बुधवार, 6 मार्च 2019

उस तितली के रंग : अशोक कुमार पाण्डेय

साढ़े पाँच बजने ही वाले थे। 
यानी पिछले आधे घंटे से इस शेड में बैठे थे हम। 
हम नहीं मैं और वह ...  अचानक दिख गया था यह शेड। तिब्बती गहनों और बुद्ध की मूर्तियों की दुकानों के बीच एक संकरी सी गली से खुलता रास्ता दिखा तो मैंने उसे इशारा किया। वह एकदम से मुड़ गई। उस पहाड़ी सड़क की बॉलकनी हो जैसे। गोल शेड छतरी जैसा। बीच में एक खंभा और गोल पत्थर की बेंचें। लोहे की जंग लगीं रेलिंग के नीचे से एक झरना सा बह रहा था जिसकी दीवारों पर नीले-गुलाबी फर्न उगे थे और सामने पहाड़। मझले आकार के हरे पहाड़ जिनमें से रास्ते किसी चाँदी की करधनी से चमकते थे। मैंने कहा, ‘देखो हम इन रास्तों से ही आए थे।’ उसने बिना मेरी तरफ देखे कहा, ‘थोड़ी देर में सूरज डूब जाएगा इन पहाड़ों में’ और बेंच पर बैठ गई। नीले कुर्ते पर उसने सफ़ेद फर वाला पुलोवर पहना था और काला मफ़लर। कंधों से ज़रा नीचे आते बालों मे सफेदी के कुछ हल्के निशान देखते मुझे पहाड़ों में दिखतीं सड़कें याद आईं। कानों में उसने कुछ नहीं पहना था, एकदम गुलाबी कान जैसे ठंड से सिहर गए हों। मैं इस वक़्त उसकी आँखें देखना चाहता था। पिछले आधे घंटे से उसने अपनी पोजीशन भी नहीं बदली थी। जैसे प्रार्थना की मुद्रा में बैठी हो चर्च की सीट पर। एकाग्र, शान्त, उदास। मैने सिगरेट जला ली। कुहरा उतरने लगा था और धुआँ उससे मिलकर और गाढ़ा लग रहा था। उसने दो अंगुलियाँ जोड़कर मेरी तरफ बढ़ाईं। मैंने उनमें सिगरेट फँसा दी। थोड़ी देर वैसे ही सिगरेट थामे रहने के बाद उसने एक बड़ा सा कश लिया जैसे गहरी साँस ले रही हो और सिगरेट लौटा दी। सूरज अब डूब रहा था। हम उसे डूबते हुए ऐसे देख पा रहे थे जैसे कोई नब्ज़ हथेलियों के बीच हो और उसका डूबना महसूस कर पा रहे हों हम। उसने अचानक मेरी हथेलियाँ थाम लीं। ठण्डे हाथ एकदम बर्फ से। धीरे धीरे दबाव बढ़ता गया और फिर एकाएक उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी बरौनियों में बूँदें उलझीं थी। चेहरा एकदम पत्थर सा। 
हम रास्ता भटक गए थे शायद। एक सी दुकानें, एक जैसे घर लेकिन जिस सड़क से आए यह वह नहीं थी। एकदम सपाट ढलान था लगातार। कई बार पाँव फिसले। दो लोगों से बस स्टैंड का रास्ता पूछा लेकिन जो बताया उन्होने उससे बस यह समझ आया कि आगे कहीं से दाहिनी तरफ़ एक गली जाती है जिससे फिर बाएँ मुड़ना होगा। बस स्टैंड उससे भी आगे कहीं था। झुंझलाहट सी हो रही थी मुझे। वह शान्त चली जा रही थी अचानक बोली – चलते रहो न। सारी ज़िंदगी हम जाने पहचाने रास्तों पर चलकर भी कहाँ पहुँचे।  

एकदम ऐसे ही मिल गई थी वह जैसे बीस साल पहले बिछड़ गई थी। बिछड़ना बड़ा रोमांटिक सा शब्द लगता है। जैसे कोई संयोग हो, कोई बाहरी ताक़त, कोई मज़बूरी। यहाँ तो शायद यह कहना बेहतर होगा कि मिलना बन्द हो गया था या फिर यह कि मिलने की वजहें ख़त्म हो गई थीं या अवसर नहीं थे या पता नहीं। 

