मंगलवार, 9 जुलाई 2019

ग़ाफ़िल : सुनील चतुर्वेदी

ग़ाफ़िल : सुनील चतुर्वेदी

'ग़ाफ़िल' हमारे समय के एक ऐसे चिंताजनक असंतुलन की गाथा है जो अतिशय महत्वाकांक्षा और सुख की दोषपूर्ण भ्रामक परिभाषाओं के कारण अस्तित्व में आया। मनुष्यता, प्रेम और अपनत्व जैसे अनिवार्य मानवीय गुणों की जगह आर्थिक समृद्धि को ऐश्वर्य का पैमाना माना जाने लगा। हमारे विकास का विजन इतना छोटा होता गया कि व्यष्टि का महत्व समष्टि से ज़्यादा होता गया।

स्वार्जित विडम्बना, निरर्थक उपलब्धियों के छद्म और असफल सुख की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए यह उपन्यास हमें बताता है कि जीवन के वास्तविक सुख और वैभव भौतिक वस्तुओं और धन से नहीं बल्कि संवेदनशीलता, सहानुभूति, औदार्य और सह-जीवन से प्राप्त होते हैं।

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'ग़ाफ़िल' का आग़ाज़ एक ऐसे अत्याधुनिक अस्पताल से होता है जहाँ का अलसाया पड़ा स्टाफ एक विशिष्ट मरीज के आगमन की सूचना मिलते ही अचानक जाग पड़ता है। ये हाई प्रोफाइल पेशेन्ट हैं 64 वर्षीय रघुनंदन बाबू जो ब्रेन हैमरेज के बाद कोमा की स्थिति में अभी अभी शहर के इस पाँच सितारा अस्पताल के आईसीयू में भरती हुए हैं।

पहले दृश्य में ही मरीज के लिए आईसीयू खाली करने का आदेश देती वार्ड इंचार्ज का जूनियर नर्स से ये कहना कि " और हाँ , ऑक्सीजन का मास्क ठीक से चेक कर लेना। पिछली बार तुमने रूम नम्बर 101 वाले पेशेंट को मास्क तो लगा दिया था लेकिन वहाँ ऑक्सीजन की सप्लाई ही नहीं थी। बेचारा...." हमारे समाज की इन जीवनदायिनी संस्थाओं के चमकते चेहरे को बेनकाब कर देता है। गरीब और अमीर मरीजों के प्रति इनके भेदभाव और भयंकर लापरवाही के कारण होने वाली मानवीय भूलों को इंगित करने के लिए सुनील चतुर्वेदी को महज़ कुछ पंक्तियों की ही ज़रूरत पड़ती है।

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रघुनंदन की चेतना कोमा के इस गहन अंधकार में बरसों पहले उनके द्वारा उपेक्षित और परित्यक्त जीवन के उजले दिनों का पुनरावलोकन करती भटक रही है। अतीत की विस्मृतियों में तैरते ( पूर्व दीप्ति/फ़्लैशबैक शैली के सहारे ) रघुनंदन बाबू के अवचेतन मन की यह यात्रा हमें उनके बचपन के उन मासूम दिनों तक ले जाती है जहाँ लोग आर्थिक रूप से भले ही असमर्थ हों, किन्तु संवेदना और सहानुभूति के स्तर पर कहीं कोई अभाव नहीं। अतीत के इन उजास भरे दिनों का भावपूर्ण वर्णन पाठक और कथा के बीच एक अद्भुत आत्मीय जुड़ाव निर्मित करता है।
ऐसे तमाम प्रसंग हैं जो रचनाकार के मानवीय दृष्टिकोण और सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण के कारण बहुत दिनों तक याद रहेंगे।

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पहला प्रसंग रघुनंदन की माँ की बीमारी के समय का है जब कुछ बुजुर्ग महिलाएँ दौड़कर घर जाती हैं और पैसे लाकर चुपचाप उसकी दादी के हाथ में दे देती हैं। मुहल्ले के भाटी माड़साहब अस्पताल जाते समय इन पैसों को ये कहते हुए लेने से इनकार करते हैं कि ' सब व्यवस्था है'। साइकिल से आगे पीछे चलते लोगों की भीड़ और अस्पताल में रघु की दोस्त गायत्री द्वारा कई दिनों तक की गई माँ की अनथक सेवा उन दिनों की सुखद तस्वीर प्रस्तुत करती है जब किसी एक व्यक्ति का सुख दुःख सिर्फ़ उसी का व्यक्तिगत सुख दुःख नहीं  होता था।
औदार्य, सामूहिकता और सहयोग का यही दृश्य रघु की बहन सुमित्रा के विवाह के समय पुनः उपस्थित होता है जब रघुनंदन की बहन का विवाह न होकर पूरे गाँव की बेटी का विवाह बन जाता है।

विवाह से पहले सुमित्रा परिजनों द्वारा नियमित उपेक्षा का शिकार मात्र इसलिए होती रही क्योंकि वह लड़की है। समदृष्टि और स्नेह उसे सिर्फ़ अपने पिता से मिलता है। दादी, माँ और मकान मालकिन आदि रघु और उसकी पढ़ाई में सहयोग के प्रति जितने सजग हैं, सुमित्रा के प्रति उतने ही लापरवाह।घर वालों के पक्षपात और रघु द्वारा बहन की अवमानना के दृश्य बहुत खटकते हैं।
सुनील चतुर्वेदी जी ने विमर्शों के अनावश्यक मोह से दूर रहते हुए इन मार्मिक दृश्यों को सहज तरलता और सांकेतिक भाषा से रचा है। कई बरस पहले का एक दृश्य... ( जब दोनों भाई बहन बैठकर पढ़ रहे हैं। मकान मालकिन मामी आकर लड़के को दुलारती हैं और उसे लाड़ से उठाकर गोद में बिठा लेती हैं) "लड़का खिल उठता है... सुमित्रा भी किताब नीचे रख खाली आँखों से मामी के चेहरे की ओर देख रही है।"

ऐसा ही एक दृश्य त्रिवेणी घाट की सीढ़ियों पर... रघु और गायत्री की अन्तिम मुलाक़ात। गायत्री की आँखों में सुनहरे भविष्य के इंद्रधनुष और रघु के सामने बहुत बड़े बनने और इलीट क्लास में जीने की दुर्दम्य इच्छाएँ। "अपने आसपास की अनकल्चर्ड सोसाइटी से दूर जाने की इच्छा" बताते समय उसके चेहरे घृणा के जो भाव होते हैं उन्हें देखकर गायत्री का मोह भंग हो जाता है। चलते चलते उसे लताड़ते हुए कहती है कि " जिन लोगों के लिए तुम सब कुछ थे, तुम्हारा जीवन सुधारने के लिए उनसे जितना बन सका, उतना किया और आज वही लोग तुम्हारे लिए अनकल्चर्ड हो गए!"
आँसुओं से धुंधलाई आँखें और अधूरे स्वप्नों की कसक के साथ गायत्री रघु के जीवन और कहानी से गायब हो जाती है और हमारी स्मृति में उसका चारित्रिक सौन्दर्य हमेशा के लिए अंकित हो जाता है।

गायत्री के जाने के कुछ दिनों बाद  का एक और दृश्य...

रघु अपने दोस्त राजू के साथ भर्तृहरि की गुफा के बाहर बैठा है और दोनों की बातों का विषय गायत्री का चले जाना है। राजू गायत्री का समर्थन करते हुए उसके जाने को सही ठहराता है। रघु के झूठे प्रतिवाद के उत्तर में राजू उससे कहता है -- " रघु, असल में हम अपने चारों तरफ़ आत्म सम्मोहन का एक औरा बुन लेते हैं और फिर उस छद्म औरा के साथ पूरा जीवन गुज़ार देते हैं। हमें यही पता नहीं चलता कि वास्तविकता में हम क्या हैं। जब कभी कोई हमें आईना दिखाने की कोशिश करता है तो हम अपने बचाव में और झूठे तर्क गढ़ते चले जाते हैं। लेकिन, जब हम दूसरों के बारे में अपनी राय जाहिर करते हैं तब हमारी असलियत सामने आ जाती है।"
भावनात्मक प्रेम, लगाव जैसे शब्दों से दूर और ऊंचाइयों के मोह में पड़ा रघु उससे बुरी तरह नाराज़ होकर उससे भी दूर हो जाता है।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद नौकरी और इसी दरमियान पहले माँ , फिर पिता और अंततः अपने बेटे के ग़म में दादी के देहावसान के साथ ही उस लोअर क्लास सोसाइटी से उसकी जड़ें ख़त्म हो जाती हैं जिससे वह दूर होना चाहता था। सुमित्रा तो पहले ही किसी अन्य परिवार का हिस्सा बन चुकी थी।

जिस फैक्ट्री में नौकरी लगी थी उसी के मालिक की बेटी इन्द्रा, जो फैक्ट्री की सख्त एडमिनिस्ट्रेटर भी है, से विवाह होता है। ससुर से दहेज के रूप में प्राप्त फैक्ट्री को दोनों पति पत्नी मिलकर बड़ा करते हैं।

इन्हीं दिनों का एक दृश्य...रघुनंदन की अंतिम घातक भूलों में एक ...

गर्भवती होने के बाद इन्द्रा बताती है कि अब वो फैक्ट्री नहीं आ पाएगी और वो किसी को हायर कर ले।
इस पर रघुनंदन का जवाब कि-- " दस हजार का आदमी रखने से अच्छा है पाँच सौ की आया रख लेना "
इन्द्रा उसे समझाने की कोशिश करती है कि "बच्चे को
आया नहीं बल्कि माँ बाप की ज़रूरत होती है" और अपने बच्चे की भावी सुखद हरकतों की कल्पना में डूब जाती है। रघु के लिए एक नॉर्मल सी बायोलॉजिकल घटना पर ये व्यर्थ की प्रतिक्रिया थी।
अपने हाथों अपनी कब्र खोदना शायद इसे ही कहते हैं। बेटे आकाश की उम्र चार वर्ष होते ही रघुनंदन बड़प्पन दिखाने की जिद में उसे देश के एक बड़े बोर्डिंग स्कूल में डालने का निश्चय करता है। इन्द्रा इतनी कम उम्र में बच्चे को घर से दूर करने का विरोध करती है। उसका मानना है कि बच्चा परिवार में रहेगा तो उसमें जीवन के मूल्य आएंगे और वह भावनात्मक रूप से मजबूत होगा। वो नहीं मानता और बच्चे को बोर्डिंग स्कूल भेज देता है।

किसी अवसर पर दोनों में हो रही बहस के दौरान जीवन, परिवार और संवेदना के प्रति रघु के उद्गार :
"व्हाट रबिश! इट्स अ मिडल क्लास कॉन्सेप्ट। थिंक बियॉन्ड फैमिली एंड इमोशन्स।"

इंद्रा: ये बिजनेस नहीं, पैसे और पावर के लिए ह्यूमन रेस है और रेस का एक ही इथिक होता है किसी एक व्यक्ति की जीत। इस रेस का कोई अंत नहीं होता!

