौने लिए उनके इंतजार में थी। उन्होंने उस से वादा किया था कि आज उसे एक नया खेल सिखायेंगे।

‘‘कहाँ गए थे बग़ैर बताये? दुकान सँभालने को कहा था न?‘‘ हामिद की आवाज़ में गुस्से के नीचे फ़िक्र दबी थी।

‘‘इतनी देर तक बाहर रहना ठीक नहीं‘‘ अबकी बार अफ़शीन थी। उनकी नर्म अम्मी की आवाज़ ऐसी थी जैसे तलवे जलकर छालेदार हो गए हों।

‘‘माहौल ठीक हो जाए फिर खूब घूमना। जानते हो न कई बातों पर पाबंदी है और पकड़े जाने पर सख़्त सजा।‘‘ हामिद ने बात सीधे न कह घुमा कर कही। अब्बा की यही आदत थी लेकिन वो घुमाई हुई बात भी इतनी साफ़ होती कि सीधी बात भी क्या होती होगी। इन मिली-जुली नसीहतों के बीच वे अभी कुछ देर पहले देखे मंज़र को सोच रहे थे। वे अम्मी-अब्बा से इस बाबत बात करना चाहते थे लेकिन ये जानने पर कि वे दोनों इतनी देर तक कहाँ थे अम्मी-अब्बा बहुत नाराज़ होते। पाबंदियाँ लगतीं सो अलग।

उस रात वे ठीक से सो नहीं पाए। ख़्वाब में बिना धड़ की कोई ख़्वातीन आकर कभी हँसती, कभी रोती, कभी अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए चीखती थी। अगले कई दिनों तक वे गुमसुम रहे। कच्चा मन ज़ख़्म खा गया था।

सारे घर को जैसे एक चुप लग गयी थी। जैसे कोई काला साया सरसराता हुआ अपने मुँह से अँधेरा उगलता हुआ, पूँछ से उजाला पोंछता जाता था। अम्मी-अब्बा ख़ुद के ख़यालों में इतने मसरूफ़ कि उन दोनों की चुप्पी देख कर भी वे नहीं देख पाए। एक शीर थी, उसकी आवाज़ सबको कभी-कभी चौंका जाती।

(परछाई ज़र्द होने लगी थी।)

एक दिन नूर चचा दुकान पर आये...गोश्त लेने। वे कुछ और उम्रदराज़ लग रहे थे। उम्र के निशान चेहरे की सिलवटों पर नुमायाँ हो रहे थे। उन दोनों को दुकान पर देख एक मुस्कान उनके चेहरे पर तिर आई...एक पोशीदा मुस्कान। फुसफुसा कर उन्होंने कहा,

‘‘मैंने तुम्हारे लिए नयी पतंगें बनायीं हैं। कब आओगे?‘‘

अली और फ़रहाद ने एक-दूसरे को देखा। अब्बा की नज़रें बचा कर दोनों नूर अहमद के नज़दीक खिसक आये। ‘‘चचा अभी तो पहले वाली ख़त्म नहीं हुईं। मौका ही नहीं मिला।‘‘

‘‘अरे मियाँ, जल्दी करो। पतंग नहीं उड़ाओगे तो पतंगबाज़ी के सिरमौर कैसे बनोगे। तुम्हें क्या लगता है ये दिन हमेशा रहने वाले हैं? अजी नहीं, जल्द ही सब ख़त्म हो जाएगा और काबुल का आसमान पतंगों से भर उठेगा। रियाज़ है ये रियाज़...जारी रखो छोटे मियाँ। हमारी उम्र होती तो हम जाने कितनी पतंगों की कुर्बानी दे चुके होते।‘‘ कहते-कहते उनकी साँस भर आई थी। हामिद ने इधर देखा तो चुप हो गए। चलते-चलते दोनों के कानों में जैसे मन्त्र फूँका, ‘‘सुनहरी बाज़ बना रहा हूँ।‘‘

सुनते ही दोनों के कान खड़े हो गए। बाज़...अफ़गानिस्तान का क़ौमी परिंदा। पतंग के शौकीन दीवानावार इस पतंग को चाहते हैं। बहुत क़ीमती होता है। किसी ख़ास दिन, ख़ास वजह होने पर लोग इसे उड़ाते हैं।

उसी शाम दोनों ने दूर...बहुत दूर, चींटी-सी पतंगें उड़ती देखीं। शायद उनकी तरह कोई ख़ब्त का मारा रहा होगा। उनका डर कुछ खुला। घर लौटते वक़्त दोनों ने उस खंडहर का रुख़ किया। अब्बा की तरफ़ से इन दिनों कुछ ढिलाई थी इसलिए उनकी चिंता न थी। जल्दी-जल्दी मलबा हटाया तो थैले में बंद पतंगें बाहर आने को कसमसाने लगीं। तय तो ये किया था कि एक-दो दिन बाद जब फ़ुरसत होगी तब पतंग उड़ायेंगे लेकिन ढलते सूरज में चम-चम करती पतंग और मद्धम बहती हवा के संगीत ने दोनों को वहीं रोक लिया। पतंग झट रिहा होकर सर्र से आसमान में जाकर रक़्स करने लगी। दोनों की माहिर उँगलियाँ डोर को थामे थीं। इतने दिनों का तनाव बह गया था। दोनों पतंग उड़ाने में इस क़दर डूबे थे कि पास आती बूट की थाप दोनों को सुनाई न दी। वे आज इबादत में जो थे। सच्ची इबादत में कहाँ कुछ ख़लल डाल पाता है। फिर अचानक, इतना अचानक कि न डोर तोड़ने की मोहलत मिली न छिपने की, न भागने की।

‘‘तो ये हैं हुक्मउदूली करने वाले बेअदब बच्चे। पकड़ लो इन्हें।‘‘ तब्दीली के दौर से गुज़र रही एक मोटी आवाज़ बोली।

अली और फ़रहाद दो क़दम पीछे हट गए। ‘‘नमाज़ से वक़्त चुराकर ये बेहूदा काम करते हो।‘‘

किसी ने फ़रहाद के बाल पकड़ कर झटके से उसे आगे घसीट लिया। सर पर एक भारी हाथ पड़ा तो उसका सर घूम गया। वो किसी तरह ज़ब्त किये खड़ा रहा। अबकी बार एक हाथ अली की ओर बढ़ा। अली सहम कर और पीछे हुआ तो एक पैर गड्ढे में चला गया। मीज़ान बिगड़ा और अली पीठ के बल गड्ढे में जा गिरा। उसे सब अपनी पहुँच से दूर और बहुत ऊँचा नज़र आ रहा था। फ़रहाद उसे ऐसे देख आगे बढ़ने को हुआ कि एक तमाचा उसके गाल पर पड़ा। वह वहीं थम गया। अली अन्दर ही अन्दर डर रहा था लेकिन उस डर को उसने ज़ाहिर नहीं होने दिया। वह खड़े होने की कोशिश में था कि मिट्टी का एक रेला उसकी आँखों से आ टकराया...फिर दूसरा और तीसरा भी। उसने आँखों को अपनी छोटी हथेलियों से ढक लिया। मिट्टी के गिरने और उन लोगों के हँसने के बीच किसी एक छोटे से लम्हे में उसने देखा काली पगड़ी पहने मिट्टी फेंकने वाला शायद उम्र में सबसे छोटा रहा होगा। उसे खेल के मैदान में पत्थर फेंकता लड़का याद आया। हाँ, यह वही तो था। वही दोनों मुट्ठी भर उस पर लगातार मिटटी फ़ेंक रहा था। ऐसा करते हुए उसके चेहरे पर वैसी ही मुस्कराहट थी जैसी अली के चेहरे पर शरारत करते वक़्त होती है।

