शुक्रवार, 22 मार्च 2019

तुझी मी वाट पाहते: ममता सिंह

हर इंसान के भीतर स्मृतियों की बड़ी दुनिया होती है। किसी के पास स्मृतियों का कंटीला जंगल होता है। किसी की स्मृतियों में फूल और कांटों का मिला-जुला झुरमुट होता है, जिसके सहारे जीवन का सफर तय होता है। किसी के पास अतीत और वर्तमान की ऐसी क्यारी होती है, जिसमें घटनाओं की नुकीली ईंटें  गहराई तक धंसती चली जाती है.....अतीत की क्यारी में रोपे हुए कुछ ही पौधे लहलहाते हैं, ज्यादातर वक्त की तेज आंधी में मुरझा जाते हैं।
         

खिड़की पर बैठे कांव-कांव की रट लगाए कौवे को रोटी खिलाकर वे फिर स्मृतियों के जंगल में दाखिल होने ही जा रही थीं कि तमतमाई हुई अभिधा सामने......उसके बेडरूम के दरवाजे बंद होने की खटाक से आवाज हुई। खिड़की का ग्लास जैसे हवा ने ज़ोर से हिला दिया हो....उनके पैर के पास नोटबुक और किताब के पन्ने फड़फड़ा उठे,  वे झुकीं...
...“अरे यह क्या”।
अभिधा का चेहरा लाल ....माथे से पसीना चुहचुहाया हुआ.....। नई पीढ़ी, नया खून....गुस्से का तरीका भी नया।...ज़रा-ज़रा सी बात में पटक-फोड़ करना। वे अभिधा के पास पहुंचें इससे पहले ही अभिधा के शब्दों के ओले उनके कान में चोट पहुंचाने लगे—“बहुत सुन ली तुम्हारी....बस अब नहीं, अब the end.........”…  कहते हुए अभिधा ने मोबाइल दीवान पर लगभग पटक दिया। मोबाइल चोटिल नहीं हुआ लेकिन उनके ज़ख़्मों की जड़ें नम हो गईं।

“किससे कह रही हो? मत कहो ....’the end’ कहने से पहले ‘beginning’ याद कर लो...रिश्तों की बिगिनिंग का सिरा थाम लो, बस the end वहीं end हो जाएगा। कभी-कभी जुबां से निकले अल्फाज़ सच हो जाते हैं और इंसान पछताता रह जाता है।”
अतुल तो बात-बात में कहता है—‘ये हमारी ज़िंदगी का आखिरी पन्ना है’... -अभिधा बुदबुदाई। अभिधा के कहे ‘The End’ से वे अपने जीवन की बिगिनिंग में पहुंच गईं। वैसे भी ज्यादातर वक्‍त वे स्मृतियों की सैर में ही बिताती हैं। उनकी आंखें दूर आसमान पर टिक गई और वे यहां इस घर में हो कर भी नहीं हैं। यूं तो जिंदगी के ज़्यादातर लम्हों में वे नहीं होतीं , पर लोग उनकी मौजूदगी का भान करते हैं....

“दादी आपने कुछ कहा ”...?
“अं..... हाँ ...न , नहीं तो ”...
वे बोलीं लेकिन उनका बोलना जैसे समंदर की लहरों के शोर में विलीन होते शब्द हों ......जो कानों में बड़े मद्धम-से सुनाई देते हैं। वे खुद भी समंदर ही हैं,  दरअसल हर स्त्री समंदर होती है। स्त्री के भीतर सरोकारों की दुनिया, उसकी पीड़ा.......पीड़ा की अथाह जल राशि होती है जिसका ओर- छोर नहीं होता। उनके भीतर भी तेज लहरों का आवागमन होता रहता है--इसकी ख़बर  उनके अपनों को नहीं होती।

-- “दादी बारिश तेज हो गई है। भीतर आइए। मौसम विभाग वालों की चेतावनी है कि आगामी 48 घंटों तक तेज बारिश होगी”। 
-- “मेरे भीतर की बारिश से कम है ये बारिश ”..
- “मतलब”...?
-- “मतलब समझने के लिए तुम्हें मेरा मन पढ़ना होगा, जो बहुत कठिन है। मेरे मन के भीतर भी बारिश है...अथाह जल है, समुद्र है, जिसकी सतह नहीं दिखती”...।
-- “आप क्या कहना चाहती हैं दादी? कोई फंतासी रच रही है क्या”??

-- “स्त्री फंतासी ही तो होती है। स्त्री के मन की बारिश सिर्फ वह देख सकती है, उसकी भीतर की बारिश में कभी इंद्रधनुष नहीं निकलता, सिर्फ काली घटाएं होती हैं”--कहती हुई वे लैपटॉप के की-बोर्ड  को अपनी उंगलियों से धीरे-धीरे छूने लगीं। IRCTC की वेबसाइट पर लॉग-इन कर खेड़ के टिकट की उपलब्धता चेक करने लगीं। उम्र की आखिरी दहलीज़ पर अकसर ही कामकाज में सुस्ती आ जाती है लेकिन वे आज भी वक्त की सीढ़ियां फटाफट चढती हैं।

-- “दादी इस तेज बारिश में दापोली जाना ठीक नहीं, हम अगले महीने चलेंगे” ।
-- “नहीं तब तारीख दिन और महीना बदल जाएगा, कुछ तारीखें ही खास होती हैं, जिन्हें हम ताबीज़ की तरह अपने गले में पहने रहते हैं”।
-- “दादाजी से जुड़ी कोई ख़ास याद है”??
-- “पहले खेड़ का टिकट बुक कर,..फिर बताऊंगी”।
-- “पिछले बरस आप इतनी बीमार थी डॉक्टर ने सफर करने को मना किया था फिर भी नहीं मानी ....आखिर वजह क्या है”??

