शनिवार, 24 मार्च 2018

पसरती ठण्ड

डॉ फ़तेह सिंह भाटी "फ़तह" का पहला कहानी संग्रह "पसरती ठण्ड" जब हमारी सराय तक पहुँचा, उस समय हम एक सप्ताह की अनचाही यात्रा पर बाहर निकल चुके थे। इसलिए उनकी किताब के दर्शन पाने में कई दिन लग गए। बहरहाल वापसी के बाद जब यह किताब सामने आई तो अपने कलात्मक आवरण के कारण पहली नज़र में ही मन को भा गयी। प्रकाशक महोदय की कृपा से कहीं इसका उल्लेख तो नहीं था किन्तु डॉ साहब से वार्तालाप करते हुए मालूम पड़ा कि आवरण का श्रेय उन्हीं को जाता है। मुखपृष्ठ के अलावा प्रयुक्त हुए कागज़ की गुणवत्ता और छपाई भी सुंदर है सिवाय प्रूफ़ के। अगर बाहरी साज सज्जा के लिए प्रकाशक और लेखक जिम्मेदार हैं तो आंतरिक हिस्से की अनगिनत भाषायी और प्रूफ़ सम्बन्धी त्रुटियों के लिए भी यही लोग उत्तरदायी हैं☺

डॉ फ़तेह सिंह भाटी किताब के पिछले भाग में दिये गए अपने परिचय में बताते हैं कि पाँच वर्ष की उम्र में ही उन्होंने अपने पिता को खो दिया। और ये भी कि... पिता के रहते जो लोग इस बच्चे को काँधे पर उठाए फिरते थे वही अब बुलाने पर भी पलटकर नहीं देखते। तब जाना 180 डिग्री पर घूमना क्या होता है।
"वक़्त के साथ लोगों को 360 डिग्री की यात्रा कर पुनः उस बिंदु पर पहुँचते देखा तो समझ आया कि पृथ्वी गोल है।
इन टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों से महसूस किया कि सिखाती तो ज़िन्दगी है। शिक्षा, भाषा या लिपि तो बस उसे प्रकट करने का माध्यम भर बनती है।"

उपरोक्त पंक्तियों को पढ़ते पढ़ते यह विश्वास हो चला था कि यह किताब मात्र छपास की इच्छा से अस्तित्व में आई कोई सामान्य किताब नहीं होनी चाहिए। जिन रचनाओं की पृष्ठभूमि में जीवन अनुभवों की ऐसी समृद्ध श्रृंखला हो वह साधारण नहीं हो सकती। दो पृष्ठों की भूमिका पढ़ते समय उनके आरंभिक जीवन की अन्य तमाम दुश्वारियों से भी परिचय होता है। भारत पाकिस्तान की सीमा पर स्थित एक छोटे से गाँव में उनका घर और रेगिस्तान का अनंत विस्तार जिसके बीच से गुजरते एक रास्ते पर 10 किलोमीटर दूरी पर स्थित स्कूल का पैदल चलने के अलावा कोई विकल्प नहीं। इन्हीं विषमताओं के बीच प्रारम्भिक शिक्षा पूरी कर भाटी साहब शहर पहुँचे। एम.बी.बी.एस. और एम.डी. की शिक्षा पूरी कर आज प्रोफेसर के पद पर आसीन हैं और देश के जाने माने एनैस्थिसिया विशेषज्ञ माने जाते हैं।
भाटी साहब कहते हैं कि "जीवन एक कला है। एक दूसरे के प्रति अपनापन, प्रेम, समर्पण, त्याग और समझ से सुख का अनुभव कर सकते हैं , साधनों से नहीं। इंसान सुख के साधन बढ़ाता जाता है और इस हद तक कि उसके जीवन का लक्ष्य ही पैसा हो जाता है। सारी ऊर्जा इसमें लगाकर अंततः वह स्वयं को छला महसूस करता है।"

