बुधवार, 27 जून 2018

मालती जोशी के गीत

जग की संध्या घिर आयी है
मेरे आँगन में दोपहरी
कैसे दीप जलाऊँ

ममता से भीगे पर लेकर
पंछी घर को लौट चले हैं
देहरियों पर सुहागिनों के
नयनों के शत दीप जले हैं
भटकी सुधियाँ घर आई हैं
सूनी फिर भी मेरी नगरी
मैं कैसे मुस्काऊँ

गद्गद कंठों से पूजा के
मंगलमय पद फूट पड़े हैं
तुलसी माँ के आगे कितने
मेहँदी वाले हाथ जुड़े हैं
मेरी आँखें भर आयी हैं
लेकर कैसी साध सुनहरी
मैं आँचल फैलाऊँ

2

अपना सीमित सा प्रकाश ले
दीपशिखा जलती है निशि भर
फिर भी मोहित है जग सारा
क्षण भंगुर विद्युत की छवि पर

मेघों का दिल चीर चीर कर
मुस्काना उसको आता है
झलक पलक भर दिखा गगन को
तड़पाना उसको आता है

शून्य लोक में छिप छिप जाती
खोज खोज रह जाता अम्बर
फिर भी मोहित है जग सारा
क्षण भंगुर विद्युत की छवि पर

नन्हे ये दीपक में लघु सा
स्नेह लिए जलते ही जाना
राख बना अपने प्राणों को
पथ भूलों को राह दिखाना

जीवन दान किया तो वह भी
पवन झकोरों से डर डर कर
अपना सीमित सा प्रकाश ले
दीपशिखा जलती है निशि भर।

यूसुफ़ रईस का पहला उपन्यास- मैं शबाना

"बाप के मरने पर बच्चे सिर्फ़ यतीम होते हैं। माँ के न रहने पर लावारिस हो जाते हैं।"

" कितनी अजीब बात है कि जिस्म छोड़ते ही लोगों को हर शख़्स में भलाई नज़र आने लगती है। अपना ज़मीर बेचकर इंसान पता नहीं कैसे इतना झूठ बोल लेता है।"

उपरोक्त अंश यूसुफ़ रईस के महत्वाकांक्षी उपन्यास "मैं शबाना" से लिये गए हैं जो पिछले दिनों नोशन प्रेस चेन्नई से प्रकाशित हुआ।
एक शायर के रूप में यूसुफ़ रईस को हम लोग ज़रूर जानते थे पर उनके प्रवाही गद्य से परिचय इस किताब के कारण ही सम्भव हो सका। अचानक "मैं शबाना" की चर्चा फेसबुक पर दिखनी शुरू हुई और धीरे धीरे छा गयी।

जिस गति और रवानी के साथ यह उपन्यास ख़त्म हुआ इसे उनके लेखन की विशेषता ही माना जाएगा। शबाना नामक एक लड़की की ये दुखद दास्तान पाठक के मन को छू जाती है। अभाव सिर्फ़ धन, दौलत और सम्पन्नता का ही नहीं होता। इंसानी रिश्तों में ऊष्मा, प्यार, आत्मीयता और स्नेह की कमी जीवन को त्रासद बना देती है। हर कोई अपना अपना नसीब लेकर इस दुनिया में आता है। दुर्भाग्य का खेल कुछ लोगों के साथ जीवन भर चलता है। शबाना के साथ भी यही हुआ। एक बार पिता की देहरी छूटी तो जीवन भर उसे सुकून के पल नहीं मिले। पति का अन्मयस्क व्यवहार, ससुराल का विचित्र माहौल, लम्बी बीमारी के बाद माँ की मौत जैसी दुर्घटनाएँ उसके जीवन की डगर पर लगातार काँटे बिछाती चलती हैं।

बरसों बाद जब धीरे धीरे पति का रुख़ शबाना के प्रति कोमल होते देखकर ये निश्चिन्तता होती है कि अब उसके दिन भी सुधरेंगे उसी समय एक आकस्मिक दुर्घटना में पति की मौत उसकी पूरी दुनिया तहसनहस कर जाती है। ससुराल से निर्वासित होकर मायके में उपेक्षापूर्ण जीवन जीना उसकी विवशता है। भाई और भाभी का अमानवीय व्यवहार उसे कुछ अरसे बाद पुनः विस्थापित होने पर बाध्य करता है। ज़िन्दगी की कठोर और खुश्क राहों पर इन दुर्दिनों का सामना बड़े साहस और धैर्य से शबाना करती है। संघर्ष के दिन धीरे धीरे बीतते रहते हैं। पर उसके भाग्य में सुख जैसे लिखा ही नहीं था।

उसकी बेटी एक दिन बीमार पड़ जाती है। सरकारी अस्पताल में हुए घटिया आरंभिक इलाज के कारण उसकी हालत इस क़दर बिगड़ती जाती है कि ज़िन्दगी और मौत के बीच की इस जंग में मौत का पलड़ा भारी पड़ने लगता है। उसे बचाने में शबाना अपना सब कुछ झोंक देती है। उसे बचाने की इस कोशिश में ही शबाना के साथ एक ऐसी घटना घटती है जिसके यूँ तो कोई खास मायने नहीं थे किन्तु उसके परिवार और जीवन के लिए वो घटना कालांतर में अभिशाप सिद्ध हुई।

