गुरुवार, 25 अक्तूबर 2018

कौन देस को वासी : वेणु की डायरी

* जब तक चीजें असम्भव लगती हैं, हाथ में आनेवाली नहीं लगतीं तो बहुत अच्छी लगती हैं, लेकिन हाथ में आ जाने के बाद हम अपने आप में गुम से हो जाते हैं।*

★कौन देस को वासी : वेणु की डायरी★ पढ़ते समय पाठकों की अलग अलग प्रतिक्रियाएँ आती रहीं। किसी ने ये चाहा कि यह उपन्यास कभी ख़त्म न हो, तो किसी ने कहा कि कई दिन बीत जाने पर भी किताब का प्रभाव अवचेतन पर हावी है।

" कौन देस को वासी" एक ऐसा उपन्यास रहा जिसकी प्रतीक्षा में सूर्यबाला जी के साथ साथ उनके पाठक भी लम्बे अरसे से रहे। इस रचना के कथ्य से जुड़े तथ्यों, घटनाओं और आवश्यक अंशों को सूर्यबाला जी लगभग एक दशक से अपनी डायरी में संजो रही थीं। प्रतीक्षा की इस लम्बी कालावधि में उन्होंने जिस धैर्य से अपने रचना-सूत्रों को सँभाले रखा, उसी धीरज से पूर्णता में हो रहे विलम्ब के कारण कभी कभी डगमगाते अपने मन को भी। एकाध बार तो यूँ भी हुआ कि लगातार आते विघ्नों से उकताकर उन्हें ऐसा लगा कि शायद यह किताब उनके जीवन के साथ ही पूरी हो सकेगी।

बहरहाल... इस सृष्टि में हर शय अपने हिस्से का भाग्य साथ
लेकर आती है। किताब पूरी होने के बाद लगभग एक डेढ़ वर्ष इसके प्रकाशन में भी लग गए।
हमारी भारतीय परम्परा यही कहती है कि "अंत भला तो सब भला।"

कई बरसों से इस किताब के कुछ चुने हुए अंश देश की तमाम पत्रिकाओं में छपते रहे। सच कहूँ तो उन अंशों को पढ़कर इस उपन्यास का कोई विशेष और व्यवस्थित आकार मन में नहीं बन पा रहा था।
आज लगभग महीने भर बाद जब यह उपन्यास पूरा हुआ है तो मुझे ऐसा लगा कि ट्रेलर या झलकियाँ हर बार अपने उद्देश्य में सफल नहीं होतीं। यह उपन्यास जिस विशाल फ़लक़ पर रचा गया है और जिन मानवीय मूल्यों, सरोकारों का प्रतिनिधित्व करता है, उसे संक्षेप में समझना या समझाना सम्भव नहीं!  कभी कभी चीजें अपनी समग्रता में ही प्रभावी बन पड़ती हैं।

उच्चशिक्षा के लिए मध्यवर्गीय परिवार के युवक वेणु की अमेरिका यात्रा से इस उपन्यास का प्रारम्भ होता है। तीन बहनों ( दो बड़ी और एक छोटी) के दुलारे भाई वेणु की यह विदेश यात्रा उसके पिता और माँ द्वारा उनकी क्षमता से बाहर जाकर किये प्रयासों के बाद सम्भव हुई है।

दो समानांतर चलती यात्राएँ : एक तरफ़ वेणु की भारत से शुरू हुई भौतिक यात्रा तो दूसरी तरफ़ माँ और वेणु के अवचेतन में निरन्तर चलती वैचारिक यात्रा...मानसिक धरातल पर माँ और बेटे का मौन किन्तु मुखर संवाद अनवरत जारी रहता है। 
माँ की कल्पना में बेटे से जुड़ी अतीत की सुखद यादें हैं --" यात्रा तो यात्रा, आगे की हो या पीछे की। हम कितनी बार, कितनी जगहों पर बार बार जाना चाहते हैं। रुकना, सुस्ताना चाहते हैं। कभी कभी तो वहाँ से आगे बढ़ना ही नहीं
चाहते।"

तो वेणु के मन में चल रहा है ---

" तुम सबके लिए मेरा जाना संभावनाओं, आकांक्षाओं और उपलब्धियों का पर्याय था। सुख-समृद्धि के महाकाव्य की प्रस्तावना। किसी विराट परियोजना का शिलान्यास!"

अमेरिका पहुँचकर संघर्षों की एक नई दुनिया से वेणु का साक्षात्कार होता है । सर्वाइव करने के लिए ऐसे ऐसे समझौते जिन्हें भारत में रहते हुए कोई सोच भी न सके।

पीछे छूट गए घर और स्वदेश की स्मृतियों की कसक के बीच अपने वर्तमान से सामंजस्य बिठाने की कोशिश करते वेणु को वहाँ की प्रकृति और उसके अनोखे रूप प्रायः विस्मित कर जाते हैं--

" यह फॉल का मौसम तो रंगों का इंद्रजाल सा रचता है। सड़कों, घाटियों, जंगलों से मैदानों तक हर तरफ़ रंगों का एक मायावी जलसा। ड्राइव करते हुए विशाल ने बताया कि दरअसल यह ठंडे देशों में पत्तियों को लगा एक रोग जैसा ही होता है। क्लोरोफिल की कमी की तरह, जिसमें पत्तियाँ हरी से पीली, नारंगी, लाल, उनाबी होती क्रमशः सूखती चली जाती हैं। मैं सोचने लगता हूँ : समाप्ति से पहले इतना अभिराम महोत्सव, इतनी इंद्राजाली सौगात! अंत को उत्सव में बदल देना !"

