शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

कजरी : अवधेश प्रीत

कजरी : अवधेश प्रीत

कजरी की हालत अब देखी नहीं जा रही।
रात जैसे-जैसे गहराती जा रही है फजलू मियां की तबीयत डूबती जा रही है। वह इस बीच कभी घर के भीतर तो कभी बथान तक कई चक्कर लगा चुके थे। जब भी वह बथान तक जाते थम कर खड़े हो जाते। कजरी उन्हें सर उठाकर देखती और वह लक्ष्य करते कि उसकी आंखें पनियायी हुई हैं। उनका दिल धड़क उठता और वह गहरी उदासी में डूबे कजरी का सर सहलाते। कजरी चुपचाप सर झुका लेती। वह मन ही मन बुदबुदाते, 'कजरी मेरी समझ में नहीं आ रहा क्या करुं। कैसे तेरी तकलीफ दूर करुं? तू ही बता क्या करुं?’

कजरी क्या बताती? वह बता पाती तो शायद बताती कि फजलू मियां मेरी समझ में आ रहा कि मैं तुम्हारी तकलीफ कैसे दूर करुं? कैसे कहूं कि हम दोनों का दु:ख साझा है। कैसे बताऊं कि हम दोनों एक-दूसरे को इस तकलीफ से मुक्त करना चाहते हैं। लेकिन कैसी विवशता है कि हम दोनों कुछ नहीं पर पा रहे।

ऐसा नहीं है कि फजलू मियां ने कुछ करने में कोर-कसर बाकी रखी। जिस दिन सईदा का इंतकाल हुआ, उस दिन वह खुद ही बेहाल थे। शाम तक उसकी मैय्यत की तैयारी होती रही। लोग बाग आते रहे। उन्हें तसल्ली देते रहे। वह खामोश, सूनी आंखों से कभी सईदा का सफेद, बेजान चेहरा देखते, तो कभी सुबक-सुबक कर रोते। तीस सालों का साथ सईदा ने एक झटके में छोड़ दिया था और वह एकबारगी निहायत अकेले हो जाने के सदमें में उभचुभ होते रहे थे। जनाजा उठने से कुछ देर पहले ही सईदा के मायके से उसका भाई अबुल आया था। उसके गले लगकर वह जोर-जोर से रो पड़े थे। अबुल ने उन्हें बड़ी मुश्किल से संभाला था। पड़ोसी बुजुर्गों रहमत अली, मुख्तार मियां ने खुदा की मर्जी का हवाला देते हुए जनाजा उठाने की ताकीद की थी। कलेजे पर पत्थर रखकर फजलू मियां ने आखिरी बार सईदा को कातर निगाहों से निहारा था और फफककर रो पड़े थे। ऐन इसी वक्त कजरी ने जोर-जोर से रंभाना शुरु कर दिया था। वह खूंटे से बंधी बथान पर उछल-कूद करने लगी थी। लगा था कि पगहा तुड़ाकर ही मानेगी। दुपट्टे में मुंह छुपाकर अपनी सिसकी दबाये रमजान मियां की बीवी अतिया ने आह भरी थी, ''देखो तो, सईदा खाला के लिए कजरी भी तड़पी जा रही है।’’

 

उस वक्त किसी को कजरी की फिक्र नहीं थी। शाम ढलने से पहले कब्रिस्तान पहुंचने की जल्दबाजी में सभी निकल गये थे। पीछे कजरी का रंभाना आर्तनाद में बदलता गया। खूंटे में बंधी वह कब तक छटपटाती रही थी, फजलू मियां नहीं जान पाये थे। वह तो देर रात तक रुंआंसे मन, भारी कदमों से लौटे थे, उनकी नजर कजरी पर पड़ी थी और उनका दिल धक्क कर गया था। नाद में रखा चारा जस का तस पड़ा था। लगता था, उसने उसमें मुंह तक नहीं मारा था। वह सिर गोते गुमसुम पड़ी थी। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि वह घर लौटे हों और उसने रंभाना न शुरु किया हो। वह जब तक उसके पास जाकर, उसके सिर पर हाथ नहीं फेरते, वह चुप नहीं होती। लेकिन, इस वक्त वह चुप ही नहीं,बेहरकत भी थी। वह दबे पांव कजरी के पास गये थे। उनके कदमों की आहट से कजरी ने सर उठाया था। चांदनी रात की उस उजास में उन्होंने गौर किया था, कजरी की आंखों में आंसू थे। वह भीतर तक तड़प उठे थे। कजरी के पास बैठकर, उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उनका गला रुंध गया था, 'हम दोनों को सईदा छोड़ गई कजरी।’ आगे कुछ बोलना मुहाल हो गया था. उनकी सिसकी फूट पड़ी थी।

