शुक्रवार, 29 मार्च 2019

नीला चाँद (समीक्षा) : जीतेन्द्र पाण्डेय

सबके अंतस में है "नीला चाँद"

मध्यकालीन भारत का सबसे बुजुर्ग शहर बनारस है । मुग़ल आक्रांताओं के पहले का बनारस । एक ऐसा नगर जहाँ अपरंपार विदेशी मुद्रा आती थी । हस्तनिर्मित वस्तुओं की कलात्मकता संपूर्ण भूमंडल को आकर्षित करती । अनेकों वीथियों से सजा-सँवरा बनारस अपने आप में बेजोड़ था । यहाँ भोग और अध्यात्म साथ-साथ चलते थेे ।  तत्कालीन वाणिज्य, परंपरा, संस्कृति, धर्म, राजनीति, महत्त्वाकांक्षा, इतिहास, भूगोल और लोकजीवन का मिश्रण यदि किसी उपन्यास में मिलता है तो निस्संदेह शिवप्रसाद सिंह का "नीला चाँद'' है ।
              इस महाकाय उपन्यास में महाकाव्यत्व की सभी शर्तें पूरी होती हैं । साथ ही यहाँ जयशंकर प्रसाद की ऐतिहासिक भावभूमि को सतर्क विस्तार मिला है । उपन्यास में इतिहास, साहित्यिक शैली में लोक से संवाद करता है । इसमें एकरसता नहीं बल्कि  प्रेमचंद की यथार्थ वाली खुरदुरी जमीन  है । पाठकों को यदि जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद के साहित्य को आमने-सामने रखकर समझना है तो "नीला चाँद" अवश्य पढ़ना चाहिए ।  राजमहलों से लेकर झोपड़ियों तक की गहन पड़ताल इस उपन्यास में मिलती है । ब्राह्मण से चांडाल तक की मनःस्थितियों को खंगाल कर उच्चतर मूल्यों को प्रतिष्ठित किया गया है ।
            उपन्यास का नायक कीर्ति वर्मा हैं । आग की लपटों में घिरे राजमहल कालंजर से कथानक का प्रारंभ होता है । दूर पहाड़ी की ऊँची चट्टान पर कीर्तिवर्मा हाथ मलते अपना सर्वस्व लुटता हुआ देखते रहते हैं । उनकी आँखों में वह दृश्य भी तैरने लगता है जब आतताई राजा कर्ण, समाधि में बैठे  उनके बड़े भाई देववर्मा का सिर कबंध से अलग करता है । उसका क्रूर अट्टहास कानों में गूँजने लगता है । दूसरे ही क्षण वधू वेश में उनकी भाभी जू का स्मरण हो आता है जो अपने पति के सिर और कबंध को लेकर चिता पर बैठी हैं । शीघ्र ही चिता धू-धूकर जलने लगती है । चारों ओर आग ही आग । ऐसा लग रहा है मानो अग्नि की सातों जिह्वावें लपलपाती हुई सब कुछ लील रही हों । कीर्ति वर्मा  सिर पकड़कर बैठ जाते हैं । उनका प्रिय अश्व प्रचंड जोर से हिनहिनाता है । तभी प्रधान आमात्य गोपाल भट्ट अपने सहयोगियों के साथ आते हैं । संकल्प-विकल्प और नीति-अनीति पर विचार-विमर्श होता है । निर्णय लिया जाता है कि  बुंदेलखंडी साधु-वेश में कीर्ति वर्मा कीरत बनकर, मंत्री अनंत अंतू बनकर और कवि कृष्ण मिश्र किसन मिसिर बनकर वाराणसी पहुँचें और वहीं आगे की रणनीति बनें । इसके बाद का पूरा घटनाक्रम बनारस की धरती पर चलता है ।
             उपन्यासकार शिवप्रसाद सिंह एक इतिहासकार भी थे । ऐतिहासिक प्रमाणों को उन्होंने स्वयं  जाँचा-परखा । शिला-लेखों एवं भूर्जपत्रों पर अंकित लिपियों पर उनकी बड़ी पैनी दृष्टि थी । दोनों के काल निर्धारण  के लिए कई तथ्य जुटाए गए । खुदाई के दौरान प्राप्त मूर्तियों एवं धातु-मुद्राओं पर बड़ी गहराई से विचार हुआ है । इतिहास का तटस्थ और तर्कपूर्ण मूल्यांकन करने के बाद मंदिरों, मठों, झीलों, खंडहरों और ऐतिहासिक स्थलों को उन्होंने उपन्यास में शामिल किया । तत्कालीन समाज की सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक समझ शिवप्रसाद सिंह के व्यक्तित्त्व के अनछुए पहलुओं को  उद्घाटित करती है ।  उपन्यास के पात्रों का चयन एवं नामकरण कथानक के अनुरूप किया गया है । संवाद की भाषा बदलती रहती है । पात्रों के अनुसार कभी संस्कृत, कभी पालि, कभी अवहट्ट, कभी भोजपुरी, कभी बंगला तो कभी लोकभाषा । जब कीर्तिवर्मा कालंजर छोड़ बनारस की ओर प्रस्थान करते हैं तो एक सामान्य स्त्री  गाती है -