प्रवासी भारतीयों के यहाँ आते जाते वेणु उन्हें अपने देश की छोटी छोटी वस्तुओं के प्रति गौरव अनुभव करते देखकर सोचता है--

" भारत में रहते हुए हम क्यों नहीं करते भारत को इतना महिमा-मंडित? शायद रोजमर्रा के संघर्ष और समस्याएँ हमें इतनी लस्त-पस्त किये रहती हैं कि यह गर्व, गौरव, फुरसती शगल की तरह हो जाता है और यहाँ ( विदेश में ) तो हमें इत्मीनान से गर्व करने की सुविधाएँ होती हैं।"

कहानी में संभावना उत्पन्न होते ही सूर्यबाला जी का व्यंग्यकार वाला रूप मुखर हो आता है :

" इस देश से ज्यादा इस देश के भगवानों का ऋण है मुझ पर। देसी पकवानों के लिए तरसते मन और स्वादेन्द्रियों की एकमात्र तृप्ति , संतुष्टि इन मंदिरों के प्रसादों से ही हुई है। धन्य हो प्रभु! कितना अच्छा हुआ जो मेरे यहाँ आने से पहले ही तुमने पधारकर अपना अपार्टमेन्ट बुक करा लिया।

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पढ़ाई और नौकरी के दो मोर्चे फ़तह कर पौने तीन साल के अंतराल के बाद वेणु की पहली घर वापसी! अपने प्रियजनों के बीच आकर वेणु को कुछ यूँ लगता है....

" घर मिला उछाह उमंगों में नहाया सा, जैसे नए मेहमानों के आने से पहले नहा धुला, साफ कपड़े पहनाकर बिठाया गया बच्चा!"

अपने पैरों पर खड़े हो चुके वेणु में आये आत्मविश्वास और उत्तरदायित्व की भावना के कारण पिता-पुत्र के बीच मित्र और साथी जैसी सहजता इस खंड को अत्यंत आत्मीय स्पर्श दे जाती है।
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लगभग तीन दशकों के जीवन क्रम और धरती के दो अलग अलग छोरों पर हो रहे सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों, पारिवारिक विसंगतियों, आउटडेटेड होती मानवीय संवेदनाओं और क्षरण होती आस्थाओं की कथा है : कौन देस को वासी !

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वेणु की दूसरी बहन के विवाह में वर पक्ष प्रवासी वेणु का बड़ी शाइस्तगी से जमकर दोहन करता है। इसी दौरान वेणु के विवाह की चर्चा भी जोर पकड़ लेती है। थोड़े समय बाद एक सम्पन्न परिवार की उच्च शिक्षित वधू के प्रस्ताव को वेणु की सहमति से स्वीकार कर लिया जाता है। विवाह के बाद वेणु पत्नी मेधा के साथ अमेरिका वापस लौट जाता है।

आरम्भिक दो खण्ड अपेक्षाकृत थोड़े धीमे हैं ( मुझे लगता है कि किसी तटस्थ व्यक्ति द्वारा की गई थोड़ी सी काटछाँट इस किताब के पक्ष में लाभदायक होती)....

★★★

" एक बाहर का समय होता है, एक आदमी के अन्दर का.. हर आदमी अपना रास्ता स्वयं चुनता है। उसे कितना पुराने में रहना है, कितना नए में, यह भी वह खुद तय करता है।"

तीसरे खण्ड से सूर्यबाला जी अपने चिरपरिचित स्वरूप में प्रकट होती हैं। और फिर... रोचकता, भाषा, शिल्प, कथ्य, संवेदना, मार्मिकता यानी शब्दों की ऐसी अद्भुत कारीगरी कि किताब छोड़ने का मन ही न हो!
जाने कितनी बार गले में कुछ अटकता है और रोकते रोकते भी आँखें नम होती हैं!
★★★

मेधा वेणु के विपरीत ऐसे आधुनिक परिवेश में पली बढ़ी है जहाँ संवेदना और समर्पण की जगह प्रैक्टिकल होने और एक दूसरे को स्पेस देने की तरफ़ ज़्यादा जोर दिया जाता है। वह वेणु और उसके परिजनों की परस्पर आत्मीयता और लगाव को समझने में प्रायः नाकाम है और कई ऐसे अवसर आते हैं जब वह प्रत्यक्ष रूप से इस पर बेहद सतही प्रतिक्रिया देती है। माँ की व्यावहारिक समझ बूझ और उनकी पारस्परिक ममता पर मेधा प्रायः कोई न कोई प्रैक्टिकल या अपमानजनक टिप्पड़ी ज़रूर करती।

◆◆◆

विवाह के बाद मेधा और वेणु पहली
स्वदेश वापसी की तैयारी...