ये रघुनंदन के जीवन की कुछ ऐसी अन्तिम भूलों के दिन थे जहाँ उजालों की भूमिका ख़त्म हो रही थी और ज़िन्दगी तेजी से उन अँधेरों की तरफ़ बढ़ रही थी जिनसे आज वह घिरे हुए हैं।

जीवन भर मनुष्यत्व और संवेदनाओं को खारिज़ करने वाले रघुनंदन की ज़िन्दगी में आज उनसे बढ़कर हृदयहीन और स्वार्थी लोग मौजूद हैं। उनके पुत्र आकाश का व्यवहार तो फिर भी कुछ हद तक ठीकठाक है किन्तु अवगुणों के मद्देनज़र बहू उन्हीं का विस्तार प्रतीत होती है, जिसे सिर्फ़ ये चिन्ता है कि कितनी जल्दी अस्पताल वाले ससुर के मरने की खबर दें और वह पहले से निश्चित यूरोप टूर पर निकल सके। इस सम्बन्ध में आकाश और सुरभि के बीच हुए वार्तालाप मानवीय सम्बन्धों और संवेदनाओं के क्षरण की त्रासद तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

इसी कठिन वक़्त में डॉक्टर तापड़िया जैसे देवदूत भी हैं जो इस अत्याधुनिक और स्वार्थी समय में भी मनुष्य और जीवन के प्रति आस्थावान हैं। उनकी चिन्ता एवं प्राथमिकता के दायरे में अस्पताल के उच्चाधिकारियों का असंतोष और नाराज़गी नहीं बल्कि मरीज का हित है , जबकि उन्हें निर्देश दिया गया है कि सर दर्द का साधारण सा केस होने पर भी पूरा एम आर आई करना है और गंभीर ज़रूरत न होने पर भी सर्जरी कर देना है।
डॉ तापड़िया का मानना है कि कोमा में न्यूनतर स्तर पर चले गए पेशेन्ट के साथ विचार तरंगों की शक्ति के माध्यम से मानवीय रिश्ता बनाया जाय और उसकी स्मृतियों को जगाने का प्रयास किया जाय तो पेशेन्ट रिवाइव कर सकता है और इन दिनों वे कई कई घंटे एकाग्र होकर रघुनंदन के पास बैठकर अपने प्रयोग में रमे हैं।

इस उपन्यास के सारे किरदार जीवन्त और वास्तविक हैं। यदि एक तरफ़ दुर्लभ होती जा रही प्रजाति के आश्वस्तिकारक प्रतिनिधि डॉ तापड़िया हैं तो दूसरी तरफ़ डॉ शुभम जैसे पढ़े लिखे युवा लम्पट भी हैं जिनके लिए इश्क़ और किसी की भावना सिर्फ़ टाइम पास की बाते हैं। दुनिया को अपने जूते पर रखने और अपार धन दौलत के अहंकार में डूबे एडमिनिस्ट्रेटर राहुल जैसे लोग भी हैं इस अस्पताल में जहाँ मौत के इन सौदागरों की अक्षम्य लापरवाहियों के चलते एक गरीब डेंगू पीड़ित बच्ची की मृत्यु हो जाती है और वो भी दस लाख के मेडिकल बिल के साथ। अवांछित स्थिति से निकलने के लिए राहुल द्वारा साम दाम दंड भेद का 'कुशलतापूर्वक प्रयोग' इस वर्ग के अमानुषिक चेहरे की एक और परत खोल जाता है।

इन चुनिन्दा प्रसंगों का ज़िक़्र उपन्यास की विषयवस्तु की एक झलक भर माना जाय। "द एंड" की सूचना अभी दूर है क्योंकि कहानी का सबसे मानीखेज़ हिस्सा अभी भी शेष है। डॉ तापड़िया और रघुनंदन के साथ क्या होता है, इसका वर्णन उपन्यास के आख़िरी लम्हों में दर्ज है। इन अन्तिम पन्नों पर कथानक इतना रोचक हो चला है कि साँस रोककर आगे बढ़ते रहने वाली स्थिति बन जाती है।

कथ्यानुरूप समर्थ भाषा, शिल्प की सादगी और पठनीयता सुनील चतुर्वेदी के लेखन का सबसे उल्लेखनीय पक्ष है। वे जिस तरह दृश्य दर दृश्य पाठकों को बाँधकर रखते हैं वह अनुभव अमूमन हिन्दी के लोकप्रिय थ्रिलर उपन्यासों के युग में ही हुआ करता था।

112 पृष्ठों का यह उपन्यास आकार की दृष्टि से भले ही लघु माना जाय किन्तु संवेदनशीलता, प्रस्तुति और कथ्य के स्तर पर यह एक बड़े कद की रचना है। इस वर्ष प्रकाशित महत्वपूर्ण उपन्यासों की प्रथम पंक्ति में शामिल होगा ये उपन्यास।

वरिष्ठ कवि जीतेन्द्र श्रीवास्तव का भी आभार जिनका शानदार आलेख इस उपन्यास के फ्लैप पर सुशोभित है।

आवरण, कागज़ की गुणवत्ता और छपाई का स्तर बेहतर है किन्तु प्रूफ़ की कमियाँ कई जगहों पर अर्थ का अनर्थ कर देती हैं। जैसे--

तकिया गिला दिखाई दिया...
इंसेक्योर्ड फिल करेगा.....

{{ विशेष नोट : हिन्दी के बहुत से प्रकाशक इस क्षेत्र में गंभीर नहीं हैं। संपादकों का भुगतान करते समय दुनिया भर का रोना गाना करते हैं और उनकी इस प्रवृत्ति का खामियाजा भुगतती हैं किताबें।
जैसे अपने सामान की रक्षा की जिम्मेदारी हमारी होती है वैसे ही अपनी किताब की जिम्मेदारी भी उठानी होगी। अपनी किताब और अपने श्रम को सत्यानाश होने से बचाने का प्रयास स्वयं करना होगा।}}

◆ ग़ाफ़िल
◆ सुनील चतुर्वेदी
◆ अंतिका प्रकाशन
◆ प्रथम संस्करण वर्ष 2019
◆ पृष्ठ 112
◆मूल्य 140 (पे.बै. संस्करण)
    275 (पु.संस्करण)

सोमवार, 8 जुलाई 2019

कालीचाट : सुनील चतुर्वेदी

तीन दिन पहले जब 'कालीचाट' पढ़कर ख़त्म किया तो एक अपराधबोध सा अनुभव हुआ। ये सोचकर कि ऐसी जाने कितनी स्तरीय किताबें बरसों से खरीदकर संग्रह में सिर्फ़ शामिल कर पाए हैं। कारण चाहे जो हों, पढ़ कुछ और रहे हैं।

गाँव और किसानों के जनजीवन पर केन्द्रित चुनिन्दा श्रेष्ठ उपन्यासों में शुमार एक उल्लेखनीय नाम है- 'कालीचाट'। सुनील चतुर्वेदी ने इस उपन्यास को समर्पित किया है कथा पितामह प्रेमचंद जी को, जिन्होंने लगभग एक सदी पहले किसानों के कठिनतम जीवन और अंतहीन संघर्ष को अपनी कुछ कालजयी कहानियों और उपन्यासों में पूरी मार्मिकता और प्रभाव से दर्शाया था। साथ ही 19 दिसम्बर 1932 को प्रेमचंद द्वारा लिखित 'जागरण' का एक संपादकीय अंश भी साझा किया गया है जिसमें वे कहते हैं--
" राष्ट्र के हाथ में जो कुछ विभूति है , वह इन्हीं किसानों और मजदूरों की मेहनत का सदका है।"

कालीचाट के केन्द्र में है मालवा का एक गाँव सिन्द्रानी जहाँ सामंती युग का आधुनिक प्रतिनिधि भीमा है, जो आर्थिक सहायता के नाम पर तो लूटता ही है, अपने कुएँ के पानी के बदले भी गाँव वालों का शोषण करने से नहीं चूकता।भूमंडलीकरण के बाद उसकी बिरादरी भी बड़ी हो चली है क्योंकि शोषकों का एक नया वर्ग अलग रंग रूप में तैयार है। बैंक के अधिकारी, कर्मचारी, उनके और अपने स्वार्थों को सफल बनाते बिचौलिए, धन पिपासु नेता और सत्ता/ प्रशासन की मुँह देखी बोलती तमाम स्वयं सेवी संस्थाएँ....

कमजोर और निराश्रित नागरिकों के साथ न तो कानून है और न ही प्रशासन। खल चरित्रों द्वारा बलात्कार और अन्याय के शिकार नागरिकों के साथ संवेदना और न्याय तो दूर, उल्टे आरोप लगाकर उनके मनोबल और साहस को नष्ट करने का प्रयास करते पुलिस वाले,
कर्ज के प्राणघातक नागपाश में तब्दील होती सरकार की कल्याणकारी योजनाएँ और धरती के भीतर काल की तरह मौजूद कालीचाट....अर्थात हताशा, पराजय और अपमान का अनन्त सिलसिला!!

इस कालीचाट को तोड़ने के क्रम में निरन्तर टूटते चले जाने और अपनी अदम्य जिजीविषा का धीरे धीरे क्षरण होते देखने को अभिशप्त हैं यूनुस जैसे किसान जिन्हें इस माटी से अनन्य अनुराग है।

इन सारी अमानवीय परिस्थितियों और विडंबनाओं के समानांतर ही संवेदना, सहानुभूति और सहजीवन का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते दो महिला चरित्र रेशमी और रुक्मिणी के। दोनों अकेली किन्तु उतनी ही सशक्त! भीमा के अत्याचार के कारण अपंग हो चला रेशमी का पति साहिबु नित नए नए संघर्षों से उकताकर एक दिन चुपचाप घर से गायब हो जाता है।

रुक्मिणी अपने पति और जेठानी, जिसके साथ उसके पति का अवैध सम्बन्ध है, की यातनाओं से ऊबकर मायके में रह रही है। एक तरफ क्रूर पति और दूसरी तरफ़ लालच और हृदय हीनता की सारी हदों को पार कर चुका वह निकृष्ट भाई जो बीमार पिता के नाम पर मुख्यमंत्री राहत कोष से डेढ़ लाख रुपये की मदद मंजूर करा लेने के बावजूद उनका इलाज नहीं कराता बल्कि डॉक्टर और वो साथ मिलकर सारे पैसे हड़प लेते हैं। आत्मीय परिजनों द्वारा छली गयी रुक्मिणी का बेटा भी पिता और विमाता द्वारा परोसी आधुनिक सुविधाओं और खराब आदतों के लोभ में उसे छोड़कर चला जाता है। ये दुर्घटनाएँ रुक्मिणी के व्यक्तित्व को और ज्यादा मजबूत बना देती हैं और धीरे धीरे वो इन्हें भुलाकर एक ऐसे मिशन पर जुट जाती है जो घर परिवार की सरहदों से बढ़कर महत्वपूर्ण और ज़िन्दगी को सार्थकत्व की तरफ़ ले जाने में सक्षम है। उसके साथ हर मोड़ पर एक मजबूत सम्बल बनकर खड़ी रहती है रेशमी।

उधर पति के घर से चले जाने के बाद भी रेशमी उसके अदृश्य साथ को सदैव कहीं आसपास अनुभव करते हुए अपने उदास, बेसहारा मन और डगमगाते साहस को सँभालने के साथ ही बेटे के जीवन को सँवारने की कोशिश में जुट जाती है। पहले बेटे की सरकारी नौकरी लगती है, फिर उसका विवाह ... और कुछ समय बाद यही बहू-बेटे एक दिन गाँव आते हैं और सम्बन्धों के आवरण को इस कदर तार तार कर जाते हैं कि उनके पीछे रेशमी अधमरी होकर रह जाती है। रुक्मिणी अब उस पर विशेष ध्यान देने लगती है। सुनील चतुर्वेदी ने इस दृश्य को अपने शब्दों से जीवंत कर दिया है---
" दोनों एक दूसरे के दुःख अच्छी तरह जानती थीं। फिर भी जब मिलतीं, अंदर का ज्वालामुखी रिसने लगता। दोनों एक दूसरे को सुनतीं। एक दूसरे के घाव सहलातीं और एक दूसरे का सम्बल बन जातीं।"

उपन्यास में ऐसे तमाम किरदार हैं जिनकी स्मृति जेहन में स्थायी रूप से बस जाती है। गाँव और किसानों की बेहतरी के मुद्दों पर प्रशासन और बेरहम एनजीओ अधिकारियों से जूझ रहे दिनेश, रुक्मिणी और रेशमी के अलावा कमला, नारायण और यूनुस सरीखे यादगार चरित्रों का सृजन वही लेखक कर सकता है, जिसने 'विभावरी' जैसी छोटी किन्तु बड़े बड़े कार्य करने वाली संस्था की अपनी टीम के साथ पिछले कई दशकों से मालवा के गाँवों में जमीनी स्तर पर प्रशंसनीय कार्य किया हो। वातानुकूलित बँगलों और गाड़ियों में बैठकर ऐसे कथानकों की कल्पना हम भले कर लें, किन्तु उनमें यथार्थ की धड़कन और जीवन का स्पन्दन कहाँ से लायेंगे?

