सोमवार, 24 दिसंबर 2018

हिन्दी ग़ज़ल की नई चेतना : ज्ञानप्रकाश विवेक

हिन्दी ग़ज़ल की नई चेतना
Gyan Parkash Vivek
प्रकाशन संस्थान
मूल्य- ₹ 195
पृष्ठ- 248

ज्ञानप्रकाश विवेक का बहुआयामी लेखन साहित्य की कई विधाओं में एक साथ सक्रिय रहता है। बड़ी सहजता से इन विधाओं में आवाजाही करते हुए वे निरंतर हमें समृद्ध करते हैं। मेरे सामने उपस्थित है- "हिन्दी ग़ज़ल की नई चेतना".. जिस तल्लीनता और आत्मीयता से उन्होंने हिन्दी ग़ज़ल के विकास काल की सूक्ष्म पड़ताल की है वह विधाओं की सीमा से ऊपर का कार्य है। वरिष्ठ ग़ज़लकारों के साथ ही अपने बाद की नई पीढ़ी की रचनात्मकता को स्नेह और गौरव से रेखांकित कर ज्ञानप्रकाश विवेक जी ने एक ऐसी पगडंडी रची है जिस पर अब कई युवा शायर चलने लगे हैं।
इस किताब को पढ़ते समय एक पुरानी जिज्ञासा का समाधान भी मिला। विद्वानों द्वारा निर्धारित हिन्दी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल का अन्तर और उनकी बहसें कभी ठीक से न समझ सका था। अपनी पहुँच के दायरे में सिर्फ़ दो श्रेणियाँ थीं- एक वह ग़ज़ल जो अच्छी लगी। दूसरी वह जो अच्छी नहीं लगी।
ज्ञानप्रकाश विवेक जी ने बड़ी सहजता से यह समझाया कि " हिन्दी ग़ज़ल यानी देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली ग़ज़लें।"

इस शानदार और सहेज कर रखी जाने लायक भूमिका में ग़ज़ल, शेर और भाषा पर उनके कुछ विचार --

" हक़ीक़त यह है कि ग़ज़ल या किसी अन्य विधा में लिखते समय हम भाषा नहीं लिख रहे होते, भाषा में लिख रहे होते हैं।
भाषा का बेशक अपना महत्व है, लेकिन जब वो सृजन से जुड़ती है तो मानीख़ेज़ हो जाती है।"

" ग़ज़ल का अपना एक परिसर होता है। वो परिसर शेर का भी होता है। शेर की सीमा, उसका कड़ा अनुशासन होता है और यही एक शेर का सौंदर्य भी होता है। ग़ज़ल का हर शेर किसी चुनौती की तरह होता है। इतनी बड़ी चुनौती कि बड़े से बड़े कथ्य को दो मिसरों में इस शऊर और संवेदना से कहा जाय कि वो लय, नाद, गूँज, और ध्वनि की ताक़त बन जाये।"

"दिमाग जब शायरी में हस्तक्षेप करता है तो अश्आर गणित में बदल जाते हैं या फिर बनावटी हो जाते हैं। दिमाग के पास चालाकी होती है और दिल के पास भावनाएँ। ग़ज़ल का सारा खेल भावनाओं का है।"

वैसे तो हिन्दी ग़ज़ल की जड़ें कबीर दास तक पहुँचती हैं किन्तु सही मायनों में भारतेन्दु युग से हिन्दी ग़ज़ल में निरंतरता आती है। भारतेन्दु और शमशेर से शुरू हुआ ग़ज़लों का यह सफर दुष्यंत तक पहुँचता है। ज्ञानप्रकाश विवेक कहते हैं-- " दुष्यंत ने बेशक हिन्दी ग़ज़ल के मुख्य द्वार खोले। इसके बावजूद भारतेन्दु और शमशेर की ग़ज़लों की रूमानियत और क्लासिक लबो-लहजा हिन्दी में अपनी तरह का मिज़ाज पैदा करने में होता है।"

इस किताब में जिन 32 शायरों पर  ज्ञान जी के आलेख शामिल हैं उनकी एक झलक.....