" मेधा के पास एक धुली-पुँछी ड्राईकलीन्ड आत्मा है। वह हर मुद्दे पर प्रैक्टिकल होकर सोचती है। बेकार के पचड़ों में नहीं फँसती। सीधी सी बात है, हम उपहार दे रहे हैं, कोई उधारी नहीं चुका रहे और उपहारों का मूल्य रुपयों या डॉलरों में नहीं आँका जा सकता-- मूल्य भावनाओं का होता है।"

घर के लोग पहले की ही तरह इस बार भी उनके लिए पलक पाँवड़े बिछाए इंतज़ार कर रहे हैं किन्तु तब और अब में बहुत कुछ बदल चुका है। उनका सम्पूर्ण वेणु बँट चुका है। सम्बन्धों के इस जोड़ घटाव में दुःख घर वालों के हिस्से में ही आने थे। मेधा की उदासीनता और उपेक्षित करने की हद तक उसका निरासक्त होना माँ तो सह लेती हैं किन्तु अपने दादा की लाड़ली छोटी बहन वसु टूट जाती है। एक दिन जब वे दोनों शॉपिंग और लंच के लिए बाहर गए होते हैं उस समय माँ और वसु के बीच का अंतर्द्वंद बाहर आ जाता है। दो ढाई पृष्ठों का यह वार्तालाप उपन्यास के कुछ महत्वपूर्ण अंशों में शुमार किये जाने योग्य है....

" भाषा आदमी की अपनी होनी चाहिए- उसकी निजी चीज, जिससे वह जाना पहचाना जाए.. और उस भाषा पर तुम्हारा अधिकार, नियंत्रण और संतुलन भी होना चाहिए।"

" किताबें सब कुछ लिखा लिखाया ही नहीं देतीं, बहुत कुछ चुपचाप थमा जाती हैं।"

" देखता तो आदमी बहुत कुछ है, पर ग्रहण अपने संस्कारों के हिसाब से करता है।"

★★★

वेणु और मेधा द्वारा उनके पहले बच्चे की देखभाल के लिए माँ और पिता को कुछ महीनों के लिए अमेरिका जाना पड़ता  है।
इस अवांछित समय खण्ड को  रचते हुए सूर्यबाला जी उन बातों पर जबरदस्त तंज कसती हैं, जिनकी चर्चा आवश्यक थी...

" मेधा नौकरी के जरिये अपने जीवन को "अर्थवान" करने की कोशिश में जुट जाती है। वैसे भी इन दिनों मेधा लगभग हर हफ़्ते बेटू के लिए खिलौने या किताब लेकर ही घर लौटती है। शेष मातृत्व दूध की नन्ही शीशियों की शक्ल में!"

( प्रवासी महिलाओं की व्यस्तता के मद्देनजर वहाँ कुछ ऐसी मशीनें ईज़ाद हुई हैं जिनकी सहायता से वो अपना दूध निकालकर शीशियों में रख, एक सुनिश्चित तापमान सेट करके फ़्रिज में रख देती हैं और छोटे बच्चों की ज़िन्दगी इसी दूध के सहारे चलती जाती है )

मेधा द्वारा किये जा रहे अमेरिका के गुणगान और भारत की बुराइयों के एक प्रसंग में वेणु की माँ बड़ी सहजता से कहती हैं---

" बस इस ग़लत-सही को अलगाना ही कठिन होता है बेटे, क्योंकि सबके अपने अपने सही और ग़लत होते हैं।"

वेणु खुश हुआ कि माँ ने कितनी सहजता से ये बात कह दी--

" इतना आसान नहीं है इन्हें परिभाषित कर पाना। होता यह है कि अपने अपने सच पालकर तोते की तरह पिंजरे में लटका लेते हैं लोग। जब जो चाहा, वही सच बुलवा लिया तोते से।"

भौतिक समृद्धि पर हो रही किसी अन्य बातचीत के दौरान उनका यह कथन कितने सरल शब्दों में बड़ी बात कह जाता है---

" प्रभूत बाहर नहीं, हमारे अंदर होता है। जब संतोष आता है तो सब कुछ प्रभूत हो जाता है वरना तो जीवन भर कंगाली हमारा पीछा नहीं छोड़ती।"

" हर बाज़ार अपने आसपास के लोगों की बाइंग कैपेसिटी देखता है।"

इसी दौरान आया एक और मार्मिक प्रसंग दिलो दिमाग पर बहुत गहरा असर डालता है। वेणु के एक चाचा हैं लोकेन्द्र जिनकी पत्नी उन्हें छोड़कर दूसरा विवाह कर लेती है।

लोकेन्द्र अपनी भाभी यानी वेणु की माँ से अपनी तारीफ़ सुनकर कहते हैं :
" भाभी, लिज से कहूँगा मेरी भाभी भी मुझे नेक इंसान कहती हैं। वैसे लिज भी मानती और कहती है कि 'बेसिकली ए गुड पर्सन' पर 'अच्छा आदमी' और 'अच्छा पति' कभी कभी बिल्लियों की तरह रास्ता काट जाते हैं एक दूसरे का। जीवन शायद सिर्फ़ प्यार के सहारे नहीं चला करता और इस वाली दुनिया ( अमेरिका ) में तो बिल्कुल नहीं !"