मुख्तसर सा क़िस्सा था। उसने टेम्पररी पोस्ट पर ज्वाइन किया था। टूरिंग जॉब। पहला टूर एक सीनियर के साथ भेजा गया। लौटकर उसने इस्तीफ़ा थमा दिया डायरेक्टर को। डायरेक्टर ने मुझे बुलाया और हिदायतों के साथ उसे अगले टूर पर साथ ले जाने का आदेश दिया। फिर हमारी टीम बन गई। अगले दो साल लगभग हर हफ़्ते में तीन दिन बाहर साथ। मैं शादी कर चुका था वह करने वाली थी। बात करते करते अनामिका में पहनी अँगुली पर टिक जातीं उसकी निगाहें और फिर वह किसी और दुनिया में होती। मैं छेड़ता तो खिलखिलाकर हँस पड़ती कभी गम्भीर हो जाती। 

एक शाम कहीं से लौट रहे थे हम और उसने कहा “जितना तुम्हारे साथ स्कूटर पर घूमी हूँ उतना तो रिचर्ड भी नहीं घुमा पायगा ।” एक रात जब उसे बस स्टैंड पर छोड़ने जा रहा था तो बोली, “शादी के बाद भी कैसे रह लेते हो इतना अकेले?” एक रात जब किसी आदिवासी गाँव की पंचायत के बाहर अगल बगल लगी खाट पर सोने की कोशिश कर रहे थे हम तो उसने कहा, “तुम्हारे साथ जाने क्यों कहीं असहज नहीं लगता ।” एक दोपहर जब पसीने से लथपथ हम किसी रेस्तरां में घुस रहे थे तो उसने कहा, “इतना गंदा तो मुझे रिचर्ड ने कभी देखा ही न होगा ।” फिर जब ख़त्म हुआ उसका टर्म तो मैने कहा, “रोज़ पूछती हो न कि वाकई खाना बनाना आता है तुम्हें? आओ आज तुम्हें घर पर पार्टी देता हूँ ” उसने कहा, “नहीं घर नहीं आऊँगी”...और पार्किंग के उस एकान्त में हग किया तो लगा जैसे सीने पर बहुत धीमे से चूमा है।    

इतने सालों बाद एक सुबह फेसबुक पर फिल्टर्ड मैसेज चेक करते हुए मिला वह मैसेज़,
“नील !! पहचाना? सुनीता क्रिश्चियन।  
वाव! कितने दिनों बाद? क्या हाल है? कैसा है रिचर्ड?
रिचर्ड के कैसे होने से तय होगा हाल? एक शरारती स्माइली आई। 
बदले में वहीं  शरारती स्माइली चिपका के पूछा, कहाँ हो? अहमदाबाद में ही?
उसने लिखा - नहीं तुम्हारे शहर में। नम्बर लो दस बजे के बाद फ्री हो तो बात करते हैं।  

उसे पहाड़ पर जाना था। उसे दिल्ली से दूर जाना था। उसे शान्ति चाहिए थी। उसे दो अपने दिन चाहिए थे। उसे बस कहीं निकल जाना था। उसे अकेले जाने से डर लगता था।  

लेकिन इस वक़्त वह अकेली ही थी। एक भूले हुए रास्ते पर चलती हुई निश्चिंत। जैसे जाने कहाँ जाना हो। जैसे कहीं नहीं जाना हो। उसके पीछे चलता हुआ मैं लगातार इधर-उधर से रास्ते की शिनाख़्त कर रहा था। अचानक वह रुकी। नीचे की तरफ़ उतरती हुई एक सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा, “हम इसी से आए थे। मैं जानती हूँ इसी से लौटकर सही जगह पहुँचेंगे। लेकिन मैं आज ग़लत जगह जाना चाहती हूँ नील।” आठ बज रहे थे। अँधेरा अब गलियों में भी जमने लगा था। थकान भी।
मैं वहीं एक पत्थर पर बैठ गया, “बोलो कहाँ जाना चाहती हो? मैं हूँ साथ तुम्हारे ।” 