1) भारतेन्दु

बागबां है चार दिन की बागे आलम में बहार
फूल सब मुरझा गए , खाली बियाबां रह गया :

2) शमशेर

जमाने भर का कोई इस क़दर अपना न हो जाए
कि अपनी ज़िन्दगी ख़ुद आपको बेगाना हो जाए

इधर मैं हूँ, उधर मैं हूँ अज़ल, तू बीच में क्या है
फ़क़त इक नाम है यह नाम भी धोका न हो जाए..
( मुक्तिबोध की असामयिक मृत्यु के आघात पर उन्होंने यह उदास ग़ज़ल लिखी थी )

3) दुष्यंत

कहाँ तो तय था चरगां हरेक घर के लिए
कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए

दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों
तमाशबीन दुकानें सजा के बैठ गए

4) हरजीत सिंह

आयी चिड़िया तो मैंने ये जाना
मेरे कमरे में आसमान भी है

नींद की टहनियाँ हिला के गया
सुबह का इक शरारती बच्चा

5 ) नार्वी

सर्दियों की बात होती सिर्फ़ तो क्या बात थी
ज़िन्दगी ही बन गयी है जनवरी, बीड़ी जला

चलने के लिए तेज़ जमाने की सड़क पर
कुछ दूर तलक चलना फिसलना था ज़रूरी

6) अदम गोंडवी

अदब गर ज़िन्दगी के दायरे से दूर होता है
तो वो तहज़ीब के सीने में इक नासूर होता है

हुस्न की मासूमियत की ज़द में रोटी आ गयी
चाँदनी की छाँव में भी फूल अंगारे हुए

7) सूर्यभानु गुप्त

पहली दफ़ा तो संग में सीता भी थी लखन भी
अबके न होगा कोई जो राम निकले जंगल

ऐसी काई है इन मकानों पर
धूप के पाँव भी फिसलते हैं

8 ) रामकुमार कृषक

हाल मौसम का हवाई छल है
इन घटाओं की गवाही छल है

आप लिखकर कीजिये या मुँहजबानी कीजिये
देश अब खुशहाल है बातें सुहानी कीजिये

9) सुल्तान अहमद

हरेक शख़्स मिले बनके आदमी जैसा
तो ग़म नहीं है कोई देवता मिले न मिले

कई जलजलों से घिरी रही मेरी ज़िन्दगी की ज़मीन गो
तेरी याद के हैं बने हुए मगर अब भी उनमें मकान कुछ

10) माधव कौशिक

उसको उसी हिसाब से बनवास मिल गया
जितना जिसे लगाव था अपने मकान से

कौन हो सकता है वारिस ज़िन्दगी के दर्द का
छोड़कर जायेंगे अपनी दास्ताँ किसके लिए

11) विजय किशोर मानव

सगा है दुख मेरे कंधे पे रखकर हाथ चलता है
नहीं आता है सुख ऊपर से, इस रिश्ते से जलता है

मंच बदलने होंगे ये दरबार बदलने होंगे
हमको सारे के सारे किरदार बदलने होंगे

12) महेश अश्क

इतने खूंखार दिन न थे तब भी
लोग रहते थे जब गुफाओं में

ज़िन्दगी इक घना घना एहसास
सांस से सांस जोड़कर देखो

13) ध्रुव गुप्त Dhruv Gupt

तिश्नगी अपनी मुक़द्दर थी तो डर लगता था
आज बारिश का है इमक़ान तो डर लगता है

हर रोज़ नए हादसे, हर दिन नई तलाश
हर रोज़ अपने क़द से मैं थोड़ा बड़ा हुआ

14) देवेन्द्र आर्य

उन्माद से भर दी गईं बच्चों की किताबें
ख़ुश आप इसी पर हैं कि बस्ता नहीं बदला

दरख़्तों को कभी छुट्टी दिया कर
हवा, तू भी कभी पैदल चला कर

15) कमलेश भट्ट कमल

पेड़ पर चिड़ियों का डेरा बोलता है
शाम होते ही अंधेरा बोलता है

वो खुद ही जान जाते हैं बुलंदी आसमानों की
परिन्दों को नहीं तालीम दी जाती उड़ानों की

