सोमवार, 21 सितंबर 2020

कलेजा: राजेन्द्र श्रीवास्तव

कलेजा

प्रबोध नहीं आया था। 
मेरा मन कह रहा था कि वह ज़रूर आएगा। मेरी आंखें स्टेशन की बेतरतीब भीड़ में अब भी उसे तलाश रही थीं। 
सुनंदा हौले से बुदबुदाई, " मैं पहले ही जानती थी...." क्षोभ और विषाद का मिला-जुला एक विचित्र किस्म का भाव उसके चेहरे पर उभर आया था। 
मैंने असहाय भाव से कंधे उचकाए और गहरी निःश्वास छोड़ी। 
अहमदाबाद स्टेशन के विशाल प्लेटफार्म पर हम मानो बिना किसी मकसद के खड़े थे। ट्रेन हमें उतारकर आगे बढ़ चुकी थी।
"शायद रास्ते में कहीं फंस गया हो ... " मैंने धीमे स्वर में कहा। पत्नी को सुनाने से ज्यादा यह अपने आप तक आवाज पहुंचाने की कोशिश थी। कोशिश नाकामयाब रही।
मैंने कमीज की जेब से सिगरेट का मुड़ा-तुड़ा पैकेट निकाला। एक सिगरेट खींचकर मैंने बिना सुलगाए ही होठों में दबा ली। फिर कुछ क्षण मैं सिगरेट उंगलियों में फिराता रहा। अंत में सिगरेट वापस डालकर मैंने पैकेट को फिर जेब में ठूंस लिया। 
"ये लोग बड़े मनी - माइन्डेड होते हैं... मैं पहले ही जानती थी... " सुनंदा ने अबकी पूरे विश्वास से कहा। 
"हर जगह, हर तरह के लोग होते हैं... " मैंने प्रतिवाद-सा किया, " मैं उसे फोन लगाता हूं... "
सुनंदा ने मुंह बिचकाया। मतलब यह था कि जो करना है करो, मेरी बला से। फिर अगले कुछ क्षण मैं फोन पर व्यस्त रहा। 
अक्तूबर की सुबह की धूप भी इतनी तीखी थी कि हम असहज हो रहे थे। सूरज किसी सूदखोर महाजन की तरह मानो कटाई से पहले ही बिलकुल हमारे सर पर आ खड़ा हुआ था। 
फोन बंद कर मैंने सुनंदा की ओर देखा। आंखें ही नहीं, सुनंदा की पूरी देह ही प्रश्न में तब्दील हो गई थी। 
मैं फीकी हंसी हंसा, " वो मौजूद नहीं है घर पर, पर मैसेज रख छोड़ा है हमारे लिए। किसी होटल हाईनेस में कमरा बुक किया है। "
सुनंदा ने " देखा! मैं न कहती थी " वाले भाव से मेरी ओर देखा । मैं कुछ अन्यमनस्क होकर परे देखने लगा। 
दर्शन इतना समृद्ध है कि आम आदमी तक सहजता से इसकी पहुंच है। कोई भी व्यक्ति इसका आधार लेकर कम से कम नसीहतें तो दे ही सकता है। विशेषकर किसी कठिन स्थिति में अथवा किसी समस्या का समाधान उपलब्ध न होने पर, सामने वाले को दिलासा देने के लिए हमारे पास बहुत कुछ है। " नेकी कर दरिया में डाल ", "मोर एक्सपेक्टेशन, मोर फ्रस्ट्रेशन " कह - कहकर मैंने न जाने कितनी बार पत्नी को बहलाया था या आप यूं भी कह सकते हैं कि बेवकूफ बनाया था। पर इस बार वह समझने को तैयार ही नहीं थी। 
हम घूमने आए थे और अब पुरानी बातों को याद करने से कोई फायदा नहीं था, पर मनपसंद भीतर - कचरा बाहर, विचारों की आमद की राह में ऐसा कोई फिल्टर लगाना संभव ही नहीं था। हम चार साल पुरानी बातों को नई टीस के साथ याद कर रहे थे।
तब प्रबोध सीधे घर आ गया था। परिचय कुछ खास था नहीं, बस इतना ही कि हम एक ही थर्मल कंपनी में काम करते थे। मैं मुंबई कार्यालय में मैनेजर था, जबकि वह अहमदाबाद कार्यालय में कैशियर। कंपनी की हाउस मैगजीन में उसकी एक कविता छपी थी- " कलेजा "। कलेजा ही था कविता का नाम। ठीक याद नहीं। कुछ और भी हो सकता है। भाव यह था कि सदियों से सुनसान रास्ते पर चला आ रहा एक युगल इस धरती को प्रकाश देने का प्रयास कर रहा है। यहां तक कि अंधेरा अधिक होने पर दोनों अपना कलेजा जलाकर भी उजाला कर रहे हैं। पर उस रोशनी में भी ये कोई नहीं देख पाता कि हंसती - खिलखिलाती उस लड़की और मुस्कुराते हुए उसके प्रेमी के कलेजे में सदियों पुराना दर्द समाया हुआ है। अब मुझे ठीक याद आ गया, कलेजा ही था कविता का शीर्षक। कविता में कृत्रिमता नहीं थी। एक कच्चापन या कहें कि खुरदुरापन था। यही इस कविता का सबसे मजबूत पक्ष था। यह कविता पढ़कर मुझे वरिष्ठ कवि उदय प्रकाश की लंबी कविता 'औरतें' याद आ गई थी। 'औरतें' की कुछ पंक्तियां तो मैं बार - बार पढ़ता हूं और हर बार स्तब्ध रह जाता हूं। जब मैंने 'औरतें' पहली बार पढ़ी थी, तब मैंने उदय प्रकाश को भी पत्र लिखा था। ठीक वैसे ही मैंने कलेजा पढ़कर प्रबोध से संपर्क किया था। 
प्रबोध। प्रबोध शाह। मातृभाषा गुजराती, पर हिन्दी बड़ी अच्छी जानता था और हिन्दी में कविताएं लिखता था। हमारी ही कंपनी के अहमदाबाद कार्यालय में कैशियर, जो कि एक ट्रेनिंग के सिलसिले में मुंबई आया था और मामूली से परिचय की बिला पर सीधे हमारे घर आ गया था। बिना किसी संकोच के। बेहिचक।
"सर, पूरे पांच दिन तकलीफ़ दूंगा आपको... पर दीदी, तुमको जरा भी  तकलीफ़ नहीं दूंगा... "  वह उत्साह में था और मेरी पत्नी को दीदी कह रहा था। गौरतलब यह था कि वह मुझे 'आप' और सुनंदा को 'तुम' संबोधित कर रहा था। 
"...जरा भी तकलीफ़ नहीं दीदी... जो भी तुम बनाओगी, बस दो रोटी और जोड़ना है... कोई पसंद नहीं खास, सब खाता हूं... बस नॉन-वेज नहीं खाऊंगा, गांधीजी के गांव से हूं... "

मैं चकित था। सुनंदा असहज हुई थी, पर कुछ खास नाराज नहीं लग रही थी इस अनाहूत अतिथि से। जबकि हालत यह थी कि वह तौलिया और मंजन तक हमसे मांग रहा था। 
सुनंदा ने अकेले में मेरी क्लास ली, "तुमने सराय बना दिया है घर को, जिसे देखो मुंह उठाए यहीं आ टिकता है।"

"मैंने बुलाया है इसे? " मैंने उलटे आंखें निकालीं, "मुझे तो पता भी नहीं था कि ये आने वाला है, पता होता तो घर को ताला लगाकर भाग जाता।"

"है तो तुम्हारी ही कंपनी का... चिट्ठी तो तुमने ही लिखी थी कि कविता बड़ी अच्छी है... बड़ी श्रद्धा तो तुम्हारे ही मन में रहती है लिखनेवालों के लिए... " उलाहनापूर्ण स्वर।

" ऐसी चिट्ठियां तो मैं रोज दस लोगों को लिखता हूं, तो क्या सब यहीं बसेरा कर लेते हैं... और फिर दीदी तो तुम्हें ही कह रहा है।" पता नहीं क्यों मैं भी शेर हो गया था। 
सुनंदा ने बुरा सा मुंह बनाया। वह कुछ कहती तब तक बगल के कमरे से प्रबोध की आवाज आई। वह गुजराती में कुछ बोल रहा था। 
पत्नी ने इशारे से पूछा कि क्या कह रहा है।
"पूछ रहा है कि कहां रखा है।" मैंने धीमे स्वर में कहा। स्वर के भाव से इतनी भाषा समझने का दम तो मैं भरता हूं।

"क्या कहां रखा है?"

"मुझे क्या पता, उसी से पूछो।" मैंने नाक - भौंह सिकोड़ी और स्वर में अप्रसन्नता घोलने का भरसक प्रयास किया।

अब सुनंदा जरा समझाने वाले भाव में कहने लगी, " ठीक है , हमारा क्या जाता है, कुछ दिन रह ही ले। सुबह से रात तक तो ट्रेनिंग में ही रहेगा... मैं तो कहती हूं कि भई किसी को बुलाओ ही मत... पर जब कोई आ ही जाए तो मुंह मत बनाओ, ढंग से रहो उसके साथ।"
प्रबोध की सरलता या अपनापन, पता नहीं वह क्या था जिससे वह परिवार का  सदस्य-सा लगने लगा। जब तक वह रहा घर में, एक अव्यक्त गर्माहट हम महसूस करते रहे। यह गर्माहट सर्दियों की रातों में अलाव तापने जैसी सुखद थी। सुनंदा से तो वह ऐसे अधिकार से पेश आता था, मानो उसका छोटा भाई ही हो। 
अपनी पत्नी का जिक्र वह बड़े गर्व से करता - "जितनी सुंदर है विशाखा, उससे ज्यादा स्वादिष्ट खाना बनाती है। खास जूनागढ़ की है विशाखा! अगर उसके हाथ की रसोई जीम ली, तो फाइव स्टार का खाना भूल जाएंगे। आप बस एक दिन रुकिए हमारे घर... विशाखा पूरा गुजरात उठाकर रख देगी - उंदिया, खमण, फाफड़ा, गाठिया, चाट-पापड़ी, खाखरा...
प्रबोध की सूची खत्म ही नहीं होती थी।
सुनंदा कहती, " गुजरात तो मन है ही देखने का, हम तो होटल - वोटल भी पता कर रहे थे बीच में... फिर द्वारका - सोमनाथ भी देखना है... "
"होटल?... होटल?? तुम कदम तो रखो दीदी अहमदाबाद में... फिर वहां तुम्हारी थोड़े ही चलेगी... विशाखा तो तुम्हें खींच कर घर ले जाएगी। कम से कम पंद्रह दिन का प्रोग्राम बनाकर आना," उसका स्वर आदेशात्मक हो जाता,  
"विशाखा जब तक मन भर खिला-पिला न देगी और मन भर सुन-गुन न लेगी, कहीं जाने थोड़े ही देगी तुम्हें..."
मैं अलग से कहता सुनंदा से, "पहला आदमी देखा है, जो दूसरों से अपनी बीबी की तारीफ करते नहीं अघाता।"

"तो क्या हुआ... " सुनंदा मुझ पर नाराज होने लगती, "मैं तो गारंटी देती हूं कि विशाखा भी इसके जैसी सरल मन की होगी।"
"मुझे तो अहमदाबाद दर्शन से ज्यादा इसकी जूनागढ़ वाली बीबी को देखने की इच्छा है..." मैं दबे स्वर में कहता।
सुनंदा के आंखें तरेरने से पहले ही प्रबोध बाहर से आकर हमारी चर्चा में शामिल हो जाता, "दीदी, मैं अहमदाबाद से गुजराती वर्क वाली साड़ी तुम्हारे लिए भेजूंगा, साड़ी पर कढ़ाई तो खुद विशाखा करके देगी।" 
प्रबोध के जाने के बाद फिर संपर्क नहीं हो पाया था। तब मेरे घर पर फोन नहीं था, न ही प्रबोध ने कोई नंबर दिया था। मैंने कुछ ही समय बाद थर्मल कंपनी छोड़ दी थी और एक मल्टीनैशनल कंपनी में लग गया था। 
मैंने अपनी ओर से कभी कोई पहल भी नहीं की थी प्रबोध से संपर्क करने की। पर जब अहमदाबाद की एक संस्था ने अपनी प्रॉपर्टी एग्जिबिशन में शिरकत के लिए आमंत्रित किया, तो मैं अनायास ही स्मृतियों के जालों को साफ करता चला गया। पत्नी भी अहमदाबाद जाने के लिए उत्सुक हो उठी। मैंने थर्मल कंपनी के अहमदाबाद कार्यालय से प्रबोध के घर का नंबर हासिल किया। प्रबोध से बात भी हुई। पर शायद समय की गर्द हमारे संबंधों के बीच अपनी जगह बना चुकी थी, क्योंकि प्रबोध के स्वर में कोई उत्साह नहीं झलक रहा था। घर पर रुकने की जिद भी नहीं की उसने। आगमन का समय और ट्रेन की सूचना भी दी थी उसे। लेकिन हमारे मन की तमाम गवाहियों और तसल्लियों के बावजूद हकीकत यही थी कि प्रबोध स्टेशन पर नहीं आया था। गुजरात घूमने का हमारा उत्साह फीका पड़ चुका था। अब पुरानी बातों को याद करने और प्लेटफार्म पर खड़े रहने से कोई लाभ नहीं था। मैंने भारी मन से कुली को आवाज दी। 
अहमदाबाद देखने की कोई विशेष इच्छा हम दोनों को नहीं थी, लेकिन प्रॉपर्टी एग्जिबिशन के सिलसिले में हमें तीन दिन वहां रुकना ही था। प्रबोध पूरे तीन दिन मिला ही नहीं। समय के साथ-साथ मन की दीवारों पर चिढ़ की परछाइयां गहराने लगी थीं  - "अब अगर बुलाएगा, तो भी नहीं जाएंगे उसके घर।" सुनंदा विषादपूर्ण स्वर में बोली।

"अब जाने का समय भी नहीं है, रात दस बजे की तो ट्रेन है... ". मैंने स्वर को सामान्य बनाते हुए कहा।

"समय होता, तो भी नहीं जाते!" सुनंदा चुनौतीपूर्ण स्वर में कह रही थी, "बातें  तो  बड़ी  करता था अपनी  बीबी की, नहीं खाना हमें उसके  हाथ  के व्यंजन! " 
फिर हम दोनों ने कोई बात नहीं की। होटल छोड़ते समय रिसेप्शन पर बताया गया कि बिल अदा नहीं करना है। प्रबोध ने शायद ऐसी व्यवस्था की थी। 
पत्नी बिफर उठी, "हमें भिखारी समझ लिया है क्या? उसके भरोसे आए हैं हम?" पता नहीं वह होटल के मैनेजर को सुना रही थी या मुझे। उसके बाद पूरा बिल उसने जबरन चुकाया। वैसे प्रबोध की यह हरकत मुझे भी नागवार गुजरी थी। 
समय से काफी पहले ही हम स्टेशन पहुंच चुके थे। भीड़ बिलकुल नहीं थी और प्लेटफार्म खाली पड़ा था। रात गहरा रही थी और गाड़ी चलने में अब कुछ ही देर थी। हम अपनी सीट पर बैठे खिड़की से प्लेटफार्म पर देख रहे थे। हम दोनों ही चुप थे पर हमारी नज़रों में एक अव्यक्त तलाश हर क्षण दोबाला होती जा रही थी। 
बस तभी वह खिड़की पर दिखा। 
वह फीकी हंसी हंस रहा था... " आपके साथ मौका ही नहीं मिला भाईसाहब ... कुछ संजोग नहीं बना इस बार ... " 
"कोई नहीं.." मैंने अचकचा कर कहा। प्लेटफार्म की धुंधली रोशनी में भी प्रबोध के चेहरे पर थकान नुमायां हो रही थी। पत्नी ने भरपूर उपेक्षा करते हुए उसकी ओर देखने की भी जहमत नहीं उठाई। सिर के बाल थोड़े कम लग रहे थे, बाकी कोई खास तब्दीली नहीं आई थी उसमें पिछले चार सालों में। हालांकि यह भी बदलाव ही था कि वह मुझे  भाईसाहब कह रहा था,  जबकि पहले 'सर' कहता था। शायद इस कारण कि तब मैं उसकी कंपनी में था और उसका सीनियर था या शायद हड़बड़ाहट में ऐसा कर बैठा हो। जो भी हो..।
सुनंदा का चेहरा सख्त हो गया था और वह प्रबोध से परे शून्य में देख रही थी । 
"होटल के पैसे आपने दे दिए... ऐसा न करें... " वह बुदबुदाया।
मैं दावे से कह सकता हूं कि प्रबोध के स्वर में याचना थी। वह कह रहा था, "इस बार संयोग नहीं बैठा वरना...अगली बार .."
मैंने मुस्कुराने की कोशिश की।

" अच्छा ये चूनर....." प्रबोध ने सितारा जड़ा परिधान खिड़की से भीतर देने का प्रयास किया ।
पत्नी ने दोनों हाथ छाती पर बांधकर अपनी अस्वीकृति जाहिर कर दी थी और बदस्तूर शून्य में ताके जा रही थी । 
"ये विशाखा ने अपने हाथ से काढ़ा...."  वह बोलते-बोलते चुप हो गया क्योंकि ट्रेन ने सीटी दे दी थी और स्टेशन से सरकने लगी थी। पता नहीं प्रबोध के चेहरे पर क्या था कि मैं बेतरह चाहने लगा कि कि सुनंदा वह चूनर रख ले। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैंने उसे हाथ हिलाने का प्रयास-सा किया। 
मेरे बगल की सीट पर बैठे आदमी ने अचानक जोर से पुकारा "कैसे प्रबोध, इस समय यहां?... अरे भाई ...." 
" कोई नहीं रावल सर ... सब ठीक भैया , सब बिलकुल ठीक" प्रबोध का स्वर इतना सर्द था कि किसी अज्ञात भावना से मेरा दिल धड़कने लगा। तब तक गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली थी । 
"आपका परिचित है क्या?  " मैंने सामने की सीट पर बैठे व्यक्ति से पूछा, जो कि अब भी खिड़की से बाहर देख रहा था।
"पागल है… कहता है कि सब ठीक है, जबकि अभी पिछले ही हफ्ते तो इसकी वाइफ की डेथ हुई है... अरे साहब, मैं तो परेशान हूं कि अभी तेरहवीं भी नहीं हुई इसकी पत्नी की…. यह आदमी यहां कैसे... " 
मुझे लगा कि कोई भारी सी चीज मेरे दिल से आ टकराई हो। पत्नी पलक झपकाए बिना उसे देख रही थी - "कौन ? विशाखा ? " कांपते स्वर में उसने पूछा।
"हां, देखिए ना, पिछले तीन सालों से टाटा मेमोरियल में इलाज चल रहा था। बार-बार मुंबई आना-जाना। पर इस बार डॉक्टर ने जवाब दे दिया था..."
 
"इसने हमें कुछ बताया ही नहीं ..." सुनंदा बदहवास स्वर में बोली, " मुंबई आता रहा और हमें खबर भी नहीं की। यहां भी हम तीन-चार दिन से हैं... यहां भी सब छुपाकर रखा... " 
शहर की झिलमिल करती रोशनियां अब लुप्त हो गई थीं और सन्नाटे को चीरती हुई ट्रेन टूटे हुए बांध के पानी की तरह पूरे वेग से बढ़ी जा रही थी। मुझे अचानक ही प्रबोध की  कविता 'कलेजा' याद आ गई। पता नहीं क्यों ! 