उनके लिए उस रोज़ वाली बारिश के सामने सारी बारिशें फ़ीकी थीं। वे राघव के साथ पिकनिक पर गई थीं,  घर से निकलीं तो बूंदाबांदी थी लेकिन घंटे भर में काले डरावने बादल समंदर में डुबकियां लगाने लगे थे.......दूर तक कहीं कोई किनारा नहीं नजर आ रहा था। मूसलाधार बारिश में बिजली कड़कती तो लगता जैसे समंदर की लहरों में आग लग जाएगी। ...बचपन से ही बेलौस मिज़ाज की वे उफनते समंदर के पानी में गड़गड़ाती बिजली को पकड़ने दौड़ीं...। लहरों के बीच दौड़ना मतलब खुद को गिराना......लहरों की चपेट में बुरी तरह गिरीं, पर राघव ने कश्ती बन उन्हें बचा लिया। दापोली का करडे बीच...हरहराता उफनता...समंदर का फेनिल पानी और चंद मछुआरे और दो चार साहसी लोग ही दिखाई दे रहे थे।

बादलों ने धूप का अस्तित्व मिटा संध्या का धुंधलका फैला दिया था। धुंधली रोशनी में चारों ओर पानी ही पानी नजर आ रहा था। बारिश की बूंदों की लडियों को हवा उड़ाकर बालों पर मोती धर रही थी। सर्द बदन पर राघव की गरम हथेलियां किसी बिजली से कम नहीं थीं। दोनों की आंखों में आग और पानी घुलमिल गए थे। ताज्जुब की बात है पानी में चिंगारी ज्यादा सुलगती है।  माने पानी आग लगाता भी है और बुझाता भी है। उस रोज़ जब वे समंदर और राघव के शोलों यानी प्यार के ताप से नहाई अपने घर पहुंचीं तो उससे पहले ही सवालों का काफिला पहुंच चुका था। ‘आई’ की डांट के ओलों ने उनके बारिश वाले दिन के मख़मली अहसास को रौंद डाला था। समंदर के किनारे की तेज़ हवाएं सिसकियां लेने लगी थीं। तरह-तरह के जख़्मों के जरिए उनके भीतर राघव के लिए नफ़रत के बीज बोए जाने लगे। लेकिन कहां?...... प्रेम का अंकुर एक बार फूटने पर पौधा लहलहाता ही है। ज़ख़्मों से उनके मन के कपाट भीतर...और भीतर खुलते गए जिस पर राघव की अनंत छवियां क़ब्ज़ा करती गईं...।

-“दादी हम बीच पर जाने की वजह आज रिसोर्ट में ही रहें”.....खेड़ स्टेशन से बाहर आकर टैक्सी में बैठती हुई अभिधा बोली। वह चिहुँककर अपनी पीठ सहलाने लगीं।  दर्द-सा महसूस हुआ, कई ख़रोंचें लहूलुहान हो गईं,  गुंथी हुई लंबी-पतली चोटी को आगे कर खींच कर देखा....सलामत हैं बाल। बाबा की दी वो चोटें हरी हो गईं। आंखों में उतरे समुद्र को रोकना उनके लिए मुमकिन नहीं रहा। उनकी स्मृतियों का यह चौरस्ता बहुत ही बीहड़ है। अपनी आंखों की लहरों पर काबू पाती हुई वे बोलीं--“आज करडे बीच और लाडघर भी चलेंगे”।
“आपको दादाजी की याद आ रही है? आप उदास हैं?”
“यादों का झरना है भूचाल है लेकिन.... ”
....“लेकिन क्या?”
“………”

अभिधा अपनी दादी की इस मन:स्थिति से बेचैन होकर उन्हें बहलाने की कोशिश करने लगी। WhatsApp पर आए हुए कुछ जोक्स पढ़कर सुनाने लगी। वे सुन तो रही हैं लेकिन वे अपने कॉलेज के दिनों में पहुंचकर, राघव के भेजे गए sms मैसेजेस पढ़ रही हैं। कृषि-अर्थशास्त्र राघव को बोरिंग लगता तो उस पीरियड में राघव उन्हें खूब सारे मैसेज भेजा करता। खेड़ से दापोली का रास्ता अब थोड़ा ही बचा है। कोंकण के इस इलाके में कहीं-कहीं सड़क और समुद्र एक-दूसरे का हाथ थामे चलते हैं। अभिधा के लिए ऐसा ख़ूबसूरत नज़ारा तिलिस्मी है। गाड़ी के साथ साथ चलते पेड़-पौधे, उसके साथ-साथ चलता समुद्र.........समुद्र तटों पर जहां बारिश नहीं हुई है वहां मछलियां रेत पर सुखाई जा रही हैं। मछलियों की वजह से यह पूरा इलाका दुर्गंध से भरा है। समुद्र के आंचल में बसे ये छोटे-छोटे गांव........इन गांव के बारे में Google करके पहले ही अभिधा सर्च कर चुकी है, लेकिन Google पर यहां के लोगों के जज़्बात, इंसानियत के बारे में कुछ नहीं खोज पाई।

पानी में भीगी काली रेत....रेत पर चमकती सीपियां, दूर कतार में खड़े नारियल के दरख़्त, दूसरी तरफ झूमते हुए हापुस आम के पेड़,  कहीं ऊंचाई पर पानी से भरे खेत......खेतों में इठलाती फसलें.....सागर किनारे का ऐसा सज़ा-संवरा अलौकिक रूप अभिधा पहली बार देख रही है। वह मन ही मन अपने दोस्तों की टोली के साथ दापोली पिकनिक का प्लान बना रही है। और मुरुड बीच की काली रेत पर पैर के अंगूठे और एड़ी को गोल घुमा कर गोला बना रही है। उसमें उसने तर्जनी उंगली से अपने दोस्तों के नाम लिख डाले हैं।