16) हरेराम समीप Hareram Sameep

वक़्त के इस शार्पनर में ज़िन्दगी छिलती रही
हम बनाते ही रहे इस पेंसिल को नोकदार

डर रहा है हर मुसाफ़िर डोलते जलयान से
बढ़ रही है आँधियों की दोस्ती कप्तान से

17) हस्तीमल हस्ती Hastimal Hasti

तुम हवाएँ लेके आओ, मैं जलाता हूँ चराग़
किसमें कितना दम है यारों, फैसला हो जाएगा

हर मोड़ पे है प्यास बुझाने की आरजू
हर मोड़ पे सराब, हमें होश तक नहीं

18) नसीम बेचैन

कल तक जो लूटते रहे राहों में कारवां
हैरत है आज काफ़िल-सालार हो गए

ज़मीन छीनकर वो आसमान क्या देगा
परों को काटनेवाला उड़ान क्या देगा

19) विनय मिश्र

इतनी ज़्यादा रेख बिछी है आँखों में
कुछ सपनों को हम पानी से लिखते हैं

भीतर जो जमी बर्फ़ है शायद पिघल सके
ज़िन्दा है उम्मीदों को बचाने की कवायद

20) पवन कुमार

लहरों को भेजता है तकाज़े के वास्ते
साहिल है कर्ज़दार, समन्दर मुनीम है

मुझे ये ज़िन्दगी अपनी तरफ़ कुछ यूँ बुलाती है
किसी मेले में कुल्फ़ी जैसे बच्चे को लुभाती है

21) सौरभ शेखर सौरभ शे.

तन्हाई का तुम्हारी था मुमकिन यही इलाज
घर के हरेक कोने को चीजों से भर दिया

बच्चों ने सजाई है कोई और ही दुनिया
खींचा है जहाँ बाघ, वहीं रक्खा हिरन भी

22)  गौतम राजऋषि

सुब्ह दो खामोशियों को चाय पीते देखकर
गुनगुनी सी धूप उतरी, प्यालियों में आ गयी

इक जिद्दी सा ठिठका लम्हा यादों के चौबारे में
अक्सर शोर मचाता है मन के सूने गलियारे में

23) स्वप्निल तिवारी Swapnil Tiwari

ख़्वाब बच्चे हैं, लौटते होंगे
नींद इक माँ सी राह तकती है

आ के इक चिड़िया मिरे पीपल पे बैठी इस तरह
जैसे मुझसे कह रही हो- ये शजर मेरा भी है

24) विकास शर्मा राज

मेरे उरूज़ की लिक्खी थी दास्तां जिसमें
मेरे ज़वाल का किस्सा भी उस किताब में था

जरा सा सब्र चराग़ों! कुछ और देर लड़ो
हवा की साँस उखड़ती दिखाई देती है

25) इरशाद खान सिकन्दर Irshad Khan Sikandar

फिर उसके बाद सोच कि बाकी।बचेगा क्या
तू सिर्फ़ कृष्ण भक्ति से रसखान काट दे

अब मेरे सर पे सबको हँसाने का काम है
मैं चाहता हूँ काम ये संजीदगी से हो

26) इंदु श्रीवास्तव

बरसों से बियाबान सा ख़ाली मेरा मकां
तुमने रखा चराग़ तो घर में बदल गया

किसको पता है रेत में खोई नदी का सच
साहिल ही जानता है मेरी तिश्नगी का सच

27) के.पी.अनमोल KP Anmol

खेल मस्ती दोस्त बचपन अब भी हैं दिल में बसे
दिन मगर चलते बने हैं इक कमी को छोड़कर

शाम गुज़री झील की गोदी में सूरज डाल के
यूँ लगा दादी चली है पोटली को छोड़कर

28) रजनीश सचान

काटने वाले थे हम बाँझ समझकर जिसको
फिर उसी पेड़ के कोटर से गिलहरी निकली

उस रिश्ते में, जिसको हमने तोड़ दिया
अब भी हम दोनों के साये रहते हैं

29) सत्यप्रकाश उप्पल

लहू से इक दिया रातभर जलाना है
मगर ये शर्त कड़ी है कि मुस्कुराना है

मिट्टी से कुछ दीप बनाये जा सकते हैं
मिट्टी का सम्मान बढ़ाया जा सकता है

30) कुमार विनोद

दिल पे लेकर बोझ ख़्वाबों का सिकंदर की तरह
फिर भी हँसना चाहता है वो समन्दर की तरह

एक अनजाना सा डर, उम्मीद की हल्की किरण
कुल मिलाकर ज़िन्दगी से क्या मिला, कुछ भी नहीं