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सोमवार, 27 जुलाई 2020

किस्सा जानकी रमण पांडे : जाकिया मशहदी

◆ किस्सा जानकी रमण पांडे
● जाकिया मशहदी

अब कोई पूछे इन जानकी रमण पांडे एडवोकेट से कि अच्छे-भले इलाहाबाद में थे, रसूलपुर कहां जा मरे। वह भी मुहावरों में नहीं, बल्कि सचमुच। यूं तो आम विश्वास है कि मरने की साअत और जगह पहले से तय होती है। (वैसे मरने से पहले उससे भी बड़ी कुछ घटनाओं की साअत पहले से तय होती है जैसे शादी) लेकिन सवाल यह है कि विश्वास यह कहता है तो फिर हंगामा है क्यों बरपा? मगर क्या कीजिए एक से एक जोड़-जोड़ लगाने वाले टेढ़े दिमाग मौजूद हैं। उनका मानना है कि मरने की साअत और जगह तो ऊपर वाले हाकिम ने तय कर दी अब कुछ तो हमारे हाथों में भी रहे। हम मुर्दे पर नौ मन मिट्टी डालें या मिट्टी का तेल (यूं तो जिन्दों पर भी मिट्टी का तेल डालकर फूंकने की परम्परा, काफी दिन हुए कि कायम हो गई है) या उसे चील कौओं को खिलाएं। और भाई, सौ बातों की एक बात यह कि आस्थाएं वही अच्छी लगती हैं जो अपनी मर्जी और सुविधा से मेल खाएं वरना उठाया डंडा और अपनी मर्जी मनवाने पर तुल गए। हमारा विश्वास तो यही है। अब देख लीजिए पांडे जी की हाल।
पांडे जी का किस्सा तो के.के. मामा सुनाते थे। के.के. यानि कृष्णकान्त। इसी उपनाम से जाने जाते थे। जाति सूचक टाइटिल लगाना उन्होंने बहुत दिन पहले से छोड़ रखा था। कहते थे इस कलयुग में सारे ब्राह्मण-पंडित, चूड़े-चमोरे हमारे साथ उठने बैठने लगे, खान-पान तक का परहेज न रहा। काहे को बाप-दादों का नाम कीचड़ में घसीटें लेकिन कृष्णकान्त के सारे चेले चपाटी जानते थे कि यह इनके हर समय हंसी-ठिठोली करने वाले स्वभाव का अंग था। वह जात-पात का कड़ा विरोध करने वालों में से थे। सरनेम न लगाना दरअसल उनके इस विरोध का सूचक था। के.के. का अपना भांजा तो शायद कोई था भी नहीं। न जाने किसने उन्हें मामा कहना शुरू किया और वह जगत मामा बन गए। लम्बे समय से लखनऊ में रह रहे थे, अच्छी उर्दू बोलते थे और किस्से सुनाने में पारंगत। नख्खास के किसी दास्तान गो की आत्मा ने उनके अन्दर प्रवेश पा लिया था। (ऐसा विचार कभी जानकी रमण पांडे ने ही ज़ाहिर किया था) मामा पान एक गाल से दूसरे गाल में ठेलते और मुंह ऊपर करके कि पीक की छींटें सुनने वालों पर न पड़ें अजीब गोलमोल लहजे में बोलते लेकिन न जाने कैसा जादू डालते थे कि श्रोता उठने का नाम न लें। दे किस्से पे किस्सा।
श्रोता गणों में विशेष थे लम्बे चौड़े परिवार के सारे युवक, दो एक अड़ौसी-पड़ौसी जिनमें मिर्जा अनवर बेग की पत्नी नय्यरा बेग भी शामिल थीं और जो आया गया हो वह अलग। अनवर बेग शायद अकेले ऐसे इंसान थे जो के.के. मामा से चिढ़ते थे ''जनखा कहीं का'' उनकी टिप्पणी होती थी। ''औरतों जैसी गप्पे लड़ाता है। खानदान ने फलाना यूं और ठिकाना यों जैसी गप्पे लड़ाता है।" परन्तु अनवर बेग कुछ भी कहें, के.के. की लोकप्रियता में कभी बट्टा नहीं लगा सके। वह आए नहीं कि जमघट लगा। विशेष कर जाड़ों में कि मूंगफलियों की देरी और गर्मागरम चाय की पियालियां सामने हों, तस्ले में आग जल रही हो और सामने बैठे हों दुलाई में लिपटे के.के., अच्छे खासे जोकर लगते हुए मनोरंजन के नये नये अध्याय खुलते चले जाते।
ऐसे ही किसी ठंडे मौसम में उन्होंने जानकी रमण पांडे एडवोकेट, जो इधर अचानक बैठे बैठे रसूलपुर जा मरे थे और अजीब क्राइसिस पैदा कर गए थे, का किस्सा बयान किया था जो कुछ इस तरह था:
''पांडे जब छोटे थे (और इस बात को बहोत दिन हुए कि पांडे छोटे थे) इनकी अम्मा जो पंडिताइन कहलाती थीं, परलोक सिधार गयी। वह हमारी अम्मा के फुफेरे भाई की साली के जेठ की चचेरी बहन होती थीं रिश्ता तो था ही, सम्बन्ध भी अच्छे थे।''
''जितना रिश्ता था उतने ही सम्बन्ध थे या कुछ कम-बेश?'' बिपिन भय्या को लगंड़ी लगाने की आदत थी चाहे दास्तान हो या जिन्दगी।'' अब भय्या सम्बन्धों की गहराई नापने का कोई आला तो हमने रेज नहीं किया मगर हां सम्बन्ध थे और बहुत गहरे थे और रिश्ता भी कौन सा कम था। अरे मियां पहले लोग चिट्ठी में लिखवाते थे 'थोड़े लिखे तो बहुत जानियो', सो लिखे को ही नहीं, थोड़े रिश्ते को भी जानते थे और निभाते थे हम भी उन्हीं में से हैं'', मामा ने छाती पर हाथ मारकर कहा। पीक की कुछ छींटें उड़ीं और इधर-उधर मिल गई। उन्होंने बाहें पोछीं।
''अच्छा, खबरदार... अब जो कोई बीच में बोला।'' बिपिन भय्या को नय्यरा बेग ने डांटा। वैसे भी सब को डांटने का ठेका उन्होंने ले ही लिया था, विशेष कर अनवर बेग को।
''तो बिटिया, पांडे की अम्मा मरीं तो कुछ दिन बाद उनके अब्बा ने कर लिया दूसरा ब्याह। उस समय लोग बाग जरूरत जानते तो पत्नी के मरने का इंतजार भी नहीं किया करते थे। मज़े से दूसरा ब्याह कर लाते थे उन्होंने पत्नी के मरने के बाद किया तो कौन सा पाप किया। वह भी परिवार की बड़ी बूढ़ियों के आग्रह पर कि ''कि आय हाय पंडित बिन मां का बच्चा कैसा रूल रहा है। दूसरा ब्याह कर लो ना। पांच वर्ष का लड़का कैसे पालोगे?''
नय्यरा बेग ने अभी बिपिन बिहारी को डांटा था लेकिन अपने आप को न रोक सकीं। टप से बोलीं, ''और जो कहीं पंडित जी मरे होते तो कोई न कहता कि आय हाय पंडिताइन दूसरा ब्याह करलेव और तब कोई न सोचता कि पांडे कैसे पलेंगें अगर उनकी अम्मा बिन ब्याह किए रह गईं।''
''ले, तो पांडे को कोई उनकी दूसरी अम्मा ने पाला? पिता श्री ने कर लिया दूसरा ब्याह और अब की जो पत्नी लाए वह पांडे की बड़ी, शादी शुदा बहन उमा से कोई साल भर छोटी थीं।''
''अय हय मामा, साल भर छोटी कि साल भर बड़ी?'' नय्यरा बेग ने फिर टहोका दिया।
''अब नय्यरा बीबी, रहीं तो वह साल भर छोटी। तुम्हारी जी चाहे तो कह लेव कि बड़ी थीं।'' मामा ने पान की गिलौरी फिर इधर से उधर ठेली।
''मामा अब की कोई बोले तो झाड़िये उसको एक लप्पड़'' कान्ती दी ने कहा। वह किस्सा आगे न बढ़ पाने के कारण चिढ़ी हुई थीं।
''तो भय्या!'' मामा ने पनडिब्बा खोल के थोड़ा सा खुशबूदार तम्बाकू और मुंह में डाला। अब हम क्या लप्पड़ झप्पड़ करें, बस तुम अब आगे की सुन लेओ। तो पंडित जी की जो बिटिया इलाहाबाद में बियाही गई थीं वह सबसे बड़ी थीं। नाम तो उमा था पर सारे लड़के वाले उन्हें दिद्दा कहते थे। बस कोई अट्ठारह बरस की थी। उन्होंने मायके के रंग ढंग देखे कि नई मां तो माथे पे टीका सजाए पायल छनकाती रून्न झुन करती घूमती हैं और पिताश्री मर्दाने घर में नई मां के आगे पीछे घूमते दिखाई देते हैं तो उन्होंने ससुराल आके किया यह कि अटवाटी खटवाटी ले के पड़ गईं और पति से कहा कि मान्यवर हम तो भय्या को साथ रखेंगे। तीन बहनें बीच में मर के तब यह भाई पैदा हुआ था और उस पर विमाता मक्खियां भिनका रही है। एक कटोरा दूध को तरसता है जबकि घर में दो गऊएं बंधी हैं। पति ने कहा "भाई हमने कब इनकार किया। तुम यही बात सीधे स्वभाव नहीं कह सकती थीं? यह रानी कैकेई बनने की क्या जरूरत थी जबकि तुम हमारी इकलौती पत्नी हो। रानी भी-तुम, पटरानी भी तुम।" दिद्दा खुश। दूसरे ही दिन वापस आईं और पांडे को लिवा ले गईं। विमाता भी खुश, एक ही कांटा था सो निकल गया। हल्दी लगी न फिटकरी। उनकी पायल के घुंघरू और ज़्यादा छनकने लगे।
पांडे को दिद्दा प्यार से भय्यन कहती थीं और भाई नहीं बेटा समझती थीं। अपने लड़के बाले हो गए तो भी भय्यन का रूतबा कम नहीं हुआ। उनके पति ओंकार नाथ मिश्र ने भी साले को कम मान-दान नहीं दिया। दिद्दा जैसी पत्नी पाकर धन्य थे। मुखड़े पर ब्राह्मणी का तेज, वादा निभाने में राजपूतनी, हिसाब-किताब रखने और जमीन-जायदाद देखने में वैश्य और खट कर सेवा करने में शूद्र। ओंकार उनकी हर बात मानते। भय्यन को उन्होंने भरपूर शिक्षा दी।
बी.ए. के दूसरे व अंतिम वर्ष में थे कि अरमानों भरी बहन जा के उनका रिश्ता तय कर आई।
के.के. मामा ने गिलौरी के साथ पहलू भी बदला और किस्से में तनिक नाटकीयता पैदा की। श्रोता गण मामा के सम्मोहन में बंधे आदर के साथ बैठे कहानी के चरम बिन्दु की प्रतीक्षा कर रहे थे।
''अब भय्या यह सुन लेव कि इधर दिद्दा रिश्ता तय करके आईं, उधर किसी ने जाके भय्यन के कान में फूंक दिया कि लड़की तो जी खोल के काली है। भय्यन का दिल डूबने लगा। बड़ा साहस बटोर के दिद्दा के पास गए। वह तख्त पर चढ़ी बैठी धोबी का हिसाब कर रही थीं। तभी चोर जैसा चेहरा बनाए, आंखें नीची किए, कुर्ते का कोना मरोड़ते भय्यन दबे पांव आकर पीछे खड़े हो गए। पीछे इसलिए कि दिद्दा की सीधी नजरों से बचे रहें और मन की बात उनके कानों में डाल सकें।
''दिद्दा'' कुछ देर बाद उनके मुंह से मरी हुई आवाज फूटी।
''अय हय मरा फिर बटन तोड़ लाया'' भय्यन गड़बड़ा गए। बचपन में निकर, कमीज़, कुर्ता-सबके बटन चबाते और दिद्दा से बड़ी डांट सुनते थे। लेकिन अब... क्या अब भी कोई बटन टूटा है?'' नहीं तो दिद्दा... कहां? वह जल्दी से बटन टटोलने लगे।
''अरे तू? यहां कहां खड़ा है रे? तुझे नहीं इस मरे धोबी को कह रही थी। धोतियां चार, चादरें दो, जाकेट एक...'' ''दिद्दा...'' भय्यन ने इत्मीनान की सांस लेकर सिर खुजाया ''क्या है रे टपक पड़ता है वक्त-बेवक्त। न सुबह देखे न शाम'' ''अच्छा दिद्दा'', भय्यन फिर गड़बड़ा गए। ''हम फिर बात करेंगे।'' ''तुझे नहीं, इस मरे धोबी को कह रही थी। आ बैठ.... बैठ न.... पीछे काहे को खड़ा है।'' उन्होंने लादी सरका के भय्यन के बैठने को जगह बनाई। ''देख न, नाश्ते का समय है और पहुंच गया। उस पर तुर्रा यह है कि कपड़े पटके और नदारद हो गया 'हिसाब करके रखिए, पड़ौस होकर आते हैं।' उन्होंने धोबी की नकल बनाई। ''अब तू बोल क्या कह रह है...?''
''दिद्दा...'' पांडे ने हिम्मत जुटाई और अपने हिसाब से बम का गोला फोड़ा। ''सुना है मिर्जापुर वाली बहुत काली है और तुम बात पक्की कर आईं।''
''क्या?'' दिद्दा के हाथ से धोबी की कापी पेंसिल समेत गिर पड़ी। भय्यन से ऐसी बेशर्मी की उम्मीद नहीं की थी। पेट के जाए जैसे भाई को उन्होंने घूरकर देखा। पांच साल का था कि ले आई थीं। पाला-पोसा। पूरी सेवा की। पढ़ाया लिखाया। उसकी यह मजाल। हालांकि पांडे बेचारे की क्या मजाल थी जो पूरी बात कह पाते। जब से ब्याह की बात सुनी थी एक चांद सा मुखड़ा आंखों में कौंधने लगा था और कहां अचानक उस पर कालिख पुत गई। आने वाले समय की यह तस्वीर तो बड़ी भयानक थी कि सबेरे सबेरे आंख खुली नहीं और काली माई हाजिर। उन्होंने यह सब कहा भी नहीं। बस ढकी छुपी छोटी सी बात कही थी।
''सुनो भय्यन!'' दिद्दा ने नाराज़ होकर धोबी की गठड़ी पर हाथ मारकर कहा। ''सूरत देखी जाती है रंडी की। बिटिया का तो खानदान देखा जाता है। सो खानदान सौ में क्या हज़ार में एक है। संस्कारी लोग हैं। कोई शराब को तो क्या मांस-मच्छी को भी हाथ नहीं लगाता। फिर बिटिया ने हाईस्कूल की परीक्षा भी दी है। अगले मंगल को बरीच्छा है। हां मगर आप फिलहाल पढ़ाई में ध्यान लगाएं।''
इस बीच नाश्ते के लिए गुहार लगाते ओंकार नाथ मिश्र उर्फ भय्यन के जीजा जी उधर को आन निकले थे और होने वाली सलहज के पूरे गुण सुन लिए थे। बड़े गंभीर स्वर में बोले ''बरखुरदार, पहले खानदान वाली से ब्याह कर लो, बाद में कभी एक सूरत वाली भी ले आना।''
दिद्दा ने अपनी बड़ी बड़ी सुन्दर आंखें तरेरते पति को घूर कर देखा लेकिन पांडे ने बात गांठ में बांध ली। खुशी खुशी काली माई को ब्याह कर ले आए। आंगन में पायल छनकारी बहू घूमने लगी। पांडे को दिद्दा से बहुत प्यार था। होना भी चाहिए था। लेकिन वह अपने पिता समान बहनोई की क़द्र भी कम नहीं करते थे। जिस बाप के बीज से जन्मे थे उसने शायद ही कभी उलट कर पूछा था। सारा कुछ बहनोई का ही दिया हुआ था। वकालत भी इसीलिए पढ़वा रहे थे कि खुद वकील थे। भय्यन को घर में ही अच्छी ट्रेनिंग मिल जाएगी। अब ऐसे देवता समान बहनोई की बात वह कैसे उठा देते। सो तालीम पूरी करने के कुछ समय बाद जब उनकी वकालत चल निकली और अच्छा पैसा आने लगा तो वह एक सूरत वाली भी ले आए।''
किस्से की इस पायदान पर पहुंच कर के.के. मामा ने एक ठंडी सांस भरी। गरम चाय दुबारा मंगवाई। श्रोतागणों की उत्सुकता में भी गरमी आई। मामा ने उस समय एक नाटकीय ब्रेक लिया।
ब्रेक में बिपिन भाई साहब ने छत-उखाड़ ठहाका लगाया। कहने लगे यह तो हम सब को मालूम है कि वह सूरत वाली मुसलमनटी थीं लेकिन उससे परिचय कब और कैसे हुआ यह तो मामा ही बताएंगे।
जवाब में मामा ने गिलोरी फिर एक गाल से दूसरे गाल में ठेली और पीक को मुंह में संभाला।
''अबे चुप!'' दूसरे ने उसे झाड़ा। ''चाय आने दे। मामा ज़रा फ्रेश हो जाएं।''
चाय तुरन्त ही आ गई। नय्यरा बीबी ने सबके लिए प्यालों में उड़ेली और आंखें तरेर कर बिपिन से बोलीं, 'इस 'मुसलमनटी' पर तो मैं बाद में तुम से निपटूंगी, ज़रा मामा से किस्सा सुन लूं पहले।' इस पर बिपिन ने तड़ से जवाब दिया, ''तुम हम से क्या निपटोगी नय्यरा भाभी। इतनी बार कहा कोई अपनी जैसी खूबसूरत मुसलमनटी ढूंढ कर ला दो, आज तक न लाईं। हम तो अब तुम्हीं पर आशिक होने वाले हैं। इस साले अनवर के भाग। वह जो कह गए कोई उस्ताद कि ब'पहलू-ए-हूर में लंगूर...' 
नय्यरा ने बिपिन की गर्दन पर थोड़ी सी गरम चाय छलकाई। ''मर, कमबख्त हिन्दुचे।''
गिलोरी का मलबा थूक कर कुल्ली करने के बाद चाय सुड़कते हुए मामा ने दास्तान का सिरा फिर पकड़ा। श्रोता मंडली भी चाय की चुस्कियां ले रही थी।
''बातें तो बहुत उड़ाईं यार दोस्तों ने। उसे रन्डी-मुन्डी तक बना दिया। लेकिन ऐसी बात नहीं थी। उनका खानदान ऐसा हेटा भी नहीं था। रहा मुसलमन्टे-मुसलमन्टी का सवाल मियां कोई कहदे इन नय्यरा बीबी की सूरत देख के कि ये हिन्दू हैं या मुसलमान। माथे पर न कोई ज़ात लेके घूमता है न मज़हब। और मियां हमारा बस चले तो हम दुनिया के सारे मज़हबों को बैन करा दें। इंसानों के बीच इन से ज्यादा फूट किसी ने नहीं डलवाई...'' मामा ने यह अन्तिम वाक्य इतने तैश में आके कहा कि श्रोता पल भर को सुन्न हो गए। वह पल गुज़र गया। मामा फिर सामान्य हो गए।जैसे लोग तैश में आने के बाद प्राय: हो ही जाते हैं।
''पांडे के जीजा जी पंडित ओंकार नाथ मिश्र के पुराने वफ़ादार मुंशी थे, रजब अली। उम्र में मिश्रा जी से कुछ बड़े। पुश्तैनी रिश्ता था। रजब अली के पिता इम्तियाज़ अली बड़े मिश्र जी की ज़मीन जायदाद देखते थे। बड़े मिश्र जी के कहने पर रजब अली को पढ़ाया लिखाया गया। बड़े हुए तो वकील साहब के मुंशी बना लिए गए। दिद्दा, जो घर की बहू थीं उन्हें रजब अली भाई साहब कहतीं। जब कभी इम्तियाज़ अली के सामने पड़तीं तो घूंघट काढ़ कर प्रणाम करतीं। हां उन लोगों के घर का खाना नहीं खाती थीं। मियां यह वह ज़माना था जब लोग एक दूसरे के घर खाएं न खाएं, सौहार्द्र ज़रूर बनाए रखते थे। अब रोटी का रिश्ता तो बना लिया लेकिन दिल के रिश्ते तोड़ लिए। धिक्कार है।'' मामा ने पनडिब्बे से फिर गिलौरी निकाली।
''परहेज़ पके हुए खाने और गीली चीज़ों का था। सूखे सामान, पान, फल, तमाखू वगैरह से कोई परहेज नहीं था। सो ईद में रजब अली के यहां से थाल लग कर आता। तांबे की नई सेनी पर सूखी सिवईयां, लच्छे, फेनियां, सूखे मेवे, शक्कर और तमाशा यह है कि दूध के लिए एक किनारे कुछ रकम रखी होती। सारे लड़के वालों के लिए नाम बनाम लिफ़ाफों में ईदी। यह सारा सामान्य थाल समेत दिद्दा के सामने रखा जाता। दिद्दा बार बार कहतीं अरे रजब अली भाई साहब, फिर नया थाल। कहां न हमें उन बर्तनों से परहेज़ नहीं जिसमें खाना पकता या खाया न जाता हो। पुरानी सेनी ले आया कीजिए और वापस ले जाइए। मगर रजब अली एक न सुनते। रजब अली के गुज़र जाने के बाद दिद्दा ठंडी सांस भर कर कहा करती थीं 'सारी सेनियां भंडार घर में रखी हैं। जाओ गिनो तो मालूम होगा कितनी ईदें साथ गुज़र गईं।
इन्हीं रजब अली की एक विधवा बहन थीं। उम्र में रजब अली से बहुत बड़ी। उन बहन की एक नातिन थी जिसकी मां जवानी में जल बसी थीं और बाप ने दूसरा निकाह कर लिया था। रजब अली विधवा बहन और अनाथ नातिन को साथ ही रखते थे। अपनी कोई बेटी नहीं थी इसलिए उसे बहुत चाहते थे। बड़े अरमान से ब्याह किया। दिद्दा ने भी जोड़े-बागे भेजे। कुछ ही समय में मालूम हुआ कि जिस लड़के से निकाह हुआ था वह मानसिक रोगी था। आखिर को लड़की को खुला दिलाना पड़ा। लड़की घर आकर बैठ गई। एक चुप लग गई थी उसे। रजब अली की असमय मौत भी शायद इसी सदमे से हुई। उनकी मौत पर पांडे उनके घर आए तो पहली बार इस लड़की पर पांडे की नज़र पड़ी। लगा खोपड़ी भक् से उड़ गई। दिन रात में बदला था और चांद धरती पर उतर आया था। रोया-रोया दुखी चेहरा, आंखों में गुलाबी डोरे। वह रोज से ज्यादा खूबसूरत लग रही थी! और निरीह। इस समय पांडे की उम्र काफ़ी हो गई थी। चालीस पार कर चुके थे। बहुत सी अच्छी सूरतें भी देख चुके थे लेकिन दिल यूं कभी नहीं हारा था।
रजब अली की पुरानी सेवाओं का बदला चुकाने के बहाने पांडे ने उनके घर आना जाना बढ़ाया। उपहारों से लाद दिया। बेचारी रजब अली की बीबी, सीधी सादी घरेलू औरत। उस पर से पति की अचानक मौत और लड़की पर जो बीती उसके सदमे से और भी बदहवास। बहुत दिन तक कुछ समझ ही न पाईं। रहीं दिद्दा तो उन्हें बसंत की खबर ही न थी। चौंकी तो पानी सिर के ऊपर बह रहा था। हर हर हर....
''अरे भय्यन! हम यह क्या सुन रहे हैं?''
भय्यन चुप तो चुप।
''अरे बोलता क्यों नहीं? यही मिली थी। एक तो जात-धरम अलग ऊपर से तलाक शुदा!''
''अरे हम पत्थर से बात कर रहे हैं क्या?'' दिद्दा ने फुसुर फुसुर रोना शुरू कर दिया। इश्क तो अच्छे अच्छों की मति फेर देता है। दिद्दा ने ज्यादा शोर मचाया तो पांडे, जो कई साल पहले चुप-चुपाते बहन की पसंद के आगे सिर झुका के सात फेरे ले आए थे, मुंह खोल कर बोल पड़े। हालांकि बोले पूरे आदर के साथ और धीरे स्वर में।
''दिद्दा आप मां समान हैं। अम्मा आज जिन्दा होतीं तो इससे ज्यादा आदर मान हम उनका भी न कर पाते। हमने आपकी लाज रखी।आप हमसे पूछे बिना हमारी ज़िन्दगी का फैसला कर आईं, हमने सिर आंखों पर उठाया। वह पटरानी है, रहेगी। लेकिन यह हमारा प्यार है, वह भी रहेगी।''
दिद्दा सुन्न हो गईं। भय्यन ने उन्हें जवाब दिया था। अब इसके आगे तो कुछ कहने सुनने को ही नहीं रह गया था।
''वह भय्यन साहब वाह। बड़े सूरमा निकले। एक यह हमारे बिपिन भय्या हैं। लड़की का धर्म दूसरा नहीं था, सिर्फ जात दूसरी थी, अम्मा ने डांट पिलाई बस झपट के उन्हीं के आंचल तले आन छिपे।'' एक श्रोता ने कहा।
''शेम शेम!'' कोरस में सब ने आवाज़ बुलन्द की।
''और ज़रा 'जेनरेशन गैप' की बात करने वालों के मुंह पर तो टेप लगाओ जाके। लोग बिना कारण आज के लोगों को बदनाम करते हैं। यह पिछले कुछ कम थे क्या?'' एक और टिप्पणी।
बिपिन को सांप सूंघ गया। उनका रुआंसा चेहरा देख कर कोई उनकी मदद को आगे आया। ''अच्छा मामा, फिर आगे क्या हुआ? आगे भी तो कुछ हुआ होगा।''