यह स्थितियाँ उनकी कई कहानियों में बार बार आती हैं और एक सबक दे जाती हैं कि सुख और संतुष्टि का पैमाना भौतिक वस्तुएँ कभी नहीं हो सकतीं।
इन कहानियों में जहाँ वर्तमान जीवन की मानवीय/अमानवीय स्थितियों और भौतिक सुखों के मरुस्थल में भटकते लोगों के कार्य व्यवहार की सजीव तस्वीरें हैं वहीं इतिहास के पन्नों पर बिखरी हुई कुछ ऐसी गाथाएँ भी हैं जिनका पुनर्लेखन कर लेखक नें इन्हें पाठकों की स्मृति में फिर से जीवित कर दिया है।
दो भाग में लिखी गयी "झलक" नाम की कहानी, जिसमें नायक एक नितांत अवसरवादी और चरित्रहीन लड़की से विवाह कर अपने जीवन को नर्क बना लेता है, के अंत में वही नायक सोचता है--
"बुद्धिमान हो या मूर्ख, समय किसी को अपनी किताब खोलकर तो नहीं दिखाता किन्तु उस किताब के पहले पृष्ठ पर लिखी भूमिका में पूरी किताब की झलक अवश्य होती है। बुद्धिमान उससे भविष्य जान लेते हैं और मूर्ख ठीक से पढ़ते या समझते नहीं।"

इसी तरह के एक और पात्र पर केंद्रित कहानी "ठूँठ" में वे लिखते हैं--- "मित्रता एक ऐसा ताबीज है कि उसके बाद सारे भय दूर हो जाते हैं और संशय विश्वास में बदलने लगते हैं।"

"मुक्त प्रेम" एक ऐतिहासिक कहानी है जिसकी पृष्ठभूमि में उज्जैन के जनप्रिय शासक और विद्वान राजा भर्तृहरि और उनके जीवन से जुड़ी वो घटनाएँ हैं जिन्होंने उन्हें पहले राजा से योगी और फिर एक मनीषी बनाया।

"उमादे" जैसलमेर की प्रसिद्ध राजकुमारी उमादे की कथा है जिससे मारवाड़ के महाराज विवाह करते हैं किंतु नशे की हालत में उसके पास न जाकर बुलाने के लिए आई हुई दासी को अपनी कामुकता का शिकार बनाते हैं। उमादे इस पहली ग़लती को माफ़ कर दासी को दुबारा भेजती है किंतु महाराज उसके साथ फिर वही कृत्य करते हैं और इस तरह उमादे की पूरी रात इंतज़ार में ही बीत जाती है। मारवाड़ पहुँचकर उमादे राजमहल में जाने से इनकार कर देती है और रहने के लिए एक छोटा सा ग्राम माँगती है। राजा द्वारा क्षमा माँगने पर कहती है-- "इंसान से एक बार भूल हो जाय तो वह भूल होती है किंतु जब वही भूल दोहराई जाय तो वह ग़लती नहीं बल्कि उसके द्वारा लिया गया निर्णय होता है जो क्षमा योग्य नहीं।"
आत्मसम्मान और गरिमा की प्रतिमूर्ति ऐसी राजकुमारी की यह कहानी इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में एक है।

"पलायन" जैसलमेर रियासत के अंतर्गत चौरासी गाँवों में बसे पालीवाल ब्राह्मणों के विस्थापन की दारुण कथा है। अपने आन बान और सम्मान को सुरक्षित रखने के लिए कई पीढ़ियों के अथक श्रम से सँवारी हुई अपनी मातृभूमि को सदा के लिये छोड़ने में चौरासी गाँवों के उन निवासियों को कितने कष्ट और वेदना से गुज़रना पड़ा होगा, इसकी कल्पना भी कठिन है।
शापित धोरा, और सिन्दूरी हो जाना भी अच्छी कहानियाँ हैं।
"पूर्वाग्रह" इस संग्रह की आख़िरी और बिल्कुल अलग विषय पर लिखी गयी बढ़िया कहानी है, जिसके अंत में नायिका सोचती है--

"इंसान के साथ छल भाग्य करता है या उसके विचार, कोई नहीं जानता। किन्तु अनेक बार वह छला अवश्य जाता है। तभी तो सीधी राह चलते चलते अचानक वह मुड़ जाता है।"

पसरती ठंड
डॉ फतेह सिंह भाटी फ़तह
प्रकाशक - हिन्द युग्म
मूल्य - ₹ १००
प्रकाशन वर्ष - २०१८

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जिगरी

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