शुक्रवार, 15 मार्च 2019

भागमती पँड़ाइन का उपवास यानी करवाचौथ पर भरवाँ करेले : सुधा अरोड़ा 

सपने सिर्फ मुंगेरीलाल ही नहीं देखते भागमती भी देखती हैं लेकिन वे प्रायः दुःस्वप्न होते हैं। काश कि वे सिर्फ सपने होते। भागमती अक्सर इसके बारे में सोचती हैं कि वे तो सब कुछ समझती-बूझती , जानती और मानती हैं, मरने-मारने की बात तो कभी सोचतीं नहीं, फिर सपनों में यह सब कैसे आ जाता है जिसके बारे में वे खुद कभी सोचतीं ही नहीं। ऐसी दुविधा के क्षणों में वह भगवान की ओट लेती हैं - हे दीनानाथ, हे पालनहार, तुम ही उबारो, दिसाहीन को दिसा दिखाओ, प्रभु। प्रभु परिदृश्य पर प्रकट होते हैं या नहीं, नहीं मालूम पर भागमती की श्रवणेंद्रियाँ कुछ अतिरिक्त श्रवणपटु हो जाती हैं। उन्हें बाहर की भी आवाजें सुनाई देने लगती हैं... और मन के भीतर की भी...

जब तक साँस लेने के लिए हवा मिलती रहती है तब तक कोई भी बढ़ते हुए पानी के बारे में नहीं सोचता लेकिन बढ़ता हुआ पानी सिर से ऊपर जाते ही निष्क्रिय से निष्क्रिय प्राणी भी हाथ पाँव मारने लगता है। भागमती पँड़ाइन के साथ बिलकुल यही हुआ। दो बेटे और चार बेटियाँ और आठ पोते-नाती-नातिनियोंवाली भागमती ने सुमेधा को सिर से ऊपर गुजरनेवाले पानी की तरह पहले देखा ही नहीं लेकिन एक दिन बंद आँखों से उन्होंने देख लिया कि अब अगर नहीं सँभलीं तो डुबा दी जाएँगी। बस यही एक बिंदु था कि वे सपने में उठ खड़ी हुईं।

पाँड़े बगल में ही सोए थे। अब दोनों के संबंध इस मुकाम पर पहुँच चुके थे कि एक ही बिस्तर पर दोनों एक दूसरे की ओर पीठ फेर कर सोते। एक दूसरे की ओर मुँह करके सोना तो एक इतिहास हो चुका था और चूमना तो चाँद की यात्रा की तरह दुर्लभ क्योंकि चंद्रयान कहीं था ही नहीं। ऐसा नहीं था कि उनकी साँसों से बदबू आती थी। बल्कि पाँड़े आदतन दिन में तीन-तीन बार माउथफ्रेशनर का उपयोग करते थे क्योंकि उन्हें पता था कि ऐसा न होने पर सुमेधा उँगलियों से उनका गाल दूसरी ओर घुमा देती है और तिरछी मुस्कान में इतरा कर कहती है, 'पंडीजी महाराज, जरा दूर से ही बात कर लीजिए।'

बस एक ही खराब आदत है हमारे बुढ़ऊ की - खर्राटे ऐसे लेते हैं जैसे हवा से कुल्ला करते हों! भागमती अब तक लाड़ से ही हमेशा अपने पति के बारे में सोचती आई थीं। लेकिन अब...

भागमती को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने अपने कान में उँगली डालते हुए इस बात की तस्दीक की - यह सब सच है या उनका वहम है जो वे सुन रही हैं!

अपने पति की ऐसी भर्राई आवाज भागमती ने पहली बार सुनी थी। ऐसी आवाज में तो कभी उन्होंने उनसे बात ही नहीं की। पाँड़े फुसफुसा रहे थे पर ऐसे भी नहीं कि संवाद सुनाई न दें - 'मेरी बात सुनो, मेधा। तुम इस घर में कैसे रह सकती हो आखिर! आती जाती हो यह भी बहुत है लेकिन बेटे-बहुओं, बेटी-दामादोंवाले इस घर में तुम्हारा होना असंभव है। अब अगर तुम इस पर अड़ी खा जाओगी तो यह तुम्हारी ज्यादती होगी...'

'...अरे उसकी क्या बात कर रही हो! वह तो गाय है!'

'...तुम मेरे लिए करवाचौथ निर्जला व्रत काहे रहोगी, पगली! वह भागो ही करेगी। करने दो उसे। जिद मत करो। क्या मजाक करती हो! चाँद क्या तुम्हारे कमरे में उगेगा? रहने दो यार! ऐसी ऐसी नौटंकी भागो को ही सोहती है। वो तुम्हारा काम नहीं कर सकती और तुम जिस काम में पारंगत हो वही करो।'

'...इधर आओ मेरे पास। एकदम इधर... कौन मुझे तुमसे शेयर कर सकता है। भागो तो इस फर्श पर ऐसे है कि पाँव के अँगूठे से जिधर सरका दो उधर ढुलक जाती है और फिर वहीं पड़ी रहती है।'

'...क्या बेवकूफी की बातें करती हो? भागो को तकिए के नीचे दबा दूँ? तुमसे उम्र में बड़ा हूँ। तुम्हारा गुरु रह चुका हूँ। क्या तुम मुझे अब भी नहीं समझ पाई। वह तो पहले से ही गूँगी है। संज्ञा में वह एक देह मात्र है लेकिन चेतना में पूरी तरह सीता है। तुम्हारी उँगलियों की छुअन को मेरी देह पर बर्दाश्त करके भी मेरा ही कल्याण चाहती है। '...अच्छा बाबा किसी दिन मौका देख कर वह भी कर ही दूँगा... अब तुम जो न करवा दो मेधा प्रिये!'

भागमती सन्न रह गईं। सीना धौंकनी-सा धुँक रहा था। उनका माथा घुमौरी खा रहा था कि पूरा कमरा, कमरा ही नहीं पूरा ब्रह्मांड हिलने लगा। तो उनकी आशंका निराधार नहीं थी।

...और फिर वह हो गया जिसका अंदाजा पँड़ाइन को भी नहीं था। पास में रखा तकिया उठाया उन्होंने और पाँड़े के मुँह पर रख कर दबा दिया। गों-गों की आवाज करते हुए उन्होंने थोड़ा हाथ-पाँव पटका और शांत हो रहे। पँड़ाइन पसीने से लथपथ थीं। पाँड़े के शरीर का खून पानी में बदल रहा था।

'अजब बात है! पँड़ाइन ने पाँड़े जी की हत्या कर दी! वो भी ब्रह्म मुहूर्त में! अरे बाप रे! कैसी गऊ सरीखी दिखती थीं। पतिव्रता सीता की साच्छात प्रतिमूर्ति! और अब यह छछंद (छल-छंद)!' गाँव से शहर तक जो भी सुनता हक्का-बक्का रह जाता। अखबारों के पन्ने पर पन्ने रँग गए। पुलिस ने पँड़ाइन को रिमांड पर ले लिया। चार्जशीट पेश की गई। मुकदमा पेश हुआ। सपने में ही दृश्य पटल बदला और उन्होंने अपने को कठघरे में खड़ा पाया।

जज के सामने जब पँड़ाइन पर चार्ज लगाया गया तो सुनते-सुनते वे बिफर पड़ीं -'कुछ मत पूछो, जज साहेब! बस चुप्पई रहो! हम कबूलते हैं कि अपनी आत्मा का दाग हमने धोया है। बाकी अपराधी हम नहीं हैं।

'साहेब! अगर दुनिया में कहीं भगवान हो, तो उसको साखी जानके हम ये बात कहना चाहते हैं जिसका जिकिर हमने सपने में भी किसी से नहीं किया। भगवान से भी नहीं! पच्चास बरस चुप रहे लेकिन आज हम चुप नहीं रह सकते!