31) अशोक आलोक

मेरे हाथों की लक़ीरों के इज़ाफ़े हैं बहुत
मैंने पत्थर की तरह ख़ुद को तराशा है बहुत

चलो अच्छा हुआ इक रात गुज़री
बताएँ किसको क्या क्या साथ गुज़री

32) विज्ञान व्रत

मैं कुछ बेहतर ढूँढ रहा हूँ
घर में हूँ, घर ढूँढ रहा हूँ

बाहर धूप खड़ी है कब से
खिड़की खोलो अपने घर की

रविवार, 16 दिसंबर 2018

यह गाँव बिकाऊ है : एम एम चन्द्रा

फ्लैप

नई पीढ़ी के होनहार लेखक एम एम चन्द्रा द्वारा लिखे जा रही कथा-त्रयी का दूसरा पड़ाव है-- "यह गाँव बिकाऊ है"। उनका पिछला और बहुचर्चित उपन्यास प्रोस्तोर जहाँ ख़त्म हुआ था वहीं से इस उपन्यास का आगाज़ होता है। "प्रोस्तोर" एक मिल के बंद पड़ने और सहसा बेरोजगारी की कगार पर आ खड़े हुए आम इंसानों के संघर्ष का दस्तावेज था । " यह गाँव बिकाऊ है" हमारे देश की एक अन्य बेहद महत्वपूर्ण समस्या पर केन्द्रित है। इस उपन्यास में किसानों के संघर्ष और राजनैतिक दाँव पेंच का विस्तार से वर्णन हुआ है। किसानों द्वारा संगठित होने का प्रयास , इस आन्दोलन में युवा वर्ग की सक्रिय भागीदारी और उनके परस्पर संबंधों, गतिविधियों का रोचक और स्वाभाविक चित्रण इस भयावह समस्या को अपेक्षित विस्तार और जमीन देता है। इस उपन्यास का एक अहम आकर्षण इसका शीर्षक है। मुझे विश्वास है कि पाठक इस किताब को पढ़ते हुए जब इस शीर्षक की पृष्ठभूमि तक पहुँचेंगे तब वे इसकी उपयुक्तता का अनुभव कर सकेंगे।

एम एम  चन्द्रा अपनी इस किताब में  जब किसानों और खेती की समस्याओं की बात करते हुए इनकी जड़ों तक जाते हैं तो बहुत बारीकी से उन परिस्थितियों के साथ ही बचाव के विभिन्न तरीकों पर भी बात करते हैं। अपनी विषयवस्तु पर समग्रता से की गई तैयारी उनके लेखन में साफ़ नज़र आती है। उनकी सकारात्मकता बहुत बार सूत्र वाक्यों की तरह सामने उपस्थित होती है--
" जब हम जमीनी लड़ाई लड़ते हैं तो हमसे तमाम गलतियाँ होती हैं। हम उन ग़लतियों से ही सबक लेकर आगे बढ़ते हैं। दुनिया की तमाम क्रांतियों की सफलता और असफलता का अनुभव हमारे सामने है। हमें इनसे सीखने की ही नहीं बल्कि आगे बढ़ने की ज़रूरत है।"

"भारतीय समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार है। उसके बिखरते ही पुरानी परंपरा और मूल्य बिखर जाते हैं।"