''आगे जो हुआ वह विधाता का किया हुआ था। उसमें पांडे, दिद्दा या उस मिर्जापुर वाली का कोई हाथ नहीं था। जब पांडे ने उस सूरत वाली से ब्याह किया उस समय उनकी दो बेटियां थीं। यही कोई पांच-छ बरस की। उधर उन्होंने दूसरा ब्याह किया उधर साल भर के अन्दर पट से बेटा। फिर दूसरे बरस एक और बेटा। इधर तीसरी भी बेटी। अब दिद्दा से न रहा गया। बधावा लेकर गईं। बड़े बड़े पुश्तैनी झुमके भावज को पहनाए। भतीजों का मुँह देख कर निहाल हो गईं। चांद-सूरज की जोड़ी थे। उनकी खूबसूरत कम उम्र मां ने झुक कर आदाब किया तो उसकी बलैयां ली। 'दूधों नहाओ, पूतों फलो' कहकर आशीर्वाद दिया। उसके हाथ से पान की गिलौरी लेकर खाई। पांडे पानदान सजा कर रखवाते थे, पान की लत थी।
घर वापस आकर दिद्दा ने सतनारायण भगवान की कथा रखवाई। प्रसाद लेकर एक बार फिर उस विधर्मी भाभी के घर गई। साफ़ साफ़ तो कुछ नहीं कह सकीं बस प्रसाद आगे बढ़ाया जो उसने मुस्कुरा कर दोनों हाथों का कटोरा सा बना कर बड़े आदर के साथ लिया, फिर माथे पर छुआ कर पी गई। कमबख्त कैसी सुन्दर है, हाथ तो देखो चांदी के बने लगते हैं। दिद्दा ने सोचा-अरे यह तो बड़ी संस्कारी, बड़ों का आदर मान करने वाली लड़की है। फिर तनिक रुक कर बोलीं, भय्यन के साथ तुम्हारी जोड़ी राम-सीता की जोड़ी लगती है। आज से हम तुम्हारा नाम जानकी रखते हैं। मालूम है, सीता मय्या का ही यह एक और नाम है। भय्यन के नाम में भी जानकी जुड़ा हुआ है।'' रौशन आरा मुस्कुराई (''नाम में क्या रखा है'' कह गए मियां शेक्स्पियर सदियों पहले। कुछ महानुभावों ने उन्हीं पर उनकी सूक्ति अज़माई। कहा उनका नाम तो शेखपीर था)।
लड़कों के नाम रखे गए थे आमिर और साबिर। दिद्दा ने आमिर को अमर और साबिर को सुवीर कर दिया। इस तरह सबको ख़ानदान में शामिल करके सतनारायण भगवान का प्रसाद चखा के लौटी। इस्लाम और हिन्दू धर्म के बीच की खाई उन्होंने पल भर में पाट के रख दी। इतनी जल्दी तो हनुमान जी की सेना भारत और श्रीलंका के बीच का पुल भी न बना पाई होगी। लेकिन इस सारी कार्रवाई का 'फ़ॉल आउट' ज़रा गड़बड़ रहने लगी थी। मियां, यह सास-ननदों वाले झगड़े होते तो हर घर में हैं लेकिन शरीफ़ घरानों में ज़रा ढके छिपे रहते हैं।
''हां साहब, राजकुमार ऐन और प्रिन्सेस डायना में कभी नहीं बनी।''
वाह साहब सीधे इंगलिस्तान पहुंच गए। अपनी देसी सफ़दर जंग रोड को क्यों भूल रहे हैं?
बात पांडे से राजनैतिक हस्तियों तक आ गई। चाय के साथ मूंगफलियों और परनिन्दा का दौर बहुत देर तक चला। ख़ासी तफ़रीह रही। बकौल मुश्ताक़ यूसुफ़ी गीबत (परनिन्दा) और मूंगफलियां ज़ाड़े में बहुत मज़ा देती हैं।
...यह बैठकें अब भी होती थीं लेकिन वह मज़ा नहीं रह गया था। के.के. मामा केवल पचपन वर्ष की अल्पायु में, जिसे वह भरी जवानी कहा करते थे, कैंसर का शिकार हुए और अगले दो साल के अन्दर चटपट चले गए। उनकी कहानी के नायक भी कुछ ऐसे बूढ़े नहीं हुए थे। बस साठ से पांचेक बरस ऊपर आए थे। हृष्ट पुष्ट देह थी। मरने के लक्षण कहीं से भी नहीं दिखाई देते थे। लगता था अस्सी पचास्सी से पहले तो एक ईंट भी नहीं खिसकने की। इमारत की कौन कहे।
हां, दिद्दा स्वर्ग सिधार चुकी थीं और लड़कियां सयानी थीं इसलिए पत्नी का दबाव उन पर बढ़ गया था। दूसरे घर जाते भी तो जल्दी चले आते। इस बार गए तो सारा अगला पिछला हिसाब चुकता कर दिया। वहीं मर गए। बस यूं ही, अचानक बैठे बैठे। के.के. मामा तो हैं नहीं वर्ना कहते अब मियां, न किसी पे दिल आ जाने का कोई समय निर्धारित है न आंधी, शादी और मौत का। कभी कभी ऐसे अचानक आती है कि पूछो मत। अब देख लेव अच्छे भले पांडे घर में बैठे थे यह रसूलपुर कहां जा मरे। माना कि वह वहां रह रही थी, उनकी चहेती बीबी रौशन आरा लेकिन उस घड़ी न जाते तो शायद मरते ही नहीं। और मरते बेशक पर रसूलपुर में तो न मरते।
पांडे ने जब रौशन के सामने ब्याह का प्रस्ताव रख रख के उनकी नाक में दम कर दिया था तो उसने एक दिन कहा था, ''मगर पंडित, (वह पांडे को इसी तरह सम्बोधित करती थी) तुम्हारा और हमारा धर्म अलग है। उस पर तुम ठहरे शादीशुदा, दो बच्चियों के बाप। अब तुम लाख कहो कि तुम हम पर ज़हर खाते हो...''
" मज़हब! धर्म! हां है तो। तुम मुसलमान, हम हिन्दू। रही बात हमारे शादीशुदा होने की तो उसे क्यों बीच में लाती हो। तुम्हारे मज़हब में तो चार की इजाज़त दे रखी है।"
रौशन मुस्कुराई। ''हिन्दू के ऊपर तो कोई पाबन्दी सिरे से है ही नहीं। चार करो या चालीस।''
पांडे झुंझलाए ''अरे सरकार ने लगा दी न वर्ना हमारे पुरखों में एक महानुभाव थे, एक ही घर से एक के बाद एक चार बहनें ब्याह लाए। फिर वहां लड़कियों का स्टॉक खतम हो गया तो एक कोठे वाली रख ली। मगर तुम पर तो अब भी पाबन्दी नहीं है न...''
रौशन आरा ने आंखें निकालीं, ''हम पर तो है, हमारे मर्दों पर नहीं। बाई द वे पंडित तुम हमें समझते क्या हो?''
''जान-ए-पंडित''
''इस ख़ालिस हिन्दू लफ़्ज के साथ इज़ाज़त अच्छी नहीं लगती, जैसे हमारी तुम्हारी जोड़ी। अनमिल-बेजोड़।''
''रौशन आरा तुम हम से पिट जाओगी।''
रौशन अचान गंभीर हो उठी। ''पिट तो हम चुके हैं। जिन्दगी की बिसात पर एक बेबज़ाअत (तुच्छ) मोहरे की तरह। पंडित, अब हम क्या करें?'' वह हाथ मलने लगी थी। उसके स्वर में बला की लाचारी थी।
''कुछ मत करो। बस चुपचाप हम से ब्याह कर लो।''
''तुम्हे मज़हब बदलना पड़ेगा। हम कोर्ट मैरेज नहीं करेंगे।''
''कोर्ट मैरेज तो वैसे भी नहीं हो पाएगी। घर पर वह जो है न मिर्जापुर वाली उससे कैसे इनकार करेंगे। वह हमारी ब्याहता है। विधि-विधान से ब्याह कर लाई गई पत्नी।'' ''तो हमें रखैल बनाओगे क्या?''
अबकी बार गंभीर होने की बारी पांडे की थी। जिसे यूं टूटकर कर चाहे उसका यह घोर अनादर! पल भर को वह जड़ हो गए।
''बोलो पंडित।'' रौशन आरा के स्वर में एक अन्तिम जवाब का आग्रह साफ़ था।
''हम निकाह करेंगे।'' पांडे का अन्तिम निर्णय भी साफ़ था।
''मज़हब बदलना पड़ेगा, जानते हो न?''
''अब वकील को तुम पढ़ाओगी रौशन आरा बेगम। तुम, एक औरत, जिसके बारे में बुजुर्ग कह गए कि उसकी अक़्ल एड़ी में होती है।''
''एड़ी में किसकी अक़्ल होती है यह फैसला बाद में करेंगे। पहले तुम यह सोच लो कि रास्ता कांटों भरा है। अपने पुरखों का मज़हब छोड़ के...''
''ऐसी की तैसी...'' पांडे ने होंठ काटे।
''किसकी ऐसी तैसी कर रहे हो, मज़हब की या बुजुर्गों की?"
''समाज की जिसने मज़हब बनाया। मगर हां, तुम्हारा मज़हब तो आसमान से उतरा है।''
''अभी हिन्दू हो इसलिए जो जी चाहे कह लो। मुसलमान हो गए तो बेअदबी की इजाज़त नहीं होगी।''
''यार तुम्हारे मज़हब में बड़ा रेजीमेन्टेशन है।''
''शायद'' रौशन आरा ने सोचा लेकिन कुछ कहा नहीं।
रात को घर जाकर पांडे पत्नी की बगल में लेटे तो उन्हें नींद नहीं आई। वह सिग्रेट सुलगा कर बरामदे में जा बैठे। शादी के कुछ दिन बाद दिद्दा ने अपने बंगले के बगल में खाली पड़ी जमीन पर बनी कॉटेज में उन्हें अलग कर दिया था ताकि दोनों परिवारों में सौहार्द बना रहे और दूर भी न हों। दोनों घरों का साझा कम्पाउंड था और दिद्दा की देख-रेख में निपुण माली के हाथों सजाया गया बाग। ऐसे खूबसूरत पेड़ पौधे, ऐसे हरे भरे कि देखते रह जाओ। हवा उनके बीच से होकर आई तो कुछ ज्यादा शीतल महसूस हुई। चांद आसमान के बीचों बीच नीली छतगीरी में फ़ानूस की तरह टंगा हुआ था। मौलसिरी की सुगन्ध तम्बाकू की महक पर हावी होकर किसी तांत्रिक के फूंके मंत्र की तरह उनके चारों ओर मंडराती रही।
अभी सवेरा होने में कुछ देर थी कि वह कुरसी से उठकार दिद्दा की ओर चल पड़े। एक तरफ सफ़ेद मुसंडे के बड़े बड़े झाड़ खड़े हुए थे। एक जातक कथा के अनुसार महात्मा बुद्ध अपने किसी जन्म में श्रीलंका के जंगलों में भटक गए थे। अमावस की रात और घना जंगल। टटोलते आगे बढ़ रहे थे कि अचानक मुसंडों के झुंड में चांदनी जैसे फूल खिल उठे। सारा जंगल रौशनी से भर उठा। यहां से वहां तक चांदनी बिखर गई। चांद की नहीं, फूलों की चांदनी। तब महात्मा बुद्ध ने मुसन्डे को आशीर्वाद दिया। उस आशीर्वाद की छाया आज तक उस पर है। उसमें सारे साल फूल खिलते हैं। पांडे को यह कहानी बहुत पसंद थी। अब पता नहीं उसका असर था या वास्तव में इन फूलों में ऐसा कोई गुण था कि देखो तो मन-मस्तिष्क में एक शीतलता भर उठे। क्या यह महात्मा बुद्ध का आशीर्वाद था? लेकिन क्या बुद्ध जी ने मानव मात्र के कल्याण की दुआ न की होगी? सद्बुद्धि की दुआ? मन की कटुता दूर होने की कामना? बुढ़ापे, बीमारी, मृत्यु, जन्मजात स्वार्थ से मुक्ति की इच्छा? उस इच्छा के पूरा होने का आशीर्वाद? यह सब तो आज भी उतने ही भयावह हैं, उसी तरह हृदय को आतंकित करते रहते हैं। अम्मा, प्यारी अम्मा.... युवावस्था में परलोक सिधारने वाली मां को याद करके पांडे की आंखें भर आईं। रात के इन अन्तिम पहर में उनके मन में हूक सी उठी। अम्मा मर के कहां गई होंगी? क्या सचमुच उन्हें वैतरणी पार करनी पड़ी होगी? क्या इस जहां से आगे और भी जहां है? क्या मरने के बाद पांडे अम्मा से मिल सकेंगे? जीवनकाल में नन्हें दुधमुंहे बेटे को हर समय कलेजे से लगाकर रखने वाली अम्मा क्या उनके लिए व्याकुल होती होंगी? हर साल गया जाकर पिंड दान करने से क्या सचमुच उनकी आत्मा को शान्ति मिलती होगी? आत्मा? आत्मा क्या है?
(रौशन आरा भी मुंशी रजब अली के नाम से फ़ातेहा पढ़ के कहती है कि इससे इनकी रूह को सुकून मिलता होगा और सवाब भी) यह गुनाह और सवाब क्या है? रौशन ने इन्हें कभी चुम्बन नहीं लेने दिया, सिर्फ हाथ पकडऩे की इजाज़त थी। यह गुनाह है... वह कहती थी (वैसे तो रौशन बीबी तुम्हारी आस्था के मुताबिक तुम्हारा मुझसे मिलना, या औरत-मर्द के बीच आकर्षण को राह देना ही गुनाह है) किसने बनाए यह पाप-पुण्य के पैमाने? वह तेज़ तेज़ चलने लगे.... अगर वह कलमा पढ़ के कहते हैं कि मैं मुसलमान हूं तो भी वह जानकी रमण पांडे ही रहेंगे या कुछ और हो जाएंगे?
फिर उन्होंने पूरे अदालती तर्क-वितर्क के बाद फैसला किया कि रहेंगे तो वह वही जो हैं... अपने सारे विवेक, सारे ज्ञान, अपने शरीर, अपने रंग-रूप, अपनी भावनाओं और संवेदनाओं, अपनी त्रुटियों, अपने स्वार्थ, अपने हर राग-द्वेष के साथ... राग अनुराग... उनकी दो बेटियां थीं और एक पत्नी। पत्नी के लिए उन्होंने किसी ऐसे मोह, भावनाओं के ऐसे ज्वार को नहीं महसूस किया था जैसे रौशन आरा के लिए लेकिन थी तो वह उनकी जीवन संगिनी। उसने कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था। और फिर दिद्दा और बेटियां? क्या उनके लिए उनके मन में प्यार सिर्फ इसलिए कम हो जाएगा (या खत्म) के वह अपने ऊपर एक नया लेबेल लगा लेंगे? यह कैसे हो सकता है जानकी रमण पांडे! उन्होंने अपने आप को झाड़ पिलाई। फिर यह कौन से झगड़े हैं, यह अल्लाह-भगवान के फ़र्क। (यह कभी मिटते नज़र नहीं आते। उन्होंने बड़ी पीड़ा के साथ सोचा)
अगले सप्ताह उन्होंने रौशन आरा से जा कहा कि वह कलमा पढ़ने को तैयार हैं।
''मगर रौशन'' उन्होंने झुकी पलकों और रौशन चेहरे वाली रौशन से कहा, ''मैं विष्णु का भक्त हूं। दिल से उन्हें नहीं निकाल सकूंगा। तुम यह समझ लो कि यह सारे नाम, यह सारी परिकल्पनाएं इन्सानों ने अपने बुनियादी सवालों के जवाब में ढूंढ़े हैं। यह दुनिया किसने बनाई? लोग मरते क्यों हैं? मरने के बाद कहां जाते हैं, क्या होता है? क्या दुनिया में जो अन्याय, जो दुख हैं उनकी कहीं कोई भरपाई है? जिन्हें कानून सजा नहीं दे पाता उन गुनाहगारों के लिए कहीं कोई सज़ा है? क्या परहित करने वालों को कहीं उनके अच्छे कर्मों का फल मिलेगा? रौशन बेगम, दुनिया में बड़े पाप, बड़े जुल्म हैं। धर्म न होता तो उनकी और भी बाढ़ आ जाती। धर्म कहो या मज़हब यह इन्सान में घुसे शैतान के सामने लक्ष्मण रेखा खींचता है, दुख में, क्राइसिस में धीरज बंधाता है, उम्मीदें जगाता है रौशन, तुम्हारा अल्लाह रहमान व रहीम है, पालनहार है, गुनाहों को माफ़ भी करता है और उनकी सज़ा भी देता है। मेरे विष्णु में भी लगभग यही गुण हैं और हां, वह मुस्कुराए, ''तुम्हारा अल्लाह जो रब्बु-उल-आलमीन (सम्पूर्ण संसार का ईश्वर) कहलाता है, रब्ब-उल-मुस्लिमीन (केवल मुसलमानों का ईश्वर) नहीं... क्या मेरा रब नहीं हुआ? अब मैं उसी को बीच में डालकर तुम्हारा हाथ थामूंगा, हां उसकी पूजा अर्चना उसके उसी रूप में करता रहूंगा जिस रूप में करता आया हूं।''
''दूसरी बात यह रौशन बेगम कि मैं अपनी पत्नी और दोनों बच्चियों को नहीं छोड़ सकता। वह जैसी भी है सात फेरे डालकर ब्याही बीबी है, उसकी पीठ पर हमारे पूरे समाज का हाथ है। किसी एक रिश्ते पर सबको बलि नहीं चढ़ाया जा सकता।'' वह तनिक रुके। लम्बी सांस ली और मुस्कुराए। मिसेज़ सिम्पसन् वाले किंग एडवर्ड का नाम मत लेना। वह ठहरे राजा। वह भी इंगलिस्तान के। हम आम आदमी, जनता जनार्दन, वह भी भारत के बड़े ही पुराने गूढ़ वर्णाश्रम का एक हिस्सा।''
हाथों के कटोरे में चेहरे का चांद थामे बड़े ध्यान से पांडे का प्रवचन सुनती रौशन हंसी। एक दुख भरी हंसी। ''पांडे मैंने अपना दिल तुम्हारे हवाले करते वक़्त यह नहीं सोचा था कि तुम जानकी रमण पांडे हो और मैं रौशन आरा। जब मैंने नामों के पीछे छिपे फ़र्क को पहचाना, उस वक़्त बहुत देर हो चुकी थी। तुम्हारा जो जी चाहे करते रहना। बस कलमा पढ़ के उंगली में जरा सा ख़ून लगा के शहीदों में शामिल हो जाओ क्योंकि निकाह के अलावा साथ रहने की कोई सूरत मुझे मंजूर नहीं है। मैं तो तुमसे गोश्त खाने को भी नहीं कहूंगी। जब मेरे यहां आओगे, गाय बैल का चारा डाल दिया करूंगी तुम्हारे आगे'' वह शरारत से मुस्कुराई फिर एकाएक गंभीर हो गई। तुम्हारी बीबी का हक़ छीनने की बात सोचूं भी तो सुअर खाऊं। मेरे यहां अपने की बात यह है कि जब चाहो आना और इतने ही दिन रहना जितने में तुम्हारा अमन-चैन खतरे में न पड़े।''
अगले हफ़्ते दोनों का निकाह हो गया। जानकी रमण पांडे ने निकाह से पहले एक डरे-सहमे, बेचारे से मौलवी के सामने इस्लाम कबूल किया। उस समय रौशन की नानी यानि रजब अली की बीबी बहुत उदास थीं और बहुत परेशान भी। अपनी परेशानी में उन्हें यह परवाह भी नहीं रह गई थी कि रौशन ने एक हिन्दू से निकाह किया है। कलमा पढ़ना कोई मानी नहीं रखता। यह महज़ सहूलियत के लिए है। उन्हें दुख यह था कि वह ओंकार नाथ की बहू को क्या मुंह दिखाएंगी, किस मुंह से उन्हें ईद की सिवईयां भेजेंगी। उसका दिमाग़ सुन्न हो रहा था। इस घर से इतने पुराने सम्बंध हैं। यही घर रह गया था सेंध मारने के लिए। अब जानकी रमण ठहरे मर्द, उन्हें कोई कुछ न कहेगा हालांकि रौशन न उनको देखते ही उनके ऊपर आशिक़ हुई थी, न उसने आने जाने और हेल मेल बढ़ाने के बहाने ढूंढे थे। बल्कि शुरू में तो वह जानकी रमण की आर-जार को बड़े शक की नजरों से देखती थी। लेकिन वह ज़िन्दगी के बेहद नाजुक दौर से गुज़रती एक कम उम्र की अकेली पड़ी लड़की थी। तवज्जो और प्यार पाया तो लुढ़क गई। लेकिन यह सब कौन देखता सुनता और कौन यह स्पष्टीकरण पाने को दम भर रुकना पसंद करता। और फिर यही हुआ। किसी ने पांडे जी को कुछ न कहा, सब कूद पड़े रौशन आरा पे।
कुलटा, कुलच्छिनी। पहले पति को छोड़ आई। ऐसी सुंदर औरत को कोई मारता है भला? आवारा होगी इसीलिए मार खाती होगी। उस पर दोष लगा दिया की दिवाना, पागल है। पास न आने देती होगी तभी तो तीन बरस में भी चूहे का बच्चा तक न जनके गिया। और यहां... इधर पांडे से ब्याह रचाया उधर बेटा। क्या पता पांडे से तभी से आशनाई रही हो। बेसुआ। धर्म अधर्म की भी नहीं सोची। ब्राह्मण का धर्म भ्रष्ट किया, सीधी नरक में जाएगी। अरे इसे तो नरक में भी जगह न मिलेगी। न जाने क्या क्या खिला रही होगी उन्हें।
फिर दुनिया जहान की सुनते, कुछ स्वयं कहते पत्नी ने पांडे से कहा। ''तुम वहां खा के आते हो, अपने बरतन अलग कर लो। यहां हमारे थाली कटोरों में मत खाना।''
पांडे पत्नी के साथ बड़ी नरमी बरतते थे। न जाने किस तरह अपना बचाव किया था और न जाने कैसी कैसी पट्टी पढ़ाई थी लेकिन खाने की बात पर गीता उठा के ले आए। उस पर हाथ रखकर सौगंध खाई। ''हमारे 'वहां' रहने पर बिल्कुल अलग बर्तनों में खाना बनता हैं। 'वह' स्वयं उन दिनों मांस-मछली नहीं खाती। शुद्ध सात्विक खाना होता है।'' इस 'वह' पर मिर्जापुर वाली के तन बदन में आग लग जाया करती थी। लेकिन गीता पर हाथ रखकर सौगंध उठाते पांडे ऐसे निरीह, ऐसे सच्चे, इतने दुखी लगे कि उसके बाद उसने इस खाद्य-अखाद्य के मसले पर रार मचाना छोड़ दिया।
खाने को तो पांडे ने कसम खा ली लेकिन उस दिन से बड़े शोकाकुल रहने लगे थे। जीवन में पहली बार अपने आप को सच्चा साबित करने के लिए इस अन्तिम हद से गुज़रना पड़ा था। लगा वह वकील नहीं हैं, मुजरिम के कटघरे में खड़े हैं। रामायण का वह प्रसंग याद आया जहां सीता अग्नि परीक्षा से गुज़री थीं। वह बहुत देर तक बैठे सोचते रहे। यह हलाल-हराम, खाद्य-अखाद्य है क्या? कोई गोश्त खाए या न खाए। कोई गोश्त खाता भी हो तो सूअर न खाए या फिर गय्या को वर्जित जाने। सब्ज़ी तक में कहीं कहीं प्याज़ के पकौड़े बनवाने शुरू कर दिए थे। दिद्दा के ससुराल में इनके जेठ के दो लड़कों के घरों में इस खान पान को लेकर चूल्हा अलग हो गया था। बरसों से चला आ रहा संयुक्त परिवार बिखर गया। दिद्दा के जेठ बहुत दुखी रहा करते थे। उनके एक लड़के ने न जाने किस की संगत में गोश्त खाना शुरु कर दिया था। उसकी पत्नी किसी नेवल ऑफिसर की बेटी थी। कॉफ़ी मॉर्डन। उसने मना करना तो क्या इस बात को बहुत पसंद किया। प्याज़ लहसुन का इस्तेमाल तो जी खोल कर हो ही रहा था। गोश्त चोरी छुपे पहले तो होटलों पर सीमित रहा फिर जब हियाव कुछ और खुला तो बिरयानी और मुर्गा नाश्ते दान में भर भर कर घर तक आने लगे। चतुर्वेदी ब्राह्मण के यहां यह अनर्थ। राम राम राम! दोनों भाइयों के यहां खुल के झगड़ा हुआ। बड़ा बेटा पुराने विचारों का था और बाप को बहुत प्यार भी करता था। इनकी ज़िन्दगी तक यह सब न होता तो बात इतनी न बढ़ती। छोटे का चूल्हा अलग करा दिया गया। बड़ा सा दो तल्ला घर दो अलग अलग घरों में बंट गया। मां-बाप बड़े बेटे के साथ हो गए। चूल्हा अलग हुआ तो उन सब छोटी छोटी बातों को लेकर लड़ाई होने लगी जो पहले अनदेखी कर दी जाती थीं। एक दिन मज़ाक ही मज़ाक में बड़ा हंगामा हो गया। देवर ने बड़ी भावज से कहा- भाभी एक दिन मुर्गे की टांग चबा कर तो देखो, मुर्गा तो क्या आदमी तक खाने लगोगी। 
भाभी इतना चिल्लाई कि सारा घर इकट्ठा हो गया। ऐसी रार मची कि जमीन जायदाद के बटवारे तक की बात होने लगी। (बटवारे की बात सच पूछा जाए तो पहले से मन में थी। उसका अच्छा मौक़ा मिल गया।) इन्सान कितने मूर्ख हैं। कब तक रहेंगे भला? रौशन आरा बता रही थीं कि उनकी अम्मा कभी सूअर का नाम नहीं लेती थीं। 'बुरा' कहती थीं या सूरत हराम। कहती थीं सू्अर का नाम लेने से घर में रहमत के फ़रिश्ते नहीं आते।
''और बीबी रौशन आरा तुम वह लोग हो जो मुर्गा, बकरा, गाय-भैंस, यहां तक कि ऊंट-घोड़ा सब खा डालते हो।''