'मेहरारुन की आँख का पानी कब सूखता है? आँय? जब आँख से खून आने लगता है। हमारे सत्त की परीच्छा क्या सिया माई से कम है! एक सिया माई रहीं - सुकुमारी जनक दुलारी। बाकी रामजी से क्या मिला। खाली अपछ्या; लांछन और जंगल। एक हम हैं भागो जिसका करम ऐसा फूटा कि घर ही में बनबास काट दिए। एक दो बरस नहीं। पूरे पच्चास बरस। आजादी की आधी सदी और हमारी गुलामी की आधी सदी। एक का तो पूरा रामायण पोथी में मिल जाएगा पर हमारी कहानी किसी किताब में नहीं मिलेगी, जज साहेब!

'कभी-कभी धोखा आँख के सन्मुख होता रहता है, बाकी सील-संकोच का जो परदा आँखों पर डार दिया गया वो हटता बहुत देर से है!

'यही परदा हमारी आँख पर पड़ा रहा और ऐसे पड़ा रहा कि हम देख ही नहीं पाए कि जो हमारी बिटिया बन के हमको माते-माते कहती घूमती रही वो वास्तव में सौतिया छछंद खेलती रही। बाकी तो सब एक ठो ओट रहा खाली। और ये धोखा भी कइसा? एकदम आँख में सीधा अँगुरी डाल के!

'जो उजबकई (बेवकूफी) हमसे हुई, वो हमारे महतारी-बाप की सीख से हुई कि हम अपनी जबान को मुँह के अंदर बंद रखें। आँख मूँद लें और हाथ से खाली सास-ससुर-भतार के गोड़ (पाँव) दबाएँ। बस, यही हमारा फरज। यही हमारा धरम।

'सो किया हमने। घर और काम। काम और घर। बाल बच्चों को पालना-पोसना, बड़ा करना और दो बेर (वक्त) के खाने से फुरसत मिले तो मठरी, शकरपारे और अचार बनाना। आम का अचार, नीबू का अचार, कटहल-करेले-करौंदे का अचार। ये अचार, वो अचार। जिंदगी अचार का मर्तबान बन के रह गई जज साहेब, जब से हमारी सादी हुई... इन्हीं पर्फेसर पाँड़े जी से... शुरू से सुनाते हैं।

'हम बिन बाप की अकेली लड़की और माँ की खूब दुलारी। दो बड़े भाई और। बहुत नोखे-निहोरे पले सब। हमारे बाप बहुत जल्दी चले गए। पाँव में कीला गड़ा, धियान दिए नहीं, घाव बढ़के पक गया। बस, खतम। अम्मा हमारी हाथ भर घूँघट काढ़ के बाहर भीतर सब सम्हार लीं। बहुत मुसीबत रही, बाकी अपना हाथ किसी के सामने पसारी नहीं। मुट्ठी बाँध के देती ही रहीं। उधर हमारे ताउ की पहली मेहरारू दो बच्चा छोड़ के सिधार गई। तेरही बीती कि झट से दूसरी ले आए। नई महतारी दोनों बिटिउनी के तो जइसे नौकरानी बनाय लीं, अपने पाँच बच्चे पैदा कर लीं और घर में रोटी के लिए कौआ रोर मचा रहता। धीरे धीरे ताऊ के खेत रेहन चले गए। अब तुम्हीं सोचो, मरद न रहे तो अउरत बाल-बच्चा, घर-दुआर, खेत-खलिहान सब सम्हार के चलती है। परिवार को, संपत्ति को एक मूठ में करके चलती है पर मरद की अउरत गुजर जाए तो उससे चार दिन घर गिरस्ती सम्हारना एकदम आफत। दो दिन अउरत के बिना घर चलाना मुसकिल। सो हमारी महतारी ने हमारे लिए देखा अइसा लरिका जो किताब-उताब पढ़ता होय, चैतंत होय और होय सीधा सच्चा। तो हमारे पर्फेसर पाँड़े जी ऐसे ही रहे।

'तब तो खाली यही देखा जाता रहा कि लड़का सहर में पढ़ता है। सखी-सहेली ए हम्मा-सुम्मा सब कहें - पाहुन तो एकदम पोथी के सुसूड़ी (चाँदी के रंग का एक कीड़ा जो किताबों को चट कर जाता है) हैं। ये तो चौबीसों घंटा किताब में मूँड़ी गाड़ के पड़े रहते।

'जब हमारी सादी हुई तो हम तेरह के रहे। वह जमाना ऐसा ही रहा जज साहेब। इसी उमिर में सब की किस्मत तय हो जाती रही। हमारी गाँठ भी बाँध दी गई। वो दिन आज भी याद आता है तो खाली हँसी नहीं आती। इस बात पर आज गुस्सा के साथ कुफुत भी होती है कि कहाँ से हम चले कहाँ आय गए!

'एक समय वो भी रहा कि जब मौर बाँध के ये मड़वा में आए तो हमारी सखी सहेली निकोटा-चिकोटी लगीं करने तो ये बेचारे भकुआय गए। और जब कोहबर में आके बैठे तब हमारी बुआ... चाची... मौसी... मामी - सब लगीं इनसे इनके नात-हित के लोगों का नाम पूछने। ये एकदम मौनी बाबा। सब सोचें, कहीं लड़का गूँगा तो नहीं। वो सब भी कम नहीं रहीं। लगीं बार-बार पूछने। पहले तो ये जपत किए रहे लेकिन जब नहीं रहा गया तो लगे भक-भक रोने। अब सब हैरान कि आँय ए कइसा लड़का? बचवा जैसे रो रहा। एक वो दिन और एक ये दिन... कि हमारे बगल में रह के भी हमसे इतना दूर।

'चार साल बाद हमारा गौना हुआ। तब भी ये बहुत लजाधुर रहे। महीनों बीत गए। हम इंतजार में, और ये किताब में। एक ही पठौनी हम आए और जब पीहर गए तब अपने भीतर एक जीव ले के गए। वो ही टैम ये चले गए बनारस।

'अब ये तो पढ़ने खातिर गए बनारस। आए तब हमारी अप्पो (अपराजिता) आठ महीना की हो गइ रही। अइसे हँसती रही और अइसे बकइयाँ चलै कि जो कहीं जाता भी हो तो उसको उठा ले गोदी में। ओ समय जब ये आए तो वो यहाँ-वहाँ डुगुर-डुगुर डोलती रही। पढ़ाई के बाद ये हो गए टीचर। चार साल बाद चले गए बिलैत। जाने से पहले मिलने को आए। ओ दफा तप्पो (तपस्या) गोद में आई।

'अब तो ये जब जब बिदेस से आए तो एक-एक ठो गदेली हमारी गोद में डाल गए। लप्पो (लोपा), जस्सो (अस्मिता) कुल चार जन हो गए। हमारी तो फजीहत। कहीं अप्पो-तप्पो मारा-मारी कर रहीं। कहीं लप्पो-जस्सो। जब तक उनको सम्हारें, तब तक पता चले कि तप्पो गिर कर माथा फोड़ लीं। हमारे तो नाक में दम हो जाता। एक जान, सौ बवाल। अकेले क्या क्या करें।

'बाकी खाली बच्चा सम्हालने को तो था नहीं। सास-ननद का गोभना (ताने) भी सुनबे को रहा। जस्सो हुई तबसे ये सब सुरू हो गया। सौरी से बाहर भी नहीं आए। छट्ठी भी नहीं बीती कि सब कपड़ा ले के ननद सामने पटक दे - लियो, कपड़ा फेंचो! अल्मात (सद्यप्रसूता) देह, जार पड़त है! ठंडी लग गई तो लड़की को ताप हो जाइ! इसका कोई खियाल नहीं। बस कपड़ा फींचौ! बरतन माँझौ अउर झाड़ू-बुहारू करौ! खाना बनावो! उप्पर से सास के गोड़ दबावो! सबेरे-सबेरे रोज बताया जाता रहा कि चार गो लड़की पैदा कर के हम कुल-बंस को ही नहीं डुबा दिया ए घर खँड़हर करन का उपाय भी कर दिया है। हमारी हालत क्या रही ए क्या बतावें। खाली इनका खियाल कर के हमारे उप्पर हाथ नहीं छोड़ा जाता रहा। बाकी कौन करम नहीं किया गया। कैसे हम रहें, क्या बतावें।

