मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

वैधानिक गल्प : चन्दन पाण्डेय

★ #किताबें_2020
★ पूरी हुई चौथी किताब

◆ वैधानिक गल्प: चन्दन पाण्डेय
◆राजकमल प्रकाशन समूह
◆ मूल्य : ₹ १६०

किसी रचनाकार के पहले उपन्यास के प्रति पाठक और लेखक जिज्ञासा के एक ही धरातल पर खड़े होते हैं। चयनित विषयवस्तु के सम्यक विस्तार और प्रस्तुतिकरण की जो सुविधा उपन्यास में सम्भव है वह कहानियों के सीमित दायरे में कहाँ! एक किस्सागो को अपने वास्तविक सामर्थ्य से रूबरू होने का अवसर यही विधा प्रदान करती है।

अपने समय को पहचानना, परखना और किसी रचना के जरिए उसे रेखांकित करना आसान कार्य नहीं है। रच देना शायद आसान हो भी किन्तु संवेदनात्मक रूप से उसे इतना असरकारक बना देना कि वह पाठक को डिस्टर्ब कर सके, हरगिज़ आसान नहीं! लेखन की जिस गम्भीर साधना के बाद यह सम्भव होता है, वहाँ कोई शॉर्टकट नहीं चलता।

पिछले दशक में अपने खास मुहावरों और अलहदा तेवरों के साथ नए कथाकारों की एक होनहार पीढ़ी हिन्दी कहानियों के परिदृश्य पर अवतरित हुई। उसी पीढ़ी के संभावनाशील कथाकारों की जमात में शामिल और कई बहुचर्चित कहानी संग्रहों के धनी चन्दन पाण्डेय अपने पहले उपन्यास 'वैधानिक गल्प' के साथ इन दिनों चर्चा में हैं। इस उपन्यास को पूरा करने में चन्दन को लम्बा अरसा ज़रूर लगा किन्तु यह इंतज़ार किताब को खूब फला। इस युवा कथाकार की समर्थ भाषा, शिल्प और कहन ने 'वैधानिक गल्प' को इस वर्ष की लोकप्रिय किताबों में शामिल कर दिया है। महज़ चालीस दिनों के भीतर 1100 प्रतियों के पेपरबैक संस्करण की समाप्ति और दूसरे संस्करण के प्रेस में जाने की सूचना निस्संदेह हिन्दी प्रेमियों के लिए सुखद समाचार है। हिन्दी किताबों का जलवा इसी बात से समझ लीजिए कि जो प्रकाशक कभी इस तरह की जानकारियाँ लेखक से भी साझा नहीं करते थे वे अब इन्हें सार्वजनिक रूप से बता रहे हैं।

पिछले पाँच छह बरसों के दौरान कई तरह की सांस्कृतिक अराजकताएँ शक्तिशाली बनकर उभरी हैं। अशान्ति, उपद्रव और अमानवीय घटनाओं को जब राजनैतिक और सामाजिक प्रश्रय मिलने लगे तो अराजकता का साम्राज्य बढ़ना निश्चित है। ऐसे कठिन समय में सबसे बड़ा संकट उन लोगों के लिए है जिनकी आस्था किसी भी जाति, धर्म द्वारा संचालित हिंसा और उपद्रव के साथ न होकर सिर्फ़ मनुष्यत्व के साथ खड़ी हो। 'इस तरफ़' और 'उस तरफ़' के पक्षों की विशेषता यही है कि इनके खेल में जो मोहरा बनकर फिट हो जाए वह समर्थक और जो प्रश्न उठाए, उसका अस्तित्व ही सवालों के घेरे में।

'वैधानिक गल्प' कुछ ऐसे ही यादगार किरदारों की कथा है जो हर युग में सिर्फ़ मानवता के पक्ष में खड़े होते हैं और इसका खामियाज़ा भी अंततः उन्हें ही भुगतना पड़ता है। वर्तमान दौर की विसंगतियों और प्रवृत्तियों को उनके असली चेहरों के साथ पकड़ते हुए चन्दन पाण्डेय इस कथानक में शामिल परिवेश, पात्रों और उनके समकालीन अंतर्द्वंद्व का गहन विश्लेषण करते हैं। सबसे सुखद बात ये रही कि इस समूची प्रक्रिया के दौरान न तो किताब की रोचकता कहीं कमजोर पड़ी, न ही उसके पुरअसर होने में कहीं कोई व्यवधान! समय और सुविधा हो तो इसे एक बैठक में ख़त्म करने का आनन्द लिया जा सकता है।

कोट किए हुए कुछ अंशों के रूप में चन्दन पाण्डेय के लेखन की छोटी सी बानगी प्रस्तुत है......

● कभी कभी लाचारी के किसी गाढ़े वक़्त में भाषा आपका साथ छोड़कर दूर जा खड़ी होती है।

● असफलताएँ खूब सारे अभिभावक भी देती हैं।

● आप अपनी आदतें भूल जाते हैं। उन आदतों से उपजी स्मृति भूल जाते हैं , लेकिन जिन्हें आपकी आदतें याद होती हैं वो उन स्मृतियों को भी याद रखते हैं।

● इस पृथ्वी पर मनुष्य को इतनी आज़ादी होनी चाहिए कि वो चाहे जब घर लौट आए। पत्नी की आँखों में ही हो, पति-पत्नी के अरमान में ही हो लेकिन लौटने के लिए एक घर होना चाहिए।

● सम्बन्धों में झूठ और धोखे इसलिए भी खप जाते हैं क्योंकि लोग अकेले नहीं छूट जाना चाहते। इसलिए वो इशारों को दरकिनार करते हैं। नंगी सचाइयों को मन के वहम से ढाँप लेते हैं।

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कलेजा प्रबोध नहीं आया था।  मेरा मन कह रहा था कि वह ज़रूर आएगा। मेरी आंखें स्टेशन की बेतरतीब भीड़ में अब भी उसे तलाश रही थीं।  सुनंदा हौले से...