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

फ्लैप जीवनपुरहाट जंक्शन

अशोक भौमिक की तस्वीरों में ज़िन्दगी के जितने रंग दिखाई देते हैं उससे कहीं ज्यादा इन स्मृति आख्यानों में। इस किताब में शामिल इन बाइस स्मृति-आख्यानों में ज़िन्दगी इस कदर साँस लेती है कि काग़ज़ के पन्नों पर लिखी हुई तहरीर अचानक उनकी तस्वीरों की तरह ही हमारे सामने जीवन्त हो उठती है। ज़िन्दगी के तलघर में जाने कितनी कहानियाँ और क़िरदार छुपे रहते हैं किन्तु इन्हें पहचानने और कहने का हुनर सबको नहीं मिलता। अशोक भौमिक के इन आख्यानों में निहित संवेदना, मर्म और मानवीय सरोकार उनके इसी हुनर का कमाल हैं।

अपने जीवन-अनुभवों और स्मृतियों के तलघर से तमाम ऐसे किरदारों को ढूँढकर उन्होंने इन कहानियों का पात्र बनाया जो सभ्य समाज द्वारा हाशिये पर धकेल दिये गये हैं और जिन्दा रहने की जद्दोजहद ने जिनके चेहरों पर अमिट निशान छोड़ दिये हैं।

" जीवनपुरहाट जंक्शन " के ये स्मृति आख्यान मर्म और संवेदना का एक ऐसा अद्भुत जहान रचते हैं जिनकी गूँज पाठकों के जेहन में लम्बे अरसे तक कायम रहेगी।
छोटे हमीद का वह मासूम सा क़िरदार, चौरासी के दंगों में अपना बहुत कुछ गँवाकर कथाकार के गले लगकर रोता सुरजीत, बेहद गरीब किन्तु खुद्दारी की हद तक ईमानदार शरफुद्दीन, आजाद हिंद फ़ौज का वह सिपाही, जिसे जीवन यापन के लिए चौकीदारी करनी पड़ रही थी, जैसे यादगार चरित्रों और छल, कपट , विश्वासघात की अनेक दास्तानें हमारी चेतना को हिलाकर रख देती हैं। किसी कहानी को पढ़ते समय यदि उसकी सच्चाई पर सन्देह हो तो यह बात ध्यान रखें कि इस दुनिया में अमानवीयता का स्तर किसी भी रचनाकार की लेखन सीमा से कई गुना ज्यादा है और कुछ सत्य विश्वनीयता के अन्तिम छोर के बाद शुरू होते हैं।

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

चौपाल

9 दिसम्बर 2018 की एक शाम। भवन्स कॉलेज अंधेरी का खूबसूरत एस. पी.जैन सभागार और "चौपाल" का नया संस्करण! खचाखच भरी हुई दर्शक दीर्घा में मुम्बई और मुम्बई से बाहर के अनेक शीर्ष रचनाकारों और संस्कृतिकर्मियों की उपस्थिति ने इस शाम को एक मुक़म्मल शाम में तब्दील कर दिया था।
"चौपाल" नामक इस सांस्कृतिक आयोजन की स्थापना बीस वर्ष पूर्व जून 1998 में हुई थी। चौपाल के साथ अनेक विशिष्ट हस्तियों श्री राजेन्द्र गुप्ता, श्री शेखर सेन, श्री अतुल तिवारी और श्री अशोक बिंदल के श्रम, समर्पण और लगन का एक प्रेरक और सकारात्मक इतिहास जुड़ा हुआ है। आज की भव्य चौपाल इन गुणी लोगों की जिद और हुनर का ही प्रतिफल है।

कार्यक्रम के संचालन सूत्र का कुशल निर्वाह करते हुए अतुल तिवारी जी ने मार्क्स , बुद्ध और मजाज पर बेहद तार्किक और खूबसूरत तब्सिरा पेश करने के बाद दास्तानगोई टीम के होनहार कलाकार हिमांशु बाजपेयी को मंच पर आमंत्रित किया और इसके बाद हिमांशु ने मशहूर शायर मजाज़ लखनवी पर केन्द्रित एक घण्टे की जो अद्भुत दास्तानगोई पेश की, उसे मुम्बई वाले जल्दी नहीं भुला पायेंगे।
इस दौरान वहाँ उपस्थित दर्शकों ने मजाज़ साहब की निजी ज़िन्दगी के बारे में बहुत कुछ जाना। उनके शेरो शायरी, लतीफ़े, हाज़िर जवाबी! कमाल की याददाश्त है इस दास्तानगो की। आख़िर में हिमांशु ने मजाज़ साहब की इस अमर रचना को पूरे जोशो खरोश के साथ सुनाकर रोमांचित कर दिया....