पत्नी साथ छोड़ चुकी है किन्तु लोकेन्द्र के घर, बाहर और उनकी हर बात में उसकी उपस्थिति न सिर्फ़ माँ को व्यथित करती है बल्कि पाठकों को भी भावुक बना जाती है।
★★★

माँ और पिता के भारत लौट जाने पर वेणु की उदासी को लक्ष्य कर मेधा पुनः वेणु से अनावश्यक बतकही शुरू करती है। इसी वार्तालाप के दौरान वेणु सोचता है--

" तुमने जवाब के कोष्ठक को इतना छोटा क्यों बना दिया है मेधा कि उसमें सिर्फ़ एक नाम मात्र के 'येस' और 'नो' को छोड़कर और कुछ की गुंजाइश ही न रहे? ज़िन्दगी के सवाल-जवाब इतने सीधे और सटीक नहीं हुआ करते।"

" इस मेधा को कौन समझाए कि तुम तब पैदा भी नहीं हुई थी, जब से माँ मेरे साथ है। मेरे हर अंतर्बाह्य की साक्षी। मेरे सारे आरोह अवरोह, द्वंद, दुविधाएँ और सुख दुःख की आवाजाहियाँ उस माँ के रजिस्टर में दर्ज हैं।"

ऐसे ही किसी अवसर पर "किचेन तब तक रसोई था" यह छोटा सा वाक्य ध्यान दिलाता है कि
रसोई जैसे आत्मीय शब्द किस तरह हमारे शब्दकोश से गायब हो गए।

" वर्तमान की कीमत लगाने में प्रायः बहुत ग़लत होते हैं हम नादान। खासकर उन वर्तमानों की जो अपने बहुमूल्य को संकोच में छुपाए रहते हैं। उजागर नहीं होने देते।"

" घर हवा में नहीं बनते और न ही हक को हठ में बदला जा सकता है। पैसों से ज्यादा अहमियत आदमी की, रिश्तों की होती है। ऐसे अनेक रिश्ते मिलकर एक घर, एक जीवन बुनते हैं। जीवन के ताने बाने में इन रिश्तों की अपनी चमक, अपनी ख़ुशबू होती है।"

★★★

" एक बात बताओ मेधा, क्या दुनिया की सारी खुशी सब कुछ लपक, झपटकर, उपलब्ध कर लेने में ही है? थोड़े में सहूलियत के साथ रहने में नहीं? मुझे तो लगता है कि आज दुनिया की सारी समस्याओं की जड़ में 'असन्तोष' ही है। क्या ज़रूरी है कि खुद को पहुँचाने के लिए दूसरों का रास्ता काटते जाया जाय?"

वेणु की छोटी और लाडली बहन वसुधा का चरित्र इस उपन्यास की बड़ी उपलब्धि है। हद दर्जे की स्वाभिमानी, खरी खरी बोलने और उतना ही खरा जीवन जीने वाली वसुधा के क़िरदार को भूलना आसान नहीं!

विवाह के बाद मँहगे कॉल दर के बहाने लगातार कम होती जा रही बातचीत हो, या कभी कभी आने वाले मनीऑर्डर का धीरे धीरे लगभग बंद हो जाना, वसुधा सब समझती है और कड़े शब्दों में कहती है कि "अब दादा के आगे भिखारियों की तरह हाथ फ़ैलाने की कोई ज़रूरत नहीं!"

बार बार बाधित हो रही पढ़ाई और बारिश की टपकन झेलती दीवारों को बचाने के लिए ट्यूशन लेना शुरू कर देती है।

माँ और वसुधा के संवाद जैसा ही एक और शानदार संवाद होता है मेधा और वसु के बीच। हालाँकि इस अंश में हो रही बातें प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि अन्तर्मन का वार्तालाप है...

मेधा के लिए वसु का शोक:- "मेधा के अन्दर की कस्तूरी गायब! उसके पास सिर्फ़ इच्छाएँ हैं और उनकी पूर्ति की अधीर प्रतीक्षा। या तो प्राप्त हो जाने की खुशियाँ या न प्राप्त हो पाने के अभाव की हताशा...। दूसरी बहुत सारी मानवीय और अनमोल अनुभूतियों से उसका कोष खाली है। उन सुखों से जो उसकी कस्तूरी वाली थैली से निकलते हैं। उन दुःखों से भी, जो मनुष्य होने की शर्तें बनते हैं।

चूँकि कहानी के बारे में ज्यादा बताने से पाठकों की जिज्ञासा और आकर्षण ख़त्म हो जाने का डर है अतः सम्बंधित प्रसंग का उल्लेख किये बिना एक और अंश साझा कर रहा हूँ जहाँ सूर्यबाला जी ने आधी अधूरी नैतिकताओं पर सटीक प्रहार किया है....

" आपकी खुशी के लिए उन्हें हाथ भर कर राखी बाँध दूँगी ( जिन हाथों को आज तक छुआ भी नहीं...), लेकिन एक बात बताइये, क्या बिना स्थूल परिभाषाओं के रिश्ते नहीं बनाए जा सकते? जिन्हें बेईमानी करनी होती है, उन्हें किसी पवित्र से पवित्र रिश्ते की सौगन्ध भी नहीं रोक पाती।
उत्तर में मामा का रिश्ता भाई से ज्यादा पवित्र, दक्षिण में भांजी से विवाह का पहला अधिकार मामा का या मामा के बेटे का.. ( जो उत्तर में पापाचार होगा और हिन्दू संहिता जिसकी अनुमति भी न देगी )..
उत्तर में सौभाग्यवती वधएँ सर ढकती हैं, दक्षिण में विधवाएँ। उत्तर में दही शुभ तो दक्षिण में दूध। इन विरोधाभासों के कारण अवश्य होंगे किन्तु प्रश्न सिर्फ़ सुविधानुसार ली जाने वाली छूटों का है।
★★★

" बरसों की गुम चीजें तलाशनी आसान नहीं होती।"

" नई पायी हुई चीजों का जश्न मनाना जितना आसान है, छूटती हुई चीजों को भुला पाना उतना ही कठिन।"

" जो जिससे जितने गहरे जुड़ा होता है, उतनी ही उग्रता से नाराज़ भी होता है- पूरे हक़, पूरे अधिकार से...."