“यह पता होते ही वह जगह सही हो जाएगी। ग़लत जगह पहुँचने के लिए उसका निश्चित न होना ही ज़रूरी है। तुम्हें याद है मैं हर टूर पर कितना रिसर्च किया करती थी। मुझे नक़्शे में सर गड़ाए देख तुम हँसते थे – ‘ग्लोब पर नया गाँव नहीं ढूँढना है मैडम ।’ और हम कभी नहीं भटके....हालाँकि चांस थे। लेकिन दोनों इतने सावधान थे। आज भटकना चाहती हूँ और पता है भटक नहीं पाऊँगी। कहीं कोई मिल जाएगा रास्ता बताने वाला। कोई ऑटो वाला। कोई पुलिस की गाड़ी ... और लौटा ले जाएगा वहीं जहाँ जाना है। होटल वाला मुस्कुराएगा। हम भी। भटकने का सुख थकान में बदल जाएगा ।” 
और वह नीचे उतरती सड़क पर उतरने लगी।
सड़क जैसे जैसे नीचे उतर रही थी अँधेरा बढ़ता जा रहा था। बहुत थोड़े से घर। कुछ गुमटीनुमा दुकानें और ढेर सारी खाली जगहें। रौशनी ने आते समय जो छिपाया था अँधेरे ने सब बेपर्द कर दिया।                                                                                                             
बॉलकनी के उस पार अँधेरे का दरिया था एक गहरा जिसमें कोई घर था किसी जहाज सा जिस पर रौशनी का एक धब्बा था लाइट हाउस सा।  उसने अँगुली का इशारा करते हुए कहा, “देखो कोई भटका हो तो वहाँ पहुँच जाये रौशनी का पीछा करते-करते। मुश्किल तब होती है जब रास्ता पता हो और रौशनी भी हो और वहाँ पहुँचों तो लगे ग़लत जगह आ गए।”  अचानक एक सवाल मेरे ज़बान की कोर तक आया और कसैला कर गया उसे तो मैंने थूक के साथ निगल लिया। लेकिन कुछ तो पूछना ही था, “तुमने कब शुरू की शराब?” वह हँसी या यह कहना ठीक होगा कि उसने हँसने की कोशिश की, “आज अभी। सिगरेट दोपहर में शुरू की थी। शराब शाम को।”  मैं चौंका। लौटते हुए मैंने यों ही पूछा था, “कुछ पियोगी ।” उसने कहा था, “ले लो ।” मैंने पूछा था, “कौन सी?” उसने कहा था “कोई भी ।”  
फिर एक ख़ामोशी थी। बैरा एक सुलगती हुई सिगड़ी पर सिंकता सिजलर रख गया था जिससे बीच बीच में सन्न की आवाज़ आती थी। उसका गिलास खाली था। तीसरा पैग बनाते हुए मैं हिचक रहा था। इस बार वह हँसी, “नील यार तुम बिलकुल नहीं बदले। बेहोश भी हो गई तो मुझे पता है तुम मेरे कमरे तक पहुँचा दोगे ।” हँसना मुझे भी था, “तबियत भी बिगड़ सकती है मैम ।” एकबारगी लगा जैसे अँधेरे की दरिया में रुके उस घर से आई हो आवाज़ – “जो बिगड़ना था बिगड़ चुका नील। अब बनने की कोई ख़्वाहिश नहीं बची ।”    