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

बादल, बिजली, रैन अंधियारी, दुख की मारी परजा सारी
बूढ़े, बच्चे सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं, दुखिया नारी
बस्ती-बस्ती लूट मची है, सब बनिये हैं सब व्यापारी बोल !

अरी, ओ धरती बोल ! !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

कलजुग में जग के रखवाले चांदी वाले सोने वाले
देसी हों या परदेसी हों, नीले पीले गोरे काले
मक्खी भुनगे भिन-भिन करते ढूंढे हैं मकड़ी के जाले

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

क्या अफरंगी, क्या तातारी, आँख बची और बरछी मारी
कब तक जनता की बेचैनी, कब तक जनता की बेज़ारी
कब तक सरमाए के धंधे, कब तक यह सरमायादारी

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

नामी और मशहूर नहीं हम, लेकिन क्या मज़दूर नहीं हम
धोखा और मज़दूरों को दें, ऐसे तो मजबूर नहीं हम
मंज़िल अपने पाँव के नीचे, मंज़िल से अब दूर नहीं हम

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

बोल कि तेरी खिदमत की है, बोल कि तेरा काम किया है
बोल कि तेरे फल खाये हैं, बोल कि तेरा दूध पिया है
बोल कि हमने हश्र उठाया, बोल कि हमसे हश्र उठा है

बोल कि हमसे जागी दुनिया
बोल कि हमसे जागी धरती

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

इसी वर्ष एक बेहद अविश्वसनीय जल दुर्घटना में वरिष्ठ कलाकार और साथी अंकित को गँवा देने का दुःख हिमांशु की आँखों में लगातार झलकता रहा।

गुलज़ार साहब ने मजाज़ लखनवी और हिमांशु की दास्तानगोई पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए हिमांशु को आशीर्वाद दिया।
*****
मध्यान्तर के बाद अगले सत्र में प्रसिद्ध लेखक और विविध भारती के उद्घोषक यूनुस खान और हिमांशु के बीच एक छोटी सी गुफ़्तगू हुई जिसने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। ख़ुशनुमा अंदाज में हुए इस वार्तालाप से हिमांशु बाजपेयी के व्यक्तिगत जीवन और उनके शहर लखनऊ के बारे में बहुत सी रोचक जानकरियाँ हासिल हुईं।

अगले वक्ता के रूप में थे शायर अख़्तर आज़ाद। उन्हें इस ग़ज़ल पर श्रोताओं से भरपूर दाद हासिल हुई--

मैं बुरा हूँ या भला अपनी अना में मस्त हूँ
क्यूँ उधर जाऊँ जिधर अच्छा नहीं लगता मुझे

आने वाली नस्ल के हक़ में दुआएँ कीजिए
फूल से चेहरों पे डर अच्छा नहीं लगता मुझे

होती है बच्चों से रौनक़ हर दर-ओ-दीवार की
बिन परिंदों के शजर अच्छा नहीं लगता मुझे

जिन घरों में हो नहीं शामिल दुआ माँ-बाप की
कोई भी घर हो वो घर अच्छा नहीं लगता मुझे

के के बिड़ला न्यास के निदेशक और  "हिन्दी चेतना" पत्रिका के सम्पादक डॉ सुरेश ऋतुपर्ण ने बहुत कम समय में चंद हाइकू और एक कविता सुनाकर आनंदित किया।

