शनिवार, 23 मार्च 2019

मन्नत टेलर्स : प्रज्ञा

■ मन्नत टेलर्स : प्रज्ञा

शायद नया ज्ञानोदय के अक्टूबर 2017 का 'महिला स्वर' पर केन्द्रित अंक था जिसमें प्रज्ञा की कहानी प्रकाशित हुई थी- "उलझी यादों के रेशम"...
उस कहानी के दुःख और संवेदना की गूँज लम्बे समय तक मनःस्थिति पर कायम रही। वृद्धावस्था और अकेलेपन के कारण अपनी स्वाभाविक रौनक और जिंदादिली खोकर दिन ब दिन जर्जर होते पिता के एक बेटी की दृष्टि से चित्रित इस मर्मस्पर्शी आख्यान को प्रज्ञा ने जिस जिस संवेदनशीलता से रचा था, वह एक होनहार कथाकार की रचनात्मक सामर्थ्य का सशक्त उदाहरण अनुभव हुआ था। फिर उनका उपन्यास ' गूदड़ बस्ती' पढ़ा। 'मन्नत टेलर्स' , 'एक झरना ज़मींदोज़' और 'मालूशाही- मेरा छलिया बुरांश' जैसी कहानियों को पढ़ते हुए प्रज्ञा का शुमार उन कथाकारों में हो चला जिनकी कहानियों का इंतज़ार रहता है। बोझिल विमर्शों और वाद से दूर उनकी कहानियाँ लोक की उस परम्परा से जुड़ती हैं जहाँ व्यक्तिगत विचारधारा के अवरोध कम और कहानी की आत्मा ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है। सबसे ज्यादा आश्वस्तिकारक है प्रज्ञा की कहानियों की बड़ी रेंज जो उन्हें अपने समकालीन लेखकों की पहली पंक्ति में स्थापित करती है। उनकी सरल सहज भाषा पाठकों को इन कहानियों से इस सहजता से जोड़ लेती है कि उनके पात्रों के सुख दुःख उन्हें अपने से लगने लगते हैं। किसी लेखक की दीर्घकालिक सफलता को जो तत्व निर्धारित करते हैं उनमें एक महत्वपूर्ण तत्व ये है कि वह अपनी रचनाओं में अपने समय, अपने कालखण्ड की जय, पराजय, विकास और विनाश को कितनी कुशलता से दर्ज़ करता है और फिर उसके सरोकार और सामाजिक प्रतिबद्धताएँ। प्रज्ञा अपनी कहानियों में बार बार उन्हें शामिल करती हैं जो इस उत्तर आधुनिक युग की कृपा से शोषित, वंचित और विस्थापित जीवन जीने को बाध्य हैं।

'तक़सीम' के बाद उनका दूसरा कहानी संग्रह "मन्नत टेलर्स" जनवरी 2019 में साहित्य भंडार इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में बहुचर्चित शीर्षक कहानी और  "उलझी यादों के रेशम" सहित कुल ग्यारह कहानियाँ संग्रहीत हैं जो पिछले दो तीन वर्षों के दौरान साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं।
इस संग्रह में संकलित कहानियों के नाम इस प्रकार हैं....

लो बजट
तेरहवीं दस्तक
उलझी यादों के रेशम
ज़िन्दगी के तार
पिछली गली
परवाज़
मन्नत टेलर्स
तबाह दुनिया की दास्तान
एक झरना ज़मींदोज़
अंधेरे के पार
बतकुच्चन

विकास की अंध-दौड़ में ख़त्म होते देशी रोजगार और लुप्तप्राय हो रही हस्तकलाओं के दर्द के बीच जाति और धर्म की जटिलताओं से परे इंसानी रिश्तों की रूहानियत बयान करती शीर्षक कहानी 'मन्नत टेलर्स' और जीवन के कठिनतम संघर्षों के बाद भी शेष रहती मानवीय जिजीविषा और जीवन राग को पूरी शिद्दत से चित्रित करती ' ज़िन्दगी के तार 'हो, या फिर रोज ब रोज दिन भर की कठोर मेहनत और मशक्कत के सहारे जीवन बिताते उन सब्जी वालों की कहानी " पिछली गली " जो मेट्रो स्टेशन और मॉल के लिए लगातार विस्थापित होते रहते हैं, अपनी पारिवारिक विषमताओं से जूझती किन्तु उड़ान के हौसलों से भरपूर खुशबू जो अपनी कॉलेज की पढ़ाई और अध्यापकों से मिल रहे समर्थन और सहयोग को खो देने के डर से थोड़ा सा जूठ भी बोल लेती है, या फिर रेडियो कमेंटेटर को पीछे छोड़ती "बतकुच्चन" दो बहनों का नॉन स्टॉप घंटों घंटो का वार्तालाप, प्रज्ञा अपने किरदारों और स्थितियों के भीतर तक पैठ बना लेती हैं।
जो एक दो कहानियाँ कथ्य के स्तर पर अन्य कहानियों से थोड़ी कमतर हैं वे भी अलग तरह के लेखकीय प्रयोग के कारण रोचक बन पड़ी हैं।

"अंधेरे के पार" इस संग्रह की बेहतरीन कहानियों में है। दो पीढ़ियों के परस्पर विपरीत स्वभाव वाले कुछ किरदारों की गहन मानवीयता से सजी इस कहानी को प्रज्ञा ने अपनी मर्मस्पर्शी चेतना और संवेदना से साकार कर दिया है।

★ मन्नत टेलर्स
★ प्रज्ञा Pragya Rohini
★ साहित्य भंडार इलाहाबाद साहित्य भंडार इलाहाबाद
★ पृष्ठ 148
★ मूल्य : ₹ 125

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