वरिष्ठ कथाकार सुभाष पंत इस उपन्यास के फ्लैप पर अपने वक्तव्य के साथ 'बोल्सिकी' का एक मानीखेज़ कथन उद्धृत करते हुए कहते हैं : "महत्वपूर्ण कृतियाँ या तो अपने समय का सवाल होती हैं या फिर उनका जवाब। कालीचाट अपने समय का सवाल भी है, जवाब भी।"

2015 में प्रकाशित 'कालीचाट' पर एक फ़ीचर फ़िल्म भी बनी है जिसे कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में पुरस्कार और प्रशंसा प्राप्त हुई। इस फ़िल्म की निर्माण प्रक्रिया से जुड़े संस्मरणों की एक रोचक किताब भी हाथ लगी है। किसी दिन उस पर स्वतंत्र चर्चा होगी।

◆कालीचाट : सुनील चतुर्वेदी Sunil Chaturvedi
◆ आवरण : अशोक भौमिक Ashok Bhowmick
◆अंतिका प्रकाशन
◆पृष्ठ : 160
◆मूल्य : ₹175

बुधवार, 3 जुलाई 2019

मिट्टी के लोग

◆मिट्टी के लोग : एस.आर. हरनोट 

● आज रामेशरी चाची बहुत परेशान है। उसका मन कहीं जाने को नहीं करता। जाए तो जाए भी कहाँ। जाने-करने को बचा भी क्या है? पहले गौशाला पशुओं और भेड़-बकरियों से भरी रहती थीं। जबसे उसके पति बालदू के पास कोई काम नहीं रहा, रामेशरी को एक-एक करके सभी को बेचना पड़ा। आज मुँह माँगी कीमत भी कौन देता है। जिस गाए की कीमत कभी हजार-दो हजार होती थी उसे पाँच सौ में देना पड़ा। वैसा ही भेड़-बकरियों के साथ हुआ। एक जमाना था जब रामेशरी चाची बकरियों की बकराथा (बाल) निकाल कर उनके खारचे (गर्म दरियाँ) बना कर बेचा करती थी। भेड़ों की ऊन निकाल कर खुद पट्टु-शालों के लिए कातती भी थी और बेच भी दिया करती थी। दाम भी बहुत अच्छे मिल जाते थे। पर आज तो मशीनों से बनी चीजों का जमाना है, भेड़-बकरियों की ऊन और बालों की कद्र अब कहाँ रही। खाली गौशाला में साँकल टँगी रहती है। बाहर-भीतर गड़े खूँटे जैसे उसका मजाक उड़ाते हैं। गौशाला की भीतों में जगह-जगह पाथे उपले जैसे उस पर हँसते नहीं थकते। आते-जाते कोई गाँव का व्यक्ति जब आवाज लगाता है तो उसका कलेजा फट जाता है, मानो सभी उससे पूछ रहे हो कि रामेशरी चाची अब तो मजे ही मजे। 'न गाय न बाच्छी, नींद आए हाछी।' न काम न काज। धूप सेंको और आनंद करो। पर चाची का दिल जानता है कि वह कितने मजे में है?

दो-चार खेत थे वे भी अच्छी तरह बाहे-जोते नहीं जाते। बैल भी नहीं है। गाँव के सरीकों की नजरें बराबर उन पर है, पर अपने बूते रामेशरी चाची ने उन्हें बचाए रखा है। नजर खेतों पर हो भी क्यों न ऐसे खेत गाँव में किसी के पास नहीं है। बालदू तो कई बार उन्हें बेचने का मन बना चुका है पर आखरी आस चाची ने मिटने नहीं दी है। सोचती है कि यही खेत काम आएँगे। बैल न भी हो तो हाथ से खोद कर ही सही, चार दाने तो भीतर आते रहेंगे।

परिवार छोटा सा है। तीन बच्चे हैं। एक लड़की और दो लड़के। दोनों लड़के स्कूल जाते हैं। बड़ा पाँचवीं में है। छोटा तीसरी में। बिटिया अमरो पाँच पढ़ कर जवानी की दहलीज पर बैठी है। रिश्ते आते हैं तो सभी पूछते हैं कि बिटिया कितनी पढ़ी है? कोई ट्रैनिंग बगैरह करवाई है या नहीं। चाची क्या जवाब दे। पाँच की पढ़ाई की भी कोई गिनती है इस जमाने में। सभी पंद्रह-बीस पढ़ी-लिखी माँगते हैं। उस पर भी सरकारी नौकरी हो तो सोने पर सुहागा, नहीं तो तीन-चार लाख का दहेज बगैरह। एक जगह रिश्ता पक्का होने की आस लगी भी थी पर अपने घर के बर्तन खाली देख अभी तक हाँ नहीं की है। जवान बेटी पर गाँव के लुच्चों-लफंगों की नजरें चाची के कलेजे को छलनी करती रहती है। सोचती है, क्या जमाना आ गया। गाँव-बेड़ में भी अब न कोई साक रहा न शर्म। अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग।

गरीबी की आँधी ने रामेशरी चाची को जवानी में ही बुढ़ा दिया है। पर चेहरे पर नूर अभी भी बचा है। भीतर हिम्मत खूब है। चाची जानती है औरतों से ही घर-बार होता है। इसलिए भीतर की परेशानियाँ सरीकों के बीच कभी मुँह पर नहीं आने देती। बेटी अमरो को भी वैसे ही संस्कार दिए हैं। खेती-बाड़ी से लेकर घर-बाहर का शायद ही ऐसा कोई काम होगा जो बेटी नहीं जानती। पराए घर जाएगी तो काम-काज की तो पक्की होनी ही चाहिए। कम पढ़ी-लिखी है तो क्या हुआ, चाची ने दूसरे भी कई हुनर उसे सिखाए हैं। अच्छे संस्कार दिए हैं। गाँव का ऐसा कौन सा घर होगा जहाँ चाची की बिटिया के खजूर, गेहूँ की बालियों और पक्की मक्की की डालियों के पत्तों के पटड़े और मंजरियाँ न बिछी हों। कौन सा ऐसा बच्चा होगा जो उसके हाथ के बुने स्वेटरों को न पहनता होगा। क्रोशिए से बने कई मेजपोश और झालरों वाली चादरें कई घरों के ड्राइंगरूमों की शोभा बढ़ा रहे हैं। गजब की कला है अमरो के हाथ में। पत्तों से बनी बहुत सी कलाकृतियाँ तहसील तक के स्कूलों और दफ्तरों की दीवारों में लगी है। जो चीज बनाती है लगता है किसी मशीन से बनी होगी। बातें भी उसकी वैसी ही सयानी है। इतनी अक्कल और हुनर तो बीए पढ़े-लिखों में भी नहीं होता। कभी वह घर में ऐसी बातें कर बैठती है कि माँ-बाप दोनों हैरान-परेशान।

रामेशरी चाची के पति बालदू के हाल भी अच्छे नहीं हैं। वह जैसे भीतर ही भीतर टूट गया हो। एक जमाना था जब गाँव-परगने में उसकी साख थी। इज्जत परतीत थी। सभी मिस्त्री कह कर सम्मान देते थे। दूर-दूर तक उसकी मिस्त्रीगिरी मशहूर थी। जहाँ किसी का घर बनता, बालदू मिस्त्री पहले वहाँ होता। उसी गाँव के चार-पाँच मजदूर भी उसके साथ होते। उनकी टीम को मिट्टी के घर बनाने की माहरत हासिल थी। गाँव-परगने में शायद ही कोई ऐसा घर था जिसमें उन्होंने मिट्टी न कूटी हो। क्या 'मट्टकंधे' बनाते। क्या कुटाई करते... भीत पर भीत ऐसे चिनते मानों हाथ नहीं कोई घर बनाने की मशीन हों। किसी के दो मंजिले मकान बनते तो किसी का एक मंजिला। सबसे बड़ा मकान इक्कीस-इक्कतीस हाथ होता। उससे छोटा इक्कीस-तेरह। और जिसका सामर्थ्य कम होता उसका एक मंजिला नौ-तेरह हाथ ही बनता। लेकिन नींव से लेकर भीतों की कुटाई और छत डालने तक का काम बालदू की टीम बखूबी करती। उनकी टीम में दो लकड़ी के मिस्त्री भी होते। घर की 'छाने' छवाने के लिए भी बालदू दक्ष था। छान चाहे घास की हो, या खपरैल की या फिर स्लेटों की, उसकी छवाई देखते ही बनती थी। मिट्टी के मट्टकंधों के दो-दो मंजिला मकान शायद ही तब उससे बेहतर कोई बना पाता होगा। आज बालदू बेकार है। उसके हाथ में बेशक वही हुनर है। दक्षता है। महारत है। पर काम नहीं है। चंद सालों में क्या कुछ नहीं हो गया। सब कुछ बदल गया है। जिसके दो जून रोटी के लाले हैं वे भी अब कच्चे मकानों को गिरा कर पत्थर सिमैंट के घर चिन रहे हैं। कोई एक ही कमरा बना रहा है। बालदू जब उन मकानों की शक्लें देखता है तो उसका कलेजा मुँह को आ जाता है। पक्के मकानों के लैंटर जैसे उसे खाने को दौड़ते हैं। न कोई सूरत और न सीरत।

जब कोई मिट्टी का घर गिराता है तो बालदू को लगता है जैसे उसी के अंग काट-काट कर गिराए जा रहे हैं। उसके शरीर से उसकी आत्मा निकली जा रही है। लगे भी क्यों न, आखिर उसने तपती दोपहरिया में उनकी मिट्टी कूटी है। ईमानदारी से पसीना बहाया है। कई घरों को गिराते हुए तो मजदूरों के पसीने छूट जाते। कई-कई दिन लगते, जैसे वे मिट्टी के घर न होकर लोहे के बने हो। उस वक्त बार-बार मिस्त्री याद आ जाता। बालदू की खूब बातें होतीं। उसके हुनर की तारीफें होतीं। कोई कहता, क्या भीत कूटता था बालदू। तो कोई बोलता मिट्टी का मिस्त्री बालदू जैसा दूसरा कोई नहीं था। घर बनाते भी तारीफ और अब उनको गिराते भी प्रशंसा, पर बालदू की किस्मत देखिए, हाथों को अब कोई काम नहीं। वह चाहता तो दूसरों की तरह सिमैंट का मिस्त्री बन जाता, पर उसे यह काम कभी नहीं भाया। फिर गाँव में जो मिस्त्री थे भी उन्होंने कोई दूसरा काम-धंधा पकड़ लिया। बहुत से तो शहर जा कर मेहनत मजूरी करने लग गए।

बालदू की जो इज्जत मिस्त्री होने से बनी थी उसने उसे घर से दूर सड़क पर काम जरूर दिला दिया। मिस्त्री का नहीं, बेलदारी का। बढ़ती महँगाई के उसका घर जैसे-कैसे चलता रहा। साठ-सहत्तर रुपये ध्याड़ी से बनता भी क्या। आटा, दाल-चावल के भाव तो आसमान छूने लगे थे। दूसरी रोजमर्रा की जरूरतों की चीजें भी सस्ती कहाँ रही। उस पर बच्चों की पढ़ाई का खर्चा। गरीबी में आटा उस समय गीला हो गया जब उस सड़क के काम पर भी कई किस्म की मशीनें पहुँच गईं। धीरे-धीरे मजदूरों के लिए मशीने चुनौती बन कर खड़ी हो गई। सरकार ने सारे का सारा काम अब ठेके पर दे दिया था। ये सारे ठेके चौधरी हरिसिंह के बेटे ने ले लिए थे। उसने गाँव की सारी लेबरें हटा दीं और जो काम बीस-तीस मजदूर करते थे, उन्हें अब लंबी-लंबी गर्दनों वाली मशीनें करने लगी थीं। उन्हें चलाने के लिए महज एक-दो आदमी होते। वे खुदाई भी करतीं। मिट्टी पत्थर को इकट्ठा करके खुद भरती और पहाड़ी से नीचे फैंक दिया करती। जहाँ मजदूरों की जरूरत थी वहाँ के लिए वह शहर से ही बिहारियों और गोरखों की लेबरें लाने लगा था। इस तरह सड़क पर जो घ्याड़ी का काम था वह भी हाथ से जाता रहा और बालदू की तरह कई घरों में रोटी के लाले पड़ गए। बालदू पर इन चीजों की मार कुछ ज्यादा ही पड़ी थी। बच्चों की फीस के लिए भी पैसे नहीं जुटते थे। फीस तो दूर, दो जून रोटी भी मुश्किल से जुटाई जा रही थी। उस पर जवान बेटी के ब्याह की चिंता भी उसे भीतर ही भीतर खाए जा रही थी।

चौधरी हरिसिंह न तो ज्यादा पढ़ा लिखा था और न ही बाप-दादाओं की कोई बड़ी संपत्ति ही उसे विरासत में मिली थी। लेकिन गाँव में सबसे ज्यादा जमीन का वही मालिक था। छोटा परिवार होने के नाते जो साल-फसल आती उसे वह बेच दिया करता। उसी के बल-बूते उसने एक छोटी सी दुकान शुरू की और देखते ही देखते अपनी दुकानदारी और लालागिरी से पूरे गाँव-परगने में धाक जमा ली। गरीबों को वह सौदा उधार देने के साथ-साथ ब्याज पर पैसे भी दे दिया करता और जब समय पर लोग उधार न लौटा पाते तो कोई उसे अपने घर से चाँदी-सोने के छोटे-मोटे जेवर दे देते और कुछ खेत-घासणी रेहन रख देते। दो-चार सालों में जब मूल ब्याज के साथ दुगुना-चौगुना हो जाता तो मजबूरन गरीब किसान और मजदूर इन्हें उसे ही बेच दिया करते। इससे उसकी जमींदारी और साहूकारी खूब चमकने लगी थी।