यूसुफ़ रईस अपने इस उपन्यास के जरिये एक लेखक के रूप में हमें आश्वस्त करते हैं। उनकी शैली और कहन में ऐसी रवानी है कि यदि समय हो तो किताब एक बैठक में ख़त्म की जा सकती है। अनावश्यक विवरणों से बचते हुए वे पाठकों के धैर्य से खिलवाड़ न कर किसी विषय पर उतनी ही बात करते हैं जितना कथानक के लिए आवश्यक होता है। उनकी भाषा बेहद सरल और सहज है। हालाँकि उर्दू की व्यक्तिगत अज्ञानता के कारण मुझे कुछ शब्दों को बिना समझे कहानी के साथ आगे बढ़ जाना पड़ा। उम्मीद करता हूँ कि उनकी अगली किताब में हम जैसे कमजोर पाठकों के लिए शब्दार्थ की थोड़ी व्यवस्था ज़रूर होगी☺
यूसुफ़ साहब को इस पहली किताब की सफल प्रस्तुति के हार्दिक बधाई और आगामी रचनाओं के लिए शुभकामनाएं।
"मैं शबाना" की कुछ और पंक्तियों के साथ अपनी बात का समापन करता हूँ।

" शादी होते ही बेटी के लिए बाप का घर पराया हो जाता है और ससुराल का घर भी कभी उसका नहीं होता है। शादी के बाद औरत की ज़िन्दगी उस बंजारे जैसी हो जाती है, जिसका ऐसा कोई मुक़म्मल ठिकाना नहीं होता है, जिसे वो अपना ख़ुद का कह सके।"

शनिवार, 9 जून 2018

रामकुमार की नज़र से "एवरेस्ट हमसफ़र -- नीरज मुसाफ़िर"

"कह गये  है काफ़िले, इस ओर को जाते हुए
तू जिधर से चल पड़ेगा,वो समझ रस्ता हुआ "

(ज्ञान प्रकाश विवेक)

यात्रा या घुमक्कड़ी सुनने समझने में एक जैसे लगते हैं लेकिन इन दोनों में एक बड़ा मूलभूत अंतर है जो घुमक्कड़ी को यात्रा से अलग कर देता है। वह मूलभूत अंतर है- योजना का..
यात्रा हमेशा एक योजना से शुरू होकर निश्चित समयानुसार पूर्ण हो जाती है। कहाँ जाना है, कैसे जाना है, कहाँ ठहरना है, किससे मिलना है ,क्या देखना है जैसे सवाल उस योजना का हिस्सा होते हैं लेकिन घुमक्कड़ी "जो होगा देखा जाएगा " के मूल मूल मंत्र पर आधारित होती है। किसी प्रकार की कोई  योजना नहीं होती , बस किसी दिन बैग उठाया और निकल पड़े।

वैसे घुमक्कड़ी में भी कई बार मंजिल तय होती है । बस किसी तरह की योजना या रास्ते की तयशुदा तस्वीर नहीं होती। पगडंडियों से लेकर सवारी गाड़ी तक का इस्तेमाल करते हुए तय मंजिल पर पहुँच जाना ही ध्येय होता है। न ही रेल का आरक्षण न ही बस का ।किसी दूसरे हमसफ़र का साथ मिले या न मिले घुमक्कड़ निकल ही पड़ते हैं।

पिछले दिनों इसी तरह की घुमक्कड़ी वाली पूर्वोत्तर भारत यात्रा के दौरान कई पत्र पत्रिकाएँ और किताबों के बीच से गुजरने का मौका मिला। संयोग से मेरा फोन भी खो गया जिससे ध्यान भंग होने के अवसर ख़त्म हो गए और पढ़ने का उपक्रम निर्बाध चला । साथ मे जितनी पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं थीं, सब क्रमशः पढ़ ली गयीं। इसी क्रम में "नीरज चौधरी" की पुस्तक "हमसफर एवरेस्ट" के साथ अपनी यात्रा को जीवंत करने का मौका मिला। वैसे इस पुस्तक को पहली बार देखते ही इसे पढ़ने की ललक पैदा हो गई थी लेकिन मुम्बई की अपनी व्यस्तताओं में ये इच्छा बस ललक बनकर ही रह गयी।
पूर्वोत्तर की इस यात्रा ने आख़िरकार ये ख़्वाहिश पूरी कर दी। वैसे "नीरज चौधरी" किताबों के ऊपर अपना उपनाम "नीरज मुसाफिर " प्रकाशक से लिखवा लेते हैं। इसका कारण भी है, उनकी बेहतरीन मुसाफिरी। "लद्दाख" आदि जगहों की मुसाफिरी साइकिल से कर लेने का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर चुके हैं नीरज ।
यह पुस्तक भी इसी मुसाफिरी का बेहतरीन विवरण है। जैसा कि नाम से ही आभास हो जाता है कि यह एवरेस्ट पर्वत श्रृंखला से ही संबंधित होगी और इत्तफ़ाक़ से यह सत्य भी है। ये किताब "एवरेस्ट बेस कैंप" तक की यात्रा का विवरण है ।
दुनिया के सभी पर्वतारोहियों का स्वप्न होता है एवरेस्ट फ़तह और सभी ट्रैकरो का लक्ष्य होता है एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुँचना।
नीरज भी एक ट्रैकर हैं तो इनका भी लक्ष्य रहा बेस कैंप तक जाना।
इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यात्रा की एक निश्चित योजना बनाते हैं जो आगे चलकर घुमक्कड़ी में तब्दील हो जाती है और अपने आख़िरी दौर में फिर यात्रा बन जाती है।

पेशे से इंजीनियर होने के कारण एंड्रायड फोन/जी पी एस और गूगल बाबा का बेहतरीन उपयोग करते हुए कुल 27 दिन की इस यात्रा का आरंभ चार लोगों के साथ होता है, जिसमें स्वयं नीरज(मुसाफिर) दीप्ति(सहधर्मिणी) मोटरसाइकिल (सहचारिणी)और देवेंद्र कोठारी (हमसफ़र) शामिल हैं।