‘‘अल्लाह ने अपने आप सज़ा दे दी तुम्हें।‘‘ हँसते हुए एक आदमी ने अपनी बड़ी मूँछें खुरचते हुए कहा।

‘‘तुम्हारे वालिदैन को मालूम हैं तुम्हारे कारनामे?‘‘ उसने अपने बूट से फ़रहाद के कूल्हे पर निशाना साधा। फ़रहाद आगे की ओर गिरने को हुआ लेकिन सँभल गया। उसकी निगाहें लगातार अली पर जमी हुई थीं। अली के सिसकने की आवाज़ आ रही थी। वह बार-बार अपने मुँह पर से मिट्टी हटाने की कोशिश में और मिट्टी लगा ले रहा था। उसके बाल, कपड़े सब मिट्टी से भर गए थे। मिट्टी फेंकने वाले ने मिट्टी फेंकना बंद कर दिया था। अब उसकी दिलचस्पी फ़रहाद में थी। फ़रहाद के गाल पर हाथ के निशान उभर आये थे। उस गाल को सहलाने की इच्छा होते हुए भी उसने हाथ हिलाया तक नहीं। उसे डर था कि हिलते ही कहीं इन सबको उसका होना याद न आ जाये। लेकिन वे भूले कहाँ थे। मिट्टी फेंकने वाले लड़के ने कुछ क़दम पीछे लिए जैसे एक साँड़ हमला करने से पहले लेता है। फिर तेज़ी से भागते हुए अपना सर फ़रहाद के पेट में घुसा दिया। फ़रहाद का सर एक पत्थर से टकराया। वह दर्द से बिलबिला उठा।

‘‘आआअह्हह्हह‘‘ उसकी चीख से शाम सहम गयी।

अली फ़रहाद के सर से बहता ख़ून देख जोर से रो पड़ा। ‘‘चूज़े चुप हो जा।‘‘ किसी ने उसे गर्दन से पकड़ कर बाहर निकाल कर बेरहमी से पटक दिया। वह फ़रहाद की बगल में जा गिरा। वो होश में नहीं था। उसने फ़रहाद की नाक के आगे हाथ लहराया। साँस चल रही थी। उसकी इस हरकत पर सबसे लम्बा शख़्स हँस पड़ा,

‘‘मौत इतनी आसानी से नहीं आती। बड़ी ज़द्दोज़हद करनी होती है। बहुत दर्द सहना होता है।‘‘ कहते हुए उसने अपने बूट की एड़ी से उसके हाथ की उँगुली दबा दी। अली चिल्ला उठा। लगा जैसे किसी ने ज़िंदा जिस्म में नमक लगे तीर भोंक दिए हों।

‘‘मौत का दर्द इस से कई गुना ज़्यादा होता है।‘‘ कहते हुए उसने दबाव और बढ़ा दिया। रोकते-रोकते भी अली की आह निकल गयी। ‘‘भाई से बहुत मुहब्बत है न? सुबूत दे। कितना भी दर्द हो, आवाज़ नहीं निकालनी चाहिए। इधर तू चिल्लाया उधर उसका सर फाड़ देंगे।‘‘ कहते हुए एक ख़ंजर उसकी आँखों के आगे लहराया। आदमी उँगलियों को बूट की नुकीली नोक से यूँ मथ रहा था जैसे छाछ मथी जा रही हो। अली की कोमल उँगलियाँ छिलने लगीं लेकिन डर से वो चुप रहा। फ़रहाद को कैसे कुछ होने दे सकता है वो। सबकी निगाहें उस पर थीं जैसे किसी मुक़ाबले में खिलाड़ी सबकी निगाहों की ज़द में रहते हैं। वो खिलाड़ी था और मुक़ाबला था दर्द और सब्र का। सबको इस दिल्लगी में मज़ा आ रहा था कि अचानक उस आदमी का सैटेलाइट फ़ोन बज उठा। दूसरी तरफ़ से कुछ कहा जा रहा था। सबकी तवज्जो अब इस ओर थी। आदमी ने अपना पैर उसके हाथ पर से हटा लिया था।

‘‘चलो फ़ौरन निकलना होगा।‘‘ आदमी ने मसरूफ़-सी आवाज़ में कहा।

‘‘और हाँ, तुम दोनों...इस दफ़ा बच गए हो। अगली दफ़ा ऐसी ख़ुशक़िस्मती हो न हो… ख़याल रखना।‘‘ कहते हुए उसने वहीं थूक दिया।

उनके जाते ही अली किसी तरह उठ खड़ा हुआ। अपने दर्द को दरकिनार कर वो फ़रहाद के पास पहुँचा और उसे हिलाने लगा। जब कोई हरकत नहीं हुई तो वो बेलगाम रो उठा।

‘‘फ़रहाद, फ़रहाद...‘‘ उसे अपनी आवाज़, कहीं दूर से आती हुई किसी और की आवाज़ लगी। भीगी, डूबी, लरज़ती आवाज़।

कुछ लम्हों बाद जो जाने कितने लम्बे थे, फ़रहाद ने आँखें खोलीं। अली को रोता देख हाथ बढ़ाकर उसे ख़ुद से लिपटा लिया। दोनों लिपट कर रोये। रोये कि दर्द था, डर था और उन सबसे बढ़कर एक-दूसरे के लिए मुहब्बत थी।

अज़ान सुनाई दी। मग़रिब की नमाज़ का वक़्त हो चला था। दोनों ने एक-दूसरे का सहारा लिया और खड़े हो गए। फ़रहाद के सर पर ख़ून जम चुका था। अली ने पूछा,

‘‘बहुत दर्द है?‘‘

दर्द था लेकिन फ़रहाद ने न में गर्दन हिला दी।

‘‘देर हो गयी। अम्मी-अब्बू इंतज़ार में होंगे।‘‘

अली ने उसके माथे की तरफ़ इशारा किया कि ये साफ़ भी करना है। फ़रहाद की नज़र उसकी उँगलियों पर गयी तो उसे झटका लगा। जिल्द के नीचे से माँस झाँक रहा था। बाकी जगह जिल्द बेरंग होकर लटक रही थी। ओह, इतने छोटे बच्चे पर भी रहम नहीं किया उन लोगों ने। वो अचानक ख़ुद को बड़ा और इन सब बातों के लिए ज़िम्मेदार महसूस करने लगा। उसने रुमाल निकाल कर अली की उँगलियों को उसमें लपेट दिया।

‘‘हम अब पतंग नहीं उड़ायेंगे। वे लोग सच में ख़तरनाक हैं।‘‘ फ़रहाद धीरे से बुदबुदाया। ‘‘जब सब ठीक हो जायेगा, तब देखेंगे।‘‘

‘‘हम नूर चचा को बता देंगे। वे इंतज़ार में होंगे न?‘‘ अली को बूढ़े नूर की चमकदार आँखें याद आयीं।

