गुरुवार, 12 जुलाई 2018

ढाक के तीन पात- मलय जैन

सुबह ग्यारह बजे का वक़्त, चहुँ ओर लाल फीतों की लालिमा धीरे धीरे खिलना प्रारंभ हो चुकी थी। इस लालिमा को देखकर सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि सरकारी सूरज उगने को था।
कुछ बेशर्म किस्म के बाबू देर से आने की परंपरा का अपमान करते हुए समय पर अपनी सीटों पर पहुँच चुके थे। टेबल पर आई फाइलों को देखकर बाबू लोग सोच रहे हैं कि इनके साथ कैसा सुलूक किया जाय। चूँकि इन फाइलों पर सेवाभाव का समर्पण प्रारंभ नहीं किया गया था लिहाज़ा अभी तक तय नहीं था कि इनमें से किन फाइलों को निबटाया जाएगा, किन्हें अटकाया जाएगा, किन्हें लटकाया जाएगा और किन्हें लतियाया जाएगा।
कुछ फाइलें लम्बे समय से एक ही जगह पड़ी पड़ी कराह रही थीं, कुछ दम घुटने के कारण अंतिम साँस ले रही थीं।

सलामतपुर नामक एक कस्बे के सरकारी दफ़्तर के इस अ-भूतपूर्व वर्णन से जिस उपन्यास का आगाज़ होता है उसका नाम है- "ढाक के तीन पात" जिसे पढ़ते समय मेरे मन में बार बार कुछ सवाल उठते बैठते रहे।
किसी लेखक की किताब दो स्थितियों में ही सवाल खड़ा करती है, या तो किताब राह भटक गई हो तब या फिर अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल हो जाए तब। मलय जैन साहब की ये किताब तो पहले ही सफलता के ज़रूरी सोपानों को लाँघ चुकी है।

उनका ये कसा हुआ व्यंग्य उपन्यास पढ़ते समय मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि पुलिस सेवा जैसी रूखी सूखी उजड्ड किस्म की जगह पर होकर भी कोई अपने लेखन में इतना हास्य वाला रस कैसे पैदा कर सकता है। हालाँकि हमारे देश के पुलिस स्टेशनों के माहौल को ध्यान से देखा जाय तो वहाँ हास्य ही क्यों सृष्टि के सारे रस धाराधार बरसते नज़र आ सकते हैं। तो ऐसे माहौल में जीने वाले लेखक की कलम में भी व्यंग्य का वायरस घुस जाना सहज है☺

दफ़्तर, फाइलों, बाबुओं, दलालों, टाइपराइटर आदि ऐतिहासिक वस्तुओं का प्रागैतिहासिक वर्णन जारी था, और बी.डी.ओ, एस. डी. एम जैसे महापुरुष अपनी अपनी सीट पर पहुँच रहे थे, उसी समय एक बुरी खबर पहुँचकर पूरे प्रागैतिहासिक परिवेश की ऐसी तैसी कर जाती है। सूचना मिलती है कि कमिश्नर साहिबा "जनता की सरकार जनता के द्वार" के तहत सारे अधिकारियों के साथ गूगल गाँव का पैदल भ्रमण और ग्राम्य शिविर करेंगी। इस ख़बर के साथ जो भगदड़ मचती है उसका बड़ा मनोहारी चित्रण जैन साहब ने किया है। सरकारी अमले को भागते देखकर दो टकिये पत्रकार लपका सिंह जो एक दुकान पर बैठकर फोकट के समोसे जलेबी उड़ाते रहते हैं, हड़बड़ी में आखिरी गाड़ी के बोनट पर कूदकर चढ़ जाते हैं।
सरकारी अमला ऐसे दुर्दिन में गाँव के पटवारी गोटी राम को ढूँढने में लग जाता है जो गोटियाँ फिट करने का जाना माना एक्सपर्ट है।
गूगल गाँव और वहाँ के सरकारी विद्यालय, जहाँ कमिश्नर साहिबा ठहरने वाली हैं, का वर्णन किसी भी  भले इंसान को हँसा हँसा कर उसके पेट का सत्यानाश करने के लिए पर्याप्त है।
गूगल गाँव में एक से बढ़कर एक क़िरदार हैं। घोर धार्मिक पत्नी द्वारा सताए और यौन कुंठित वैद्य, लात मारकर आशीर्वाद देने वाला भूतपूर्व अपराधी और अब का बाबा दनादन, सरकारी स्कूल के सुपर भ्रष्ट प्रिंसिपल पाराशर, सरकारी अधिकारियों तहसीलदार, एस. डी. एम, सरपंच, गड्ढेदार सड़कें बनाने वाले ठेकेदार गड्ढे भैया, यहाँ तक कि आपस में विचार विमर्श करते गाँव के कुत्ते तक इस उपन्यास को रोचक बनाने में कालजयी सहयोग करते हैं।

स्कूल के मिडडे मील वाले भुतहे कमरे जहाँ जालों से लटकती मकड़ियों, कड़ाही में कूदकर आत्महत्या को तैयार छिपकिलियों और मेढकों का चित्रण भी जमकर किया गया है।