कुल 7 दिनों तक मोटरसाइकिल की यात्रा करने के बाद (या यूँ कहें कि जहाँ तक वो जा सकती थी) उसका साथ छूट जाता है। 11वे दिन कोठारी साहब भी साथ छोड़ देते हैं। वैसे तो किताब पढ़ते हुए पता चलता है कि श्री कोठारी बहुत हिम्मती और दृढ़ निश्चयी थे ,फिर भी उनका बीच रास्ते से लौटना हजम नहीं होता (कभी मिलेंगे तो जरुर पूछेंगे)।

सफर के दौरान हमसफ़र का साथ छूटना मानसिक रूप से बहुत कमजोर कर देता है, फिर भी नीरज और दीप्ति पूरी हिम्मत और तल्लीनता से अपनी यात्रा को जारी रखते हैं । ज़्यादातर यात्रा संस्मरणों में लेखक ऐतिहासिक बातों या घटनाओ का हवाला देते हैं जिससे कभी-कभी तो रोचकता बढ़ जाती है पर कभी-कभी इनकी अधिकता ऊब पैदा कर जाती है। इस पुस्तक में नीरज ने ऐतिहासिक तथ्यों को बिल्कुल स्थान नही दिया है। चाहते तो इन स्थानों के बारे में अपने ज्ञान का भव्य प्रदर्शन करते हुए एक एक पृष्ठ का विवरण ठूँस देते लेकिन किताब पढ़ने का रस फिर भंग हो जाता। ये लेखक का संयम और उसकी ताकत है कि पूरी किताब में  पाठकीय रस कभी भी कम नहीं होने पाता।

पूरी किताब प्रातः जगने से शुरू होकर बिस्तर में पहुँचने तक के बीच की घटनाओं का सिलसिलेवार विवरण है। जो देखा, जो अनुभव हुआ वही बिना लाग-लपेट के लिख दिया।
क्या खाया? क्या खरीदा? कितने का खरीदा? कहाँ विश्राम किया ?सब जस का तस लिख दिया।
यात्रा के दौरान बड़े मजेदार अनुभव भी मिलते हैं । जैसे खच्चर वाली ट्रेनों के बारे में, प्रथम एवरेस्ट विजेता एडमंड हिलेरी द्वारा बनाये  स्कूल , भोजपत्र के वृक्षों बारे में, पहाड़ों में रहने वालों के व्यवहार के बारे में पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम प्रत्यक्ष वहाँ की यात्रा कर रहे हैं । इस पुस्तक की एक बड़ी खास बात यह है कि यदि आप एवरेस्ट बेस कैम्प न जाकर किसी अन्य दुर्गम स्थान पर भी जाना चाहते हैं तो भी पगडंडियों से लेकर  होटल तक का उल्लेख मिल जाएगा। एक पथ प्रदर्शक की तरह यह किताब ठहरने और खाने-पीने के सामानों से लेकर एक बाल्टी गर्म पानी तक का मूल्य बता देती है।

इस किताब को पढ़ते हुए पहली बार यह पता चलता है कि एवरेस्ट मैराथन भी होता है । ये नीरज का  सौभाग्य है कि वे उसके प्रत्यक्ष गवाह बने हैं।

नए/पुराने ट्रैकरों के लिए  ढेर सारी बातें/ सूचनाएँ भी इस किताब में शामिल है जैसे ऊँचे पहाड़ों पर कैसी कैसी कठिनाई आती है और उससे बचने के रास्ते क्या क्या हैं..

 अपनी यात्रा के दौरान कई बार इन लोगों ने भी वापस लौट आने का मन बनाया लेकिन रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन फिर से अपनी मंजिल की ओर चल पड़े । इसी तरह इन बाधाओं को पार करते हुए अंततः वे बेस कैंप पहुँच ही जाते हैं।
इस पुस्तक में नीरज  ने बड़ी ईमानदारी से लिखा है कि इन 27 दिनों की यात्रा के दौरान एक बार भी एवरेस्ट का दर्शन नहीं कर पाए जबकि वे बेस कैंप तक पहुंच चुके होते हैं।
तो क्या कारण था? वह कौन सी परिस्थिति थी? जिसके कारण इतना करीब होकर भी एवरेस्ट की चोटी नहीं देख पाए ?
4000 मीटर पर स्थित झीलों का क्या आकर्षण होता है?
शून्य से भी नीचे के तापमान पर भी अपने को बचाते हुए कैसे फोटोग्राफी की जाती है? ये सब जानने के लिए  एक बार इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें और विशेष रूप से दीप्ति को उनकी हिम्मत के लिए बधाई अवश्य दें। जब 4000 मीटर पर उनके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया (अत्यधिक ऊंचाई पर पर्वतीय बीमारियाँ अपने प्रभाव का एहसास करा देती हैं ) उसके बाद उन्होंने नीरज का साथ नही छोड़ा।
इस दंपति को उनके साहस और सफल यात्रा के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं!!

" कभी-कभी पहाड़ों पर जाना जरूरी है, अपनी अक्षमताओं से तो वहाँ परिचय होता ही है, अपनी सीमाओं को स्वीकारने की दृष्टि भी बनती है"**** कुमार रविंद्र

पुस्तक-हमसफ़र एवरेस्ट
लेखक-नीरज मुसाफिर
प्रकाशक-हिंदी युग्म
मूल्य-150
पृष्ठ-220

सादर
रामकुमार
hindikitab@gmail.com

बुधवार, 30 मई 2018

फिर वापसी... राजेन्द्र श्रीवास्तव

कहानी

शीर्षक : फिर वापसी...

