शनिवार, 4 अगस्त 2018

कोरे कागज़- अमृता प्रीतम

"किसी त्याग देने वाले को ढूँढना, अपना लेने वाले का अपमान होता है।"

"कुछ दीये आरती के थाल में रखने के लिए होते हैं, और कुछ दीये सिर्फ़ मरने वालों के सिरहाने के पास रखने के लिये।"

अमृता प्रीतम के गद्य से गुज़रना किसी नियामत से कम नहीं ! भाषा, संवेदना और मानवीयता की ऐसी तरल ज़मीन उन्हें उनके समकालीन रचनाकारों से एक अलग स्तर पर ले जाती है। ये उनके लेखन का ही कमाल है कि मात्र सत्तासी पृष्ठों का छोटा सा उपन्यास "कोरे कागज़"  अब तक कई कई बार पढ़ा जा चुका है। संवेदना और जीवन-दर्शन उनकी रचनाओं में कितनी सहजता से एक रूप लेते हैं, देखकर आश्चर्य होता है---

"पीर फ़कीरों ने जिस्म को ख़ुदा का हुजरा कहा है,आत्मा की कोठरी। पर यह दुनिया कोठरी को मान्यता देती है, आत्मा को नहीं। भूल जाती है कि कोठरी आत्मा के कारण महान होती है।"

आत्मकथात्मक शैली में लिखे गए इस उपन्यास का नायक है पंकज, जो इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष का छात्र है। कहानी का आरंभ 27 अक्टूबर के उस दिन से होता है जब उसकी माँ अपने अंतिम समय में होती है। अमृता शुरुआती पंक्तियों से ही पाठक को एक अलग संसार में ले जाती हैं---

" माँ की देह में अभी पाँचों तत्व जुड़े थे, पर प्राणों के धागे की गाँठ बस खुलने को थी। उसने काँपते होठों से पाँच ख़्वाहिशें ज़ाहिर कीं.. शायद एक एक तत्व की एक एक ख़्वाहिश थी।"

माँ के बाद पंकज के जीवन में आत्मीय सम्बन्धों के नाम पर शेष हैं सन्यासी निधि महाराज और रक्खी मौसी, तो दूसरी तरफ परिवार के नाम पर जनक चाचा जो नहीं चाहते थे कि माँ का अंतिम संस्कार पंकज करे किन्तु निधि महाराज के पास जनक के हर सवाल का तार्किक उत्तर था और इसी कारण वह चाहकर भी मनमानी नहीं कर पाते। इसी बातचीत में उसे मालूम पड़ता है कि वो वह माँ का सगा नहीं बल्कि उनका दत्तक पुत्र था। पंकज का अपरिपक्व मन ऐसे प्रश्नों में डूब जाता है जिनका कोई स्पष्ट उत्तर फ़िलहाल उसके सामने मौजूद नहीं है।

निधि महाराज से मिलने आये एक अन्य ज्योतिषी कृष्णन शास्त्री से बातचीत के दौरान उसके असमंजस और बढ़ जाते हैं जब वो पंकज की जन्मपत्री देखते हुए बताते हैं कि " तुम्हारी माँ का अल्प आयु योग बनता है। क्या वे तुम्हें जन्म देते ही मर गयी थीं?" पंकज उनसे कहता है कि माँ की मृत्यु तो पाँच दिन पहले ही हुई है। असमंजस में पड़े दोनों ये मान लेते हैं कि शायद पत्री ग़लत बनी होगी। फिर.. उसकी बहन गीता की जन्मपत्री देखकर शास्त्री जी बताते हैं कि उसकी मृत्यु बरसों पूर्व पानी में डूबने से हुई थी। कुण्डली का अध्ययन करते करते चौंकते हैं शास्त्री जी और दबे स्वर में बताते हैं कि गीता ने आत्महत्या की थी । नाश्ता लेकर पहुँची रक्खी मौसी से पंकज जब पूछता है तो वो भी संतोषजनक जवाब नहीं देतीं।
धीरे धीरे पंकज समझ जाता है कि उसके जन्म के रहस्य से मौसी और निधि महाराज परिचित हैं किंतु उसके जानने का समय अभी नहीं आया है---
"शायद कुछ विश्वास होते हैं जिन्हें चुप की ज़रूरत होती है।"