'जब चारों ओर से आदमी के उप्पर बादल गहराने लगे तो वो साँप का बिल में भी सुरच्छा (सुरक्षा) खोजने लगता है।

'वो तो ईस्वर की किरपा कि दो बचुवा भी आ गए - मन्नो (मनोहर) और कप्पू (कपिलेश) उसके बाद ये बिदेस से लौट आए तो हमारी बच्चा नली बंद करा दिए! बोले, आध दर्जन बच्चा होइ गए, अब बस। हम पहिली दफा इनके सामने मुँह खोले कि इतना पढ़ लिख के, अपने कुल बंस का गिनती, गेहूँ धान के बोरा माफिक करें, ये अच्छी बात नहीं...।

'बाकी ये इतने चुप्पे कि बस पूछो मत। लगता रहा कि एकदम गूँगे। गिलास का पानी खतम - चुप! नमक बेसी पड़ गया - चुप! तरकारी अलोन माने नमक डालना भूल गए - चुप! कौनों सवाल नाहीं। हम सोचें कि ये हमसे कितना पिरेम करते हैं... कइसा ही घास फूस पका कर सामने रख दो कुछ नहीं बोलेंगे। अइसा मरद किस्मत से न मिलता है! सोचते हम कितना भाग्यसाली हैं। क्या इसीलिए हमारा नाम भागो रख दिए महतारी-बाप?

'हमें क्या पता कि आगे क्या होनेवाला है। चले आए इनके साथ-साथ मुंबई के ये माचिस की डिबिया जैसे फिलैट में। हमारे बाल-गोपाल सब इसी सहर में पढ़े लिखे... सादी बियाह हुआ। हम अपने इस छोटे से फिलैट को ही अपना पूजाघर मान के खूब साफ सफाई से रखते-चमकाते रहे। ये हरदम हमारे हाथ में झाड़न देखते तो ठिठलाते - 'अरे ए भागमती ए तोहार जनम तो इस आठ नंबर फिलैट का धूल मिट्टी बुहारने के लिए ही हुआ है!' अब आप ही देख लो - जिधर आँख जाए किताब ही किताब! ये देखो अलमारी! लोग-बाग गोदरेज का अलमारी में कपड़ा जेवर रखते हैं ताला बंद करके। ये किताब को ताला चाभी में बंद करके रखते हैं। किताब ही इनका सोना-चाँदी-हीरा-जवाहरात है। हम कहते हैं - सफाई कैसे करें... खाने का मेज तो किताब से अँटा है तो ये कहते हैं - इसी का तो रोटी खाती हो... इसका पूजा-अर्चना करो। इसे हटाने को मत कहो। हम तो इसी में खुस कि पर्फेसर साहेब कितना बड़ा आदमी हैं। कितना विदमान लोक हमारे घर में आते-बतियाते हैं। अउर इनका चेला चेली का तो कुछ मत पूछो। हमेसा इनके आगे-पाछे लड़िका-लड़की चक्कर मारते - गुरुजी ई बात ए गुरुजी ऊ बात! ये भी अपने चेला-चेलिन को इतना लड़ियाते कि मत पूछौ। पढ़ाई वो सब करते रहे। पास होने की चिंता इनको होती रही।

'और एक दिन वो भी आय गई - सुमेधा! घर में घुसते ही गोड़ पकड़ ली - परणाम माते। वो नहीं रहा सीरियल मातेसिरीवाला महभारत। एकदम वैसे। अब माते भी क्या करें। करेजे से लगा लिए। सकल भले बनरिया (बंदरिया) जैसी रही, बाकी लीला अइसी कि अच्छे-अच्छे की आँख मूँद जाय।

'हमारी आँख भी मुँद गई। हम तो सोचे कि ये शोध करने के लिए आई है। डाग्दर साहेब भी कहें कि बिना महतारी की लड़की है। परम दुखियारी! जनम से ही दुख झेल रही। बाप मजूर रहा। रोज कुआँ खोदके पानी पिएवाला। कल का कौनों सपना नाहीं। बस बचपन में ही लड़की की बाँह एक मजूर के हाथ में पकड़ा के फारिग हुइ गए। वो अनपढ़ गँवार... ये पढ़वैया! वो रोटी माँगे... ये किताब ले के बैठी रहे!

'जल्दी ही मामिला ये हो गया कि वो इसका झोंटा खींच के लातन-मुक्कन मारे। ये बेचारी हियाँ लुकाय हुआँ छिपे। अड़ोस-पड़ोस भी ऊब गया। इसकी ओर से कोई बोलेवाला नहीं। आखिर अउरत मरद का झगड़ा में कौन बोले और क्या बोले। इसका फरज रहा कि उसको रोटी बना के खिलाय। बाकी इसको आवे तब न! एक दिन आटा में आधा लोटा पानी डाल के सानने लगी। अब घर में एक तो आटा नाहीं ऊपर से ये गिलपोकना! आदमी आया। भूख के मारे आँख के आगे अँधेरा। बस रोटी न मिली तो लगा इसको धोने! जो सुने वो कहे कि ये कइसी मेहरारू कि आटा भी नहीं सान सकती। कलट्टर बनी क्या? बस इसके आदमी को तो मिल गया रोज-रोज कुटम्मस का साटिफिटिक (सर्टिफिकेट)!

'जिनगी नरक हो के रह गई! अब कोई रास्ता कइसे निकले। बस ये भी वहाँ से भाग ली। भरसाई में जाय दुलहा! ये कहानी सुमेधा अपने 'सर' ए फिर डागदर साहेब ए फिर बाबूजी के रो रो के सुनाई। और हमारे भरतार ए जो हमारे भरतार कम और इसके 'बाबू' जियादा हो गए थे ए हमको सुनाए। अब इसमें कितना झूठ कितना सच भगवान रामजी भी नहीं बोल सकते पर वो टैम सुन के हमको बहुत दया लागी। करेजे से लगा लिए। बाकी वो समय कहाँ मालूम रहा कि हम आस्तीन के सँपोली को गले से लगावत हैं!

'और इनकी दसा कहो चाहे दुर्दसा आँख खोल खोल कर हम देखते रहे। इनका तो हुलिया बदल गया। धोती कुरता छोड़ के, शर्ट पतलून शुरू! गुलबिया रंग की चौखानेवाले कपड़े की शर्ट जैसी हमारी तप्पू इस्कूल में उनिफार्म पहन के जाती रही। पतलून के भीतर खोंस खोंस के पहिरने लगे। खुसबूदार साबुन से स्नान करने लगे। स्नान के बाद गमकउआ पाउडर, गाल पर लोसन! महकते दहकते जाएँ अपना उनिबरसिटी! हम भौंचक! बिलैत से आ कर भी धोती-कुरता ही पहनते रहे अउर अब ये फिरंगी पोसाक पहन के साहब बने का फितूर! अपनी तोंद को भीतर धकेल-धकेल के लगे भिनसारे उठ के करने ब्यायाम! देह छरहरी हो गई! जइसे हिंदी फिलिम के राजकुमार! हम सोचे - परभू, इन पर कइसा जादू छाय रहा...।

'लेकिन जादू कइसा भी होय ए एक न एक दिन उसका राज खुल ही जात है। हम तो दया-माया में पड़ के अपने पति की छातरा को सीने से लगा लिए और ये लगी डाग्दर साहेब के सीने से लगने।

'अब क्या बतावें कि गाँव-गिराँव का संस्कार औरत को कितना मोटा रस्सी में बाँध देता है। एक दिन इनका एक चेला घर आया। आके पाँव छूके कहने लगा - अम्मा, पानी सिर से ऊपर जा रहा। एही बखत लगाम कस लेना ठीक रहेगा। क्या बताएँ अम्मा... गुरुजी और सुमेधा को ले कर पूरा कैंपस में एक से एक किस्सा। बिलकुल लैला-मजनूवाला।