रचनाकार : राजेन्द्र श्रीवास्तव

 

फिर वापसी...

 

दफ्तर का आखिरी दिन है। रिटायर हो रहा हूं। सोचकर बड़ा अजीब लगता है कि कल से इन कार्यों और जिम्‍मेदारियों से कुछ लेना-देना नहीं। जबकि कल तक तो लगता था कि जरा सा ध्‍यान नहीं दिया अगर मैंने, तो पता नहीं क्या हो जाए। कहीं कंपनी बंद ही न हो जाए। जैसे मैं ही चला रहा हूं पूरी कंपनी! काम को लेकर हर समय भाग-दौड़। काम में परफेक्‍शनिस्‍ट भी माना जाता रहा हूं। अपने मातहतों से भी मेरी अपेक्षाएं बहुत अधिक रही हैं। खुद देर रात तक रुककर और छुट्टियों के दिन भी दफ्तर आकर काम में जुटा रहता हूं। आप समझ सकते हैं कि छुट्टी के दिन मैं अगर दफ्तर में मौजूद रहा, तो विभाग के कर्मचारियों को भी मजबूरी में आना ही पड़ेगा। वह भी बिना किसी ऑफिस ऑर्डर के।

 

बड़ा खराब उदाहरण है, मगर बता देता हूं। कुछ सहकर्मी मित्र सीधे मुंह पर मेरे कहते हैं कि चलती बैलगाड़ी के नीचे जो कुत्‍ता चलता रहता है, उसे यही लगता है कि बैलगाड़ी उसके कारण ही चल रही है। वो रुक गया, तो सब कुछ रुक जाएगा।

 

मेरे अधीन कार्यरत कर्मचारियों की यह भावना है कि ये तो छड़ा आदमी है। पत्‍नी इसकी मर चुकी है। बेटा घर बसा के दिल्‍ली में रहता है। तो समय बिताना ही इसकी समस्‍या है, देर रात तक दफ्तर में न बैठे और छुट्टी के दिन भी ऑफिस न आए... तो टाइम कैसे पास हो इसका।

 

मेरे समीकरण अलग थे। काम को केवल निपटाने की बजाए बेहतर तरीके से करना तो खैर आदत की बात थी,लेकिन उच्‍चाधिकारियों को प्रसन्‍न रखना, काम को लेकर अनावश्‍यक अपमान या डांट से बचना, असुविधाजनक केन्‍द्रों पर स्‍थानांतरण को टालना, अपने हिस्से का प्रमोशन समय पर पाना और सबकी नज़रों में जिम्मेदार अधिकारी के रूप में छवि बनाए रखना आदि कारण मुख्‍य थे।

 

बावजूद इन सब बातों के सहकर्मियों का बड़ा सम्‍मान मिला मुझे। दरअसल किसी को कभी परेशान करने की भावना से कोई काम नहीं किया मैंने। प्रशासनिक निर्णयों को छोड़ दें, तो किसी का बुरा नहीं किया। इससे भी बढ़कर यह कि किसी का बुरा नहीं चाहा मैंने। अधिकतम सुविधाएं प्रदान करने और अपने मातहतों की हर मुश्किल में उनके साथ डटकर खड़े होने के मेरे व्‍यवहार के कारण आज मेरी विदाई के दिन सभी ग़मगीन हैं।

 

कैम्‍पस सिलेक्‍शन द्वारा मार्केटिंग डिपार्टमेन्‍ट में लगभग 30 लोगों की युवा टीम का चयन मैंने किया था। वे हाथ जोड़ रहे हैं। एक-दो लड़कियां अपने आंसू पोंछ रही हैं। यकीन मानिए, कुछ मेरे पैर भी छू रहे हैं। एक ब्‍लेजर मुझे अपने विभाग की तरफ से दिया है उन्‍होंने।

 

मैं बहुत भावुक किस्‍म का व्‍यक्ति हूं, किंतु हमेशा ऊपर से सामान्‍य दिखने की कोशिश करता हूं। पर हकीकत यही है कि आज खुद को नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है। पत्‍नी की याद बहुत आ रही है। वैजयंती जीवित होती तो आज के दिन की बात ही कुछ और होती। कई बार हम रिटायरमेन्‍ट के बाद की सुखद योजनाओं पर चर्चा करते थे। इसमें मेरा देर तक सोना, मन भर कर किताबें पढ़ना,फिल्‍में देखना और यात्राएं आदि आदि बहुत कुछ शामिल था।

 

पत्‍नी को भी मेरे देर तक काम से शिकायत थी। कभी-कभी छोटे बच्चे की तरह मुंह भी फुलाती थी, लेकिन समर्थन पूरा था। कहने में संकोच नहीं कि मेरा बड़ा ध्‍यान रखती थी। ‘केयरिंग’ शब्‍द ही सटीक होगा। कंपनी की अपनी कैन्‍टीन है। एग्जिक्यूटिव्स के लिए भोजन की व्‍यवस्‍था है, लेकिन सुबह नौ बजे हर दिन मेरा डब्‍बा तैयार रहता था। मजे की बात देखिए... शाम का नाश्‍ता भी होता डब्‍बे में। कभी सूजी का हलवा, कभी फलों की चाट, बेसन का चिल्ला, कभी निमकी, ठेकुआ या कभी पिट्ठा । ‘सो क्‍यों भई?’ ‘नहीं, आपको घर आने में देर होती है, तो शाम को कुछ खा लिया कीजिए।’ बीमार हो या कोई और मजबूरी... मुझे याद नहीं कि पत्नी के रहते मैंने कैन्‍टीन का खाना कभी खाया हो। देहांत के एक दिन पहले तक उसने खाने का डब्‍बा दिया था।