व्यंग्य आधारित कथानक वाले हिन्दी उपन्यासों की परम्परा में पिछले कुछ वर्षों से जो श्रेष्ठ उपन्यास लिखे गए हैं उनमें बड़ी आसानी से शामिल हो चुका है "ढाक के तीन पात".. मुझे इस उपन्यास का सबसे प्रबल पक्ष लगा इसकी पठनीयता। मलय जैन ने अपने उपन्यास को एक कुशल पटकथा लेखक की भाँति इस तरह  विकसित किया है कि बोर होने के क्षण कहीं नहीं आते। अंत की ओर अग्रसर होते होते कथानक की रोचकता निरंतर बढ़ती जाती है और मलय पात्रों को उनके कर्मानुसार ठिकाने लगाने का पूरा प्रबन्ध रचते हैं।

ढाक के तीन पात
मलय जैन
राधा कृष्ण प्रकाशन राजकमलप्रकाशनसमूह
पृष्ठ- 200
मूल्य- 195

जल संसाधन : गहराता संकट , कृष्ण कुमार मिश्र

कवि रहीम ने सैकड़ों वर्ष पूर्व एक दोहे के माध्यम से हमें चेतावनी दी थी--
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून

ये दोहा पढ़ा हर पीढ़ी ने किन्तु इस पर सही ढंग से अमल कभी नहीं हुआ। प्राकृतिक संसाधनों के अवैध दोहन और जीवनदायी जल के भयंकर दुरुपयोग के परिणामस्वरूप आज पूरी सृष्टि एक ऐसे चिंताजनक मोड़ पर खड़ी है कि यदि हम शीघ्र ही नहीं चेते तो आने वाला समय हमें पश्चाताप का अवसर भी नहीं दे सकेगा।

जल संसाधनों की निरन्तर गम्भीर होती समस्या पर केन्द्रित किताब "जल संसाधन : गहराता संकट" इसी वर्ष किताबघर प्रकाशन से आई है। वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं लेखक कृष्ण कुमार मिश्र की इस महत्वपूर्ण पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है प्रख्यात विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी जी ने। मेवाड़ी साहब कहते हैं कि "जल के बिना जीवन की कल्पना भी कठिन है। औद्योगिकीकरण और कल कारखानों के चलते जलस्रोत समय के साथ प्रदूषित होते गए। पर्यावरण एक जीवंत इकाई है और उसके तमाम घटक परस्पर संयुक्त और अन्योन्याश्रित हैं, इस बात के प्रति हममें सम्यक समझ विकसित नहीं हो सकी।" उनका अंतिम वक्तव्य भी बहुत मानीखेज़ है कि-- "जल जागरण का इतना बड़ा कार्य केवल कुछ व्यक्तियों या संस्थाओं के बूते नहीं किया जा सकता है। जाहिर है सबको अपने अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी उठाना होगा और जल संरक्षण का व्रत लेना होगा ।"

कृष्ण कुमार मिश्र जी आरंभिक पृष्ठों पर जल का परिचय देते हुए मानव जीवन में जल की महती आवश्यकता और भूमिका पर विस्तार से चर्चा करते हैं। समस्त प्राचीन सभ्यताओं का उद्भव नदियों और जलस्रोतों के किनारे हुआ। कालांतर में जब भौगोलिक या जलवायु के कारणों से ये जलस्रोत या नदियाँ समाप्त हुईं तो इनके साथ ही वो सभ्यताएँ भी विलुप्त हो गईं।

इदं सलिलं सर्वं - ऋग्वेद

भारतीय पौराणिक मान्यताओं और यूनानी परम्परा में भी जल की अहम भूमिका का वर्णन मिलता है। पृथ्वी की सतह का 70.8 भाग जल है। ऐसा नहीं है कि हमारे देश में जल संकट किसी प्राकृतिक कारण से है, बल्कि यह संकट पूरी तरह से मानव निर्मित है। विश्व में वर्षा का वार्षिक औसत जहाँ 870 मिलीमीटर है वहीं भारत में प्रतिवर्ष औसतन 1100 मिलीमीटर वर्षा होती है। इस बारिश का दो तिहाई भाग नदियों के द्वारा बहकर समुद्र में चला जाता है। बचा एक तिहाई झील, पोखर, तालाबों आदि में इकट्ठा हो जाता है। यह शेष जलराशि भी कम नहीं है अगर हम इसे सहेज सकें। हमें जल संग्रह पर ध्यान देना होगा, जल को प्रदूषित होने से बचाना होगा, जल शुद्धिकरण के उपाय करते हुए बड़े स्तर पर जल जागरूकता का अभियान चलाना होगा, तभी यह मानव सभ्यता सुरक्षित रह पाएगी।

अगले अध्याय में जल के भौगोलिक वितरण पर प्रकाश डाला गया है।
मिश्र जी बताते हैं कि- धरती पर मौजूद कुल जल राशि का 2.67 प्रतिशत जल ही सादा उपयोगी जल है। इसका भी दो प्रतिशत ध्रुवीय क्षेत्रों तथा हिमनदों में बर्फ़ के रूप में जमा है।
भारत में लगभग दो सौ घंटों की बारिश होती है। इस वर्षा का केवल 20 प्रतिशत जल ही हम सुरक्षित रख पा रहे हैं। यही कारण है कि हर वर्ष शीत ऋतु के समाप्त होते होते देश के अधिकांश हिस्सों में जल के लिए त्राहि त्राहि होने लगती है।

अगला अध्याय है- जल का उपयोग जहाँ विभिन्न दैनिक आवश्यकताओं एवं कृषि तथा अन्य उद्योग धंधों में
प्रयोग किये जाने वाले जल की औसत मात्रा का विवरण दिया गया है।

