सोमवार, 27 जुलाई 2020

किस्सा जानकी रमण पांडे : जाकिया मशहदी

◆ किस्सा जानकी रमण पांडे
● जाकिया मशहदी

अब कोई पूछे इन जानकी रमण पांडे एडवोकेट से कि अच्छे-भले इलाहाबाद में थे, रसूलपुर कहां जा मरे। वह भी मुहावरों में नहीं, बल्कि सचमुच। यूं तो आम विश्वास है कि मरने की साअत और जगह पहले से तय होती है। (वैसे मरने से पहले उससे भी बड़ी कुछ घटनाओं की साअत पहले से तय होती है जैसे शादी) लेकिन सवाल यह है कि विश्वास यह कहता है तो फिर हंगामा है क्यों बरपा? मगर क्या कीजिए एक से एक जोड़-जोड़ लगाने वाले टेढ़े दिमाग मौजूद हैं। उनका मानना है कि मरने की साअत और जगह तो ऊपर वाले हाकिम ने तय कर दी अब कुछ तो हमारे हाथों में भी रहे। हम मुर्दे पर नौ मन मिट्टी डालें या मिट्टी का तेल (यूं तो जिन्दों पर भी मिट्टी का तेल डालकर फूंकने की परम्परा, काफी दिन हुए कि कायम हो गई है) या उसे चील कौओं को खिलाएं। और भाई, सौ बातों की एक बात यह कि आस्थाएं वही अच्छी लगती हैं जो अपनी मर्जी और सुविधा से मेल खाएं वरना उठाया डंडा और अपनी मर्जी मनवाने पर तुल गए। हमारा विश्वास तो यही है। अब देख लीजिए पांडे जी की हाल।
पांडे जी का किस्सा तो के.के. मामा सुनाते थे। के.के. यानि कृष्णकान्त। इसी उपनाम से जाने जाते थे। जाति सूचक टाइटिल लगाना उन्होंने बहुत दिन पहले से छोड़ रखा था। कहते थे इस कलयुग में सारे ब्राह्मण-पंडित, चूड़े-चमोरे हमारे साथ उठने बैठने लगे, खान-पान तक का परहेज न रहा। काहे को बाप-दादों का नाम कीचड़ में घसीटें लेकिन कृष्णकान्त के सारे चेले चपाटी जानते थे कि यह इनके हर समय हंसी-ठिठोली करने वाले स्वभाव का अंग था। वह जात-पात का कड़ा विरोध करने वालों में से थे। सरनेम न लगाना दरअसल उनके इस विरोध का सूचक था। के.के. का अपना भांजा तो शायद कोई था भी नहीं। न जाने किसने उन्हें मामा कहना शुरू किया और वह जगत मामा बन गए। लम्बे समय से लखनऊ में रह रहे थे, अच्छी उर्दू बोलते थे और किस्से सुनाने में पारंगत। नख्खास के किसी दास्तान गो की आत्मा ने उनके अन्दर प्रवेश पा लिया था। (ऐसा विचार कभी जानकी रमण पांडे ने ही ज़ाहिर किया था) मामा पान एक गाल से दूसरे गाल में ठेलते और मुंह ऊपर करके कि पीक की छींटें सुनने वालों पर न पड़ें अजीब गोलमोल लहजे में बोलते लेकिन न जाने कैसा जादू डालते थे कि श्रोता उठने का नाम न लें। दे किस्से पे किस्सा।
श्रोता गणों में विशेष थे लम्बे चौड़े परिवार के सारे युवक, दो एक अड़ौसी-पड़ौसी जिनमें मिर्जा अनवर बेग की पत्नी नय्यरा बेग भी शामिल थीं और जो आया गया हो वह अलग। अनवर बेग शायद अकेले ऐसे इंसान थे जो के.के. मामा से चिढ़ते थे ''जनखा कहीं का'' उनकी टिप्पणी होती थी। ''औरतों जैसी गप्पे लड़ाता है। खानदान ने फलाना यूं और ठिकाना यों जैसी गप्पे लड़ाता है।" परन्तु अनवर बेग कुछ भी कहें, के.के. की लोकप्रियता में कभी बट्टा नहीं लगा सके। वह आए नहीं कि जमघट लगा। विशेष कर जाड़ों में कि मूंगफलियों की देरी और गर्मागरम चाय की पियालियां सामने हों, तस्ले में आग जल रही हो और सामने बैठे हों दुलाई में लिपटे के.के., अच्छे खासे जोकर लगते हुए मनोरंजन के नये नये अध्याय खुलते चले जाते।
ऐसे ही किसी ठंडे मौसम में उन्होंने जानकी रमण पांडे एडवोकेट, जो इधर अचानक बैठे बैठे रसूलपुर जा मरे थे और अजीब क्राइसिस पैदा कर गए थे, का किस्सा बयान किया था जो कुछ इस तरह था:
''पांडे जब छोटे थे (और इस बात को बहोत दिन हुए कि पांडे छोटे थे) इनकी अम्मा जो पंडिताइन कहलाती थीं, परलोक सिधार गयी। वह हमारी अम्मा के फुफेरे भाई की साली के जेठ की चचेरी बहन होती थीं रिश्ता तो था ही, सम्बन्ध भी अच्छे थे।''
''जितना रिश्ता था उतने ही सम्बन्ध थे या कुछ कम-बेश?'' बिपिन भय्या को लगंड़ी लगाने की आदत थी चाहे दास्तान हो या जिन्दगी।'' अब भय्या सम्बन्धों की गहराई नापने का कोई आला तो हमने रेज नहीं किया मगर हां सम्बन्ध थे और बहुत गहरे थे और रिश्ता भी कौन सा कम था। अरे मियां पहले लोग चिट्ठी में लिखवाते थे 'थोड़े लिखे तो बहुत जानियो', सो लिखे को ही नहीं, थोड़े रिश्ते को भी जानते थे और निभाते थे हम भी उन्हीं में से हैं'', मामा ने छाती पर हाथ मारकर कहा। पीक की कुछ छींटें उड़ीं और इधर-उधर मिल गई। उन्होंने बाहें पोछीं।
''अच्छा, खबरदार... अब जो कोई बीच में बोला।'' बिपिन भय्या को नय्यरा बेग ने डांटा। वैसे भी सब को डांटने का ठेका उन्होंने ले ही लिया था, विशेष कर अनवर बेग को।
''तो बिटिया, पांडे की अम्मा मरीं तो कुछ दिन बाद उनके अब्बा ने कर लिया दूसरा ब्याह। उस समय लोग बाग जरूरत जानते तो पत्नी के मरने का इंतजार भी नहीं किया करते थे। मज़े से दूसरा ब्याह कर लाते थे उन्होंने पत्नी के मरने के बाद किया तो कौन सा पाप किया। वह भी परिवार की बड़ी बूढ़ियों के आग्रह पर कि ''कि आय हाय पंडित बिन मां का बच्चा कैसा रूल रहा है। दूसरा ब्याह कर लो ना। पांच वर्ष का लड़का कैसे पालोगे?''
नय्यरा बेग ने अभी बिपिन बिहारी को डांटा था लेकिन अपने आप को न रोक सकीं। टप से बोलीं, ''और जो कहीं पंडित जी मरे होते तो कोई न कहता कि आय हाय पंडिताइन दूसरा ब्याह करलेव और तब कोई न सोचता कि पांडे कैसे पलेंगें अगर उनकी अम्मा बिन ब्याह किए रह गईं।''
''ले, तो पांडे को कोई उनकी दूसरी अम्मा ने पाला? पिता श्री ने कर लिया दूसरा ब्याह और अब की जो पत्नी लाए वह पांडे की बड़ी, शादी शुदा बहन उमा से कोई साल भर छोटी थीं।''
''अय हय मामा, साल भर छोटी कि साल भर बड़ी?'' नय्यरा बेग ने फिर टहोका दिया।
''अब नय्यरा बीबी, रहीं तो वह साल भर छोटी। तुम्हारी जी चाहे तो कह लेव कि बड़ी थीं।'' मामा ने पान की गिलौरी फिर इधर से उधर ठेली।
''मामा अब की कोई बोले तो झाड़िये उसको एक लप्पड़'' कान्ती दी ने कहा। वह किस्सा आगे न बढ़ पाने के कारण चिढ़ी हुई थीं।
''तो भय्या!'' मामा ने पनडिब्बा खोल के थोड़ा सा खुशबूदार तम्बाकू और मुंह में डाला। अब हम क्या लप्पड़ झप्पड़ करें, बस तुम अब आगे की सुन लेओ। तो पंडित जी की जो बिटिया इलाहाबाद में बियाही गई थीं वह सबसे बड़ी थीं। नाम तो उमा था पर सारे लड़के वाले उन्हें दिद्दा कहते थे। बस कोई अट्ठारह बरस की थी। उन्होंने मायके के रंग ढंग देखे कि नई मां तो माथे पे टीका सजाए पायल छनकाती रून्न झुन करती घूमती हैं और पिताश्री मर्दाने घर में नई मां के आगे पीछे घूमते दिखाई देते हैं तो उन्होंने ससुराल आके किया यह कि अटवाटी खटवाटी ले के पड़ गईं और पति से कहा कि मान्यवर हम तो भय्या को साथ रखेंगे। तीन बहनें बीच में मर के तब यह भाई पैदा हुआ था और उस पर विमाता मक्खियां भिनका रही है। एक कटोरा दूध को तरसता है जबकि घर में दो गऊएं बंधी हैं। पति ने कहा "भाई हमने कब इनकार किया। तुम यही बात सीधे स्वभाव नहीं कह सकती थीं? यह रानी कैकेई बनने की क्या जरूरत थी जबकि तुम हमारी इकलौती पत्नी हो। रानी भी-तुम, पटरानी भी तुम।" दिद्दा खुश। दूसरे ही दिन वापस आईं और पांडे को लिवा ले गईं। विमाता भी खुश, एक ही कांटा था सो निकल गया। हल्दी लगी न फिटकरी। उनकी पायल के घुंघरू और ज़्यादा छनकने लगे।
पांडे को दिद्दा प्यार से भय्यन कहती थीं और भाई नहीं बेटा समझती थीं। अपने लड़के बाले हो गए तो भी भय्यन का रूतबा कम नहीं हुआ। उनके पति ओंकार नाथ मिश्र ने भी साले को कम मान-दान नहीं दिया। दिद्दा जैसी पत्नी पाकर धन्य थे। मुखड़े पर ब्राह्मणी का तेज, वादा निभाने में राजपूतनी, हिसाब-किताब रखने और जमीन-जायदाद देखने में वैश्य और खट कर सेवा करने में शूद्र। ओंकार उनकी हर बात मानते। भय्यन को उन्होंने भरपूर शिक्षा दी।