ये बच्चे किस मिट्टी के बने थे। अब भी इनकी सोच के दायरे में पतंग और नूर चचा ही थे। जहाँ बड़े-बड़े लोग झुक जाते हैं, वहाँ ये गिर कर ऐसे खड़े हो गए जैसे जो गुज़रा वो वहीं दफ़्न हो गया।

तभी बूट की आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ सुन कर दोनों छुई-मुई के पौधे की तरह सिमट गए। क्या वे फिर आ रहे हैं? अब वे क्या करेंगे? दोनों के ख़याल अंधी सुरंगों में भटकते इस से पहले उनके सामने वह आ खड़ा हुआ था। वही जिसने अली पर मिट्टी फेंकी थी, फ़रहाद के पेट में सिर घुसा दिया था और जिसकी आँखें शरारती थीं। दोनों को ऐसे खड़ा देख वह फिर मुस्कुराने लगा। उन दोनों को यह दुनिया की सबसे वहशी मुस्कुराहट लगी।

‘‘पतंगों का ख़ज़ाना कहाँ है?‘‘

जिस माहौल में रहते हैं उसका असर आवाज़ों पर भी होता होगा। उसकी आवाज़ आतंक से सनी थी। सुनकर कोई भी ख़ौफ़ खा जाए। छोटा-सा बच्चा और यह तेवर। अली ने फ़रहाद को देखा। फिर उस लड़के को देखा। वह उस लड़के के साथ ठीक वही करना चाहता था जो उसने थोड़ी देर पहले उनके साथ किया था। कुछ कर गुज़रने की हिम्मत वह जुटाता इस से पहले ही ग़ुस्से से भरी उसकी आवाज़ आयी,

‘‘बताते हो या निशाना लगाऊँ?‘‘ उसके हाथ में भारी बन्दूक थी।

फ़रहाद ने उस ओर इशारा कर दिया जहाँ पतंगें छिपायी थीं। पतंगों के जाने का अफ़सोस था पर नूर चचा हैं न। वह लड़का कूदते हुए वहाँ जा पहुँचा। मिट्टी हटायी और पतंगों से भरा थैला उसके हाथ में था। पतंग छूते ही उसके तास्सुरात बदल गए थे। वह एक़दम ही शैतान से इंसान में तब्दील हो गया था। आँखों की सख़्ती, नरमी में बदल गयी थी और वह अचानक बच्चा बन गया था।

‘‘मुझे पतंग उड़ाना सिखाओगे?‘‘ आवाज़ में हुकूमत थी पर इस बार अन्दाज़ डराने वाला न था।

यह सुनकर अली और फ़रहाद बुरी तरह चौंक गए। अभी कुछ लम्हे पहले यही था जो उन्हें इसी बात की सज़ा दे रहा था। इस से ज़्यादा हैरत की बात उनकी ज़िंदगी में दूसरी न हुई होगी। वे ख़ामोशी से उसे देखते रहे जो उम्मीद से उन्हें तक रहा था।

‘‘बोलो, सिखाओगे?‘‘ वह चिल्ला कर पूछ रहा था।

‘‘नमाज़ का वक़्त हो गया। हमें जाना है।‘‘ वे किसी तरह अटकते हुए बोले और बग़ैर पीछे मुड़े भाग लिए। उन्हें उस पर ज़रा यक़ीं नहीं था। उनकी उम्र का है तो क्या, कितनी बेदर्दी से मारा था। अब्बा कहते हैं, दग़ा करने वालों की फ़ितरत दग़ा करना ही होती है। उन पर भरोसा नहीं करते।

मस्जिद में वजू के पानी से हाथ-मुँह धोकर जब दोनों घर पहुँचे तो तारीक़ी दिन का गला घोंट कर ज़ेहन में ही नहीं, गली में भी पाँव पसार चुकी थी। माहौल और मन दोनों ग़मगीन थे। उनका मन चाह रहा था कि यहाँ से किसी ऐसी जगह जाया जा सकता जहाँ ज़िंदगी तरतीब से तह की जा सके। किताबें, रंग, नाच-गाना,...उनकी ज़िन्दगी का भी हिस्सा हो। कहाँ होता होगा ऐसा? उनके लिए ऐसी दुनिया ना-क़ाबिल-ए-तसव्वुर हो चली थी। उनके ख़्वाबों का रंग उस रात से काला हो गया। ख़्वाब आते थे पर उनमें कुछ नज़र न आता।

(मैंने उन आँखों में उतर आये अँधेरे को देखा। बाहर चमकीली धूप थी, पतंगें थीं, ख़ुशी और किलकारियाँ थीं। उसी समय एक जोड़ी आँखें हादसों के पनीले वर्क़ में लिपटी थीं।)

***

उन्हें वह लड़का अब हर जगह दिखाई देता। काली पगड़ी में लिपटा छोटा-सा सिर हिलाते हुए वह दुकान के चारों ओर चक्कर काटता। वे किसी काम से बाहर आते तो उनके पीछे-पीछे चलता। पीछे मुड़ कर देखते तो आँखों से इल्तिज़ा करता। उसे उनके घर का पता भी मालूम हो गया था। काली पुती हुई खिड़कियों की दरारों से अली और फ़रहाद जब झाँकते तब उन्हें वह दिखाई देता। उसकी नज़रें उनको खोजती रहतीं और जब वे उसे दिखते, तवक्क़ो की एक लौ उनमें जल जाती। पतंगों वाला थैला हमेशा उसके बाएँ कंधे पर लटका रहता। हाँ, एक तब्दीली थी। अब उसके पास बन्दूक नहीं दिखाई पड़ती थी। अली और फ़रहाद हैरान-परेशान थे। कभी उनका सामना हो जाता तो वह उनसे पूछता,

‘‘बोलो, पतंग उड़ाना सिखाओगे?‘‘ अब्बू को मालूम हो गया तो वे दोनों मुश्किल में पड़ जाएँगे। गले पड़ गयी इस नयी मुसीबत से दोनों आजिज़ आ गए थे। शुरू दिनों में उसे देख दोनों को ग़ुस्सा आता था। वह ख़ौफ़नाक मंज़र उनकी आँखों में तैर जाता था। उस रोज़ उन दोनों में से किसी को कुछ हो जाता तो...!यह ख़याल दोनों के मन में जितनी बार आया, वे उतनी बार उस लड़के की ओर से निगाहें फेर लेते पर वह था कि पीछा ही नहीं छोड़ रहा था।

‘‘ज़िद्दी कहीं का‘‘ अपने मन में वे सोचते।

काली पगड़ी, काला कुर्ता और काला ही पाजामा वह हमेशा पहने रहता। अली और फ़रहाद को शक था कि वह कभी नहीं नहाता। एक दिन उन्होंने देखा कि उनके घर के पीछे वाली ख़ाली जगह में वह पतंग उड़ाने की कोशिश कर रहा है। पतंग दो-तीन हिचकोले खाकर गिर पड़ती। वह फिर उसे उठाता। इस बीच कई दफ़ा वह ख़ुद भी गिर पड़ा लेकिन पतंग ने उड़ान नहीं भरी। उसका नौसिखियापन देख वे हँस पड़े। कुछ देर उसकी कोशिश देखने के बाद वे उसके पास पहुँचे तो उसका चेहरा खिल गया। उसने अली को डोर पकड़ा दी।यह उन्हीं की पतंग थी। अली ने चुपचाप डोर थामी और समेट दी। उसे ऐसा करते देख वह रोने-रोने को हो आया।