किताब के कुछ प्रभावी अंश देखिए--

" धरती पर बहने वाली गंगा को भागीरथी कहते हैं। आकाश गंगा को मंदाकिनी और पाताल गंगा को भोगवती। ये तीनों गंगाएँ हर इंसान के भीतर बहती हैं। कल्पना शक्ति वाली गंगा ज़रूर आकाश गंगा है, चेतन मन वाली भागीरथी है और अवचेतन में उतरकर बहती हुई गंगा पाताल गंगा है।"

"जन्म और रूप जैसे कर्म परमात्मा ने अपने हाथों में रखकर, सचमुच गुण जैसा कर्म मनुष्य के हाथ में दे रखा है।"

"इंसान तब देवता होता है जब किसी भी गुज़र चुके वक़्त की परछाईं उसके साथ नहीं होती।"

"जल और मिट्टी में यही फ़र्क़ होता है कि जल में किसी का पुण्य भी बह जाता है, पाप भी। पर मिट्टी में सब कुछ ठहर जाता है और फिर मिट्टी में से उग आता है।"

माँ की अस्थियाँ प्रवाहित करने के लिए पंकज निधि महाराज के साथ हरिद्वार की यात्रा पर निकलता है।
इस यात्रा और प्रवास के दौरान उसे अपने उन तमाम प्रश्नों और चिंताओं का उत्तर निधि महाराज से प्राप्त होता है, जिन्होंने उसके अवचेतन को लगातार व्यस्त रखा था। साथ ही आत्मीय क्षणों में निधि महाराज के अतीत और वर्तमान की अनेक परतें भी उसके सामने खुलती हैं। उनके वार्तालाप का एक मार्मिक अंश----

"क्या मोह ममता सिर्फ़ दुनियावालों के हिस्से आती है? नहीं ! दुनिया वालों के हिस्से आ जाती तो कुछ भी मुश्किल नहीं होता। यह सिर्फ़ उसके हिस्से जाती है, जिसे इस रिश्ते की पहचान होती है।

जिसने कोई दर्द नहीं जाना, वह सन्यास किस चीज से लेगा? क्यों लेगा? दर्द से मुक्त होने का यत्न ही सन्यास है। सन्यास मन की अवस्था होती है, विरासत में मिले हुए मन्दिर की पूजा नहीं। हम सब कभी न कभी ज़िन्दगी का ज़हर पीते हैं, पर इससे हम शिव नहीं बन सकते। ज़हर ज़हर का अंतर होता है। जिस समय मुझे जो ज़हर पीना चाहिए था, मैं वह पी नहीं सका। मुझे वह पार्वती मिली, जिससे मिलकर मैं सचमुच शिव हो सकता था और उस वक़्त मुझे सिर्फ़ अपनी परंपरा को तोड़ने का एक ज़हर पीना था, जो मैं नहीं पी सका। वह पार्वती इस शिव को नाकारा समझकर किसी और में अपना शिव पा लेती तब भी इस दर्द का ज़हर पीना ज़्यादा मुश्किल नहीं था। पर जब सुना कि ब्याह की रात घर से वह डोली में नहीं, बल्कि अर्थी में निकली है तो समझ लिया कि अब मैं कोई भी ज़हर पीकर शिव नहीं बन सकूँगा।"

" दूसरे का दुःखान्त न सोचने वाले को अपने दुःखान्त को सोचने का हक़ नहीं होता।

वह आदमी सचमुच बदनसीब होता है जिसे एक दिन अपने खून से माफ़ी माँगनी पड़ती है।"

उपन्यास के उत्तरार्द्ध के अहम हिस्से की जानकारी अधूरी छोड़ रहा हूँ ताकि पाठक इसे पढ़ते समय कहानी का समुचित आनन्द उठा सकें।

भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित "कोरे कागज़" का मूल्य है मात्र साठ रुपये और अब तक इसके बारह पेपरबैक संस्करण आ चुके हैं। इमरोज़ साहब द्वारा बनाया गया कलात्मक आवरण भी दर्शनीय है।

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