छोटी पुलिया से गुजरकर तिर्यक रास्ता हरणे गांव की ओर जाता है। सागर की लहरों के सामने बिखरे छोटे ठिये और दुकानों के बीच एक रेस्तरां में रुक कर अभिधा और उन्होंने भाखरी (चावल की रोटी) और अंडा करी खायी। भाखरी खाते वक्त उनके चेहरे पर मुस्कान की तेज किरण चमकी पर फिर तुरंत ही बदली में तब्दील हो गई। अभिधा ने उनकी आंखों के नीचे अटकी खु़शी की किरण को बाक़ायदा देखा और परखा। अभिधा सोचने लगी,  हर वर्ष 5 जुलाई को दादी का दापोली आना.....उनकी किताब का कोई अहम पन्‍ना है जो वह पढ़ नहीं पा रही है पर कभी ना कभी पढ़कर रहेगी। करडे बीच, लाडघर बीच और भी कई बीच वे गईं।  अभिधा उनकी छाया बनकर साथ-साथ चलती रही।

रिसोर्ट पहुंचकर वे शावर के नीचे वह देर तक खारे पानी का नमक बदन से छुड़ाती रहीं। गुनगुने पानी से नहा कर उनकी थकान उतर गई। अभिधा ने रेस्टोरेंट  से दोनों के लिए ब्लैक कॉफी के साथ भुनी हुई फिश फ्राई मंगवाई। वनमाली रिसोर्ट बारिश से नहाकर और निखर आया है। लैंप पोस्ट की रोशनी में झिलमिलाते हरसिंगार और गुलमोहर झूम रहे हैं। गुलमोहर के नर्म-नाज़ुक फूल बारिश की बूंदों को सह पाने में असमर्थ झरकर जमीन पर लाली बिखेर रहे हैं। बालकनी के झूले पर अभिधा कुदरत के इस नजारे को अपने मन के एल्बम में चिपका रही है। वे झींगुरों की तेज सीटीदार समूह गान के साथ कोई उदास गीत गुनगुना रही हैं। दो लताएं आपस में गलबहियां डाले प्रेम में लिप्त है। ठूंठ जैसे बांस के दो पेड़ एक दूसरे को छूते हुए सरसरा रहे हैं। रुकी हुई बारिश फिर शोर करने लगी है। सामने हरहराते समंदर की लहरें इतनी ऊंची उठ रही है कि जैसे अभी उड़कर कमरे के भीतर आकर उन्हें बहा ले जाएंगी। पानी के बारीक-बारीक फ़ाहे हवा के कणों में नमक घोल रहे हैं। होठों पर जीभ फिराते ही मुंह का स्वाद नमकीन हो रहा है।  उनकी झुर्रीदार आंखों में अतीत का सैलाब उमड़ आया है।

एक दिन जब वह अपने आई-बाबा के साथ समुद्र में डॉल्फिन देखने गई थीं, पानी की सतह पर तैरते हुए डॉल्फिन के समूह पर सूरज ने अपनी किरणें बिखेर पानी में नीला रंग घोल दिया था। समुद्र तट से काफी दूर......वहां कई कश्तियां तैर रही थी सामने की बोट में राघव था। और वे आंखों की कोरों से राघव को देख रही थीं।  उन दिनों उन पर आई-बाबा का पहरा था, लेकिन प्रेम में पड़ी स्त्री के लिए पहरे का किला भी बौना हो जाता है। शायद इसीलिए घरवालों और समाज के तमाम नियम-कानून के बावजूद ठोंक-बजाकर प्रेम नहीं किया जाता, प्रेम बस हो जाता है।

“दादी आप भीग रही हैं तबीयत खराब हो जाएगी”…..कहते हुए अभिधा ने उन्हें हाथ का सहारा दिया लेकिन वह जड़वत बैठी रहीं। उनके गालों पर कुछ नमकीन बूंदें झर गईं। जिंदगी में नमक जरूरी है लेकिन बिना मिठास के नमक ज़्यादा ही खारा लगता है। दादी इंसान दुनिया से जाकर सितारा बन जाता है वह आसमान से अपनों को देखता है, दादाजी भी आपको बादलों की ओट से देखते होंगे ।
-“पर मैंने कभी उन्हें भर आंखों देखा ही नहीं, उन्हें देखते ही मन में विद्रोह की आग जलती...”...कहते हुए ठंड से कांपते हाथों को हवा में फैला कर उन्होंने स्ट्रेच किया, टूटती आवाज को सहारा दे वे ‘पिच’ को थोड़ा और ऊपर उठाते हुए फिर बोलने लगीं। अपनी आवाज़ जितनी ‘हाई पिच’ की ओर ले जातीं, थकी आवाज़ उतनी ही नीचे गिर कर बेस पर आ जाती।

“मेरे अंतर्मन के पन्ने को कोई नहीं पढ़ सका ”
“दादी अपने भीतर के ज्वार को बाहर निकाल दीजिए मैं सुनना चाहती हूं, पढ़ना चाहती हूं आपके अंतर्मन के पन्ने”।
“तुम्हें मैं वह बताती हूं जिस पर मैं बहुत पहले पर्दा डाल चुकी थी” ।

अभिधा अपनी दोनों हथेलियों में अपना चेहरा टिकाकर प्रश्नवाचक मुद्रा में उनके सामने बैठ गई ।

