मंगलवार, 29 जनवरी 2019

एक औरत की नोटबुक

क्या कहानियाँ सिर्फ़ दोपहर की फ़ुरसत में महिलाओं को अच्छी नींद सुलाने के लिए लिखी जानी चाहिए? क्या हर कहानी का पहला उद्देश्य मात्र मनोरंजन होना चाहिए? नहीं। बेशक कहानियों से कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन खड़ा नही किया जा सकता पर जीवन को बेहतर बनाने में, सामाजिक कुरीतियों को अपदस्थ करने में, व्यक्ति को उसके इर्द गिर्द फैली विसंगतियों के प्रति जागरूक और चौकस करने में हर प्रकार के रचना-कर्म की एक निश्चित सकारात्मक भूमिका होती है।
मैं दुपहर की फ़ुरसत में नींद दिलाने के लिए कहानियाँ नही लिखती। कहानी पढ़कर आती हुई नींद भाग जाए और पढ़ने वाले के दिमाग में थोड़ा सा ख़लल पैदा करे, कुछ सोचने पर मज़बूर करे, घर के पिछवाड़े फेंक दी गयी या जानबूझकर आँखों से ओझल कर दी गई कुछ अनचाही स्थितियों को सामने ला खड़ा करे - तभी कहानी लिखने का मक़सद पूरा होता दिखाई देता है।

सुधा अरोड़ा
( एक औरत की नोटबुक )

शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

अशोक भौमिक : सुनीता जैन को स्मरण करते हुए

सुनीता जैन 

19 दिसम्बर 2002 -11 दिसम्बर 2017 

न जाने क्या सोच कर इन दो तारीखों को पिछले साल अपनी डायरी के एक पन्ने पर एक साथ लिखा था। दोनों तारीखों के बीच पंद्रह सालों का फैसला था फिर भी दोनों में एक रिश्ता था और यह रिश्ता दोनों ही दिसम्बर की तारीखें थीं, महज इस लिए नहीं थीं। कवि टी एस इलियट की एक प्रसिद्द कविता 'वेस्टलैंड' की एक पंक्ति मुझे अपने कालेज के दिनों से याद है जहाँ कवि ने अप्रैल को एक 'क्रूरतम' महीना कहा है। शायद टी एस इलियट ने उस मधुर वसंत को क्रूरतम कहा है जो हमारे स्मृतियों में एक दर्द के अहसास के साथ बार बार लौटती है। 

मेरे लिए दिसम्बर का महीना कुछ ऐसा ही है। 

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मुझे कलकत्ता रहते काफी लम्बा समय बीत चुका था और एक ऊब सी होने लगी थे, उस शहर से। मुझे लगने लगा था कि इस शहर में रह कर चित्र बनाना मेरे लिए संभव नहीं होगा और मैं अगर अपनी पूरी जिंदगी भी यहाँ बिता दूँ तब भी मैं एक 'आउटसाइडर' ही बना रहूँगा। तभी डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय, कलकत्ता के भारतीय भाषा परिषद् छोड़ कर भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली आ गए थे और इन्होने जब मुझे दिल्ली आने का न्योता दिया तो मैंने , बिना ज्यादा कुछ सोचे दिल्ली आने का निर्णय ले लिया। दिल्ली आये बस कुछ ही दिन हुए थे,  श्रोत्रिय जी अपने कुछ घनिष्टों को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में रात के भोजन के लिए आमंत्रित किया था।  बाद में पता चला की उस दिन उनका जन्मदिन था ! 

वह 18 दिसम्बर 2002 की एक शाम थी !