'बाकी कहा गया है कि आँख पर पर्दा पड़ जाय तो अजगर भी रस्सी दिखने लगता है। अशुतोशवा के मुँह से अपने डाग्दर साहेब के लिए इतना निकलते ही हम तो उठा लाए झाड़ू। भाग मुँहझौंसा! भाग हियाँ से! बेचारा उल्टे पाँव चला भाग! हमारी समझ में वो बखत तो यही आया कि हमारे डाग्दर साहेब ठहरे बिभाग के हेड। जरूर किसी की चाल है कि चलित्तर पर दोष लगा के उनको बदनाम करके कुर्सी हथिया लेय! बस हम तो अगियाबैताल हो गए कि देखें कौन हमार डाग्दर साहेब का रोआँ टेढ़ा कर लेता है। पतिबरता नारी की यही पहिचान कि आँख पर घूँघट काढ़ ले! कान में रूई ठूँस ले! सो हम किए... ये तो बाद में न सोचे कि अशुतोशवा गलत क्या कहा... हमारे गाँव में जितनी मेहरारू... उतनी कथा... अनंत किस्सा-कहानी...।

'हमरी एक काकी रहीं। कलावंती चच्ची। वैसी मेहरारू तो हम आज तलक नहीं देखा। जितनी सुन्नर (सुंदर), उतनी सतवंती। एकदम सीता। क्या मजाल कि कोई घूँघट उठा के देख ले। अउर चच्चा - परम लुच्चा! दुस्चरित्तर! रिश्तेदारी में जाएँ तो वहाँ से भी दिन-दुपहर भगा दिए जाते रहे। जो नार हत्थे चढ़ जाए, ले जावें उसको अरहर का खेत में! चच्चा ने जीवन भर चच्ची की वो दुर्गत बनाई कि का बतावें। मार लाठी के हाथ-गोड़ तोड़ दें... इस पर भी जब तीज-चौथ आए तो चच्ची निर्जला बरत रहें। अंत क्या हुआ... सोच के हियरा काँपता है। उनका पेट में बच्चा रहा। पर चच्चा अपना आदत से लाचार। ईंटा उठा के पटक दिए चच्ची का पेट पर। पाँच माह का बचवा, पेट में कुम्हला गया। चच्ची की भी हालत खराब होने लगी। बैलगाड़ी पर लाद के दादी हास्पिटल ले गईं। जब पुलिस आई तो चच्ची बयान क्या दीं कि कुइयाँ पर पानी काढ़ते फिसल गईं। चच्चा साफ बच गए। दादी अस्पताल छोड़कर घर चली आईं बाकी सतवंती काकी नहीं बचीं। चिता में फूँक आए तब भी चच्चा अउर उनकी माई - दुन्नौ का आँख में एक बूँद पानी नहीं। गाँव में सब आज भी उनका गुण गावत हैं। लच्छमी रही लच्छमी! अब क्या फायदा - साच्छात लच्छमी बनाओ चाहे सीता! जीव तो निकल के उड़ गया न जी देह से! आज हम सोचते हैं कि काकी ने जो किया क्या वो ठीक रहा? बोल के काहे न गईं कि ये हत्यारा है... आज भी बिसरा दिन याद करके आँख भीग जाता है जज साहेब...।

'हम बार बार सोचते कि हम कितना भाग्यसाली हैं। हमारे डाग्दर साहेब कभी हमारे उपर हाथ नाहीं उठाए। नहीं तो कोई मेहरारू ऐसी नाहीं जिसका भतार अपनी अउरत का खाल खींच के भूसा न भर दे। ये तो एकदम चुप्पै। क्या इसीलिए हमारा नाम भागो भागवंती? हम हूँ चुप्पै रहे... बाल गोपालन के देख देख के जिनगी काट दिए। लप्पो का बेटा तो जब भी यहाँ आता है हमारी गोद में आके लगता है खींचने - नानी, ये देखो ए नानी, वो...।

'अब जिसके आगे कौनों गर-गोसइयाँ नाहीं... वो तो छुट्टा साँड़ हो जाता है। अनबोलता मनई को चार बात सुना के सब कोई अपने के बीर-बहादुर समझता है! यही किस्सा यहाँ भी चलता रहा बाकी हम एक दिन जान गए कि दाल में बहुत काला है! सुमेधा घर आए तो एक ही कागज में मूँड़ी गाड़ के 'सर' से इतना सट के रहे कि आन्हर से आन्हर (अंधे से अंधा) आदमी भी एक दफा चिहुँक जाय कि ये गुरु-चेली हैं कि अउर कौनों बात है! दोनों अपना में मगन, दीन दुनिया की कौनों फिकिर नाहीं। लेकिन जब तक सीधे खटिया पर न पकड़े जाएँ तब तक कैसे वो बात जबाँ पर लावैं ए जो मन में बवंडर उठा देत है।

'एक दफा हम अकेले गाँव गए, ममेरी बेटी का शादी रहा। ये बोले - हम तो नहीं जा पाएँगे भागमती, तुम जाओ। इनकी आग्या शिरोधार्य। हम चले गए। सब नेग-नियम, रीति-रिवाज निभा आए। घर लौटे तो इनका रीति-नीति का खबर मिला। हमरी पड़ोसन खुसुर-पुसुर करती बोली - भउजी, पर्फेसर साहेब के पास एक लड़की बहुत आती रही। रात के नौ-दस बजे तक बैठती रही। हम बोले - वो थेसीस का काम बहुत परिश्रम का काम है। वो बोली - 'सो तो ठीक है पर हमने उस दिन खीर पुरी बनाई थी। सोचा - भउजी है नहीं तो थोडा दद्दा को दे आएँ, उनके पसंद की चीज है। हम घंटी बजाए। नहीं खोले दरवाजा। दो तीन बार बजाए तो थोड़ा-सा दरवाजा खोलकर झाँके। हमें देखा तो खीझकर बोले - क्या है। हमने कहा - आपके लिए खीर-पुरी लाए हैं। बोले - हम खाना खा लिए हैं। अंय, साढ़े सात बजे ही खाना खा लिए। हम बस इतना ही कहा - दद्दा, फ्रिज में रख दीजिए, कल खा लीजिएगा। जरा-सा दरवाजा खोल कर थाली डोंगा हमारे हाथ से पकड़ लिए और दरवज्जा हमारे मुँह पर ठाँय से बंद। घंटे भर बाद क्या देखते हैं तो वही पतुरिया फिलैट से निकल कर चली जा रही है, अउर ये उसके पीछे पीछे। अगर लिखने पढ़ने का काम ही करते रहे तो सामने के कमरे में बैठ कर करेंगे न कि भीतर किवाड़ी उढ़का के... ओ छोकरिया से सावधान रहो भउजी'...। हम क्या कहते। खुद ही अनदेखा करके चलते रहे। आखिर हमारे भरतार है। इनका सम्मान - हमारा सम्मान। इनकी इज्जत - हमारी इज्जत। पर पास पड़ोस का मुँह तो नहीं न बंद कर सकते।
'लेकिन शंका का बीज तो पड़ गया न जी! आखिर डाग्दर साहेब इतना सीधा काहे बने रहें कि मोट-पातरए अलोन अउर लोना खा के भी ए कभी कौनों शिकायत नहीं किए? जरूर उनकी कोई और दुनिया रही जहाँ वो अपने जीभ का स्वाद पूरा करते रहे। हमारी गोद में छह-छह गदेली डार तो दिए, बाकी धियान कभी नहीं दिए कि वो सब रहते कैसे हैं! बस कमा के घर में दे देते रहे... बाकी सारी जिम्मेवारी हमारी! रसोई से लेके लड़किन के स्कूल तक सब हमारे ऊपर! घर-भर का कपड़ा-लत्ता, सेवा-सभाखन सब हमारे ऊपर! दिन भर फेंफिया होके चकरघिन्नी की तरह हम यहाँ से वहाँ नाचित रहीं...।