" क्या दुनिया का सबसे बड़ा दुःख खाने पीने का अभाव ही है? क्या दुखों की कोई नाप-तौल सम्भव है इस दुनिया में? एक ही आकाश से आती ख़ुशी की किरणें सबको अलग अलग ऊष्मा देती हैं, दुखों के झरते ओस के बिन्दु भी।
कुछ दुःख कहने सुनने के लिए होते हैं, कुछ चुप से गटक जाने के लिए.. और कुछ इतने धीमे धीमे नन्हे शावक से सहलाते जाने के लिए कि आसपास किसी को भनक तक न लगे।"

★★★

उपन्यास का उत्तरार्द्ध अमेरिका में आई मंदी, कॉस्ट कटिंग के नाम पर नौकरियाँ गँवाते और असुरक्षित भविष्य की भयावहता से घिरे युवाओं के प्रभावी वर्णन से भरपूर है।

मंदी और बेरोजगारी की इसी आपदा का शिकार बनता है वेणु का मित्र शशांक। उपलब्ध विकल्पों से समझौता उसके दिल को गवारा नहीं था और ऐशो आराम में कोई समझौता उसकी पत्नी को मंजूर नहीं। परिणाम- सम्बन्ध विच्छेद और दुष्प्रभाव का शिकार इनके बच्चे। शशांक वेणु को बताता है कि आखिरी बार अलविदा कहने जाता है तो उसका बच्चा कमर से लिपटकर कहता है-- "डैड, आई डोंट वांट तो ग्रो विदआउट यू" ( "पापा, मैं आपके बग़ैर बड़ा नहीं होना चाहता ")

" आदमी को उसके अन्दर बाहर से भी छितरा बिखरा देने में माहिर है यह निर्मम और दुर्दांत समय। पहले उसे आसमानी ख़्वाबों के लिए उकसाने, बदहवास भगाने के लिए, फिर धीरे धीरे खुद उन सपनों को पिचकाकर कचरे के ड्रम में डाल देने के लिए मजबूर कर देने वाला समय।"

ईगो और अनावश्यक आत्मसम्मान के नाम पर टूटते घरों, असफल विवाहों, असमय अकेलेपन की ओर बढ़ते अभिशप्त बचपन की इन घटनाओं पर मंथन करते हुए वेणु सोचता है--

"पूरी तरह एक दूसरे के अनुकूल स्त्री पुरुष ईश्वर ने अब तक जन्माए हैं क्या? जो ऐसा कहते हैं वे सबसे बड़ा ढोंग करते हैं। झूठ बोलते हैं। अनुकूल होना और ख़ुद को दूसरे के अनुकूल बनाना दो अलग बातें हैं..

जाने क्यों हमेशा ऐसे प्रसंगों में मंडप में लिए गए फेरे और सुनी जाती सप्तपदियाँ याद हो आतीं। लगता, जैसे हम सिर्फ़ जीवन के साथ नहीं, अपने धर्म, अपने ईश्वर के साथ अन्याय कर रहे हैं। अवज्ञा ईश्वर की, अनादर धर्म का।... अच्छा, तो इसीलिए कलाइयों में अक्षत, सुपारी के कलावे बाँधे जाते हैं। हथेली पर हथेली थमा पाणिग्रहण होते हैं। देहरी पर स्वास्तिक उकेरते हैं। धान पान से वधू का आँचल भरते हैं। जल से भरा कलश सजाते हैं जिससे संग साथ का यह जीवन-कलश हमेशा भरा-पूरा और सँवरा रहे। ऐसी यादों से सजी पिटारी साथ रहेगी तो स्मृति कोष का पाथेय होगा। संकट की घड़ी में ग़लत कदम उठाने से पहले थोड़ा हिचकेंगे। सँभालेंगे अपने आप को। अपनी ख़ातिर नहीं तो अपनों की ख़ातिर। देश, दुनिया और लोक मर्यादा की ख़ातिर... और बचा ले जाएँगे जीवन-सत्व को.."

■■

पाठकों की दुनिया में कोई रचना तभी अमरत्व प्राप्त करती है जब उसके सरोकार सीमित दायरों में क़ैद न हों।  कथा के उत्तरार्द्ध में सूर्यबाला जी की संवेदना और सामाजिक प्रतिबद्धता भी एक परिवार की चौखट से बाहर निकल वैश्विक सन्दर्भों से जुड़ जाती है। टूटते परिवारों और खंडित होती सामाजिक व्यवस्थाओं के विचलित करते दृश्यों के साथ ही अकेले पड़ते बचपन की मार्मिक तस्वीरें इस उपन्यास को एक स्मरणीय महागाथा में तब्दील कर जाती हैं।

दो अलग अलग प्रसंगों में आये इस सूत्र वाक्य की महत्ता से कौन इनकार कर सकता है...