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आई आई सी में उस शाम मेरे लिए सभी अपरिचित थे।आमंत्रितों में सुनीता जी भी थीं इसलिए सुनीताजी से यह मेरी पहली मुलाक़ात थी। मुझे उनसे पहली मुलाकात में ही लगा कि वह कवयित्री ही नहीं हैं बल्कि चित्रकला में उनकी गहरी दिलचस्पी है। मेरे चित्रों से सुनीता जी ,  उस समय प्रकाशित होने वाली कई पुस्तकों के आवरणों के जरिये परिचित थीं और वह मेरी स्टूडियो आना चाहती थी । तब बस कुछ ही दिन बीते थे , मैंने लाजपत नगर एक किराये के मकान के एक कोने में एक ईज़ल तो लगा लिया था पर काम करना शुरू नहीं किया था । यूँ कहें कि नये शहर और नयी नौकरी के नए किस्म के बोझ तले चित्र बनाने के लिए मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था । मुझे याद है उन्ही दिनों सुप्रसिद्ध नृत्यांगना शोभना नारायण के व्यक्तिगत निमंत्रण पर अशोका होटल के हाल में उनकी एक एकल प्रस्तुति को देखने का मौका मिला। शोभनाजी जिस गीत पर नृत्य प्रस्तुत कर रहीं थीं, उसके बोल में पिहू के  माध्यम से पिया को याद करने का प्रसंग था ( पिहू , पिया की बानी न बोल' ) ! पर उस एकल प्रस्तुति को देखते हुए मैंने बार बार शोभना जी के साथ एक नहीं बल्कि कई कोयलों को उनके इर्द -गिर्द उनके नृत्य करते देखा । कार्यक्रम के ख़त्म होने के बाद मैं बिना वहाँ रुके अपने घर लौट आया था और जब अपने ईज़ल के पास (दिल्ली में पहली बार) बैठा तो नृत्य की मुद्राएँ  थीं ही पर साथ में चिड़ियों  भी था । उस रात मैंने कितने स्केचेस किये थे , यह आज याद नहीं पर इतना जरूर याद है कि मैंने जाड़े की उस रात में , निष्क्रियता के एक लम्बे दौर को नृत्यांगना की घुंघरुओं और कोयल की कूक से तोड़ा था। 

इस घटना के कुछ ही दिनों बाद सुनीता जी अपने वादे के मुताबिक़ मेरे घर आयी थीं और मेरे तमाम चित्रों को बहुत लगन से देखा था। वह कागज़ पर बने चित्रों को अपने हाथों से यूँ पकड़  रहीं थीं कि मानों वे कागज़ पर नहीं बल्कि काँच पर बने थे। उस दिन उन्होंने मुझसे एक पेन्टिंग लिया था। दिल्ली शहर में यह मेरी पहली पेन्टिंग थी जो बिकी थी। सुनीता जी इस पेन्टिंग  लेकर इतनी उत्साहित थीं कि मेरे घर से निकल वह सीधे फ्रैमर के पास गयीं थीं और चित्र को फ्रेम करा कर ही घर लौटी थी। 

मेरे स्टूडियो में बैठे मुझे उस दिन पहली बार लगा था कि, 'अब बस! बहुत हो गयी नौकरी' ।

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सुनीता जी के घर पहली बार जब गया था , तो दीवार पर काफी पेन्टिंगें लगी थीं पर एक आध को छोड़ कर वे सभी ऐसे चित्रकारों की थीं जिनके नाम मैंने पहले कभी नहीं सुने थे। सुनीता जी के माध्यम से ही हालाँकि बाद में लगभग सभी से परिचित होने का मौका मिला। वे सभी युवा थे जो 2003  आस पास , अपनी-अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। इनमें कई चित्रकार ऐसे भी थे जिनके चित्र उन्हें पसन्द नहीं थे , कुछ बाज़ार के पीछे भागते हुए अपने चित्रों के साथ समझौता करने लग गये थे। सुनीता जी का चित्रों को देखने का एक ख़ास नज़रिया था जिससे वह कभी भी विचलित नहीं हुई। मुझे लगता था कि सुनीता जी सभी चित्रों में एक कविता खोजती थीं , एक ऐसी कविता जिसे वह अपनी कविता में लिखना चाहतीं थीं। चित्रकला और चित्रकारों के प्रति उनके प्रेम को मैंने शायद सबसे करीब से देखा था । 

