बुधवार, 27 जून 2018

मालती जोशी के गीत

जग की संध्या घिर आयी है
मेरे आँगन में दोपहरी
कैसे दीप जलाऊँ

ममता से भीगे पर लेकर
पंछी घर को लौट चले हैं
देहरियों पर सुहागिनों के
नयनों के शत दीप जले हैं
भटकी सुधियाँ घर आई हैं
सूनी फिर भी मेरी नगरी
मैं कैसे मुस्काऊँ

गद्गद कंठों से पूजा के
मंगलमय पद फूट पड़े हैं
तुलसी माँ के आगे कितने
मेहँदी वाले हाथ जुड़े हैं
मेरी आँखें भर आयी हैं
लेकर कैसी साध सुनहरी
मैं आँचल फैलाऊँ

2

अपना सीमित सा प्रकाश ले
दीपशिखा जलती है निशि भर
फिर भी मोहित है जग सारा
क्षण भंगुर विद्युत की छवि पर

मेघों का दिल चीर चीर कर
मुस्काना उसको आता है
झलक पलक भर दिखा गगन को
तड़पाना उसको आता है

शून्य लोक में छिप छिप जाती
खोज खोज रह जाता अम्बर
फिर भी मोहित है जग सारा
क्षण भंगुर विद्युत की छवि पर

नन्हे ये दीपक में लघु सा
स्नेह लिए जलते ही जाना
राख बना अपने प्राणों को
पथ भूलों को राह दिखाना

जीवन दान किया तो वह भी
पवन झकोरों से डर डर कर
अपना सीमित सा प्रकाश ले
दीपशिखा जलती है निशि भर।

यूसुफ़ रईस का पहला उपन्यास- मैं शबाना

"बाप के मरने पर बच्चे सिर्फ़ यतीम होते हैं। माँ के न रहने पर लावारिस हो जाते हैं।"

" कितनी अजीब बात है कि जिस्म छोड़ते ही लोगों को हर शख़्स में भलाई नज़र आने लगती है। अपना ज़मीर बेचकर इंसान पता नहीं कैसे इतना झूठ बोल लेता है।"

उपरोक्त अंश यूसुफ़ रईस के महत्वाकांक्षी उपन्यास "मैं शबाना" से लिये गए हैं जो पिछले दिनों नोशन प्रेस चेन्नई से प्रकाशित हुआ।
एक शायर के रूप में यूसुफ़ रईस को हम लोग ज़रूर जानते थे पर उनके प्रवाही गद्य से परिचय इस किताब के कारण ही सम्भव हो सका। अचानक "मैं शबाना" की चर्चा फेसबुक पर दिखनी शुरू हुई और धीरे धीरे छा गयी।

जिस गति और रवानी के साथ यह उपन्यास ख़त्म हुआ इसे उनके लेखन की विशेषता ही माना जाएगा। शबाना नामक एक लड़की की ये दुखद दास्तान पाठक के मन को छू जाती है। अभाव सिर्फ़ धन, दौलत और सम्पन्नता का ही नहीं होता। इंसानी रिश्तों में ऊष्मा, प्यार, आत्मीयता और स्नेह की कमी जीवन को त्रासद बना देती है। हर कोई अपना अपना नसीब लेकर इस दुनिया में आता है। दुर्भाग्य का खेल कुछ लोगों के साथ जीवन भर चलता है। शबाना के साथ भी यही हुआ। एक बार पिता की देहरी छूटी तो जीवन भर उसे सुकून के पल नहीं मिले। पति का अन्मयस्क व्यवहार, ससुराल का विचित्र माहौल, लम्बी बीमारी के बाद माँ की मौत जैसी दुर्घटनाएँ उसके जीवन की डगर पर लगातार काँटे बिछाती चलती हैं।

बरसों बाद जब धीरे धीरे पति का रुख़ शबाना के प्रति कोमल होते देखकर ये निश्चिन्तता होती है कि अब उसके दिन भी सुधरेंगे उसी समय एक आकस्मिक दुर्घटना में पति की मौत उसकी पूरी दुनिया तहसनहस कर जाती है। ससुराल से निर्वासित होकर मायके में उपेक्षापूर्ण जीवन जीना उसकी विवशता है। भाई और भाभी का अमानवीय व्यवहार उसे कुछ अरसे बाद पुनः विस्थापित होने पर बाध्य करता है। ज़िन्दगी की कठोर और खुश्क राहों पर इन दुर्दिनों का सामना बड़े साहस और धैर्य से शबाना करती है। संघर्ष के दिन धीरे धीरे बीतते रहते हैं। पर उसके भाग्य में सुख जैसे लिखा ही नहीं था।