बी.ए. के दूसरे व अंतिम वर्ष में थे कि अरमानों भरी बहन जा के उनका रिश्ता तय कर आई।
के.के. मामा ने गिलौरी के साथ पहलू भी बदला और किस्से में तनिक नाटकीयता पैदा की। श्रोता गण मामा के सम्मोहन में बंधे आदर के साथ बैठे कहानी के चरम बिन्दु की प्रतीक्षा कर रहे थे।
''अब भय्या यह सुन लेव कि इधर दिद्दा रिश्ता तय करके आईं, उधर किसी ने जाके भय्यन के कान में फूंक दिया कि लड़की तो जी खोल के काली है। भय्यन का दिल डूबने लगा। बड़ा साहस बटोर के दिद्दा के पास गए। वह तख्त पर चढ़ी बैठी धोबी का हिसाब कर रही थीं। तभी चोर जैसा चेहरा बनाए, आंखें नीची किए, कुर्ते का कोना मरोड़ते भय्यन दबे पांव आकर पीछे खड़े हो गए। पीछे इसलिए कि दिद्दा की सीधी नजरों से बचे रहें और मन की बात उनके कानों में डाल सकें।
''दिद्दा'' कुछ देर बाद उनके मुंह से मरी हुई आवाज फूटी।
''अय हय मरा फिर बटन तोड़ लाया'' भय्यन गड़बड़ा गए। बचपन में निकर, कमीज़, कुर्ता-सबके बटन चबाते और दिद्दा से बड़ी डांट सुनते थे। लेकिन अब... क्या अब भी कोई बटन टूटा है?'' नहीं तो दिद्दा... कहां? वह जल्दी से बटन टटोलने लगे।
''अरे तू? यहां कहां खड़ा है रे? तुझे नहीं इस मरे धोबी को कह रही थी। धोतियां चार, चादरें दो, जाकेट एक...'' ''दिद्दा...'' भय्यन ने इत्मीनान की सांस लेकर सिर खुजाया ''क्या है रे टपक पड़ता है वक्त-बेवक्त। न सुबह देखे न शाम'' ''अच्छा दिद्दा'', भय्यन फिर गड़बड़ा गए। ''हम फिर बात करेंगे।'' ''तुझे नहीं, इस मरे धोबी को कह रही थी। आ बैठ.... बैठ न.... पीछे काहे को खड़ा है।'' उन्होंने लादी सरका के भय्यन के बैठने को जगह बनाई। ''देख न, नाश्ते का समय है और पहुंच गया। उस पर तुर्रा यह है कि कपड़े पटके और नदारद हो गया 'हिसाब करके रखिए, पड़ौस होकर आते हैं।' उन्होंने धोबी की नकल बनाई। ''अब तू बोल क्या कह रह है...?''
''दिद्दा...'' पांडे ने हिम्मत जुटाई और अपने हिसाब से बम का गोला फोड़ा। ''सुना है मिर्जापुर वाली बहुत काली है और तुम बात पक्की कर आईं।''
''क्या?'' दिद्दा के हाथ से धोबी की कापी पेंसिल समेत गिर पड़ी। भय्यन से ऐसी बेशर्मी की उम्मीद नहीं की थी। पेट के जाए जैसे भाई को उन्होंने घूरकर देखा। पांच साल का था कि ले आई थीं। पाला-पोसा। पूरी सेवा की। पढ़ाया लिखाया। उसकी यह मजाल। हालांकि पांडे बेचारे की क्या मजाल थी जो पूरी बात कह पाते। जब से ब्याह की बात सुनी थी एक चांद सा मुखड़ा आंखों में कौंधने लगा था और कहां अचानक उस पर कालिख पुत गई। आने वाले समय की यह तस्वीर तो बड़ी भयानक थी कि सबेरे सबेरे आंख खुली नहीं और काली माई हाजिर। उन्होंने यह सब कहा भी नहीं। बस ढकी छुपी छोटी सी बात कही थी।
''सुनो भय्यन!'' दिद्दा ने नाराज़ होकर धोबी की गठड़ी पर हाथ मारकर कहा। ''सूरत देखी जाती है रंडी की। बिटिया का तो खानदान देखा जाता है। सो खानदान सौ में क्या हज़ार में एक है। संस्कारी लोग हैं। कोई शराब को तो क्या मांस-मच्छी को भी हाथ नहीं लगाता। फिर बिटिया ने हाईस्कूल की परीक्षा भी दी है। अगले मंगल को बरीच्छा है। हां मगर आप फिलहाल पढ़ाई में ध्यान लगाएं।''
इस बीच नाश्ते के लिए गुहार लगाते ओंकार नाथ मिश्र उर्फ भय्यन के जीजा जी उधर को आन निकले थे और होने वाली सलहज के पूरे गुण सुन लिए थे। बड़े गंभीर स्वर में बोले ''बरखुरदार, पहले खानदान वाली से ब्याह कर लो, बाद में कभी एक सूरत वाली भी ले आना।''
दिद्दा ने अपनी बड़ी बड़ी सुन्दर आंखें तरेरते पति को घूर कर देखा लेकिन पांडे ने बात गांठ में बांध ली। खुशी खुशी काली माई को ब्याह कर ले आए। आंगन में पायल छनकारी बहू घूमने लगी। पांडे को दिद्दा से बहुत प्यार था। होना भी चाहिए था। लेकिन वह अपने पिता समान बहनोई की क़द्र भी कम नहीं करते थे। जिस बाप के बीज से जन्मे थे उसने शायद ही कभी उलट कर पूछा था। सारा कुछ बहनोई का ही दिया हुआ था। वकालत भी इसीलिए पढ़वा रहे थे कि खुद वकील थे। भय्यन को घर में ही अच्छी ट्रेनिंग मिल जाएगी। अब ऐसे देवता समान बहनोई की बात वह कैसे उठा देते। सो तालीम पूरी करने के कुछ समय बाद जब उनकी वकालत चल निकली और अच्छा पैसा आने लगा तो वह एक सूरत वाली भी ले आए।''
किस्से की इस पायदान पर पहुंच कर के.के. मामा ने एक ठंडी सांस भरी। गरम चाय दुबारा मंगवाई। श्रोतागणों की उत्सुकता में भी गरमी आई। मामा ने उस समय एक नाटकीय ब्रेक लिया।
ब्रेक में बिपिन भाई साहब ने छत-उखाड़ ठहाका लगाया। कहने लगे यह तो हम सब को मालूम है कि वह सूरत वाली मुसलमनटी थीं लेकिन उससे परिचय कब और कैसे हुआ यह तो मामा ही बताएंगे।
जवाब में मामा ने गिलोरी फिर एक गाल से दूसरे गाल में ठेली और पीक को मुंह में संभाला।
''अबे चुप!'' दूसरे ने उसे झाड़ा। ''चाय आने दे। मामा ज़रा फ्रेश हो जाएं।''
चाय तुरन्त ही आ गई। नय्यरा बीबी ने सबके लिए प्यालों में उड़ेली और आंखें तरेर कर बिपिन से बोलीं, 'इस 'मुसलमनटी' पर तो मैं बाद में तुम से निपटूंगी, ज़रा मामा से किस्सा सुन लूं पहले।' इस पर बिपिन ने तड़ से जवाब दिया, ''तुम हम से क्या निपटोगी नय्यरा भाभी। इतनी बार कहा कोई अपनी जैसी खूबसूरत मुसलमनटी ढूंढ कर ला दो, आज तक न लाईं। हम तो अब तुम्हीं पर आशिक होने वाले हैं। इस साले अनवर के भाग। वह जो कह गए कोई उस्ताद कि ब'पहलू-ए-हूर में लंगूर...' 
नय्यरा ने बिपिन की गर्दन पर थोड़ी सी गरम चाय छलकाई। ''मर, कमबख्त हिन्दुचे।''
गिलोरी का मलबा थूक कर कुल्ली करने के बाद चाय सुड़कते हुए मामा ने दास्तान का सिरा फिर पकड़ा। श्रोता मंडली भी चाय की चुस्कियां ले रही थी।
''बातें तो बहुत उड़ाईं यार दोस्तों ने। उसे रन्डी-मुन्डी तक बना दिया। लेकिन ऐसी बात नहीं थी। उनका खानदान ऐसा हेटा भी नहीं था। रहा मुसलमन्टे-मुसलमन्टी का सवाल मियां कोई कहदे इन नय्यरा बीबी की सूरत देख के कि ये हिन्दू हैं या मुसलमान। माथे पर न कोई ज़ात लेके घूमता है न मज़हब। और मियां हमारा बस चले तो हम दुनिया के सारे मज़हबों को बैन करा दें। इंसानों के बीच इन से ज्यादा फूट किसी ने नहीं डलवाई...'' मामा ने यह अन्तिम वाक्य इतने तैश में आके कहा कि श्रोता पल भर को सुन्न हो गए। वह पल गुज़र गया। मामा फिर सामान्य हो गए।जैसे लोग तैश में आने के बाद प्राय: हो ही जाते हैं।
''पांडे के जीजा जी पंडित ओंकार नाथ मिश्र के पुराने वफ़ादार मुंशी थे, रजब अली। उम्र में मिश्रा जी से कुछ बड़े। पुश्तैनी रिश्ता था। रजब अली के पिता इम्तियाज़ अली बड़े मिश्र जी की ज़मीन जायदाद देखते थे। बड़े मिश्र जी के कहने पर रजब अली को पढ़ाया लिखाया गया। बड़े हुए तो वकील साहब के मुंशी बना लिए गए। दिद्दा, जो घर की बहू थीं उन्हें रजब अली भाई साहब कहतीं। जब कभी इम्तियाज़ अली के सामने पड़तीं तो घूंघट काढ़ कर प्रणाम करतीं। हां उन लोगों के घर का खाना नहीं खाती थीं। मियां यह वह ज़माना था जब लोग एक दूसरे के घर खाएं न खाएं, सौहार्द्र ज़रूर बनाए रखते थे। अब रोटी का रिश्ता तो बना लिया लेकिन दिल के रिश्ते तोड़ लिए। धिक्कार है।'' मामा ने पनडिब्बे से फिर गिलौरी निकाली।