‘‘मुझे पतंग उड़ाना सीखना है। सिखाओगे?‘‘ इस बार उसकी आवाज़ क़ायदे में थी।

‘‘तुमने उस दिन हमें इसीलिए मारा था। याद है कि भूल गए।?‘‘ अली का ग़ुस्सा बाहर आ ही गया। फ़रहाद ने उसका हाथ थाम लिया।

लड़का सिर झुका कर खड़ा हो गया। फिर कुछ सोचने के बाद बोला, ‘‘अच्छा तुम भी मुझे मारो। हिसाब बराबर हो जाएगा। फिर तो सिखाओगे?‘‘

फ़रहाद ने अली की उँगली उसके आगे कर दी। वहाँ अब भी माँस झाँक रहा था। देखकर लड़के के तास्सुर बदल गए। एहसास-ए-जुर्म ने उसको जकड़ लिया। उसने पत्थर उठा कर अली के हाथ में दे दिया। अली ने पत्थर फेंक दिया।

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?‘‘

‘‘मूसा।‘‘ वह धीरे से बोला। क्या यह वही लड़का है जिसका रवैया इतना वहशियाना था!

‘‘मुझे उन लोगों ने बहती नदी में पाया था।‘‘ उसने अपनी ज़िंदगी का ख़ुलासा एक जुमले में कर दिया।

‘‘बहती नदी में!‘‘ अली और फ़रहाद एक साथ बोले। ऐसी बात उन्होंने पहले कभी नहीं सुनी थी।

‘‘हाँ, मैं बहुत छोटा था। मुझे कुछ याद नहीं है। ये बात मुझे उन लोगों ने बतायी है।‘‘ उनको मुतमईन करने के लिए वह फिर बोला,

‘‘उस रोज़ उन्होंने कहा था जितना अच्छा काम अंजाम दोगे उतना अच्छा खाना मिलेगा।‘‘

‘फिर क्या खाने को मिला? ‘‘ वे दोनों उस रोज़ की बात भूल कर दूसरी बातों में दिलचस्पी ले रहे थे।

‘‘खाना तो वही रोज़ वाला था पर उस दिन उन्होंने मुझे मेवे दिए। मैंने तुम्हारे लिए बचा कर रखे हैं।‘‘ उसने थैले में हाथ डाला और मेवे निकल कर उनके सामने कर दिए। अगले ही लम्हे अपने पिटने की एवज़ में दिए गए मेवे वे दोनों मूसा के साथ मिल-बाँट कर खा रहे थे।

‘‘मैं तुम्हें नहीं मारता तो वे मुझे बहुत मारते।‘‘ खाते-खाते वह अचानक बोला। ‘‘मैंने बचपन से अब तक बहुत मार खायी है। देखो...‘‘ कहते हुए उसने अपना कुर्ता उठा दिया। वहाँ ढेर सारे निशान थे। दोनों हैरत से वे निशान देख रहे थे। उनके अब्बा-अम्मी तो उन्हें बहुत प्यार से रखते थे। मूसा ने वे निशान ढँक लिए।

‘तुम्हारी एक छोटी बहन भी है न? मैंने उसे कभी-कभी देखा है।‘‘ मूसा ने बात बदल दी।

‘‘हाँ, है न। तुमसे भी छोटी। तुम कहाँ रहते हो?‘‘

‘‘यह बताने की इजाज़त नहीं है।‘‘ वह किशमिश चाटता हुआ बोला।

‘‘पतंग उड़ाने की इजाज़त है?‘‘

‘‘नहीं, है तो वो भी नहीं पर मुझे पतंगें बहुत अच्छी लगती हैं। इतनी अच्छी कि मैं जब भी उन्हें देखता हूँ उनके साथ उड़ने लगता हूँ।‘‘ मूसा की नज़रें फिर पतंग पर थीं।

‘‘हमें भी अच्छी लगती हैं पर उस दिन हमारा हश्र तुमने देखा था। क्या वे तुम्हें बख़्श देंगे?‘‘ फ़रहाद उस दिन को याद कर काँप गया।

‘‘नहीं, वे किसी को नहीं छोड़ते। ग़द्दारों की सज़ा और भी भयानक होती है।‘‘

‘क्या करते हैं उनके साथ? ‘‘

‘‘मार देते हैं पर उस से पहले भयानक अज़ीयत से गुज़रना पड़ता है।‘‘ मूसा लम्हे भर के लिए बुत बन गया था। ‘‘जानते हो वहाँ बच्चों के खेलने पर सख़्त पाबंदी है। यूँ भी हम लोगों की उम्र नहीं गिनी जाती।‘‘

‘‘तो क्या तुम कभी नहीं खेलते?‘‘

‘‘कभी कोशिश की तो एक निशान बढ़ गया। इसलिए अब नहीं करता।‘‘

‘‘तो फिर पतंग उड़ाने की ज़िद क्यों? अगर पकड़े गए तो?‘‘

‘‘नहीं, इन दिनों वे लोग मसरूफ़ हैं। मैं चुपचाप निकल आता हूँ, नमाज़ का कहकर। वे अब मुझ पर यक़ीन करते हैं। मुझे अकेले आने-जाने की इजाज़त है। अगर कभी पकड़े गए, तब देखेंगे।‘‘

‘‘तुम तो बहुत बहादुर हो।‘‘ अली उस से मुतास्सिर था। ‘‘लेकिन यहाँ इस तरह ख़ुलेआम पतंग उड़ाना ख़तरे से ख़ाली नहीं है।‘‘ फ़रहाद ने समझदारी दिखायी।

‘‘मुझे कुछ महफ़ूज़ ठिकाने मालूम हैं। वहाँ कोई नहीं आता-जाता। तुम दुकान से जब भी निकल सको हम वहाँ जा सकते हैं।‘‘

‘‘हमने तय किया है कि जब तक पाबंदी नहीं हट जाती तब तक हम पतंग नहीं उड़ाएँगे।‘‘ वह दिन अब भी उनकी याद में ताज़ा था।

‘‘उस रोज़ जो हुआ वह हर बार हो यह क्या ज़रूरी है? फिर तुम मेरे साथ रहोगे तो महफ़ूज़ रहोगे। मैं वायदा करता हूँ तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा। मैं अपनी बन्दूक लेकर आऊँगा। किसी से सामना हुआ तो उसे ऐसे उड़ा दूँगा।‘‘ हाथ का इशारा कर उसने जिस तरह कहा, अली और फ़रहाद हँस पड़े।

(आँखों का शशोपंज मद्धम पड़ गया था।)

***

तीनों हर शाम मिलने लगे। मूसा के पास शहर का नक़्शा था। उसने नक़्शे में उन्हें वे सारी जगहें दिखायीं जहाँ उनके कैम्प थे और जिन जगहों से उन्हें बच कर चलना है। उसने कुछ ऐसी जगहें भी दिखायीं जिन्हें वे लोग बेकार समझते हैं। वे उस तरफ़ कभी नहीं जाते। तीनों यूँ तरकीबें कर रहे थे ज्यों किसी मिशन पर निकलना है। पतंगबाज़ी के लिए उन्होंने पाँच महफ़ूज़ अड्डों की निशानदेही की थी। उन जगहों पर तक पहुँचने के रास्ते, ज़रूरत पड़ने पर वहाँ से जल्द-से-जल्द भागने के रास्ते सब उन्होंने तय किए थे।