'हमारा तो सारा जिनगी इंतजार में कट गया। बच्चा लोक छोटे रहें तो उनके इस्कूल से लौटने का इंतजार! बीमार पड़ गए तो उनके ठीक होने का इंतजार! भतार पढ़ाने को गए तो दुपहरिया उनके खाना के लिए घर आने का इंतजार! खा कर उठे, सुस्ता लिए, गए तो शाम को उनका लौटने का इंतजार! टूशन पढ़ने के लिए आनेवाला छात्र-छात्राइन का इंतजार! रात को बिछौना में आए तो इनका हवा से कुल्ला करने का इंतजार! कभी एक पूरा रात आँख भर सोए नाहीं। कभी लड़िका बच्चा, कभी नाती पोती - जेके थोडा खाँसी बुखार हो जाए तो उसका माँ हमारे बिछौना पर डाल जाए! हम जइसे तइसे कमर थोड़ा सीधा करके सुस्ताय लें तो सूरज भगवान हमारे इंतजार में कि कब उठें तो उन्हें जल चढ़ावें...।

सारा जिनगी, दिन रात घर का चक्की में पिसते रहे, जज साहेब! लरिका बच्चा के पाले पोसे फिर नाती पोता के। अब उमिर का साँझ बेला घर से बाहर निकल कर पेड़ का नीचे बेंच पर बैठ कर जरा सुस्ता लेते हैं, तो ये आँख दिखाते हैं - पर्फेसराइन हो, ये सब उल्टा पल्ला की सारी और हथकटा जंपरवाली के पास काहे बइठत हो। अबहू चाहत हैं कि हम माचिस का डिबिया में ही बंद रहें! सुख चैन से! बाहर का हवा लगी तो ठंडी खा जाइ!

'हम मानते हैं - ये पढ़े हैं ज्यादा, ज्ञानी हैं ज्यादा, पर अपना रीत, अपना हित, अपना मीत, अपना भीत, अपना समाज, अपना रिवाज - हम समझते हैं, ये नहीं! ये साहेब के हाथ से एक तिनका नहीं टूटता! डार से फूल तोड़ लावें तो समझो, बहुत हुआ!

'आज अगर हम अपने तनखाह का जियादा नहीं पाँच सौ रुपया महीना भी लगाएँ तो कई हज्जार बन जाता है लेकिन बिना पैसा के अब तक खटते रहे। कभी दो से तीसरा सारी नहीं खरीदे। हमरे जैसी एक दो की कौन कहे ए लाखों मेहरारू ऐसे ही खटती रहती हैं। बिन पइसा ए बिन मोल!

'आज तो ये अपने पर हो गए तो चलो, सास-ननद का गोभना नाहीं लेकिन एक जमाना वो भी रहा कि सौर में रहीं और छट्ठी भी नाँय बीती कि सारा कपड़ा ला के हमारे सामने सब पटक देत रहीं - सब धो डारो! लड़िका नाहीं बियाई हो कि बरही भर हाथ-गोड़ दबावा जाय। हरदी-अछवानी पियावा जाय। लड़की जनी हो। सादी-बियाह करे मा घर बेच के खंडहर होय जाई। हमारा करेजा छलनी हो जाता रहा। बाकी हम अल्मात (कमजोर) शरीर लेके सब कपड़ा धोएँ। हमको ठंडी लग जाए। बच्ची की जान चाहे संकट में पड़ जाय बाकी काम न छूटे। ...ओह, हम ये सब बता दिए पहिले? अब क्या बतावें, बुढ़ापे की एही तो निसानी! खुदै भूल जाते हैं क्या बता दिए, क्या बच रहा। बिटवा, वो बहुत तकलीफ का दिन रहा। भुलाए भूलता नहीं। तब का कुबेला अब देखते हैं ए तब समझ में आता है कि ये इतना घुरमुसहा बेमतलब नहीं रहें। मतारी-बाप सादी-बियाह कर दिए कि लड़िका कब्जा में रही।

'एक बार जब हम माई के घर जाने लगे तो इनकी बहिन-मतारी लगीं हमारे बक्से की तलाशी लेने... कहीं हम कौनों सामान तो नहीं ले के जा रहे। बाकी जब कुछ मिला नहीं तो लगीं खिसियाने। हें हें हें। हमारी आँख भीज गई पर भीतर करेजा जरत रहा - मायका गरीब है इसका मतलब हुआ हम सब चोरी का खात हैं। ...उसके बाद तो जब भी हम मायके गईं तो जाने से पहले एक बार बक्सा-डोलची सब उलट के देखा के गईं कि लो देख लो, एको कौड़ी ले जावें तो कीड़ा परे हमार...। तब ये मूँड़ी धरती में गड़ा लिए। बाकी बहिन मतारी के एक्को बोल नाहीं बोले... उल्टा हमीं को आँख दिखाते रहे...।

'क्या क्या बतावैं। पहिले हम इनका ऊपर बहुत नाज करत रही कि एक से एक लड़किन इनके पास आती हैं। पर ये कभी एकर-ओकर नहीं देखे। देख के हमको हरदम लगा कि हमारे डाग्दर साहेब कितने सतवंते हैं! एकदम रामजी की तरह! बाकी ई सुरपनखा (शूर्पणखा) जादू डार दिहिस! तो सम पुरुस न मो सम नारी...

'अब सुनो, एक दिन क्या देखते हैं, एक फोन आया। बस ये घटा घनघोर बारिस में अपना टूटा छतरी ले कर घर से निकर परे। हमारे हलक में ही रह गया - अरे ए इस अंधर तूफान में कहाँ जात हो ए कौनों बिपदा आय परी का? घंटा भर बाद इनके पर्फेसर दोस्त चौबे जी इनको अपना छतरी में पानी से बचाते बचाते ले आए। जब ये निमोनिया से बिस्तर पकड़ लिए तो चौबे जी देखने आए। बोले - 'भउजी क्या बतावें। इनकी वो छात्रा - सुमेधा! नेट सेट की परीक्षा में फेल हो गई। एक घंटे का पेपर दस मिनट में छोड़ के बाहर निकल गई। सत्यानास! ऐसा फुटानी दिखाएगी तो पास होगी क्या। हम बोले... ठीक है... अगली बार बैठ लेगी पर अपना पाँड़े जी हैं न - उसका चचाजान। माने ही नहीं। सो उसका नंबर बढ़वाने हम दोनों डाक्टर सिंह के दुआरे गए, उनका गोड़ पकड़ लिए - रिश्तेदारी है। भतीजी ठहरी। गरीब की बेटी! फेल हो गई तो जिंदगी बिगड़ जाएगी! ...उस थर्ड डिवीजनर के लिए न अपना उम्र देखें न सरीर! ठंड खा गए! बिछौना पकड़ लिए, पर उस 'गरीब' को तार दिए...!'

'दस दिन बाद पेड़ा का दोना ले कर सुमेधा हमारे घर पधारी - 'माते हम सौ में अस्सी नंबर पाए हैं... मुँह मीठा करो।' हमसे वो पेड़ा न उगलते बने ए न निगलते। इसी वास्ते सात दिन मूँड़ी माथा कंबल ओढ़ के सर्दी खाँसी बुखार में पड़े रहे तब तो ये देखने न आई। अब दाँत निपोरती पेड़ा से मुँह मीठा कराने चली आई ससुरी! अपने डाग्दर साहेब खाँस खाँस कर हँसते रहे। खी खी खी... खौं खौं खौं...

'कभी-कभी हमें लगता है कि जो सोना ए हीरा-जवाहिर देख के भी लालच में नहीं आया वो पीतल पर कैसे ललचा गया! बाकी अब सोचते हैं कि सोना लेवे की हिम्मत नहीं रही इनकी। जब खुद अपने पर भरोसा नहीं होता तो हर चीज कीमती ही लगती है... पीतल होय चाहे लोहा...।

'हमारा तो माथा ठनक गया जब एक बार डाग्दर साहेब साठ की उमिर में हमारे बिस्तर पर आ गए। लड़का लड़िकी - सब लड़िका-बच्चावाले हो गए और बुढ़ऊ को जवानी छाय रही! अब तो हमरे गाल-ललाट सब झुर्री से भर गए। अब जिनगी का सात्विक बेला में ये बिछौना का खेला क्या अच्छा लगता है?