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 वह शायद 2005 का वक़्त था। मैं और मेरी पत्नी एक शाम ललित कला अकादमी की  कला दीर्घाओं में प्रदर्शित चित्रों को देख रहे थे। एक हॉल में मध्य प्रदेश के कुछ छोटे-छोटे कस्बों से आये पाँच कलाकारों की प्रदर्शनी चल रही थी। सभी चित्रों में चित्रकारों की ईमानदारी तो दिख रही थी पर उनका एक भी काम नहीं बिका था। इस प्रदर्शनी का एक कलाकार, अकेले ही अन्य चार दोस्तों के चित्रों को लेकर इस प्रदर्शनी में उपस्थित था । उसने  बेबाक ढंग  से हमसे कहा, कि प्रदर्शनी के लिए पाँचों चित्रकारों ने पैसे मिला कर हॉल का किराया भरा था पर अगर पाँचों कलाकार आते तो उनके दिल्ली आने जाने और रहने खाने का खर्चा इतना ज्यादा हो जाता कि प्रदर्शनी ही संभव न हो पाता , इसीलिये वह अकेले ही दिल्ली आकर इस प्रदर्शनी को कर रहा था। कल प्रदर्शनी का आखरी  दिन था और उस कलाकार के पास वापस  जाने का ट्रैन का किराया तक नहीं था। मैं उसे किराये भर के पैसे ही दे सकता था, लिहाज़ा मैंने उसकी पेशकश की । पर वह खुदगर्ज़ चित्रकार इस महानगर आया था अपने और अपने दोस्तों के चित्र दिखाने और बेचने आया था ,खुद को नहीं। उसने मुझे पूरी विनम्रता के साथ इंकार कर दिया।

मैं खुद इस शहर में नया था और उसे मदद  करने के लिए मेरे पास और कोई उपाय नहीं था। ऐसे असहाय स्थिति में मुझे सुनीता जी की याद आयी। सुनीता जी को एक अतिरिक्त क्षण भी नहीं लगा और वह तुरन्त पूरी बात समझ गयी।  दुसरे दिन , जिस दिन प्रदर्शनी का अंतिम दिन था ; सुनीता जी ठीक ग्यारह बजे ललित कला पहुँची थीं और उस प्रदर्शनी से पाँच चित्र खरीदे थे।  घर में जब वह चित्रकार पेन्टिंगों को पहुँचाने आया था तब अलग से उन्होंने उस चित्रकार को ट्रेन का किराया भी दिया था। उस शाम मैंने सुनीता जी की बैठक की दीवार पर , कस्बों से आये उन पाँच संघर्षशील ख़ुदग़र्ज़ चित्रकारों के चित्रों को टँगे देख कर मुझे सुनीता जी से कहीं ज्यादा ख़ुशी हुई थी। 

इस घटना के बाद जब भी कोई युवा चित्रकार किसी आर्थिक संकट में पड़ कर मेरे पास आता तो मैं उसे सुनीता जी के पास ले जाता था। सुनीता जी लम्बे समय तक विदेशों में रहीं थीं लिहाज़ा उनके बहुत सारे दोस्त और परिचित उनके घर आतेजाते थे और चित्र संग्रह करते थे।  इन्हीं संग्राहकों के माध्यम से इन युवा चित्रकारों के अनेक चित्र आज विदेशों में हैं। 

ऐसे न जाने कितने किस्से हैं , कितनी घटनाएँ हैं जहाँ मैंने सुनीता जी को महज़ एक कलाप्रेमी ही नहीं बल्कि उन युवा चित्रकारों के लिए एक परम स्नेहपूर्ण,उदार मदददाता के रूप में भी देखा है। 

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तब मेरा स्टूडियो साउथ एक्स में था। एक दिन मेरा एक दोस्त अपने साथ एक युवा प्रतिभाशाली चित्रकार को मुझसे मिलाने ले आया।  पता चला कि जे एन यु में छात्रसंघ चुनाव के दौरान प्रचार पोस्टर बनाने के लिए , वह बंगाल के किसी छोटे से जिले से दिल्ली आया था। चुनाव ख़त्म हो चुका था ,अब समस्या थी उसके लिए रहने खाने का इंतज़ाम करने और कोई काम जुटाने की। सुनीता जी विचारधारा के स्तर पर वामपंथ विरोधी थीं, पर  कभी भी किसी बात पर मुझे उनसे संवाद करने में कतई दिक्कत नहीं आयी। इस युवा चित्रकार के बारे में जब मैंने सुनीता जी से कहा तो उन्होंने अपने इलाके के आर डब्ल्यू ए के दफ्तर  बेसमेंट में न केवल उसके रहने का इंतज़ाम ही करवा दिया बल्कि इलाके के बच्चों के लिए चित्रकला शिक्षा का क्लास भी शुरू करा दिया जिससे उसे कुछ पैसे भी मिलने लगे । उसकी समस्या को देखते हुए सुनीता जी ने उसे एक साईकिल खरीद दी। इस चित्रकार का चित्र कभी भी सुनीता जी के रूचि से मेल नहीं खाता था फिर भी उन्होंने उसका एक चित्र केवल  खरीदा ताकि उसे रंग कैनवास खरीदने के लिए पैसे मिल सके । 