"जल - एक अमूल्य संसाधन" नामक अध्याय में कृष्ण कुमार मिश्र लिखते हैं- " जल संसाधनों की दृष्टि से भारत विश्व के समृद्धिशाली राष्ट्रों में से एक है जहाँ छोटी बड़ी 10360 नदियों में विपुल जल राशि मौजूद है। यदि हम इस जल का व्यवस्थित प्रबंधन कर सकें तो वह हमारी कृषि भूमि के 90 प्रतिशत क्षेत्र को सींचने के लिए पर्याप्त होगा।
पिछले दशक में केरल जैसे राज्य, जहाँ से मानसून का आरम्भ होता है, को भी सूखे का सामना करना पड़ा। वर्षा और जल की कमी का प्रमुख कारण पश्चिमी घाटों में स्थित सघन वनों का अंधाधुंध दोहन है। देश के कई राज्य सूखा प्रभावित क्षेत्र बन चुके हैं। अधिकतर नदियाँ विनाश के कगार पर हैं। नदियों का विनाश कालांतर में सभ्यता और संस्कृति के विनाश का कारण भी बन जाता है।"
इस अध्याय में विभिन्न नदियों, घाटों, बाँधों, तालाबों, बावड़ियों, टंकाओं, झीलों आदि का बहुत ही उपयोगी सचित्र वर्णन हुआ है।

"जल प्रदूषण" नामक खंड में उन्होंने उन तमाम बिंदुओं पर चर्चा की है जिनके कारण जल प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ती गयी और आज प्रदूषित जल से उत्पन्न समस्याएँ हमारे सामने हैं।

गंगा जैसी पूजनीय और पावन नदी को इस कदर कलुषित किया गया कि आज गंगाजल में भी कीड़े मिलने लगे हैं। बरसों बरस हमारे घरों में रखे रहने के बावजूद गंगा जल कभी प्रदूषित नहीं होता था। पिछले कई दशकों से गंगा सफाई के नाम पर हमारी सरकारें करों के रूप में जनता से वसूले गए राजकोष से करोड़ो रुपयों का अपव्यय कर चुकी हैं।

"जल परीक्षण एवं शुद्धिकरण" अध्याय में जल को परखने और इसे शुद्ध करने के उपायों की लाभदायक चर्चा की गई है।

अंतिम महत्वपूर्ण अध्याय "जल संरक्षण एवं जल जागरूकता"  जल संरक्षण के विभिन्न तरीकों से हमारा परिचय कराता है। जल संरक्षण की कोशिशें तभी कामयाब होंगी जब हमारे भीतर जल जागरूकता जागेगी।
भविष्यविद हमें पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगला विश्वयुद्ध यदि कभी हुआ तो वह पानी के लिये होगा। ऐसे कठिन समय में यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि यदि हमनें जल जागरूकता और जल संरक्षण के प्रति ध्यान न दिया और पर्यावरण के साथ किये जा रहे अत्याचारों पर रोक न लगी तो कभी न कभी प्रकृति के रोष का सामना हमें करना ही होगा। प्रकृति के उस प्रकोप से बचने और इस मानव सभ्यता को जीवित रखने के प्रयास अभी से करने होंगे। इस दिशा में हम पहले ही बहुत देर कर चुके हैं।

श्रम,शोध और समर्पण से रची गयी इस पुस्तक के लिए कृष्ण कुमार मिश्र जी का हार्दिक अभिनंदन। वैज्ञानिक तथ्य, विचार और समाधान से परिपूर्ण यह प्रयास ऐसे समय में हमारे सामने आया है जब इसकी बहुत आवश्यकता थी। किताबघर से प्रकाशित इस पुस्तक का आवरण और मुख्य सामग्री की प्रस्तुति प्रशंसनीय है। गुणवत्ता से युक्त इस त्रुटिहीन प्रकाशन के लिए लेखक और प्रकाशक बधाई के पात्र हैं।

जल संसाधन: गहराता संकट
कृष्ण कुमार मिश्र
किताबघर प्रकाशन
वर्ष 2018
मूल्य - ₹ 200

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

चेरी के पेड़- रामकुमार

चेरी के पेड़ 
रामकुमार 

फाटक पार करते ही जिस ओर सबसे पहले हमारा ध्‍यान गया, वे थे पेड़ों पर लटकते हुए अलूचों से मिलते-जुलते किसी फल के गुच्‍छे। मकान के भीतर घुसने के बदले हम उस ओर दौड़े। कई पेड़ थे जिन पर वे लटक रहे थे। परंतु उछल-उछल कर कूदने पर भी किसी के हाथ में एक भी दाना नहीं आ सका। मैं सबसे लंबा था, लेकिन मेरा हाथ भी उन्‍हें छूते-छूते रह जाता। हमारा शोर सुन कर बड़ी बहन भीतर से आईं।

'यह तोड़ दीजिए, न जाने कौन-सा फल है! शायद अलूचे या आलूबुखारा या खूबानी…' हम सब चिल्‍लाने लगे।

बहन धीमी चाल से हमारी ओर आने लगीं। हमें क्रोध आया कि वे ऐसे मौके पर भाग कर क्‍यों नहीं आतीं। लेकिन भय था कि कहीं उनसे जल्‍दी आने के लिए कहें तो वे वापस न लौट जाएँ।