'बस कदम डगमगा गया। बहाना भी मिल गया। बाकी धुआँ तो रुका नाहीं। खबर भी धुआँ के माफिक फैलने लगी। दबी जबान से निकला फुलझड़ी भी एक दिन बम हो जात है।

'हम क्या करते... आप ही बताओ। मन मार के चुपाय रहे। अपने को समझा लिया कि जैसे हम घर में नीचे बैठ के पोछा नहीं लगा सकते तो उसके लिए एक महरी लगावत हैं। हैं कि नाहीं? वैसे ही अब नई नवेली की तरह नखरा तो नहीं कर सकते। अब आराम की बेला में ये साहेब चाहें कि बिछौना में कलामुंडी खाईन तो ये तो हमसे ना होई। बस हम भी ढील दे दिए। हम ढील न देते तो ये बाजार-कोठा चले जाते, भला समझो के बाजार खुदै चल के घर में आ गया। खुली आँख से हम आँख मूँद लिए। अब इसको चाहे हमारी गलती कहो चाहे गुनाह!

'जब एक बार रास्ता साफ हो जाता है तो आदमी बड़ा बेसरम बन जाता है। अब वो जो जो करतब निभावत रही उसके बदले ये साहेब उसके लेख लिखें। पिएचडी वो कर रही, औ थेसीस हमारे साहेब लिख रहे। यहाँ तक जी जान लगा दिए कि पिएचडी की किताब भी छप जाए। ये निबहुरी तो जानती रही कि बस डागदर साहब की किरपा दृष्टि होय तो बिना परिश्रम के सब हासिल। थेसीस लिखें। छपवाएँ। उसको कहीं बोलने खातिर जाना हो तो उसकी तैयारी में जुट जाएँ। बस यही कारोबार - चौबीसों घंटा। यहाँ तक कि कहीं इनकी बुलाहट हो तो कह दें कि हमारे पास तो टाइम नहीं है। सुमेधा को बुला लो। वो बिदूसी है ए उसको आगे आने का चांस दो। जोन परोग्राम होय ए सुमेधा के चांस देव। एक बार उसको आजमाओ। हमारी सिस्या हमसे अच्छा भासन करी। बस एक ही तोतारटंत - सुमेधा के चांस देव... सुमेधा के चांस देव।

'वो घबरा के कहती - सर हमें तो इस विषय में कुछ आता ही नहीं, हम कइसे करेंगे तो अपने साहेब कहने लगते - 'अरे पगली, हुआँ कौन बिदमान बिराजत हैं। ससुरा एक से एक गदहा हैं सब। हम लिख कर दे देते हैं। जाके बस बोल आव। इतना तो कर ही लोगी। हँय कि नहीं। थोड़ा खातिर तवाज्जो का मजा भी लो, मेधा।' वो नखरीली अहसान से इतरा इतरा के दोहरी हो जाती - 'सर... सर! सब आशिरबाद है आपका! का नाहीं मिला जीवन मा! रुपया-पैसा... नर-नौकरी सब मिला! बस थोड़ी-सी मान-परतिष्ठा मिल जाए तो बस!

'ये तो लहालोट! ...मन में तो खीर पकने लगती।

'मन अइसे ही बढ़ाए! वो इनका! ये उसका! अगन में मगन। माई-धिया गवनहर ए बाप-पूत बजनियाँ (माँ बेटी गाना गाएँ और बाप बेटा ढोल बजाएँ)। वो बनरी (बंदरी) इनके हिरदै पर लोटे और इनका गाल एकदम लाल गुलाबी। उस समय ये इतना बड़ा दानी कि अपना करेजा निसार के दे दें। सकल सूरत नाहीं पर तो ये हाल, जो रूपमती होती तो पूरा सहर में कहर बरपा देती। इसी सूरत पर ये जान छिड़कते बोलें - 'तू घबड़ाती काहें हो! सब होय जाई ए बस हमरे ऊपर भरोसा रखो!'

'वो तिरछी नजरिया से देख कर इनै निहाल कर दे - सर ए आप पर भरोसा नहीं करेंगे तो किस पर करेंगे!

'बचपन में जब कोई लोक कौनों मेहरारू के तिरिया चरित्तर की बात करता तो हमको बहुत अपमान बुझाता, बाकी सुमेधा को देखके समझ में आ गया कि तिरिया चरित्तर क्या होत है। वो हमरे सामने दोहरी चौहरी हो के सर और माते का गोड़ छूने लगती... तब मन में हम कहते कि पसार लो गुण लल्ली! बाकी जे तोहार छछंद न बूझे ओहके सिखाव ई सब! क्या हम आन्हर हैं जो डाग्दर साहेब को पिता समान पिता समान किए जात हो! एक बार तो दया भी आय गई कि अपना उमर का कोई नहीं मिला इसको? बाकी दया भी कोई कितना कर सके उसके उपर... जो खुद दया करनेवाले का घर में आग लगाए। बस ऐसे ही फोड़ा बढ़ के कंसर हो गया! पानी सिर से ऊपर चला गया।

'और एक दफा तो हम सन्मुख ही कह दिए कि 'अरे बबुई! तनिक आपन अँचरा सम्हार लेओ। बार-बार ढरक जात है! कंधे पर काई जमी है का!' और वो सतभतरी क्या बोली - 'हमारी माई भी यही कहती रही हर बखत। आप भी तो हमारी माते हैं। आप नहीं कहेंगी तो कौन कहेगा, माते!'

'हम तो सनक गईं। मन हुआ कि ससुरी के मुँह में अंगार भर दें। अरे महतारी की एको दिन सुनी होती तो इस उमर तक पल्ला न ढरकता तोहार। तब से ही यही चाल है क्या। पक्की सिकारिन है ये तो! हमारे मूरख भतार डाग्दर साहेब के एक बार ये कीचड़ में खींच ली तो बस वो सर से पाँव तक लथपथ। एकदम थापकथइया! न लोक की लाज ए न परलोक का लिहाज! ओकर अपना बगल में लेके अजंता अलोरा से लातूर तक अउर इगतपुरी से बजरेस्वरी तक सबका सामने एक ही कमरा में ठहराते। हमार समधी भी परफेसर पर उनका सामने भी आँख का परदा नाहीं। वो तो जानो छुटटी भैंस ए पर बाबा-नाना भए हमार बुढ़उ को भी कौनों लाज-सरम नाहीं! बुद्धी सारी टखना में बिलाय गई!

'देखो बबुआ, हम किसी की सिकायत सुनेवाली नहीं और हियाँ जो घर में आए ए जैसे ही हमको अकेले देखा तो हो जाए शुरू - सुमेधा और इनके बारे में। एक बोला - 'अम्मा, सर को सब मोहित कुमार नाम दिए हैं।' हम पूछे - 'ई काहें रे।' बोला - 'ओ सुमेधा का असल नाम सुमेधा नहीं, मोहिनी है न... इसके वास्ते।' अयँ नाम ऊ पतुरिया गड़बड़ बताइस! पर हम हरहर माहुर खा के रह गए। उल्टा डाँट के बोले - 'अगर ई बात हम तोहार सर के बोल दें तो तोहार पत्ता ई साफ होइ जाइ। पास होय की हुलस हय बचुवा, तो तुम हू इतनी अकलमंदी करो कि चुप्पई रहो।'

'डाग्दर साहब लौटे तो हम पूछे - सुमेधा का नाम क्या है?
'बोले - मेधा ए और क्या?
'ये लेओ, एक आखर अउर कम हो गया!
'काहे पूछत हो? - व्वो अइसे हमारी ओर आँख काढ़ कर देखे, जैसे कहते हों - 'सुन लो, पँड़ाइन, अपना लखमन रेखा का भीतर ही रहो!' अउर उसका भासन लिखने को बैठे। सच्ची बात जज साहेब, हमारा हिम्मत न हुआ कि उनका नामकरण 'मोहित कुमार' बतावें। अइसे ही तो नहीं, एक इस छातराइन को छोड़ सब छात्र लोग का गुरूजी के सामने घिग्घी बँध जात है।

'रात दिन उसके लिए भासन कागज पर लिखते लिखते उनके दिल में तो नहीं ए पेट में दरद सुरू हो गया। असली डाग्दर को दिखाए तो पेट क हर्निया...।

'वो ही टेम ए डाग्दर साहेब हर्निया के ऑपरेशन करा के तीन दिन अस्पताल में रहे। हम अस्पताल जावें तो सुमेधा बोले - माते, आप घर-दुआर देखो, बाबू को हम देख लेते हैं। ये भी बोलें - मेधा है न। तू काहे बेआराम होती हो...