एक और चित्रकार था जो अपनी प्रेमिका को साथ लेकर ,अपना घर छोड़ कर दिल्ली में बसने आ गया था ।  दोनों को साथ रहते कई साल गुज़र गये पर अर्थाभाव  के कारण , शादी करने की स्थिति नहीं बन पा रही थी। ऐसे दो कलाकारों की मदद करने के लिए वे कुछ दिनों तक उपाय सोचती रही फिर उन्होंने उन्हें दैनिक भत्ते पर अपनी पेन्टिंगों की कैटलॉगिंग के लिए रख लिया। मुझे उन्होंने कहा था , " मैंने उन्हें दैनिक भत्ते पर इसलिए रखा है ताकि रोज़ उन्हें पैसा मिलता रहे।  वे अपना नौकरी की तलाश भी जारी रख सकेंगे और खाने पीने में उन्हें दिक्कत भी नहीं आएगी। " 

इसके बाद जल्द ही इन दोनों चित्रकारों का कठिन समय बीत गया और उन दोनों ने न केवल शादी ही की बल्कि आज वे दिल्ली में अपना घर बसा लिया है।  

सुनीता जी अत्यंत सुलझी हुई महिला थी, जिन्हें दुनियादारी की गहरी समझ थी। एक कवयित्री के रूप में उनकी साधना ,उनके सपने और उनकी संगत के साथ उनके चित्रकला-प्रेम का कोई रिश्ता मुझे कभी नहीं दिखा । उन्होंने चित्रकला के प्रति अपने प्रेम को कभी सार्वजनिक नहीं किया इसलिए उनके घनिष्ठ साहित्यकार मित्रों के लिए सुनीता जी के व्यक्तित्त्व का यह चेहरा , अपरिचित ही है । 

सुनीता जी ने छोटे छोटे इलाकों से दिल्ली में आये हुए चित्रकारों की मदद की । एक चित्रकार को मैं जानता हूँ जिसकी उन्होंने पिछले दस वर्षों से ज्यादा समय तक मदद की। अपने मृत्यु के पहले तक उस चित्रकार को हर महीने न केवल पैसे ही देती रहीं ,रंग-काग़ज़  भी मुहैय्या कराती रहीं। छोटे छोटे इलाकों से दिल्ली में आये युवा चित्रकारों की असहाय स्थिति से वह प्रायः विचलित हो जाती थीं। उन्होंने जरूरतमंद चित्रकारों के लिए एक स्थाई कोष बनाने की सोची थीं पर कई कारणों से इस योजना को वह अंजाम नहीं दे सकीं ।   

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दिल्ली में  रहते हुए मेरे सोलह साल बीत चुके हैं। इस दौरान चित्रकला की दुनिया ने बहुत उतार चढ़ाव देखें हैं, पर इन सब बनते-बिगड़ते दौर में मेरी अपनी चित्रकला पर मे

री आस्था को सुनीता जी ने कभी टूटने नहीं दिया। उन्हें शायद अपने अंत का  पता चल चुका था इसीलिए वह अनंत की यात्रा के लिए खामोश अपने को तैयार करती रहीं और  एक रात बिना बताये ही उस यात्रा पर चल दी। 

वह दिसम्बर की ग्यारह तारीख थी !

पंद्रह सालों पहले इसी महीने उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई थी।  उनकी यादें तो साथ रहेंगी ही, पर दिसम्बर ' क्रूरतम' महीना बन कर हर साल आता और जाता रहेगा। 

◆कछु अकथ कहानी : कविता वर्मा

चौड़ी चिकनी सड़क पर बस पूरी ताकत लगा कर जितनी गति पकड़ सकती थी उस गति से दौड़ी चली जा रही थी।  बस के काँच यात्रा के धक्के खाकर पकड़ ढीली कर चुके ...