'क्‍या हैं ये...।' उन्‍होंने ऊपर पेड़ की ओर देखते हुए कहा।

'शायद अलूचे ही हैं। तोड़ दीजिए जल्‍दी।'

'कोई जंगली फल है शायद?' वे बोलीं।

'नहीं-नहीं जंगली नहीं है,' हम चिल्‍लाए, 'एक तोड़ कर मुझे दीजिए…'

हमारी ओर बिना ध्‍यान दिए वे ऊपर लटकते गुच्‍छों को देख रही थीं, फिर एक दाना तोड़ा और उसे घुमा-फिरा कर देखती रहीं। 'पता नहीं क्‍या है? ऐसा फल तो कभी किसी पहाड़ पर देखा नहीं।'

हम उनके आस-पास एक दायरा बना कर खड़े हो गए थे और अब उस एक दाने को लेने के लिए छीना-झपटी करने लगे।

'नहीं, यह खाना नहीं होगा। कौन जानता है, इसमें जहर हो! पहले माली से पूछेंगे।' फिर मेरी ओर देख कर बोलीं, 'सुनो, कोई नहीं तोड़ेगा इन्‍हें!' यह कह कर वे फिर धीमी चाल से मकान की ओर चली गईं।

उनके आदेश का कोई विरोध नहीं कर सकता, यह सोच कर सब मन मसोस कर रह गए। लेकिन उस शाम सारे बाग में घूम-घूम कर हमने उन पेड़ों को गिना। दूसरे पेड़ भी थे लेकिन उनका महत्‍व नहीं के बराबर ही था। यह पहला मौका था कि किसी पहाड़ में अपने ही बाग में किसी फल के इतने पेड़ मिले हों। कभी एक-आध अलूचे, खूबानी या सेब का पेड़ मिल जाता था, या फिर करीब ही किसी दूसरे मकान में इन पेड़ों को देख कर चुपके से कभी कुछ तोड़ लेते, लेकिन इस बार अपने ही बाग में इतने पेड़… हमारे उत्‍साह की सीमा नहीं थी।

अंदर बहन ने वह दाना पिता के सामने रख कर कहा, 'पता नहीं कौन-सा फल है? बाग में लगा है।'

पिता उसे देखते ही बोले, 'यह तो चेरी है, अभी पकी नहीं।'

चेरी का नाम सुनते ही हमारा उत्‍साह और भी बढ़ गया। हमने आज तक चेरी का पेड़ नहीं देखा था और अब अपने ही बाग में पंद्रह-बीस चेरी के पेड़ है, जिन्‍हें तोड़ने से कोई नहीं रोकेगा, जिन पर पूर्ण रूप से हमारा अधिकार होगा।

हम उस एक विषय में इतने मग्‍न थे कि उस साल कमरों को ले कर झगड़ा नहीं हुआ। हर साल पहले दिन यह समस्‍या जब सामने आती - कौन-सा कमरा किसका होगा, तो हम आपस में झगड़ते थे, हाथापाई भी होती थी और गुस्‍से में पिता भी एक-आध को पीट देते थे। लेकिन इस बार बहन ने जहाँ जिसका सामान रख दिया, उसका विरोध किसी ने नहीं किया।

रात को बहन हमारे कमरे में आईं, मैं एक किताब में तस्‍वीरें देख रहा था।

'सोया नहीं?'

'नींद नहीं आई।' मैं बोला। छोटे भाई-बहन सो गए थे।

'मुझे भी नए घर में पहली रात को नींद नहीं आती।'

वे खिड़की के पास जा कर खड़ी हो गईं। खिड़की बंद थी लेकिन एक शीशा टूटा हुआ था जिसमें से वे बाहर झाँकने लगीं। दो महीने पूर्व जब से उनकी सगाई हुई वे बहुत चुप-चुप-सी रहने लगी थीं। अगले जाड़ों मे उनका विवाह हो जाएगा, उनके विवाह की कल्‍पना से ही हमारा उत्‍साह बढ़ जाता। लेकिन विवाह के बाद वे इस घर में नहीं रहेंगी, सोच दुख भी होता।

'यह देखो।' उन्‍होंने धीमे स्‍वर में कहा।

'क्‍या है?'

'इधर आओ?' खिड़की के दूसरे शीशे से बाहर देखा, लेकिन अँधेरे में सामनेवाले पहाड़ के अतिरिक्‍त और कुछ दिखाई नहीं दिया।

उन्‍होंने धीरे से खिड़की की चिटखनी खोली और अपना सिर बाहर निकाल लिया।

मैंने फिर आकाश की ओर दे, मुझे भी लगा जैसे तारे बहुत नीचे उतर आए हों।

'पहाड़ों पर तारे नजदीक दिखाई देते हैं। हम ऊँचाई पर आ जाते हैं न, इसीलिए।'

'नहीं, यह बात नहीं है। पिछले साल मसूरी में वे इतने पास कभी दिखाई नहीं दिए, नैनीताल में...'