 

वैजयंती कई बार कहती, “इतने मन से इतना बड़ा मकान बनवाया हमने, पर इसमें रह भी नहीं सकेंगे…।” घर बड़ा था। सामने की तरफ छोटा सा बगीचा था, जिसमें फूलों की कुछ किस्‍मों के साथ-साथ पत्‍नी  ने तुरई, धनिया, पालक, टमाटर आदि सब्जियां बो दी थीं। बाईं ओर लगकर आउटहाउस था, जिसमें बाबूजी के समय से गांव से आकर बड़ा हुआ नौकर और उसकी घरवाली रहते थे।

 

“इस घर में थोड़े ही रहना है, हमें तो बच्चों के साथ ही रहना है। जहां अपना अमोल, वहीं हम... ” उसके स्वर में एक काश-भाव होता और बेटे के साथ रहने के सुख की अव्यक्त खुशी भी।

 

मैं हंसता – “जानती हो, क्‍या चल रहा है दुनिया में? आज के बच्चे मां-बाप का झंझट पालना ही नहीं चाहते। उनकी अपनी दुनिया है और इसमें किसी का हस्तक्षेप उन्हें पसंद नहीं। इतने वृद्धाश्रम खुल रहे हैं। वो तो गनीमत है कि लोन लेकर ये मकान बनवा लिया है।”

 

“चुप रहिए,” पत्नी तुनक जाती – “अपना अमोल रह ही नहीं सकता हमारे बिना। हीरा है अपना बेटा तो...”

 

“वो ‘वापसी’ कहानी सुनाई थी ना तुम्‍हें। गजाधर बाबू वाली। कैसे थोड़े दिन में ही परिवार से अलग होकर अकेले रहने को मजबूर हो जाते हैं? ”

 

“आपकी किताबों में सब बुरा ही बुरा क्‍यों रहता है जी, ”वैजयंती अब सचमुच नाराज    होती - “कोई अच्‍छी बात इन लेखकों को दिखाई नहीं देती?”

 

“लेखक तो वही लिखता है, जो दुनिया में देखता है। रिश्तों की ऊष्मा में कमी और संवेदनशून्य होता मनुष्य। यही आज के समय की सबसे बड़ी सच्चाई है। अब तुम सच से ही परहेज करने लगो, तो बड़ी मुश्किल है। सच होता ही है कड़वा... ”

 

“रहने दीजिए आपका किताबी सच... और आज के समय को क्यों दोष दें भला? अच्छे-बुरे दोनों तरह के लोग हर दौर में होते हैं...” पत्नी पटाक्षेप के भाव में कहती।

 

“अब अमोल की बीबी वैसे तो कितनी भली है...पर साथ-साथ रहने पर ही सब पता चलता है...”

 

और कैसे रहा जाता है साथ? कितनी बार तो हम गए हैं दिल्‍ली... कितनी बार तो वो लोग आकर रहे हैं यहां। हर दूसरे-तीसरे दिन खुद फोन करती है प्रियंका। कोई तीज-त्‍यौहार नहीं छूटता...किस्‍मत वालों को ही ऐसी लड़की मिलती है...” पत्‍नी के स्‍वर में प्रार्थना का-सा भाव है कि जो वह कह रही है सच ही निकले।

 

मैं उसे तंग करता – “तुम्‍हें किस बात की चिन्‍ता है। रघु काका और सुलक्षणा तो हैं ही हमारे केयर के लिए यहां...”

 

“आप भी ना... मुझे तो अगर वो मालविका मिल जाए, ‘वापसी’ कहानी की राइटर, तो मैं कहूं कि भई हमारे अमोल पर भी एक कहानी लिखिए, श्रवणकुमार को ध्‍यान में रखकर…”

 

“मालविका नहीं प्रियंवदा...”

 

“हां, वही। प्रियंवदा...”

“उषा प्रियंवदा... नाम तक तो याद नहीं तुम्‍हें कहानीकार का ठीक से, कहानी के भाव क्‍या  समझ में आएंगे तुम्‍हें...?”

 

“खूब याद है कहानी, पर अपना अमोल तो लाखों में एक है और प्रियंका भी वैसी ही     है... लाssखों में एक !”वैजयंती शब्द को खींचकर पूरे विश्वास से कहती।

 

पत्‍नी को मैं चिढ़ाने भर के लिए यह सब कह रहा था। मुझे खुद इतमीनान था। बेटा घर से जुड़ा था और पिछले दस सालों में बहू भी परिवार में घुल मिल गई थी। परिवार से उनका लगाव हम महसूस कर सकते थे। प्रियंका ने एमबीए किया था। दिल्‍ली में ही एक फर्म में काम करती थी। उनके दोनों बच्‍चे, जुड़वां, ईशा और आदी, स्‍कूल जाने लगे थे।    

 

मुझे दो साल पहले की दुर्घटना भी याद आ गई। दुर्घटना के बाद वैजयंती की मौत से कुछ घंटे पहले, पहली फ्लाइट लेकर भागते-दौड़ते दोनों बच्‍चे अस्‍पताल पहुंचे थे। प्रियंका ने अपनी सास का हाथ पकड़ा तो मुझे लगता है कि उसकी मौत के बाद ही छोड़ा। अमोल तो सकते में था। वैजयंती ने मुझसे अपने कंगन मंगवाए थे। जड़ाऊ कंगन थे। कुंदन पर नफासत से मीनाकारी की गई थी। बड़ी वाली अलमारी में एकदम सहेजकर रखे हुए। त्यौहार या विशेष मौकों पर वैजयंती ये कंगन पूजा में रखती थी। मैं रक्‍तविहीन चेहरे के साथ उसका हर कहा पूरा कर रहा था।