अली और फ़रहाद उसकी दानिशमंदी से मुतास्सिर थे। इतनी होशियारी से नक़्शा पढ़ना वे स्कूल में भी नहीं सीख पाए थे जितना मूसा की संगत में सीख गए थे। मूसा ने उन्हें और भी बहुत कुछ सिखाया था। आहटों में फ़र्क़ करना, बच भागने के पैंतरे, छिपने के तरीक़े और बदले में वे मूसा को सिखा रहे थे भले लड़कों की आदतें और पतंग उड़ाना। दो मुख़्तलिफ़ दुनिया मिल गयी थीं, उनके बीच की लकीर मिट गयी थी। वे इस तरह घुल गयी थीं कि एक नयी दुनिया ईजाद हो गयी थी जहाँ मासूमियत थी और मुहब्बत थी और था जज़्बा।

‘‘तुम यह काली पगड़ी उतार नहीं सकते? इस से तुम अलग से पहचान में आ जाते हो?‘‘ एक रोज़ फ़रहाद ने कहा।

‘‘एक बार खोल दी तो वापस कैसे बाँधूँगा? और तुम चिंता क्यों करते हो? यह काली पगड़ी देख लोग कितना डरते हैं। कोई हमसे कुछ नहीं पूछेगा...‘‘ मूसा पगड़ी को छू कर उस छुअन को चूमते हुए बोला।

अली और फ़रहाद का एक मन उन्हें रोकता था और एक मन मूसा की सारी दलीलें मान लेता था। पतंग उड़ाने का जुनून इस हद तक था कि धीरे-धीरे दोनों मन उन्हें मूसा की ओर धकेलने लगे। मूसा भी तो उनमें कितनी दिलचस्पी लेता था। उनके अम्मी-अब्बू की, शीर की, उनके स्कूल की बातें बार-बार पूछा करता। उसका कोई घर न था इसलिए अली और फ़रहाद की बातों में उसने घर ढूँढ़ लिया था। अली और फ़रहाद उस से कुछ भी नहीं छिपाते थे। घर के हालात से लेकर घर में बनने वाले खाने तक हर बात मूसा को मालूम होती। खाना मूसा की कमज़ोरी थी। जिस रोज़ वे दोनों मूसा के लिए घर से कुछ ले आते उस दिन वो बहुत ख़ुश होता। कभी-कभी वो भी फ़रमाइश कर बैठता और अपने दोस्त की फ़रमाइश पूरी करने के लिए वे दोनों कोई कसर नहीं उठा रखते।

तीनों ने सोचा कि हर रोज़ पतंग ले जाने की बजाय एक दिन जाकर पाँचों ठिकानों पर पतंग और उसे से जुड़ा सामान छिपा दिया जाए जिस से हर रोज़ की क़वायद से वे बच जाएँगे। पकड़े जाने का डर भी नहीं रहेगा। तय हुआ नूर चचा से पतंगें ले आयी जाएँ। नूर चचा ने यूँ तो उन्हें पाबंद किया था कि किसी को न बताया जाए वे पतंग कहाँ से लाते हैं लेकिन मूसा तो उनका दोस्त था। उस को बताने में हर्ज़ नहीं था।

‘‘चचा नूर, नूर चचा।‘‘ जाने क्यों वो गली उस रोज़ से भी ज़्यादा ख़ामोश थी। परिंदा भी पर मारता नहीं दीख रहा था। जैसे कोई पोशीदा जिन्न गली पर सवार हो। जिन्न खड़ा हँसता था, गली के होंठ भी हँसी की शक्ल ले लेते। जिन्न चुप था, गली ने चुप्पी इख़्तियार कर ली थी। गली का अपना वजूद गुम गया था।

दरवाज़ा धीरे से धकेला तो खुल गया। अन्दर कोई नहीं था...शायद चचा कहीं नज़दीक ही गए होंगे। दीवार पर कोयले से पतंगों की शक्लें बनी थीं । पतंगों से बचे हुए रंगीन तुड़े-मुड़े नुचे हुए काग़ज़ एक कोने में पड़े थे। छत पर से कुछ धागे लटक रहे थे जिनके सिरे पर ज़रूर पतंगें रही होंगी। शायद बहुत दिनों से सफ़ाई नहीं हुई थी। वे हैरत से उस कोठरी को देख रहे थे जहाँ वे एक बार पहले आ चुके थे। उस रोज़ यहाँ नूर चचा थे तो वे कुछ और कहाँ देख सके थे। नूर चचा के नूर से लबरेज़ थी ये जगह उस रोज़। अपनी आँखों से देखने पर आज सब नया लगा। वे सोच ही रहे थे कि क्या किया जाए इतने में खाँसते-खँखारते नूर अहमद आ पहुँचे। हाथ में पकड़ा पानी का बर्तन उन्होंने बच्चों की मदद से नीचे रखा। वह पहले से ज़्यादा बूढ़े और बीमार लग रहे थे पर उन्हें देख ख़ुश हो गए।

‘‘कितने दिनों बाद आए हो? मैंने तुम्हारे लिए बहुत-सी पतंगें बनायी हैं।‘‘ कहते हुए पतंगों का एक ज़ख़ीरा उनके आगे रख दिया। रंग-बिरंगी पतंगें धीरे-धीरे फड़फड़ा रही थीं ज्यों आसमान में पहुँचाने वाले हाथों को पहचान कर उनसे बात करने की कोशिश कर रही हों। मूसा बड़े शौक से एक-एक पतंग छू कर देख रहा था। नयी-कोरी पतंगों की ख़ुशबू उसके लिए नयी थी।

‘‘यह कौन है?‘‘ सिमट आयी आँखों से देखने की कोशिश करते हुए चचा ने पूछा।

फ़रहाद ने सारा क़िस्सा बयान कर दिया। चचा एक पल के लिए दोनों के लिए ख़ौफ़ से भर गए। उनके माथे पर बल पड़ गए। दोनों अपने भोलेपन में क्या कर बैठे!। उन्होंने पैनी निगाहों से मूसा को देखा जो पतंगों में डूबा हुआ था। है तो बच्चा पर इसकी तरबियत बहुत अलग है। अच्छा संग भी इसे अंदर से कितना बदल पाया होगा! लेकिन अगले ही पल उन्हें दोनों पर फ़ख़्र हुआ। अपने दुश्मन को दोस्त बना कर बग़लगीर कर लिया। बड़े-बड़े यह काम नहीं कर पाते। उन्होंने दुआ पढ़ी कि इस दोस्ती का एहतराम क़ायम रहे।

‘‘चचा आपकी तबियत नासाज़ लगती है।‘‘ अली ने उनकी बूढ़ी हथेली को सहलाते हुए कहा।

‘‘हाँ, बेटा अब उम्र हो चली है।‘‘ दम नहीं रहा इन हड्डियों में। उन्हें फिर खाँसी का दौरा पड़ा।