मुझे इस विषय में अधिक दिलचस्‍पी नहीं थी।

'मैंने कहीं पढ़ा था कि यहाँ तारे बहुत पास दिखाई देते हैं।' वे बोलीं।

खुली खिड़की से ठंडी हवा भीतर आ रही थी। मैं अपनी चारपाई पर आ गया और लिहाफ से अपना शरीर ढँक लिया। वे कुछ देर तक खिड़की पर झुकी रहीं, फिर अपने कमरे में चली गईं। मैं फिर तस्‍वीरें देखने लगा।

अगले दिन प्रातः उठते ही हम चेरी के पेड़ों के पास पहुँच गए। कोई किसी पेड़ के पास जा कर दूसरों को आवाज लगाता, 'देखो, ऊपर की डाल पर चेरी कितनी पीली हो गई है।' किस पेड़ की चेरी सबसे बड़ी हैं, किसकी छोटी इन सबकी जाँच-पड़ताल हमने तुरंत कर डाली। एक पेड़ की कुछ टहनियाँ नीचे की ओर झुकी हुई थीं, लेकिन बहुत उछलने के बावजूद हाथ उन तक नहीं पहुँचा। फिर छोटा भाई घुटनों के बल बैठा और मैं उसकी पीठ पर चढ़ कर चेरी तोड़ने लगा। केवल चार दाने ही हाथ में आए। एक-एक सबको दिया, लेकिन छोटी बहन के लिए नहीं बची। वह रोने लगी, मैंने उसे अपनी आधी चेरी देने का वायदा किया, लेकिन उसने इनकार कर दिया। वह बहन से शिकायत करेगी, यह धमकी दे कर वह रोती-रोती घर की ओर भागी।

कुछ देर बाद बहन हमारे पास आईं, 'ये कच्‍ची चेरी क्‍यों तोड़ी? इन्‍हें खा कर क्‍या बीमार पड़ना है?' फिर मेरी ओर देख कर बोलीं, 'अगर किसी ने अब एक भी चेरी खाई, तो उसे कड़ी सजा मिलेगी। कच्‍चा फल तोड़ने में पाप चढ़ता है।'

वे लौट गईं। अब बहन के मना कर देने पर किसी को फिर चेरी खाने का साहस नहीं होगा। यदि छिप कर ऐसा किया भी और बहन को पता चल गया, तो उसका क्‍या परिणाम निकलेगा - इसकी कल्‍पना से ही डर लगने लगा। वे कभी किसी को पीटती नहीं थीं, अधिक क्रोध आने पर डाँटतीं भी नहीं, उनकी सजा होती थी - कसूरवार से बोलचाल बंद। यह सजा असहनीय बन जाती थी, मार-पीट और डाँट से भी अधिक, जिससे हम सब घबराते थे।

खाते समय जब साथ बैठते तो हम इसी एक विषय पर बातें करते थे।

'अब तो गुलाबी होने लगी हैं।'

'ऊपर की डालियों पर तो लाल हो गई हैं।'

'अब दो हफ्तों तक तैयार हो जाएँगी, फिर जी भर कर खाना।' पिता कहते।

बहन कहतीं, 'इनका बस चले तो ये कच्‍ची ही खा जाएँ। इस बार तो ये घर से बाहर ही नहीं निकलते। बस, चेरी-चेरी औार कोई बात ही नहीं।'

माँ को बहन के विवाह की चिंता लगी हुई थी। जब घर का काम न रहता तो पिता के साथ वे इस विषय पर कितनी ही बातें किया करती थीं। पिता एक कापी में माँ की बतलाई हुई लिस्‍टें लिखा करते थे - क्‍या सामान मँगवाना होगा, कितना गहना बनेगा, कितनी साड़ियाँ, बारात कहाँ ठहरेगी?

इस चर्चा से बहन का चेहरा और भी गंभीर हो आता।

हर चेरी के पेड़ के तने पर मैंने चाकू की नोक से सबके नाम लिख दिए थे। पेड़ पर जिसका नाम होगा, वही उसकी चेरी तोड़ेगा और खाएगा। सब अपने-अपने पेड़ों के नीचे खड़े हो कर अपनी चेरी की प्रशंसा करते और दूसरे पेड़ों की निंदा। हर एक का दावा रहता कि उसके पेड़ों की चेरी बहुत तेजी से पक रही है।

उस दिन एक व्‍यक्ति हमारे बाग में आया और चेरी के पेड़ों के चक्‍कर लगाने लगा। हर पेड़ के पास जाता और शाखाओं को इधर-उधर हटा कर ऊपरी सिरे तक देखता, कभी एक पेड़ की चेरी तोड़ कर खाता, कभी दूसरे पेड़ की। इतना बेधड़क हो कर वह बाग में घूम रहा था जैसे यह उसी का घर हो। हम झुंड बना कर उसकी ओर देखते रहे, उसके व्‍यवहार पर क्रोध आ रहा था, परंतु उससे कुछ भी कहने का साहस हममें से किसी में नहीं था। अपना काम खत्म करके उसकी नजर हमारी ओर गई और वह मुस्‍कराने लगा जिसमें हमें उसके ऊपर के दो बड़े-बड़े पीले-से दाँत दिखाई दिए।

'आप लोग इस बँगले मे रहते हैं?'