इतना ही नहीं अब जो भी बड़ा अफसर या नेता दौरे पर उस इलाके में आता तो उनकी शामें चौधरी के पास ही गुजरती थी। वह उनकी खूब आव-भगत करता था। यही वजह थी कि अब उसने अपने पाँव राजनीति में भी जमाने शुरू कर दिए थे। यह क्षेत्र आरक्षित था, नहीं तो वह कभी का विधायक के चुनाव में भी कूद जाता और इसमें कोई दो राय नहीं थी कि वह जीत भी जाता। फिर भी उसका रुतबा अब राजनीति में बढ़ने लगा था।

चौधरी की उम्र भी ज्यादा नहीं थी। यही होगी कोई साठ के आसपास लेकिन लगता वह पच्चास से कम का था। पहले-पहल वह बिल्कुल सादे कपड़े पहनता था लेकिन अब लिबास पूरी तरह बदल गया था। खद्दर के कपड़ों की जगह महँगे कपड़ों ने ले ली थीं। सिल्क का सलेटी सूट और उस पर सिल्क की ही लंबी सदरी, जिसमें एक लंबी सोने की चेन बटनों के साथ लटकी रहती। सिर पर वह लाल पहाड़ी टोपी पहने रखता। सेहत भी अब नेताओं जैसी हो गई थी। कभी दुबला-पतला चौधरी अब काफी मोटा हो गया था। मुँह भरा हुआ था। छोटी बारीक मूँछें उसे खूब जचती थी। पेट आगे निकल गया था। हाथों की उँगलियों पर कई महँगे नगों की सोने की अँगूठियाँ सजी रहतीं। जब इधर-उधर जाता तो हाथ में चमड़े का बैग और जेब में महँगा मोबाइल रहता।

उसकी चार बेटियाँ थीं और सबसे बाद लड़का हुआ था। तीन बेटियों की शादियाँ बड़े धूम-धाम से की थी। दहेज में खूब सोना-चाँदी और दूसरी चीजें दी थीं। देता भी क्यों न, गरीबों का खूब खून जो चूसा था। चौथी बेटी अपंग पैदा हुई थी। उसके इलाज पर उसने बहुत खर्च किया पर कोई फायदा न हुआ। उसकी दाईं टाँग छोटी थी। यही कारण था कि उसका कहीं रिश्ता न हो सका था। लेकिन बेटी से उसने दसवीं करवा ली थी जो अब दुकान का काम सँभालती थी। गाँव का ही एक लड़का उनके पास नौकर था। चौधरी के लिए बेटी की अपंगता एक तरह से वरदान साबित हुई थी। इसीलिए वह निश्चिंत होकर इलाके में राजनीति करता रहता था। एक-दो बार प्रधान के चुनाव भी लड़े और दोनों बार जीत गया। तीसरे चुनाव को प्रधान की सीट आरक्षित हुई तो वह अब दूसरी पार्टी के साथ हो लिया। अब तो हर चुनाव में उस इलाके की राजनीति उसी के इर्द-गिर्द घूमती थी।

चौधरी हरिसिंह को यह बात काँटे की तरह खटकती थी कि कभी बालदू मिस्त्री ने न तो उससे कर्ज लिया और न उसकी औरों की तरह कभी परवाह ही की। उसकी दुकान से सौदा जब भी लिया तो नकद ही लिया। कभी-कभार थोड़ी-बहुत उधारी हुई भी तो उसे महीने-दूसरे महीने चुका दिया। बालदू की घरवाली हालाँकि चौधरी की जमीन में मेहनत-मजदूरी अवश्य करती रहती पर अपनी इज्जत पर कभी आँच न आने दी। उसके तेज-तर्रार तीखे मिजाज देख कर चौधरी ने भी कभी उसकी मजदूरी नहीं रखी। बालदू के पास जो जमीन थी हालाँकि वह बहुत थोड़ी थी पर थी अब्बल किस्म की। दूसरे गाँव में जहाँ बस अड्डा बन रहा था उसकी एक घासणी और दो खेत उससे लगते थे। चौधरी की आँख तभी से उस जमीन पर गड़ी थी जब से सड़क का सर्वे गाँव तक हुआ था। उसने कई बार और कई तरह से बालदू को रिझाने की कोशिश भी की कि वह उस जमीन को बेच दे लेकिन बालदू ने हमेशा चौधरी की बात या तो मजाक में टाल दी या करारा जवाब दे दिया। यह बात उसे भीतर ही भीतर कचोटती रहती थी। इसलिए भी कि गाँव तो क्या अब तो दूर-दूर के इलाकों में भी चौधरी की बात कोई टाल नहीं पाता था और फिर बालदू जैसे छोटी जात के आदमी की भला औकात ही क्या? पर चौधरी को उसकी औकात का मालूम था। कई तरह के हथकंडे अपनाने के प्रयास भी उसने किए थे लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात ही निकले। अब उसकी नजरें बालदू की जवान बेटी पर थी कि उसकी शादी-ब्याह के लिए तो उसे चौधरी के पास ही आना पड़ेगा।

गाँव-इलाके में चौधरी हरिसिंह के लड़के की खूब चर्चा होने लगी थी। चौधरी ने अपने लड़के की विदेश में पढ़ाई करवाई थी। वह अब लौट कर गाँव आ गया था। सुना है उसने सरकारी नौकरी के बजाए शहर में करोड़ों का कर्ज लेकर एक कंपनी खोली थी जिसमें तरह-तहर की मिट्टी खोदने और उठाने की मशीनें लाई गई थीं। मशीनें ऐसी कि बीस-बीस मजदूरों का काम एक घंटे में कर दे। गाँव परगने में ही नहीं, शहरों तक की सड़कों और मकानों के निर्माण के ठेके उसे ही मिलने लगे थे। उसने गाँव में अपना पुराना मकान पूरी तरह गिरा कर नया बना लिया था। तीन मंजिले इस मकान में तीस से ज्यादा कमरे थे और सभी में संगमरमर बिछा था। यही नहीं अब तकरीबन गाँव और इलाके का हर संपन्न व्यक्ति उसी से अपना घर भी बनवाने लगा था।

गाँव के लिए जो सड़क निकल रही थी उसका ठेका भी चौधरी के लड़के को ही मिला था। वह भी कई बार बालदू की जमीन की बात अपने पिता से कर चुका था। वह चाहता था कि यदि यह जमीन उसे किसी भी कीमत पर मिल जाए तो वह वहाँ अपना कारोबार स्थापित कर सकता है। बालदू की एक घासणी में रोड़ी के लिए अच्छा पत्थर मौजूद था और इस पर चौधरी के लड़के की आँख लगी थी। वह किसी भी कीमत पर उसे हासिल करके वहाँ क्रशर (रोड़ी बनाने की मशीन) लगाना चाहता था।

चौधरी और उसके व्यवहार में रातदिन का अंतर था। चौधरी जहाँ गाँव के माहौल के मुताबित ढल-पड़ जाता वहाँ उसका लड़का किसी की परवाह नहीं करता था। बोलचाल में भी कोई शालीनता नहीं थी। वह जब भी गाँव आता तो अपनी हेकड़ी में रहता। गाँव के बड़ों को तो वह क्या सम्मान और आदर देता पर उल्टा सोचता कि बूढ़े-बुजुर्ग और उनके बीबी-बच्चों तक उसे नमस्ते करें या पाँव छूऐ। गाँव के लोग बेचारे ऐसा करते भी थे। पर बालदू और उसके परिवार ने कभी उससे मुँह ही नहीं जोड़ा।

एक दिन उसने चौधरी के साथ बालदू के घर जाने की इच्छा जाहिर की। चौधरी ने उसे बहुत समझाया कि मिस्त्री अपनी जमीन कभी नहीं देगा, पर वह नहीं माना। मजबूरन चौधरी को उसके साथ आना पड़ा।

इतवार का दिन था। बालदू अपने आँगन में बैठा अनारदाना सुखा रहा था। रामेशरी चाची और अमरो कटे हुए दाड़ुओं (छोटे खट्टे अनार) से अनारदाना निकाल रही थी। अचानक चौधरी को आँगन में आते देख वे हैरान रह गए। बालदू ने चौधरी को प्रणाम किया। रामेशरी चाची ने भी उसके पाँव छूए। अमरो ने दोनों हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और भीतर जाकर मंजरी ले आई। चौधरी तो बैठ गया पर उसका लड़का इधर-उधर ताक-झाँक करता रहा। बालदू ने ही पूछ लिया, 'चौधरी जी इनको नहीं पैचाणा।'

चौधरी के चेहरे पर यह सुनते हँसी पसर आई जिसमें घमंड की छोंक ज्यादा थी, 'बई मिस्त्री तू कैसे पैचानता। मेरी-तेरी तरह ये गोबर-मिट्टी में रहा ही कहाँ है। छोटा सा था तो अपनी मासी के पास शहर पढ़ने चला गया। अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा। फिर मैंने विदेश इंजीनीयरिंग करने भेज दिया। मेरा बेटा सुमेर चौधरी है बई। आज लाखों-करोड़ों का कारोबार है इसका।'

बालदू तारीफ सुन कर हल्का सा हँस दिया और कुछ पल उसको देखता रहा। वह अभी भी गर्दन ताने खड़ा था। बालदू को कुछ अटपटा लगा। कुछ बोलता तभी अमरो भीतर से एक छोटी सी दरी ले आई और मंजरी पर बिछाते हुए बोल पड़ी, 'यहाँ बैठ जाओ छोटे चौधरी। अब म्हारे घर मेज कुर्सी तो है नहीं। गोबर-मिट्टी के लोग हैं। रहते-बसते भी इसी के बीच है।'

यह कह कर वह भीतर चली गई पर उसकी बातें छोटे चौधरी को ज्यादा ही चुभ गई। वह जूते समेत उस दरी पर धँस गया। पर नजरे अमरो का पीछा भीतर तक करती रही।

दरी मंजरी पर बिछाते छोटे चौधरी के मुँह से शराब की बास का एक भभका इस तरह अमरो के नाक में घुसा कि वह भीतर जल्दी न जाती तो वहीं उल्टी कर लेती। बालदू ने भी ताड़ लिया था कि वह शराब पीए हुए है। वह मन ही मन सोचता रहा कि चौधरी ने अच्छे संस्कार दिए है अपने लड़के को कि बाप की भी लिहाज नहीं रही...?

बालदू ने पहल की, 'कैसे आणा हुआ चौधरी जी आज?'

'बई बालदू! तेरे से एक विनती करने आए है। पहले भी कई बार बात की पर तू नी माना। देख बालदू गरीबी बुरी चीज होती है। अपणा घर देख, कितणा पुराणा हो गया है। ऊपर अब घास भी नहीं रही। अब तो जमाना पक्के मकानों का है। है किसी के घास के घर गाँव में? उस पर जवान बेटी ब्याहणे को। जमाना बुरा है मिस्त्री। ऊपर से इतणी महँगाई। मेरा बेटा चाहता है कि तू सड़क के साथ लगती अगर अपणी घासणी बेच दे तो मुँह माँगी कीमत दे देंगे।'

बालदू की समझ में सारी बात आ गई थी। पर अमरो को ये बातें मन को लग गई। बालदू कुछ बोलता, अमरो ने दरवाजे पर से टोक दिया, 'चौधरी चाचा! रोटी और बेटी इतनी बुरी बी नी होती कि उनके लिए जमीन ही बेच दी जाए। भगवान ने जब दो हाथ दिए हो तो न कोई गरीब रहता है न मरता ही है। जिनके खेत और घासणियाँ आपने अपणे करवा लिए वे कौण से साहूकार हो गए।'

अमरो की बातें चौधरी और उसके बेटे पर तमाचे की तरह पड़ीं। चौधरी से कुछ अब बोलते नहीं बन रहा था। उसके बेटे के मुँह और आँखों में खून तैरने लगा था। वह एकदम ऐसे खड़ा हुआ मानो किसी कीड़े ने काट दिया हो। खड़े होते ही उसने मिस्त्री को कालर से पकड़ लिया, 'ओए मिस्त्री! तेरी ये लड़की क्या सोचती है कि मेरे बाप ने लोगों की जमीनें उनसे छीनी है। अरे खुद दरवाजे पर आकर दे गए वो... नहीं तो जेल में सड़ते रहते। तू अपनी बात कर बे ओ मिस्त्री। मेरे को घासणी चाहिए किसी भी कीमत पर। बोल कितने लाख दूँ तेरे को। ...बोल ...बोल ...अभी तेरे मुँह पर पाँच-दस लाख मार दूँगा।'