''हम तो नहीं खाते ऊंट-घोड़े। और बीफ़ तुम्हारी वजह से छोड़ दिया।"

"हलाल तो हैं न ऊंट-घोड़े। तुम्हारे वह दूर के रिश्तेदार जो हैं, अरे वह..बद्दन मियां। उन्होंने छ बेटियों के बाद बेटा होने पर ऊंट की कुर्बानी दी थी। तुम्हारे यहां हिस्सा भिजवाया था। लोग बेटी पैदा होने पर ऊंट क्या बकरी की भी कुर्बानी न दें। लाख तुम कहते रहो कि इस्लाम में औरत का दर्जा बुलन्द है लेकिन धर्म और सामाजिक रीतियों में टकराव हर जगह दिखता है... पंडित ने यह भी कहा था।"

''हम ने कहां खाया वह ऊंट?''

"फिर वही मुर्गे की एक टांग! अरे हलाल है न, तुम्हारे धर्म भाई खाते हैं। तुम खाओ या मत खाओ।"

"मुर्गे की एक टांग तो तुम ने लगा रखी है। लगता है रेकार्ड पर सूई अटक गई।"

''सूई इसलिए अटकी कि तुमने यह नहीं बताया कि तुम लोग सूअर से इतना क्यों बिदकते हो? याद है एक वादा तुमने कुछ इस तरह किया था कि तुम्हारी बीबी का छीनूं तो सूअर खाऊं।''

''शायद इसलिए कि बड़ा ही गन्दा और घिनावना लगता है।''

"सो तो हमें भी लगता है लेकिन तुम्हारे यहां तो गधा भी हराम है और कुत्ता भी। तो तुम लोग नाराज़ होकर 'सू्अर खाना' क्यों कहते हो, गधा खाना, कुत्ता खाना क्यों नहीं कहते?'

''इस पहलू पर हमने कभी ध्यान नहीं दिया। हां अब तुम इस पर रिसर्च कर लो।"
रौशन आरा ने आंखें निकालीं... अरे पंडित घर में ही दंगा कराओगे क्या? बाहर तो बहुत करा लिए तुमने!'' 
पांडे खिलखिला कर हंसे।
हाल ही में एक दंगा होते होते बच गया था। कोई टेढ़े दिमाग वाला मस्जिद में गोश्त की पोटली फेंक गया था। अब वह गोश्त किस का था यह जानकारी तो नहीं ली जा सकी लेकिन मस्जिद में फेंका गया इसलिए जरूर किसी नापाक जानवर का ही रहा होगा। भड़के हुए नौजवानों को समझा बुझा कर ठंडा करने में पांडे आगे आगे रहे। वह इन दिनों रौशन आरा के पास रसूलपुर आए हुए थे।
''तुम लड़कर उनसे नहीं जीत सकोगे जो संख्या में तुमसे इतने ज्यादा हैं। तुम्हारी गलतियां तुम्हारे लोगों के बड़े नुकसान का कारण बनेंगी। धैर्य रखो। छोटी छोटी बातों से आपे से बाहर मत हो जाओ।'' पांडे ने समझाया था।"

''यह छोटी बात है?'' कुछ लड़कों ने आंखें निकाली थीं।

''समझो तो छोटी ही है। पोटली उठाकर फेंक दो। मस्जिद का आंगन धो डालो किस्सा खतम। जो तुम्हें चिढ़ा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं वह भी एक दिन शान्त हो जाएंगे।'' मगर बड़ी देर लगी जोश में आए लोगों को ठंडा करने में। पांडे ने स्वयं पोटली उठा कर कूड़े पर फेंकी। फिर बाल्टी भर भर पानी लाए। गरम माहौल ठंडा पड़ा और कोई बड़ी घटना होने से टाली जा सकी।

(''बड़ी घटना होती भी कैसे? मुसलमानों में दम है कहीं? कुछ फुटर फुटर करेंगे तो तुम उन्हें पीट पाट के रख दोगे। कब्रिस्तानों पर कब्जा भी करोगे और उन्हें कब्रिस्तान भेजने की धमकी भी दोगे। पाकिस्तान तो हम जाने से रहे'' रौशन की टिप्पणी थी। बाबरी मस्जिद का मामला उन दिनों गरम हो रहा था। कोई रौशन के दरवाज़े पर खरिया मिट्टी से लिख गया था 'मुसलमानों के दो स्थान - पाकिस्तान और कब्रिस्तान।)

रौशन बिल्कुल जड़ हो गई थी। चेहरा ऐसा जैसे आसपास किसी चीज़ का होश न हो। लम्बे लम्बे बाल जो उस रात पांडे ने खोल कर अपने शानों पर बिखराए थे, उसी तरह बिखरे हुए थे और थोड़ा उलझ चले थे। आंखों के नीचे काले घेरे उभर आए थे। आंखें, जो अब भी रौशन और चमकदार थीं उनमें किसी ने आश्चर्य जैसे कूट कूट कर भर दिया था। आश्चर्य इस अनहोनी पर जो हो चुकी थी। मन उसे स्वीकार नहीं कर पा रहा था। कहीं यह बात भी कचोट रही थी कि पांडे उसके पास आकर ही क्यों मरे (लेकिन शायद वह अपने घर पर रहकर परलोक सिधारे होते तो उसको यह सदमा चैन न लेने देता कि उनके अन्त समय में वह उनका मुँह न देख सकी।) पता नहीं वहां लोग क्या सोचेंगे। दोनों बेटे तो थे ही, और बहुत से लोग इकट्ठे हो गए।
पांडे पास पड़ौस में बहुत लोकप्रिय थे। लेकिन रौशन की समझ में नहीं आ रहा था कि जो आज तक लोगों को पता नहीं चला वह राज कैसे खोले। कैसे कहे कि उसका शौहर मुसलमान नहीं है, उसका क्रिया-कर्म हिन्दू रीति से होना चाहिए। वह पूरा गांव मुसलमानों का था कुछ ब्राह्मण और राजपूत घर थे। गांव के हाशिए पर कुछ दलितों की झोपड़ियाँ थीं। मगर क्या पांडे को किसी खांचे में रखा जा सकता था? किस खांचे में?
काफी समय गुजरा। एक रात जब वह रौशन के इन्हीं लम्बे, काले घने बालों में उंगलियों से कंघी करते, उसका सिर अपनी छाती पर टिकाए लेटे हुए थे तो रौशन ने कहा था, "पंडित तुम कितने बड़े रियाकार (धूर्त) हो। जुमे के दिन मस्जिद में जाके नमाज भी पढ़ आए। सच कहना नमाज में क्या पढ़ा था? गायत्री मंत्र या हनुमान चालीसा?"

पांडे हंसे थे। हमें सातों कलमें याद हो गए हैं और अलहम्द (कुरान की एक सूरह) भी। वही हेर फेर के पढ़ लिए। बाकी उठ्ठक-बैठक बस इमाम साहब के पीछे वैसे ही करली जैसे दूसरे कर रहे थे। फिर वह अचानक ही गंभीर हो उठे, 'दो मुल्लाओं के बीच मुर्गी हराम होते कभी देखी है रौशन?''

''क्यों मुर्गी कहां से सूझ गई पंडित? वह भी हलाल-हराम के फ़र्क से। खाओगे क्या?''

''रौशन''। पांडे गंभीर ही रहे! हम सीधे सादे हिन्दू थे। तुम्हारे चक्कर में नकली मुसलमान बने। फिर असली हिन्दू भी न रहे। पक्के नास्तिक हो उठे। वह क्या कहा जाता है नेचरी।

रौशन ने एक झटके से घने बाल पीछे फेंके और उठकर बैठ गई। ''वाही तबाही मत बका करो। चलो खाना लगाती हूं।'' वह किचन की तरफ़ बढ़ गई। देखा पंडित पीछे पीछे चले आ रहे हैं। फिर वह गैस के चूल्हे से कोहनी टिका कर खड़े हो गए।

''रौशन, पहले कभी हमने अल्लाह, भगवान, मज़हब-इन सब पर इतना विचार करने की जरूरत नहीं समझी थी। हम समझते थे हां है एक पालनहार और संध्या आरती करते उनके प्रति अपने सारे फ़र्ज़ पूरे कर लेते थे। आस पास दूसरे धर्म की बड़ी नुक्ता चीनी सुनते थे। हमें भी लगता था हमारा धर्म ही सबसे अच्छा है। फिर हमने दुनिया को ग़ौर से देखा। तुमसे मिलने के बाद तुम्हारे मज़हब को समझने की कोशिश की। पहले हम निरे वकील थे। कानून के अलावा कुछ नहीं जानते थे। बाद में बहुत कुछ पढ़ा, हिस्ट्री, सोशियालॉजी, एन्थ्रोपॉलोजी, धर्म। और अब-अब हम सारे ख़ानों, तहख़ानों से ऊपर उठ चुके हैं।''

''सुनो पंडित'', रौशन ने चने की दाल भरे टिन्डे कढ़ाई से निकाल कर एक फूलदार डिश में रखते हुए संजीदगी से कहा, ''हमारे किसी मज़ाक पर सीरियस मत हो जाया करो। बा खुदा तुम्हारे मज़हब से हम ने कोई मतलब नहीं रखा। हमारे लिए तुम सिर्फ तुम हो। एक इन्सान जिसने हमें भरपूर प्यार दिया और तहफ़्फुज़ (सुरक्षा)।''

''जानते हैं रौशन और हमने भी सिर्फ तुम्हारी अच्छी सूरत को नहीं चाहा। तुम्हारी गहरी सूझ बूझ, तुम्हारी खुशमिजाज़ी, तुम्हारी ईमानदारी, धर्म से ऊपर उठकर लोगों को परखने की सलाहियत... यह सब हमने अपनी धर्म पत्नी में चाहा था। वहां नहीं मिला तभी तुम्हारी ओर ढुलक पड़े। आज हम तुमसे कुछ कहना चाहते हैं। हमें कह डालने दो रौशन! हमने बड़ी गहराई से महसूस किया है कि इस कायनात के रहस्यों ने, ज़िन्दगी और मौत ने, बुढ़ापे और दुख ने, कुदरत की रंगारंगी ने हर दौर, हर रंग और हर नस्ल के इन्सानों में एक ऐसी शक्ति की कल्पना जगाई जो इन सारे गोरख धंधे के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सके। जिसे संसार कहते हैं। वह शक्ति एक पिता की तरह मुहब्बत करने वाली है, उससे हम सच का पक्ष लेने और झूठ का विरोध करने की अपेक्षा करते हैं। वह हर शय से ऊपर है, हर समय जागती और हर प्राणी पर नज़र रखती है। उससे हम सब कुछ मांग सकते हैं। इस शक्ति, इस हस्ती को खुश रखने, उसके गुस्से, उनकी अनदेखी से बचने के लिए हमने पाप और पुण्य के नियम गढ़े। बुनियादी तौर पर सारे पाप वह थे जिनसे दुख या नुकसान पहुंचे और पुण्य वह जो किसी को सुख पहुचाएं, दुख में मदद करें। लेकिन फिर उनमें बहुत कुछ ऐसा भी जुड़ता गया जो इतना स्पष्ट, इतना साफ नहीं था। इन तसव्वरात को विकसित करते करते हम यह भूल गए कि वक्त, जगह और सोच के हिसाब से लोगों को तसव्वरात का अलग अलग होना फ़ितरी था चाहे उनका बुनियादी मक़सद एक ही क्यों न रहा हो यानि उस क़ादिर-मतलक़ तक पहुंचना जो हमारा ख़ालिक है। लेकिन हम में से ज्यादातर सिर्फ उसी तरीके को सही समझते हैं जो उनका अपना है। जो हमारे दायरे से बाहर थे उनसे हमने नफरत की। कभी-कभी तो उनका सिर काट देना जायज ठहराया। फिर पाप पुण्य में भी ऐसी ऐसी शाखाएं फूटीं जिनके कोई मानी ही नहीं रह गए।''
''रौशन, लेकिन मैं एकेश्वरवादी हूं। मतलब जानती हो? एक ईश्वर, चाहो तो खुदा कह लो, में यक़ीन रखने वाला। मेरे सनातन धर्म में एकेश्वरवाद रहा है। मैं तुम्हारे पैग़म्बर साहब की बड़ी इज्ज़त करता हूं। उन्हें मैं और कुछ समझूं या नहीं, बहुत बड़ा इन्कलाबी सुधारक मानता हूं।''

''फिर भी तुम मुसलमान नहीं हो।''

"मैंने कहा न रौशन, मैं अब हिन्दू भी नहीं हूं। मैं एक इंसान हूं। मुझे चिड़ियों की चहचहाहट में, खुशबू में, आकाश में बिखरे तारों में, नदियों के पानियों में, उगते और डूबते सूरज के हुस्न में, उस परमपिता का नूर दिखाई पड़ता है। शायद सूरज की पूजा भी हमारे ऋषियों-मुनियों ने इसीलिए करनी शुरु की थी। और पेड़ों और नदियों की भी। यह सब उसी एक शक्ति के रूप हैं। और रौशन, मैं हर व्यक्ति के लिए उसकी व्यक्तिगत आस्था और धर्म के अधिकार को मानता हूं। वह जिस तरह भी चाहे, अपने भगवान तक पहुंचने का उपक्रम करे, उसे जो चाहे नाम दे। लेकिन दुख की बात यह है कि धर्म के नाम पर जितनी दीवारें उठीं, जितने ज़ुल्म हुए, शायद किसी और मुद्दे पर नहीं हुए होंगे। अमेरिका की खोज के बाद जब स्पेनी वहां पहुंचे तो बारूद और चेचक के साथ वह वहां के मूल वासियों के लिए तोहफ़े में एक नया खुदा भी ले गए थे। बेशक उन्हें इस नए ईश्वर के साथ ताल मेल बैठाने में परेशानी हुई होगी। उन्हें वक़्त लगा होगा अपने पुरखों की उन आत्माओं को भुलाने में जिन्हें वह पूजते चले आए थे, उन पवित्र भैंसों की हत्या होते देख कर दुख न करने में... जर्मनी के कुछ कबीले ओक के पेड़ों की पूजा किया करते थे। ईसाई मिशनरियों ने उन्हें कटवा दिया।
और रौशन माफ़ करना, तुम्हारे यहां भी धर्म प्रचार की बड़ी अहमियत है। मैं यह नहीं कहूंगा कि इस्लाम केवल तलवार के ज़ोर पर फैला लेकिन इसके फैलने में मुसलमान आक्रमणकारियों और उनकी विजय का काफ़ी हाथ जरूर रहा है। इसलिए कि जो पराजित होते हैं उन्हें विजेताओं का धर्म अपनाने में कई फ़ायदे नज़र आते हैं। फिर धीरे धीरे बदलता समाज और बदलते धार्मिक विचार अपना असर डालते चले जाते हैं।''