'हाँ, यह हमारा मकान है।' मैने साहस से कहा।

पिता से मिलने की इच्‍छा प्रकट करने पर हम उसे पितावाले कमरे में ले गए। हमें उसके चेहरे से घृणा हो रही थी और यह जानने का कौतूहल भी था कि वह कौन है। उसके जाने के बाद हम पिता के पास गए।

'यह ठेकेदार था जिसने चेरी के पेड़ मकान-मालिक से खरीद लिए हैं। कल से उसका आदमी इन पेड़ों की रखवाली करेगा।' पिता बोले।

हम में से कोई उस ठेके की बात समझा, कोई समझ नहीं सका।

'हम तो समझ रहे थे कि ये हमारे पेड़ हैं, हमारे बाग के अंदर हैं, कोई दूसरा उन्‍हें कैसे खरीद सकता है।' मैं बोला।

पिता हँसने लगे, 'हमने मकान किराए पर लिया है। पेड़ों पर मकान-मालिक का ही हक रहता है।'

'अब हम चेरी नहीं तोड़ सकते हैं?'

'चेरी ठेकेदार की हैं, हम कैसे तोड़ सकते हैं?'

उस रात को हममें से किसी ने भी चेरी के विषय मे एक भी शब्‍द नहीं कहा। किसी ने भूले से कुछ कहा तो सबको चुप देख कर उसे अपनी गलती का तुरंत अहसास हो गया। मुझे बहुत देर तक नींद नहीं आई। खिड़की से बाहर बाग की ओर देखा, चेरी के छोटे-छोटे पेड़ भार से झुके हुए सोए जान पड़े। जिन पर कल हम अपना अधिकार समझते थे, वे अब अपने नहीं जान पड़े। मैं बहन से इस विषय में और भी कई बातें पूछना चाहता था, परंतु वे उस रात हमारे कमरे में नहीं आर्इं।

अगले दिन सुबह ठेकेदार के साथ एक बूढ़ा भी आया। वे अपने साथ रस्सियों के ढेर, टूटे हुए पुराने कनस्‍तर और बाँस की चटाइयाँ लाए। बाग के दूसरे सिरे पर चटाइयों से उन दोनों ने एक झोंपड़ी के भीतर ए‍क दरी बिछाई, एक कोने में बूढ़े ने हुक्‍का रख दिया। हम थोड़ी दूर से सब कुछ देखते रहे। दो चटाइयों को मिला कर झोंपड़ी जितनी जल्‍दी तैयार हो गई, उससे हमें बहुत आश्‍चर्य हुआ। वे दोनों कभी-कभी हमारी ओर देख कर मुस्कराने लगते लकिन हमने उनका कोई जवाब नहीं दिया। छोटे भाई ने कहा कि हमारे शत्रु हैं और हमारी ही जमीन पर अपने खेमे गाड़ रहे हैं।

कनस्‍तरों में छोटे-छोटे पत्‍थर भरे गए और रस्सियों की सहायता से उन्‍हें कुछ पेड़ों पर बाँध दिया गया। उन रस्सियों के सिरे झोंपड़ी के पास एक खूँटे में बाँध दिए गए। बूढ़ा रस्‍सी के सिरे को झटके के साथ हिलाता तो कनस्‍तर में पड़े पत्‍थर बजने लगते और एक कर्कश-सी आवाज सारे बाग में गूँज उठती। हमारा कौतूहल बढ़ता जा रहा था।

कुछ देर बाद सारा प्रबंध करके ठेकेदार चला गया। रह गया वह बूढ़ा जो झोंपड़ी के पास एक पत्‍थर पर बैठा हुक्‍का गुड़गुड़ाने लगा। ठेकेदार की अपेक्षा उस बूढ़े के चेहरे पर हमें मैत्री भाव दिखाई दिया। हम धीरे-धीरे उसके पास पहुँच गए। उसने बड़े प्‍यार से हमें अपने पास बिठाया। हमारे पूछने पर उसने बतलाया कि ये कनस्‍तर परिंदों को भगाने के लिए बाँधे गए हैं, बहुत-से परिंदे - विशेषकर बुलबुल - चेरी पर चोंचें मारते हैं जिससे वह सड़ जाती है। अगर उन्‍हें न भगाया जाए तो पेड़-के-पेड़ खत्‍म हो सकते हैं।

'लेकिन कनस्‍तर सब चेरी के पेड़ों पर क्‍यों नहीं बाँधे गए?'

'चार-पाँच पेड़ों के लिए एक कनस्‍तर की आवाज काफी है।' वह बोला।

'क्‍या तुम रात को भी यहीं सोओगे?'

'हाँ, रात को भी डर रहता है कि कोई आदमी चेरी न तोड़ ले।'

सबसे छोटी बहन का ध्‍यान हुक्‍के की ओर था। उसने पूछा, 'यह क्‍या है?'

हम हँस पड़े। 'यह इनकी सिगरेट है,' छोटा भाई बोला।

धीरे-धीरे बूढ़े की उपस्थिति से सब अभ्‍यस्‍त हो गए। रस्‍सी खींच कर कनस्‍तरों को बजाना, 'हा-हू,हा-हू' या सीटी बजा कर परिंदों को उड़ाना - इन सब आवाजों को सुनने की आदत पड़ गई। चेरी के भार से डालियाँ इतनी झुक गई थीं कि उछल कर आसानी से मैं दो-चार दाने तोड़ सकता था, परंतु बूढ़े की नजरें हर समय चौकन्‍नी हो कर चारों ओर घूमती रहती, इसलिए साहस नहीं होता था।