''परहेज़ पके हुए खाने और गीली चीज़ों का था। सूखे सामान, पान, फल, तमाखू वगैरह से कोई परहेज नहीं था। सो ईद में रजब अली के यहां से थाल लग कर आता। तांबे की नई सेनी पर सूखी सिवईयां, लच्छे, फेनियां, सूखे मेवे, शक्कर और तमाशा यह है कि दूध के लिए एक किनारे कुछ रकम रखी होती। सारे लड़के वालों के लिए नाम बनाम लिफ़ाफों में ईदी। यह सारा सामान्य थाल समेत दिद्दा के सामने रखा जाता। दिद्दा बार बार कहतीं अरे रजब अली भाई साहब, फिर नया थाल। कहां न हमें उन बर्तनों से परहेज़ नहीं जिसमें खाना पकता या खाया न जाता हो। पुरानी सेनी ले आया कीजिए और वापस ले जाइए। मगर रजब अली एक न सुनते। रजब अली के गुज़र जाने के बाद दिद्दा ठंडी सांस भर कर कहा करती थीं 'सारी सेनियां भंडार घर में रखी हैं। जाओ गिनो तो मालूम होगा कितनी ईदें साथ गुज़र गईं।
इन्हीं रजब अली की एक विधवा बहन थीं। उम्र में रजब अली से बहुत बड़ी। उन बहन की एक नातिन थी जिसकी मां जवानी में जल बसी थीं और बाप ने दूसरा निकाह कर लिया था। रजब अली विधवा बहन और अनाथ नातिन को साथ ही रखते थे। अपनी कोई बेटी नहीं थी इसलिए उसे बहुत चाहते थे। बड़े अरमान से ब्याह किया। दिद्दा ने भी जोड़े-बागे भेजे। कुछ ही समय में मालूम हुआ कि जिस लड़के से निकाह हुआ था वह मानसिक रोगी था। आखिर को लड़की को खुला दिलाना पड़ा। लड़की घर आकर बैठ गई। एक चुप लग गई थी उसे। रजब अली की असमय मौत भी शायद इसी सदमे से हुई। उनकी मौत पर पांडे उनके घर आए तो पहली बार इस लड़की पर पांडे की नज़र पड़ी। लगा खोपड़ी भक् से उड़ गई। दिन रात में बदला था और चांद धरती पर उतर आया था। रोया-रोया दुखी चेहरा, आंखों में गुलाबी डोरे। वह रोज से ज्यादा खूबसूरत लग रही थी! और निरीह। इस समय पांडे की उम्र काफ़ी हो गई थी। चालीस पार कर चुके थे। बहुत सी अच्छी सूरतें भी देख चुके थे लेकिन दिल यूं कभी नहीं हारा था।
रजब अली की पुरानी सेवाओं का बदला चुकाने के बहाने पांडे ने उनके घर आना जाना बढ़ाया। उपहारों से लाद दिया। बेचारी रजब अली की बीबी, सीधी सादी घरेलू औरत। उस पर से पति की अचानक मौत और लड़की पर जो बीती उसके सदमे से और भी बदहवास। बहुत दिन तक कुछ समझ ही न पाईं। रहीं दिद्दा तो उन्हें बसंत की खबर ही न थी। चौंकी तो पानी सिर के ऊपर बह रहा था। हर हर हर....
''अरे भय्यन! हम यह क्या सुन रहे हैं?''
भय्यन चुप तो चुप।
''अरे बोलता क्यों नहीं? यही मिली थी। एक तो जात-धरम अलग ऊपर से तलाक शुदा!''
''अरे हम पत्थर से बात कर रहे हैं क्या?'' दिद्दा ने फुसुर फुसुर रोना शुरू कर दिया। इश्क तो अच्छे अच्छों की मति फेर देता है। दिद्दा ने ज्यादा शोर मचाया तो पांडे, जो कई साल पहले चुप-चुपाते बहन की पसंद के आगे सिर झुका के सात फेरे ले आए थे, मुंह खोल कर बोल पड़े। हालांकि बोले पूरे आदर के साथ और धीरे स्वर में।
''दिद्दा आप मां समान हैं। अम्मा आज जिन्दा होतीं तो इससे ज्यादा आदर मान हम उनका भी न कर पाते। हमने आपकी लाज रखी।आप हमसे पूछे बिना हमारी ज़िन्दगी का फैसला कर आईं, हमने सिर आंखों पर उठाया। वह पटरानी है, रहेगी। लेकिन यह हमारा प्यार है, वह भी रहेगी।''
दिद्दा सुन्न हो गईं। भय्यन ने उन्हें जवाब दिया था। अब इसके आगे तो कुछ कहने सुनने को ही नहीं रह गया था।
''वह भय्यन साहब वाह। बड़े सूरमा निकले। एक यह हमारे बिपिन भय्या हैं। लड़की का धर्म दूसरा नहीं था, सिर्फ जात दूसरी थी, अम्मा ने डांट पिलाई बस झपट के उन्हीं के आंचल तले आन छिपे।'' एक श्रोता ने कहा।
''शेम शेम!'' कोरस में सब ने आवाज़ बुलन्द की।
''और ज़रा 'जेनरेशन गैप' की बात करने वालों के मुंह पर तो टेप लगाओ जाके। लोग बिना कारण आज के लोगों को बदनाम करते हैं। यह पिछले कुछ कम थे क्या?'' एक और टिप्पणी।
बिपिन को सांप सूंघ गया। उनका रुआंसा चेहरा देख कर कोई उनकी मदद को आगे आया। ''अच्छा मामा, फिर आगे क्या हुआ? आगे भी तो कुछ हुआ होगा।''
''आगे जो हुआ वह विधाता का किया हुआ था। उसमें पांडे, दिद्दा या उस मिर्जापुर वाली का कोई हाथ नहीं था। जब पांडे ने उस सूरत वाली से ब्याह किया उस समय उनकी दो बेटियां थीं। यही कोई पांच-छ बरस की। उधर उन्होंने दूसरा ब्याह किया उधर साल भर के अन्दर पट से बेटा। फिर दूसरे बरस एक और बेटा। इधर तीसरी भी बेटी। अब दिद्दा से न रहा गया। बधावा लेकर गईं। बड़े बड़े पुश्तैनी झुमके भावज को पहनाए। भतीजों का मुँह देख कर निहाल हो गईं। चांद-सूरज की जोड़ी थे। उनकी खूबसूरत कम उम्र मां ने झुक कर आदाब किया तो उसकी बलैयां ली। 'दूधों नहाओ, पूतों फलो' कहकर आशीर्वाद दिया। उसके हाथ से पान की गिलौरी लेकर खाई। पांडे पानदान सजा कर रखवाते थे, पान की लत थी।
घर वापस आकर दिद्दा ने सतनारायण भगवान की कथा रखवाई। प्रसाद लेकर एक बार फिर उस विधर्मी भाभी के घर गई। साफ़ साफ़ तो कुछ नहीं कह सकीं बस प्रसाद आगे बढ़ाया जो उसने मुस्कुरा कर दोनों हाथों का कटोरा सा बना कर बड़े आदर के साथ लिया, फिर माथे पर छुआ कर पी गई। कमबख्त कैसी सुन्दर है, हाथ तो देखो चांदी के बने लगते हैं। दिद्दा ने सोचा-अरे यह तो बड़ी संस्कारी, बड़ों का आदर मान करने वाली लड़की है। फिर तनिक रुक कर बोलीं, भय्यन के साथ तुम्हारी जोड़ी राम-सीता की जोड़ी लगती है। आज से हम तुम्हारा नाम जानकी रखते हैं। मालूम है, सीता मय्या का ही यह एक और नाम है। भय्यन के नाम में भी जानकी जुड़ा हुआ है।'' रौशन आरा मुस्कुराई (''नाम में क्या रखा है'' कह गए मियां शेक्स्पियर सदियों पहले। कुछ महानुभावों ने उन्हीं पर उनकी सूक्ति अज़माई। कहा उनका नाम तो शेखपीर था)।
लड़कों के नाम रखे गए थे आमिर और साबिर। दिद्दा ने आमिर को अमर और साबिर को सुवीर कर दिया। इस तरह सबको ख़ानदान में शामिल करके सतनारायण भगवान का प्रसाद चखा के लौटी। इस्लाम और हिन्दू धर्म के बीच की खाई उन्होंने पल भर में पाट के रख दी। इतनी जल्दी तो हनुमान जी की सेना भारत और श्रीलंका के बीच का पुल भी न बना पाई होगी। लेकिन इस सारी कार्रवाई का 'फ़ॉल आउट' ज़रा गड़बड़ रहने लगी थी। मियां, यह सास-ननदों वाले झगड़े होते तो हर घर में हैं लेकिन शरीफ़ घरानों में ज़रा ढके छिपे रहते हैं।
''हां साहब, राजकुमार ऐन और प्रिन्सेस डायना में कभी नहीं बनी।''
वाह साहब सीधे इंगलिस्तान पहुंच गए। अपनी देसी सफ़दर जंग रोड को क्यों भूल रहे हैं?
बात पांडे से राजनैतिक हस्तियों तक आ गई। चाय के साथ मूंगफलियों और परनिन्दा का दौर बहुत देर तक चला। ख़ासी तफ़रीह रही। बकौल मुश्ताक़ यूसुफ़ी गीबत (परनिन्दा) और मूंगफलियां ज़ाड़े में बहुत मज़ा देती हैं।
...यह बैठकें अब भी होती थीं लेकिन वह मज़ा नहीं रह गया था। के.के. मामा केवल पचपन वर्ष की अल्पायु में, जिसे वह भरी जवानी कहा करते थे, कैंसर का शिकार हुए और अगले दो साल के अन्दर चटपट चले गए। उनकी कहानी के नायक भी कुछ ऐसे बूढ़े नहीं हुए थे। बस साठ से पांचेक बरस ऊपर आए थे। हृष्ट पुष्ट देह थी। मरने के लक्षण कहीं से भी नहीं दिखाई देते थे। लगता था अस्सी पचास्सी से पहले तो एक ईंट भी नहीं खिसकने की। इमारत की कौन कहे।
हां, दिद्दा स्वर्ग सिधार चुकी थीं और लड़कियां सयानी थीं इसलिए पत्नी का दबाव उन पर बढ़ गया था। दूसरे घर जाते भी तो जल्दी चले आते। इस बार गए तो सारा अगला पिछला हिसाब चुकता कर दिया। वहीं मर गए। बस यूं ही, अचानक बैठे बैठे। के.के. मामा तो हैं नहीं वर्ना कहते अब मियां, न किसी पे दिल आ जाने का कोई समय निर्धारित है न आंधी, शादी और मौत का। कभी कभी ऐसे अचानक आती है कि पूछो मत। अब देख लेव अच्छे भले पांडे घर में बैठे थे यह रसूलपुर कहां जा मरे। माना कि वह वहां रह रही थी, उनकी चहेती बीबी रौशन आरा लेकिन उस घड़ी न जाते तो शायद मरते ही नहीं। और मरते बेशक पर रसूलपुर में तो न मरते।