अबुल ने समझा-बुझा कर फजलू मियां को उठाया था। फजलू मियां की आह निकल पड़ी थी, 'अबुल भाई, सईदा और कजरी की जान एक-दूसरे में बसती थी। जब से कजरी आई, सईदा उसका ऐसे ख्याल रखती जैसे कोई अपने बच्चे का ख्याल रखता है। रात में भी कई-कई बार उठकर देखती कि कजरी ठीक तो है। टाइम पर उसका सानी-पानी,खरहरी से लेकर नहलाने-धुलाने तक एक पैर पर खड़ी रहती।’

अबुल चुपचाप सुनते रहे थे गोया फजलू मियां के गम को यंू ही बह जाने देना चाहते हों। फजलू मियां अपनी रौ में बोले जा रहे थे, 'हम सईदा को कभी-कभी टोकते तो वह हंसकर कहती, अकेले जी हलकान करने से तो बेहतर है कि कजरी में ही मन लगा रहता है। उसकी देखभाल से बड़ा सुकून मिलता है। मैं समझ गया था कि सईदा ने औलाद की कमी का गम कजरी की देखभाल में गलत करने का तरीका निकाल लिया है। बस, मैंने भी टोक-टाक करना छोड़ दिया था। और देखों, आज सईदा के बगैर कजरी भी अनाथ हो गई है।’

अबुल भी बहन की मौत से कम गमजदा न थे। लेकिन इस वक्त बहनोई की बेजार हालत देखी नहीं जा रही थी। कंधे से झिंझोड़ते हुए तसल्ली देनी चाही थी, 'भाई जान सब्र रखिए। खुदा की मर्जी के आगे किसी की कहां चलती है।’

'सही कहते हो, अबुल। खुदा ने सईदा का साथ बस इतने ही दिन के लिए मुकर्रर किया था। खुदा उसे जन्नत बख्शे। आमीन।’ जैसे खुद को ही तसल्ली देने की कोशिश की थी फजलू मियां ने।

अबुल चालीसवां में आने को कहकर अगले ही दिन चला गया था। उसके जाते ही घर की तन्हाई भांय-भांय करने लगी थी। जिस घर-बाहर सईदा की मौजूदगी से रौनक रहा करती थी, वहां बेतरह सन्नाटा छा गया था। बीच-बीच में कोई मातमपुर्सी के लिए आता, थोड़ी देर रुकता और चला जाता। लेकिन ताज्जुब कि सन्नाटे में कोई जुंबिश नहीं होती,मानो सईदा के साथ ही वक्त ने धड़कना बंद कर दिया हो। फजलू मियां को तो कभी-कभी लगता कि कहीं किसी कोने में सईदा नमूदार होगी और उन्हें यूं गुमसुम देख टोक बैठेगी, 'कजरी का नाद खाली है, इतना भी नहीं देख सकते।’

नहीं, सईदा नहीं है। लेकिन यह टोकना तो सईदा का ही है। वह चिंहुककर कजरी की ओर देखते हैं। नाद में सानी भरा है। कजरी सिर गोते बैठी है। उन्हें याद आता है, सानी तो रात में ही डाला था। अभी तक जस का तस पड़ा है। कजरी ने सानी को मुंह तक नहीं लगाया है, 'या खुदा, इस कजरी को क्या हुआ? ये कब तक सोग मनायेगी?’

फजलू मियां तड़पकर उठते हैं और लपककर कजरी की नाद तक जाते है। सानी को उलटते-पलटते हैं। बगल वाली नाद में पानी नहीं है। फुर्ती से बाल्टी उठाते हैं। पानी भरकर नाद में डालते हैं। मन छछन जाता है, 'पता ना कब से पानी ना पिया बेचारी ने।’

नाद भरते ही कजरी उठती है और मुंह गोतकर पानी पीने लगती है। फजलू मियां कलपकर रह जाते हैं। अपराध बोध से भरे कजरी को थपथपाते हैं, 'माफ करना, बेटा भूल हो गई। सईदा के गम में तुम्हारा ख्याल ही नहीं रहा।’