बैरा यह बता कर जा चुका थी कि अब कोई सर्विस सम्भव नहीं होगी। ठंड एकदम से बढ़ने लगी थी। अगल बगल की सभी बॉलकनीज़ की लाइट्स एक एक कर ऑफ हो चुकी थीं। लेकिन जैसे वह किसी टाइमफ्रेम में जड़ हो गई थी। टेबल पर साँवले पाँव, आँखें बन्द और कुर्सी के सहारे टिका सर। काला मफ़लर अब भी गर्दन में वैसे ही लिपटा हुआ था। उसने कुछ नहीं खाया था। मैं उठकर कुर्सी के पीछे गया। माथा सहलाते हुए बहुत धीमे से कहा, “कुछ खा लो सुनीता।” लेकिन उस तरफ़ एक ख़ामोशी थी। माथा छुआ तो बर्फ़ सा ठण्डा। सहारा देकर उठाया तो उसने गले में बाहें डाल दीं। बिस्तर पर लिटाकर रज़ाई ओढ़ाई।  कितनी शान्त आँखें थीं उसकी। बीस साल पहले हमेशा शरारत और उत्सुकता से भरी रहने वाली आँखें जैसे समय की नदी में तैरते तैरते थक गई हों। अचानक मन हुआ उन्हें चूम लेने का।   

सुबह से बारिश हो रही थी। हम निकले तो बहुत महीन सी बूँदें थीं। ऑटो वाले ने सिमेट्री पर रोका और कहा भीग जाएँगे आप लोग। वह कई और जगहों की सलाह दे रहा था लेकिन वह बज़िद थी।  मुझे लगा शायद उसे चर्च जाना हो लेकिन मैं चर्च की तरफ़ बढ़ा तो उसने रोक लिया, “वहाँ कोई नहीं है। यहाँ बैठते हैं जहाँ यादें हैं इंसानों की। तुम्हें पता है इस सिमेट्री में ज़्यादातर 1857 के बलवे में मार दिये गए लोग दफ़न हैं। अपने घर से हज़ारों मील दूर। कितने ही ऐसे होंगे जिनका कोई अपना कभी फूल चढ़ाने भी नहीं आया होगा।”  फिर अचानक घूमी मेरी तरफ़, “मान लो मैं मर जाऊँ अभी यहीं तो इस क़ब्रिस्तान में ही दफना दोगे न? फूल चढ़ा देना लौटने से पहले क्योंकि फिर कभी कोई नहीं आएगा।” मैं कुछ बोलने को हुआ तो उसने रोक दिया और एक पेड़ के नीचे बैठकर मेरे लिए जगह बना  दी।  
एक ऊब सी होने लगी थी अब। कोई घंटे भर से हम वैसे ही बैठे हुए थे। पत्तों पर ठहरी बूँदें भारी होतीं तो टपक पड़तीं। पुरानी क़ब्रों पर उगी हरियाली में खो जातीं। मैने लिखावट पढ़ने की कोशिश की। साल भर पहले शादी करके हिंदुस्तान आई 19 साल की उम्र में 17 जुलाई 1856 में किसी बीमारी का शिकार हो मर गई मिसेज एलेना मारग्रेट ह्यूज़। पति कम्पनी की सेना में कर्नल। ‘यह बलवे में नहीं मरी थी,’ मैने यों ही कहा, ‘मर गई इसलिए बलवे से बच गई’, वह वैसे ही बैठी थी निश्चल। सिगरेट जलाई तो उसने दो कश लिए।  मैंने उसके कन्धों पर आहिस्ता से हाथ रखा और कहा, “सुनीता। कुछ है भीतर।  कह दो उसे। मुझसे नहीं तो चर्च में कनफेस कर आओ। शांति मिलेगी अगर बोझ हट जाएगा ।” वह हँसी... पहले हल्की मुस्कुराहट। फिर हँसी...  तेज़... और तेज़। मैंने घबरा कर अगल-बगल देखा। कोई नहीं था। अब तक उसकी हँसी हिचकियों में तब्दील हो गई थी। उसका चेहरा अपनी तरफ़ किया। वह रो रही थी। चुप कराने की कोशिश में चेहरा हाथों में लिया तो वह कंधों पर टिक गई जैसे कह रही हो रो लेने दो प्लीज़ और फिर एकदम अचानक उठ खड़ी हुई – होटल चलो नील।     
उसकी आँखें पहले एक तितली में बदलीं। नीली तितली जिस पर सुनहरे ज़री बूटे थे। फिर उस पर से रंग एक एक कर ऑटो से बाहर चले गए। उसने शॉल कसकर लपेटी जैसे रोक लेने हों कुछ रंग। मैरून शॉल पर कुछ तिनके बटोर लाई थी वह सिमेट्री से। उनमें से कुछ जैसे तितली की पंखों पर जा बैठे तो उड़ान सहम गई। मैं उस तितली को थामना चाहता था लेकिन वह आकर मेरे कन्धों पर बैठ गई और कमरे तक आई।