माँ दूसरे-तीसरे दिन बूढ़े को चाय का गिलास भिजवा देतीं। वह भी कभी-कभी कुछ पकी हुई चेरी तोड़ कर हमें दे देता। लेकिन पेड़ पर चढ़ कर तोड़ना, फिर खाना - जिसकी हमने शुरू में कल्‍पना की थी, वह साध मन में ही रह गई। जब कभी कोई चिड़िया रेत पर चेरी खा रही होती और बूढ़े को पता न चलता तो हमें बहुत प्रसन्‍नता होती। हमारा वश चलता तो सारे पेड़ परिंदों का खिला देते। लेकिन चिड़ियाँ चुपचाप चेरी नहीं खातीं, एक-दो दाने खा कर जब वे दूसरी डाल पर उड़तीं तो बूढ़े को पता चल जाता और वह रस्‍सी खींच कर कनस्‍तर बजा देता।

बहन दिन-भर किसी पेड़ के नीचे कुरसी बिछा कर हम में से किसी का पुलोवर बुनती रहतीं। इस साल गरमियों की छुटि्टयों में उन्‍होंने किसी किताब को हाथ तक नहीं लगाया, नहीं तो हर बार वे अपने कोर्स की कोई किताब पढ़ती रहती थीं। कुछ दिन पूर्व उनका इंटरमीडिएट का परिणाम निकला था और वे फर्स्‍ट डिवीजन में पास हुई थीं। वे और पढ़ना चाहती थीं परंतु माँ को उनके विवाह की जल्‍दी थी।

हमारे घर से थोड़ी दूर एक चश्‍मा बहता था जहाँ हम दूसरे-तीसरे दिन नहाने चले जाते थे। कभी बाजार, कभी सिनेमा, कभी पार्क-धीरे-धीरे हमारी दिनचर्या में दूसरे आकर्षण आते गए। यह शायद पहला अवसर था कि बड़ी बहन ने किसी में भाग नहीं लिया। पहाड़ों में वे हमारे बहुत करीब आ जाती थीं। रात को खाने के बाद चारपाइयों में दुबके हम उनसे कहानियाँ सुना करते थे, शाम को सबको अपने साथ घुमाने ले जाती थीं और पि‍कनिकों की तो कोई गिनती ही नहीं होती थी। इस बार वे बहुत कम घर से निकलीं और जब बाहर जातीं भी तो अकेली ही जातीं। माँ की किसी बात का असर उन पर नहीं हुआ।

एक दिन सुबह आँख खुलते ही बाहर बाग में कई लोगों की आवाजें सुनाई दीं। मैं चारपाई पर लेटा-लेटा कुछ दूर तक आश्‍चर्य से इस शोरगुल के बारे में ही सोचता रहा। खिड़की से झाँक कर बाहर देखने ही वाला था जब बहन किसी काम से कमरे में आई।

'यह शोर कैसा है?' मैंने पूछा।

'वे लोग आ गए।'

'कौन लोग?' मैंने आश्‍चर्य से पूछा।

'वही, ठेकेदार के आदमी, चेरी तोड़ने के लिए,' वे बोलीं।

मैं झट से बाहर दौड़ा। पेड़ों पर टोकरियाँ लिए ठेकेदार के आदमी चढ़े हुए थे। दोनों हाथों से ऊपर-नीचे की शाखाओं से चेरी तोड़ कर टोकरियों में भरते जा रहे थे। किसी दूर की शाखा को पकड़ कर अपने पास घसीटने पर 'चर्र-चर्र' की आवाजें गूँजने लगतीं। सारे बाग में शोरगुल था।

हम धीरे-धीरे बाग के चक्‍कर लगाने लगे। हर पेड़ के पास कुछ देर तक खडे़ रह कर ऊपर चढ़े आदमी को देखते। लग रहा था जैसे आज हमारी पराजय का अंतिम दिन हो।

हर पेड़ के नीचे काफी चेरी गिरी हुई थीं। छोटी बहन ने लपक कर एक गुच्‍छा उठा लिया तो भाई ने उसके हाथ से छीन कर फेंक दिया, 'जानती नहीं कि बहन ने क्‍या कहा है?'

'कोई एक भी चेरी मुँह में नहीं रखेगा।'

झोंपड़ी के पास ठेकेदार अन्‍य चार-पाँच व्‍यक्तियों के साथ चुन-चुन कर चेरी एक पेटी में रख रहा था। उसके पास ही कई खाली पेटियाँ पड़ी थीं और दरी पर दिखाई दिया तोड़ी हुई चेरियों का ढेर। वे सब बहुत तेजी से काम कर रहे थे। हमें खड़े देख कर ठेकेदार ने एक-एक मुट्ठी चेरी हम सबको देनी चाही, लेकिन हमने इन्‍कार कर दिया।

हम लोग बाग में ही घूमते रहे। घर से कहीं बाहर जाने की इच्‍छा नहीं हुई। चेरी के पेड़ धीरे-धीरे खाली हुए जा रहे थे। उस दिन कनस्‍तर बजाने की जरूरत नहीं पड़ी। बुलबुल और दूसरे पक्षी पेड़ों के ऊपर ही चक्‍कर लगाते रहे, किसी पेड़ पर बैठने का साहस नहीं था।

'यह देखो, उस पेड़ के नीचे क्‍या पड़ा है?' छोटी बहन ने एक पेड़ की ओर संकेत करके कहा।

हमने उस ओर देखा, परंतु जान नहीं सके कि वह क्‍या है? पास जाने पर पेड़ के नीचे एक मरी हुई बुलबुल दिखाई दी। उसकी गर्दन पर खून जमा हुआ था। हम कुछ देर तक चुपचाप देखते रहे। मैंने उसका पाँव पकड़ कर हिलाया, लेकिन उसमें जान बाकी नहीं बची थी।

'यह कैसे मर गई?'

