बुधवार, 27 जून 2018

यूसुफ़ रईस का पहला उपन्यास- मैं शबाना

"बाप के मरने पर बच्चे सिर्फ़ यतीम होते हैं। माँ के न रहने पर लावारिस हो जाते हैं।"

" कितनी अजीब बात है कि जिस्म छोड़ते ही लोगों को हर शख़्स में भलाई नज़र आने लगती है। अपना ज़मीर बेचकर इंसान पता नहीं कैसे इतना झूठ बोल लेता है।"

उपरोक्त अंश यूसुफ़ रईस के महत्वाकांक्षी उपन्यास "मैं शबाना" से लिये गए हैं जो पिछले दिनों नोशन प्रेस चेन्नई से प्रकाशित हुआ।
एक शायर के रूप में यूसुफ़ रईस को हम लोग ज़रूर जानते थे पर उनके प्रवाही गद्य से परिचय इस किताब के कारण ही सम्भव हो सका। अचानक "मैं शबाना" की चर्चा फेसबुक पर दिखनी शुरू हुई और धीरे धीरे छा गयी।

जिस गति और रवानी के साथ यह उपन्यास ख़त्म हुआ इसे उनके लेखन की विशेषता ही माना जाएगा। शबाना नामक एक लड़की की ये दुखद दास्तान पाठक के मन को छू जाती है। अभाव सिर्फ़ धन, दौलत और सम्पन्नता का ही नहीं होता। इंसानी रिश्तों में ऊष्मा, प्यार, आत्मीयता और स्नेह की कमी जीवन को त्रासद बना देती है। हर कोई अपना अपना नसीब लेकर इस दुनिया में आता है। दुर्भाग्य का खेल कुछ लोगों के साथ जीवन भर चलता है। शबाना के साथ भी यही हुआ। एक बार पिता की देहरी छूटी तो जीवन भर उसे सुकून के पल नहीं मिले। पति का अन्मयस्क व्यवहार, ससुराल का विचित्र माहौल, लम्बी बीमारी के बाद माँ की मौत जैसी दुर्घटनाएँ उसके जीवन की डगर पर लगातार काँटे बिछाती चलती हैं।

बरसों बाद जब धीरे धीरे पति का रुख़ शबाना के प्रति कोमल होते देखकर ये निश्चिन्तता होती है कि अब उसके दिन भी सुधरेंगे उसी समय एक आकस्मिक दुर्घटना में पति की मौत उसकी पूरी दुनिया तहसनहस कर जाती है। ससुराल से निर्वासित होकर मायके में उपेक्षापूर्ण जीवन जीना उसकी विवशता है। भाई और भाभी का अमानवीय व्यवहार उसे कुछ अरसे बाद पुनः विस्थापित होने पर बाध्य करता है। ज़िन्दगी की कठोर और खुश्क राहों पर इन दुर्दिनों का सामना बड़े साहस और धैर्य से शबाना करती है। संघर्ष के दिन धीरे धीरे बीतते रहते हैं। पर उसके भाग्य में सुख जैसे लिखा ही नहीं था।

उसकी बेटी एक दिन बीमार पड़ जाती है। सरकारी अस्पताल में हुए घटिया आरंभिक इलाज के कारण उसकी हालत इस क़दर बिगड़ती जाती है कि ज़िन्दगी और मौत के बीच की इस जंग में मौत का पलड़ा भारी पड़ने लगता है। उसे बचाने में शबाना अपना सब कुछ झोंक देती है। उसे बचाने की इस कोशिश में ही शबाना के साथ एक ऐसी घटना घटती है जिसके यूँ तो कोई खास मायने नहीं थे किन्तु उसके परिवार और जीवन के लिए वो घटना कालांतर में अभिशाप सिद्ध हुई।

यूसुफ़ रईस अपने इस उपन्यास के जरिये एक लेखक के रूप में हमें आश्वस्त करते हैं। उनकी शैली और कहन में ऐसी रवानी है कि यदि समय हो तो किताब एक बैठक में ख़त्म की जा सकती है। अनावश्यक विवरणों से बचते हुए वे पाठकों के धैर्य से खिलवाड़ न कर किसी विषय पर उतनी ही बात करते हैं जितना कथानक के लिए आवश्यक होता है। उनकी भाषा बेहद सरल और सहज है। हालाँकि उर्दू की व्यक्तिगत अज्ञानता के कारण मुझे कुछ शब्दों को बिना समझे कहानी के साथ आगे बढ़ जाना पड़ा। उम्मीद करता हूँ कि उनकी अगली किताब में हम जैसे कमजोर पाठकों के लिए शब्दार्थ की थोड़ी व्यवस्था ज़रूर होगी☺
यूसुफ़ साहब को इस पहली किताब की सफल प्रस्तुति के हार्दिक बधाई और आगामी रचनाओं के लिए शुभकामनाएं।
"मैं शबाना" की कुछ और पंक्तियों के साथ अपनी बात का समापन करता हूँ।

" शादी होते ही बेटी के लिए बाप का घर पराया हो जाता है और ससुराल का घर भी कभी उसका नहीं होता है। शादी के बाद औरत की ज़िन्दगी उस बंजारे जैसी हो जाती है, जिसका ऐसा कोई मुक़म्मल ठिकाना नहीं होता है, जिसे वो अपना ख़ुद का कह सके।"

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