पांडे ने जब रौशन के सामने ब्याह का प्रस्ताव रख रख के उनकी नाक में दम कर दिया था तो उसने एक दिन कहा था, ''मगर पंडित, (वह पांडे को इसी तरह सम्बोधित करती थी) तुम्हारा और हमारा धर्म अलग है। उस पर तुम ठहरे शादीशुदा, दो बच्चियों के बाप। अब तुम लाख कहो कि तुम हम पर ज़हर खाते हो...''
" मज़हब! धर्म! हां है तो। तुम मुसलमान, हम हिन्दू। रही बात हमारे शादीशुदा होने की तो उसे क्यों बीच में लाती हो। तुम्हारे मज़हब में तो चार की इजाज़त दे रखी है।"
रौशन मुस्कुराई। ''हिन्दू के ऊपर तो कोई पाबन्दी सिरे से है ही नहीं। चार करो या चालीस।''
पांडे झुंझलाए ''अरे सरकार ने लगा दी न वर्ना हमारे पुरखों में एक महानुभाव थे, एक ही घर से एक के बाद एक चार बहनें ब्याह लाए। फिर वहां लड़कियों का स्टॉक खतम हो गया तो एक कोठे वाली रख ली। मगर तुम पर तो अब भी पाबन्दी नहीं है न...''
रौशन आरा ने आंखें निकालीं, ''हम पर तो है, हमारे मर्दों पर नहीं। बाई द वे पंडित तुम हमें समझते क्या हो?''
''जान-ए-पंडित''
''इस ख़ालिस हिन्दू लफ़्ज के साथ इज़ाज़त अच्छी नहीं लगती, जैसे हमारी तुम्हारी जोड़ी। अनमिल-बेजोड़।''
''रौशन आरा तुम हम से पिट जाओगी।''
रौशन अचान गंभीर हो उठी। ''पिट तो हम चुके हैं। जिन्दगी की बिसात पर एक बेबज़ाअत (तुच्छ) मोहरे की तरह। पंडित, अब हम क्या करें?'' वह हाथ मलने लगी थी। उसके स्वर में बला की लाचारी थी।
''कुछ मत करो। बस चुपचाप हम से ब्याह कर लो।''
''तुम्हे मज़हब बदलना पड़ेगा। हम कोर्ट मैरेज नहीं करेंगे।''
''कोर्ट मैरेज तो वैसे भी नहीं हो पाएगी। घर पर वह जो है न मिर्जापुर वाली उससे कैसे इनकार करेंगे। वह हमारी ब्याहता है। विधि-विधान से ब्याह कर लाई गई पत्नी।'' ''तो हमें रखैल बनाओगे क्या?''
अबकी बार गंभीर होने की बारी पांडे की थी। जिसे यूं टूटकर कर चाहे उसका यह घोर अनादर! पल भर को वह जड़ हो गए।
''बोलो पंडित।'' रौशन आरा के स्वर में एक अन्तिम जवाब का आग्रह साफ़ था।
''हम निकाह करेंगे।'' पांडे का अन्तिम निर्णय भी साफ़ था।
''मज़हब बदलना पड़ेगा, जानते हो न?''
''अब वकील को तुम पढ़ाओगी रौशन आरा बेगम। तुम, एक औरत, जिसके बारे में बुजुर्ग कह गए कि उसकी अक़्ल एड़ी में होती है।''
''एड़ी में किसकी अक़्ल होती है यह फैसला बाद में करेंगे। पहले तुम यह सोच लो कि रास्ता कांटों भरा है। अपने पुरखों का मज़हब छोड़ के...''
''ऐसी की तैसी...'' पांडे ने होंठ काटे।
''किसकी ऐसी तैसी कर रहे हो, मज़हब की या बुजुर्गों की?"
''समाज की जिसने मज़हब बनाया। मगर हां, तुम्हारा मज़हब तो आसमान से उतरा है।''
''अभी हिन्दू हो इसलिए जो जी चाहे कह लो। मुसलमान हो गए तो बेअदबी की इजाज़त नहीं होगी।''
''यार तुम्हारे मज़हब में बड़ा रेजीमेन्टेशन है।''
''शायद'' रौशन आरा ने सोचा लेकिन कुछ कहा नहीं।
रात को घर जाकर पांडे पत्नी की बगल में लेटे तो उन्हें नींद नहीं आई। वह सिग्रेट सुलगा कर बरामदे में जा बैठे। शादी के कुछ दिन बाद दिद्दा ने अपने बंगले के बगल में खाली पड़ी जमीन पर बनी कॉटेज में उन्हें अलग कर दिया था ताकि दोनों परिवारों में सौहार्द बना रहे और दूर भी न हों। दोनों घरों का साझा कम्पाउंड था और दिद्दा की देख-रेख में निपुण माली के हाथों सजाया गया बाग। ऐसे खूबसूरत पेड़ पौधे, ऐसे हरे भरे कि देखते रह जाओ। हवा उनके बीच से होकर आई तो कुछ ज्यादा शीतल महसूस हुई। चांद आसमान के बीचों बीच नीली छतगीरी में फ़ानूस की तरह टंगा हुआ था। मौलसिरी की सुगन्ध तम्बाकू की महक पर हावी होकर किसी तांत्रिक के फूंके मंत्र की तरह उनके चारों ओर मंडराती रही।
अभी सवेरा होने में कुछ देर थी कि वह कुरसी से उठकार दिद्दा की ओर चल पड़े। एक तरफ सफ़ेद मुसंडे के बड़े बड़े झाड़ खड़े हुए थे। एक जातक कथा के अनुसार महात्मा बुद्ध अपने किसी जन्म में श्रीलंका के जंगलों में भटक गए थे। अमावस की रात और घना जंगल। टटोलते आगे बढ़ रहे थे कि अचानक मुसंडों के झुंड में चांदनी जैसे फूल खिल उठे। सारा जंगल रौशनी से भर उठा। यहां से वहां तक चांदनी बिखर गई। चांद की नहीं, फूलों की चांदनी। तब महात्मा बुद्ध ने मुसन्डे को आशीर्वाद दिया। उस आशीर्वाद की छाया आज तक उस पर है। उसमें सारे साल फूल खिलते हैं। पांडे को यह कहानी बहुत पसंद थी। अब पता नहीं उसका असर था या वास्तव में इन फूलों में ऐसा कोई गुण था कि देखो तो मन-मस्तिष्क में एक शीतलता भर उठे। क्या यह महात्मा बुद्ध का आशीर्वाद था? लेकिन क्या बुद्ध जी ने मानव मात्र के कल्याण की दुआ न की होगी? सद्बुद्धि की दुआ? मन की कटुता दूर होने की कामना? बुढ़ापे, बीमारी, मृत्यु, जन्मजात स्वार्थ से मुक्ति की इच्छा? उस इच्छा के पूरा होने का आशीर्वाद? यह सब तो आज भी उतने ही भयावह हैं, उसी तरह हृदय को आतंकित करते रहते हैं। अम्मा, प्यारी अम्मा.... युवावस्था में परलोक सिधारने वाली मां को याद करके पांडे की आंखें भर आईं। रात के इन अन्तिम पहर में उनके मन में हूक सी उठी। अम्मा मर के कहां गई होंगी? क्या सचमुच उन्हें वैतरणी पार करनी पड़ी होगी? क्या इस जहां से आगे और भी जहां है? क्या मरने के बाद पांडे अम्मा से मिल सकेंगे? जीवनकाल में नन्हें दुधमुंहे बेटे को हर समय कलेजे से लगाकर रखने वाली अम्मा क्या उनके लिए व्याकुल होती होंगी? हर साल गया जाकर पिंड दान करने से क्या सचमुच उनकी आत्मा को शान्ति मिलती होगी? आत्मा? आत्मा क्या है?
(रौशन आरा भी मुंशी रजब अली के नाम से फ़ातेहा पढ़ के कहती है कि इससे इनकी रूह को सुकून मिलता होगा और सवाब भी) यह गुनाह और सवाब क्या है? रौशन ने इन्हें कभी चुम्बन नहीं लेने दिया, सिर्फ हाथ पकडऩे की इजाज़त थी। यह गुनाह है... वह कहती थी (वैसे तो रौशन बीबी तुम्हारी आस्था के मुताबिक तुम्हारा मुझसे मिलना, या औरत-मर्द के बीच आकर्षण को राह देना ही गुनाह है) किसने बनाए यह पाप-पुण्य के पैमाने? वह तेज़ तेज़ चलने लगे.... अगर वह कलमा पढ़ के कहते हैं कि मैं मुसलमान हूं तो भी वह जानकी रमण पांडे ही रहेंगे या कुछ और हो जाएंगे?
फिर उन्होंने पूरे अदालती तर्क-वितर्क के बाद फैसला किया कि रहेंगे तो वह वही जो हैं... अपने सारे विवेक, सारे ज्ञान, अपने शरीर, अपने रंग-रूप, अपनी भावनाओं और संवेदनाओं, अपनी त्रुटियों, अपने स्वार्थ, अपने हर राग-द्वेष के साथ... राग अनुराग... उनकी दो बेटियां थीं और एक पत्नी। पत्नी के लिए उन्होंने किसी ऐसे मोह, भावनाओं के ऐसे ज्वार को नहीं महसूस किया था जैसे रौशन आरा के लिए लेकिन थी तो वह उनकी जीवन संगिनी। उसने कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था। और फिर दिद्दा और बेटियां? क्या उनके लिए उनके मन में प्यार सिर्फ इसलिए कम हो जाएगा (या खत्म) के वह अपने ऊपर एक नया लेबेल लगा लेंगे? यह कैसे हो सकता है जानकी रमण पांडे! उन्होंने अपने आप को झाड़ पिलाई। फिर यह कौन से झगड़े हैं, यह अल्लाह-भगवान के फ़र्क। (यह कभी मिटते नज़र नहीं आते। उन्होंने बड़ी पीड़ा के साथ सोचा)
अगले सप्ताह उन्होंने रौशन आरा से जा कहा कि वह कलमा पढ़ने को तैयार हैं।