" समय के साथ सबसे अच्छी बात यही है कि वो गुज़र जाता है।"

" एक सच तो ये है कि हमारा जो कुछ हमसे छूट जाता है, उसके सपने हमेशा हमारे साथ बने रहते हैं। और दूसरा सच यह कि हमसे हमारे सपने छूट जाएँ तो शायद हम मनुष्य भी न रह जाएँ।
अंततः जीते हम सपनों में ही हैं। चाहे वह भविष्य का सपना हो या अतीत का... और एक समय ऐसा आता है जब अतीत के सारे साथ जिये सच भी सपने हो जाया करते हैं....।"

उपन्यास का समापन अंश कथ्य की दृष्टि से जबर्दस्त है। इन आख़िरी पन्नों की गम्भीरता, तन्मयता और कंटेंट की गुणवत्ता उपन्यास को एक अलग ऊँचाई पर ले जाती है।

जीवन मंत्र सरीखी इन पंक्तियों से इस उपन्यास का समापन होता है----

" किसी एक पल का भी साथ, किसी एक पल की भी ख़ुशी नगण्य नहीं हुआ करती। कभी कभी तो ये उम्र भर उजाला किये रहती है। हमारे मन की दुनिया आलोकित रहती है इन कंदीलों से।"

" इस पूरे विश्व में हम कहीं रहें, किसी भी जाति, धर्म, वर्ण के नाम से, क्या फ़र्क़ पड़ता है, सिवा इसके कि हम कितने मनुष्य बने रह पाए हैं ! "

रविवार, 7 अक्तूबर 2018

सूर्यभानु गुप्त

मीर और गालिब के समय से शुरू हुआ ग़ज़लों का तीन सौ वर्ष पुराना सफर आज भाषा, शिल्प और संवेदना की तमाम चौहद्दियों को पार कर लोकप्रियता की एक अनूठी मिसाल कायम कर चुका है। पहले फारसी, फिर उर्दू और फिर हिन्दी ग़ज़ल कहकर किया गया इस विधा का वर्गीकरण इन दिनों अप्रासंगिक हो उठा है क्योंकि आज कई ऐसी भाषाओं में भी ग़ज़लें लिखी जा रही हैं जिनकी कल्पना भी शायद नहीं की गई होगी।

ग़ज़ल को वर्ग विशेष की महफ़िल से उठाकर आम आदमी तक पहुँचाने की अहम भूमिका जिन शायरों ने निभाई उनमें सूर्यभानु गुप्त प्रमुख हैं। यही कारण है कि उनका शुमार हमारे दौर के शीर्षस्थ ग़ज़लकारों में होता है।

सूर्यभानु गुप्त हमारे समय के उन चुनिन्दा रचनाकारों में हैं जिनकी रचनात्मकता किसी प्रकाश स्तम्भ की तरह निरन्तर प्रज्वलित रही और अपनी चालीस वर्ष की काव्य यात्रा के दौरान कविता, ग़ज़ल, गीत, दोहे, त्रिपदी, चतुष्पदी, और हाइकू जैसी विभिन्न विधाओं में उन्होंने उत्कृष्ट सृजन किया।
उनकी कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाने की विशेषता मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती है। एक छोटी सी कविता देखिए...

पुख़्ता होते ही मर गयी चीज़ें
बात जब तक थी, बात कच्ची थी,
घर बनाकर बहुत मैं पछताया
इससे ख़ाली ज़मीन अच्छी थी!

यूँ तो सूर्यभानु गुप्त जी ने हर विधा में कमाल का लेखन किया है किन्तु सबसे ज्यादा मारक उनकी त्रिपदियाँ हैं। मात्र तीन पंक्तियों में ऐसी बातें कह जाते हैं वो जिसे कई पृष्ठों की बड़ी कविता भी नहीं कह पाती। "देश" नामक खण्ड की ये पंक्तियाँ देखें...

पड़ा है धूप का सपना अभी वहीं का वहीं
जिस आधी रात को हमको मिली थी आजादी
उस आधी रात की क़िस्मत में सहर है कि नहीं ?

चला किधर के लिए था, किधर निकल आया !
मैं इससे पहले ये कहता बदल तू शक्ल अपनी
वो मेरी नस्ल का हर आईना बदल आया !

इंतज़ार और अभी दोस्तों करना होगा !
राम लीला जरा कलियुग में खिंचेगी लम्बी,
लेकिन ये तय है कि रावण को तो मरना होगा "!

इसी तरह दूसरी आजादी, ग्रीष्म, सावन, शरद आदि अध्यायों में उनकी कुछ और शानदार त्रिपदियों के दर्शन होते हैं....

आदमी, आदमी हुआ फिर से!
धूप, चिड़िया, हवा , नदी, ख़ुशबू
दिल को हर चीज ने छुआ फिर से!!

अपने ही घर में हम पराए हैं!
ऐसा लगता था देशी शक्लों में
फिर से अंग्रेज लौट आये हैं!

धूप, ताज़ा हवा ज़रूरी है!
बात गणतंत्र की इमारत की
खिड़कियों के बिना अधूरी है !!

लोग क़समें हज़ार खाते हैं
लौटकर राजघाट से लेकिन
फिर उसी रंग में डूब जाते हैं ।

धूल ही धूल हर गली बाबा !
चोर सारे सवार घोड़ों पर,
और पैदल इधर अलीबाबा !!

दूर तक रात है, अँधेरे हैं,
जिनके घर खेतियाँ अँगूठों की,
उनकी जेबों में फिर सवेरे हैं !

रेत सहरा की आ गयी मन तक !
गर्मियाँ आ के कहाँ तक ठहरीं,
जी में आये, उतार दें तन तक !!

मेघदूतों का इंतज़ार हुई !
धूप ने इस क़दर नदी पहनी,
रहगुज़र एक आर-पार हुई !!

इन दो मिस्रों में सदी सिमटी है !
झिलमिलाता है रूह तक मृगजल,
दोपहर यूँ बदन से लिपटी है !