बालदू ने कभी सोचा भी न था कि चौधरी का लड़का इतना बेशर्म और बिगड़ैल होगा। वह उसकी हरकत से भौचक्क रह गया। भीतर रामेशरी चाची और अमरो की समझ में भी कुछ नहीं आ रहा था। चाची का हाथ अचानक दराट पर पड़ा पर अमरो ने रोक दिया।

छोटे चौधरी ने अभी भी बालदू की कमीज का कालर पकड़ा हुआ था। अब बालदू के रहा नहीं गया। पानी गले तक ही हो तो अच्छा है, सिर से ऊपर चढ़े तो... एक ही झटके में छोटा चौधरी आँगन की मुंडेर पर धड़ाम से गिर गया। पास बालदू का हुक्का पड़ा था। उसके हाथ वही लगा और उसे हाथ में उठाकर मार ही देता अगर चौधरी हाथ न पकड़ता। उसने खुद भी न सोचा था कि बात यहाँ तक बढ़ जाएगी।

'मिस्त्री क्या करता है यार। जवानी का खून है बई। रहणे दे। मत दे तू जमीन। हमारे लिए कहाँ कमी है। अपणे पास रख। उजड़ रहने दे। तू भूखा-नंगा मरे या जीए म्हारे को क्या। तेरे भले की बात थी। हमारा कौन सा तेरी जमीन या घासणी के बगैर कारोबार बंद हो जाएगा।'

छोटा चौधरी अभी भी पूरी तरह सँभल नहीं पाया था। न इस काबिल रह गया था कि पीछे हट कर कुछ बकता या हाथा चलाता। चौधरी हरिसिंह ने ही उसे सँभाला था। उन्होंने अब वहाँ से निकलना ही ठीक समझा। पर आर-पार के घरों के लोगों को इसकी भनक लग गई थी कि बालदू के आँगन में कुछ हुआ जरूर है। दो-चार तो आँगन तक पहुँच भी गए थे। पर इस घटना पर किसी ने मुँह नहीं खोला। गाँव-इलाके में यह पहली घटना होगी जब किसी ने चौधरी हरिसिंह को अपने आँगन में इतना करारा जवाब दिया था।

चौधरी का गुस्सा अपने लाल पर ही फूट पड़ा था। वह जोर-जोर से उसे कुछ कहते हुए चला जा रहा था। उसके पीछे लडखड़ाते हुए उसका बेटा था। चौधरी शायद इस बात को लेकर शर्मिंदा था कि आज उसका नाम कहाँ तक पहुँचा है पर इस दो टके के मिस्त्री ने बेटे पर हाथ उठा दिया। दूसरे पल वह यह भी सोच रहा था कि बेटे की ही गलती थी। कोई ऐसे भी किसी के गिरेबान तक पहुँच सकता है। लड़का तो पहले ही नशे में था। अब ऊल-जुलूल बके जा रहा था।

बालदू को खुद भी पता नहीं रहा कि यह सब कैसे हो गया? मन में डर भी बैठ गया कि कहीं चौधरी पुलिस न बुला दे। पर उसने ऐसा किया ही क्या था? पहल तो चौधरी के लड़के ने ही की थी।

रामेशरी चाची ने अब पहले से ज्यादा काम करना शुरू कर दिया था। वह कई जमींदारों की जमीन में काम करने लगी थी। अमरो भी उसके साथ काम करती। कई बार वे दोनों अलग-अलग जगहों पर होती। पर जमींदारों से इतना भी न मिलता कि बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ अच्छी रोटी भी मिल जाए। वे जिन घरों में घास कटाई या साल-फसल इकट्ठी करने का काम किया करतीं, वहाँ के मर्द अब पहले जैसे नहीं रहे थे। न तो काम के हिसाब से पैसे ही मिलते और न ही कोई इज्जत। एक दिन तो हद ही हो गई जब चौधरी हरिसिंह के छोटे भाई ने फसल को भीतर भरते चाची की बाँह पकड़ ली और छाती पर हाथ मार दिया। रामेशरी का खून खौल गया और उसने सिर पर उठाया अनाज का बोरा नीचे पटक कर उल्टे हाथ का तमाचा जड़ दिया। वह किसी को कुछ नहीं बोल पाया कि उसके साथ क्या कुछ घटा था। रामेशरी के लिए किसी के घरबार काम करने का वह आखरी दिन था। उसने यह बात किसी को नहीं बताई थी। बालदू को भी नहीं। सोचती कि इज्जत जितनी ढकी रहे उतनी अच्छी।

इतना ही नहीं उसकी बेटी के साथ भी वैसा ही कुछ हुआ था। अमरो भी इधर-उधर गाँव में काम करने जाती रहती थी। एक दिन चौधरी के बड़े भाई के लड़के ने, जो जिला परिषद का सदस्य भी था और उसी के पास रहता था, गौशाला के पास घास छोड़ते अमरो से छेड़छाड़ कर ली। शाम ढल रही थी। उसने खूब शराब पी रखी थी। उसके साथ पार्टी के दो-तीन मुश्टंडे भी थे। अमरो पहले चुप रही। लेकिन जब उसने अमरो को पकड़ कर गौशाला के भीतर ही खींचना चाहा तो उसके सब्र का बाँध टूट गया। उल्टी दराटी का ऐसा वार किया कि लड़के के दो दाँत ही जाते रहे। अमरो घबराई सी घर पहुँची तो रामेशरी चाची के होश उड़ गए। उसके हाल देख कर वह हक्की-बक्की रह गई। हाथापाई में अमरो का कुर्ता छाती पर से नीचे तक उधड़ गया था। बहुत देर तक वह माँ के गले लग कर रोती रही। फिर रुँधे स्वर में विनती करने लगी,

'अम्मा! मुझे नहीं करना है इन लफंगों के घर काम। इससे तो अच्छा है मैं ढाँक से छलाँग लगा कर मर जाऊँ।'

चाची का हृदय जैसे चीर गया। बेटी को जैसे-कैसे सँभाला। पर अपने गुस्से पर कैसे काबू रखती। दराट उठा कर जैसे ही बाहर निकलने लगी, बेटी ने रोक दिया।

'अम्मा! किस-किस से लड़ते रहेंगे हम। लोग गरीबों को ही कसूरवार मानते हैं। पर, मैंने उसके किए की उसको सजा तो दे दी है न। तू, मत जा।'

पर रामेशरी चाची कहाँ मानने वाली थी। उसका पति घर में होता तो भी बात बन जाती। उस दिन वह भी वहाँ नहीं था। आग-बबूली, पगलाई वह जब चौधरी के आँगन पहुँची तो सबसे पहले उसके बदमिजाज लड़के से ही सामना हुआ। वह चाची को देख गीदड़ की तरह भीतर भाग गया और घर का दरवाजा बंद कर दिया। उसको देख चाची का पारा सातवें आसमान पर। आँगन में गरज गई रामेशरी,

'चौधरी! अपने इस हरामी को बाहर कर। देखती हूँ इसकी माँ ने कितणा दूध पलाया है इस लफंगे को। अमरो ने तो इसके दो दाँत ही तोड़े हैं, मैंने इसकी गर्दन न काट दी तो रामेशरी न बोलियो। हम गरीब जरूर है चौधरी पर इज्जत नी बेची है। मेहनत का खाते-कमाते हैं। भीख नी माँगते किसी से। तेरे घर का काम इसलिए नहीं करते रे चौधरी की उसके बदले तुम म्हारी गाँव की बहू-बेटियों की भी परवा भी न करो। काहे की परधानी है रे तेरी और काहे को इस अपणे कपूत को सिर पर चढ़ा दिया। क्या यही करता है रे लोगों की सेवा तेरा लाल। निकाल इसको बाहर, फिर देख इसकी मैं क्या गत बणाती हूँ।'

चौधरी घर की खिड़की से रामेशरी चाची के तेवर देख कर डर गया। वह पूरी चंडी लग रही थी। घर के बाकि लोग कहीं भीतर दुबक गए थे। चाची के चीखने की आवाजें जब दूसरे घरों ने सुनी तो कई आँगन-पिछवाड़े से झाँकने लग गए। बात बिगड़ती देख चौधरी ने हिम्मत जुटाई और आँगन में आकर रामेशरी चाची के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया,

'लड़के से गलती हो गई रे रामेशरी। गलती हो गई। आज की औलाद छोटा-बड़ा, गाँव-बेड़ कहाँ देखते हैं। नहीं देखते। बाप की कमाई है न। लाट साहब बणे फिरते हैं। देख रामेशरी, मेरी टोपी की इज्जत रख दे। तेरे पाँव पड़ता हूँ। मेरे को माफ कर।'

चौधरी का लड़का उस समय वहीं पर था पर चुपचाप चुपचाप भीतर दुबका रहा। आज उसे अपने ऊपर ही शर्म आ रही थी कि इतने पैसे-धेले वाले होते हुए भी वह एक दो टके की औरत से जलील हो रहे हैं। पहले इस औरत के घरवाले से जलील हुए और अब यह आँगन में ही आ धमकी। उसे पहली बार अपनी कंपनी, अपनी विदेशी पढ़ाई-लिखाई, हजारों-लाखों के बैंक खाते दो पैसे के भी न लगे थे। रामेशरी की गालियाँ उसके कानों में गर्म सलाखों की तरह पड़ रही थी। एक मन करता कि अपने छोटे भाई को गोली से उड़ा दे, पर इससे ज्यादा गुस्सा उसे उस औरत पर आ रहा था। चौधरी के हाल भी कुछ ऐसे ही थे। अपनी इज्जत बचाने के लिए उसने चाची से दिखावे की माफी तो माँग ली पर भीतर ही भीतर जलता-भुनता रहा।

अब चौधरी जैसा बड़ा इज्जतदार आदमी हाथ ही जोड़ दे तो चाची कैसे न माने। मानना पड़ा। कहाँ चौधरी और कहाँ चाची का परिवार। पर गलत तो गलत ही है न। चाची ने अब वहाँ से लौटना ही ठीक समझा। चली तो आई, पर मन में खुशी भी कम नहीं थी। भीतर अपने साथ हुई बतमीजी की आग भी कई दिनों से जल रही थी। चौधरी का कलेजा इस अपमान से भभक उठा था। उसकी रातें यही सोच कर कटती कि इन नीचों और हरामियों का क्या किया जाए? चाची के मन में भी एक बड़ा डर घर कर गया था। इसी वजह से अब चाची ने बेटी को कहीं काम पर भेजना बंद कर दिया था।

चौधरी के लड़के ने बालदू को काम न देने के लिए गाँव के मजदूरों को भी अपने पास काम नहीं कर दिया। उसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से परेशान करने की कोशिशें करता रहा। इतना ही नहीं रामेशरी चाची और अमरो के साथ जो बतमीजी हुई उसमें भी उसी का हाथ था। लेकिन वह कभी सामने नहीं आया और इन कामों को दूसरों के कंधों पर अंजाम देता रहा पर हर बार मुँह की खानी पड़ी।

कई दिनों से घर पर ही बैठी देख बालदू ने रामेशरी चाची को टोक ही दिया, 'लाड़ी! क्या बात है बई, आजकल बड़ी राणी बण के बैठी रहती है। खुद तो क्या कमाणा पर अपणी इस राणी को भी कहीं आणे-जाणे नहीं देती। क्या कोई सरकारी नौकरी लग गई है दोनों की।'

पहली बार काम के लिए अपने पति से ऐसी बात सुनी थी रामेशरी ने। ताने तीर की तरह कलेजे में चुभ गए। पर वह खून का घूँट पी कर रह गई।'

उसकी चुप्पी ने बालदू का गुस्सा और बढ़ा दिया। गुस्सा तो कुछ और था। वह भी कहाँ काम पर जाता था। पर आज भीतर का गुस्सा पत्नी पर ही फूट पड़ा था। रामेशरी को भनक तक न लगी कि उसके बाएँ गाल पर कब बालदू का भारी भरकम हाथ पड़ गया। वह हक्की-बक्की रह गई। ऊपर से गंदी-गंदी गालियाँ,

'राँड़ महाराणी बन के बैठी रहती है। न खुद कुछ करती है न अपनी इस लाडली को कुछ कमाणे देती। गाँव में जमींदारों का इतणा काम पड़ा है उसको करते अब तुम्हारे को शर्म आने लगी है। मेरे से नी होता अब कुछ कि तुम्हारे को बैठ के खिलाया करूँ। रंडी निकल जा यहाँ से और इन अपणे जायों को भी साथ ले जा...।'