''और तुमने बौद्धों को मार मार के भगा दिया। उनके मठ तबाह किए। महात्मा बुद्ध को विष्णु का नवां अवतार मानकर उनको हड़प कर गए। यह बुद्ध धर्म को खत्म करने का हथकन्डा था।'' रौशन के चिढ़ कर कहा। फिर हंस के बोली, ''लेकिन मुझ मुसलमान को महात्मा बुद्ध से बड़ी अक़ीदत है। काफ़ी प्रवचन दे लिए तुमने घास खोर, चलो तुम्हारा खाना लगा दिया है।''

''रौशन, तुम्हारे महात्मा बुद्ध ने मूर्ति पूजा का विरोध किया था और सारे कर्मकाण्ड का भी। लेकिन उनके पैरूकारों ने सारी दुनिया में उन्हीं की मूर्तियां लगा दीं और वह सारा कुछ करने लगे जिसे नकारा गया था। बात दरअस्ल यह है कि रौशन की खुदा या भगवान इनसानों की जरूरत है। वह भी ऐसा जो दिखाई-सुनाई दे। तुम्हारे निर्गुण निराकार खुदा की पूजा अर्चना बड़ी कठिन है भाई। उसके लिए जो गहरी सूझ बूझ दरकार है वह आम लोगों में कहां मिल पाती हैं। हां लाठी हाथ में हो तो दूसरों के शरीर और आस्था, दोनों पर करेर वार करना सबको आ जाता है। इन्सान में जो शैतान छुपा हुआ है उसे बस में करना... अब देखो न, बामियान में बुद्ध जी की इतनी विशाल और भव्य मूर्तियों को तुम्हारे तालिबान ने...।''

रौशन इस बार सचमुच नाराज़ हो गई। ''तालिबान मेरे क्यों? इसलिए कि मेरा उनका मज़हब एक है? मेरा सिर शर्म से झुक जाता है पंडित। इन मूर्तियों को अफ़गानिस्तान के किसी फ़ातेह ने हाथ नहीं लगाया था। बुत-शिकन कहलाने वाले महमूद ने भी नहीं।'' उसके गुस्से में दुख घुला हुआ था।

''हर मज़हब अपनी अस्लियत में कुछ था, पैरूकारों ने उसे कुछ और बना दिया। एक बात बताओ रौशन, पांडे ने अचानक हंस कर कहा, हम मर जाएंगे तो हमारी अंत्येष्टि किस धर्म के मुताबिक होगी? भाई हमें दफ़नाए जाने से बड़ा डर लगता है। कब्र में आके तुम्हारे मुनकिर-नकीर परेशान करेंगे सो अलग। तुम हमारी उल्टी सीधी झेल लेती हो वह तो गदा उठाकर सीधे शुरू हो जाएंगे दे दना दन....

रौशन होंठ दबा कर दूसरी तरफ़ देखने लगी। पांडे की कतरनी जैसी ज़बान चालू थी... ''और रौशन, हम कबीर नहीं हैं कि मरें तो हमारे शरीर की जगह फूल आ जाएं। आधे तुम बांट लो और आधे वह, हमारी पहली महल।'' रौशन ने पांडे को घूर कर देखा। होंठों से मुस्कुराहट की महीन सी रेखा ग़ायब हो गई थी। 
पांडे हंस पड़े। ''अच्छा यह एक बात और बताओ। यह सारे चमत्कार पिछलों के साथ ही क्यों होते थे जिन्हें हमने देखा जाना न हो। हमारे साथ ही क्यों नहीं होते? आज, अब? वैसे एक अच्छी बात तो है। हमें मर कर दोहरा पुण्य मिलेगा। पिंड दान तो होगा ही। तुम भी फ़ातेहा जरूर पढ़ोगी जैसे अपनी मां के लिए पढ़ती हो और रजब अली चाचा के लिए।''
रौशन ने थाली पटक दी। खाना सामने रखकर ऐसी अपशुकनी बातें!
''रौशन हम तुमसे बहुत बड़े हैं इसलिए तुमसे पहले हमारी मौत लगभग तय है।'' लगभग हमने इसलिए कहा कि कहीं हमसे तंग आकर तुमने आत्महत्या की ठान ली तो...? मगर नहीं, तुम ऐसा नहीं करोगी। हमें अकेला छोड़ कर तुम नहीं जाओगी'' उन्होंने उसके लम्बे, मुलायम बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया। ''अच्छा, सच कहो क्या करोगी जो हम मर गए?''

''करेंगे क्या?'' रौशन ने अचानक उमड़ आने वाले आंसू पी लिए। ''अब भी राजी व  रज़ा हैं, तब भी वैसे ही रहेंगे।''

''राज़ी-ब-रज़ा'' तीनों शब्दों को पांडे ने अलग अलग करके दोहराया। ''यानी जाहि बिधि राखें राम ताहि बिधि रहियो।''
''राम'' वही है, वही सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान जिनके सिर सब कुछ मढ़ कर हम अपनी ज़िम्मेदारियों से बरी हो जाते, दुखों को आसानी से झेल लेते हैं। यह दसरथ पुत्र राम नहीं, वेदों के ब्रहमन् हैं। कबीर के राम भी वही थे और गांधी के राम भी वही। हम कोई सा भी धर्म अपनाए, लेबेल कोई भी लगा दो, हम वही रहेंगे और एक इन्सान की हैसियत से अपना फ़र्ज भी निभाएंगे। हमने अपनी आधी जायदाद तम्हारे और तुम्हारे दोनों बेटों के नाम कर दी है और आधी तीनों बेटियों के नाम। हां जिस घर में रहते चले आए हैं वह पत्नी को दे दिया है।''

''पंडित, हमें कुछ नहीं चाहिए। रसूलपुर में रहने का ठिकाना तुमने कर ही दिया है। दोनों लड़के पढ़ रहे हैं, वह खुद बहुत कमा लेंगे। तुमने उन्हें बाहर रखकर अच्छे स्कूल-कॉलेज में पढ़ाया, इतना खर्च किया, अब और क्या दोगे। हमारा सिर फटने लगता है जब हम सोचते हैं कि इन्सान बुनियादी तौर पर कितना खुदगर्ज और नीच है। एक नीचता तो हमने भी दिखाई कि एक बेचारी औरत के शौहर पर अधिकार जमा लिया।''

''वह औरत ऐसी बेचारी भी नहीं है रौशन। उसे हमारा भरपूर साथ मिला है। समाज ने उसे जो कुछ दिया, वह हम तुम्हें न दे सके समाज से कट के व्यक्ति अकेला हो जाता है। सच पूछो तो हम तुम्हारे गुनहगार हैं। तुम्हें बिना किसी मदद के, बेसहारा छोड़ कर हम अपने पापों को बढ़ाना नहीं चाहेंगे। हमारी दिली इच्छा है कि मरें तो तुम्हारे पास हों...''
के.के. मामा होते तो कहते, 'अरे वह तो सदा से काली जीभ वाला था। जो बुरी बात मुंह से निकालता, पूरी हो जाती। लेकिन के.के. मामा तो काफी समय पहले ही गुजर चुके थे। न अब वह किस्से थे न बैठकें। सदा रहे नाम अल्लाह का जो अनादि है और अनन्त। अछेद और और अभेद्य। जो जीवन व मृत्यु दोनों से बालातर है (हम इन्सान तो बस मौत के ऊपर उठने की इच्छा ही करते और अगले जहान गढ़ते रहे)
दरवाज़े पर शोर बढ़ता जा रहा था। लोगों के हाथों में लाठियां थीं। कुछ लाठियों पर सान चढ़े हुए फल भी चमक रहे थे। लाठियों वाले लोकल लोग थे। इलाहाबाद से पांडे के तीनों दामाद, उनके एक दूर के रिश्तेदार और दिद्दा के जेठ के परिवार वाले थे। दिद्दा के अपने दोनों बेटों ने खुद की इस टन्टे से अलग रखा था। माँ के नाम पर गन्दी गालियां सुनी तो रौशन के लड़कों से न रहा गया। वह निहत्थे ही बाहर निकल आए। अन्दर रौशन हाथों पर कुरान उठाए थर थर कांप रही थी।
कुछ ही देर में वह खुद भी बाहर निकल आई और बेटों के सामने ढाल बन कर खड़ी हो गई।
''यह तुम्हारे रिश्तेदार हैं, तुम्हारे भाई। जानकी रमण पांडे की अपनी सन्तानें...'' उसने चिल्ला कर कहा।

''पहले तो इस कुल्टा को ही मारो।'' भीड़ में से कोई जवाब में चिल्लाया।

''तुम लोग काग़ज ले आओ। अमन चैन से हमारे साथ बैठो। हम तीनों उस जायदाद से दस्तबरदार होते हैं जो पंडित हमारे नाम कर गए हैं।'' रौशन को अच्छी तरह याद था कि दिद्दा के जेठ के यहां गोश्त खाने न खाने को लेकर जो तकरार हुई थी वह जमीन जायदाद के बटवारे पर जाकर खत्म हुई। लड़कों को पीछे धकेल कर उसने यह बात भी चिल्ला कर कही।
तभी किसी अनहोनी के डर से जीप लेकर भागे चले आ रहे बुजुर्ग ओंकार नाथ मिश्र मौके पर पहुंच गए। सत्तर से ऊपर थे। दिद्दा के गुज़र जाने के बाद लगभग सन्यासी की जिन्दगी बिता रहे थे। दुनिया की ऊंच नीच देख चुके थे और लोगों के स्वभाव को अच्छी तरह समझ चुके थे। दुनिया चार दिन की है, यह विचार भी मानस पटल पर लिखा जा चुका था। पांडे रसूलपुर में मरे, वहां लोगों ने बाकायदा जनाज़े की नमाज़ पढ़कर उन्हें कब्रिस्तान में दफना दिया है, यह पक्की खबर आ चुकी थी। मरने से पहले उन्होने लगभग आधी जायदाद रौशन और लड़कों के नाम कर दी थी, यह भी लोगों को मालूम हो चुका था। इधर चुनाव करीब आ रहे थे। रसूलपुर में आईएसआई के एजेन्टों की घुसपैठ की अफ़वाह भी कभी कभार कान में पड़ रही थी। सब कुछ मिला जुला कर स्थिति बड़ी खतरनाक थी। ओंकार नाथ कमर पर हाथ रख कर उठे। पांडे की पहली पत्नी माथे तक घूंघट खींच कर पास आईं।
''भाई साहब, लड़कों और उनकी मां पर आंच न आने दीजिएगा। रौशन आरा ने 'उन्हेंं' कभी हमसे छीना नहीं। रहे लड़के तो वह तो 'उन्हीं' का खून हैं। धर्म दूसरा होने से खून नहीं बदलेगा।'' उनकी आवाज़ भर्रा गई। ''दामादों को हम कुछ न कह सके।''

ओंकारनाथ को भी सूखी, सूनी आंखों में नमी का एहसास हुआ। पत्नी की मौत के बाद पहली बार खुल कर रोने को जी चाहा। कुछ रुक कर बोले, ''भगवान से मनाओ हमारे जाने से पहले कोई अनर्थ न हो चुका हो।'' और उठ खड़े हुए। उनकी स्वर्गवासी पत्नी भाई पर जान देती थीं। यही कारण था कि उन्होंने रौशन और उसके पैदा होने वाले दोनों लड़कों को स्वीकार किया था। लेकिन इस समय स्वयं उनके बेटे जानकी रमण के दामादों का साथ दे रहे थे। बेशक वह उनके साथ मरने मारने नहीं निकले थे लेकिन समझाने या रोकने की कोशिश भी नहीं की थी। और ओंकारनाथ के भाई के लड़के? वह तो साथ भी चल दिए थे। इस समय उन्हें अपने सारे रिश्ते-नाते निभाने का ख़याल आ गया था।

जानकी रमण के सोने के दिल वाली काली पत्नी की प्रार्थना सुन ली गई थी। ओंकार नाथ सही समय पर पहुंच गए थे वर्ना वास्तव में कुछ अनर्थ हो जाता। मामला सुलझ गया। ज़मीन जायदाद से रौशन ने अपना अधिकार वापस ले लिया। यह वादा, कुछ और शर्तें और कब्र से उखाड़ कर निकाला गया पांडे का पार्थिव शीर लेकर लोग वापस आ गए।

''छोटी बहू, - ओंकार नाथ पहली बार रौशन से रू-ब-रू हुए थे!'' इजाज़त दे दो।'' उन्होंने नर्मी से कहा था। 
''वर्ना तुम तो सिर्फ तीन हो, गांव में न जाने कितने ऐसे निर्दोष मारे जायेंगे जिनका तुम्हारे इस गोरखधन्धे से कोई वास्ता नहीं है। वातावरण में तनाव है, खुद ही कह दो कि ठीक है, ले जाइए। इसी में भलाई है, सद्भाव बना रहेगा। जिनकी मति पलट गई हो हम उनसे लड़ नहीं सकते बेटा।"

पंडित के शरीर की ऐसी दुर्दशा! रौशन पछाड़ें खाने लगी। कितना कहा था गांव के लोगों से, बेटों से, कि उसे उनके घर इलाहाबाद पहुंचा दिया जाए पर लोग नहीं माने।

''छोटी बहू, मरा हुआ इन्सान सड़ने के लिए नहीं छोड़ा जाता। न घर में न सड़क पर, यह सभी जानते हैं।'' लोगों के लाश ले जाने के बाद ओंकार नाथ कुछ देर के लिए वहीं बैठ गए थे। ''अब उसे जलाओ या दफ़न करो, वह तो इस संसार से गया। पंच तत्व, पंच तत्व में मिल जाते हैं। जलकर भी यही होता है और गाड़ दिए जाने पर भी यही। अन्तर सिर्फ इतना ही है कि मिट्टी में यह क्रिया बहुत धीरे धीरे होती है। मगर लोग इस बात को नहीं समझेंगे। मरने के बाद की सारी रस्में केवल उनकी तसल्ली के लिए होती हैं जो अभी जीवित हैं। हम तो साधारण आदमी हैं। ऋषियों मुनियों ने शरीर को चोला माना है जिसे आत्मा बदलते रहती है। आत्मा, जो अजर और अमर है। यह मानें तो दफ़न किए जा चुके आदमी को उखाड़ कर निकालना बिल्कुल बेमानी हो जाता है। मगर हम क्या करें बेटा, भगवान को भी मूर्खों से विशेष लगाव है इसीलिए उसने इतनी बड़ी तादाद में मूर्ख पैदा किये हैं। क्या करोगी, सब्र करो।''

''ओंकार भाई साहब'', रौशन ने आंसू भरी आंखे उठा कर उन्हें देखा। धरती आप जैसे देवता समान लोगों पर टिकी हुई है। इतनी मेहरबानी हम पर और कीजिए, हमें इलाहाबाद ले चलिए। कहीं ठहरा दीजिएगा। रजब अली नाना तो पहले ही चले गये थे अब नानी भी नहीं रहीं। दूसरे रिश्तेदारों ने नाता तोड़ रखा है।'' वह फफक फफक कर रोने लगी।

... शांति से हौले हौले बहती गंगा मय्या के किनारे धू धू कर जलती चिता। शाम के धूमिल अंधेरे में लपकती लाल पीली लपटें। आकाश पर इक्का दुक्का बादल तैर रहे थे। हरियाली में छिपे झींगुरों ने शोर मचा रखा था। आदमी जन जा चुके थे। लकड़ियों की तड़तड़ाहट, मेंढकों, झींगुरों और दरिया की तिरल तिरल गुनगुनाहट के बावजूद फैला सन्नाटा। अनन्त, असीम और अनादि। आग की और भी कई ढेरियां थीं जो इन्सानों को खा रही थीं। पांचों तत्व, पांचों तत्वों में विलीन हो रहे थे।
नदी रे नदी कितने लोगों को फुंकते देखा? इस किनारे और उस किनारे। यहां से वहां तक-तहां से तू आती है और जहां जाकर विलीन हो जाती है?

पेड़ों के झुरमुट के पीछे से निकल कर वह सामने आ गई। एक ओर जमीन थोड़ी ऊंची थी। उसी के पीछे एक कतार में पेड़ थे। हरे भरे, अजर अमर। वह उस ऊंची जमीन पर खड़ी हो गई। हल्के फुल्के शरीर की, लम्बी गोरी (उस समय कागज जैसी सफेद) स्त्री। हवा के झोंके से उसकी महीन, किनारीदार सफ़ेद साड़ी का आंचल फडफ़ड़ाया। अचानक ऐसा लगा जैसे वह इस पूरे दृश्य पर हावी हो उठी है।
यह आदमी जो आग की लपटों के हवाले किया गया, जिसके घने बालों को आग ने एक लमहे, केवल एक लमहे में चाट लिया, जिसके मज़बूत सिर को कपाल क्रिया के दौरान लाठी मार कर फोड़ा गया, उसका कौन था? क्यों आई थी वह यहां शमशान घाट पर जहां स्त्रियों को आने की इजाज़त नहीं है? यह सारे इन्सान कौन है जो कब्र के कीड़ों और चिता की शरीर चाटने वाली लपटों को भुला कर जान लेने और जान देने पर तुल जाते हैं? क्यों इन्होंने अपने और अपने जैसे दूसरे लोगों के बीच नफ़रत की दीवारें खड़ी कर रखी हैं?

''किसी भुलावे में मत रहना रौशन आरा बेगम। यह दूसरी दुनिया की कल्पना हम इन्सानों की सदा जिन्दा रहने और मौत पर विजय पाने की ख्वाहिश के अलावा और कुछ नहीं। यह आत्मा का अजर-अमर होना बिल्कुल बकवास है। हमारा तुम्हारा साथ बस इत्ता ही है जितने दिन हम जिन्दा हैं। अब तुम्हारा जी न माने तो हमारे नाम से भी फ़ातेहा पढ़ लिया करना।'' फिर वह शरारत के साथ मुस्कुराए। 
''मगर क्या तुम्हारी फ़ातेहा हम तक पहुंचेगी? हम ठहरे...''

बुझती चिता के धुएं की तरह बेचैनी ने रौशन के भीतर चक्कर काटे।
''सारे स्वर्ग, सारे नरक, हम इसी संसार में झेल लेते हैं और यह हमारे ही रचे हुए होते हैं, हमारे अपने कर्मों के फल''
रौशन आरा ने आंसू पोंछे। अलविदा, जानकी रमण पांडे, अलविदा।

【 उर्दू से लिप्यांतरण : स्वयं लेखक। पहल अप्रैल 2017 अंक से साभार 】

रविवार, 10 मई 2020

मुख़बिर : राजनारायण बोहरे

#किताबें_2020
#लॉकडाउन_डायरी

जाने कितने दिनों के बाद...
पूरी हुई तीसरी किताब!