यह माफी वह कजरी से मांग रहे थे या सईदा से, यह उनके लिए समझना आसान नहीं था। लेकिन सईदा के पीछे कजरी का ख्याल न रख पाने का मलाल, सईदा को ही तकलीफ पहुंचाने जैसा गुनाह था। मन ही मन इस गुनाह से तौबा का संकल्प लेते हुए उन्होंने  कजरी को टिटकारा 'चल कुछ खा ले, ना तो सईदा गुस्सा करेगी।’

कजरी ने चारा वाली नाद की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखा। फजलू मियां हताश अपनी खटिया पर लौट आये। खाना तो उन्होंने भी नहीं खाया था। भूख जैसे मर गई हो। पड़ोसी रमजान मियां की बीवी अतिया एक प्लेट में परोसकर खाना लाई थी। लेकिन उन्होंने बरज दिया था, 'ना बहू, भूख नहीं है।’

'ऐसे कब तक भूखे रहेंगे?’ अतिया ने इसरार किया था।

'भूख लगेगी तो मांग लूंगा, बहू!’ फजलू मियां ने उसके आग्रह का मान रखते हुए पूछा था, 'रमजान, युसुफपुर से कब लौटेगा?’

'आज देर-सबेर आ जाना चाहिए।’ अतिया पलट कर जाते हुए आग्रह कर गई, 'कुछ चाहिए तो आवाज दीजिएगा।’

कुछ चाहने की इच्छा तो जैसे सईदा के साथ ही चली गई थी। वह खटिया पर लेटे सईदा की यादों में डूबते-उतराते रहे। कोई ऐसी बीमारी नहीं थी उसे कि वह यूं अचानक चली जायेगी जैसा कोई अंदेशा होता। उम्र का तकाजा, गरीबी की मजबूरी, मौत का बहाना, क्या कहें, कुछ समझ नहीं आ रहा। टी.बी. हुई थी। युसूफपुर के सरकारी अस्पताल में इलाज भी चला। डॉक्टर ने खान-पान ठीक रखने को कहा था। खान-पान क्या ठीक रखते? मेहनत-मजदूरी से दो वक्त का खाना नसीब हो जाता, वही बहुत था। कभी कुछ न  कर पाने की मायूसी में वह सईदा पर अपनी लाचारी जाहिर करते तो वह हंसकर झिड़क देती, 'जानते नहीं हैं, टी.बी. राजरोग है। जान के साथ ही जायेगी।’

वह सईदा की इस दिल्लगी पर नाराज होते तो वह हंसकर बात संभाल लेती, 'दवा चल रही है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा।’

वाकई दवा का असर दिखने लगा था। अब खांसी कम आती हालांकि बीच-बीच में बलगम निकलता। लेकिन आस बंधी थी कि सईदा चंगा हो जायेगी। डॉक्टर भी कहते, 'टी.बी. अब लाइलाज रोग नहीं है।’

इसी बीच, एक दिन अबुल अचानक आ धमका था। उसके साथ थी कजरी। कजरी का पगहा थमाते हुए उसने हुलसकर कहा था, 'गांव के पंडित जी के यहां सस्ते में मिल गई तो ले लिया। अब आप ही इसे पालिए।’

पता नहीं, सईदा ने अबुल को खबर दी थी या उसे खुद ही इल्हाम हुआ था कि वह कजरी को खरीद लाया था, फजलू मियां आज तक समझ नहीं पाये। लाख पूछने पर भी यह राज सईदा ने कभी नहीं खोला। पूछो तो हंसकर टाल जाती, 'आपको आम खाने से मतलब है या पेड़ गिनने से!’

इस मामले में उनकी एक न चलती। वह चुप लगा जाते। हां, मन ही मन खुश होते कि कजरी के गाभिन होने से दूध का इंतजाम हो जायेगा, जो सईदा की सेहत के लिए मुफीद रहेगा।

उस दिन कजरी का पगहा घर के एक खंभे से बांधते हुए उन्होंने कहा था, 'अभी तो थोड़ा घास उखाड़ लाता हूं। फिर इसके लिए नाद-खूंटा का भी इंतजाम करना पड़ेगा।’

फजलू मियां उलटे पांव सीमान की ओर निकल पड़े थे।

आनन-फानन घास लेकर लौटे थे और कजरी के आगे डालते हुए लाड़ जताया था, 'ले खाले। भूख लगी होगी।’

अबुल मियां ने टोका था, 'इसका नाम कजरी है।’

'कजरी।’ आंखें सिकोड़ते फजलू मियां ने कहा था, 'ना, अब इसका नाम शीबा रहेगा।’

उनकी बात खत्म होते न होते सईदा बोल पड़ी थी, 'नाम में क्या रखा है?’