 

अपने असह्य दर्द को दबाकर हंसी थी वैजयंती। एक चमक उभरी थी उसकी आंखों में।

 

“ये कंगन पहन ले बेटा, मेरे बाद ये अब तेरे पास रहने चाहिए... संभाल कर रखना हमेशा इन्‍हें... ” प्रियंका को पहनाने लगी थी कंगन। बड़ा अजीब लग रहा था। अस्‍पताल में यह सब।

 

“पागल हो गई हो क्‍या...” मैंने नाराजगी दिखाने की असफल कोशिश की, “हुआ ही क्‍या है तुम्‍हें?”

 

“आप नहीं समझेंगे,” वैजयंती की हंसी में पीड़ा छुपी हुई थी, लेकिन आंखों की चमक बरकरार     थी - “ये कंगन अम्‍मा जी ने मुझे दिए थे... वैसे रुपयों में लगाई जा सकती है इनकी कीमत। पर हैं ये अनमोल। कितनी बार जरूरत पड़ी पैसों की...पर मैंने बेचा नहीं कभी। जी कड़ा करके जतन से संभाल कर इन्‍हें रखा है। अब प्रियंका को सौंपती हूं ये विरासत...”

 

मैंने मुंह चढ़ा लिया – “ज्यादा फिल्मी स्टाइल मत दिखाओ। अब दो दिन में ठीक हो जाओगी... बकवास क्‍या कर रही हो तुम... फिर वापस मांगेगी न बेटा, तो करना मत वापस ये कंगन... ”

 

वैजयंती अब खुल कर हंसी थी। जोर से। उसकी हंसी में यह भी था कि बहलाओ मत मुझे।

 

इस घर को छोड़ते हुए उसकी हंसी अब भी मेरे कानों में गूंज रही है। रघु काका और उसकी घरवाली सुलक्षणा दोनों रो रहे थे –

 

“ऑफिस छूटा तो आप हम लोगों को भी छोड़ दे रहे हैं मालिक...”

 

“नहीं, नहीं, रघु काका...दिल्‍ली में बच्‍चे हैं... ईशा और आदी हैं...फिर मैं तो आता-जाता रहूंगा। घर है इतना बड़ा। किताबें हैं मेरी इतनी। कहां जाऊंगा ये सब छोड़कर।”

 

दोनों हाथ जोड़े खड़े थे।

 

आंखें मेरी भर आई थीं। दोनों ने इतने बरसों से हमारी निःस्वार्थ सेवा की थी। घर के सदस्य जैसे ही थे दोनों। मैंने बात बदलकर  कहा – “इस बार तुरई खूब अच्‍छी हुई है, लताएं छत पर चढ़ गई हैं... बगीचे में पानी रोज देना रघु काका। इतवार वाले दिन घर खोलकर भीतर से साफ करना...अपना खयाल रखना...”

 

दिल्‍ली में बच्‍चों ने मुझे घेर ही लिया। अमोल बड़ा नाराज हुआ। बस से आने की क्‍या  जरूरत थी? इतनी गर्मी है। बारह घंटे का रास्‍ता। फ्लाइट है जबकि। आदि आदि।

 

फ्लैट खूब बड़ा था। तमाम आधुनिक सुख-सुविधाओं से संपन्‍न। पिछले साल ही यह फ्लैट खरीदा है अमोल ने। अमोल और प्रियंका दोनों काम पर निकल जाते हैं और देर रात लौटते हैं। ईशा और आदी स्‍कूल के बाद शाम को घर आ जाते थे। तब थोड़ा समय उनके साथ बिता लेता था।

 

कई बार ‘वापसी’ के गजाधर बाबू विचारों के प्रदेश में एक कोना हथिया लेते। मुझे बड़ी हंसी आती। आखिर क्या हो गया है सोच को। भला यह भी कोई बात हुई। लेकिन हकीकत यही थी कि यहां रहते हुए मैंने कई बार गजाधर बाबू की छोटी-छोटी बातों से तुलना की।

 

मुझे बड़ा सा कमरा दिया गया था। डेढ़ टन का ए.सी. लगा था कमरे में। लकड़ी का कस्टमाइज्ड पलंग काफी बड़ा था। स्याह-मरून रंग। यह पेन्ट नहीं था, लकड़ी का स्वाभाविक रंग था। एक मेज-कुर्सी भी थी कमरे में, जिस पर सुंदर सा टेबिल-लैम्प भी था। मेरी देर रात तक लिखने-पढ़ने की आदत बेटा खूब जानता है। कर्ल-ऑन के आरामदेह गद्‍दे पर लेटते समय मुझे गजाधर बाबू की पतली-सी चारपाई का ध्यान आ जाता। बैठक में चारपाई डालकर किसी मेहमान की तरह उनके रहने का अस्थायी प्रबंध किया गया था।

 

गजाधर बाबू को गाढ़ी मलाईदार और खूब मीठी चाय पसंद थी। अपने परिवार के साथ रहते हुए गरम पूरियों और जलेबी की भी याद गजाधर बाबू को आई थी। अब गजाधर बाबू की फीकी चाय से मैं तुलना इसलिए नहीं करता था, क्योंकि एक तो मुझे डॉक्टर ने वैसे ही कम दूध और कम चीनी की हिदायत दे रखी है। दूसरे पूरी तो मैं खा ही नहीं सकता। बिना   तेल-घी की सादी रोटी। मैं अब जाकर कहानी के इस मर्म को समझ पाया कि उनके विस्थापन में परिवार की आर्थिक स्थिति की बड़ी भूमिका थी। यानी कि लंबी दाढ़ीवाला महान विचारक इस कहानी में भी घुस गया था। संतोष हुआ कि बेटा-बहू दोनों आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं और मेरी भी अपनी जमा-पूंजी है। किसी पर वैसे निर्भर नहीं मैं!