इस लम्बे लॉकडाउन में हालात कुछ ऐसे रहे कि एक के बाद एक तमाम किताबें सिरहाने जुटती चली गईं। मंगला से शयन तक, बेगम समरू का सच, जनता स्टोर, दूसरी शुरुआत, जो घर फूँके आपना, बारिशगर, एक लड़की पानी पानी, लिट्टी चोखा, हाशिमपुरा 22 मई ( विभूतिनारायण रॉय ), दावानल (बालशौरि रेड्डी), विष्णुगुप्त चाणक्य ( वीरेंद्र कुमार गुप्त )... किसी की भूमिका पढ़ी गई, किसी के शुरुआती चार छह पन्ने तो किसी संग्रह की दो चार कहानियाँ...। कविता वर्मा के उपन्यास के बाद एक बैठक वाली किताब मिली नहीं। इधर  टुकड़ों टुकड़ों में पढ़ने के कारण कोई किताब पूरी ही नहीं हो रही थी। इसी अराजक मनःस्थिति में एक दिन ध्यान आया कि राजनारायण बोहरे जी का उपन्यास 'मुख़बिर' भी अरसे से अधूरा पड़ा है।【 इसका आगाज़ नवम्बर के आख़िरी दिनों में इंदौर में हुआ था। निरन्तर यात्राओं के कारण यह पूरा नहीं हो सका था।】
और फिर... इसे भी ढूँढ़कर सिरहाने रख लिया।

हमारी पीढ़ी बचपन से ही डाकुओं के किस्से सुनते, पढ़ते और शोले जैसी फ़िल्मों में देखते हुए बड़ी हुई। साहित्य में इस पृष्ठभूमि पर संभवतः कम लिखा गया है। यदि लिखा भी गया होगा तो शायद उन किताबों तक पहुँचना सम्भव न हुआ हो। बोहरे साहब मूलतः चम्बल क्षेत्र से हैं और यकीनन उनके पास देखे, सुने गए अनुभवों और स्मृतियों की ऐसी पुख़्ता ज़मीन मौजूद थी जो इस उपन्यास के कथा-धरातल की रचना में स्वाभाविक रूप से मददग़ार सिद्ध हुई।

राजनारायण बोहरे जी का यह उपन्यास हैरतअंगेज़ घटनाओं और सूक्ष्म विवरणों के जरिए चम्बल घाटी के जनजीवन, मुख़बिरों, डाकुओं और पुलिस महकमे की कार्यशैली का यथार्थपरक चित्रण करता है।
'मुख़बिर' में कल्पना और सत्य का प्रतिशत क्या है, यह तो नहीं मालूम, किन्तु यह कहानी पाठकों को डिस्टर्ब ज़रूर करती है। परिवेश को यथार्थवादी और विश्वसनीय बनाने के लिए देशज बोली, कहावतों और स्थानीय गालियों का प्रयोग भी हुआ है।( हालाँकि गालियाँ सांकेतिक रूप से आधी अधूरी ही लिखी गई हैं। )

पुलिस और डाकुओं के बीच मुख़बिर उसी तरह पिसते हैं , जैसे गेहूँ के साथ घुन। उनके लिए इस विडम्बना में फँसना जितना आसान है , इससे बाहर निकल पाना उतना ही असंभव! यह उपन्यास उन जातिगत अत्याचारों और अमानवीयताओं पर भी रौशनी डालता है जिसके कारण दलित और शोषित वर्ग के पास चम्बल की घाटियों में कूद जाने के सिवा कोई और विकल्प शेष नहीं रहा था।

एक नई और लगभग उपेक्षित पृष्ठभूमि पर लिखे गए इस महत्वपूर्ण उपन्यास के लिए राज बोहरे भाई साहब को हार्दिक शुभकामनाएँ। उनकी किस्सागोई आश्वस्त करती है। वैसे भी महानगरों की राजनीति से दूर रह गए नगरों और कस्बों में किस्से कहानियों की परम्परा कहीं ज़्यादा बेहतर और जीवंत नज़र आती है।

● किताब : मुख़बिर
● लेखक : राजनारायण बोहरे
● प्रकाशक: प्रकाशन संस्थान, दिल्ली
● पृष्ठ: 183
● मूल्य : ₹ 250

शुक्रवार, 8 मई 2020

खिरनी : मनीष वैद्य

★ खिरनी: मनीष वैद्य

लड़का गली में खुलते किवाड़ से सटकर खड़ा था और लड़की आँगन में दीवाल के पास मिट्टी की छोटी-सी ओटली पर बैठी थी। आँगन उन दोनों के बीच था। लड़के ने गौर किया कि इतना वक्त गुजर जाने के बावजूद यह आँगन वैसा ही था। आँगन ही नहीं, कच्ची मिट्टी से बने इस घर के भूगोल में भी कोई खास बदलाव नहीं हुआ था। हाँ, इधर के दिनों में कुछ नई और चमकीली वस्तुएँ जरूर इसी पुराने और बेढब घर में बेतरतीबी से ठूँस दी गई है। लगता था कि इस घर ने अभी उन्हें अपने में मर्ज नहीं किया है या अपनेपन से स्वीकार नहीं किया है। फिर भी नए चलन की वे वस्तुएँ अपनी पूरी ढिठाई और बेहयाई से वहाँ मौजूद थी।

जबकि थोड़ी देर पहले ही उसने महसूस किया था कि इधर का गाँव काफी हद तक बदल गया था, अब वहाँ पहले जैसा बहुत कम ही बचा था। ज्यादातर नया-नवेला और सुविधा संपन्न। कच्ची मिट्टी के घर, लिपे-पुते फर्श, दीवारों के मांडने, खपरैलों और फूस की छतें, घंटियाँ टुनटुनाते मवेशियों के झुंड, काँच की अंटिया, लट्टू और गिल्ली-डंडा खेलती टुल्लरें, पनघट, चौपाल और वैसी जीवंत गलियाँ अब वहाँ नहीं थीं। न गाँव पानीदार था और न लोग ही पानीदार बचे थे। उनके चेहरों का नूर खो गया था, उमंग और हँसी-ठठ्ठा भाप बनकर कहीं उड़ गए थे।

लड़के और लड़की के बीच जो आँगन फैला था, उसमें तीस बरस का वक्फा तैर रहा था। आँगन बहुत छोटा था और तीस बरस का वक्फा बहुत बड़ा था, लिहाजा वह उफन-उफन जाता था। लड़की की उजाड़ और सूनी आँखों में कहीं कोई हरापन नहीं था। हरापन तो दूर उनमें गीलापन भी नहीं था। उन थकी-थकी आँखों में पानी का कोई कतरा तक नहीं था। जैसे वह किसी अकाल के इलाके या रेगिस्तान से चली आई हो।

एक पल को उसकी आँखें लड़के को देखकर विस्मय से फैल गई, क्षणभर को मानो कोई बिजली-सी कौंधी और दूसरे ही पल फिर स्थायी बैराग फिर उन आँखों में समा गया। इस एक पल को लड़के ने अपनी आँखों में पकड़ लिया। लड़की ने लड़के की आँखों में झाँका। इस झाँकने में तीक्ष्णता थी और सूक्ष्मता भी। इसमें तीस साल की सहेजी हुई दृष्टि थी। लड़के की आँखों में बागों की ताजगी थी। झरने-सी उत्फुल्लता थी और वासंती बयारों का झोंका था। अपने पूरे सुदर्शन डील-डौल तथा शहरी अभिजात्य के साथ लड़का वहाँ मौजूद था।

तभी अनायास कहीं से एक क्षीण-सी आवाज कौंधी - 'कब आए?'

लड़के के लिए यह सवाल अप्रत्याशित था। वह ऐसे किसी सवाल के जवाब के लिए कतई तैयार नहीं था। वह हड़बड़ा गया। फिर कुछ सँभलते हुए बोला - 'कल शाम...'

उसका वाक्य अधूरा ही रह गया। लड़का झेंप गया था। लड़की के सपाट चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान तैर गई। उसने अपनी मुस्कुराहट को होंठों के कोनों में दबाते हुए जाना कि लंबा वक्फा भी कुछ आदतें बदल नहीं पाता।

लड़की उस वक्फे के पार खड़ी थी। वह बहुत पीछे के वक्त में दाखिल हो चुकी थी, जहाँ लड़का उसके पीछे-पीछे जंगल में मीठी खिरनी के लालच में चला जा रहा था। उसे इस तरह जंगल में अकेले आने का अनुभव नहीं था। उसने जंगल के बारे में जो कुछ सुन रखा था, उससे उसे भीतर ही भीतर डर लग रहा था, लेकिन वह उसे लड़की के सामने प्रकट करना नहीं चाहता था। एक बार को उसकी इच्छा हुई कि वह पीछे से भाग निकले पर इतनी दूर आ गए थे कि अकेले लौटने में भटकने की आशंका थी। तभी न जाने कैसे लड़की ने जान लिया कि वह डर रहा है। लड़की ने लड़के का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा - 'डरो मत, मैं यहाँ अक्सर आती हूँ, बस उस पहाड़ी के नीचे खिरनी के बड़े-बड़े पेड़ हैं। उनसे खूब पीली-पीली गलतान खिरनियाँ टपकती हैं। मैं तो पेड़ पर चढ़ जाती हूँ।'

लड़की के हाथ पकड़ लेने लड़के का डर कुछ कम हो गया था। उसने पूछा -"गलतान...? यह क्या होता है।" लड़की का हँस-हँस कर बुरा हाल था -" बुद्धू, तुम्हें तो कुछ भी नहीं मालूम। गलतान मतलब खूब पका हुआ। डाल पर पके हुए खूब रसीले फलों को गलतान कहते हैं न। अब याद रखना।"

लड़की फिर हँसी - " मैं भी तुमसे याद रखने को कह रही हूँ, तुम्हारे साथ रहते-रहते मैं भी कितनी बुद्धू हो गई हूँ। पता है कि तुम कभी कुछ याद नहीं रख सकते फिर भी तुमसे कह रही हूँ।"

लड़के को उसकी यही बात बुरी लगती है। हर बात में उसका मजाक उड़ाया करती है। लड़का चिढ़ गया।

" हाँ-हाँ, जानता हूँ तुम्हें भी, इतना ही याद रख लेती हो तो फिर स्कूल में हमेशा फिसड्डी क्यों रहती हो? वहाँ तो तेरह का पहाड़ा याद रखने में जान निकल जाती है।" लड़का गुस्से में पिनपिना रहा था।

लड़की ने अजीब-सा मुँह बिचकाया और हँसते हुए कहा - 'किताब में खिरनी का पेड़ और यह जंगल नहीं है न। ये होता तो तुम सब फेल हो जाते, मैं अव्वल आती... समझे।'

इतने में सामने खिरनी के पेड़ आ गए। पेड़ के नीचे की जमीन खिरनियों से पीली पड़ चुकी थी। खिरनियाँ बहुत मीठी थीं, लड़के का मुँह मिठास से भर गया। लड़की पकी हुई खिरनियों को बीन कर अपने फ्राक के घेर की खोली में इकट्ठा कर रही थी। लड़का भी पटापट अपने हाफपेंट की जेबें भर रहा था।

लड़के को लगा कि कुछ लड़कियाँ खिरनी के पेड़ की तरह होती हैं। दुनिया के कड़वेपन को वे मिठास में बदल देती हैं।

लड़की की तंद्रा टूटी तो ऐन सामने लड़के का सवाल था - 'तुम कैसी हो?'

लड़की को यह सवाल अजीब-सा लगा। यह भी कोई पूछने की बात है भला। क्या किसी को देखकर ही नहीं मालूम होता कि वह कैसा है। फिर उसे यह पूछने की जरूरत क्यों पड़ी। लड़की ने आँखों में हल्की-सी चमक भरते हुए कहा - 'अच्छी हूँ...'

लड़के को लगा कि लड़की ने यह सफेद झूठ बोला है। वह अच्छी कैसे हो सकती है। उसे तो कोई अंधा भी देखकर कह सकता है कि वह ठीक नहीं है। कहाँ वह तीस साल पहले की उद्दंड, चुलबुली और बातूनी लड़की और कहाँ यह आज की घुन्नी, उदास, मेहँदी लगे बालों की उलझी लटों से घिरे रूखे और सपाट चेहरे पर सूनी आँखों वाली, मामूली साड़ी ओढ़े अपनी मरियल देह को ढोती हुई अधेड़-सी दिखती औरत।

लड़की को भी लगा कि उसका झूठ पकड़ लिया गया है, पर इसका जवाब भी तो यही हो सकता था न। लड़के को यह सवाल पूछना ही नहीं चाहिए था।

लड़की फिर लौट रही थी पीछे की ओर। बहुत पीछे छूट चुके समय में। वे दोनों देवी मंदिर की सीढ़ियों से छलाँग लगाते हुए नदी में कूद रहे थे। लड़की गंठा लगाकर नीचे तल तक जाती और वहाँ से मुट्ठी में कोई चिकना पत्थर या रेत लिए बाहर आती। लड़का किनारे पर ही तैरता रहता, उसे नदी की धार में जाने से डर लगता। लड़की बिजली की गति से इस पार से उस पार तक दौड़ी जाती। वह पानी की सतह पर चित लेटकर उल्टी तैरती तो कभी ऐसी डूबकी लगाती कि देर तक वह पानी में भीतर ही डूबी रहती और अक्सर अपनी जगह से दूर जाकर निकलती। चकित लड़का उसका दुस्साहस देखता रहता।

मछलियाँ लड़की की दोस्त हुआ करती थी। वह हर मछली को पहचानती थी और उनकी खूब सारी बातें उसके पास हुआ करती थी।

नदी में नहाने के बाद वह झाड़ियों के पीछे अपने गीले कपड़ों को इतनी जोर से निचोड़ती कि पानी की आखरी बूँद तक निचुड़ जाए। फिर उन्हें धूप में सुखाती और उनके सूखने तक वहीं खरगोश की तरह दुबककर बैठी रहती। इधर लड़का भी रेत की ढेरियों पर अपने कपड़े सुखाता। कुछ गीले भी होते तो बदन पर सूख जाते। कपड़े सूखने पर ही वे घर या स्कूल लौट सकते थे। कभी घर में पता चलने पर उनकी पिटाई भी हो जाती लेकिन छुपते-छुपाते नहाने और नदी के ठंडे पानी में घंटों पड़े रहने का अपना मजा था।

रिमझिम बारिश की एक दोपहर देवी मंदिर के दालान से नीम की एक टहनी तोड़ते हुए उसने लड़के से पूछा था - 'तुम्हें नीम की पत्तियाँ कैसी लगती हैं?'

लड़के ने तपाक से कहा - 'यह भी कोई पूछने की बात है। नीम तो कड़वा ही होता है। पत्तियाँ कड़वी ही लगेंगी न।'

लड़की ने जीत की खुशी में दमकते हुए कहा - 'तभी तो मैं तुम्हें बुद्धू कहती हूँ। नीम की पत्तियाँ हमेशा कड़वी ही लगें। यह जरूरी नहीं। साँप काटे हुए को जब ये पत्तियाँ खिलाते हैं न तो उसे ये मीठी लगती है। शरीर में जहर हो तो कड़वा भी मीठा लगने लगता है, समझे।'

लड़के ने कहा - 'यह तो मेरे साथ चीटिंग है। बात साँप के काटे की थी ही नहीं...'

'आगे तो सुनो, मेरी दीदी कहती है जो कोई किसी से प्रेम करता है तो उसे भी नीम की पत्तियाँ मीठी लगने लगती है। तुम खाकर देखो।' - लड़की ने कहा।

लड़के ने बुरा-सा मुँह बनाते हुए एक पत्ती जीभ पर रखी ही थी कि उसके मुँह में कडवाहट भर गई, उसने तुरंत पत्ती थूक डाली।

लड़की ने लड़के की आँखों में देखा और दो-तीन पत्तियाँ चबाने लगी। लड़की पान के पत्ते की तरह उसे बाखुशी चबाती रही।

लड़की ने कहा - 'यह तो मीठी हैं।'

लड़की को लगा कि लड़का उससे पूछेगा कि क्या तुम्हें भी प्रेम है? किस से?

लेकिन लड़के ने कुछ नहीं पूछा। वह बार-बार अपना गला खँखार रहा था। जैसे कड़वाहट उसके भीतर तक चली गई हो। न जाने क्यों लेकिन उसे लगा कि लड़के के मुँह में नीम की वह कड़वाहट अब तक घुली है।

लड़की उस कडवाहट के बारे में पूछना चाहती थी लेकिन उसने पूछा - 'तुम्हारे कितने बच्चे हैं?'

लड़के को लगा कि उसने जान-बूझकर शादी के बारे में नहीं पूछते हुए सीधे बच्चों के बारे में पूछा है। लड़के ने झिझकते हुए कहा - 'दो... एक बेटा एक बेटी... दोनों वहीं पढ़ते हैं।'

लड़की उसकी पत्नी के बारे में कुछ पूछना चाहती थी लेकिन क्या पूछे, यह सोचती रही फिर 'अच्छा' कहकर कुछ भी पूछने का विचार निरस्त कर दिया।

तब स्कूल में बच्चे कपड़े के झोले में अपना बस्ता लाते थे। लड़के के झोले पर उसकी माँ ने कढ़ाई के रेशमी धागों से बहुत सुंदर हिरण बनाया था। भूरे धागों से उसका शरीर, काले धागों से उसके सींग और पैर की टापें। हिरण की आँखों में दो मोती जड़े थे। हिरण इतना सजीव था कि उसकी तरफ देखते तो लगता कि वह अभी कुलाँचे मारते दौड़ पड़ेगा। उसकी आँखें झमझम हुआ करती। लड़की को वह हिरण बहुत पसंद था। लड़की उसके पेट पर हाथ घुमाती तो लगता असली हिरण का ही स्पर्श है। हिरण उसकी तरफ प्यार से देखने लगता। उसे भी हिरण बहुत भाने लगा था।

उसे हमेशा डर बना रहता कि कहीं यह हिरण किसी रात जंगल की तरफ लौट तो नहीं जाएगा। उसकी आँखों में खूब तेज दौड़ने का सपना वह देख चुकी थी। जमाने से उसकी होड़ थी। उसे आगे बढ़ने का जूनून था, वह हर दौड़ जीत लेना चाहता था। हर बाजी उसके हक़ में करना चाहता था। दौड़ के लिए वह सब कुछ छोड़ सकता था। लड़की को अब यह हमेशा लगता कि कहीं वह उसे छोड़कर तो नहीं चला जाएगा।

एक रात वह हिरण बस्ते के झोले से निकल गया और सजीव होकर लड़के की आत्मा में उतर गया। तब से अब तक लड़का उसी की तरह चौकड़ियाँ भरता रहता है। उसने लड़की को छोड़ा, घर छोड़ा, अपनी मिट्टी छोड़ी, गाँव छोड़ा, नाते-रिश्ते छोड़े और सुनने में तो यहाँ तक आता है कि उसने अपनी आत्मा तक छोड़ दी है।

तभी गुलाबी फ्राक पहनी हुई एक लड़की दौड़कर हाँफती हुई उसके पास आई और उसके गाल सहलाते हुए बोली - 'माँ देखो, मैं जंगल से कितनी गलतान खिरनियाँ लाई हूँ, तुम खाओगी। तुम्हें बहुत पसंद है न... खाओगी न माँ।'

लड़के ने कहा - 'तुम्हारी बेटी बड़ी क्यूट है।' आगे जोड़ना चाहता था 'तुम्हारी तरह' लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी वह हड़बड़ा गया।

लड़की प्रशंसा भाव से कभी बेटी की तरफ तो कभी लड़के की तरफ देखती रही।

उसी वक्त लड़के का मोबाइल बज उठा। उसने लड़की की ओर देखा, बायाँ हाथ हिलाकर विदा ली और दाएँ हाथ से मोबाइल को कान पर सटाए तेज कदमों से गली की ओर बढ़ गया। लड़की उसे गली में गुम होते हुए देखती रही।

© Manish Vaidya

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

बहुरि अकेला : मालती जोशी

◆ बहुरि अकेला
◆ मालती जोशी

स्टाफ़रूम में गरमागरम बहस चल रही थी। मुझे देखकर क्षणभर को सन्नाटा खिंच गया। मुझे लगा कि कहीं बहस का मुद्दा मैं ही तो नहीं हूँ। तभी मिसेज झा ने कहा, "लो ये आ गई मिस स्मार्टी। इन्हें भेज दो। बहुत काबिल आयटम है। कैसी भी सिच्यूएशन हो ब्रेवली हैंडल करती हैं।"

मिसेज सक्सेना मुँह बनाकर बोली, "वे दिन गए मिसेज झा। अब तो ये मिस प्रिविलेज्ड हैं। इन्हें कोई हाथ भी नहीं लगा सकता।"
"क्या हुआ भई! सुबह-सुबह मुझ पर इतनी कृपादृष्टि क्यों हो रही है?" मैंने आखिर पूछ ही लिया।
"अरे हम गरीब क्या कृपादृष्टि करेंगे। कृपादृष्टि तो आप पर मैम की है। इसीलिए तो आपको कोई असाइनमेंट नहीं दिया जा सकता।"
"खासकर संडेज को।" मिसेज सक्सेना कुटिलता से आँखें नचाकर बोलीं।
"कुछ पता भी तो चले कि माजरा क्या है।" मैंने कुर्सी खींचते हुए कहा। उत्तर में सब ने एक साथ बोलना शुरू किया। बड़ी देर बाद मेरी समझ में जो आया उसका सार यह था कि शुक्रवार को एम.ए. फ़ाइनल की लड़कियाँ अजंता-एलोरा जा रही हैं। पर इंचार्ज मिसेज गुप्ता के श्वसुर जो आज अचानक कूच कर गए। अब सवाल यह है कि उनके स्थान पर किसे भेजा जाए। सबकी अपनी परेशानियाँ थीं। मिसेज सक्सेना की बिटिया वायरल में पड़ी थी।

रविवार को किरण के देवर की सगाई थी। मिसेज कृपाल की सास पैर में प्लास्टर बँधवाकर पड़ी थीं। खंडेलवाल के पूरे दिन चल रहे थे। दासगुप्ता के दोनों बच्चों के सोमवार से टर्मिनल्स शुरू हो रहे थे और बिसारिया पहले से छुट्टी पर थीं।

स्टाफ में दो तीन अति बुजुर्ग सदस्य थीं जिन्हें इस मिशन पर भेजना बेकार था। एकाएक मुझे याद आया- "विभा तो जा रही है न! या उसके यहाँ भी कोई प्रॉब्लम है?"
"विभा तो जा रही है पर वह तो खुद बच्ची है। लड़कियों को क्या सँभालेगी? कोई ज़िम्मेदार व्यक्ति भी साथ होना चाहिए।"
"और तुम्हें कोई हाथ नहीं लगा सकता। मैडम की चहेती जो हो। उनकी सख़्त हिदायत है कि अंजु शर्मा को छुट्टी के दिन कोई काम न सौंपा जाए।"
"देर से शादी करने का यही तो फ़ायदा है। सबकी सिम्पैथी मिल जाती है।"

मैं चकित-सी देखती रह गई। ये सबकी सब मेरी 'कुलीग्स' थीं, सालों से हम साथ काम कर रहे थे। हमेशा कैसी शहद घुली बातें करती हैं। आज पता चला कि सबके मन में कितना ज़हर भरा हुआ है। उन सबके पास व्यस्तताओं की एक लंबी लिस्ट थी। एक मैं ही फालतू नज़र आ रही थी पर उनके शब्दों में 'प्रिविलेज्ड' थी। इसलिए सबकी ज़बान पर जैसे काँटे उग आए थे।
भला हो मिसेज देशपांडे का। मेरा पक्ष लेते हुए बोलीं, "अभी तक तो यही बेचारी सारी बेगार ढो रही थी। अब इसके साथ मैडम थोड़ी 'सिम्पैथेटिक' हो गई है तो तुम लोगों को जलन हो रही है। अरे यह तो सोचो कि इतनी देर से उसने शादी की है। पति भी साथ नहीं रहते। एक छुट्टी के दिन ही मेल-मुलाक़ात हो पाती है, वह भी तुम लोगों से देखी नहीं जाती।"

उनकी बुजुर्गियत का ख़याल करके सब चुप हो गई। पर सबके चेहरे पर यह भाव था कि इसने देर से शादी की है तो उसका ख़मियाज़ा हम क्यों भुगतें। मिसेज सक्सेना से तो आखिर रहा नहीं गया। बोलीं, "आँटी। अब सालभर तो हो गया। इतना तो कोई नई नवेली बहू को भी नहीं सहेजता।"
मेरा तो जैसे खून खौल गया, "आप लोग यही चाहती हैं न कि इस बार मैं लड़कियों के साथ जाऊँ। तो चली जाऊँगी। उसके लिए इतने तानों-उलाहनों की क्या ज़रूरत है?"
"और मिस्टर हबी? उनका क्या होगा?"
"उसकी चिंता आपको क्यों हो रही है? दैट इज माय प्रॉब्लम!"