''मगर रौशन'' उन्होंने झुकी पलकों और रौशन चेहरे वाली रौशन से कहा, ''मैं विष्णु का भक्त हूं। दिल से उन्हें नहीं निकाल सकूंगा। तुम यह समझ लो कि यह सारे नाम, यह सारी परिकल्पनाएं इन्सानों ने अपने बुनियादी सवालों के जवाब में ढूंढ़े हैं। यह दुनिया किसने बनाई? लोग मरते क्यों हैं? मरने के बाद कहां जाते हैं, क्या होता है? क्या दुनिया में जो अन्याय, जो दुख हैं उनकी कहीं कोई भरपाई है? जिन्हें कानून सजा नहीं दे पाता उन गुनाहगारों के लिए कहीं कोई सज़ा है? क्या परहित करने वालों को कहीं उनके अच्छे कर्मों का फल मिलेगा? रौशन बेगम, दुनिया में बड़े पाप, बड़े जुल्म हैं। धर्म न होता तो उनकी और भी बाढ़ आ जाती। धर्म कहो या मज़हब यह इन्सान में घुसे शैतान के सामने लक्ष्मण रेखा खींचता है, दुख में, क्राइसिस में धीरज बंधाता है, उम्मीदें जगाता है रौशन, तुम्हारा अल्लाह रहमान व रहीम है, पालनहार है, गुनाहों को माफ़ भी करता है और उनकी सज़ा भी देता है। मेरे विष्णु में भी लगभग यही गुण हैं और हां, वह मुस्कुराए, ''तुम्हारा अल्लाह जो रब्बु-उल-आलमीन (सम्पूर्ण संसार का ईश्वर) कहलाता है, रब्ब-उल-मुस्लिमीन (केवल मुसलमानों का ईश्वर) नहीं... क्या मेरा रब नहीं हुआ? अब मैं उसी को बीच में डालकर तुम्हारा हाथ थामूंगा, हां उसकी पूजा अर्चना उसके उसी रूप में करता रहूंगा जिस रूप में करता आया हूं।''
''दूसरी बात यह रौशन बेगम कि मैं अपनी पत्नी और दोनों बच्चियों को नहीं छोड़ सकता। वह जैसी भी है सात फेरे डालकर ब्याही बीबी है, उसकी पीठ पर हमारे पूरे समाज का हाथ है। किसी एक रिश्ते पर सबको बलि नहीं चढ़ाया जा सकता।'' वह तनिक रुके। लम्बी सांस ली और मुस्कुराए। मिसेज़ सिम्पसन् वाले किंग एडवर्ड का नाम मत लेना। वह ठहरे राजा। वह भी इंगलिस्तान के। हम आम आदमी, जनता जनार्दन, वह भी भारत के बड़े ही पुराने गूढ़ वर्णाश्रम का एक हिस्सा।''
हाथों के कटोरे में चेहरे का चांद थामे बड़े ध्यान से पांडे का प्रवचन सुनती रौशन हंसी। एक दुख भरी हंसी। ''पांडे मैंने अपना दिल तुम्हारे हवाले करते वक़्त यह नहीं सोचा था कि तुम जानकी रमण पांडे हो और मैं रौशन आरा। जब मैंने नामों के पीछे छिपे फ़र्क को पहचाना, उस वक़्त बहुत देर हो चुकी थी। तुम्हारा जो जी चाहे करते रहना। बस कलमा पढ़ के उंगली में जरा सा ख़ून लगा के शहीदों में शामिल हो जाओ क्योंकि निकाह के अलावा साथ रहने की कोई सूरत मुझे मंजूर नहीं है। मैं तो तुमसे गोश्त खाने को भी नहीं कहूंगी। जब मेरे यहां आओगे, गाय बैल का चारा डाल दिया करूंगी तुम्हारे आगे'' वह शरारत से मुस्कुराई फिर एकाएक गंभीर हो गई। तुम्हारी बीबी का हक़ छीनने की बात सोचूं भी तो सुअर खाऊं। मेरे यहां अपने की बात यह है कि जब चाहो आना और इतने ही दिन रहना जितने में तुम्हारा अमन-चैन खतरे में न पड़े।''
अगले हफ़्ते दोनों का निकाह हो गया। जानकी रमण पांडे ने निकाह से पहले एक डरे-सहमे, बेचारे से मौलवी के सामने इस्लाम कबूल किया। उस समय रौशन की नानी यानि रजब अली की बीबी बहुत उदास थीं और बहुत परेशान भी। अपनी परेशानी में उन्हें यह परवाह भी नहीं रह गई थी कि रौशन ने एक हिन्दू से निकाह किया है। कलमा पढ़ना कोई मानी नहीं रखता। यह महज़ सहूलियत के लिए है। उन्हें दुख यह था कि वह ओंकार नाथ की बहू को क्या मुंह दिखाएंगी, किस मुंह से उन्हें ईद की सिवईयां भेजेंगी। उसका दिमाग़ सुन्न हो रहा था। इस घर से इतने पुराने सम्बंध हैं। यही घर रह गया था सेंध मारने के लिए। अब जानकी रमण ठहरे मर्द, उन्हें कोई कुछ न कहेगा हालांकि रौशन न उनको देखते ही उनके ऊपर आशिक़ हुई थी, न उसने आने जाने और हेल मेल बढ़ाने के बहाने ढूंढे थे। बल्कि शुरू में तो वह जानकी रमण की आर-जार को बड़े शक की नजरों से देखती थी। लेकिन वह ज़िन्दगी के बेहद नाजुक दौर से गुज़रती एक कम उम्र की अकेली पड़ी लड़की थी। तवज्जो और प्यार पाया तो लुढ़क गई। लेकिन यह सब कौन देखता सुनता और कौन यह स्पष्टीकरण पाने को दम भर रुकना पसंद करता। और फिर यही हुआ। किसी ने पांडे जी को कुछ न कहा, सब कूद पड़े रौशन आरा पे।
कुलटा, कुलच्छिनी। पहले पति को छोड़ आई। ऐसी सुंदर औरत को कोई मारता है भला? आवारा होगी इसीलिए मार खाती होगी। उस पर दोष लगा दिया की दिवाना, पागल है। पास न आने देती होगी तभी तो तीन बरस में भी चूहे का बच्चा तक न जनके गिया। और यहां... इधर पांडे से ब्याह रचाया उधर बेटा। क्या पता पांडे से तभी से आशनाई रही हो। बेसुआ। धर्म अधर्म की भी नहीं सोची। ब्राह्मण का धर्म भ्रष्ट किया, सीधी नरक में जाएगी। अरे इसे तो नरक में भी जगह न मिलेगी। न जाने क्या क्या खिला रही होगी उन्हें।
फिर दुनिया जहान की सुनते, कुछ स्वयं कहते पत्नी ने पांडे से कहा। ''तुम वहां खा के आते हो, अपने बरतन अलग कर लो। यहां हमारे थाली कटोरों में मत खाना।''
पांडे पत्नी के साथ बड़ी नरमी बरतते थे। न जाने किस तरह अपना बचाव किया था और न जाने कैसी कैसी पट्टी पढ़ाई थी लेकिन खाने की बात पर गीता उठा के ले आए। उस पर हाथ रखकर सौगंध खाई। ''हमारे 'वहां' रहने पर बिल्कुल अलग बर्तनों में खाना बनता हैं। 'वह' स्वयं उन दिनों मांस-मछली नहीं खाती। शुद्ध सात्विक खाना होता है।'' इस 'वह' पर मिर्जापुर वाली के तन बदन में आग लग जाया करती थी। लेकिन गीता पर हाथ रखकर सौगंध उठाते पांडे ऐसे निरीह, ऐसे सच्चे, इतने दुखी लगे कि उसके बाद उसने इस खाद्य-अखाद्य के मसले पर रार मचाना छोड़ दिया।
खाने को तो पांडे ने कसम खा ली लेकिन उस दिन से बड़े शोकाकुल रहने लगे थे। जीवन में पहली बार अपने आप को सच्चा साबित करने के लिए इस अन्तिम हद से गुज़रना पड़ा था। लगा वह वकील नहीं हैं, मुजरिम के कटघरे में खड़े हैं। रामायण का वह प्रसंग याद आया जहां सीता अग्नि परीक्षा से गुज़री थीं। वह बहुत देर तक बैठे सोचते रहे। यह हलाल-हराम, खाद्य-अखाद्य है क्या? कोई गोश्त खाए या न खाए। कोई गोश्त खाता भी हो तो सूअर न खाए या फिर गय्या को वर्जित जाने। सब्ज़ी तक में कहीं कहीं प्याज़ के पकौड़े बनवाने शुरू कर दिए थे। दिद्दा के ससुराल में इनके जेठ के दो लड़कों के घरों में इस खान पान को लेकर चूल्हा अलग हो गया था। बरसों से चला आ रहा संयुक्त परिवार बिखर गया। दिद्दा के जेठ बहुत दुखी रहा करते थे। उनके एक लड़के ने न जाने किस की संगत में गोश्त खाना शुरु कर दिया था। उसकी पत्नी किसी नेवल ऑफिसर की बेटी थी। कॉफ़ी मॉर्डन। उसने मना करना तो क्या इस बात को बहुत पसंद किया। प्याज़ लहसुन का इस्तेमाल तो जी खोल कर हो ही रहा था। गोश्त चोरी छुपे पहले तो होटलों पर सीमित रहा फिर जब हियाव कुछ और खुला तो बिरयानी और मुर्गा नाश्ते दान में भर भर कर घर तक आने लगे। चतुर्वेदी ब्राह्मण के यहां यह अनर्थ। राम राम राम! दोनों भाइयों के यहां खुल के झगड़ा हुआ। बड़ा बेटा पुराने विचारों का था और बाप को बहुत प्यार भी करता था। इनकी ज़िन्दगी तक यह सब न होता तो बात इतनी न बढ़ती। छोटे का चूल्हा अलग करा दिया गया। बड़ा सा दो तल्ला घर दो अलग अलग घरों में बंट गया। मां-बाप बड़े बेटे के साथ हो गए। चूल्हा अलग हुआ तो उन सब छोटी छोटी बातों को लेकर लड़ाई होने लगी जो पहले अनदेखी कर दी जाती थीं। एक दिन मज़ाक ही मज़ाक में बड़ा हंगामा हो गया। देवर ने बड़ी भावज से कहा- भाभी एक दिन मुर्गे की टांग चबा कर तो देखो, मुर्गा तो क्या आदमी तक खाने लगोगी। 
भाभी इतना चिल्लाई कि सारा घर इकट्ठा हो गया। ऐसी रार मची कि जमीन जायदाद के बटवारे तक की बात होने लगी। (बटवारे की बात सच पूछा जाए तो पहले से मन में थी। उसका अच्छा मौक़ा मिल गया।) इन्सान कितने मूर्ख हैं। कब तक रहेंगे भला? रौशन आरा बता रही थीं कि उनकी अम्मा कभी सूअर का नाम नहीं लेती थीं। 'बुरा' कहती थीं या सूरत हराम। कहती थीं सू्अर का नाम लेने से घर में रहमत के फ़रिश्ते नहीं आते।
''और बीबी रौशन आरा तुम वह लोग हो जो मुर्गा, बकरा, गाय-भैंस, यहां तक कि ऊंट-घोड़ा सब खा डालते हो।''