रामेशरी जब से इस घर में ब्याही है शायद ही कभी पति से जुबान लड़ाई हो। यहाँ तक कि कभी सिर उठा कर आँख न मिलाई। पर आज तो जैसे उम्र का कमाया चूल्हे में चला गया। बालदू ने जैसे ही दूसरा चाँटा मारना चाहा, रामेशरी ने हाथ पकड़ लिया। फिर इतने जोर का झटका मारा कि वह दहलीज पर चपाट जा गिरा। इस अप्रत्याशित वार के लिए वह कतई तैयार न था। इससे पहले कि वह सँभल पाता, रामेशरी ने चूल्हे की पठाई से एक लकड़ी उठा ली और बुरी तरह बिफर गई,

'तू क्या चाहता है रे तेरी औरत और जवान बेटी गाँव के इन कमीणें पंडतो-ठाकुरों के घर अपना पसीना भी बहाए और उनके बिस्तर भी तपाती रहे। सुण ले तू! हमारे से ये काम नी होता। मैं भूखी मर जाऊँगी पर किसी के घर न आज के बाद खुद काम करूँगी और न अमरो को कहीं भेजूगी। तेरे से हम यहाँ नी सहन होते तो बहुत ढाँक-ढँकार है गाँव में, छलाँग लगा कर खुद भी मरूँगी और इन तेरे बच्चों को भी मार दूँगी। सुणा तैने।'

और इसके साथ ही वह बुरी तरह बिलख पड़ी थी। अमरो ने ही बात सँभाली थी। मुश्किल से माँ का गुस्सा ठंडा किया था।

बालदू के कानों में पत्नी की बात गर्म तेल की तरह पड़ी। कलेजे में जैसे किसी ने नश्तर मार दिया हो। वह जैसे दहलीज के पास पड़ा था वैसे ही अधमरा सा हो गया। उसकी सारी की सारी मर्दानगी जाती रही। उसने बाँहों के घेरे में सिर रख कर दहलीज पर टिका दिया। एक पल के लिए आँखों के पास अँधेरा छा गया। कुछ नहीं सूझ रहा था। फिर अचानक लगा कि उसके आँगन मे पीछे से वे लंबी गर्दनों वाली मशीने रेंगती चली आ रही है। एक मशीन ने उसे अपने जबड़ों में भर कर आँगन से नीचे फेंक दिया है। फिर उसे लगा कि उसकी औरत और बेटी के पीछे गाँव-परगने के मुश्टंडे भाग रहे हैं। कुछ मनचलों ने उसकी जवान बेटी के कपड़े तक फाड़ दिए हैं। वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा है। अपना सिर दहलीज पर पटक रहा है। यह देख कर रामेशरी चाची घबरा गई थी। अमरो, जो कहीं बाहर थी पिता के पास पहुँची तो देख कर हैरान रह गई कि माथे से खून बह रहा है। वह और उसकी माँ बालदू को मुश्किल से उठा कर चूल्हे के पास ले आई। वह सुबक सुबक कर बच्चों की तरह रोते हुए कह रहा था,

'रामेशरी! मुझे माफी दे दे। मेरी वजह से तुमको दूसरों की चौखट पर काम करना पड़ा। मेरी जवान बेटी को भी। तुम आज के बाद कहीं काम पर नहीं जाना। मैं करूँगा सब कुछ। जैसे भी होगा।'

रामेशरी चाची को अपने किए पर पछतावा हो रहा था कि क्यों उसने अपने पति को खरी-खोटी सुनाई। पर और चारा भी क्या था उसके पास। माँ-बेटी दोनों ने बालदू को सँभाला था। उसे ढाँढ़स बँधाया था। वह उठ कर चूल्हे के पास भीत का ढाँसना लगा बैठ गया और सिर घुटनों के बीच ठूँस दिया। कई विचार मन में आने-जाने लगे। एक मन किया कि इस गरीबी से मर कर ही छुटकारा ले लें। उसके सामने कई ऐसी घटनाएँ घूमने लगी थीं।

उसी के पंचायत के एक कुम्हार ने अपने दो बच्चों और बीबी को तीन महीने पहले जहर देकर मार दिया और खुद भी खा कर जान दे दी थी। उसकी चार परगनों में खूब साख थी। इज्जत-परतीत थी। उसकी तरह मिट्टी के बर्तन कोई नहीं बना सकता था। चौधरी ने किसी बैंक से उसे कामकाज बढ़ाने के लिए एक लाख रुपये का कर्ज दिलवाया था। लेकिन मिट्टी के जितने बर्तन उसने बनाए, घर में धरे के धरे रह गए। किसी ने नहीं खरीदे। अब मिट्टी के बर्तन लेता भी कौन है। कुम्हार न अपना हुनर बेच पाया न ही बैंक की किश्तें समय पर दे सका। दो साल बाद वही रूपया दुगुना हो गया। एक दिन जमीन-जायदाद की कुड़की का नोटिस बैंक वाले दरवाजे पर चिपका गए। कुम्हार के ऊपर जैसे बिजली गिर गई। कईयों के दरवाजे गया कि कुछ पैसा ही उधार मिल जाए। चौधरी ने भी मदद नहीं की। वह करता भी क्यों, उसी का किया-धरा था सब। बस अपने समेत पूरे परिवार को खत्म करने का ही रास्ता सूझा था कुम्हार को। यह ऐसी घटना थी जिसने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया था। लेकिन चौधरी की तो जैसे लाटरी लग गई थी। उसने कुड़की का सारा पैसा चुका कर कुम्हार का घर और जमीन अपने नाम करवा ली थी।

बालदू के मन में भी यही विचार कौंधा था। सोच रहा था कि कैसा बुरा वक्त उन पर आ बैठा है। न कामकाज है, न हाथ के हुनर की कद्र है और न गाँव-बेड़ अपना रहा है। कितना कुछ बदल गया है। जो गाँव कभी साक-संबंधों, प्यार-प्रेम, एक दूसरे की मदद के लिए जाना जाता था उस पर किस की बुरी नजर लग गई है। जहाँ न किसी के साक-संबंध रहे, न किसी की इज्जत-परतीत। पर क्या मुसीबतों से भागना अच्छी बात है? उसके पास भले ही थोड़ी सी जमीन है पर है सड़क के साथ लगती। आज चौधरी जैसे कइयों की आँख उस पर है। मुँह माँगी कीमत देंगे उसकी। ...यह सोच कर वह कुछ पल के लिए मन ही मन अमीर हो गया था।

वह अपने हाथों को देखने लगा था जिसमें न जाने कितना हुनर कभी हुआ करता था। पर बिना काम के वह जाता रहा। उसने दोबारा मिस्त्री का काम ढूँढ़ने का प्रयास किया पर सफलता नहीं मिली। गाँव-परगने में चौधरी के लड़के के सारे काम चल रहे थे। वहाँ तो बालदू को काम मिलने से रहा था। पर एक दो जगह दूसरे परगने में बाहर से आए कुछ ठेकेदार और सिमेंट के मिस्त्री काम कर रहे थे। यह काम उन जमींदारों के घरों का था जिनसे चौधरी परिवार की पटती नहीं थी। वह उनके पास जा कर बेलदारी का काम करने लगा था उसने अपने मन से यह बात निकाल दी थी कि वह कभी इतना बड़ा मिस्त्री भी हुआ करता था। अब सवाल दो जून रोटी का था। चौधरी और उसके लड़के जैसे कमीनों से अपना घर-बार बचाने का था। उसने रात दिन काम करना शुरू कर दिया। दस से पाँच तक के काम के बाद जितने घंटे लगते उसे उसके भी पैसे मिल जाते थे। इसलिए वह देर रात तक काम करता और वहीं रह जाता। कुद दिनों की मशक्कत के बाद घर ठीक चलने लगा था।

रामेशरी और अमरो भी कहाँ चुप बैठने वाली थी। बालदू के काम करने से उनकी हिम्मत भी बढ़ गई और उन्होंने भी इधर-उधर काम करना शुरू कर दिया था।

बालदू ने अपने दो कमरों के घर को कभी करीब से देखा ही नहीं था। एकाएक उसे चौधरी की बात याद आ गई। आज तीनों आँगन में खड़े होकर उसके मट्कंधों को देखने लगे तो हैरान रह गए। उसकी एक दीवार गिरने के कगार पर थी। ऊपर से घास की छान भी गलने लगी थी। पानी की रिसाई भीतों को पीछे की तरफ से गीला करने लगी थी। कई जगह से पलस्तर उखड़ गया था। सिर ढकने के लिए एक घर था वह भी जाता रहेगा यदि समय रहते मरम्मत नहीं हुई तो। आगे बरसात आने वाली है फिर उसमें घर कहाँ बचने वाला। वे तीनों कई पल बुत से बने खड़े रहे। बालदू भूल गया था कि पटवारी घर के लिए पैसे देने की भी कोई बात कर गया था। अमरो ने ही समाधान किया था,

'अरे पिता! ऐसे क्या देखते हो। दीवार को मत देखो, अपने हाथों को देखो पिता जिसमें आज भी वह कारीगर छिपा है। हम धीरे-धीरे खुद घर बनाएँगे और वह भी मिट्टी का। बिल्कुल धीरे-धीरे। देखना वह सबसे न्यारा बंगला होगा। फिर पटवारी अंकल पैसे देने की बात तो कर ही गए हैं।'

बेटी की बात सुन कर वह कुछ पल चुप रहा। फिर एक नजर पत्नी के चेहरे पर दी और दूसरी बेटी पर। वे दोनों मुस्करा रही थीं, जैसे माँ-बेटी ने पहले से ही यह योजना बनाई हो। बालदू को उनकी आँखों में खूब विश्वास भरा दिखा था। उसने दोनों हाथ सामने ऐसे किए जैसे किसी चीज के लिए अँजुरी भर रहा हो। हथेलियों पर जगह-जगह छालों के काले निशान थे, जो अब पक्के होकर स्थायी हो गए थे। उन निशानों में बरसों की मेहनत छिपी थी। एक मिस्त्री की कारीगरी छिपी थी। उसके भीतर अनायास ही इतनी हिम्मत जुट गई कि वह अभी से घर का काम शुरू कर दे।

वे तीनों आँगन के साथ सटे खलिहान की मुंडेर पर बैठ गए थे। बालदू ने अपने घर की तरफ देखा तो दाईं तरफ चिड़िया का घोंसला दिखाई दिया। तभी बाहर से एक चिड़िया चोंच में लेकर कुछ आई और घोसले के पास पहुँचते ही भीतर से कई चोंचे बाहर निकल पड़ी। वह पंछियों के इस परिवार को काफी देर देखता रहा। फिर नजरें दोनों बच्चों की तरफ गई जो खलिहान के दूसरे छोर पर बैठे स्कूल का काम कर रहे थे। उनके आसपास बिल्लियों के तीन बच्चे उछल-कूद कर रहे थे। बच्चों का ध्यान किताबों पर कम और उनकी शरारतों पर ज्यादा था। अनायास ही बालदू की आँखें भीग आईं।

रामेशरी चाची दूर-पार आसमान को छूती धार को देख रही थी जो कई छोटी-बड़ी धाटियों से गूँथीं थीं। इसी धार से घास पकने पर रामेशरी और उसकी बेटी कभी घास काट कर पशुओं को लाती थी। यह एक सरकारी घासणी थी। जब यह खुलती तो कई गाँव की औरतें और मर्द इससे घास काटते थे। रामेशरी ने एक नजर गौशाला की तरफ दी। और दूसरी उस धार पर, हल्के भूरे रंग की घास से भरी उस धार पर ढलते सूरज की रोशनी चमक रही थी। जैसे रामेशरी और उसकी बेटी को अपने पास बुला रही हो। रामेशरी उठी और भीतर कुछ टटोलने लगी। कुछ देर में वह बाहर आई और हाथ में दो दराटियाँ थीं। बेटी समझ गईं कि कल से घास काटने जाना है।

दूसरे दिन तड़के ही माँ-बेटी सबसे पहले घासणी में पहुँच गई। गाँव की दूसरी औरतें उन दोनों को देख कर हैरान हो गई। लेकिन उन्होंने मन की बात किसी को नहीं बताई। ...और महीने भर घास काटने और ढोने पर उन दोनों ने अपने घर के सामने वाले दो पेड़ों पर लंबी लंबी घास की कई गडेड़ें लगा दीं। एक दिन पशुओं का व्यापारी घास खरीदने आया तो एक-एक गडेड़ तीन-तीन हजार की बिकी।