यही वह करडे बीच था  जहां मैं हर शाम बैठकर उदास आंखों से लहरों का आना-जाना देखती। जिस समंदर के अलौकिक सौंदर्य पर मैं अभिभूत रहती। लहरों में इतना खेलती थी कि हाथ पांव दुखने लगते। उन्हीं लहरों में मैं वस्तु की तरह घंटों बैठी रहती, लहरें भी मुझे चट्टान मान चुकी थीं इसलिए शायद वे कभी मुझे अपने भीतर बहा ले जाने की कोशिश नहीं करती थीं। शाम ढले तक मैं बीच पर बैठी लहरों का खेल देखती रहती। तट पर रहने वाले लोग मुझे पागल समझने लगे थे।  घर वालों ने दया भाव से मेरा मानसिक इलाज भी शुरू कर दिया था। बहुत देर हो जाने पर कई बार वे ज़बरन मेरा हाथ पकड़ कर घर ले जाते। दरअसल समाज संवेदनशीलता के चरम को पागलपन का नाम देता हैं। कहते कहते उनकी बूढी  आवाज़ कंपकंपाने लगी। इसके बाद कुछ पलों का मौन...जो अभिधा के लिए असह्य था, वह एक कथानक की तरह आगे सुनने को आतुर थी। उसके युवा-मन में समानांतर अटकलों की कहानी भी चल रही है-- “लगता है दादा से इनके विवाह में अड़चनें आई होंगी”। उनकी ख़ामोशी अभिधा के लिए एक नई कहानी बुनने की पीठिका बना रही है। उनके चेहरे की झुर्रियों के बीच बारीक-बारीक स्याह पड़ी  लकीरों पर अचानक ललाई सी छा गई, होंठ हल्के से हिले, खुले और बंद हुए। आंखें चमकी और उनके कानों में बाबासाहेब कृषि कॉलेज के अंतिम पीरियड का घंटा टन्न से बज गया। वे फिर अतीत की वादियों में विचरण करने लगीं, उनकी आंखों गुलमोहर और बोगनविलिया के लाल गुलाबी रंग से सज गई हैं। उन्हें देखकर इस वक्त कोई भी कह सकता है वह प्रेम के सघन और दिव्य पलों को जी रही हैं। उनका मन उन्हीं पेड़ों की टहनियों में अटक गया है, जिनकी पत्तियों पर ढलते सूरज ने लाल फीता धर दिया था और ख़ुद समुद्र में डुबकी लगाने चल दिया। साथ साथ चलते हुए राघव और उनके बीच इतना फासला था कि सामने से कोई वाहन आता तो दोनों के कंधे आपस में टकरा जाते और उनका मन बीरबहूटी हो जाता।

अचानक जब राघव ने उनकी हथेली अपने हाथों में ली तो उनके हाथ रेशमी धागे के गोले-सा नरम हो गया था, उनकी हथेली पर उसने अपने होंठ रखे तो रात-रानी की ख़ुशबू हवा में घुल गई, हवा में नमी थी लेकिन उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थी। उनके पांव जमीन से उड़ने लगे थे, सड़क और घर का फ़ासला भी भूल चुकी थीं।

बादलों की तेज गड़गड़ाहट और बौछारें अब भीतर आने लगीं। अचानक बिजली की कड़क ने उनकी आंखों पर सर्च लाइट चमका दी। वे चिहुंक कर अपने तिलिस्मी ख्याल से बाहर आईं ।

अभिधा ने उन्हें हुलस कर बाँहों का सहारा देते हुए इसरार किया कि वे चलकर बिस्तर पर आराम करें। बाहर बारिश का शोर पर उनके भीतर गहन सन्नाटा... रिज़ोर्ट के ग्राउंड फ्लोर पर जगह-जगह पानी भर गया था। स्विमिंग पूल पानी से ढँक गया था। वहां कोई अनजान आदमी आए और वहां के कर्मचारी एहतियात से ना बताएं तो व्यक्ति छपाक से जा गिरे पूल में। अभिधा का मन उनकी बातों से काफी बेचैन था उसने आखिरकार पूछ ही लिया-
“क्या दादा जी से आपके रिश्ते ठीक नहीं थे” ?
“अंजरले और करडे बीच से आपका इतना ज्यादा जुड़ाव क्यों है? कह डालिए वह कहानी जो आपको कचोट रही है”

... “हम और वो कोंकण कृषि विद्यापीठ से निकलते और सड़क पर पैदल साथ साथ चलते”। अभिधा की आंखों में सवालों की घटाएं घिर आईं थीं। ..... “उस रोज़ मेरा आसमानी दुपट्टा झरते हरसिंगार और अमलतास से भर गया था, मैं लाल पलाश के फूलों से जैसे नहा उठी थी, दूर समंदर में अस्ताचल को जाता सूरज पानी में लाल और नारंगी रंग घोल रहा था और वह मेरी खूब सारी तस्वीरें खींचते खींचते अचानक इतने करीब आ गया कि मुझे उसके दिल की धड़कनें सुनाई देने लगीं, उसकी गरम सांसो की उष्मा से मैं हड़बड़ा उठी थी, तभी दूर से आते बाबा के दोस्त ने हमें देख लिया। बस उसके बाद मुझे बेड़ियाँ पहना दी गईं। पर बहती हवा को रोकना जरा मुश्किल होता है। उस बरस कृषि कॉलेज में मैंने टॉप किया था। इसी बिना पर ‘आई-बाबा’ को आगे पढ़ाई जारी रखने के लिए मैं कन्विंस कर पाई थी। इस तरह पढ़ाई और चुपके-चुपके राघव से मिलना भी जारी रहा”।