''हम तो नहीं खाते ऊंट-घोड़े। और बीफ़ तुम्हारी वजह से छोड़ दिया।"

"हलाल तो हैं न ऊंट-घोड़े। तुम्हारे वह दूर के रिश्तेदार जो हैं, अरे वह..बद्दन मियां। उन्होंने छ बेटियों के बाद बेटा होने पर ऊंट की कुर्बानी दी थी। तुम्हारे यहां हिस्सा भिजवाया था। लोग बेटी पैदा होने पर ऊंट क्या बकरी की भी कुर्बानी न दें। लाख तुम कहते रहो कि इस्लाम में औरत का दर्जा बुलन्द है लेकिन धर्म और सामाजिक रीतियों में टकराव हर जगह दिखता है... पंडित ने यह भी कहा था।"

''हम ने कहां खाया वह ऊंट?''

"फिर वही मुर्गे की एक टांग! अरे हलाल है न, तुम्हारे धर्म भाई खाते हैं। तुम खाओ या मत खाओ।"

"मुर्गे की एक टांग तो तुम ने लगा रखी है। लगता है रेकार्ड पर सूई अटक गई।"

''सूई इसलिए अटकी कि तुमने यह नहीं बताया कि तुम लोग सूअर से इतना क्यों बिदकते हो? याद है एक वादा तुमने कुछ इस तरह किया था कि तुम्हारी बीबी का छीनूं तो सूअर खाऊं।''

''शायद इसलिए कि बड़ा ही गन्दा और घिनावना लगता है।''

"सो तो हमें भी लगता है लेकिन तुम्हारे यहां तो गधा भी हराम है और कुत्ता भी। तो तुम लोग नाराज़ होकर 'सू्अर खाना' क्यों कहते हो, गधा खाना, कुत्ता खाना क्यों नहीं कहते?'

''इस पहलू पर हमने कभी ध्यान नहीं दिया। हां अब तुम इस पर रिसर्च कर लो।"
रौशन आरा ने आंखें निकालीं... अरे पंडित घर में ही दंगा कराओगे क्या? बाहर तो बहुत करा लिए तुमने!'' 
पांडे खिलखिला कर हंसे।
हाल ही में एक दंगा होते होते बच गया था। कोई टेढ़े दिमाग वाला मस्जिद में गोश्त की पोटली फेंक गया था। अब वह गोश्त किस का था यह जानकारी तो नहीं ली जा सकी लेकिन मस्जिद में फेंका गया इसलिए जरूर किसी नापाक जानवर का ही रहा होगा। भड़के हुए नौजवानों को समझा बुझा कर ठंडा करने में पांडे आगे आगे रहे। वह इन दिनों रौशन आरा के पास रसूलपुर आए हुए थे।
''तुम लड़कर उनसे नहीं जीत सकोगे जो संख्या में तुमसे इतने ज्यादा हैं। तुम्हारी गलतियां तुम्हारे लोगों के बड़े नुकसान का कारण बनेंगी। धैर्य रखो। छोटी छोटी बातों से आपे से बाहर मत हो जाओ।'' पांडे ने समझाया था।"

''यह छोटी बात है?'' कुछ लड़कों ने आंखें निकाली थीं।

''समझो तो छोटी ही है। पोटली उठाकर फेंक दो। मस्जिद का आंगन धो डालो किस्सा खतम। जो तुम्हें चिढ़ा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं वह भी एक दिन शान्त हो जाएंगे।'' मगर बड़ी देर लगी जोश में आए लोगों को ठंडा करने में। पांडे ने स्वयं पोटली उठा कर कूड़े पर फेंकी। फिर बाल्टी भर भर पानी लाए। गरम माहौल ठंडा पड़ा और कोई बड़ी घटना होने से टाली जा सकी।

(''बड़ी घटना होती भी कैसे? मुसलमानों में दम है कहीं? कुछ फुटर फुटर करेंगे तो तुम उन्हें पीट पाट के रख दोगे। कब्रिस्तानों पर कब्जा भी करोगे और उन्हें कब्रिस्तान भेजने की धमकी भी दोगे। पाकिस्तान तो हम जाने से रहे'' रौशन की टिप्पणी थी। बाबरी मस्जिद का मामला उन दिनों गरम हो रहा था। कोई रौशन के दरवाज़े पर खरिया मिट्टी से लिख गया था 'मुसलमानों के दो स्थान - पाकिस्तान और कब्रिस्तान।)

रौशन बिल्कुल जड़ हो गई थी। चेहरा ऐसा जैसे आसपास किसी चीज़ का होश न हो। लम्बे लम्बे बाल जो उस रात पांडे ने खोल कर अपने शानों पर बिखराए थे, उसी तरह बिखरे हुए थे और थोड़ा उलझ चले थे। आंखों के नीचे काले घेरे उभर आए थे। आंखें, जो अब भी रौशन और चमकदार थीं उनमें किसी ने आश्चर्य जैसे कूट कूट कर भर दिया था। आश्चर्य इस अनहोनी पर जो हो चुकी थी। मन उसे स्वीकार नहीं कर पा रहा था। कहीं यह बात भी कचोट रही थी कि पांडे उसके पास आकर ही क्यों मरे (लेकिन शायद वह अपने घर पर रहकर परलोक सिधारे होते तो उसको यह सदमा चैन न लेने देता कि उनके अन्त समय में वह उनका मुँह न देख सकी।) पता नहीं वहां लोग क्या सोचेंगे। दोनों बेटे तो थे ही, और बहुत से लोग इकट्ठे हो गए।
पांडे पास पड़ौस में बहुत लोकप्रिय थे। लेकिन रौशन की समझ में नहीं आ रहा था कि जो आज तक लोगों को पता नहीं चला वह राज कैसे खोले। कैसे कहे कि उसका शौहर मुसलमान नहीं है, उसका क्रिया-कर्म हिन्दू रीति से होना चाहिए। वह पूरा गांव मुसलमानों का था कुछ ब्राह्मण और राजपूत घर थे। गांव के हाशिए पर कुछ दलितों की झोपड़ियाँ थीं। मगर क्या पांडे को किसी खांचे में रखा जा सकता था? किस खांचे में?
काफी समय गुजरा। एक रात जब वह रौशन के इन्हीं लम्बे, काले घने बालों में उंगलियों से कंघी करते, उसका सिर अपनी छाती पर टिकाए लेटे हुए थे तो रौशन ने कहा था, "पंडित तुम कितने बड़े रियाकार (धूर्त) हो। जुमे के दिन मस्जिद में जाके नमाज भी पढ़ आए। सच कहना नमाज में क्या पढ़ा था? गायत्री मंत्र या हनुमान चालीसा?"

पांडे हंसे थे। हमें सातों कलमें याद हो गए हैं और अलहम्द (कुरान की एक सूरह) भी। वही हेर फेर के पढ़ लिए। बाकी उठ्ठक-बैठक बस इमाम साहब के पीछे वैसे ही करली जैसे दूसरे कर रहे थे। फिर वह अचानक ही गंभीर हो उठे, 'दो मुल्लाओं के बीच मुर्गी हराम होते कभी देखी है रौशन?''

''क्यों मुर्गी कहां से सूझ गई पंडित? वह भी हलाल-हराम के फ़र्क से। खाओगे क्या?''

''रौशन''। पांडे गंभीर ही रहे! हम सीधे सादे हिन्दू थे। तुम्हारे चक्कर में नकली मुसलमान बने। फिर असली हिन्दू भी न रहे। पक्के नास्तिक हो उठे। वह क्या कहा जाता है नेचरी।

रौशन ने एक झटके से घने बाल पीछे फेंके और उठकर बैठ गई। ''वाही तबाही मत बका करो। चलो खाना लगाती हूं।'' वह किचन की तरफ़ बढ़ गई। देखा पंडित पीछे पीछे चले आ रहे हैं। फिर वह गैस के चूल्हे से कोहनी टिका कर खड़े हो गए।

''रौशन, पहले कभी हमने अल्लाह, भगवान, मज़हब-इन सब पर इतना विचार करने की जरूरत नहीं समझी थी। हम समझते थे हां है एक पालनहार और संध्या आरती करते उनके प्रति अपने सारे फ़र्ज़ पूरे कर लेते थे। आस पास दूसरे धर्म की बड़ी नुक्ता चीनी सुनते थे। हमें भी लगता था हमारा धर्म ही सबसे अच्छा है। फिर हमने दुनिया को ग़ौर से देखा। तुमसे मिलने के बाद तुम्हारे मज़हब को समझने की कोशिश की। पहले हम निरे वकील थे। कानून के अलावा कुछ नहीं जानते थे। बाद में बहुत कुछ पढ़ा, हिस्ट्री, सोशियालॉजी, एन्थ्रोपॉलोजी, धर्म। और अब-अब हम सारे ख़ानों, तहख़ानों से ऊपर उठ चुके हैं।''

''सुनो पंडित'', रौशन ने चने की दाल भरे टिन्डे कढ़ाई से निकाल कर एक फूलदार डिश में रखते हुए संजीदगी से कहा, ''हमारे किसी मज़ाक पर सीरियस मत हो जाया करो। बा खुदा तुम्हारे मज़हब से हम ने कोई मतलब नहीं रखा। हमारे लिए तुम सिर्फ तुम हो। एक इन्सान जिसने हमें भरपूर प्यार दिया और तहफ़्फुज़ (सुरक्षा)।''

''जानते हैं रौशन और हमने भी सिर्फ तुम्हारी अच्छी सूरत को नहीं चाहा। तुम्हारी गहरी सूझ बूझ, तुम्हारी खुशमिजाज़ी, तुम्हारी ईमानदारी, धर्म से ऊपर उठकर लोगों को परखने की सलाहियत... यह सब हमने अपनी धर्म पत्नी में चाहा था। वहां नहीं मिला तभी तुम्हारी ओर ढुलक पड़े। आज हम तुमसे कुछ कहना चाहते हैं। हमें कह डालने दो रौशन! हमने बड़ी गहराई से महसूस किया है कि इस कायनात के रहस्यों ने, ज़िन्दगी और मौत ने, बुढ़ापे और दुख ने, कुदरत की रंगारंगी ने हर दौर, हर रंग और हर नस्ल के इन्सानों में एक ऐसी शक्ति की कल्पना जगाई जो इन सारे गोरख धंधे के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सके। जिसे संसार कहते हैं। वह शक्ति एक पिता की तरह मुहब्बत करने वाली है, उससे हम सच का पक्ष लेने और झूठ का विरोध करने की अपेक्षा करते हैं। वह हर शय से ऊपर है, हर समय जागती और हर प्राणी पर नज़र रखती है। उससे हम सब कुछ मांग सकते हैं। इस शक्ति, इस हस्ती को खुश रखने, उसके गुस्से, उनकी अनदेखी से बचने के लिए हमने पाप और पुण्य के नियम गढ़े। बुनियादी तौर पर सारे पाप वह थे जिनसे दुख या नुकसान पहुंचे और पुण्य वह जो किसी को सुख पहुचाएं, दुख में मदद करें। लेकिन फिर उनमें बहुत कुछ ऐसा भी जुड़ता गया जो इतना स्पष्ट, इतना साफ नहीं था। इन तसव्वरात को विकसित करते करते हम यह भूल गए कि वक्त, जगह और सोच के हिसाब से लोगों को तसव्वरात का अलग अलग होना फ़ितरी था चाहे उनका बुनियादी मक़सद एक ही क्यों न रहा हो यानि उस क़ादिर-मतलक़ तक पहुंचना जो हमारा ख़ालिक है। लेकिन हम में से ज्यादातर सिर्फ उसी तरीके को सही समझते हैं जो उनका अपना है। जो हमारे दायरे से बाहर थे उनसे हमने नफरत की। कभी-कभी तो उनका सिर काट देना जायज ठहराया। फिर पाप पुण्य में भी ऐसी ऐसी शाखाएं फूटीं जिनके कोई मानी ही नहीं रह गए।''
''रौशन, लेकिन मैं एकेश्वरवादी हूं। मतलब जानती हो? एक ईश्वर, चाहो तो खुदा कह लो, में यक़ीन रखने वाला। मेरे सनातन धर्म में एकेश्वरवाद रहा है। मैं तुम्हारे पैग़म्बर साहब की बड़ी इज्ज़त करता हूं। उन्हें मैं और कुछ समझूं या नहीं, बहुत बड़ा इन्कलाबी सुधारक मानता हूं।''