'काहे? नाम में काहे ना रखा है।’ फजलू मियां ने आपत्ति की थी, 'पंडित के घर में कजरी थी। अब मेरे घर में तो इसका नाम शीबा होगा।’

कोई कुछ नहीं बोला था। बोलने जैसा कुछ था भी नहीं।

अगले दिन अबुल मियां चले गये थे। अगले ही दिन दरवाजे पर नाद खड़ी हो गई थी। खूंटा गड़ गया था। फजलू मियां शीबा का पगहा खूंटे से बांधते हुए बोले थे, 'लो शीबा, अब अपना आसन जमाओ।’

नाद के पास खूंटे से बंधते ही शीबा उस पर बैठ गई थी। उसके इस तरह गुमसुम बैठ जाने से फजलू मियां ने टोका, 'क्या हुआ शीबा, ऐसे काहे थउस गई?’ शीबा उर्फ कजरी पर कोई असर नहीं हुआ। फजलू मियां नाद में पड़े सानी सो उलट-पुलटकर पलटे, 'जब मन करे खा लेना’।

वह खटिया पर आकर बैठे ही थे कि अंदर से निकली सईदा ने पूछा, 'क्या हुआ, काहे मन मार के बैठी है?’

'पता ना क्या हुआ? तुम्ही देखो। क्या पता तुमरी बात माने।’ ठिठोली-सी की फजलू मियां ने।

सईदा गाय के पास गई। उसके सर पर हाथ फेरकर बोली, 'कजरी... कजरी... ए कजरी... क्या हुआ तुमको?’

कजरी ने मुंडी हिलाई। जीभ निकालकर सईदा के हाथ को चाटा और एकदम से उठकर खड़ी हो गई। फिर पूंछ हिलाती हुई सईदा की तरफ मुंह उठाकर रंभाने लगी। सईदा ने पुचकारकर पूछा, 'भूख लगी है? नाद में सानी है, खाती क्यों नहीं?’ और जैसे चमत्कार हुआ। कजरी ने सीधे नाद में मुंह लगाया और खाना शुरू कर दिया।

फजलू मियां ने आश्चर्य से मुंह बा दिया, 'कौन जादू की कि तुमरा कहना माने लगी?’

'आप बुलाइए आपका कहना भी मानेगी।’ सईदा हंसी।

'शीबा... शीबा...ए शीबा।’ फजलू मियां ने हांक लगाई। लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

'कजरी...ए कजरी।’ सईदा ने पुकारा। गाय ने मुंह नाद से बाहर निकाला और सईदा की हथेली चाटने लगी।

फजलू मियां चकित भाव सईदा को ताकते जा रहे थे और सईदा उन्हें विजयी भाव से देखे जा रही थी फिर उनके आश्चर्य को झटका देते हुए खुद ही बोल पड़ी, 'इसका नाम कजरी है। इसे यही सुनने की आदत पड़ी है। आप भी कजरी बुलाइए तो देखिए जवाब देती है कि नहीं।’

सईदा की सलाह को आजमाने के लिहाज से उन्होंने बगैर हुज्जत पुकारा, 'कजरी...ए कजरी।’

कजरी ने गर्दन घुमाई। आवाज की ओर देखा और खूंटे पर बंधे-बंधे ही रंभाना शुरु कर दिया। यह अद्भुत क्षण था। फजलू मियां खुशी के मारे आगे बढ़कर कजरी की पीठ सहलाने लगे। कजरी पूंछ कभी दाये-बायें हिलाती, तो कभी रंभाती गोया वह भी अपने असली नाम से पुकारे जाने से पुलकित हो। सईदा ने चुहल से पूछा, 'क्या कहते हैं अब?’