बालदू ने अब अपना घर बनाने की योजना बना ली थी। अमरो ने पिता से घर के बारे में खूब चर्चा की थी और अपने हाथ से इसका नक्शा भी तैयार कर लिया था। वह पिता को समझाती कि हमारा घर भले ही छोटा हो लेकिन हो सबसे न्यारा। ऐसा कि सब देखते रह जाए।

वे तीनों धीरे धीरे घर बनाने में जुट गए। इस बार उन्होंने अपने नए घर की नींव बिना मुहूर्त निकाले और पंडित बुलाए ही रख दी। नींव के लिए कुदाली से 'खणाही' जिस रोज करनी थी, बालदू सपरिवार ऐन तड़के तैयार हो गया। रामेशरी, अमरो और दोनों बच्चे भी नहा-धोकर इस शुभ अवसर पर साथ थे। अमरो ने ही यह सारी योजना सुझाई थी। वह इस हक में नहीं थी कि घर के लिए पहले पंडितो के चक्कर काटो और फिर वास्तु का पत्थर ढूँढ़ कर पूजा-पाठ पर पैसा बर्बाद करो।

बालदू ने बेटी के हाथ से ही इस शुभ काम को अंजाम दिया। सूरज की पहली किरण के साथ ही अमरो ने जैसे ही पहली कुदाली जमीन पर मारी सभी ने उसको स्पर्श किया। इसी भाव से कि वे इस काम को मिल कर कर रहे हैं। उन्होंने सूरज को साक्षी माना कि उनका काम सिरे चढ़ जाए। और इस तरह उनके घर का काम शुरू हो गया। गाँव के लोगों के लिए यह बात हैरत वाली थी कि बिना मुहुर्त और पूजा पाठ के बालदू मिस्त्री ने घर का काम लगा दिया। गाँव का एक स्याना पंडित मणिराम सबसे पहले बालदू के काम पर आ धमका और धर्म-संस्कार समझाने लगा, 'भई बालदू, तू तो बड़ा मिस्त्री है रे। बीसियों घर बनाए है तैने। क्या कोई बिना सायत-मुहुर्त के भी नींव रखता है। ये तेरे परिवार के लिए अच्छा नहीं है कि हम पंडतों-पुरोहितों की तोहीन हो। गाँव-बेड़ से लेकर परगने तक चर्चा हो रही है कि क्या उस गाँव में कोई बड़ा-बुजुर्ग नहीं है जो बालदू को समझाता। तैने ठीक नी किया बालदू।'

वह कुछ इस तरह नाराजगी जता रहा था जैसे उसके पंडित होने के साथ कोई बड़ी नाइंसाफी हुई हो। इससे पहले बालदू कुछ कहता, अमरो पंडत के सामने आई और कहने लगी,

'दादा! घर हम बना रहे हैं और तोहीन आप लोगों की हुई है। ये बात जची नहीं कुछ। रही साइत-मुहुर्त की बात तो दादा आप तो बड़े पंडत हैं। जरा बताना तो कि आज तक जिन भगवानों और देवताओं की आप पूजा करते-करवाते आए हैं उन्हें आपने कितनी बार देखा है?'

मणिराम ने सोचा भी न था कि बालदू की बेटी इतने तीखे तर्कों से उसे चित कर देगी। प्रश्न ऐसा था कि मणिराम के कुछ बोलते ही नहीं बना, पर भीतर ही भीतर पूरी तरह जल-भुन गया। इतने में कई और लोग भी वहाँ चले आए।

अमरो ने अपनी बात शिष्टता से जारी रखी।

'दादा! ऐसा भी नहीं है कि हमने बिना मुहूर्त और पूजा बगैरह के ही घर का काम शुरू कर दिया। पहली बात तो दादा यह है कि हम ठहरे गरीब लोग। साइत-मुहूर्त होते हैं बड़ी हवेलियों के जहाँ बीस-तीस कमरे हों और फिर घर भी पक्का हो। हमारा तो मिट्टी का मटकंधा है दादा। बस यूँ समझ लो कि सिर ढकने के लिए छोटी सी छत। हम असल में अपने पुराने घर को ही तो नया बना रहे हैं। इसके लिए क्या पूजा और क्या पाठ। पर हमने तो उस देवता-भगवान को अपने काम के लिए साक्षी बनाया है जो हमारी मेहनत की कद्र करता है और सदा हमारे साथ रहता है।'

इस बात पर गाँव के सभी जमा हुए तमाशबीन अमरो का मुँह ताकते रह गए। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

'इस तरह हैरान होने की बात नहीं है! आप भी तो सूरज को देवता और भगवान मानते हो न। उसके लिए न कोई नीच है और न ऊँचा। न अमीर है न गरीब। वह बिना हिचक सभी के पास आता-जाता है। सोचो तो जरा, अगर सूरज न हो तो न दुनिया में हम रहेंगे न वे देवता-भगवान जिनकी आप पूजा करते रहते हैं। बस, हमने उसे ही साक्षी मान कर सुबह की शुभ बेला में काम लगा दिया।'

बालदू की बेटी की बात में कइयों को खूब दम लगा। खास कर ऐसे लोगों को जो अपनी मेहनत की खाते थे। सचमुच जच गई उन्हें अमरो की ये बात। पर मणिराम पंडत जल-भुन कर चलता बना। पता नहीं जाते-जाते क्या कुछ बड़बड़ा रहा था।

बालदू ने अपनी हैसियत के मुताबिक उन्नीस-तेरह हाथ घर की नींव रखी। और बाद में उसके साथ एक रसोई के लिए जगह निर्धारित कर दी। चारों तरफ रस्सी से नपाई की और सूत डाल दिया। अब नींव की चिनाई-भराई शुरू हो गई। बालदू नींव खोदता और बाकी के सदस्य बाँस के ओडलों में मिट्टी उठा कर फैंकते। फिर पत्थर ढो कर बालदू को देते। देखते-ही देखते दो-तीन दिन में नींवों की भराई-चिनाई पूरी हो गई।

अब मटकंधों का काम शुरू होना था। बालदू ने पुराने घर के निचली तरफ अपने खेत के किनारे मिट्टी के लिए गड्ढा खोद दिया। यह मिट्टी उसे घर के लिए उम्दा लगी। इसमें हल्की चिकनाई भी थी जो कूट में ठीक बैठने के लिए अच्छी थी। अब भीत की कुटाई के लिए सामान की जरूरत पड़ी। बालदू के पास सारा सामान था, लेकिन कई सालों से वह छत पर कहीं लावारिस की तरह पड़ा था। आज उस सामान की अपने घर के लिए जरूरत थी। वह छत पर गया और सामान को ढूँढ़ने लगा। पहले लकड़ी की मुंगरियाँ निकाली। उनकी लकड़ी और धार का मुआइना किया। वे बिल्कुल ठीक थीं। उन्हीं के साथ दो फले (तख्ते), एक धड़ा, बाँस की पाँच देवलियाँ और पाँच ही शर रखे थे। उसने उन्हें निकाला, झाड़ा और गौर से देखा। वह हैरान था कि उनमें किसी तरह का कीड़ा या दीमक नहीं लगा था। बाँस की 'देवलों' (तीन छेदों वाली बाँस की लकड़ी) के छेद भी ठीक थे। उसने छत पर ही एक देवल के छेद में शर को डाल कर परखा तो वह फिट बैठ गया। सारे का सारा सामान एक-एक करके वह छत से नीचे पकड़ाता रहा। उसने बहुत पहले से ही पुराने घर की मरम्मत के लिए कुछ सामान जोड़ रखा था। उसमें चीड़ और चूली की कड़ियाँ और कातियाँ थीं। कुछ खैर के पेड़ों की लकड़ी भी थी जो खिड़कियों के ऊपर शल्दर लगाने के काम आ सकती थीं।

खिड़की-दरवाजे बनाने के लिए लकड़ी की अभी भी जरूरत थी। उसने अपने एक पुराने साथी मिस्त्री से इस बावत बात की तो वह इन चीजों को बनाने-देने के लिए राजी हो गया। होता भी क्यों न, बालदू ने ही उसे लकड़ी का मिस्त्री बनाया था और दोनों कितने ही दिनों साथ-साथ काम करते रहे थे। उस मिस्त्री ने अब गाँव के बस अड्डे पर ही एक छोटा आरा लगा लिया था और मिस्त्री के काम का सारा आधुनिक सामान रख लिया था। इसलिए उसका धंधा खूब फल-फूल रहा था। बालदू के लिए वह सचमुच भगवान की तरह प्रकट हुआ था। उसने हालाँकि कभी ऐसी उम्मीद नहीं की थी कि कोई उसकी इतने खुले दिल से सहायता कर देगा।

अब भीत की भराई-कुटाई शुरू हो गई। बालदू ने पाँच हाथ लंबे दोनों तख्तों के एक सिरे पर मिट्टी की रोक के लिए धड़ा लगाया। नींव के ऊपर तख्तों के नीचे से लकड़ी की देवलियाँ लगाकर ऊपर से भी उतनी ही डाल दी। उसके बाद दोनों तरफ से उनके छेदों में शरों को डाल कर तख्तों को अच्छी तरह कस दिया। अमरो मिट्टी खोदती और चाची तथा दोनों बच्चे ढुलाई का काम करते। जैसे ही पहला टोकरा तख्तों के बीच रामेशरी ने गिराया, बालदू ने सूर्य देवता और अपनी कुल देवी को मथा टेक कर पहली मुंगरी मिट्टी में जोर से मारी। धम्म की आवाज हुई और फिर रामेशरी ने भी मुंगरी सँभाल कर कुटाई शुरू कर दी। देखते ही देखते पहला मिट्टी का भीत कूट कर तैयार हो गया। बालदू ने तख्तों को खोला तो मिट्टी के उस भीत की सफाई देखता ही रह गया। बहुत अच्छा बना था।

पहले दिन वे सभी अकेले ही काम करते रहे, लेकिन दूसरे दिन जैसे ही काम शुरू हुआ तो गाँव की दो-तीन औरतें हाथ में मुगरियाँ लेकर उनके पास पहुँच गई। बालदू और रामेशरी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्हें पुराने दिन याद आ गए थे। जब किसी का मिट्टी का घर बनता तो बारी-बारी गाँव के सभी लोग मिट्टी कूटने, ब्वारी(मदद) करने आ पहुँचते। पता भी न चलता कि कब मटकंधे कूट कर छवाई के लिए तैयार हो जाते। आज कुछ ऐसा ही आभास बालदू को हुआ था। उसकी आँखों में अनायास पानी भर आया। इसलिए भी कि उसने आज के इस समय में इस तरह के सहयोग की कतई उम्मीद नहीं की थी। सोचा कि शायद कुछ अपनापन गाँव में बचा है। या फिर बालदू और उसके परिवार ने जो कुछ सहायता दूसरों की थी उसकी कमाई का ही यह फल था।

बालदू के घर के भीत जब जमीन से ऊपर उठने लगे तो चौधरी हरिसिंह और उसके बेटे के कान खड़े हो गए। कहाँ तो वे उसको बर्वाद करने के मनसूबे तैयार कर रहे थे और कहाँ उसने आज उनकी छाती पर मूँग दलने का काम कर दिया। बालदू का घर चौधरी की बेड़ से काफी दूर था पर आँगन-दरवाजे से वह सामने दिखाई देता था। भीत कूटने और मिट्टी-पत्थर की आवाजें सीधी आकर चौधरी के कानों में टकरा जाती थी। उसे लगता था कि मिट्टी की मुगरियाँ उसकी छाती पर पड़ रही है।

बालदू के घर और वहाँ हो रहे काम की पल-पल की खबर रोज कोई न कोई चौधरी को दे देता था। एक दिन चौधरी के रहा नहीं गया और सीधा बालदू के घर पहुँच गया। उसका पूरा परिवार घर के काम में व्यस्त था। खलियान की मुंडेर पर बैठे-बैठे चौधरी ने बालदू पर ताना कसा, 'मान गए रे मिस्त्री तेरे को। दो जून रोटी के लाले पड़े हैं। बेटी बाँस की तरह ऊँची हो रही है और तेरे को महल बनाने की सूझ रही। क्या बात है बई मिस्त्री...।'