“...राघव....? दादाजी का नाम तो राघव नहीं है”... और भी अनगिनत प्रश्नों की बारिश से अभिधा भीग गई, पर दादी की मन:स्थिति को देखते हुए उसने एक भी सवाल पूछने की हिमाक़त नहीं की। थोड़े विराम के बाद वे फिर बोलीं- “राघव कभी-कभार नोट्स देने के बहाने से मेरे घर आता। ‘आई-बाबा’ को लगता कि वह पढ़ाई में मदद कर रहा है, उनके मन में उहापोह होता। कभी वे राघव से मीठा बर्ताव करते...यहां तक कि यदा-कदा मम्मी उसे भाकरी और फिश भी खिलातीं।  साथ में हरी पत्ती वाली चाय पिलातीं, लेकिन कभी ‘आई-बाबा’ उससे बड़ी बेरुख़ी से पेश आते। इस रिश्ते में वह बड़े कंफ्यूज़ थे। दरअसल हरे भरे गांव की तरह लोगों का मन भी हरा-भरा था लेकिन सभ्यता और विकास की सदी में पहुंचकर भी हमारे विचार बेहद अविकसित हैं। हमारे सभ्य समाज में संवेदनशीलता के जामा में बेहद निर्मम मन छिपा होता है हमारे घर वाले भी समाज के ठेकेदारों के सम पर अपनी रागिनी छेड़ते”।
“राघव आया था उत्तर प्रदेश के गांव से”।
“तो तू यूपी के भैया से लगन करेगी” ‘आई’ जो खुद जीवन भर ‘सच्चा प्यार’ तलाशती रहीं...बोली थीं।
“वह यूपी का भैया है इसलिए बुरा इंसान है..?”
“….’यूपी के भइया’ नाम के जातिवाद की एक और शाखा प्रस्फुटित हुई, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा ही नहीं था”।
“पण ती मराठी माणूस नहीं आहेत न .....! कशाला लग्न करणार.....”??

“मैंने उस समय ‘मराठी थाट’ से ‘दीपक राग’ की उत्पत्ति की तब घर हिंसा और तनाव की ज्वाला से भर गया। ‘दीपक राग’ गाने से मुझे सफलता नहीं मिली। राघव के मन के तार में मैं इतनी गुँथ गई थी कि उससे अलग होती तो मेरे जीवन का वायलिन टूट जाता, सो राघव नाम की प्रेम की नदी को अपने भीतर बहने दिया, अपना सुर बदल दिया...तार सप्तक से मध्य सप्तक में अपना सुर लाकर मैं सिर्फ ‘मेघ-राग’ गाने लगी। निरंतर ‘मेघ-राग’ गाने से ‘आई-बाबा’ का मन भी सूखे रेगिस्तान से पहाड़ी नदी में तब्दील होने लगा। राघव के प्रेम का मोरपंख मुझे सहला रहा था, जिसके हौसले से मैं अपने ‘आई-बाबा’ के मन को धान का खेत बना रही थी जिसमें बेहन लगाने से पहले खूब नरम किया जाता है”।

“उस दिन उफनता समुद्र लहरों से अठखेलियां करता उसे अपनी आग़ोश में भर रहा था, पूनम के दिन की लहरें ग़जब ढा रही थीं...लहरों के किनारे पर हमने प्रेम लिखा, लहरों ने मिटाया। हमने फिर लिखा। पत्थरों पर खुदे हुए नामों की तस्वीरें खींची, तलछट पर लेटकर लहरों को ओढ़ लिया, फिर छापक-छैया खेला...। धीरे-धीरे खिसकती रेत पर अपने पैर की एड़ी गड़ाकर गोलाकार बनाए, मुट्ठी में गीली रेत भरकर एक दूसरे के चेहरे पर हमने मल दी।... ” कहते कहते वह फिर उन लम्हों को जैसे जीने लगी । उनकी आंखें आसमान की ओर तिरछी उठीं”।

अभिधा के दिल की धड़कन थम-सी गई हैं वह अपनी अनझिप आंखों से उनके चेहरे पर लिखे अबूझ अफ़साने को पढ़ने की कोशिश कर रही है।

.....उन्हें राघव की सांसों की उष्मा अभी भी महसूस हो रही है, राघव के कहे अल्फ़ाज़ को पहन वे कुछ कह रही हैं, जिसे वे ख़ुद ही सुन पा रही हैं। उनके अतीत की फुलवारी में कांटे ज्यादा...फूल कम नज़र आ रहे हैं। फिर भी वह इस वक्त कचनार-सी खिल गईं हैं, शब्द-दर-शब्द टटोलती वे फिर बोलने लगीं...