उसकी बेटी एक दिन बीमार पड़ जाती है। सरकारी अस्पताल में हुए घटिया आरंभिक इलाज के कारण उसकी हालत इस क़दर बिगड़ती जाती है कि ज़िन्दगी और मौत के बीच की इस जंग में मौत का पलड़ा भारी पड़ने लगता है। उसे बचाने में शबाना अपना सब कुछ झोंक देती है। उसे बचाने की इस कोशिश में ही शबाना के साथ एक ऐसी घटना घटती है जिसके यूँ तो कोई खास मायने नहीं थे किन्तु उसके परिवार और जीवन के लिए वो घटना कालांतर में अभिशाप सिद्ध हुई।

यूसुफ़ रईस अपने इस उपन्यास के जरिये एक लेखक के रूप में हमें आश्वस्त करते हैं। उनकी शैली और कहन में ऐसी रवानी है कि यदि समय हो तो किताब एक बैठक में ख़त्म की जा सकती है। अनावश्यक विवरणों से बचते हुए वे पाठकों के धैर्य से खिलवाड़ न कर किसी विषय पर उतनी ही बात करते हैं जितना कथानक के लिए आवश्यक होता है। उनकी भाषा बेहद सरल और सहज है। हालाँकि उर्दू की व्यक्तिगत अज्ञानता के कारण मुझे कुछ शब्दों को बिना समझे कहानी के साथ आगे बढ़ जाना पड़ा। उम्मीद करता हूँ कि उनकी अगली किताब में हम जैसे कमजोर पाठकों के लिए शब्दार्थ की थोड़ी व्यवस्था ज़रूर होगी☺
यूसुफ़ साहब को इस पहली किताब की सफल प्रस्तुति के हार्दिक बधाई और आगामी रचनाओं के लिए शुभकामनाएं।
"मैं शबाना" की कुछ और पंक्तियों के साथ अपनी बात का समापन करता हूँ।

" शादी होते ही बेटी के लिए बाप का घर पराया हो जाता है और ससुराल का घर भी कभी उसका नहीं होता है। शादी के बाद औरत की ज़िन्दगी उस बंजारे जैसी हो जाती है, जिसका ऐसा कोई मुक़म्मल ठिकाना नहीं होता है, जिसे वो अपना ख़ुद का कह सके।"

शनिवार, 9 जून 2018

रामकुमार की नज़र से "एवरेस्ट हमसफ़र -- नीरज मुसाफ़िर"

"कह गये  है काफ़िले, इस ओर को जाते हुए
तू जिधर से चल पड़ेगा,वो समझ रस्ता हुआ "

(ज्ञान प्रकाश विवेक)

यात्रा या घुमक्कड़ी सुनने समझने में एक जैसे लगते हैं लेकिन इन दोनों में एक बड़ा मूलभूत अंतर है जो घुमक्कड़ी को यात्रा से अलग कर देता है। वह मूलभूत अंतर है- योजना का..
यात्रा हमेशा एक योजना से शुरू होकर निश्चित समयानुसार पूर्ण हो जाती है। कहाँ जाना है, कैसे जाना है, कहाँ ठहरना है, किससे मिलना है ,क्या देखना है जैसे सवाल उस योजना का हिस्सा होते हैं लेकिन घुमक्कड़ी "जो होगा देखा जाएगा " के मूल मूल मंत्र पर आधारित होती है। किसी प्रकार की कोई  योजना नहीं होती , बस किसी दिन बैग उठाया और निकल पड़े।

वैसे घुमक्कड़ी में भी कई बार मंजिल तय होती है । बस किसी तरह की योजना या रास्ते की तयशुदा तस्वीर नहीं होती। पगडंडियों से लेकर सवारी गाड़ी तक का इस्तेमाल करते हुए तय मंजिल पर पहुँच जाना ही ध्येय होता है। न ही रेल का आरक्षण न ही बस का ।किसी दूसरे हमसफ़र का साथ मिले या न मिले घुमक्कड़ निकल ही पड़ते हैं।