'जानवर भी सब समझता है, है न?’ फजलू मियां अपनी झेंप मिटाने के लहजे में हंसे, 'नाम में क्या रखा है।’

उस दिन से कजरी, कजरी ही रही। कभी-कभी रमजान जरूर छेड़ देता, 'चच्चा, सफेद गइया का नाम कजरी कुछ जमता नहीं।’

'अब, ये तो वो पंडित ही जाने के सफेद गइया का नाम कजरी काहे रखा? हम तो बस इतना ही जानते हैं कि दूध का रंग एक ही होता है।’ फजलू मियां हंसकर बात टाल देते।

कजरी जब गाभिन हुई तो सईदा ने उसकी सेवा में जान लगा दी। भूसा, खल्ली की कोई कमी न हो, इसके लिए तरह-तरह का जुगाड़ करती। मेहनत-मजदूरी की आय से बचाकर कजरी के खान-पान का ख्याल रखने में कोई कोताही नहीं बरतती। उसकी सेवा-टहल देखकर फजलू मियां झिड़की भी देते, 'इतना ख्याल तो तुम कभी अपना भी नहीं रखी।’

सईदा झिड़की का जवाब चुहल से देती, 'मेरा ख्याल रखने के लिए तो आप हैं न!’

फजलू मियां चुप लगा जाते। मन कचोट कर रह जाता, 'हम कहां तुम्हारा ख्याल रख पाते हैं?’

दोनों के बीच देर तक अनकहा घुमड़ता रहता। गरीबी, बेबसी, सईदा की बीमारी और उसके बेऔलाद रह जाने का गम अंदर ही अंदर औंटता।

सईदा कजरी की सेवा में मुतवातिर जुटी रहती और वह उसकी खुशी में ही सुकून हासिल करने की मुराद से खुद को समझा लेते। अनकहा लाख सही, अबूझ कुछ न था।

कजरी जिस दिन ब्याने वाली थी, उस शाम उसे जबर्दस्त पीड़ा हुई। सईदा उसकी तकलीफ देखकर तड़प उठी थी। रमजान, रमजान की बीवी अतिया सभी जुट आये थे। सईदा मुंह में दुपट्टा दबोचे, कभी कजरी को सहलाकर ढाढ़स बंधाती, तो कभी किसी तजुर्बेकार को बुलाने की गुहार लगाती। फजलू मियां दौड़कर मुख्तार मियां को बुला लाये थे। मुख्तार मियां ने धीरज बंधाते हुए कहा था, 'लगता है बच्चा पेट में खतम हो गया है।’ सईदा की सिसकी फूट पड़ी थी। अतिया ने आगे बढ़कर उन्हें संभाला था। खींचकर ओसारे में ले गई थी।

देर रात मरा बछड़ा पैदा हुआ था। कजरी शांत पड़ गई थी। हर ओर सन्नाटा छा गया था। थोड़ी देर बाद फजलू मियां के मंह से निकला था, 'अब’?

'अब क्या?’ मुख्तार मियां ने समझाया था, 'एक उपाय है, बछड़े के खाल में भूसा भर के गाय के सामने रखा जाये। अपने बच्चे के भरम में उसके थन में दूध आ जायेगा।’।

तड़प उठी थी सईदा। ओसारे में खड़ी-खड़ी एतराज जताया था, 'मरे का भरम बनाये रखना गुनाह होगा। बेहतर हो कि उसे ठिकाने लगा दिया जाय।’

वही हुआ। सुबह होने से पहले ही मरे बछड़े को दफना दिया गया।

अगले दिन कजरी सुस्त, बेजान पड़ी रही। सईदा ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए जैसे उसे सांत्वना देने की कोशिश की, 'कलेजा पर पत्थर रखों, कजरी। नसीब में यही बदा था, तो क्या कर सकते हैं हम?’

सईदा और कजरी का नसीब जैसे एक ही हो। दोनों बेऔलाद रहीं। सईदा का बच्चा भी नहीं बचा था। उसने भी कलेजे पर पत्थर रख लिया था। कजरी ने भी कलेजे पर पत्थर रख लिया। वक्त के साथ-साथ वह भी अपनी तकलीफ भुलाने लगी थी। इस हादसे के बाद सईदा और कजरी कहीं ज्यादा करीब हो गई थीं। अब तो जैसे दोनों एक-दूसरे की तकलीफ, गम और तन्हाई की साझीदार हो गई थीं। फजलू मियां दोनो को एक-दूसरे में रमा देखकर संतोष कर लेते, 'चलो जैसे भी खुश रहे सईदा।’

सईदा खुश थी। लगा कि उसकी सेहत में सुधार है। लेकिन यह भ्रम ही साबित हुआ। टी.बी. फिर उभर आई। इलाज चला। डॉक्टर बोला, 'टी.बी. लाइलाज नहीं हैं। दवा चलाते रहिए, ठीक हो जायेगी।’