 

वापस ‘वापसी’ पर आता हूं। गजाधर बाबू परिवार का हिस्सा ही नहीं बन पाए और उनकी राय को महत्व भी नहीं दिया जाता था। ग़नीमत है कि यहां प्रियंका और अमोल अपने दफ्तर के कार्यों में भी मुझसे सलाह-मशविरा करते थे। रही बात अपने ही घर में अजनबी और अस्तित्वहीन हो जाने के बोध की, तो भई मेरे मामले में यह विकल्प ही नहीं था। कुछ  कम-ज्यादा हो मेरे साथ, तो मैं खुद भी एडजस्ट कर लेता हूं और मेरी किताबें तो रहती ही हैं मेरे साथ।

 

वैजयंती के कहे पर तो मुझे पहले ही यकीन था। अब पुख्ता हो गया। वैजयंती कहती थी कि हम तो अपने बनवाए घर में रह ही नहीं पाएंगे। जहां हमारे बच्चे वहीं हम। लेकिन अब उसे कैसे बताऊं कि चैन से बच्चों के साथ रहते हुए भी उषा प्रियंवदा की कहानी से पीछा ही नहीं छूट रहा।

 

सोमवार को मैं सुबह जल्‍दी उठ गया था। नहा-धोकर ड्राइंग रुम में आ गया। बच्‍चे अभी स्‍कूल के लिए निकले नहीं थे। कामवाली ने नाश्‍ते के लिए दो बार पूछा था। चाय के लिए भी। मैंने मना कर दिया था। प्रियंका और अमोल साथ ही अपने कमरे से निकले। कुछ हड़बड़ी में। दोनों रोज साथ ही जाते थे। प्रियंका के फर्म पर उसे ड्रॉप कर अमोल अपने ऑफिस चला जाता था।

 

“नाश्‍ता कर लिया पापा आपने...” प्रियंका ने सहज भाव से पूछा और उत्‍तर की प्रतीक्षा किए बिना दोनों बाहर निकलने लगे। प्रियंका के स्वर में प्रश्न जैसा कुछ नहीं था।

 

“बेटा मैं...” मैंने कुछ कहना चाहा। पता नहीं अनुरोध अथवा याचना।

 

“पापा... कुछ दोस्त भी आ रहे हैं, आपके साथ नाश्ता नहीं कर सकते...” अमोल बोला - “हमें आज नरूला में नाश्ता करना है... मेड ने बताया नहीं आपको? ”

 

मेरे कलेजे में हूक-सी उठी। कुछ हिचक कर, मानो अपराध कर रहा हूं, मैंने कहा – “आज तेरी मां की बरसी है बेटा, तो पूजा नहीं करेगा...

 

अमोल सिटपिटा गया – “ध्‍यान है पापा मुझे ! रात में भी हमने इस पर बात की थी। है ना प्रियंका?”

 

प्रियंका ने जोर से सिर हिलाया।

 

“पूजा क्‍या करनी है पापा…!” अमोल ने बात आगे खींची – “और आप कब से पूजा-पाठ में विश्‍वास करने लगे पापा। आप तो मां पर भी नाराज होते थे व्रत वगैरह रखने पर... ”

 

“पूजा...मतलब, पूजा की क्या बात? हां, मां की फोटो पर हार चढ़ा लेते। समझ रहे हो ना? अगरबत्‍ती दिखा देते... और क्‍या? ”

 

“अब पापा! ये तो दिल्‍ली है। और वो भी इतनी पॉश कॉलोनी। यहां कहां सुबह-सुबह फूल-हार मिलेगा? मैं शाम को लेता आऊंगा। अभी देर हो रही है हम दोनों को।” अमोल ने जल्दबाजी में कहा।

 

बाहर जाते हुए प्रियंका ने कहा – “आप ध्‍यान रखिए अपना... और नाश्‍ता कर लीजिएगा पापा... टेबल पर ढंककर रख दिया है।”

 

मैंने नि:श्‍वास छोड़ी। ये बच्‍चे भावनाओं को समझना ही नहीं चाहते। और हर समय जल्‍दी। पर बेचारे क्‍या करें। महानगर की भागदौड़ और आपाधापी।

 

खैर! मैंने बालकनी का दरवाजा बंद किया। फ्लैट से बाहर निकलकर ताला लगाया फ्लैट को। ग्राउंड फ्लोर पर आने के बाद काफी देर पता नहीं क्या सोचता रहा। फिर सोसायटी के वाचमैन से पूछ कर एक आटो-रिक्‍शा पकड़कर मैं बसंत-कुंज पहुंच गया। हार-फूल और अगरबत्‍ती का पैकेट लेकर लौटा तो ग्‍यारह बज चुके थे।

 

वैजयंती फोटो में मुस्‍करा रही थी। उसकी आंखों में चमकीलापन था। मुझे लगा कि वह पूछ रही है कि नाश्‍ता क्‍यों नहीं किया अब तक। पूछ सकती तो ज़रूर पूछती। उसे पता जो था कि मैं नौ बजे तक तो छटपटा जाता हूं भूख से।