........“और हम अपनी कार से पानी के तेज़ छींटे उड़ाते हुए लहरों के किनारे-किनारे दूर तक निकल गए। अचानक ही राघव को महसूस हुआ कि कार मोड़ते हुए गाड़ी के पहिए रेत में फंस रहे हैं... गाड़ी आगे नहीं बढ़ रही है, जैसे-जैसे राघव एक्‍सेलेटर को दबाते वैसे-वैसे पहिया अंदर धंसता जाता, हमने तुरंत वापस लौटने का फैसला किया, लेकिन कार टर्न होने का नाम ही नहीं ले रही थी। रेत के जिस हिस्से पर पहिया घूमता...वहां रेत गीली हो जाती और गोल गड्ढा हो जाता। हम समुद्र तट के ऐसे निर्जन छोर पर थे जहां सिर्फ विराट समुद्र था।...और ऊंची-ऊंची लहरों का तेज़-डरावना शोर... समंदर के विपरीत, ऊंचे टीले और विशालकाय पत्थरों के पीछे नारियल के दरख्त की कतार थी और था बीहड़ सन्नाटा। डर और घबराहट में हाथ बर्फ़ हो गए थे...आंखों के आगे समंदर गोल-गोल घूमने लगा--जिसमें आई बाबा का चेहरा भी...यूं ही काफी देर हो चुकी थी। घर पहुंचने का निर्धारित समय ख़त्म हो गया था। दूर....बहुत दूर...तट पर कुछ मछुआरे नाव बांध रहे थे, दूर से वह छोटे बच्चे नजर आ रहे थे। राघव और मैं मिलकर रेत में धंसी कार को बाहर निकालने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। मैं भाग कर सामने के टीले से एक पत्थर ले आई, कार के पहियों को राघव ने पत्थर के ऊपर चढ़ाने की कोशिश की। मैंने पीछे से ‘पुश’ करने की कोशिश की....लेकिन पहिया टस-से-मस नहीं हुआ। पानी हमारी ओर बढ़ता जा रहा था, हर बार लहरें चिप्स के नए रैपर  और पॉलिथीन छोड़ जातीं। लहरों का आवेग इतना ज्यादा था कि लगता अब हम अगले झोंके में बह जाएंगे, लेकिन समुद्र का विराट दिल जल्दी से किसी को लीलता नहीं। आखिर इतनी सारी नदियां उसकी आगोश में समाहित होती हैं तो अपनी बड़प्पन का उसे भी ख्याल रखना पड़ता है। इंसान को कहां ख्याल रहता है कि कुदरत हमारी हिफ़ाज़त कर रही है, इसलिए हम भी उसका सम्मान करें, ऐसे जोखिम उठाने की भला क्या ज़रूरत...यह हमें कहां याद रहता है। बार-बार हम खुद को कोस रहे थे कि इस खोखली रेत और ऐसे निर्जन किनारे पर भला क्यों आए...गुदगुदाने वाली लहरें अब विध्वंसक लगने लगी थी। राघव गाड़ी के पहियों और रेत के साथ लगातार मशक्कत कर रहा था।

“तुम करडे बीच की ओर जाओ, वहां कोई मछुआरा मिल जाए तो बेहतर...एक बार किसी की कार बीच पर पार्क की गई थी, लहरें उसे भिगो रही थीं, एक मछुआरे ने कार स्टार्ट करके सड़क तक ला दी थी। ये लोग यहाँ के एक्सपर्ट होते हैं”......हताश स्वर में कहते हुए राघव और ज्यादा पत्थर इकट्ठे करने लगा शायद पत्थरों पर गाड़ी का पहिया चढ़े और कार स्टार्ट हो जाए... वहां दूर तक कोई मदद करने वाला नहीं था। फिर भी मैं मदद की गुहार करती हुई उलटी दिशा में तलछट में दौड़ने लगी.... मेरी सांसों में जैसे उस वक्त मृदंग बज रहा हो और समुद्र तटीय हवा के वेग से भी तेज थी सांसों की गति.... तभी दिए और तूफान की कहानी की मानिंद वहां दिए भर रोशनी जगमगाई, तीन इंसानों की छाया टीले की तरफ से यानी समुद्र की विपरीत दिशा से आती नजर आई। हमारे जैसे साहसी रोमांच के शौकीन लोगों की काया थी ये...।  तफरीह के अंदाज में तीनों कदमताल करते हुए मेरी ओर बढ़े आ रहे थे, मैं उनकी ओर दौड़ी, उन्होंने भी मुस्कराते हुए अपने चलने की गति तीव्र कर दी। अब मेरे भीतर संशय की नदी हिलोरे मारने लगी--“पता नहीं यह तीनों व्यक्ति ठीक हैं या नहीं....”। पर यह तीनों सचमुच तूफान में तिनके का सहारा निकले। मेरी परेशानी सुनकर बड़े तटस्थ भाव से एक जो उन दोनों के बीच में चल रहा था बोला- “यहां रेत खिसकना आम बात है। एक बार हमारी गाड़ी भी फंस गई थी। पत्थर-वत्थर रखकर रेत में से गाड़ी तो निकाल ली लेकिन पूरी तरह से गाड़ी खड़ंजा हो गई थी।” वे तीनों और मैं आधा किलो मीटर भी नहीं चले होंगे कि बहुत ऊंची वेगवती लहरें आईं और हम चारों को धकेल गईं। अब तक सिर्फ पैर और कमर तक ही हमारी पोशाकें गीली थी—पर लहरें सिर तक भिगो गईं। मुंह में नमकीन पानी घुस गया और दांतों में रेत किरकिराने लगी। बालों में नमक चिपचिपाने लगा।  लहरों का वेग और ऊंचाई बढ़ती जा रही थी और मेरे मन के चलने की रफ्तार घोड़े सी हो गई थी।

मेरा मन डर की गहरी घाटी बन गया था, जिसमें एक तरफ....रेत की गहरी खाई में गाड़ी फंसी है जिसे बाहर निकालना- खाई में खुद गिर कर वापस पहाड़ी पर चढ़ने जैसा कठिन है, दूसरी तरफ ‘आई-बाबा’ का ख़ौफ़...अब तक घर पहुंच जाना था... जैसे-जैसे देर होगी उनका सामना करना दोपहर के तेज़ गरम सूरज से आंखें मिलाने जैसा होगा...ख्याल आते ही मैं गीली रेत पर दौड़ने लगी। मेरे पैर हल्के हल्के रेत में धंस रहे थे, लहरें कभी तेज कभी धीमी गति से हमारी बाईं ओर से आकर भिगोकर लौट जा रही थीं। मेरे पीछे-पीछे वह तीन व्यक्ति भी तेज गति से चलने लगे।