दवा चलती रही। लेकिन इलाज कारगर नहीं हुआ। आखिर सईदा साथ छोड़ गई। तीस साल का साथ एक झटके में छूट गया। फजलू मियां को यकीन नहीं आता। सूनी आंखों में घर का सूनापन भांय-भांय करने लगता है। शाम का धुंधलका आंखों में गाढ़ा होने लगा तो वह उठे और लालटेन जलाकर जैसे ही ओसारे में लौटे, सामने रमजान खड़ा दिखा।

'अभी युसूफपुर से आया तो खबर मिली खाला के इंतकाल की।’

'हाँ, रमजान, छोड़ गई सईदा सबको।’ फजलू मियां की सूनी आंखें आसमान की ओर उठीं। रमजान अफसोस में डूबा वहीं खटिया पर बैठ गया। फजलू मियां ने लालटेन खूंटी पर टांगते हुए पूछा, 'और सुनाओं, क्या खबर है युसूफपुर की?’

'बहुत खराब है।’ रमजान की आवाज में उत्तेजना-सी आ गई थी, 'महौल बहुत खराब चल रहा है।’

'क्यों क्या हुआ?’

'गोकशी का इल्जाम लगाकर दाढ़ी-टोपी वाले दो लोगों को भीड़ ने मार दिया।’ अबकी रमजान की आवाज कहीं ज्यादा तल्ख थी।

'अरे!’ फजलू मियां के मुंह से निकला, 'क्या कह रहे हो? कहीं ऐसा होता है क्या? जरूर कोई गलतफहमी हुई होगी।’

'गलतफहमी में कोई किसी को जान से मार देता है क्या?’ रमजान का गुस्सा फूट पड़ा था, 'वे बेचारे अपनी बीमार गाय को अस्पताल ले जा रहे थे। लेकिन लोगों ने उन्हें कसाई कहकर मार डाला। बताइए, ये भी कोई बात हुई। इसी बात पर युसूफपुर में माहौल बहुत खराब हो गया है।’

फजलू मियां ने रमजान की ओर देखा। लालटेन की पीली रोशनी में उसका चेहरा भी जर्द नजर आ रहा था। खुद की यकीनी-नायकीनी के बीच उन्होंने रमजान को समझाया, 'ज्यादा हलकान होने की जरूरत ना हैं। सब ठीक हो जायेगा।’

'इंशाअल्ला!’ रमजान उठ खड़ा हुआ, 'कुछ जरूरत हो तो बोलिएगा।’

रमजान के जाने के बाद फजलू मियां उठे और लालटेन लेकर कजरी के पास आये। नाद भरी हुई थी। कजरी गुमसुम बैठी थी। झुंझलाकर बोले, 'कुछ खाती काहे नहीं हो? ऐसे कब तक सोग मनाओगी?’

कजरी पर कोई असर नहीं हुआ। फजलू मियां पैर पटकते हुए वापस ओसारे में लौट आये। अचानक उनका रुख एकदम बदला-बदला सा लगने लगा। पता नहीं क्यों रमजान की बातों ने जैसे कहीं गहरे बेचैन कर दिया था। वह खटिया पर लेटे-लेटे करवट बदलते रहे।

अगले दिन सुबह-सुबह ही मुख्तार मियां को बुला लाये। मुख्तार मियां ने कजरी की हालत देखकर कहा, 'गहरे सदमें में हैं। हमको लगता है, उसको भितरिया बुखार है। देह गरम लग रही।’

फजलू मियां तड़प कर रह गये, 'क्या उपाय है?’

'हमरे पास अरनिका है। वही एक-दो खुराक दे के देखो। शायद बुखार उतर जाय।’ मुख्तार मियां ने उपाय सुझाया।

लेकिन अरनिका का भी कोई खास असर नहीं हुआ। दो दिन बाद भी जब बुखार कम नहीं हुआ तो फजलू मियां की चिंता बढ़ गई। मुख्तार मियां ने लाचारी में सुझाव दिया, 'फजलू भाई, लगता है, डॉक्टर को ही दिखाना पड़ेगा। इसका बुखार बढ़ता जा रहा हैं।’

जानवर का अस्पताल तो युसूफपुर में है। वहीं ले जाना पड़ेगा कजरी को।’ फजलू ने हताश में जैसे खुद से ही जिरह की।

'लेकिन... वहां ले जाना खतरा से खाली ना है।’ रमजान ने आशंका जताई, 'उधर का माहौल ठीक ना हैं।’