‘‘चचा, आपको अस्पताल ले चलें? एक दफ़ा डॉक्टर से मिल लेते हैं।‘‘

‘‘नहीं बेटा, ज़िंदगी भर अस्पताल नहीं गए। अब अस्पताल जाकर क्या करना है। जितना नसीब में लिखा है , उतने जी लेंगे।‘‘

‘‘चचा, आप अस्पताल नहीं जाना चाहते तो न सही, हम आपके लिए यहीं दवा ले आएँगे।‘‘ इतनी देर में मूसा पहली बार बोला। सुनकर चचा मुस्कुरा उठे। बच्चे के अहसास अभी तक मरे नहीं हैं।

‘‘हाँ चचा, मूसा हर काम में माहिर है। वह पलक झपके ही आपके लिए डॉक्टर भी बुला सकता है और दवा भी ला सकता है।‘‘ फ़रहाद भी मूसा का मुरीद हो चला था।

बहरहाल, चचा ने न दवा ली न अस्पताल गए लेकिन तीनों बच्चे रोज़ उनके पास आते रहे। जितनी बन पड़ती, चचा की मदद करते। चचा के घर की सफ़ाई करते, उनके लिए पानी भर कर लाते। खाना बनाना उनके लिए ज़रा मुश्किल था लेकिन मूसा यहाँ भी उनसे दो क़दम आगे था। छोटे-छोटे हाथों से फ़ुर्ती से आटा लगाता और तंदूर वाले से नान सिकवा लाता। तब तक चचा गोश्त तैयार कर लेते। उनकी तबियत इन बच्चों की सोहबत में सुधर गयी थी। नूर अहमद जिनका कोई नहीं था, जिसकी मौत भी उन्हीं की तरह अनाथ रह जाती, तीन छोटे बच्चों ने उस से निस्बत जोड़ कर उनकी बची हुई ज़िंदगी में रंग भर दिए थे। जिसके पीछे उसकी मय्यत उठाने वाला कोई न हो, उसे रोने को कुछ जोड़ी आँखें मिल गयी थीं यह सोचकर चचा की रूह को चैन मिलता था। वह तीनों से एक-सी मुहब्बत करने लगे थे।

एक दिन वे वहाँ पहुँचे तो छोटी-बड़ी कई पतंगों के बीच सुनहरी रंग के डैने फड़फड़ा रहे थे। वे लपक कर उस ओर गए।

‘‘मैंने बताया था न तुम्हारे लिए बाज़ बना रहा हूँ। फिर तबियत बिगड़ गयी थी। बाज़ बन जाएगा तब उड़ाओगे न?‘‘ चचा मुहब्बत से बोले।

‘‘यह भी पूछने की बात है चचा।‘‘ कहते हुए वे तीनों नूर अहमद से लिपट गए।

‘‘अच्छा सुनो, हफ़्ते बाद आकर बाज़ ले जाना। अभी इसमें कुछ काम बचा है। इस बाज़ को आसमान की बड़ी आस है।‘‘

जाते-जाते उन्होंने कहा था। ‘‘हिफ़ाज़त से रहना। किसी का यक़ीन मैला न हो।‘‘ सुनकर तीनों ने मन में ख़ुद से कोई वायदा किया था।

( आँखों में उम्मीद की मशालें थीं।)

****

‘‘तुम्हारी मुमानी जान की तबियत ख़राब है। हम उन्हें देखने जलालाबाद जायेंगे।‘‘ अब्बा जान की ख़ुरदुरी आवाज़ आई।

‘‘शाम तक लौट आयेंगे। तब तक तुम लोग कहीं बाहर मत जाना और शीर का ख़याल रखना।‘‘ एक दिन सुबह-सुबह अफ़शीन ने फ़रहाद को अफ़रा-तफ़री में जगाते हुए कहा। उन्होंने जल्दी-जल्दी दुपट्टा लेकर बुर्क़ा पहना और दुपट्टे का धानी रंग काले के भीतर छिप गया। दिन के इब्तिदाई हिस्से की नींद में डूबते-उतराते उसका मन चाहा अम्मी उसका माथा पहले की तरह चूम लें। पर इधर के कुछ बरसों में अम्मी बदल गयी हैं। उनकी नर्म-सी अम्मी तुर्श हो गयी हैं। एक शोख़ लड़की औरत में तब्दील होकर कई दफ़ा पहचान में नहीं आती। अम्मी का चेहरा ख़ाली कैनवस सा लगता है जिस पर अली रंग भर देना चाहता है। बगैर कोई ख़ाका खींचे बस रंगों की जुगलबंदी हो। वह जानता है उस एक चेहरे के रंगों में पूरा घर नहा जाता है।

अचानक उसे पुराने दिन याद आये। बहुत पुराने जब वो इतना छोटा था कि बातों का मतलब नहीं समझता था। पर उसे याद है कि अम्मी, अब्बा का चश्मा छिपा देती थीं जिस से अब्बा न टीवी देख पायें न अख़बार पढ़ पायें। अम्मी यूँ मासूम चेहरा बनाये रखतीं कि उन पर शक़ ही नहीं जाता। अब्बा फिर अम्मी के पास बैठ जाते और दोनों ख़ूब गप्प लड़ाते। अब्बा ने एक दिन अम्मी को रंगे हाथों पकड़ लिया था और उसे लगा था अब्बा अब अम्मी को ठीक वैसे डांटेंगे जैसे अम्मी कभी-कभी उन्हें डाँटती थीं। पर अम्मी-अब्बा हँसते-हँसते दुहरे हो गए थे और अब्बा ने अम्मी को सीने से लगा लिया था। यह क़िस्सा मूसा उनसे अनगिनत बार सुन चुका था।

अब अब्बा टीवी नहीं देखते, अख़बार पढ़ना भी इन दिनों छूट गया है। दुकान से लौटकर अम्मी के पास बैठे ज़रूर रहते हैं लेकिन बोलते कुछ नहीं। चुपचाप काली खिडकियों से बाहर न दीखती किसी चीज़ को देखते हैं। कभी-कभी उसे लगता है जैसे वे मन ही मन कुछ कहते हैं जो काँच से टकरा उन तक लौट आता होगा। उन्हें यहाँ कोई डर नहीं है, ज़ाहिर तौर पर तो नहीं, फिर भी वे डरे-से रहते हैं। शायद इसीलिए उन लोगों ने ऊँची आवाज़ में बात करना छोड़ दिया है। उनका घर फुसफुसाहटों से भर गया है।

वो अम्मी को, अब्बा को, शीर को बहुत ख़ुश देखना चाहता है। वो अपने वतन को तरक्क़ी करते देखना चाहता है। काश वो फ़रहाद और मूसा के साथ मिलकर सब बदल सकता। फ़रहाद के पास उसके हर सवाल का जवाब होता था पर कुछ बातों का जवाब अब उसके पास भी नहीं मिलता।

‘‘छोटे मियाँ, मुमानअतों से बुज़दिल डरते हैं। तुम तो शेर-ए-अफ़गन हो।‘‘

कभी नूर चचा के कहे गए ये लफ़्ज़ ज़हन में आज भी ताज़ादम थे। अली की नींद अचानक पूरी तरह खुल गयी।