"हंसा फिरे विपत के मारे अपने देस निनारे
अब का बैठे ताल तलइयाँ छोड़े समुद्र किनारे
अपने देस निनारे - अपने देस निनारे - "
उपन्यास में लोक को विशेष स्थान दिया गया है । कार्षापण (सिक्का), प्रसेव (थैली), द्रम्म (द्रव्य-धन) जैसे दर्ज़नों शब्दों से पाठक परिचित होते हुए कथा का आनंद लेते चलता है । कृतिकार ने लोक और शास्त्र में सदैव अभिन्नता दर्शायी है । शास्त्र, लोक में कुछ यूँ धंसा है - "शरीरी प्रेम लाल, मानसिक प्रेम श्याम  और आत्मिक प्रेम श्वेत होता है ।"
              कहा जाता है बनारस शिव के त्रिशूल पर टिका है । इसलिए "धगद्धगद्धग-ज्ज्वल-ल्ललाट-पट्ट-पावके" की अनुगूँज पूरे उपन्यास में सुनाई देती है । नंदीश्वर का ज्योतिर्लिंग विराट रूप लेने लगता है ।  यहाँ की आबो-हवा में पराक्रम, ज्ञान और वैराग्य घुला है । महायोगिनी माँ शीलभद्रा इस रहस्य से परिचित हैं । उनका वरदहस्त उन सबके ऊपर रहता है जो अन्यायी यशः कर्ण के विरोध में खड़े हैं । आमात्य और भृत्य दोनों इनके सामने नतमस्तक होते हैं । आगे चलकर अध्यात्म की ऊँचाइयाँ वासुदेव की अनंत लीला में एकीकृत होने लगती हैं । माँ शीलभद्रा  स्वयं एक योगिनी होकर गोपगान करती हैं । इनका आश्रम तप के तेज से सदैव देदीप्यमान रहता है । नया  आगंतुक आते ही उस अलौकिक प्रकाश को सहन नहीं कर पाता और मूर्छित हो जाता है । उपन्यास के नायक कीर्तिवर्मा स्वयं इस अनुभव से गुजरते हैं । माँ शीलभद्रा कथानक की महत्त्वपूर्ण पात्र हैं । इनसे लगभग सभी पात्र जुड़े हैं । आर्य नस्ल की अद्वितीय सुंदर कन्या गोमती का विवाह महायोगिनी की कृपा और उनकी देख-रेख में संपन्न होता है । बौद्ध धर्म की दोनों शाखाओं (हीनयान और महायान) के उच्च आदर्श और पतन को बड़ी बेबाकी से दर्शाया गया है ।
               उपन्यास में राजा भोज की सदाशयता की मुक्तकंठ से प्रशंसा की गई है । बड़े विस्तार से बताया गया है कि वे किस तरह वाराणसी के राजा धूर्त कर्ण के बिछाए मोहरों में फँस जाते हैं । साथ ही राजा भरथरी और रानी पिंगला की संक्षिप्त कथा यहाँ मिलती है । जब कीरत (कीर्तिवर्मा) भरथरी को उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराते हैं तो योग को साधने वाला वैरागी झेंप जाता है । इस प्रकार उपन्यास में कई अन्तरकथाएँ गुम्फित, फलित और पूर्ण होती हैं ।
             खड़ग संचालन और धनुर्विद्या का बड़ी सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है । इसके अलावा तीर और तलवार में ऐसे विष के लेपन की बात की गई है जिनके खरोंच मात्र से सैनिक की मृत्यु हो जाती थी । युद्ध के समय उन जड़ी-बूटियों का भी उल्लेख है जिनका प्रयोग करने से व्यक्ति की मौत नहीं बल्कि घाव में सड़न पैदा हो जाती । एक माह के भीतर वह तड़प-तड़पकर मर जाता था । अश्व-प्रशिक्षण और संचालन की बारीकियों को इस तरह बताया गया है कि पाठक जानवरों की संवेदना एवं भाषा में रुचि लेने लगता है । इन सबसे गुजरते हुए वेद व्यास का महाभारत में वर्णित आयुध-वृत्तांत का स्मरण हो आता है । कितना सघन ! कितना विस्तृत ! ऐसा लगता मानो इन स्थानों पर भगवान वेद व्यास उपन्यासकार में उतर आए हों । ज्ञान का अगाध विस्तार ।