फजलू मियां से कुछ कहते न बना। रमजान का डर उनके भीतर भी घर करता जा रहा था। उन्होंने आसमान की ओर हाथ उठाकर अफसोस जताया, 'अल्लाह ही मालिक हैं।’

वह दिन जैसे-तैसे बीता। कजरी सुस्त पड़ती जा रही थी। फजलू मियां उसकी हालत देखकर छछने जा रहे थे। कुछ न कर पाने की बेबसी में उनका मन डूबता जा रहा था। रात जैसे-जैसे गहरी होती जा रही थी, उनकी लाचारी उन पर गहराती जा रही थी। पता नहीं क्यों, उन्हें महसूस हो रहा था कि वह सईदा के प्रति अपराधबोध से भरते जा रहे हैं। जैसे सईदा उलाहना दे रही हो, 'हमारे पीछे आप कजरी का ख्याल नहीं रख सके।’

वह मन ही मन कलप उठे। स्याह रात का घना सन्नाटा उन्हें अपनी गिरफ्त में कसता जा रहा था। भीतर कोई अनजान खौफ सर उठा रहा था। बरगद के पेड़ पर कोई परिंदा पर मारता और वह चिंहुककर कजरी को ताकने लगते। कजरी भी चिंहुककर सर उठाती, एक नजर उनकी ओर देखती, फिर मुंह गोतकर पड़ जाती। फजलू मियां इस बेजुबान की तकलीफ को सोचकर बेचैन हो उठे। बेचारी किसके भरोसे है? कौन है इसका? सईदा होती तो क्या कजरी की इस हालत से बेहाल न हो जाती! फजलू मियां अचानक उठे। गमछा समेटा कजरी के पास आये। खूंटे से पगहा खोला और उसे पुचकारते हुए बड़बड़ाये, 'कजरी, चल अस्पताल। अब जो होगा देखा जायेगा।’

इस बड़बड़ाहट में जिद थी जैसे खुद सन्निपात में हों। पगहा खींचते ही कजरी उठ खड़ी हुईं। फजलू मियां ने कजरी को टिटकारी दी और दबे पांव चल पड़े। कजरी भी बगैर हील-हुज्जत उनके साथ हो ली। गांव में सन्नाटा पड़ा था। अंधेरा और सन्नाटा इस कदर गाढ़ा था कि रात भकसावन लग रही थीं। एक बार तो फजलू मियां का दिल इस जोर से धड़का कि हिम्मत जवाब दे गई। लेकिन खुद पर काबू पा चल पड़े। यूं यह आशंका बार-बार सिर उठा रही थी कि किसी ने उन्हें कजरी के साथ जाते देख लिया तो जान की दुहाई देकर रोक लेगा। लेकिन इस वक्त उन्हें अपनी नहीं, कजरी की जान की फिक्र थी। वह उसे हर हाल में जानवरों के अस्पताल ले जाने पर आमादा थे। लिहाजा, वह भय और अंधेरे को चीरते हुए अपनी राह चलते रहे।

गांव का सीवान पार करने के बाद ही फजलू मियां ने राहत की सांस ली। एक बार पीछे मुड़कर स्याह सन्नाटे में डूबे अपने गांव को निहारा और फिर कजरी को पुचकारते हुए हुए बोले, 'सुन कजरी, बस अढ़ाई कोस जमीन चलना है। हिम्मत रख, सब ठीक हो जायेगा।’

कजरी पीछे-पीछे चलती रही। वह पगहा पकड़े आगे-आगे बढ़ते रहे। एक बार जो रमजान की बात याद आई, 'उधर का माहौल ठीक ना है।’ सर झटक कर इस ख्याल को बाहर निकाला। रमजान झुट्ठे डराता हैं।’

डर साथ चलता रहा। जिद जारी रही। इस बीच, एक बार कजरी अड़ गई। फजलू मियां ने पलटकर देखा। कजरी के मुंह से झाग निकल रही थी। करीब आकर उसकी देह को सहलाया। देह गरम थी। चिंहुककर बुदबुदाये 'बुखार तो चढ़ते जा रहा है।’ फिर खुद ही वहीं बैठकर बोले, 'थोड़़ा आराम कर लें, फिर चलते हैं।’