उसी तैश में मैं मैडम के कमरे में चली गई और कह दिया कि मिसेज गुप्ता के न आने से कोई परेशानी हो रही हो तो मैं तैयार हूँ। वे कुछ देर तक मुझे देखती रहीं। फिर बोली, "इट इज व्हेरी स्पोर्टिंग ऑफ यू। दरअसल मैं तुम्हें बुलाने को सोच ही रही थी। अकेली विभा पर तो भरोसा नहीं किया जा सकता ना।"
"तो आप इतना संकोच क्यों करती है मैम। यू आर द बॉस। आप जिसे कहेंगी उसे जाना ही पड़ेगा। आप नहीं जानतीं, आपके इस सौजन्य का लोग कितना ग़लत अर्थ निकालते हैं।"
"आय डोंट केयर। मैं तो सिर्फ़ शर्मा जी के बारे में सोच रही थी।"

मैं चार-पाँच बार उन्हें बतला चुकी हूँ कि वे मि. कश्यप हैं, शर्मा नहीं। पर उन्हें याद ही नहीं रहता। अब तो मैंने टोकना भी छोड़ दिया है। इसलिए उनके सुर में सुर मिलाकर कहा, "आप शर्मा जी की चिंता न करें। मैं उन्हें फ़ोन कर दूँगी। वे भी सरकारी नौकर हैं, ड्यूटी का मतलब समझते हैं।"
"ओ.के. एंड गुड लक टू यू।"

घर लौटते समय बहुत हलका महसूस कर रही थी। अच्छा लगा कि मेरे प्रस्ताव के बाद मैडम के चेहरे पर राहत के भाव उभरे थे। पर ईमानदारी की बात यह थी कि उनसे भी ज़्यादा राहत का अहसास मुझे हो रहा था। पिछले दो हफ़्ते श्रीमान जी नहीं आए थे। आख़िरी बार जिस मूड में यहाँ से गए थे, लगता था इस बार भी नहीं आएँगे। दो रविवार लगातार मैं स्नेही पड़ोसियों की प्यार भरी पूछताछ से तंग आ गई थी। इस हफ़्ते फिर वही सब दोहराना संकट लग रहा था। शायद इसलिए आगे बढ़कर मैंने यह ज़िम्मेदारी ले ली थी। मुझे एक बहाना चाहिए था, सो मिल गया।

कभी-कभी लगता है मैंने नाहक शादी की। ज़िंदगी अच्छी भली गुज़र रही थी। न कोई तनाव था न पछतावा। बस एक शादी की चिंता थी जो मुझसे ज़्यादा मेरे भाइयों को खाए जा रही थी। अपनी भरी-पूरी गृहस्थियों के बीच बेचारे एक अपराध बोध के साथ जी रहे थे। बड़े भैया की पिंकी के बी ए़ क़र लेने के बाद तो सबके सब जैसे एकदम व्यग्र हो उठे। कम से कम उसकी शादी से पहले मेरी हो जाना लाज़मी था। सो श्रीमान कश्यप को घेरा गया। दस और बारह साल के दो बच्चों के बाप से शादी करना मेरे लिए कतई रोमाँचक नहीं था पर भाई आश्वस्त थे कि मुझे अपना एक घर मिल गया है।

पर उस घर से जुड़ कहाँ पाई, किसी ने मौका ही नही दिया। शादी के बाद चार पाँच दिन रही थी। बाद में दीपावली पर लक्ष्मीपूजन के लिए गई थी बस। छुटि्टयों में वे मुझे एकाध महीना घुमाने ले गए थे। एक महीना मुझे भाइयों के पास रहने के लिए कह दिया था। भाइयों के पास तो हर छुट्टी में जाती थी। पर इस बार का अनुभव नया था। पीहर आई बहन-बेटी का स्वागत सत्कार। लाड दुलार पहली बार ही पाया था। शादी के बाद भी मैं तो उसी घर मैं बनी रही। पर हाँ मिस्टर कश्यप को ज़रूर एक अतिरिक्त घर मिल गया था। उनकी सारी छुटि्टयाँ यहीं गुज़रतीं। केंद्र सरकार की नौकरी थी। शनिवार, रविवार छुट्टी होती। वे भोपाल से शुक्रवार को इंटरसिटी से आते और सोमवार की सुबह उसी ट्रेन से लौट जाते। साल भर से मेरा दांपत्य जीवन इसी साप्ताहिक तऱ्ज पर चल रहा था।

उस रविवार की रात को भी वे घड़ी में अलार्म भर रहे थे कि मैंने कहा, "सुबह चले जाएँगे?"
"जाना तो पड़ेगा ही। कल सोमवार है, भूल गई क्या?"
"सोमवार को कैसे भूल सकती हूँ, मुझे भी तो कॉलेज जाना है। पर मुझे और भी कुछ याद आ रहा है।"
"क्या?"
"कल शाम मैंने कुछ लोगों को खाने पर बुला लिया था।"
"कल क्यों? आज ही बुला लेतीं न।"
"यों ही बुलाना अच्छा नहीं लगता। कोई मौका भी तो हो।"
"तो कल क्या है?"
"आपकी याददाश्त तो इतनी अच्छी है। आपको यहां बैठकर भी अपने बच्चों के ही नहीं, भांजे-भतीजों के, मामा मौसियों के जन्मदिन याद आ जाते हैं।"
"कल तुम्हारा जन्मदिन है?"
"नहीं, मेरा जन्मदिन तो कब से आकर चला गया। जिन्हें याद था उन्होंने मना भी लिया। आपके लिए मुझे सौ-सौ बहाने गढ़ने पड़े। एक साड़ी अपनी ओर से ख़रीदकर आपके उपहार के तौर पर पेश करनी पड़ी। मेरा जन्मदिन आपको याद नहीं रहा, कोई बात नहीं। पर कल की तारीख तो आपको याद रखनी चाहिए या कि उसका भी आपके निकट कोई महत्व नहीं है- न चाहते हुए भी मेरी आवाज़ थोड़ी तल्ख हो गई थी।"
उन्होंने कैलेंडर की ओर नज़र डाली, "ओह! कल ११ नवंबर है। मतलब अपनी शादी को एक साल पूरा हो गया।"
"धन्य भाग्य! आपको याद तो आया। पर आपने इस तरह मुँह क्यों लटका लिया? मैंने स्र्कने के लिए कहा ज़रूर है पर कोई समस्या हो तो रहने दीजिए। सेलिब्रेशन का मूड अगर है तो मैं साथ चली चलती हूँ नहीं तो उसकी भी कोई ज़रूरत नहीं है।"

"तुम चलना चाहो तो ज़रूर चलो," उन्होंने कहा, पर स्वर मैं कोई आग्रह नहीं था, "ऐसा है कि बच्चों की परीक्षाएँ चल रही हैं। मंगलवार को शौनक का गणित का पेपर है इसीलिए मेरा कल जाना ज़रूरी है।"
"सेलीब्रेशन से मेरा मतलब किसी पार्टी से नहीं था। हम सब मिलकर बाहर खाना खा सकते थे या एकाध पिक्चर देख सकते थे। बच्चों की परीक्षाएँ चल रही हैं तो कोई बात नहीं। हम लोग दिनभर साथ ही रह लेते। यह प्रस्ताव आपकी ओर से आता तो मैं उतने ही में खुश हो जाती। पर आपको तो याद ही नहीं था। आपको अम्माजी के ठाकुरजी तक की याद रहती है। पिछली रामनवमी और जन्माष्टमी पर श्रृंगार का सारा सामान यहीं से ले गए थे। बस आपको मेरा जन्मदिन या अपनी शादी की सालगिरह याद नहीं रही।"
"बार-बार बच्चों का, अम्मा का ताना क्यों दे रही हो? वे लोग मेरी ज़िम्मेदारी हैं।"
"और मैं क्या हूँ? सिर्फ़ ज़रूरत?"
"कैसी ज़रूरत?"
"यह भी बताना पड़ेगा?"

कुछ देर तक कमरे में भीषण स्तब्धता छाई रही। फिर मैंने ही कहा, "आप बच्चों के सामने एक आदर्श पिता बने रहना चाहते हैं। इसीलिए मुझे तरजीह नहीं देते, जानती हूँ। इसीलिए आज तक आपने मेरे स्थानांतरण के लिए प्रयत्न नहीं किया। आश्चर्य तो यह कि अम्माजी ने भी कभी इसके लिए ज़ोर नहीं दिया।"
"प्लीज़ लीव्ह माय मदर अलोन।"
"मैं कोई उन्हें गाली थोड़े ही दे रही हूँ, एक बात कह रही हूँ। कोई भावुक महिला होती तो कहती, बहू, तुम आकर जल्दी से अपना घर-बार सम्हालो और मुझे छुट्टी दो। पर वे बड़ी प्रैक्टिकल हैं। उन्हें यही व्यवस्था रास आ गई है। घर में उनका एकछत्र शासन भी बना रहता है और बेटे को कोई परेशानी भी नहीं होती। वह आदर्श बेटा बना रहता है। आदर्श पिता बना रहता है और उसकी साप्ताहिक आनंद-यात्रा भी निर्विघ्न चलती रहती है।"
"आनंद यात्रा? वाह! तुम क्या सोचती हो तुम कोई हुस्नपरी हो जिसके लिए मैं दीवाना हो चला आता हूँ।"

ठक्क! लगा जैसे किसी ने कलेजे पर एक घूँसा जड़ दिया हो। बड़ी मुश्किल से मैं उस पीड़ा को जज़्ब कर पाई। फिर अत्यंत कसैले स्वर में कहा, "मैं हुस्नपरी होती तो चौंतीस साल तक अनब्याही न बैठी रहती। और न ही दो बच्चों के बाप से शादी करती।"

यह बात कहने के साथ ही मैं दीवार की ओर मुँह करके लेट गई थी इस कारण उनका चेहरा नहीं देख पाई। पर वह ज़रूर स्याह पड़ गया होगा। वे उस रात कब कहां सोए मैं नहीं जानती। सुबह अलार्म बजा था पर मैं नहीं उठी। उन्होंने शायद अपने से ही चाय बनाई थी। पर मैं दम साधे पड़ी रही। जाते समय उन्होंने मुझे आवाज़ दी भी हो तो पता नहीं।

सुबह उठी तो लगा जैसे एक भयानक स्वप्न देखकर जागी हूँ।
उसके बाद आज तीसरा शुक्रवार है, जनाब की कोई खबर नहीं। रूठकर गए हैं, सोचा होगा मना लेगी। पर हम मिट्टी के नहीं बने हैं। बल्कि गुस्सा तो हमें आना चाहिए था। अपमान तो हमारा हुआ है।
सच तो यह है कि उनके न आने से मुझे राहत ही मिली थी। क्यों कि मुझे लग रहा था कि अब मैं उस व्यक्ति का स्पर्श या सामीप्य सहन नहीं कर पाऊँगी।

सुबह बैग भर रही थी कि फ़ोन खड़का, "मैं बोल रहा हूँ।"
मैं? कितना ज़बरदस्त अहम है। जैसे आवाज़ सुनते ही पहचान लिए जाएँगे।
"अच्छा आप हैं? कहिए।"
"हम लोग रात को नौ बजे तक पहुँच रहे हैं। फ़ोन इसलिए किया कि खाना बनाकर रख सको।"
पिछले दो शुक्रवार से मेरा खाना बरबाद हो रहा था। पर मैंने उसका ज़िक्र न करते हुए कहा, "हम लोग मतलब?"
"बच्चे भी साथ आ रहे हैं। इसीलिए बस से आ रहा हूँ। ट्रेन बहुत लेट पहुँचती है।"

मैं पसोपेश में पड़ गई। मेरी चुप्पी से वे भी थोड़े विचलित हो गए, "क्या हुआ? कोई समस्या? कहो तो बच्चों को न लाऊं। बड़ी मुश्किल से उन्हें राज़ी किया था।"
"बच्चे आ रहे हैं तो दे आर मोस्ट वेलकम। लेकिन सचमुच एक समस्या आ गई हैं। मैं आज शाम को अजंता-एलोरा जा रही हूँ।"
"प्रोग्राम बदल नहीं सकतीं?"
"नहीं। क्यों कि ये प्लेजर ट्रिप नहीं है। कॉलेज की लड़कियों के साथ इंचार्ज बनकर जा रही हूँ।"
"पर तुम्हीं क्यों?"
"मैं क्यों नहीं? पिछले सालभर से तो उन्होंने मुझसे कोई काम नहीं लिया। मेरे सारे संडेज़ फ्री रक्खे। कॉलेज में इतनी परीक्षाएँ होती हैं पर कभी इनविजीलेशन की ड्यूटी भी नहीं दी। पर किसी की सदाशयता का ज़्यादा फ़ायदा उठाना अच्छा थोड़े ही लगता है। आख़िर ये मेरी नौकरी है।"

इस बार उधर चुप्पी छाई रही।
"फिर दो हफ़्ते से आप आए नहीं थे तो मैंने सोचा इस बार भी नहीं आएँगे।"
"मैं दो हफ़्तों से नहीं आया तो तुमने कोई खोज ख़बर भी तो नहीं ली। एक बार फ़ोन ही कर लेतीं।"
"कारण मुझे मालूम था इसीलिए फ़ोन नहीं किया।"
"मैं बीमार भी तो हो सकता था।"
"बीमार होते तो फ़ोन करते। आप तो नाराज़ थे। मैं तो आज भी आपकी आशा नहीं कर रही थी। शायद अम्माजी ने. . .।"
"हर बार अम्मा को बीच में क्यों ले आती हो?"
"बहुत श्रद्धायुक्त अंत:करण से कह रही हूँ कि शायद अम्माजी ने ही समझाया होगा कि कमाऊ बीबी से बनाकर चलना चाहिए।"

उधर से फ़ोन पटकने की आवाज़ आई। मैंने भी परवाह नहीं की। अगर आप कड़वी बात कहते हो तो सुनने का भी हौसला रखो। जब सुन नहीं सकते तो कहते क्यों हो?
कॉलेज से लौटते हुए अचानक ख़याल आया कि सफ़र के लिए कुछ ज़रूरी चीज़ें ले लूँ। घर की ओर मुड़ने की बजाए मैं बाज़ार की ओर मुड़ गई। वह शायद मेरी होनी ही थी जिसने मुझे इस बात के लिए प्रेरित किया था। क्यों कि उस ओर मुड़ते ही एक स्कूल बस मेरे सामने आ गई। उसे बचाने के लिए मैं सड़क के इतने किनारे चली गई कि गिर ही पड़ी। क्षणभर को आँखों के सामने अँधेरा छा गया। पलभर में वहाँ भीड़ जुड़ आई थी।

चार सहृदय लोगों ने मुझे स्कूटर के नीचे से निकाला और पास के अस्पताल में पहुँचाया। मैंने तुरंत एक फ़ोन पड़ोस में किया और एक कॉलेज में। नीतू और उसकी मम्मी फ़ौरन दौड़ी चली आई और पूरे समय मेरे साथ बनी रहीं। कॉलेज में फ़ोन करने का मेरा उद्देश्य सिर्फ़ यह था कि लोग मेरे भरोसे न रहें। पर ख़बर मिलते ही प्रिंसीपल मैडम भी दो तीन लोगों के साथ आ गई और जाते समय अपनी कार वहीं छोड़ गई। रात दस बजे जब घर लौटी तो मेरे बाएँ हाथ में प्लास्टर था बाएँ पैर की पिंडली में 6-7 टाँके थे और घुटने और कंधे पर खरौंचें थी। सौभाग्य से सिर पर कोई चोट नहीं थी पर वह बेतरह घूम रहा था।

घर आते ही पस्त होने से पहले मैंने बड़े भैया को फ़ोन लगाया। मेरे कुछ कहने से पहले वे ही बोल उठे, "अरे इतनी देर तुम कहाँ थी? मैं कब से फ़ोन लगा रहा हूँ।"
उनके स्वर में उल्लास फूट पड़ रहा था। मैंने अपनी बात कुछ देर को मुल्तवी कर के कहा, "थोड़ा बाज़ार तक गई थी। पर आप मुझे क्यों ढूँढ़ रहे थे?"
"अरे वो बीकानेरवाले पिंकी को देखकर गए थे न! उनके यहाँ से हाँ आ गई है।"
"अरे वाह! बधाई।"
"लड़का तीन महीने के लिए जापान जा रहा है। इसलिए माँ के साथ एक बार मिलने आ रहा है। मेरी इच्छा थी कि कल तुम दोनों भी आ जाते तो लड़के को देख लेते।"
"दरअसल क्या है भैया कि मैं कॉलेज की लड़कियों के साथ टूर पर जा रही थी तो इन्हें आने के लिए मना कर दिया था।"
"कब जा रही हो?"
"आज ही जाना था पर पता नहीं कैसे स्कूटर से गिर पड़ी। पट्टी वगैरह करवाकर अभी लौटी हूँ।"
"ज़्यादा चोट तो नहीं आई?"
"चोट तो ज़्यादा नहीं है पर आना ज़रा मुश्किल लग रहा है।"
"ख़ैर कोई बात नहीं। टेक केअर। इन लोगों से निपट लूँ फिर आता हूँ।"
नीतू मुझे देखती रह गई- "यह क्या? आपने ठीक से बताया क्यों नहीं?''
"वे बिटिया का रिश्ता तय कर रहे हैं इस समय मैं उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहती।"
"जीजाजी को तो फ़ोन कर दिया होता।"
"नहीं रे। यहाँ नहीं आना था इसलिए उन्होंने टूर प्रोग्राम बना लिया था। घर पर अम्माजी और बच्चे अकेले होंगे। इतनी रात को फ़ोन करूँगी तो परेशान हो जाएँगे।"
"जीजाजी के पास मोबाइल नहीं है?"
"यही तो सोच रही हूँ इस जन्मदिन पर उन्हें प्रेजेंट ही कर दूँगी। बहुत परेशानी होती है। अच्छा नीतू, आज की रात तुम मेरे पास रह जाओगी। कल से मैं वासंती को बोल दूँगी।"
"कैसी बात कर रही हो? आज तो मुझे रहना ही है। अपने घर पर ख़बर की भी होती तो सुबह से पहले कोई आता थोड़े ही।"

वह रात बड़ी मुश्किल से कटी।
उपचार के समय उन्होंने ज़रूर कोई निश्चेतक दवा दी होगी। उसका असर धीरे-धीरे कम हो रहा था और दर्द अपना अस्तित्व जताने लगा था। यों तो दर्द निवारक गोलियाँ भी दी गई थीं। पर उन्हें कारगर होने में थोड़ा समय लगता ही था। घर का कोई साथ में होता तो मैं उसे सारी रात सोने नहीं देती। पर पराई लड़की को परेशान कैसे करती सो सहनशीलता का नाटक करना ही पड़ा। दर्द के घूँट पीते हुए मैं बारबार उस एक व्यक्ति को कोस रही थी - मि. कश्यप! आपने सालभर में कोई और तोहफ़ा तो नहीं दिया। पर शायद बद्दुआएँ दिल खोलकर दी हैं। उसी को भुगत रही हूँ। नहीं तो दस साल से गाड़ी चला रही हूँ। कभी एक खरौंच भी नहीं आई।

बमुश्किल तमाम रात के तीसरे पहर थोड़ी-सी आँख लगी। पर नीतू ने सात बजे ही चाय के लिए जगा दिया। उसका कहना भी ठीक था। बोली, "आप हाथ मुँह धोकर तैयार हो जाइए। अड़ोस-पड़ोस में ख़बर लगते ही आने वालों का ताँता शुरू हो जाएगा। आप परेशान हो जाएँगी।"