चौपाल का समापन सत्र भी अविस्मरणीय रहा। वरिष्ठ संगीतकार कुलदीप सिंह के तबला वादन और उनके यशस्वी सुपुत्र ग़ज़ल गायक जसविंदर सिंह के गायन ने श्रोताओं को एक ऐसी दुनिया में पहुँचा दिया जहाँ सिर्फ़ संगीत की स्वर लहरियाँ थीं। पिता- पुत्र की इस जुगलबन्दी का जादू सर चढ़कर बोल रहा था। जसविंदर ने बड़ी सहजता और मधुरता से दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल " मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ " गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
इस अवसर पर हस्तीमल हस्ती, सूरज प्रकाश, गुलज़ार, विष्णु शर्मा, चित्रा देसाई, विभा रानी, अजय ब्रह्मात्मज, ममता सिंह, रीना पंत, अमृता सिन्हा, सुरबाला मिश्र, अनुराधा सिंह जैसे तमाम लेखक, कवि और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।
हिन्दुस्तान के सबसे बड़े प्रकाशन गृह "राजकमल प्रकाशन समूह" द्वारा प्रस्तुत पुस्तक प्रदर्शनी को पाठकों का अपार स्नेह और सहयोग मिला। ममता सिंह का सद्यःप्रकाशित कहानी संग्रह " राग मारवा" इस दौरान लगातार साहित्य प्रेमियों के आकर्षण का केन्द्र रहा।

देहरी के अक्षांश पर : डॉ मोनिका शर्मा

डॉ मोनिका शर्मा की अकादमिक और लेखकीय उपलब्धियाँ खासी प्रभावशाली हैं। अर्थशास्त्र एवं पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातकोत्तर डिग्री, पी.एच. डी., समाचार वाचक, एंकर,अध्यापक, ब्लॉगर, इसके अलावा महिलाओं, बच्चों और विविध सामाजिक विषयों पर सार्थक लेखन और देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में निरंतर प्रकाशन।
इतने छोटे से जीवन के एक तिहाई हिस्से में इतने बड़े बड़े काम लोग कैसे कर लेते हैं, यह मुझ जैसे औसत मस्तिष्क व्यक्ति के लिए
घोर आश्चर्य और बौद्धिक रूप से आक्रांतकारी विषय है☺☺

इन दिनों गाहे बगाहे उनके कविता संग्रह "देहरी के अक्षांश पर" देखता रहा। वैसे इस देखने के पीछे एक बड़ा कारण इसका खूबसूरत आवरण भी रहा☺

2015 में बोधि प्रकाशन से छपे इस संग्रह की एक बड़ी कविता जो मुझे बहुत अच्छी लगी, तीसरे नंबर पर साझा कर रहा हूँ।  हालाँकि कविता के आरंभ में यदि "कभी कभी " शब्द जुड़ा होता तो यह अधिक प्रासंगिक हो जाती। इसके पहले चंद शब्दों में बहुत कुछ कहती दो छोटी कविताएँ......

१)

मुट्ठी भर सपनों और
अपरिचित अपनों के बीच
देहरी के पहले पायदान से आरम्भ होती है
गृहिणी के जीवन की
अनवरत यात्रा।

२)

स्त्री के लिए
अधूरे स्वप्नों को
हर दिन जीने की
मर्मान्तक पीड़ा
गर्भपात की यंत्रणा सी है।

३)

बरसों का साथ बहुत कुछ देकर
सदा के लिए
छीन लेता है आपसी संवाद
सम्बन्धों की सामाजिक रूपरेखा जीवित रहती है
पर शब्द खो जाते हैं
शेष रह जाती है मात्र औपचारिकता
रिश्तों को निभाने की
मन की नहीं
जगत की सुनने सुनाने की।

निश्चित हो जाती है परिसीमाएँ
पसर जाते हैं अनचाहे सन्नाटे
जो भेद जाते हैं कहीं भीतर तक
और सिमट जाते हैं
हृदय के यथार्थ भाव
जन्म-जन्मांतर के साथ में
जीवन गतिशील रहता है
और भावनाएँ गतिहीन हो जाती हैं
तब संवेदनाओं को घर के आहाते में
आजीवन कारावास मिलता है।

डॉ मोनिका शर्मा

सोमवार, 12 नवंबर 2018

दुष्यंत स्मृति

दुष्यंत को पहली बार महज़ एक शेर की वजह से जाना था। इससे पहले ग़ज़लों और शेरों की जिस दुनिया से थोड़ी जान पहचान थी, वहाँ कभी इस तरह की असरदार पंक्तियाँ सामने आयी ही नहीं थीं जिन्हें पढ़कर इस कदर ठिठक जाना पड़ा हो। शेर था--
कहाँ तो तय था चरागां हरेक घर के लिए
कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए....