हामिद और अफ़शीन जा चुके थे। जुम्मे का दिन था। मकतब के दिनों में ये छुट्टी का दिन होता था। अब फ़र्क नहीं था लेकिन आज का दिन कुछ अलग था। अरसे बाद वे घर में इस तरह अकेले थे। अकेले होते ही फ़रहाद और अली सर से सर जोड़कर कुछ तय करने लगे। नूर चचा की ख़्वाहिश पूरी करने का दिन आ गया था। कितने दिनों से इंतज़ार था।

‘‘लेकिन शीर...‘‘ सोती हुई शीर का सर सहलाते हुए अली कह रहा था।

‘‘उसे भी साथ ले चलते हैं। कितने दिनों से वो घर से बाहर नहीं निकली है।‘‘ फ़रहाद ने दोनों की ओर प्यार से देखा।

‘‘याद है हम उन दिनों खाना लेकर बाबर के बाग़ जाते थे। वहीं बैठ कर खाना खाते, दौड़ लगाते और पतंग उड़ाते थे।‘‘ अली पुराने दिनों में गोते लगा रहा था।

‘‘हाँ, लेकिन अब वहाँ पतंग उड़ाना नामुमकिन है। आज हम बाला हिसार के पीछे चलेंगे। वहाँ हमें कोई देख भी नहीं पायेगा और जैसे ही कोई आएगा, छिपने और भागने की जगह मिल जायेगी। मूसा ने कहा था वहाँ कोई झाँकता तक नहीं।‘‘

‘‘भाईजान, ख़तरे की बात तो नहीं है? शीर भी हमारे साथ होगी।‘‘

‘‘उनका ध्यान इन दिनों दूसरी तरफ़ है। इतनी अहम् बातों के बीच इस हक़ीर मसले पर कहाँ ध्यान देंगे वे। अभी उस रोज़ दुकान पर मैंने सुना था कि लोग पतंगबाज़ी करने लगे हैं। दबे-छिपे ही सही, लेकिन लोग हिम्मत कर रहे हैं।‘‘ फ़रहाद बड़े इश्तियाक़ से बोला था। ‘‘फिर मूसा भी तो हमारे साथ होगा।‘‘

मूसा के लिए उन्होंने आज बहुत-सी चीज़ें ले ली थीं। अम्मी जो नहीं थी आज देखने के लिए। नन्हें मगर मज़बूत हाथों से तीनों ने खाना बाँधा। ठीक उन दिनों की तरह जिनकी झीनी-सी याद शीर के पास थी। शीर ने जब से बाहर जाने की बाबत सुना था, वो चहक रही थी। अली को लगा जैसे बुलबुलें गा रही हों...उनका घर गुलिस्ताँ हो गया था। अली शीर की चोटी गूँथने में मसरूफ़ था और उधर फ़रहाद पतंगबाज़ी की तैयारी कर रहा था।

मूसा नीचे उनके इंतज़ार में था। जंग थी आज...नूर अहमद की ख़्वाहिश और हुक्मरानों के बीच। मुहब्बतों और नफ़रतों के बीच। एकदम ही सियाह काँच से रोशनी झाँकने लगी।

(आँखों से कोई सरफ़रोश झाँकता था।)

****

मौसम उस रोज़ साफ़ था, आसमान नीला, हवा में ज़ाफरानी महक घुली थी। बाला हिसार अपने सीने पर ज़ख़्म लेकर भी बेबदल खड़ा था। चारों बच्चे उस सुनसान जगह को अपनी किलकारियों से भर रहे थे। आहूचश्म शीर हैरानकुन हो खुली दुनिया से मुख़ातिब थी। उसने बुर्क़ा उतार फेंका और गहरी साँस भरी कि सारी हवा आज पीनी है। अल्हड़ हाथों से गुँथी चोटी हवा का लम्स पा खुल कर लहरा रही थी। फ़रहाद को अपनी बहन किसी किताब में देखे बादबान-सी लगी। मूसा उसे टकटकी लगाए देख रहा था। उसने पहली दफ़ा शीर को नज़दीक से देखा था। उसकी कोई बहन होती तो ऐसी ही होती। भाई होते तो अली और फ़रहाद से कम न होते। और अम्मी-अब्बू, उन्हें कभी न देखा था पर तसव्वुर में हामिद और अफ़शीन का चेहरा ही उभरता। वह कितने एहसासों से भर गया था।

फ़रहाद ने थैला खोला और क़रीने से रखे बाज़ को ज़मीन पर फैला दिया। दो दिन पहले वे तीनों नूर चचा से बाज़ ले आए थे मगर थैला आज ही खोला था। देखते ही चारों ख़ुशगवार हैरत से भर गये। इतना ख़ूबसूरत! बाज़ की आँख जैसे आग की लौ, बाज़ के पंख जैसे परवाज़ भरने को तैयार… कुछ देर में यह वाक़ई फ़लक को चूमने वाला था।

अली और शीर ने चुनी एक आसमानी पतंग। चारों ने ठीक से नाप-जोख कर दोनों पतंगों में तंग डाला। अब पतंगें तैयार थीं।

‘‘हम उस ओर जाते हैं‘‘ अली ने भूरे रंग की एक छोटी चरखी थामी। मूसा के हाथ में बड़ी चरखी थी।

‘‘मूसा, भाई जान के साथ ही रहना। बाज़ बहुत बड़ा है। उन्हें मदद की ज़रुरत होगी।‘‘ पीछे मुड़कर अली चिल्लाया। मूसा ने ख़ुशदिली से उसकी ओर हाथ हिला दिया।

मूसा ने फ़रहाद के साथ चरखी सँभाली और फ़रहाद ने अपनी सारी ताक़त लगा दी बाज़ को आसमान तक पहुँचाने में। पतंग बहुत बड़ी थी इसलिए शुरू में सँभालने में ज़रा मुश्किल आई लेकिन एक दफ़ा वो ऊपर पहुँची तो सारा वज़न डोर ने ले लिया। फ़रहाद की मज़बूत बाज़ुओं को अब पतंग पंख-सी हलकी लग रही थी।

बाज़ आसमान में कुलाँचें भर रहा था। नीचे से अचानक कोई देखे तो वह परी-कथाओं से निकला, आग उगलने वाला, बड़े डैनों वाला पंछी नज़र आता था। सूरज की रोशनी में उसका सुनहरी रंग और गहरा गया था। उसकी शान देख, नीचे खड़े चारों बच्चों की आँखें चुँधिया गयीं। अली और शीन कुछ देर उसे ताकते रहे। फिर सारा ध्यान अपनी पतंग पर लगा दिया। बाज़ के सामने उसकी क्या बिसात। आज तो वो सिर्फ़ रिवायत के लिए पतंग उड़ा रहा है। नूर चचा ने कहा था बिना मुक़ाबले के पतंगबाज़ी यानी शान में बट्टा।

फ़रहाद साजिंदा, डोर साज और पतंग सुर थी। कुछ देर बाज़ आसमान में मौसिक़ी बन तैरता रहा। सबका ध्यान उस ओर ही था। अभी एक-एक कर सबकी बारी आने वाली थी। उनके लिए बाज़ का तर्जुमा होता था उनकी आपसी मज़बूती, उनके वतन की लम्बी ख़ुशहाल ज़िंदगी और उनके दरमियाँ की मुहब्बत।