यह कहते हुए चौधरी ने खुद ही जोर का ठहाका लगा दिया। चौधरी को बैठे देख अब दो-चार चमचे भी उसके इधर-उधर खड़े हो गए। किसी के हाथ में दराट था जो घास-पत्ती को जा रहा था। किसी की पीठ पर किल्टा था जो अपने खेत में गोबर फेंक कर आ रहा था तो कोई कंधे पर पट्टु की बुक्कल मारे ऐसे ही मजा लेने चला आया था। चौधरी की अब हिम्मत बढ़ गई थी पर बालदू और रामेशरी का रोम-रोम गुस्से से काँप रहा था। एक मन किया कि मुंगरी से चौधरी की खूब कुटाई कर दे पर मुश्किल से अपने मन को संयत किया। इसमें भी अमरो का ज्यादा हाथ था। उसने अपने साथ माँ और पिता को भी शांत रहने के लिए कहा था।

चौधरी ने फिर मन की भड़ास निकाली, 'अरे मिस्त्री! ये मिट्टी-विट्टी के घर को पुराने जमाने की बातें है। मेरे को बोलता तो सरिया-सिमैंट के ढेर लगा देता। तू तो जानता है मेरा लड़का इंजीनियर है। विदेश से पढ़-लिख कर आया है। बीसियों मकान बना दिए है उसने। फिर तेरा तो एक-आध कमरे का था। बोलता तो रात-रात को चिण-चुण के किनारे कर देता। भई रही पैसे की बात, तो तेरे से पैसे थोड़े ही लेने थे। गाँव-बेड़ में इतणा मान तो होता ही है। बस बदले में रामेशरी और अमरो को म्हारे खेत-खलियाण में काम करने लगाए रखता।'

इस पर बालदू ने आपा खो दिया था और किसी को पता नहीं चला कि मिट्टी कूटने की मुंगरी कब उसने चौधरी पर फैंक दी। किस्मत अच्छी थी कि चौधरी के सिर पर नहीं लगी। लगती तो वहीं ढेर हो जाता। मुंगरी चौधरी के साथ एक पेड़ में टकराई और खेत में गिर गई।

चौधरी ने कभी सोचा भी न था कि ऐसा कुछ घट जाएगा। जितने में बालदू नीचे उतरता चौधरी के साथ उसके चमचे भी वहाँ से छू-मंत्र हो लिए। अमरो और रामेशरी ने मुश्किल से बालदू का गुस्सा शांत किया था। वह अभी भी आँगन में हाँफ रहा था। अमरो ने झटपट भीतर से पानी का लोटा लेकर उसे दिया तो वह खड़े गले पूरा गटक गया। थोड़ा सहज हुआ तो बेटी ने समझाना शुरू कर दिया,

'देख पिता! इतना गुस्सा नी करते। ये हरामी तो चाहता ही है कि हमारे काम में कुछ न कुछ अड़चन पड़े। सोच पिता कहीं उसके सिर पर मुंगरी लग गई होती तो लेने के देने पड़ जाते। कुत्ते हैं साले पिता, भौंकते रहते हैं। चल ऊपर चल, काम बहुत है करने को।'

बिटिया की सलाह उसके मन को छू गई थी। उसे एहसास होने लगा था कि कहीं सच कुछ गुरा घट जाता तो वह कहीं का नहीं रहता। क्या करते उसके बच्चे।

इस बात की चर्चा पूरे गाँव में हो रही थी। यह तीसरा अवसर था जब चौधरी जैसे नामी-गिरामी आदमी को बालदू के परिवार से फटकार मिली हो। पहले रामेशरी ने उसकी ऐसी-तैसी की थी और आज बालदू ने रही-सही कसर खो दी। चौधरी तो पागल सा हो गया था। उसने बहुत कोशिश की कि बालदू के काम पर कोई ब्वारी करने न जाए पर इसका उल्टा असर गाँव में देखने को हुआ। पहले दो-तीन औरतें सहायता के लिए आया करती पर अब तो हर घर से बारी-बारी रोज कोई न कोई चला आता और देखते ही देखते काम निपटता रहता।

बालदू ने इस घर को पहले बने मकानों की तरह नहीं बनाया। इसका जो आकार बना वह कलात्मक था। उसने उसके लिए मिट्टी के खपरे तैयार करने के लिए खूब लकड़ियाँ इकट्ठी कीं और घर की छत के मुताबिक जब साँचे में मिट्टी के खपरे तैयार हुए तो उन्हें भट्टी में पकाने रख दिया। पूरे 15 दिन बालदू के घर के पिछवाड़े भट्टी जलती रही। जब आवा ठंडा हुआ तो खपरे पक गए। बाहर निकाले तो उसकी पत्नी और बेटी हैरान रह गए। उन्होंने इतनी कारीगरी से बने खपरे पहले कहीं देखे ही नहीं थे। बालदू ने जंगली जड़ी-बूटियों को इकट्ठा कर खपरों के लिए एक हल्के गेरुई रंग का घोल तैयार किया और उससे उन्हें रंग दिया जिससे उनकी शक्ल ही सँवर गई। आँगन में खपरों की कतारें देख कर अब रोज गाँव-परगने से कोई न कोई वहाँ आता और पूछता कि बालदू ने इन्हें कहाँ से खरीदा है। तो वे सभी हँस देते।

बाँस बालदू के अपने खेत में था। उसने उनकी कनाते काटी और तैयार कर ली। पुराने घर के छत से भी काफी लकड़ियाँ निकली थीं जिनका भी घर की छवाई के लिए बाँस के साथ उपयोग किया गया। बाँस-लकड़ी की कड़ियों और बत्तों से जब बारीक छत गूंथा गया तो उस पर खपरों की छवाई का काम शुरू हो गया। यह काफी बारीक और मेहनत का काम था जिसे तीन-चार दिनों में पूरा कर लिया गया।

बालदू की बिरादरी का एक आदमी था जिसकी उम्र तकरीबन पचहत्तर साल की थी लेकिन चेहरे पर नूर ऐसा था मानो अभी पचपन-साठ का होगा। एक जमाने में वह बाँस का ऊँचे दर्जे का कारीगर था जिसके पास गाँव-परगने से तो लोग बाँस की टोकरियाँ, किल्टे, अनाज के लिए भलोटियाँ इत्यादि बनवाने आते ही थे लेकिन दूर-दराज के इलाकों से भी लोग उसके पास आया करते थे। लेकिन समय के साथ न बाँस के बर्तनों की लोगों को जरूरत रही और न ही उसकी कारीगरी काम आई। अमरो उसका बहुत आदर करती थी और दादा कह कर पुकारती थी। बालदू को इस बात का इल्म ही नहीं हुआ कि वह कब आँगन में आकर बाँस का काम करने लग पड़ा। अमरो ने जब उसके पास घर के लिए नए तरीके से लोहे की जालियों की जगह बारीक बाँस से जालियाँ बनाने का प्रस्ताव रखा तो उसकी खुशी का पारावार न रहा। नए मकानों में लोग अक्सर पल्लों वाली खिड़िकियों के बाहर मक्खी-मच्छर के बचाव के लिए जालीदार पल्ले लगाते थे, इसलिए अमरो ने यह नई तरकीब निकाली थी। छज्जे के लिए लकड़ी नहीं थी और इतने पैसे भी नहीं थे कि लोहे की चादर खरीदी जाती। घर के चारों ओर बने छज्जे में लकड़ी व टीन की चादर के बजाए बाँस का छज्जा बनाया गया जिसने घर को चार चाँद लगा दिए। घर के भीतर भी जो छतें कमरों में डाली गई वह भी बाँस की ही कारीगरी से बनाई गई थीं।

बालदू ने अब लेवी-पलस्त का काम शुरू कर दिया था। बारीक मिट्टी छान कर उसमें मूंज नामक एक विशेष तरह की घास बारीक काट कर मिलाई थी जो मिट्टी के गारे की पकड़ को कई गुना बढ़ा देती थी। बाहर-भीतर के मटकंधे उससे इतनी सफाई से तैयार हुए जिसके आगे सिमैंट के पलस्तर के मायने भी कुछ नहीं रह गए थे। अमरो ने भी अपनी कलाकारी खूब दिखाई थी। उसने लकड़ी के मिस्त्री से घर के खिड़की दरवाजों पर बाँस का गजब का काम करवाया था। आँगन में चारों तरफ फूल की क्यारियाँ अमरो ने खुद बनाई थी। वह कल्पना करने लगी कि जब इनमें फूल खिलेंगे तो इस घर की शोभा और भी बढ़ जाएगी।

इसी बीच शहर से आकर एक-दो पत्रकार भी बालदू का घर देख गए थे और उसके चित्र भी खींचे थे। बालदू और उसके परिवार की समझ में यह नहीं आया था कि वे यहाँ कैसे पहुँच गए और उन्होंने घर के फोटो क्यों खींचे थे। उन्होंने अमरो से भी लंबी बातचीत की थी। एक फोटो उसका और साथ बालदू का भी खींचा था।

आज घर बन कर पूरी तरह तैयार हो गया था। वे सभी देर रात तक काम करते रहे।

सुबह होते ही गाँव में दो बातें हुईं। पहली यह कि भोर का सूरज जैसे बालदू के घर पर ठहर गया हो। दूसरी यह कि बालदू के घर का फोटो अखबार के पहले पन्ने पर छपा था। दिन की बस खराब होने के कारण गाँव में अखबार दोपहर को नहीं पहुँची थी। रात की बस में अखबारें थीं। इसलिए छोटे चौधरी का अखबार ऐन तड़के एक लड़का दे गया था। वह अखबार लेकर भीतर से आँगन में आया तो उसकी नजर खेतों के बीच बालदू के मकान पर पड़ी। उसकी आँखें चौंधिया गईं। लगा जैसे काँच की हजारों बारीक किरचें आँखों में घुस गई हों। उसने कंधे पर रखे तौलिए से आँखें मली और कई बार झपकाई। फिर हाथ में पकड़े अखबार को सामने किया और भौचक्क रह गया। पहले ही पृष्ठ पर बालदू के घर का फोटो देख कर हैरान-परेशान। जैसे अंधा और बहरा हो गया हो। दिमाग ने सोचना-समझना बंद कर दिया... बस यही बात परेशान करती रही कि खेतों के बीच से बालदू का घर अखबार पर कैसे चिपक गया...?

चौधरी ने अपने लड़के को आँगन के बीच ठूँठ की तरह खड़े देखा तो उसका सिर भिन्नाया। भाग कर पास आया तो उसकी शक्ल देख कर परेशान हो गया। चेहरा पसीने से भीगा हुआ था और आँखों में ढलती शाम की लालिमा उतर आई थी। वह एकटक सूरज की तरफ देख रहा था। पसीने की बूँदें गालों और मुँह पर उगी हल्की काली दाढ़ी के बीच इस तरह चू रही थी मानो चूल्हे पर रखे तंबिया से पानी उबल कर नीचे सरक रहा हो। दाएँ हाथ की मुट्ठी में बुरी तरह भींचा अखबार इस तरह लग रहा था जैसे साँप ने चूहे को अपने जबड़े में दबा रखा हो। चौधरी को उसके पूरे शरीर में इस तरह की कंपन महसूस हुई जैसे किसी देव पंचायत के दौरान मुख्य गूर के शरीर में देवता का प्रवेश हो रहा हो। उसने छोटे चौधरी को कई बार झिंझोड़ा। फिर ठिठक गया। दोबारा चेहरे पर नजर डाली तो सोचा कि वह बाबा रामदेव का कोई सूरज वाला प्राणायाम कर रहा है।

चौधरी ने ध्यान से सामने देखा और हतप्रभ रह गया। बालदू का नया बना घर चमक रहा था। उसे लगा जैसे आज का सूरज पूर्व की पहाड़ियों से नहीं बल्कि बालदू की खपरैल के बीच से उग रहा हो। वह भी उसी मुद्रा में जड़ हो गया। उन दोनों को इस तरह आँगन में बुत की तरह खड़े देख एक-एक करके परिवार के सदस्य उनके पास पहुँचे और उन जैसे हो गए। कुछ देर बाद बाप-बेटा जैसे नींद से जागे। दोनों ने अपनी आलीशान कोठी की तरफ देखा... फिर दूर-दूर तक छोटे चौधरी ने अपने बनाए मकानों को याद किया... उस मिट्टी-गोबर और खपरैल से बने बालदू के घर के आगे वे सभी बौने लग रहे थे। उसके गुस्से और अपमान की कोई इंतहा नहीं रही। उसने अखबार को दोनों हाथों के बीच पूरे जोर से मसला और लाइटर से आग लगा दी, मानो बालदू के घर को जला दिया हो।

◆कछु अकथ कहानी : कविता वर्मा

चौड़ी चिकनी सड़क पर बस पूरी ताकत लगा कर जितनी गति पकड़ सकती थी उस गति से दौड़ी चली जा रही थी।  बस के काँच यात्रा के धक्के खाकर पकड़ ढीली कर चुके ...