''फिर भी तुम मुसलमान नहीं हो।''

"मैंने कहा न रौशन, मैं अब हिन्दू भी नहीं हूं। मैं एक इंसान हूं। मुझे चिड़ियों की चहचहाहट में, खुशबू में, आकाश में बिखरे तारों में, नदियों के पानियों में, उगते और डूबते सूरज के हुस्न में, उस परमपिता का नूर दिखाई पड़ता है। शायद सूरज की पूजा भी हमारे ऋषियों-मुनियों ने इसीलिए करनी शुरु की थी। और पेड़ों और नदियों की भी। यह सब उसी एक शक्ति के रूप हैं। और रौशन, मैं हर व्यक्ति के लिए उसकी व्यक्तिगत आस्था और धर्म के अधिकार को मानता हूं। वह जिस तरह भी चाहे, अपने भगवान तक पहुंचने का उपक्रम करे, उसे जो चाहे नाम दे। लेकिन दुख की बात यह है कि धर्म के नाम पर जितनी दीवारें उठीं, जितने ज़ुल्म हुए, शायद किसी और मुद्दे पर नहीं हुए होंगे। अमेरिका की खोज के बाद जब स्पेनी वहां पहुंचे तो बारूद और चेचक के साथ वह वहां के मूल वासियों के लिए तोहफ़े में एक नया खुदा भी ले गए थे। बेशक उन्हें इस नए ईश्वर के साथ ताल मेल बैठाने में परेशानी हुई होगी। उन्हें वक़्त लगा होगा अपने पुरखों की उन आत्माओं को भुलाने में जिन्हें वह पूजते चले आए थे, उन पवित्र भैंसों की हत्या होते देख कर दुख न करने में... जर्मनी के कुछ कबीले ओक के पेड़ों की पूजा किया करते थे। ईसाई मिशनरियों ने उन्हें कटवा दिया।
और रौशन माफ़ करना, तुम्हारे यहां भी धर्म प्रचार की बड़ी अहमियत है। मैं यह नहीं कहूंगा कि इस्लाम केवल तलवार के ज़ोर पर फैला लेकिन इसके फैलने में मुसलमान आक्रमणकारियों और उनकी विजय का काफ़ी हाथ जरूर रहा है। इसलिए कि जो पराजित होते हैं उन्हें विजेताओं का धर्म अपनाने में कई फ़ायदे नज़र आते हैं। फिर धीरे धीरे बदलता समाज और बदलते धार्मिक विचार अपना असर डालते चले जाते हैं।''

''और तुमने बौद्धों को मार मार के भगा दिया। उनके मठ तबाह किए। महात्मा बुद्ध को विष्णु का नवां अवतार मानकर उनको हड़प कर गए। यह बुद्ध धर्म को खत्म करने का हथकन्डा था।'' रौशन के चिढ़ कर कहा। फिर हंस के बोली, ''लेकिन मुझ मुसलमान को महात्मा बुद्ध से बड़ी अक़ीदत है। काफ़ी प्रवचन दे लिए तुमने घास खोर, चलो तुम्हारा खाना लगा दिया है।''

''रौशन, तुम्हारे महात्मा बुद्ध ने मूर्ति पूजा का विरोध किया था और सारे कर्मकाण्ड का भी। लेकिन उनके पैरूकारों ने सारी दुनिया में उन्हीं की मूर्तियां लगा दीं और वह सारा कुछ करने लगे जिसे नकारा गया था। बात दरअस्ल यह है कि रौशन की खुदा या भगवान इनसानों की जरूरत है। वह भी ऐसा जो दिखाई-सुनाई दे। तुम्हारे निर्गुण निराकार खुदा की पूजा अर्चना बड़ी कठिन है भाई। उसके लिए जो गहरी सूझ बूझ दरकार है वह आम लोगों में कहां मिल पाती हैं। हां लाठी हाथ में हो तो दूसरों के शरीर और आस्था, दोनों पर करेर वार करना सबको आ जाता है। इन्सान में जो शैतान छुपा हुआ है उसे बस में करना... अब देखो न, बामियान में बुद्ध जी की इतनी विशाल और भव्य मूर्तियों को तुम्हारे तालिबान ने...।''

रौशन इस बार सचमुच नाराज़ हो गई। ''तालिबान मेरे क्यों? इसलिए कि मेरा उनका मज़हब एक है? मेरा सिर शर्म से झुक जाता है पंडित। इन मूर्तियों को अफ़गानिस्तान के किसी फ़ातेह ने हाथ नहीं लगाया था। बुत-शिकन कहलाने वाले महमूद ने भी नहीं।'' उसके गुस्से में दुख घुला हुआ था।

''हर मज़हब अपनी अस्लियत में कुछ था, पैरूकारों ने उसे कुछ और बना दिया। एक बात बताओ रौशन, पांडे ने अचानक हंस कर कहा, हम मर जाएंगे तो हमारी अंत्येष्टि किस धर्म के मुताबिक होगी? भाई हमें दफ़नाए जाने से बड़ा डर लगता है। कब्र में आके तुम्हारे मुनकिर-नकीर परेशान करेंगे सो अलग। तुम हमारी उल्टी सीधी झेल लेती हो वह तो गदा उठाकर सीधे शुरू हो जाएंगे दे दना दन....

रौशन होंठ दबा कर दूसरी तरफ़ देखने लगी। पांडे की कतरनी जैसी ज़बान चालू थी... ''और रौशन, हम कबीर नहीं हैं कि मरें तो हमारे शरीर की जगह फूल आ जाएं। आधे तुम बांट लो और आधे वह, हमारी पहली महल।'' रौशन ने पांडे को घूर कर देखा। होंठों से मुस्कुराहट की महीन सी रेखा ग़ायब हो गई थी। 
पांडे हंस पड़े। ''अच्छा यह एक बात और बताओ। यह सारे चमत्कार पिछलों के साथ ही क्यों होते थे जिन्हें हमने देखा जाना न हो। हमारे साथ ही क्यों नहीं होते? आज, अब? वैसे एक अच्छी बात तो है। हमें मर कर दोहरा पुण्य मिलेगा। पिंड दान तो होगा ही। तुम भी फ़ातेहा जरूर पढ़ोगी जैसे अपनी मां के लिए पढ़ती हो और रजब अली चाचा के लिए।''
रौशन ने थाली पटक दी। खाना सामने रखकर ऐसी अपशुकनी बातें!
''रौशन हम तुमसे बहुत बड़े हैं इसलिए तुमसे पहले हमारी मौत लगभग तय है।'' लगभग हमने इसलिए कहा कि कहीं हमसे तंग आकर तुमने आत्महत्या की ठान ली तो...? मगर नहीं, तुम ऐसा नहीं करोगी। हमें अकेला छोड़ कर तुम नहीं जाओगी'' उन्होंने उसके लम्बे, मुलायम बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया। ''अच्छा, सच कहो क्या करोगी जो हम मर गए?''

''करेंगे क्या?'' रौशन ने अचानक उमड़ आने वाले आंसू पी लिए। ''अब भी राजी व  रज़ा हैं, तब भी वैसे ही रहेंगे।''

''राज़ी-ब-रज़ा'' तीनों शब्दों को पांडे ने अलग अलग करके दोहराया। ''यानी जाहि बिधि राखें राम ताहि बिधि रहियो।''
''राम'' वही है, वही सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान जिनके सिर सब कुछ मढ़ कर हम अपनी ज़िम्मेदारियों से बरी हो जाते, दुखों को आसानी से झेल लेते हैं। यह दसरथ पुत्र राम नहीं, वेदों के ब्रहमन् हैं। कबीर के राम भी वही थे और गांधी के राम भी वही। हम कोई सा भी धर्म अपनाए, लेबेल कोई भी लगा दो, हम वही रहेंगे और एक इन्सान की हैसियत से अपना फ़र्ज भी निभाएंगे। हमने अपनी आधी जायदाद तम्हारे और तुम्हारे दोनों बेटों के नाम कर दी है और आधी तीनों बेटियों के नाम। हां जिस घर में रहते चले आए हैं वह पत्नी को दे दिया है।''

''पंडित, हमें कुछ नहीं चाहिए। रसूलपुर में रहने का ठिकाना तुमने कर ही दिया है। दोनों लड़के पढ़ रहे हैं, वह खुद बहुत कमा लेंगे। तुमने उन्हें बाहर रखकर अच्छे स्कूल-कॉलेज में पढ़ाया, इतना खर्च किया, अब और क्या दोगे। हमारा सिर फटने लगता है जब हम सोचते हैं कि इन्सान बुनियादी तौर पर कितना खुदगर्ज और नीच है। एक नीचता तो हमने भी दिखाई कि एक बेचारी औरत के शौहर पर अधिकार जमा लिया।''

''वह औरत ऐसी बेचारी भी नहीं है रौशन। उसे हमारा भरपूर साथ मिला है। समाज ने उसे जो कुछ दिया, वह हम तुम्हें न दे सके समाज से कट के व्यक्ति अकेला हो जाता है। सच पूछो तो हम तुम्हारे गुनहगार हैं। तुम्हें बिना किसी मदद के, बेसहारा छोड़ कर हम अपने पापों को बढ़ाना नहीं चाहेंगे। हमारी दिली इच्छा है कि मरें तो तुम्हारे पास हों...''
के.के. मामा होते तो कहते, 'अरे वह तो सदा से काली जीभ वाला था। जो बुरी बात मुंह से निकालता, पूरी हो जाती। लेकिन के.के. मामा तो काफी समय पहले ही गुजर चुके थे। न अब वह किस्से थे न बैठकें। सदा रहे नाम अल्लाह का जो अनादि है और अनन्त। अछेद और और अभेद्य। जो जीवन व मृत्यु दोनों से बालातर है (हम इन्सान तो बस मौत के ऊपर उठने की इच्छा ही करते और अगले जहान गढ़ते रहे)
दरवाज़े पर शोर बढ़ता जा रहा था। लोगों के हाथों में लाठियां थीं। कुछ लाठियों पर सान चढ़े हुए फल भी चमक रहे थे। लाठियों वाले लोकल लोग थे। इलाहाबाद से पांडे के तीनों दामाद, उनके एक दूर के रिश्तेदार और दिद्दा के जेठ के परिवार वाले थे। दिद्दा के अपने दोनों बेटों ने खुद की इस टन्टे से अलग रखा था। माँ के नाम पर गन्दी गालियां सुनी तो रौशन के लड़कों से न रहा गया। वह निहत्थे ही बाहर निकल आए। अन्दर रौशन हाथों पर कुरान उठाए थर थर कांप रही थी।
कुछ ही देर में वह खुद भी बाहर निकल आई और बेटों के सामने ढाल बन कर खड़ी हो गई।
''यह तुम्हारे रिश्तेदार हैं, तुम्हारे भाई। जानकी रमण पांडे की अपनी सन्तानें...'' उसने चिल्ला कर कहा।