एक बहुत धीमी आवाज़ जैसे उस तितली का पीछा कर रही थी -  ‘वह नौकरी छूटने के तीन महीने के अन्दर हमने शादी कर ली। तुम्हें बुलाना चाहती थी लेकिन एक तो ये गुस्सा था कि उसके बाद तुमने एक फोन न किया दूसरे ऑफिस से पता चला कि तुम्हारा ट्रांसफर हो गया है। फिर वैसा ही था सब कुछ जैसा होता है।  हनीमून के लिए पांडिचेरी गए थे हम। ठीक दसवें महीने जो आ गया। चार किलो का मोटा ताज़ा लड़का। दो साल निकल गए उसके साथ। बीच में उसी जॉब के परमानेंट के लिए रिटेन दिया था। रिजल्ट आया तो इंटरव्यू भी दे दिया। सेलेक्शन हुआ तो लगा बस अब और क्या चाहिए। रिचर्ड अपने काम में रमा हुआ था। पहले किसी के अंडर में काम करता था। अब अपना ऑफिस डाल दिया था। सी ए था न। ख़ूब काम आ रहा था। माँ का घर पास में था तो जो ज़्यादा वक़्त उन्हीं के पास रहता। सात-आठ साल कैसे निकल गए पता ही न चला। टूरिंग की भी अब आदत सी हो गई थी तो उसका बहुत टेंशन रहता नहीं। जो स्कूल जाने लगा था। सब एकदम नॉर्मल। लेकिन कुछ था जो बदल रहा था।’ 
कुर्सी से सर टिकाते हुए उसने आँखें मूँद लीं। मुझे अपने कन्धों पर जैसे एक नमी सी महसूस हुई। उसने पाँव आहिस्ता से उठाकर बेड पर रख दिए। दोनों हाथ जोड़कर सीने पर रखे तो अंगुलियाँ देखीं। पतली साँवली नुकीली अंगुलियाँ। अचानक उसने एक हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया वैसे ही दो अंगुलियाँ जोड़कर। मैंने सिगरेट थमा दी। देर तक जैसे उसकी लौ को देखती रही फिर एक लम्बा कश। धुआँ निकला तो उसने धीमे धीमे आँखें खोलीं, “कुछ था जो बुझने लगा था। हम अब भी वीकेंड्स को बाहर जाते। अब भी त्यौहार मनते। अब भी पार्टियाँ होतीं। अब भी वह रातों में पागल होता। अब भी मैं उसकी एक पुकार पर सिमट जाती उसकी बाहों में। पर कुछ था जो बदल रहा था।” उसने सिगरेट मुझे वापस करने की जगह एश ट्रे में मसल दी। “पता है जब तुम्हारे बारे में पता चला ऑफिस में से ही किसी से तो एक बार मुझे आश्चर्य हुआ। तुम्हारे जैसा सुलझा हुआ इंसान भी! फिर लगा जैसे सुलझने-उलझने का मामला ही नहीं है। शायद कोई एक्सपायरी डेट होती हो प्रेम की भी। लेकिन मैंने उससे समझौता कर लिया था। परिवार था। घर था। रिचर्ड अब भी प्यार करता था मुझे। मैं कोशिश करती अपने तरह से। जिम ज्वाइन कर लिया। वज़न घटाया। पार्लर जाने लगी, वह मुस्कुराई, लांजेरीज़ ले आई सुन्दर सुन्दर। मुझे लगा वह ख़ुश होता है। और वक़्त तो निकल ही रहा था दौड़ते भागते। साथ रहते रहते ऑटो मोड मेन आ जाती है न ज़िंदगी, कुछ न करो तो भी चलती जाती है अपने आप।” 