खेल मौसम भी खूब करता है
छींटे आते हैं मेरे अंदर तक
मेंह बाहर मेरे बरसता है!

एक पहचान के हरे वन में
इस तरह इंद्र का धनुष टूटा
रंग ही रंग भर गए मन में !

ओस झिलमिल कनेर हैं सुबहें
एक तालाब के कमल ओढ़े
किसकी ग़ज़लों के शेर हैं सुबहें!

इस तरह से है धूप कोहरे में
बाजरा तुमने साफ़ करने को
जैसे रक्खा हो सूप कोहरे में!

पेड़ बजते हैं पुष्पशंखों से
एक कविता हवा में लिखती हैं
उड़ती चिड़ियाएँ अपने पंखों से।

रास्ते क्या नज़र नहीं आते?
सुब्ह के भूले शाम तक साहिब
इन दिनों लोग घर नहीं आते!

सूर्यभानु गुप्त के यहाँ भाषा और भाव का जो संयोजन नज़र आता है वह अन्यत्र विरल है। कल्पना और रूपक का अद्भुत प्रयोग उन्होंने अपनी कविताओं में किया है।

जो लोग जूतों के साथ
पेड़ों पर नहीं चढ़ पाते हैं
वे कुर्सियाँ बनवाते हैं।

और यहाँ देखिए....

न जाने आसमान कब गिरेगा !
दरख़्त
छोटे बड़े
एक पाँव पर खड़े
प्रतीक्षा कर रहे हैं सदियों से
कि कब आसमान गिरे
और हम थाम लें !
लेकिन आसमान भी कोई बुद्धू नहीं है,
बूढ़ा हो गया है,
यह समझता है
कि दरख़्त सब के सब ,
यूँ ही नहीं खड़े हैं बेमतलब
सदियों से,
अरे!
अगर गिरना ही है
तो सीधे ज़मीन पर गिरेंगे,
भला इन दलालों के हाथ
क्यों पड़ेंगे?
मेरा ख़याल है--
जब तक एक दरख़्त भी खड़ा रहेगा
आसमान नहीं गिरेगा !

"पिताजी का बच्चा" सूर्यभानु गुप्त की अत्यंत चर्चित रचनाओं में शामिल है। एक आत्ममुग्ध पिता और पितामुग्ध बालक की यह जुगलबन्दी अद्भुत है..

पिताजी हैं गामा
पिताजी सिकन्दर
पिताजी टमाटर
पिताजी चुकन्दर

पिताजी का जीवन
पिताजी का दर्शन
पिताजी की पुस्तक
पिताजी को अर्पन

पिताजी का पर्वत
पिताजी का डण्डा
पिताजी ने गाड़ा
पिताजी पे झण्डा

पिताजी के अंदर
पिताजी पड़े हैं
पिताजी के बाहर
पिताजी खड़े हैं

पिताजी का भेजा
पिताजी ने पाया
पिताजी के सर पे
पिताजी का साया

पिताजी का बच्चे पे
ऐसा असर है
पिताजी की जूती
पिताजी के सर है।

सूर्यभानु गुप्त की चतुष्पदियाँ उनकी त्रिपदियों जितनी प्रभावशाली न होते हुए भी रोचक और पठनीय हैं।

आंखों में फूल
हाथों में धूल
हमने भी की कैसी
बच्चों सी भूल

पत्थर का मौन
समझा है कौन
शिल्पी कुछ, पर कितना?
यही आध-पौन !

उतर गया घाम
कर मेरे नाम
डूबा दिन, कटे हुए
पाँवों की शाम !

हाइकू विधा की कुछ रचनाएँ देखें....

रेत पे पाँव
याद आ रही है माँ
पेड़ की छाँव!

बात बात में
दीवारें गिरती हैं,
बरसात में !

टूटे बादल
बीच सड़क पर
नाचे पागल!

नीम का पेड़
देख रहा है, सूनी
खेतों की मेड़ !

सूर्यभानु गुप्त जी ने कमाल के दोहे लिखे हैं। बानगी के तौर पर ये दोहे पढ़ें...

गीता और कुरान पर, है अब ऐसी धूल
भोले भाले आदमी, रस्ता जाएँ भूल

मन्दिर वन्दिर के नहीं, राम मेरे मोहताज
बसी अयोध्या जिस हृदय, उसमें रहे विराज

गंगा जी से क्या जुड़ें, पितरों के सम्बन्ध
जब पंडों के हाथ हों, घाटों के अनुबन्ध

क्या बतलाएँ, क्या लिखें, तुमको अपना हाल
दिल तो राजस्थान है, आँखें नैनीताल

छोड़ समय की रेत पर, चंद सीपियाँ शंख
उड़ जाता जाने कहाँ, प्रेम लगाकर पंख

हर इक युग के अंत में, मिले हमेशा झूठ
हाथ लिए टूटी हुई, तलवारों की मूठ

जब से हमने ले लिया, हर रिश्ते से जोग
घर के से लगने लगे, दुनिया भर के लोग

कलियुग में रावण अमर, त्रेता में थे राम
अपना अपना देवता, चुनना युग का काम

सूर्यभानु गुप्त की सर्वाधिक ख्याति ग़ज़ल के क्षेत्र में है अतः उनकी ग़ज़लों की चर्चा के बग़ैर कोई भी परिचर्चा अधूरी रह जाएगी। अपने
एक शेर में वे कहते हैं---

जो ग़ालिब आज होते तो समझते
ग़ज़ल कहने में क्या कठिनाइयाँ हैं

ग़ज़ल कहने में उन्हें क्या कठिनाइयाँ दिखीं ये मुझे नहीं मालूम। पर ये ज़रूर कहूँगा कि उनकी ग़ज़लों ने दुष्यंत की ही तरह एक नए तरह की भाषा, शिल्प और कथ्य को जन्म दिया और इस प्रक्रिया में ग़ज़ल उन सामान्य लोगों से भी जुड़ सकी जिन्हें उर्दू के भारी भरकम लफ़्ज़ों की समझ नहीं थी....