 

बड़े जतन से मैंने फोटो को साफ कपड़े से पोछा। हार चढ़ाया। फूल रखे सामने। अगरबत्‍ती जलाकर बैठा रहा वैजयंती के सामने। लगा कि वो भी मेरे साथ बैठी हुई है।

 

दोपहर चढ़ रही थी। खाने की इच्‍छा न होने पर भी मैंने मुंह जुठाया।

 

रात को अमोल और प्रियंका देर से लौटे। डिनर पार्सल करा लाए थे। मैंने कहा कि मैंने फोटो पर हार चढ़ा दिया है। तुम लोग मां को प्रणाम कर लेना।

 

ईशा और आदी ने पार्सल खोलकर चिकन टिक्‍का निकाल लिया था और चाव से खा रहे थे।  

 

मैं निष्‍प्रभ रहा - “बेटा आज नॉनवेज क्‍यों खा रहे हो, मां की बरसी है आज तो!”

 

प्रियंका ने कहा – “पापा हम नहीं खा रहे, ये तो बच्‍चों के लिए लाए हैं। कल दोनों को बाहर नहीं ले जा सके थे। संडे था कल फिर भी...”

 

मैं चुप रहा।

 

अमोल ने कहा – “पापा, आप तो कहते थे कि मनुष्‍य का प्रारंभिक भोजन तो मांस ही था। खेती तो बहुत बाद में सीखा मनुष्य ने। फिर आज नहीं खा सकते हैं, कल खा सकते हैं, इन बातों का क्या मतलब...अपने सारे सिद्धांत क्‍यों बदल रहे हैं आप...?”

 

“सिद्धांत!” मैं शांत भाव से हंसा - “तुम खा लो बेटा, मैं तो यूं ही कह रहा था।” मुझे भी लगा कि किन निरर्थक बातों पर मेरा ध्यान जा रहा है। ऊलजलूल बातों में उलझ रहा है मन। प्रियंका से कहा मैंने - “बेटा मां को प्रणाम कर लो और अपने कंगन ले आओ। मां के सामने रख दो कुछ देर।”

 

प्रियंका कंगन का जोड़ा लेकर आई भीतर से।

 

“नहीं, ये कंगन नहीं बेटा, वो जो मां ने तुम्‍हें दिए थे। मां पूजा में वही कंगन रखती थी...” कुछ बेचैन होकर मैंने कहा।

 

“पापा वो कंगन सोने के थे, लेकिन आउटडेटेड थे। बिलकुल ऑर्डिनरी... और कीमत भी कुछ खास नहीं थी। मैंने कुछ पैसे मिलाकर उन्‍हें बदलकर पूरा सेट ले लिया। हमारे देश में तो पापा, जीवन भर किसी उपयोग में नहीं लाते लोग सोना चांदी। सिर्फ सेफ में भरकर    रखते हैं।”    

 

मैंने अमोल की ओर देखा। अमोल खीझ गया – “आप क्‍यों परेशान हो रहे हैं पापा? अभी आप मेरे लैपटॉप पर देख लीजिए। सब कुछ ऑनलाइन उपलब्ध है। एक से बढ़कर एक कंगन मिल जाएंगे। आप अपनी पसंद से ऑर्डर कर दीजिए। और पैसों की चिंता मत कीजिएगा। दो-चार लाख के गहने तो प्रियंका की ही हैसियत है खरीदने की।”

 

“पापा का मन आज ठीक नहीं है,” प्रियंका अमोल से बोली, “कल आप छुट्टी ले लीजिए ऑफिस से…और उन्‍हें घुमाने ले जाइए।”

 

अगले दिन सुबह मैं अपने कमरे से बाहर आया। मैंने अपना बैग रात को ही पैक कर लिया था। अमोल और प्रियंका चौंक गए। यह उनके लिए अप्रत्याशित था।

 

“बात क्‍या है पापा?” अमोल ने ‍उद्विग्न स्वर में पूछा।

 

“कुछ नहीं बेटा! जाऊंगा। घर बड़े दिनों से छूटा हुआ है।”

 

“फिर क्‍या हुआ, रघु काका हैं ना वहां देखभाल के लिए...”

 

“जाना होगा बेटा” मैंने ठंडे स्वर में कहा।

 

“पापा को मां की याद आ रही है।” प्रियंका थूक गटककर बोली।

 

“मैं तो आता-जाता रहूंगा बेटा। दस-बारह घंटे का तो रास्‍ता है। और हवाई जहाज से तो घंटे भर में तुम्‍हारे पास!”

 

“सो तो ठीक है पापा... थोड़े दिन रुक जाते अभी…” बहुत मुश्किल से कह पाया अमोल।

 

“नहीं बेटा। अभी सुबह बस मिल जाएगी। रात तक मैं घर पहुंच जाऊंगा।” मैंने ईशा और आदी को प्‍यार किया।

 

अमोल मेरे आवाज की दृढ़ता को पहचानता है।

 

उसने बैग उठा लिया और निःशब्द मेरे साथ बाहर के दरवाजे की ओर बढ़ा।

 

XXX

 

 

राजेन्द्र श्रीवास्तव

सहायक महाप्रबंधक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र , प्रधान कार्यालय,

लोकमंगल, शिवाजीनगर,  पुणे – 411005  

फोन   : मोबाइल - 09604641228

सिनारिओ : शेखर जोशी

  कहानी सिनारिओ : शेखर जोशी     अपना सफरी थैला , स्लीपिंग बैग और फोटोग्राफी का भरपूर सामान लेकर जब वह गाँव पहुँचा , सूर्यास्त का समय...