वह कुर्सी से उठी। बालकनी में जाकर खड़ी हुई तो मुझे लगा जैसे आँखें पोछी हैं उसने। बारिश अब भी जारी थी बदस्तूर। अँधेरे की दरिया में साफ़ दिखता वह घर जैसे हरे समन्दर में डूब गया था। मैं चुपचाप जाकर बगल में खड़ा हो गया। उसने एक बार मुड़कर मेरी तरफ़ देखा और फिर कहीं शून्य में नज़रें गड़ा दीं, वह बेरंग तितली धुंध में उड़कर खो गई कहीं।  
‘उसे पहली बार देखा तो तुम्हारी याद आई। ऐसे ही शान्त, केयरिंग और मेहनती। जैसे रोल बदल गए थे। तब मैं आई थी और तुम्हें भेजा गया था मेरे साथ अब वह नया आया था और मुझे उसे लेकर फील्ड में जाना था। कितना ख़याल रखता। मैम मैं कर लूँगा आप रेस्ट कर लो। मैम कुछ खा लो आप। फील्ड में जैसे पंख लग जाते उसके पैरों को। एक पुरानी मोटरसाइकल थी। कहीं लेकर पहुँच जाता मुझे। पेपर्स हमेशा समय से तैयार। पक्की टीम बन गई थी हमारी। अकेला रहता था तो अक्सर मैं उसके लिए लंच पैक कर लेती। डेढ़ साल साथ काम किया और एक दोस्ती सी हो ही जाती है न। कई बार रुकना भी पड़ा बाहर। उसके साथ कोई हिचक नहीं होती थी। जैसे तुम्हारे साथ नहीं हुई कभी।’   
उसने फिर सिगरेट के लिए अंगुलियाँ बढ़ाईं। बालकनी की ओर पीठ कर ली और मेरी आँखों में आँखें डाल कर जैसे कुछ तलाश कर रही थी, ‘उस दिन रुकने का मन बिलकुल नहीं था मेरा। जो के इक्जाम्स चल रहे थे। लेकिन उसकी बाइक ख़राब हो गई थी और बारिश भी। उसने रेस्ट हाउस में बात कर ली और बोला एकदम सुबह सुबह निकल पड़ेंगे। नॉर्मल था न नील। टूरिंग जॉब में कितना नॉर्मल है यह सब। रिचर्ड को फोन किया और रुक गई मैं। थकान थी कब नींद आई पता ही न चला। अचानक खुली नींद तो...एक बार को भरोसा ही न हुआ। सारे कपड़े अस्त व्यस्त! पता नहीं कब हुआ यह सब। वह पागलों की तरह चूम रहा था मुझे। चीखी तो मुँह बन्द कर दिया । पता नहीं कहाँ से आई ताक़त और मैने दोनों पैर जोड़ लिए कस के। दरवाज़े बन्द कर लेते हैं न हम। उसने ज़बरदस्ती करने की कोशिश की तो उसके बाल नोच लिए। फिर सारी ताक़त जोड़ कर एक घूँसा जड़ा। कमज़ोर पड़ा तो एक तेज़ लात पेट पर। वह ज़मीन पर बैठा था और मैं रो रही थी। दौड़कर लाईट जलाई तो उसे भी होश आया जैसे। पैर पकड़ लिए। माफ़ियाँ। रोना। धक्का देकर कमरे से बाहर किया उसे और सूरज की पहली किरण के साथ बस स्टैंड आ गई।” 
उफ़...मैने कंधे पर हाथ रखा तो हँस पड़ी, ‘सुन लो नील। सब सुन लो। उफ़ कहने के बहुत मौक़े आयेंगे। मैंने भी कहाँ कहा कभी किसी से। रिचर्ड से कहा आकर। गुस्से में थी भयानक। शिक़ायत करनी थी ऑफिस में। नौकरी लेनी थी कमीने की। रोक दिया रिचर्ड ने। बेकार में बदनामी होगी। पूरी बिरादरी जान जाएगी। तमाशा मचेगा। दस तरह की बात होगी। मैं नहीं मानी तो जो की क़सम खिला दी। मैं चुप हो गई। एकदम चुप। उसने ऑफिस में कई बार बात करने की कोशिश की। मैं चुप। टूर की जगह एडमिन के लिए कहा तो डायरेक्टर ने पूछा। मैं चुप। लम्बी छुट्टी लगा दी। सोचा वक़्त भर देगा मरहम। रिचर्ड ख़ूब प्यार से बात करता। इक्जाम के बाद घूमने भी गए। बट ...’