'हम जब घर दुआर से फारिग होकर अस्पताल पहुँचें तो क्या देखें कि वो सेव, संतरा, नासपाती, आलू बुखारा और क्या क्या हेन-तेन ला के डाग्दर साहेब को खिला रही है। अपने हाथ से छील-छील के ऐसे खिलाए जैसे ये कौनों बबुआ होंय। सोचो कि एक साठ बरिस का आदमी सात साल का बच्चा होय के गुबुर-गुबुर फल खा रहा है और ये चेलिन लहक लहक के उसका मुँह में संतरा का फाँक डार रही है।

'संतरा के फाँक का ये असर कि डाग्दर साहेब इसको कालेज में टीचर लगाने के खातिर सबसे जोग्ग लरिका को रिजेक्ट कर दिए। एक से बढ़के एक खिस्सा पानी में गोबर के जैसे उतरा गया। हम वो सब बरदास (बर्दाश्त) कर लिए। तीसरे पन डाग्दर साहेब बोल-बतियाब हमसे छोड़ दिए। हम सोचे कि चलो, उसका बियाह हो गया तो सुबह का भूला कभी तो घर पलट आवेगा ही।

'पर न उसका बियाह हुआ, न हमारा इच्छादेवी का नींद टूटा... घर तो पलट के आते रहे पर अपना जीव उधर ही छोड़ के। कितना कालिज में उसको फिट किए, एक बरिस कौनों जगह टिकी नाहीं। कालिज में लगते ही इस्टाफ रूम छोड़ के सीधा पहुँच जाए प्रिंसिपल या मैनेजिंग कमेटी का हेड का कमरा मा। साथ पढ़ानेवाले के आँख का काँटा बन जाए। काम छूट जाय, बस हमरे दरवज्जे पे हाजिर। ये उसके संकटमोचन, दस काम छोड़ के फोन पर लग जाते। एकर फोन, ओकर फोन! सोलह घंटा फोन पर। बिल आय गवा ओ महीना दो हजार रुपिया। हम बोले - आँय, ए बिल का एन्कायरी कराओ। फोन का एतना बिल तो कभी आया नहीं। बोले - भागमती, तुम अपना बथुआ का साग देखो... गैस खुला छोड़ आई का... जल रहा है, ई सब से हम निपट लेंगे। हम क्या बोलते? अयँ, मन में सोचे - ठीक है! जब अपना खीसा में हराम का पइसा आ गया है, लुटावो जेकर उपर चाहो। जिधर भेकेंसी का खबर मिले, जुगाड़ में लग जावें। आखिर इनका मेहनत का रंग असर देखा दिया। ये टैम जो उसका नौकरी लगवाए, सो अइसा कि रहने-रुकने को क्वार्टरवा मिल जाए। बस, उसका क्वार्टर को ही अपना घर दुआर बना बैठे। हर सनीचर-इतबार उसके दुआरे। दरवज्जे के बाहर पाँव छुआ छुआ के निहाल और दरवज्जे के भीतर... साँकल चढ़ जाती। सोचते, कौन देखता है। अरे ए लोग-बाग बिना आँख के तो नाहीं। माना कि भीतर नहीं देखते मगर बाहर निकलते समै चेहरे पर भीतर का रंग तो कपाट में बंद करके नहीं आते न... तो सब तोहार रंग के तो देखत बूझत है कि नाहीं। पर जो एकबार लोकलाज छूट गई तो जानत सब कोई। मरद की ई देह... मरद की जो दुरगति न कराय सो थोड़ा...।

'हम यहीं तो खा गए धोखा! हम सोचते रह गए कि ये हमसे ही लौ लगाए हैं, मुँह चाहे जिसके दुआरी मारें! बाकी पिरेम का परिभासा बड़े-बड़े ज्ञानी ध्यानी न बता पाए तो हम गाँव जवार की अउरत क्या बताएँ कि मरद का पिरेम क्या होता है। हम तो इनके चुप्पी को ही प्रेम समझ लिए। ये अपने को ज्ञान समझत रहे और सुमेधा को शरीर। हम सोचत रहीं कि ज्ञान चेतन्त होय तो घर लौटे और शरीर जाए मसान पर लेकिन शरीर अपना परपंच दिखाय तो ज्ञान भी आँख मूँद कर, सुग्गा बन जाता है।

'ये सब टेंसन में हमारा दाँत दुखान लगा। दाँत का डाग्दर के पास गए। आजकल डाग्दर रूट कलान, रूट कलान करता है न। पइसा जियादा मिलता है उसमें। चार बार दाँत को जड़ से खुरच-खुरच के साफ कराए पर जइसे ही उसमें फिलिन करते रहे, वो फूल के कुप्पा। दुखे सो अलग। हम हार कर डाग्दर के बोले - बेटवा, एके निकाल बाहर करो जड़ से। ना रही बाँस, न बाजी बंसरी! ये ऐसे ठीक न होइ। जड़ से दाँत उखाड़ दिया, तब जाके चैन का साँस लिए। ये तो दाँत की बात, पर आँत के भीतर जो कीला चुभता रहा, उसको जड़ से कइसे निकाला जाय। हम तो अपने पंडीजी का नाम मोहित कुमार मोहित कुमार सुन सुन के बेहाल हुइ जाते। ये नाम हमरा कलेजे में सूल-सा चुभता, पर कोनो डाग्दर के पास इसका इलाज नाहीं...।

'बाकी ये बात बताओ! सब कुछ बरदास करे का मेवा क्या मिला? ये तो हमारे लिए ही सोच लिए - ना रही बाँस, न बाजी बंसरी। आज नहीं तो कल, दूनों मिल के हमरा काम तमाम कर देते। वो ही काम हमरे हाथ से हो गया तो कौन गुनाह हो गया? बताओ साहेब... बताओ... बताओ...?'

ऊँची आवाज में बोलतीं... हाँफती हुई पँड़ाइन एकाएक चुप हो गई। दाँत के दुखने की फिरौती हो गई थी और उसकी पीर दिमाग की नसों तक पहुँच रही थी। एकदम चाय की तलब महसूस हुई पर पूरी देह पर जैसे सपना अकड़ कर बैठा था।

अपने इकलौते सोने के कमरे में अब वे अकेली जाग रही थीं। बगल में सोए पाँड़े सप्तम सुर में खर्राटे भर रहे थे। बीच-बीच में उनका पेट ऐसे गुड़गुड़ा उठता मानो कोई बूढ़ा हुक्का खींच रहा हो। पँड़ाइन ने चारों ओर देखा और अपना माथा पकड़ लिया क्योंकि भूला-बिसरा अतीत जब आँख में उँगली डाल कर, फेंटा कस कर सामने आ खड़ा हुआ तो सोच-सोच कर उनका दुखता सिर घूमने लगा कि क्या यह सब सच भी हो सकता है? आज तक किसी के सामने उन्होंने जुबान नहीं खोली और आज अपने जीवन का कच्चा चिट्ठा सपने में बयान कर गईं। मन में सुकून भी रहा कि चलो, किसी ने सुना नहीं, उनके भरतार की इज्जत लुटने से बच गई। कहीं भी आते-जाते रहे हों, सप्तम सुर में खर्राटे तो उन्हीं की बगल में इत्मीनान से लेते रहते हैं। जानते हैं, भागमती उन्हें करवट बदलने को नहीं कहेंगी।