अचानक हवा का रुख़ बदला कि बाज़ के पंख डूबने लगे। अली हैरान...ये कैसे मुमकिन है। उसने पतंग नहीं काटी, आसमान में कोई और पतंग है नहीं। फिर! क्या भाईजान और मूसा पतंग नहीं सँभाल पाए। वो एक अनजान अहसास से घिर गया। शीर का हाथ थामे वह दूसरी ओर पहुँचा तो दंग रह गया। वे चारों ओर से घिरे हुए थे। इतने छोटे बच्चों के लिए इतनी बड़ी फ़ौज। उसने फ़रहाद को देखा जिसके चेहरे पर बाज़ के जाने का ग़म और पकड़े जाने का डर दोनों थे। वह सिर झुकाए खड़ा था। अली की आँखों में खेल का मैदान तैर गया। उसकी आँखें बाज़ की आँखों से कम नहीं लग रही थी। बाज़ की आँखों की ललाई उन आँखों में नज़र आ रही थी। नहीं, उनके साथ वैसा कुछ नहीं होगा। लेकिन ये लोग यहाँ आए कैसे? मूसा ने तो कहा था यहाँ कोई नहीं आता। क्या मूसा का हिसाब-किताब ग़लत ठहरा था? लेकिन मूसा, मूसा कहाँ है! बाला हिसार के ज़ख़्मों में अभी कुछ और ज़ख़्म जुड़ने बाक़ी थे लेकिन वो बेख़बर आँख बंद किये खड़ा रहा।

अली की आँखें उन लोगों का पीछा करते हुए मूसा पर ठहर गयी। मूसा उन लोगों के साथ खड़ा था। उसकी बन्दूक उसके हाथ में थी। इतने मुश्किल समय में भी अली मुस्कुरा उठा। उनका बहादुर मूसा। इतनी बड़ी फ़ौज के सामने खड़ा है। उन्हें पहला दिन याद आया जब मूसा ने बन्दूक से इशारा करके दिखाया था और वे तीनों हँस पड़े थे। क्या मूसा उनका सामना कर पाएगा? नहीं उन्हें यहाँ से निकलना होगा। कोई जुगत लगानी होगी नहीं तो वे पीट-पीट कर सबको अधमरा कर देंगे। उसे मूसा के जिस्म के निशान याद आए। वे तो फिर भी झेल जाएँगे लेकिन बेचारी शीर... सोचकर उसकी साँस थम गयी। मासूम और नाज़ुक शीर...उसने कस कर शीर को चिपटा लिया।

वह सोच रहा था आगे क्या करना है कि मूसा की चीख सुनाई दी। एक आदमी ने उसे कस कर लात मारी थी। मूसा की बन्दूक उसके हाथ से छूट गयी और वह नीचे गिर पड़ा था। उसकी आँखों में क्या था अली नहीं देख पाया पर मूसा की डरी हुई आवाज़ सुनाई उसे सुनाई दी,

‘‘मैं सच कहता हूँ मैं इन लोगों के साथ नहीं हूँ। मुझे इनके मंसूबों की ख़बर हो गयी थी इसलिए इनका पीछा करते चला आया। मैं ग़द्दार नहीं हूँ।‘‘

सुनकर अली और फ़रहाद के पैर के नीचे की ज़मीन खिसक गयी। उन्हें यक़ीन नहीं आया कि यह उनका मूसा है। नहीं, नहीं मूसा उन्हें बचाने के लिए ज़रूर कोई चालाकी कर रहा है। उन्होंने मूसा को नज़र भर कर देखा कि कहीं कोई इशारा मिले पर मूसा ने उनसे निगाह नहीं मिलायी थी। वह घुटनों पर गिरा उनसे गुज़ारिश कर रहा था कि इन बद्तमीज़ बच्चों को भरपूर सज़ा मिलनी चाहिए। मूसा के साथ बिताए लम्हे अली और फ़रहाद की निगाह तले दम तोड़ रहे थे। वो सच था कि ये सच है? एक लम्हा दोस्त होकर, दूसरा लम्हा कोई दग़ा कैसे कर सकता है? नहीं, उन्हें उस पर शुबहा नहीं करना चाहिए। आख़िर को उनकी थाली का नमक एक है। मूसा ने कहा था वह मरते दम तक उनका साथ देगा। वो कोई न कोई तरकीब ज़रूर निकाल लेगा। उन्हें अपने दोस्त की मुहब्बत पर अब भी यक़ीन था। अली, फ़रहाद और शीर एक दूसरे से सटे खड़े थे। अगले लम्हे से नावाक़िफ़, यक़ीन और नायक़ीनी के दरमियाँ, फिर भी उम्मीद से भरे। तभी मूसा ने नीचे से बन्दूक उठायी थी और उनकी आँखें पुरसुकून हो गयी थीं। अपनी दोस्ती पर उन्हें नाज़ हो आया था। मूसा उन्हें यहाँ से निकाल ले जाएगा। लेकिन नहीं, यक़ीन मैला हो गया था।

कुछ देर पहले जिन शक्लों में उसने अपने अनदेखे ख़ानदान का तसव्वुर किया था, उसे वो अपने हाथों से मिटाने वाला था। उसकी रूह लम्हे भर को काँपी पर फिर उसने आँखें बंद कर लीं। उसकी बुज़दिली उसे ज़िंदगी भर सज़ा देगी, उसे मालूम नहीं था। वह तमाम ज़िंदगी आईना देखने से घबराएगा, वह कहाँ जानता था। एक जीता-जागता शख़्स अचानक गुम होकर अपने पीछे इस जहान में कितनी वीरानी रख जाता है, वो ज़िंदगी भर महसूस करेगा। बची हुई ज़िंदगी वह पतंग के मेलों में अली और फ़रहाद की सूरत देखने को भटकेगा इसका इलहाम उसे होता तो शायद वह उस दिन जिस्म पर मिलने वाले निशानों से नहीं घबराता। उस अज़ीयत से घबराकर उसने जो फ़ैसला लिया था, उसकी रूह को हमेशा के लिए ज़ख़्मी कर देने वाला था।

पिछली दफ़ा का ईनाम मेवे थे, इस दफ़ा ईनाम में मूसा को ख़ुद की ज़िंदगी मिली।

(आँखें स्याह हो गयी थीं।)

मेरे सामने बैठे शख़्स की निगाह दूर कहीं उफ़ुक़ पर अटकी थीं। मैंने उनकी गर्म हथेली को अपनी हथेली में भींच लिया। मेरी आँखों में दर्द का दरिया उफन रहा था लेकिन उनकी आँखों में सिवा तिश्नगी के कुछ नहीं था।

‘‘आप कौन हैं?‘‘

‘‘बरसों हुए मैं अपना नाम नहीं लेता। फिर भी आप चाहें तो मुझे दग़ाबाज़ पुकार सकती हैं।‘‘

उनकी आँखों में दूर कहीं अली और फ़रहाद के कहकहे थे। शीर के लम्बे सुनहरे उड़ते बाल थे। वतन की ख़ुशबू थी। वह मरा हुआ आदमी अपनी आँखों के भीतर कुछ लोगों को ज़िंदा रखे था।

रतिनाथ का पलंग: सुभाष पंत

◆रतिनाथ का पलंग ◆सुभाष पंत बावन साल की उमर में रतिनाथ की जिन्दगी में एक ऐसा दिन आया जब वह बेहद खुश था और अपने को दुनिया का सबसे सुखी प्राणी ...