पिछले दिनों इसी तरह की घुमक्कड़ी वाली पूर्वोत्तर भारत यात्रा के दौरान कई पत्र पत्रिकाएँ और किताबों के बीच से गुजरने का मौका मिला। संयोग से मेरा फोन भी खो गया जिससे ध्यान भंग होने के अवसर ख़त्म हो गए और पढ़ने का उपक्रम निर्बाध चला । साथ मे जितनी पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं थीं, सब क्रमशः पढ़ ली गयीं। इसी क्रम में "नीरज चौधरी" की पुस्तक "हमसफर एवरेस्ट" के साथ अपनी यात्रा को जीवंत करने का मौका मिला। वैसे इस पुस्तक को पहली बार देखते ही इसे पढ़ने की ललक पैदा हो गई थी लेकिन मुम्बई की अपनी व्यस्तताओं में ये इच्छा बस ललक बनकर ही रह गयी।
पूर्वोत्तर की इस यात्रा ने आख़िरकार ये ख़्वाहिश पूरी कर दी। वैसे "नीरज चौधरी" किताबों के ऊपर अपना उपनाम "नीरज मुसाफिर " प्रकाशक से लिखवा लेते हैं। इसका कारण भी है, उनकी बेहतरीन मुसाफिरी। "लद्दाख" आदि जगहों की मुसाफिरी साइकिल से कर लेने का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर चुके हैं नीरज ।
यह पुस्तक भी इसी मुसाफिरी का बेहतरीन विवरण है। जैसा कि नाम से ही आभास हो जाता है कि यह एवरेस्ट पर्वत श्रृंखला से ही संबंधित होगी और इत्तफ़ाक़ से यह सत्य भी है। ये किताब "एवरेस्ट बेस कैंप" तक की यात्रा का विवरण है ।
दुनिया के सभी पर्वतारोहियों का स्वप्न होता है एवरेस्ट फ़तह और सभी ट्रैकरो का लक्ष्य होता है एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुँचना।
नीरज भी एक ट्रैकर हैं तो इनका भी लक्ष्य रहा बेस कैंप तक जाना।
इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यात्रा की एक निश्चित योजना बनाते हैं जो आगे चलकर घुमक्कड़ी में तब्दील हो जाती है और अपने आख़िरी दौर में फिर यात्रा बन जाती है।

पेशे से इंजीनियर होने के कारण एंड्रायड फोन/जी पी एस और गूगल बाबा का बेहतरीन उपयोग करते हुए कुल 27 दिन की इस यात्रा का आरंभ चार लोगों के साथ होता है, जिसमें स्वयं नीरज(मुसाफिर) दीप्ति(सहधर्मिणी) मोटरसाइकिल (सहचारिणी)और देवेंद्र कोठारी (हमसफ़र) शामिल हैं।

कुल 7 दिनों तक मोटरसाइकिल की यात्रा करने के बाद (या यूँ कहें कि जहाँ तक वो जा सकती थी) उसका साथ छूट जाता है। 11वे दिन कोठारी साहब भी साथ छोड़ देते हैं। वैसे तो किताब पढ़ते हुए पता चलता है कि श्री कोठारी बहुत हिम्मती और दृढ़ निश्चयी थे ,फिर भी उनका बीच रास्ते से लौटना हजम नहीं होता (कभी मिलेंगे तो जरुर पूछेंगे)।

सफर के दौरान हमसफ़र का साथ छूटना मानसिक रूप से बहुत कमजोर कर देता है, फिर भी नीरज और दीप्ति पूरी हिम्मत और तल्लीनता से अपनी यात्रा को जारी रखते हैं । ज़्यादातर यात्रा संस्मरणों में लेखक ऐतिहासिक बातों या घटनाओ का हवाला देते हैं जिससे कभी-कभी तो रोचकता बढ़ जाती है पर कभी-कभी इनकी अधिकता ऊब पैदा कर जाती है। इस पुस्तक में नीरज ने ऐतिहासिक तथ्यों को बिल्कुल स्थान नही दिया है। चाहते तो इन स्थानों के बारे में अपने ज्ञान का भव्य प्रदर्शन करते हुए एक एक पृष्ठ का विवरण ठूँस देते लेकिन किताब पढ़ने का रस फिर भंग हो जाता। ये लेखक का संयम और उसकी ताकत है कि पूरी किताब में  पाठकीय रस कभी भी कम नहीं होने पाता।