अचानक मन के कपाट पर फिर एक ख़्याल ने दस्तक दी--“कहीं यह तीनों व्यक्ति अच्छे ना हों और मेरे अकेलेपन और सुनसान जगह का ये फायदा ना उठाएं... ” इस ख्याल के अंकुर के साथ ही मेरे हाथ पाँव जमने लगे, पैर आगे बढ़ाऊँ तो जैसे हवा में लहरा जाए... पीछे मुड़कर देखने का हौसला भी जाता रहा, कनखियों से गर्दन हल्की घुमा कर देखने की कोशिश की कि वह आ रहे हैं और शायद उनका इरादा भी नेक है। ऐसा लग रहा था हम तीनों नजदीक पहुंच रहे हैं। नारियल का बड़ा गाछ जिसके आधे भाग चारों ओर गोलाई से बड़े पत्थरों से घिरे थे.... उसी के पीछे दूर एक रिजोर्ट था, यहीं कहीं हमारी गाड़ी फंसी थी, यहीं से मैं राघव को गाड़ी के साथ छोड़कर मदद की गुहार लगाने दौड़ती हुई गई थी पर अब अंधेरे में कुछ नजर नहीं आ रहा था... ।

मोबाइल की टॉर्च ऑन कर हम तीनों आगे पीछे देख रहे थे-लेकिन कहीं गाड़ी नहीं दिख रही थी, न ही कहीं राघव नजर आ रहा था, हमने आवाज दी। मेरी आवाज़.... डर और आशंका से टकराकर मेरे ही कानों में गूँज रही थी। अपनी ही आवाज की अनुगूंज से कान झनझना रहे थे। अब पानी इतना बढ़ गया था कि आगे जाना मुमकिन नहीं लग रहा था। ऐसा महसूस हो रहा था कि अब अगली लहर आएगी और हम तीनों को समंदर के बीचों बीच बहा ले जाएगी।

“लगता है वो गाड़ी छोड़कर आगे उस रेज़ोर्ट की ओर चले गए होंगे, क्योंकि गाड़ी तो कहीं नजर नहीं आ रही”--उनमें से एक युवक बोला था। दूसरे युवक ने हामी भरी.....“हां.. अपने साथ भी यही हुआ था... दरअसल यहां की रेत खोखली है, रेत पर पैर रखते ही गहरे से गड्ढे हो जाते हैं और फिर भू-स्खलन.. ”. यह बात सुनते ही मेरे मुंह से चीख निकली -“नहीं प्‍लीज़....अपशकुन वाली बातें न करें....राघव बहुत हिम्मती और समझदार है उसने खुद को बचा लिया होगा”।

“अब आगे जाना खतरे से खाली नहीं है दलदल जैसी है यहाँ की रेत.....कभी भी गड्ढा हो सकता है ”....पहला युवक जो थोड़ा आगे चल रहा था, बोला.....

“हम यहां कतई सुरक्षित नहीं हैं.... कुछ महीने पहले इसी बीच का कोई हिस्सा धंसक गया था, कई लोगों की जानें गई थीं ”.....यह कहते हुए वे तीनों युवक उस रेज़ोर्ट की ओर चल पड़े थे, जिधर कहीं बहुत दूर से मद्धम रोशनी टिमटिमा रही थी। मेरे कदम आगे ही नहीं बढ़ रहे थे.....चारों तरफ घूम-घूम कर मैं आगे बढ़ती, फिर पीछे लौटती, फिर राघव को आवाज़ लगाती... मेरी आंखों के सामने वह दृश्य कौंध गया....जब होली पर पेड़ का बड़ा-सा तना अपने कंधों पर रखकर कुछ युवक डांस कर रहे थे। मोबाइल से कोंकणी गाना बजा रहे थे और उन्हीं में से कुछ युवक वीडियो ले रहे थे। ये सब होलिका दहन से पहले का जश्‍न था। उनके हाथ में बोतल थी और वे नशे में थे, कुछ पर शराब का नशा था, कुछ युवकों पर रंग का और कुछ युवक प्रेम के नशे में धुत्त थे। डांस करते करते उनमें से कुछ युवक मस्ती में पानी में काफी आगे तक निकल गए। पानी में जाते हुए तो वे दिखे पर पौराणिक कथा के चमत्कारी किरदार की तरह थोड़ी देर बाद वे अंतर्ध्यान हो गए। उनमें से कुछ जो किनारे की ओर थे वे उन्हें बचाने के लिए गोताखोरों की गुहार लगाने लगे। जो तेज लहरों में विलुप्त हुए थे उन्हें गोताखोरों की टीम ढूंढने गई थी, पर यहां ना तो कोई मछुआरा है ना कोई गोताखोर... ना ही दूर तक कोई आकृति नजर आ रही थी, न ही कोई कश्ती....मैं ‘राघव राघव’ पुकारे जा रही थी पर मेरी आवाज़ पाम और नारियल के पेड़ के क़तार में कहीं गूंज कर विलुप्त हो रही थी। शायद उन दरख़्तों में पनाह लिए चिड़ियों ने जरूर सुनी होगी तभी तो टिटिहरी की ‘टी टी’……किसी और चिड़िया का महीन स्वर फिज़ा में गुंजायमान हुआ था। मेरी आवाज़ राघव तक नहीं पहुंची....न समंदर ने सुनी....न ही उसमें रहने वाली डॉल्फिनों ने। हां शायद रेत के महीन कणों ने जरूर सुनी होगी, तभी तो मेरे पैरों तले गहरे निशान बने थे और उनमें पानी भर गए था, उस नन्हे
गड्ढे में इकट्ठे पानी में एक स्टार-फिश दिखी थी।
 