जिनके अंदर चिराग जलते हैं
घर से बाहर वही निकलते हैं

ऐसी काई है अब  मकानों पर
धूप के पाँव भी फिसलते हैं... जैसे लाजवाब शेर कहने वाले शायर बहुत कम हैं हमारे पास। इसी ग़ज़ल के आख़िर में उनका ये प्रयोगात्मक शेर काबिले तारीफ़ है--

हम तो सूरज हैं सर्द मुल्कों के
मूड आता है तब निकलते हैं

उनकी ग़ज़लों के शेर हमें कभी विस्मित तो कभी मोहित करते हैं....

आम रस्ता नहीं था मैं, फिर भी
मुझसे होकर गुज़र गया कोई

**
दिल के दरवाजे होते हैं अन्दर को खुलने वाले
मैं अन्दर आकर पछताया और इक चेहरा याद आया
**
अपने ही घर में अजनबी की तरह
मैं सुराही में इक नदी की तरह

उसकी सोचों में मैं उतरता हूँ
चाँद पर पहले आदमी की तरह

**
हर लम्हा ज़िन्दगी के पसीने से तंग हूँ
मैं भी किसी क़मीज़ के कॉलर का रंग हूँ
ये किसका दस्तख़त है, बताए कोई मुझे
मैं अपना नाम लिख के अँगूठे सा दंग हूँ

**

रंज इसका नहीं कि हम टूटे
ये तो अच्छा हुआ भरम टूटे

ज़िन्दगी ! कंघियों में ढाल हमें
तेरी जुल्फ़ों का पेचो-ख़म टूटे

अपनी एक और ग़ज़ल में जिस तरह ख़ामोशी लफ़्ज़ का प्रयोग उन्होंने किया है, वह शानदार है.....

सुब्ह पर्वत की एक मन्दिर है
जिसमें इक प्रार्थना है ख़ामोशी

दर्द के शह्र में मेरा घर है
मेरे घर का पता है ख़ामोशी

गुफ़्तगू के सिरे हैं हम दोनों
बीच का फ़ासला है ख़ामोशी

दोस्तों, ख़ुद तलक पहुँचने का
मुख़्तसर रास्ता है ख़ामोशी

रिश्तों पर कही एक ग़ज़ल के चन्द शेर देखिए...

यूँ हदों से गुज़र गए रिश्ते
रह गए लोग मर गए रिश्ते

धूप जब तक रही, रहा मेला
फिर न जाने किधर गए रिश्ते

ज़िन्दगी शीर्षक ग़ज़ल से उनके चंद शेर देखिए....

धूप, वादे, वफ़ा,रोशनी,  देवता
हर खिलौने से उतरा कलर ज़िन्दगी

छन्द से जैसे बाहर ग़ज़ल हो कोई
रहगुज़र, रहगुज़र, रहगुज़र ज़िन्दगी

सौ दफ़ा आदमी को गिराए बिना
टिकने देती नहीं पीठ पर ज़िन्दगी

एक अन्य ग़ज़ल में उनके बिम्बों का बेहतरीन प्रयोग देखें...

सुब्ह शाम के चेहरे मिलकर एक हुए
कुछ लम्हों को ऐसा फ्यूज़ हुआ सूरज

धरती और चाँद की सफ़ में आते ही
अपना तो चेहरा ही खो बैठा सूरज

हुई ज़मानत ज़ब्त अँधेरों की आख़िर
इतने वोटों से आगे निकला सूरज

बरस रहा अँधियारा सौ सौ शक्लों में
इस दुनिया की ख़ातिर माँग दुआ सूरज !

और अंत में उनकी सर्वाधिक चर्चित ग़ज़ल "पानी" के चंद शेर....

आँखों में पड़े छाले, छालों से बहा पानी
इस दौर के सहरा में ढूँढ़े न मिला पानी

लोगों ने कभी ऐसा, देखा न सुना पानी
पानी में बही बस्ती, बस्ती में बहा पानी

हर सिम्त मुक़ाबिल थीं, बस धूप की तलवारें
पर आख़िरी क़तरे तक, सहरा में लड़ा पानी

हर लफ़्ज़ का मानी से, रिश्ता है बहुत गहरा
हमने तो लिखा बादल और उसने पढ़ा पानी

तन भी न बचा कोरा, मन भी न बचा कोरा
इस बार के सावन में, क्या जम के गिरा पानी

इक मोम के चोले में धागे का सफ़र दुनिया
अपने ही गले लग के रोने की सज़ा पानी

हर एक सिकन्दर का, अंजाम यही देखा
मिट्टी में मिली मिट्टी, पानी में मिला पानी

◆कछु अकथ कहानी : कविता वर्मा

चौड़ी चिकनी सड़क पर बस पूरी ताकत लगा कर जितनी गति पकड़ सकती थी उस गति से दौड़ी चली जा रही थी।  बस के काँच यात्रा के धक्के खाकर पकड़ ढीली कर चुके ...