            फूटते उजास के पूर्व गंगा स्याह होती हैं । इसके बाद क्रमशः इनकी मंथर धार रंग बदलने लगती है । रजत, ताम्र और स्वर्ण में रूपांतरित होती हुई माँ गंगा सूर्यास्त तक लगभग चौबीस रंग धारण करती हैं । प्रश्न यह उठता है कि यदि गंगा की विभिन्न छवियों का फिल्मांकन करना हो तो कैसे संभव होगा ? शायद असंभव लेकिन इनका शाब्दिक फिल्मांकन "नीला चाँद" जैसे ऐतिहासिक उपन्यास में मुमकिन हो पाया है ।  शिवप्रसाद सिंह के दूसरेे उपन्यास "गली आगे मुड़ती है" में भी इन बिंबों का सिलसिलेवार निदर्शन है । यदि गंगा के अलौकिक सौंदर्य का पान करना हो तो एक बार इस कालजयी कृति से अवश्य गुजरना चाहिए । वर्तमान बनारस के आचार-विचार और रहन-सहन के सूत्र यहीं बिखरे मिलेंगे । कुछ उलझे-उलझे से किंतु पारदर्शी । ठीक वैसे ही जैसे सदाशिव की उलझी जटाओं से गिरतीं निर्मल गंग-धारा । अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण "नीला चाँद" जैसी कृति का पुनर्मूल्यांकन होता रहेगा । उसके लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार और व्यास सम्मान की कसौटी कोई मायने नहीं रखती ।
              उपन्यास का संदेश उसके नायक कीर्ति वर्मा में छिपा है । वह दुश्मन के घर में रहकर उसकी नाक के नीचे युद्ध की रणनीति बनाता और उसे अमल में लाता है । शत्रु राजा कर्ण की कलचुरी सेना में अपने मंत्री अनंत का प्रवेश कराता है । उसकी एक-एक गतिविधि पर नज़र रखी जाती है । सामान्य प्रजा के सहयोग से कीर्तिवर्मा और उनके सहयोगी शत्रु को शिकस्त पर शिकस्त देते हैं । आश्चर्य की बात यह कि वह किसी पड़ोसी राजा की मदद नहीं लेते बल्कि उनके सहयोगी डोम, धरिकार, आदिवासी, मछुआरे, मुसहर और मल्लाह बनते हैं । उनसे राजा अतिशय प्रेम करता है । वे भी अपने राजा के लिए मौत से लड़ने के लिए तैयार रहते हैं । पूरा युद्ध वाराणसी में लड़ा जाता है । युद्ध के दौरान कीर्तिवर्मा  धर्म और अध्यात्म के मर्म समझने के लिए अनेकों आचार्यों, साधकों, पुरोहितों के संपर्क और संगति में रहते हैं । स्वयं महायोगिनी माँ शीलभद्रा उनके भविष्य को पढ़कर संभावित विपत्तियों के प्रति  आगाह करती हैं । आचार्य वृषध्वज भगवान नंदीश्वर की महिमा समझाते हैं । "जय कंदार्य" का उद्घोष करते चंदेल युद्ध जीतते भी हैं । राज्याभिषेक के समय कृष्ण मिश्र जैसे उच्चकुल में उत्पन्न कवि को कोई पद नहीं मिलता जबकि नीच समझी जाने वाली जातियाँ बड़े पदों पर आसीन होती हैं । वहीं दूसरी ओर सभी मत-मतान्तरों को दरकिनार करते हुए उपन्यास का नायक उद्घोष करता है कि पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ किए गए संकल्प कार्यसिद्धि में सहायक होते हैं - पूजा, व्रत, तप, अनुष्ठान  नहीं । व्यक्ति पर जब भी संकट आता है उसकी अन्तरशक्ति सक्रिय होने लगती है । अमावस के समय "नीला चाँद" की प्रतीक्षा बड़ी शिद्दत से होती है । ऐसे समय में उसकी पहचान जरूरी है क्योंकि सबके अंतस में छिपा होता है "नीला चाँद" ।

समीक्षक -
जीतेन्द्र पाण्डेय
उपन्यासकार -
शिवप्रसाद सिंह
उपन्यास -
नीला चाँद
वाणी प्रकाशन
नई दिल्ली ।
मूल्य - ₹ 700

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