पाम के अलसाए पेड़ तेज हवा पाकर तड़-तड़ की आवाज़ कर के मन में और ख़ौ़फ़ पैदा कर रहे थे। चांद की खू़बसूरती शबाब पर थी। चांद ही तो अपने गुरुत्वाकर्षण से रचता है ज्वार-भाटे का क़हर और खेल...। शाम रात के आग़ोश में समा चुकी थी। आसमान से बूंद-बूंद चांदनी झर रही थी। पूनम की रात समंदर के साथ गलबहियां डाल कर और निखर आई थी। पर यह खू़बसूरती मेरे ऊपर फब्तियां कस रही थी। मेरी आंखों से बहती नमकीन खारी बूंदें होठों पर ठहर कर पपड़ा गईं थी।  आसमान से झरती चाँदनी बदन पर शोले-से बरसा रही थी, मैं ‘राघव-राघव’ रटती हुई बिलखने लगी थी। अगर हमारी कार यहां दिखाई देती तो मैं यही मानती कि राघव ने गाड़ी यहीं छोड़ कर खुद को बचा लिया लेकिन गाड़ी का कोई अता-पता नहीं है। पाम और नारियल के दरख्तों के पार चारों ओर अपनी आंखों की पुतलियां घुमा-घुमा कर में बेचैनी से देख रही थी कि राघव कहीं खड़ा होकर हमारा इंतजार तो नहीं कर रहा है।

“दापोली के इन दो तीन बीच पर भूस्खलन आम बात है....बीच के इस तरफ आना ख़तरे से खेलना है। अब यहां वक्त बर्बाद करने की बजाय हमें किसी ग़ोताख़ोर को खोजना चाहिए। उधर जहां से मुट्ठी भर रोशनी आ रही है। वहां कोई रिजोर्ट या मछुआरों का घर जरूर होगा उनसे हमें मदद लेनी चाहिए”.....तीनों में से एक युवक की कही बात का हर शब्द टूटे हुए कांच की तरह किरच-किरच मुझे चुभ रहा था। मैं पीड़ा के दंश से कराहने लगी थी। मेरी कराह और उम्मीद का गला घोंट दिया था उस शख़्स के जवाब ने जो उस मद्धम रोशनी वाले रेज़ोर्ट से आ रहा था। उसके एक एक शब्द ने राघव के वहां न पहुँचने की मुहर लगा दी थी।

“वह रेज़ोर्ट बंद है, वहां कोई व्यक्ति नहीं है”…..उसका ये वाक्य सुनते ही मेरी आंखों के सामने राघव का बेबस चेहरा ठहर गया, जो ऊंची लहरों के थपेड़े से चोट खाते हुए जूझ रहा है। ख़ुद को बचाने के लिए उसने पत्थर और टीलों की ओर भागने की कोशिश की होगी। रेत के अंदर धंसते हुए....पानी के अथाह सागर में बेचैनी से छटपटाते हुए...खु़द को बचाने के लिए उसने इधर-उधर हाथ बढ़ाया होगा--शायद कार का दरवाजा या बोनट पकड़ में आ जाए। उसने मुझे आवाज दी होगी....लेकिन उसकी आवाज गले के भीतर ही घुटकर दम तोड़ रही होगी। उसने ‘बचाओ बचाओ’ की गुहार जरूर की होगी। उसके मुंह और नथुनों में पानी भर गया होगा। उसने अपने घरवालों को याद किया होगा।  उसके सामने पूरा ब्रह्मांड घूम गया होगा। उसने अपने भगवान को याद किया होगा। प्रार्थना की होगी अपनी जान बचाने की। खुद को अथाह जल राशि के भीतर पाकर कितना छटपटाया होगा। किस तरह से तड़पा होगा। दम घुटा होगा। उफ़-उफ़। क्या मेरा नाम वह अंतिम क्षणों में पूरी तरह से बोल पाया होगा।

रेत का भँवर मेरी आंखों की पुतलियों में गोल-गोल घूमने लगा। मैं राघव को पुकार रही थी लेकिन ‘रा...’ अक्षर के बाद कोई और अक्षर मेरे मुंह से उच्चरित नहीं हो पा रहा था। सिर्फ मुंह खुल रहा था। मेरी आवाज़ पानी में विलीन हो गयी थी। जिस तरह नींद में हम कोई भयावह सपना देखते हैं, और ज़ोर से चीखते हैं—लेकिन मुंह से आवाज़ नहीं निकलती.... अंदर ही अंदर गले में घुटती रहती है... ठीक वैसा ही अहसास था उस रोज़। मेरे मुंह से निकली वो आख़िरी चीख़ थी शायद। ‘राघव’ कहने में मैंने इतनी ताक़त लगायी कि मेरी सांस घुटने लगी थी। बिलखती हुई मैं छटपटा रही थी। उन तीनों युवकों में से किसी एक के हाथ का सिर्फ स्‍पर्श याद है मुझे।
मेरी आंखों के सामने यह दृश्य जीवंत हो उठा था। और मैं जैसे रेत के दलदल में फंसी हूं। इसके बाद मुझे अपनी सिर्फ चीख याद है। बस उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ नहीं याद, जब होश आया तो मैं अस्पताल में थी। ‘आई’, ‘बाबा’, रिश्तेदार सब थे मेरे सामने...फिर भी मैं महासागर के अथाह जल राशि में निर्जन एकाकी बेसहारा डूबी जा रही थी।

अभिधा ने ज़ोर से लंबी उसांस भरी तो उसके गालों पर ठहरे आंसू की बूंदों कण हवा में उड़ गए। बारिश की बूंदें भी मंद हवा का साथ पाकर चारों ओर उड़ने लगीं। मौसम का रंग निखर आया है लेकिन उनके मन के मौसम में अभी काली घटाएं घिरी हैं। आज भी वे यही मानती हैं कि राघव को लहरें नहीं ले गईं। वो दुनिया में कहीं है—वे अपने मन में आज भी राघव के इंतज़ार का चिराग़ जलाए हुए हैं।

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अस्तित्व : ज्ञानप्रकाश विवेक

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