हुस्न, इश्क़, मीना और सागर से परे ये एक अलग सी भाषा और भाव-भूमि थी। मूल ग़ज़ल तक पहुँचने में काफी वक़्त लगा। जब इसका मुक़म्मल स्वरूप देखा तो दरख़्तों के साये में धूप लगने का बिम्ब मन में स्थायी रूप से घर कर गया--

यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिए

सामाजिक असमानता और विडंबना को इससे अधिक मर्म और तंज से उनसे पहले शायद ही कोई व्यक्त कर पाया हो---

न हो कमीज तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए|

खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही
कोई हसीन नजारा तो है नजर के लिए|

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेकरार हूँ आवाज में असर के लिए

और जब इसका मक़्ता पढ़ा तो
गुलमोहर लफ़्ज़ भी मोहब्बतों में शामिल हो चला--

जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए|

इंटरनेट और गूगल की दुनिया तो बहुत देर में आई। ढूँढने और पढ़ने की इतनी सहूलियत उस दौर में कहाँ थी। उनकी अन्य ग़ज़लें इंटरनेट आने के बाद ही पढ़ने को मिल सकीं।

हो गयी पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

जैसी ग़ज़लें पढ़कर दुष्यंत के प्रति जितना गर्व और सम्मान जागा मन में उतनी ही कसक। कसक इसलिए कि इतने बड़े शायर को कितनी छोटी सी उम्र मिली थी.. 42 वर्ष की उम्र भी भला कोई उम्र होती है जाने की। ये अलग बात है कि इन्हीं बयालीस सालों में अपने लेखन की बदौलत दुष्यंत को जो उपलब्धियाँ हासिल हुईं उसका कोई सानी नहीं !

बरसों बाद किताबों की दुनिया तक पहुँचने की राह निकली और हाथों में आया - " साये में धूप " उनका इकलौता ग़ज़ल संग्रह। क्या संयोग है कि जिस विधा ने उन्हें अमर बनाया उस विधा की मात्र एक किताब उनके नाम पर दर्ज़ है, जबकि उपन्यास और कविता संग्रह एकाधिक। इस छोटे से असली बेस्ट
सेलर एलबम की शानदार भूमिका कमलेश्वर ने लिखी थी, जिसके आख़िर में उन्होंने दुष्यंत का एक ऐसा शेर उद्धृत किया था जिसे पढ़कर किताब बेशक़ीमती लगने लगी--

हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए

जिस ग़ज़ल से यह शेर उठाया गया है वह एक चर्चित और प्यारी ग़ज़ल है--

ये सच है कि पाँवों ने बहुत कष्ट उठाए
पर पाँव किसी तरह से राहों पे तो आए

हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए

जैसे किसी बच्चे को खिलौने न मिले हों
फिरता हूँ कई यादों को सीने से लगाए

चट्टानों से पाँवों को बचा कर नहीं चलते
सहमे हुए पाँवों से लिपट जाते हैं साए

यों पहले भी अपना—सा यहाँ कुछ तो नहीं था
अब और नज़ारे हमें लगते हैं पराए

उनके असंख्य मुरीदों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि ग़ज़ल के शास्त्रीय उस्ताद उनकी ग़ज़लों में अहर और बहर की कमियाँ बताते हैं। उनकी लोकप्रियता और रचनाओं की गुणवत्ता इन तमाम दुनियावी चीजों से बहोत बहोत ऊपर की चीज बन चुकी है।

दुष्यंत एक अच्छे कवि भी थे और उनके कई कविता संग्रह राजकमल और वाणी से प्रकाशित हैं। चलते चलते उनकी एक छोटी सी कविता से इस तब्सरे को विराम देता हूँ। जय हिन्द !!

जा तेरे स्वप्न बड़े हों।

भावना की गोद से उतर कर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।

चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये
रूठना मचलना सीखें।

हँसें
मुस्कुराएँ
गाएँ।

हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें
उँगली जलाएँ।
अपने पाँव पर खड़े हों।
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।

दुष्यंत कुमार

© गंगा शरण सिंह

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