'किसी ने इसकी गर्दन पर पत्‍थर मारा है।'

'इन्‍हीं लोगों ने मारा होगा।'

'तभी कोई बुलबुल पेड़ पर नहीं बैठ रही।'

हमने ठेकेदार और उसके आदमियों को जी भर कर गालियाँ दीं। उन लोगों पर पहले ही बहुत क्रोध आ रहा था, अब बुलबुल की हत्‍या देख कर तो उनसे बदला लेने की भावना बहुत तीव्र हो उठी। कितनी ही योजनाएँ बनाईं, परंतु हर बार कोई कमी उसमें नजर आ जाती जिससे उसे अधूरा ही छोड़ देना पड़ता। फिर यह सोच कर कि यदि यह बुलबुल यहीं पड़ी रही तो कोई बिल्ली या कुत्ता इसे खा जाएगा, हमने पास ही एक गड्ढा खोदा और उसमें बुलबुल को लिटा कर ऊपर से मिट्टी डाल दी।

उस दिन बड़ी बहन ने बाग में पैर तक नहीं रखा। उन्‍होंने न मरी हुई बुलबुल देखी, न पेड़ों से चेरी का टूटना। उन्‍हें पेड़ों से फल तोड़ना अच्‍छा नहीं लगता।

'फूल, पौधों और फलों में भी जान होती है। उन्‍हें तोड़ना भी उतना ही बुरा है जितना किसी जानवर को मारना।' वे हमसे कहा करती थीं।

वे लोग शाम को बहुत देर तक चेरी तोड़ते रहे। फिर एक लारी रुकी जिसमें सब पेटियाँ लाद दी गईं और वे सब चले गए। बाग में अचानक सन्नाटा हो गया, रह गए केवल चेरी के नंगे पेड़, जिन पर एक भी चेरी दिखाई नहीं देती थी। हवा तेज थी और रह-रह कर पेड़ों की शाखाएँ हिल उठती थीं जैसे आखिरी साँसे ले रही हों। नीचे बिखरी हुई थीं अनगिनत पत्तियाँ और कुछ डालियाँ जो चेरी तोड़ते वक्‍त नीचे गिर गई थीं। शाम हमें बहुत सूनी-सूनी-सी लगी और पेड़ों से डर-सा लगने लगा।

खाते वक्‍त हम दिन भर की घटनाओं की चर्चा करते रहे, मरी हुई बुलबुल का कि़स्‍सा भी सुनाया। लेकिन बड़ी बहन ने जरा भी दिलचस्‍पी नहीं ली, उनके मुँह से एक भी शब्‍द नहीं निकला। लगा जैसे वे हमारी बातें न सुन रही हों। खाना भी उन्‍होंने बहुत कम खाया।

रात को देर तक नींद नहीं आई, न कोई किताब पढ़ने में ही मन लगा। छोटे भाई-बहन दिन भर की थकान से चारपाई पर लेटते ही सो गए। थकान से मेरा शरीर भी टूट रहा था, लेकिन बहुत कोशिश करने पर भी नींद नहीं आ सकी।

कुछ देर बाद मैं खिड़की के पास जा कर खड़ा हो गया। अचानक आकाश में बहुत-से तारे एक साथ चमक उठे। तारे यहाँ सचमुच बहुत करीब दिखाई देते हैं। क्‍यों? केवल छह हजार फुट ही तो ऊँचा यह स्‍थान है और तारे तो मीलों दूर हैं। फिर इतने पास कैसे दिखाई देते हैं? मैं सोचने लगा। तभी बाग में पेड़ों के नीचे किसी की परछाईं दिखाई दी। मुझे डर-सा लगा। लेकिन कुछ देर बाद पता लगा कि वे बहन हैं। वे अभी तक सोईं नहीं...

मैं भी दबे पाँव बाहर आया। वे चेरी के पेड़ों के नीचे टहल रही थीं, उनका आँचल नीचे तक झूल रहा था।

'अभी तक सोए नहीं?' बिना मेरी ओर देखे उन्‍होंने पूछा।

उनकी आवाज सुन कर मैं चौंक पड़ा। मेरा अनुमान था कि उन्‍हें मेरे बाहर आने का पता नहीं चला। मैंने धीमे स्‍वर में कहा, 'नहीं, अभी नींद नहीं आई।'

उनके पैरों के नीचे पत्‍ते दबते तो सर्र-सर्र जैसी आवाज रात के सन्‍नाटे में गूँज जाती। हवा और तेज हो गई थी।

'आज बहुत अँधेरा है।' मैं बोला।

'आजकल अँधेरी रातें हैं।'

कभी-कभी अपनी नजर ऊपर उठा कर वे किसी पेड़ को देखतीं जिसकी शाखाओं के बीच से आकाश में चमकते तारे दिखाई देते।

'आज तारे बहुत करीब दिखाई दे रहे हैं।' मैंने कहा।

उन्‍होंने कोई उत्‍तर नहीं दिया।

ढाक के तीन पात- मलय जैन

सुबह ग्यारह बजे का वक़्त, चहुँ ओर लाल फीतों की लालिमा धीरे धीरे खिलना प्रारंभ हो चुकी थी। इस लालिमा को देखकर सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि स...