पूरी किताब प्रातः जगने से शुरू होकर बिस्तर में पहुँचने तक के बीच की घटनाओं का सिलसिलेवार विवरण है। जो देखा, जो अनुभव हुआ वही बिना लाग-लपेट के लिख दिया।
क्या खाया? क्या खरीदा? कितने का खरीदा? कहाँ विश्राम किया ?सब जस का तस लिख दिया।
यात्रा के दौरान बड़े मजेदार अनुभव भी मिलते हैं । जैसे खच्चर वाली ट्रेनों के बारे में, प्रथम एवरेस्ट विजेता एडमंड हिलेरी द्वारा बनाये  स्कूल , भोजपत्र के वृक्षों बारे में, पहाड़ों में रहने वालों के व्यवहार के बारे में पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम प्रत्यक्ष वहाँ की यात्रा कर रहे हैं । इस पुस्तक की एक बड़ी खास बात यह है कि यदि आप एवरेस्ट बेस कैम्प न जाकर किसी अन्य दुर्गम स्थान पर भी जाना चाहते हैं तो भी पगडंडियों से लेकर  होटल तक का उल्लेख मिल जाएगा। एक पथ प्रदर्शक की तरह यह किताब ठहरने और खाने-पीने के सामानों से लेकर एक बाल्टी गर्म पानी तक का मूल्य बता देती है।

इस किताब को पढ़ते हुए पहली बार यह पता चलता है कि एवरेस्ट मैराथन भी होता है । ये नीरज का  सौभाग्य है कि वे उसके प्रत्यक्ष गवाह बने हैं।

नए/पुराने ट्रैकरों के लिए  ढेर सारी बातें/ सूचनाएँ भी इस किताब में शामिल है जैसे ऊँचे पहाड़ों पर कैसी कैसी कठिनाई आती है और उससे बचने के रास्ते क्या क्या हैं..

 अपनी यात्रा के दौरान कई बार इन लोगों ने भी वापस लौट आने का मन बनाया लेकिन रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन फिर से अपनी मंजिल की ओर चल पड़े । इसी तरह इन बाधाओं को पार करते हुए अंततः वे बेस कैंप पहुँच ही जाते हैं।
इस पुस्तक में नीरज  ने बड़ी ईमानदारी से लिखा है कि इन 27 दिनों की यात्रा के दौरान एक बार भी एवरेस्ट का दर्शन नहीं कर पाए जबकि वे बेस कैंप तक पहुंच चुके होते हैं।
तो क्या कारण था? वह कौन सी परिस्थिति थी? जिसके कारण इतना करीब होकर भी एवरेस्ट की चोटी नहीं देख पाए ?
4000 मीटर पर स्थित झीलों का क्या आकर्षण होता है?
शून्य से भी नीचे के तापमान पर भी अपने को बचाते हुए कैसे फोटोग्राफी की जाती है? ये सब जानने के लिए  एक बार इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें और विशेष रूप से दीप्ति को उनकी हिम्मत के लिए बधाई अवश्य दें। जब 4000 मीटर पर उनके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया (अत्यधिक ऊंचाई पर पर्वतीय बीमारियाँ अपने प्रभाव का एहसास करा देती हैं ) उसके बाद उन्होंने नीरज का साथ नही छोड़ा।
इस दंपति को उनके साहस और सफल यात्रा के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं!!

" कभी-कभी पहाड़ों पर जाना जरूरी है, अपनी अक्षमताओं से तो वहाँ परिचय होता ही है, अपनी सीमाओं को स्वीकारने की दृष्टि भी बनती है"**** कुमार रविंद्र

पुस्तक-हमसफ़र एवरेस्ट
लेखक-नीरज मुसाफिर
प्रकाशक-हिंदी युग्म
मूल्य-150
पृष्ठ-220

सादर
रामकुमार
hindikitab@gmail.com

◆कछु अकथ कहानी : कविता वर्मा

चौड़ी चिकनी सड़क पर बस पूरी ताकत लगा कर जितनी गति पकड़ सकती थी उस गति से दौड़ी चली जा रही थी।  बस के काँच यात्रा के धक्के खाकर पकड़ ढीली कर चुके ...