बट...मैंने पूछा...वह कुछ नहीं सुन रही थी। उसने फिर पीठ कर ली मेरी तरफ़. ‘बट आय वाज़ नेवर लव्ड अगेन। शुरू में तो मैं सोच ही नहीं पाई इस तरफ़। बाद में एहसास हुआ। रिचर्ड अवायड कर रहा था मुझे। मैं पास जाती तो कभी थकान का बहाना करता कभी कुछ कभी कुछ। कई महीने बीत गए। उस दिन एनिवर्सरी थी हमारी। हर साल की तरह पार्टी दी रिचर्ड ने। शैम्पेन खुली। म्यूजिक। डांस। रात में जब अकेले हुए हम तो ज़ोर से हग किया मैने। हलके नशे में था वह। मैं आगे बढ़ने लगी। लगा महीनों की बर्फ़ पिघल जाएगी आज। उसके होठों में पिघलना हमेशा से पसंद था मुझे। हाथ कमर पर कसते जा रहे थे मैं किसी और दुनिया में जा रही थी कि अचानक...अचानक वह धक्का।  बेड के किनारे से लगा सर। वह चीख़ रहा था – तुम्हारी देह से बदबू आती है मुझे। झूठ बोला था तुमने। सब हुआ था उस रात। मैं जानता हूँ तुम्हें। तुम्हारी लस्ट को। ही इज़ यंग। पिघल गई होगी तुम। फिर मेरे सामने नाटक – गर्दन से पकड़ लिया उसने मुझे – बताओ कितना सेक्स चाहिए तुम्हें? कितना? बड़ा गुरूर हैं न इन बालों पर तुम्हें। खोले हुए घूमती हो। यू स्मेल लाइक मेड्यूसा।’
मैं वहीं बैठ गया। चुप। थोड़ी देर तक सिर्फ़ बारिश की आवाज़ रही उस बालकनी में। फिर वहीँ बगल में बैठ गई वह, पथरीली आँखें चेहरा किसी शून्य में टिका,  “अगली सुबह मैंने सामान पैक किया और बाहर निकल गई। महीने भर एक वर्किंग हॉस्टल में रही। उसने कई फोन किये। मिलने की कोशिश। मैं नहीं मिली। ट्रांसफर के लिए जान लगा दी और आने से पहले तलाक़ का नोटिस भिजवा दिया। दो साल हो गए। कभी बाल खोलकर नहीं निकली बाहर। अक्सर अकेले में देखती हूँ ख़ुद को। मेड्यूसा की पेंटिंग्स देखती हूँ ढूंढ कर। उसके बालों मे उलझे हुए क्रुद्ध नाग! आँखें! कैसी जलती सी! सोचती हूँ क्या ग़लती थी उसकी! कामना का होना ही ग़लत है नील? किसमें नहीं होती कामना! स्वीकार करती हूँ आज। है मुझमें कामना। अथाह कामना। और जगी है कई बार उसके बिना भी। उस शाम जब तुमने घर बुलाया था जगी थी कामना और मैं बहकना नहीं चाहती थी इसलिए मना किया । जब जगी रोक लिया या मोड़ दिया उसकी ही तरफ़ । कई बार उसकी बाहों में होते एक क्षण को आये थे तुम या कोई और भी ख़याल में फिर झटक दिया था। डूब गई उसमें ही तब भी जब वह होते हुए मेरे पास नहीं था हुआ। कल रात जब सुला रहे थे तुम मुझे तो हुआ था मन कि चूम लूँ...मानती हूँ...स्वीकार करती हूँ अपनी कामनायें। लस्ट कह लो उसे। वह भी स्वीकार है। लेकिन उस रात? उस रात कैसे जाग सकती थी कामना नील?  उसके वहशीपने में मेरी कामना कैसे पनप पाती! जो साथी रहा मेरी कामनाओं का इतने बरस वह ऐसे कैसे सोच सकता था! उसी क्षण सब ख़त्म हो गया था। सब...”
मैंने कॉफी दी । वह अब तक काँप रही थी। मैंने कन्धों पर हाथ रख दिए तो मुझे देखते हुए कुछ और देखती रही जैसे। शब्दों का एक गुबार सा उठा भीतर और होठों तक आते शान्त हो गया। उसने दाहिना हाथ उठाया और कस के बंधे हुए बाल मेरी अँगुलियों से किसी पहाड़ी नदी से गुज़र से गए।
घड़ी पाँच बजा रही थी। 
मैने धीमे से कहा – 7 बजे की बस है। वह कुछ नहीं सुन रही थी। 
शून्य में बनी कई कई आकृतियाँ और वह तितली लौट आई धुंध में भटक कर जाने कहाँ से वापस ले अपने रंग।

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अस्तित्व : ज्ञानप्रकाश विवेक

कुछ विरोधाभास जीवन भर साथ रह जाते हैं। प्रयास करने पर भी कुछ आदतें नही जातीं। ऐसी ही एक समस्या है पढ़ते समय झपकी आ जाने की। अधिकतर पढ़ना यात्र...