''पहले तो इस कुल्टा को ही मारो।'' भीड़ में से कोई जवाब में चिल्लाया।

''तुम लोग काग़ज ले आओ। अमन चैन से हमारे साथ बैठो। हम तीनों उस जायदाद से दस्तबरदार होते हैं जो पंडित हमारे नाम कर गए हैं।'' रौशन को अच्छी तरह याद था कि दिद्दा के जेठ के यहां गोश्त खाने न खाने को लेकर जो तकरार हुई थी वह जमीन जायदाद के बटवारे पर जाकर खत्म हुई। लड़कों को पीछे धकेल कर उसने यह बात भी चिल्ला कर कही।
तभी किसी अनहोनी के डर से जीप लेकर भागे चले आ रहे बुजुर्ग ओंकार नाथ मिश्र मौके पर पहुंच गए। सत्तर से ऊपर थे। दिद्दा के गुज़र जाने के बाद लगभग सन्यासी की जिन्दगी बिता रहे थे। दुनिया की ऊंच नीच देख चुके थे और लोगों के स्वभाव को अच्छी तरह समझ चुके थे। दुनिया चार दिन की है, यह विचार भी मानस पटल पर लिखा जा चुका था। पांडे रसूलपुर में मरे, वहां लोगों ने बाकायदा जनाज़े की नमाज़ पढ़कर उन्हें कब्रिस्तान में दफना दिया है, यह पक्की खबर आ चुकी थी। मरने से पहले उन्होने लगभग आधी जायदाद रौशन और लड़कों के नाम कर दी थी, यह भी लोगों को मालूम हो चुका था। इधर चुनाव करीब आ रहे थे। रसूलपुर में आईएसआई के एजेन्टों की घुसपैठ की अफ़वाह भी कभी कभार कान में पड़ रही थी। सब कुछ मिला जुला कर स्थिति बड़ी खतरनाक थी। ओंकार नाथ कमर पर हाथ रख कर उठे। पांडे की पहली पत्नी माथे तक घूंघट खींच कर पास आईं।
''भाई साहब, लड़कों और उनकी मां पर आंच न आने दीजिएगा। रौशन आरा ने 'उन्हेंं' कभी हमसे छीना नहीं। रहे लड़के तो वह तो 'उन्हीं' का खून हैं। धर्म दूसरा होने से खून नहीं बदलेगा।'' उनकी आवाज़ भर्रा गई। ''दामादों को हम कुछ न कह सके।''

ओंकारनाथ को भी सूखी, सूनी आंखों में नमी का एहसास हुआ। पत्नी की मौत के बाद पहली बार खुल कर रोने को जी चाहा। कुछ रुक कर बोले, ''भगवान से मनाओ हमारे जाने से पहले कोई अनर्थ न हो चुका हो।'' और उठ खड़े हुए। उनकी स्वर्गवासी पत्नी भाई पर जान देती थीं। यही कारण था कि उन्होंने रौशन और उसके पैदा होने वाले दोनों लड़कों को स्वीकार किया था। लेकिन इस समय स्वयं उनके बेटे जानकी रमण के दामादों का साथ दे रहे थे। बेशक वह उनके साथ मरने मारने नहीं निकले थे लेकिन समझाने या रोकने की कोशिश भी नहीं की थी। और ओंकारनाथ के भाई के लड़के? वह तो साथ भी चल दिए थे। इस समय उन्हें अपने सारे रिश्ते-नाते निभाने का ख़याल आ गया था।

जानकी रमण के सोने के दिल वाली काली पत्नी की प्रार्थना सुन ली गई थी। ओंकार नाथ सही समय पर पहुंच गए थे वर्ना वास्तव में कुछ अनर्थ हो जाता। मामला सुलझ गया। ज़मीन जायदाद से रौशन ने अपना अधिकार वापस ले लिया। यह वादा, कुछ और शर्तें और कब्र से उखाड़ कर निकाला गया पांडे का पार्थिव शीर लेकर लोग वापस आ गए।

''छोटी बहू, - ओंकार नाथ पहली बार रौशन से रू-ब-रू हुए थे!'' इजाज़त दे दो।'' उन्होंने नर्मी से कहा था। 
''वर्ना तुम तो सिर्फ तीन हो, गांव में न जाने कितने ऐसे निर्दोष मारे जायेंगे जिनका तुम्हारे इस गोरखधन्धे से कोई वास्ता नहीं है। वातावरण में तनाव है, खुद ही कह दो कि ठीक है, ले जाइए। इसी में भलाई है, सद्भाव बना रहेगा। जिनकी मति पलट गई हो हम उनसे लड़ नहीं सकते बेटा।"

पंडित के शरीर की ऐसी दुर्दशा! रौशन पछाड़ें खाने लगी। कितना कहा था गांव के लोगों से, बेटों से, कि उसे उनके घर इलाहाबाद पहुंचा दिया जाए पर लोग नहीं माने।

''छोटी बहू, मरा हुआ इन्सान सड़ने के लिए नहीं छोड़ा जाता। न घर में न सड़क पर, यह सभी जानते हैं।'' लोगों के लाश ले जाने के बाद ओंकार नाथ कुछ देर के लिए वहीं बैठ गए थे। ''अब उसे जलाओ या दफ़न करो, वह तो इस संसार से गया। पंच तत्व, पंच तत्व में मिल जाते हैं। जलकर भी यही होता है और गाड़ दिए जाने पर भी यही। अन्तर सिर्फ इतना ही है कि मिट्टी में यह क्रिया बहुत धीरे धीरे होती है। मगर लोग इस बात को नहीं समझेंगे। मरने के बाद की सारी रस्में केवल उनकी तसल्ली के लिए होती हैं जो अभी जीवित हैं। हम तो साधारण आदमी हैं। ऋषियों मुनियों ने शरीर को चोला माना है जिसे आत्मा बदलते रहती है। आत्मा, जो अजर और अमर है। यह मानें तो दफ़न किए जा चुके आदमी को उखाड़ कर निकालना बिल्कुल बेमानी हो जाता है। मगर हम क्या करें बेटा, भगवान को भी मूर्खों से विशेष लगाव है इसीलिए उसने इतनी बड़ी तादाद में मूर्ख पैदा किये हैं। क्या करोगी, सब्र करो।''

''ओंकार भाई साहब'', रौशन ने आंसू भरी आंखे उठा कर उन्हें देखा। धरती आप जैसे देवता समान लोगों पर टिकी हुई है। इतनी मेहरबानी हम पर और कीजिए, हमें इलाहाबाद ले चलिए। कहीं ठहरा दीजिएगा। रजब अली नाना तो पहले ही चले गये थे अब नानी भी नहीं रहीं। दूसरे रिश्तेदारों ने नाता तोड़ रखा है।'' वह फफक फफक कर रोने लगी।

... शांति से हौले हौले बहती गंगा मय्या के किनारे धू धू कर जलती चिता। शाम के धूमिल अंधेरे में लपकती लाल पीली लपटें। आकाश पर इक्का दुक्का बादल तैर रहे थे। हरियाली में छिपे झींगुरों ने शोर मचा रखा था। आदमी जन जा चुके थे। लकड़ियों की तड़तड़ाहट, मेंढकों, झींगुरों और दरिया की तिरल तिरल गुनगुनाहट के बावजूद फैला सन्नाटा। अनन्त, असीम और अनादि। आग की और भी कई ढेरियां थीं जो इन्सानों को खा रही थीं। पांचों तत्व, पांचों तत्वों में विलीन हो रहे थे।
नदी रे नदी कितने लोगों को फुंकते देखा? इस किनारे और उस किनारे। यहां से वहां तक-तहां से तू आती है और जहां जाकर विलीन हो जाती है?

पेड़ों के झुरमुट के पीछे से निकल कर वह सामने आ गई। एक ओर जमीन थोड़ी ऊंची थी। उसी के पीछे एक कतार में पेड़ थे। हरे भरे, अजर अमर। वह उस ऊंची जमीन पर खड़ी हो गई। हल्के फुल्के शरीर की, लम्बी गोरी (उस समय कागज जैसी सफेद) स्त्री। हवा के झोंके से उसकी महीन, किनारीदार सफ़ेद साड़ी का आंचल फडफ़ड़ाया। अचानक ऐसा लगा जैसे वह इस पूरे दृश्य पर हावी हो उठी है।
यह आदमी जो आग की लपटों के हवाले किया गया, जिसके घने बालों को आग ने एक लमहे, केवल एक लमहे में चाट लिया, जिसके मज़बूत सिर को कपाल क्रिया के दौरान लाठी मार कर फोड़ा गया, उसका कौन था? क्यों आई थी वह यहां शमशान घाट पर जहां स्त्रियों को आने की इजाज़त नहीं है? यह सारे इन्सान कौन है जो कब्र के कीड़ों और चिता की शरीर चाटने वाली लपटों को भुला कर जान लेने और जान देने पर तुल जाते हैं? क्यों इन्होंने अपने और अपने जैसे दूसरे लोगों के बीच नफ़रत की दीवारें खड़ी कर रखी हैं?

''किसी भुलावे में मत रहना रौशन आरा बेगम। यह दूसरी दुनिया की कल्पना हम इन्सानों की सदा जिन्दा रहने और मौत पर विजय पाने की ख्वाहिश के अलावा और कुछ नहीं। यह आत्मा का अजर-अमर होना बिल्कुल बकवास है। हमारा तुम्हारा साथ बस इत्ता ही है जितने दिन हम जिन्दा हैं। अब तुम्हारा जी न माने तो हमारे नाम से भी फ़ातेहा पढ़ लिया करना।'' फिर वह शरारत के साथ मुस्कुराए। 
''मगर क्या तुम्हारी फ़ातेहा हम तक पहुंचेगी? हम ठहरे...''

बुझती चिता के धुएं की तरह बेचैनी ने रौशन के भीतर चक्कर काटे।
''सारे स्वर्ग, सारे नरक, हम इसी संसार में झेल लेते हैं और यह हमारे ही रचे हुए होते हैं, हमारे अपने कर्मों के फल''
रौशन आरा ने आंसू पोंछे। अलविदा, जानकी रमण पांडे, अलविदा।

【 उर्दू से लिप्यांतरण : स्वयं लेखक। पहल अप्रैल 2017 अंक से साभार 】

कलेजा: राजेन्द्र श्रीवास्तव

कलेजा प्रबोध नहीं आया था।  मेरा मन कह रहा था कि वह ज़रूर आएगा। मेरी आंखें स्टेशन की बेतरतीब भीड़ में अब भी उसे तलाश रही थीं।  सुनंदा हौले से...