थोड़ी देर बाद खुद के पांवों पर जोर देकर फजलू मियां ने कजरी का पगहा हिलाया। कजरी उनके पीछे चल पड़ी। पक्की सड़क आ गई थी। दूर टिमटिमाती रोशनियां दिखने लगी थीं। युसूफपुर नजदीक आता जा रहा था। फजलू मियां ने कजरी का हौसला बढ़ाया, 'चल कजरी, अब पहुंच गये हैं। थोड़ी और हिम्मत रख।’

सर के ऊपर से कोई टिटहरी उड़ी। आसमान में उजास की आंखें खुलती नजर आई। फजलू मियां के भीतर भी उम्मीद की उजास फूटी। कहीं से फजर की नमाज के एलान की आवाज आई। फजलू मियां के पास नमाज का वक्त नहीं था। उन्होंने आसमान की ओर देखा जैसे खुदा से बतिया रहे हो, 'माफी चाहते हैं। इस वक्त कजरी की जान बचाना जरूरी हैं।’

अचानक कजरी जहां खड़ी थी वहीं बैठ गई। फजलू मियां के सीने में धक्क-सी हुई। वह कजरी के पास आये और लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोले, 'कजरी, चल अंदर अस्पताल में।’

कजरी नहीं उठी। फजलू मियां ने पगहा खींचकर कजरी को उठाना चाहा। लेकिन वह नहीं उठीं। बेबस फजलू मियां कजरी को गेट पर ही छोड़कर अस्पताल के अंदर दौड़े। अस्पताल में मुर्दघट्टी पसरी थी। अंदर-बाहर कहीं कोई नजर नहीं आ रहा था। वह कलेजे को जोर लगाकर चीख पड़े, 'कोई है...!’ उनकी चीख उन तक लौट आई। वह बदहवास फिर चीखे। इस बार किसी कोने से एक आवाज आई, 'क्या बात है। काहे चीख रहे हैं?’

फजलू मियां आवाज की दिशा में बढ़े। फर्श पर अंगड़ाई लेता चौकीदार दिखा। उन्होंने मिन्नत के स्वर में अर्ज की, 'हमारी गाय की हालत ठीक ना हैं। डॅक्टर साहब को कहिए, जरा देख लें।’

'इस बखत कहां डॉक्टर-कंपाउंडर? सब तान के सो रहा होगा।’ चौकीदार उठ खड़ा हुआ था।

'कोई उपाय चाहिए, हुजूर। बड़ा एहसान मानेंगे।’ फजलू मियां गिड़गिड़ाये।

'कुछ खर्चा-पानी करो तो उपाय बतायें!’ चौकीदार ने आलस भरी देह को झटका दिया।

'हम गरीब आदमी हैं, हुजूर। फूटी कौड़ी भी पास ना है। सोचा, सरकारी अस्पताल में हमरी कजरी का मुफ्त इलाज हो जायेगा!’ कलप उठे फजलू मियां।

'तो अस्पताल खुलने का इंतजार करो।’ बेरुखी से जवाब देता चौकीदार अस्पताल की दीवार से लगकर पेशाब करने लगा।

'अस्पताल हैं कि कसाईखाना।’ फजलू मियां की थरथराती देह, लडख़ड़ाती जबान संभाले नहीं संभल रहीं थी। वह अपनी ही रौ में गेट की ओर दौड़ पड़े। कजरी को जिस हाल में छोड़कर गये थे, वह वैसी ही पड़ी हुई थी। लस्त-पस्त। वह पछाड़ खाकर कजरी की देह पर गिर पड़े। कजरी ने गर्दन उठाई। जीभ निकालकर फजलू मियां के माथे को चाटने लगी। फजलू मियां सिसक पड़े। अपनी बेबसी पर उनकी हिचकी बंध गई। वह फूट-फूट कर रो पड़े।

सुबह होते न होते पशु अस्पताल के गेट के बाहर दो लाशें पड़ी मिलीं। एक गाय की, दूसरी इंसान की। गाय का नाम कजरी था। इंसान का नाम फजलू। लेकिन दोनों की शिनाख्त करने वाला कोई नहीं था।

पशु अस्पताल के डॉक्टर का कहना था, 'गाय को काफी तेज बुखार था। समय पर अस्पताल लाई गई होती तो उसकी जान बचाई जा सकती थी।’

इंसान के बारे में पुलिस का कहना था, 'गो तस्कर होने का शक है। पुलिस मामला दर्ज कर कार्रवाई कर रही है।’

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अस्तित्व : ज्ञानप्रकाश विवेक

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