फिर उसी ने मेरे मुँह हाथ धुलवाए, बाल ठीक किए। उसी की मदद से मैंने कपड़े बदले। फिर उसने मेरे हाथ में कॉर्डलेस थमा कर मुझे सोफे पर लाकर बिठा दिया। आसपास तकिए लगाकर ऐसी व्यवस्था कर दी कि मैं अधलेटी रह सकूँ। बोली कि हर किसी को बेडरूम तक लाना ठीक नहीं लगता।
उसका तर्क ठीक था और जैसा कि उसने कहा था। आठ बजे से आने वालों का सिलसिला जो शुरू हुआ- दस साढ़े दस तक चलता ही रहा। बेचारी नीतू नहाने धोने घर भी न जा सकी। ग्यारह बजे मैंने उसे ज़बरदस्ती घर भेजा। कहा कि दरवाज़े में चेन लगा दो। आने वाला अपने आप खोल लेगा।

नीतू गए मुश्किल से दस मिनट हुए होंगे कि दरवाज़ा अपने आप खुल गया। मैं तो चकित थी कि न दस्तक, न घंटी, ऐसे औचक कौन आ गया। पर जब आगंतुक को देखा तो देखती रह गई। कमर पर दोनों हाथ रखे, दरवाज़े में खड़े होकर श्रीमान मुझे घूर रहे थे। उस दृष्टि में रोष था, उपालंभ था, उपहास था और शायद तिरस्कार भी।
"आय न्यू इट। मुझे मालूम था, तुम्हें कहीं आना-जाना नहीं था। सिर्फ़ मुझे टालने के लिए बहाना बनाया गया था। आय वॉज डेड श्योर।" 

वे जिस तरह मुझे घूर रहे थे, मैं भी एकटक उन्हें देख रही थी। मेरी आँखों में उपालंभ की मात्रा शायद ज़्यादा गहरी थी। क्यों कि थोड़ी देर बाद उन्होंने अपनी नज़रें फेर लीं। उनकी नज़रें हटते ही मैंने कॉर्डलेस पर पड़ोस का नंबर मिलाया, "सॉरी नीतू डार्लिंग, तुम्हें फिर से कष्ट दे रही हूँ। पर क्या है कि तुम्हारे जीजाजी आ गए हैं। एक कप चाय बनाकर दे जाओगी तो अच्छा रहेगा।"
"मेरे लिए पड़ोसियों को कष्ट देने की कोई ज़रूरत नहीं है।" उन्होंने कसैले स्वर में कहा। अब वे दरवाज़ा छोड़कर सामने कुर्सी पर बैठ गए थे। "अगर घर में चाय बनाने में कोई प्रॉब्लम है तो मैं बाहर पी सकता हूँ। वैसे भी मैं यहाँ रुकने वाला नहीं हूँ। सिर्फ़ देखने चला आया था।"

मैं भी उन्हें चाय पिलाने के लिए बहुत व्यग्र नहीं थी। बस चाहती थी कि इस समय हम दोनों के बीच में कोई तीसरा आकर बैठ जाए। मुझे पता था कि जीजाजी का नाम सुनते ही नीतू दौड़ी चली आएगी।
और वही हुआ। पाँच मिनट में नीतू दो कप चाय लेकर हाज़िर हो गई।
"हाय जीजाजी।" नीतू ने चहककर स्वागत किया और हुलसकर पूछा, "आपको कैसे पता चला? दीदी तो फ़ोन ही नहीं कर रही थीं।"
"पता करने वाले पता कर ही लेते हैं।" इन्होंने कुटिल मुस्कान के साथ कहा। बेचारी नीतू! इनका मंतव्य समझ नहीं पाई। अपनी ही रौ में बोली, "मम्मी यही तो कह रही थीं कि दिल से दिल को राह होती है। फ़ोन करने की क्या ज़रूरत है।"
फिर इन्हें चाय पकड़ाते हुए मुझसे बोली, "दीदी! अब आप भी उठकर ज़रा-सी चाय पी लो। सुबह से बोल-बोलकर दिमाग़ चकरा गया होगा।"

वो मुझे सहारा देकर उठाने लगी और इनके चेहरे का रंग बदलने लगा। मेरी अधलेटी मुद्रा को वे अनादर का प्रदर्शन समझ रहे थे। अब उन्हें कुछ-कुछ समझ में आ रहा था। उठने की प्रक्रिया में जब मेरा शॉल कंधे से खिसक गया तो उनकी प्लास्टर पर नज़र पड़ी, "अरे! ये हाथ को क्या हो गया?"
"गनीमत है कि सिर्फ़ हाथ ही टूटा है। आप खुशकिस्मत है जीजाजी कि ये सही सलामत बच गई। वरना क्या से क्या हो जाता।"
"तुम्हें मैं सही सलामत नज़र आ रही हूँ?"
"अरे हाथ ही तो टूटा है। सब लोग कर रहे थे कि किस्मतवाली थी जो सड़क के किनारे गिरीं। अगर बीच में गिरती तो सोचो क्या होता?"
उस कल्पना मात्र से ही मुझे झुरझुरी हो आई। मैंने नीतू से कहा, "थोड़ी हेल्प कर दोगी तो भीतर जाकर थोड़ा लेट लूँगी।"
"हाँ, अब आप बिल्कुल आराम करो। कोई आएगा तो जीजाजी निपट लेंगे।"
बिस्तर पर लेटते हुए मैंने कहा, "बसंती को दो दिन की छुट्टी दे दी थी। अगर किसी के हाथ ख़बर भिजवा दोगी तो वे आ जाएगी। दो रोटी ही डाल जाएगी।"
"बसंती को मैं ख़बर कर दूँगी। पर आप रोटी की इतनी चिंता क्यों कर रही हैं? हम लोग क्या इतना भी नहीं कर सकते?"
"तुम्हीं लोग तो कर रहे हो।"
"पड़ोसी और होते किसलिए हैं?"
नीतू जब चली गई तो ये कमरे में आकर बोले, "इतना सब हो गया तो क्या मुझे फ़ोन नहीं कर सकती थी?"
मैंने एक क्षण उनकी ओर देखा और कहा, "फ़ोन कर भी देती तो क्या आप विश्वास कर लेते? या इसे भी एक बहाना समझते?"

वे चुप हो गए। फिर बड़ी देर तक एक मौन हम दोनों के बीच पसरा रहा। फिर कुछ देर बाद फ़ोन बजा। मेरा कॉर्डलेस बाहर ही छूट गया था इसलिए फ़ोन इन्हें ही उठाना पड़ा। शायद बड़े भैया का था, "मेरा हालचाल पूछ रहे थे। मैं जब तक उन्हें सावधान करती वे सब ब्यौरा दे चुके थे। फिर तो मेरी पेशी होनी ही थी।"
"ये क्या कर बैठीं तुम? और रात को मुझे बताया क्यों नहीं? मैं उसी समय चला आता।"
"मुझे मालूम था इसीलिए नहीं बताया। आप आ भी जाते तो सुबह फिर मेहमानों के लिए भागना पड़ता अब आपकी उम्र इतनी भागदौड़ करने की नहीं है। वैसे चिंता की कोई बात नहीं है। पड़ोसी बहुत अच्छे हैं, और अब तो ये भी आ गए हैं।"
"हाँ, अभी फ़ोन पर उनकी आवाज़ सुनकर थोड़ा संतोष तो हुआ। अच्छा तो हम लोग सुबह आते हैं। टेक केअर।"

भैया के फ़ोन के बाद फिर से सन्नाटा छा गया। ये पेपर पढ़ते रहे, मैं सोने की कोशिश करती रही। नीतू दोनों की थालियाँ लेकर आई तभी यह नीरवता भंग हुई।
नीतू बोली, "मम्मी तो कह रही थीं जमाई जी को यहीं बुला लो। ठीक से खा लेंगे। पर मैंने कह दिया कि दीदी अकेली बोर हो जाएँगी। वो अच्छी हो जाएँ फिर दोनों को एक साथ बुलाकर खूब ख़ातिरदारी कर लेना।"
"एक बात और। जाते हुए मैं बाहर से ताला डालकर जा रही हूँ। नहीं तो मोहल्ले भर की आँटी लोग तंग करने आ जाएँगी। रातभर की जागी हो, थोड़ा आराम कर लो।"
"खोलोगी कब?"
"चार बजे चाय लेकर आऊँगी न!"

और सचमुच वह हमें ताले में बंद करके चली गई। वह जब तक रहती है पटर-पटर करती रहती है। घर भरा-भरा लगता है। उसके जाते ही एक निचाट सूनेपन ने घेर लिया। उस असहज एकांत से निजात पाने के लिए मैंने कहा, "आप तो आज ही जाने वाले थे न! तो दिन में निकल जाते। रात में ठंड से परेशान हो जाएँगे।"
वे एक क्षण मुझे घूरते रहे। फिर बोले, "मुझे क्या इतना गया-गुज़रा समझ लिया है कि तुम्हें इस हाल में छोड़कर चला जाऊँगा।"

एक तरह से बात यहीं पर एक अच्छे बिंदु पर समाप्त हो जानी थी। पर मेरे मन में तो प्रतिशोध की आग धधक रही थी। वह हुस्नपरी वाला डायलॉग मेरे कलेजे में कील की तरह गड़ा हुआ था। उसी ने मुझे चुप नहीं बैठने दिया। मैंने बड़े नाटकीय अंदाज़ में कहा, "मेरी ऐसी हालत है तभी तो कह रही हूँ, रुककर क्या करेंगे।"
वे अवाक होकर मुझे देखते रह गए, "व्हॉट डू यू मीन?"
"कुछ नहीं। एक पुरानी बात याद आ गई। एक बार आए थे और मैं -(संकोच के मारे मैं क्षणभर को चुप रह गई) उस दिन आप कितना नाराज़ हुए थे। कहा था कि फ़ोन तो कर देतीं। बेकार में दो ढाई सौ रुपए को चूना लग गया।"
उनका चेहरा फक पड़ गया। डूबती सी आवाज़ में बोले, "उस बात को अब तक गाँठ बाँध बैठी हो?"
"यही क्यों? और भी बहुत-सी हैं। सारी गाँठे खोलने बैठूँगी तो सुबह से शाम हो जाएगी।"
"तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे मैं तुम पर बहुत अत्याचार करता रहा हूँ।"
"प्रचलित मायनों में जिसे अत्याचार कहते हैं वह तो आप कर नहीं सकते थे क्यों कि मैं उतनी बेचारी नहीं हूँ। आपका तरीका बड़ा सोफिस्टिकेटेड है और एप्रोच बहुत ही प्रेक्टिकल। बहुत आसानी से आप सामने वाले की भावनाओं को अनदेखा कर देते हैं।"
"मसलन?"
"मसलन - अब कहाँ से शुरू करूँ। चलिए शुरू से करते हैं। याद है जब शादी के बाद पहली बार हम लोग इस घर में आए थे। मेरी सहेलियों ने घर को बहुत कलात्मक ढंग से सजाया था। हमारा स्वागत भी बहुत शानदार हुआ था। हार-फूल, संगीत, उपहार, मिठाई - और लोग इतने कि पैर रखने को जगह नहीं थी। उसके बाद जब हम अकेले हुए तो आपका प्रश्न था- फ्लैट तो बहुत सुंदर है, कितने का पड़ा?"
"क्या मुझे यह पूछने का हक नहीं था?"
"ज़रूर था पर आपकी टाइमिंग गल़त हो गई। उस निभृत एकांत की अवहेलना कर आप इंदौर और भोपाल की कीमतों की तुलना करते रहे। बातों-बातों में आपने यह भी पूछ लिया कि मैंने लोन बैंक से उठाया था या जी प़ी ए़फ स़े लिया था? और यह भी कि किश्तें पट गई हैं या कि अभी बाकी है!"
"मेरे ख़याल से मुझे यह भी पूछने का हक नहीं था।"
"हक सौ फीसदी है। पर यह विषय उस दिन के लिए नहीं था। मुझे मालूम है मेरी शादी में मेरी नौकरी, मेरा वेतन, मेरा फ्लैट प्लस पाइंटस थे। पर वे ही अहम मुद्दा होकर रह जाएँगे और मैं गौण हो जाऊँगी यह नहीं सोचा था। अगली बार आप जब आए तो आपने नॉमिनेशन के बारे में पूछा था। मैंने दोनों भाइयों के बेटों को फ्लैट और जीपीएफ के लिए नॉमिनेट किया था। आपने कहा कि अगर नामाँकन बदलना है तो फुर्ती करनी होगी। नहीं तो बाद में बहुत परेशानी होती है।"
"इसमें गल़त क्या था। सरकारी दफ़्तर में काम करता हूँ। रोज़ देखता हूँ कि लोग बाद में किस तरह परेशान होते हैं।"
"मैं भी जानती हूँ। पर महीने भर पहले ब्याही औरत भविष्य के सपने देखती है। उसे वसीयत के बारे में सोचना ज़रा अच्छा नहीं लगता। बदली हुई परिस्थिति में शायद मैं खुद इस विषय में पहल करती। पर आपकी उतावली देखकर वितृष्णा हो आई।"
"इसके बाद तो शोषण का एक अनवरत सिलसिला शुरू हो गया। मेरे टेलीफ़ोन का बिल दुगुना तिगुना आने लगा। सब लोग छेड़ते कि रात-रात भर मियाँ से बात करती होगी। उन्हें क्या पता कि मियाँ ने घर पर बात करने के लिए एकदम मना किया हुआ है। और दफ़्तर में बात करना मुझे अच्छा नहीं लगता। उन्हें कैसे बताती कि यहाँ आकर श्रीमान को सारे दोस्तों के, भाई भतीजों के जन्मदिन याद आ जाते हैं। सारे रिश्तेदारों की मिजाज़पुरसी और मातमपुरसी यहाँ से होती है।"
"यह तो शायद तुम्हें भी पता होगा कि लांग डिस्टेंस कॉल्स संडेज़ को सस्ती पड़ती है। और अक्सर संडेज़ को मैं यही होता हूँ।"
"हाँ, मुझे पता है और मुझे यह भी पता है कि इंदौर का कपड़ा मार्केट बहुत अच्छा है। इसलिए चादरें और परदे यहीं से ख़रीदना चाहिए। यहाँ के रेडीमेड गारमेंट्स की मंडी भी बहुत मशहूर है इसलिए बच्चों के जन्मदिन के कपड़े यहीं से लेना चाहिए। यहाँ जब तब गरम कपड़ों की 'सेल' लगती है इसलिए अम्माजी के लिए शाल और स्वेटर यहीं से जाएगा। इसके अलावा और भी फर्माइशी चीजे हैं। जैसे फरियाली सामान, नमकीन, राहुल के लिए कैमरा, एटलस, रीना के लिए बार्बी का सेट, कलर बॉक्स वगैरह- और मुझे यह भी मालूम है कि आपने घर पर यह कभी नहीं जताया होगा कि ये फ़र्माइश कौन पूरी कर रहा है।"
"देखो ज़्यादा एहसान जताने की ज़रूरत नहीं है। हिसाब लगाकर रखना, अगली बार आऊँगा तो सब चुकता कर जाऊँगा।"
"हिसाब करने की ज़रूरत नहीं, क्यों कि यह सब मैंने अपने घर के लिए, अपने बच्चों के लिए किया था। जिस तरह शादी के बाद यह घर आपका हो गया, मैंने सोचा कि वह घर भी अब मेरा ही है। इसलिए एहसान की कोई बात नहीं है। बात अधिकार की है। राहुल को जन्मदिन पर डांस करना था, आप यहाँ का म्यूज़िक सिस्टम ले गए। बच्चों को गर्मियों में पिक्चर्स देखनी थीं, आप यहाँ से वीसीडी प्लेयर ले गए, बार-बार बिजली गुल होने से बच्चों की पढ़ाई हर्ज़ होती है इसलिए मेरा इमर्जेंसी लैंप भी भोपाल पहुँच गया- मैं शिकायत नहीं कर रही हूँ। आपको अधिकार था और आपने उसका उपयोग किया। पर यह तो वन-वे ट्रैफिक हो गया। मुझे तो कोई अधिकार मिला ही नहीं। मेरा तो सिर्फ़ एक्सप्लायटेशन किया गया।"
"वाह?"
"सुनने में बुरा लगता है न? शोषण कहूँगी तो और भी बुरा लगेगा। पर मेरे साथ यही हो रहा था और वह मेरी समझ में भी आ रहा था। पर मैंने मन को बहला लिया था कि मैं घर की किश्तें चुका रही हूँ। घर- जिसकी मुझे अरसे से तलाश थी। घर जो रिश्तों की मज़बूत ज़मीन पर खड़ा हो, घर जो आपसी सामंजस्य और सद्भाव के सहारे टिका हो। पर वह घर तो मुझे मिला नहीं। आपने दिया ही नहीं।"
"देखो, तुम्हारी तरह मैं साहित्यिक भाषा तो बोल नहीं सकता। लेकिन. . ."
"आप खूब बोल सकते हैं। आपका हुस्नपरी वाला जुमला तो अब तक मेरे कलेजे में गड़ा हुआ है। कल रातभर मैं दर्द के मारे सो नहीं पाई थी। पर यह दर्द उस दर्द के मुक़ाबले कुछ नहीं था जो उस रात आपने मुझे दिया। ये घाव तो कल को भर भी जाएँगे पर यह घाव ताउम्र हरा रहेगा।"
"और आज तो आपने कमाल ही कर दिया?"
"आज? आज मैंने क्या किया?" वे हैरान थे। "आज आप सिर्फ़ मेरे सच को परखने यहाँ चले आए। मान लो मैं चली ही गई होती तो- तो आपकी क्या इज़्ज़त रह जाती? या मेरी ही क्या इमेज बनती? आपकी तो यह दूसरी शादी है। इतना तो आप भी समझते होंगे कि दांपत्य का आधार होता है विश्वास- और मिस्टर कश्यप, आपने उसे ही नकार दिया। फिर शेष क्या रहा?"

तभी दरवाज़ा खड़का, नीतू शायद चाय लेकर आई थी। हम दोनों अच्छे बच्चों की तरह चुपचाप बैठ गए। वैसे भी बोल-बोल कर मैं इतना थक गई थी कि कुछ देर आँख बंद करके लेटने को जी चाह रहा था। और चाय पीकर मैं सचमुच लेट गई। नीतू बोली, "जीजा जी! शाम को क्या खाना पसंद करेंगे बताइए।"
व्यंग्यपूर्ण मुस्कुराहट के साथ वे बोले, "मैं ग़रीब क्या बताऊँगा, अपनी दीदी से पूछो। गेस्ट ऑफ ऑनर तो वो हैं" और इतना कहकर वे बाथरूम में घुस गए। नीतू थोड़ी देर बैठी बतियाती रही पर मेरी ओर से कोई प्रोत्साहन न पाकर चुपचाप उठकर चली गई।
वे फ्रेश होकर आए और बालों में कंघी फेरते हुए बोले, "अच्छा मैं निकल रहा हूँ।"
मैंने प्रश्नार्थक नज़रों से उनकी ओर देखा।
"रतलाम वालों के आने तक रुकने का इरादा था। पर देखता हूँ उसकी कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है। तुम्हारे अड़ोसी-पड़ोसी बहुत अच्छे हैं। खूब अच्छी सेवा टहल कर रहे हैं। मेरी वजह से बल्कि असुविधा ही हो रही है।
"-और हाँ, तुम्हारी सारी चीज़ें अगली बार ले आऊँगा, अगर आया तो वरना किसी के हाथ भिजवा दूँगा।"
मैंने उठने का उपक्रम किया तो बोले, "लेटी रहो। मेरे लिए फॉर्मेलिटीज़ करने की ज़रूरत नहीं है। वैसे भी आदर मान बहुत हो चुका है।"
"सी ऑफ करने के लिए न सही, दरवाज़ा बंद करने के लिए तो उठना होगा।"

मैं लड़खड़ाते हुए उठ खड़ी हुई। लंगड़ाते हुए जब तक दरवाज़े पर पहुँची, ये दो मंज़िल उतरकर बिल्डिंग के गेट तक पहुँच चुके थे। खिड़की से मैं उन्हें जाते हुए देखती रही।
फिर मैंने बहुत मुश्किल से दरवाज़ा बंद किया। इतने से श्रम से भी मैं हांफ गई थी। देर तक बंद दरवाज़े के सामने वहीं खड़ी रही जहाँ से मैंने उन्हें जाते हुए देखा था। मुझे लगा, वे मेरे घर से ही नहीं जीवन से भी चले गए हैं।

"अलविदा मि. कश्यप" मैंने कहा, "आज से मेरे घर और मेरे मन के, दरवाज़े आपके लिए बंद हो चुके हैं। घर का दरवाज़ा तो शायद कभी मजबूरी में खोलना भी पड़ेगा क्यों कि इस शादी को इतना आसानी से मैं नकार नहीं सकती। इसके लिए मेरे भाइयों ने बहुत सारा श्रम और पैसा खर्च किया है, इसलिए इस शादी को तो मुझे ढोना ही पड़ेगा। पर मेरे मन का दरवाज़ा अब आपके लिए कभी नहीं खुलेगा, कभी नहीं।"

कलेजा: राजेन्द्र श्रीवास्तव

कलेजा प्रबोध नहीं आया था।  मेरा मन कह रहा था कि वह ज़रूर आएगा। मेरी आंखें स्टेशन की बेतरतीब भीड़ में अब भी उसे तलाश रही थीं।  सुनंदा हौले से...