पँड़ाइन का मन रोने-रोने को हो आया लेकिन बेआवाज वे लेट गईं। लगा जैसे आँख से देख कर भी धोखा खाते रहना ठीक नहीं था। वे जीवन भर वही करती रहीं जो हर भारतीय नारी करती है। घर को सँभालना। अपनी अनिच्छाओं को भी पति की इच्छा से ढँक देना और मुँह बंद रखना। और उसका सिला क्या मिला? उपेक्षा! बहिष्कार! घर निकाला! और अब मार डालने की साजिश! और ये खाली सपना रहा हो, ऐसी बात नहीं थी। वे देख रही थीं कि आजकल उनके बुखार, उनकी बेआरामी, कलेजे की जलन, मुट्ठी भर भात खाके भी ढउँ-ढउँ डकार, घुटने-टखने-कुहनी के दर्द से उठती आह और कराह से उनके पति प्रोफेसर गिरधारी लाल पाँड़े की आँख में नमी और ललाट पर चिंता की एक लकीर तक नहीं उभरती बल्कि एक राहत की साँस झलकती है। जो धर्म-कर्तव्य निभाने आई थी, सब तो हो गए पूरे। अब बस पूर्णाहुति बाकी है। कल की मरती बुढ़िया आज मरे, उनकी बला से! उस झलक को छिपाने के लिए किसी न किसी नाती-पोते का नाम, जो उन्हें वैसे तो कभी याद तक नहीं रहता, उस वक्त झट से याद आ जाता है। उसी का नाम ले कर बोल देंगे - विहान को साथ ले जाओ, डॉक्टर को दिखा आओ। ...किस्सा खतम और अपना कंधा झटक कर निकल पड़ते नाक की सीध में। कहाँ? कौन नहीं जानता। भागमती की याददाश्त जितनी भी कमजोर हो गई हो पर वह दिन कभी नहीं भूलता जब उन्हें तपते बुखार में छोड़ कर चले गए डाग्दर पाँड़े अपनी मेधा के क्वॉर्टर। बुढ़िया को बुखार है तो नाती-पोते किसलिए हैं, हकीम डॉक्टर दिखा लेंगे। उसके लिए वो अपना शनीचर इतवार क्यों खराब करें!

पँड़ाइन भूल गई थीं कि मेहर हो चाहे मनुस... अगर लँगोट का कच्चा हो गया तो किसी एक का तो हो ही नहीं सकता, प्रेम तो बहुत दूर की बात है। पँड़ाइन को सोच कर बुरा लगता कि सुमेधा तो अपने मतलब के लिए उनका इस्तेमाल करती रही लेकिन ये तो डाग्दर साहब थे - विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष। बहुत मोटी तनख्वाह और ढेर सारी सुविधाओं का सेवन करनेवाले! मानित-सम्मानित! छात्रों से पाँव पुजवानेवाले! ये क्यों अपने चरित्र से गिर गए। क्या ये भीतर से इतने कमजोर थे। या जन्म के लंपट थे। क्या थे ये कि वे समझ नहीं पाई और इनकी कुशलता के लिए ताउम्र निर्जला व्रत रखती रहीं। लानत है उन पर!

पँड़ाइन उम्र भर धोखा पाले रहीं कि उनके इकलौते पति मोहतरम जनाब प्रोफेसर पाँड़े उनके हैं! सिर्फ उनके! वे चाहे जिस खेत चर लें लेकिन प्रेम तो वे बस मुझसे ही करते हैं। सच तो यह था कि प्रेम किस चिड़िया का नाम है यह भूल कर वे सिर्फ और सिर्फ नटवर नागर हो कर रह गए थे। ...और इन नटवर नागर के लिए क्या भागमती का भी सतवंती चाची बनना जरूरी है? सतवंती चाची तो ईंट के एक प्रहार से स्वर्ग सिधार गईं, पर भागमती के प्राण तो, अपने डाग्दर पाँड़े की आग उगलती एक तीखी निगाह से ही, सिकुड़ कर रोमकूप से बाहर निकल जाएँगे।

पँड़ाइन के दिमाग में बवंडर चल रहा था। बिस्तर से उठा नहीं जा रहा था। चाय की तलब परेशान कर रही थी। कोई एक प्याला चाय बना के देनेवाला नहीं। उनके भरतार को तो गैस का चूल्हा जलाने तक की जरूरत नहीं पड़ी कभी। अपने भाग्य में पति के हाथ की चाय पीना नहीं बदा! भागमती ने एक गहरी उसाँस ली। पता नहीं लेटे-लेटे कब दुबारा उनकी आँख लग गई।

बदलाव बहुत धीरे-से होता है। सतह पर दिखता नहीं लेकिन भीतर चल रहा होता है। अचानक हो जाता है। वैसा ही हुआ!

इस बार मंगलवार को करवाचौथ थी। पाँड़े घर पर ही रहे। तीज-त्यौहार शनिवार-इतवार को नहीं पड़ा, इसलिए। हर साल यह दिन पँड़ाइन के लिए खास होता रहा है। पचास साल से मुसलसल। पाँड़े भी गर्व से फूल जाते। आखिर ऐसे गुलाम मिलते कहाँ हैं जो लात खा कर भी मारनेवाले की जिंदगी के लिए दुआ माँगें!

लेकिन उस दिन डाग्दर पाँड़े को कहीं कुछ सुगबुगाहट नजर नहीं आई। उन्होंने सोचा कि उम्र की वजह से सुस्त पड़ी होंगी। पँड़ाइन को अचंभे में डालने के लिए वे बाजार से सामान लाने घर से निकल पड़े। मेथी-पालक,फल-फ्रूट, खरीद लेने के बाद उन्हें इलहाम हुआ कि कुछ खास ले चलना चाहिए। आखिर साल में एक ही दिन तो इनकी खातिर करते हैं। वो भी अपनी खातिर! वे फौरन फ्लोरिस्ट की दूकान पर जा पहुँचे। एक दमकता हुआ लाल सुर्ख गुलाब चुनने में उन्हें देर न लगी। जेब से भी सिर्फ पाँच का सिक्का निकालना पड़ा और काम हो गया।

पाँड़े बाईं मुट्ठी में सुदर्शन चक्र की तरह लाल सुर्ख गुलाब थामे घर लौटे। वे पँड़ाइन को गुलाब का फूल दिखा कर चकित कर देना चाहते थे। लेकिन उन्हें स्वयं चकित होना पड़ा। पँड़ाइन चाय पीते हुए आलू के चिप्स चुभला रही थीं। पास रखी तश्तरी में रोटी, भरवाँ करेले, बथुए का रायता और नीबू का अचार रखा था। यह नाश्ता है कि खाना? और वो भी अकेले! डाग्दर पाँड़े ने पलकों को झपका कर फिर से खोला।

मंगल को अमंगल कैसा! सकपकाई हुई आवाज में पाँड़े बोले - 'अरे! का हो? आज चौथ है। व्रत नाहीं हउ का?'

'न्ना।' पँड़ाइन ने गरम-गरम चाय की चुस्की लेते हुए कहा। एक एक चुस्की में चाय खींचने की सुड़क-सुड़क की आवाज होती रही बेहिचक।

'क्या? काहे?'

'बस अइसे ही! मन न हुआ! तीज-चौथ को एतना बरत-उपवास से का हुइ हैं?' बोलते हुए पँड़ाइन के चेहरे पर ऐसा तेज दीप्त हुआ कि उसकी चमक में उनके चेहरे की एक-एक झुर्री गिनी जा सकती थी - 'अब हमसे अउर बरत-उपवास ना हुइ। सरीर लाल बत्ती दिखावत हय... बोलत हय - न्नो।'

पँड़ाइन के मुँह से अंग्रेजी का जोरदार 'न्नो' सुन कर पाँड़े के हाथ से सुर्ख गुलाब नीचे गिर पड़ा। जमीन पर गिरते ही गुलाब के फूल की पंखुरियाँ टूट कर इधर-उधर बिखर गईं।

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अस्तित्व : ज्ञानप्रकाश विवेक

कुछ विरोधाभास जीवन भर साथ रह जाते हैं। प्रयास करने पर भी कुछ आदतें नही जातीं। ऐसी ही एक समस्या है पढ़ते समय झपकी आ जाने की। अधिकतर पढ़ना यात्र...