बुधवार, 28 मार्च 2018

हस्तीमल हस्ती

बरसों पहले जगजीत सिंह का एक नया ग़ज़ल एलबम कैसेट प्लेयर पर बज रहा था। अचानक एक ग़ज़ल की कुछ आरंभिक पंक्तियों नें बरबस ध्यान खींच लिया। वो शेर था...

जिस्म की बात नही थी, उनके दिल तक जाना था,
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है।

बहुत बड़ी बात बेहद खूबसूरती और सादगी से दो मिसरों में कह दी गयी थी। तुरन्त एलबम उठाया और शायर का नाम देखा-- "हस्तीमल हस्ती" और ये वही रचना थी जो इतनी मक़बूल हुई कि हस्तीमल हस्ती साहब की सिग्नेचर ग़ज़ल बन गयी, और जगजीत सिंह की गाई सदाबहार ग़ज़लों में इसका शुमार हुआ।

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है।
नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है...

बस उसी दिन से ये नाम जेहन में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। हालाँकि बड़ा भारी भरकम सा नाम था। कहीं से ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि ये जनाब वास्तविक जीवन मे कैसे होंगे। फिर कुछ दिनों बाद पंकज उधास के एक अल्बम में एक ग़ज़ल के कुछ अशआरों ने पुनः एलबम के विवरण पर जाने को मजबूर किया। फिर यही साहब हाज़िर थे और वो पंक्तियाँ थीं...

सूरज की मानिन्द सफर में रोज निकलना पड़ता है
बैठे बैठे दिन बदलेंगे इसके भरोसे मत रहना..

हस्ती साहब की ग़ज़लें धीरे धीरे  हमारे जीवन का हिस्सा बनती चली गईं। ये भी एक खुशकिस्मती ही थी कि हम महाराष्ट्र में आसपास के जिलों यानी मुम्बई और ठाणे के निवासी हैं जिसकी वजह से पिछले वर्ष एक व्यक्तिगत बैठक में उनसे रूबरू होने का सौभाग्य भी मिला। हस्ती साहब के सहज सरल व्यक्तित्व और हँसमुख चेहरे को देखकर उनके नाम को लेकर जो भी भरम थे सब दूर हो गए। उनके साथ बीता वो खूबसूरत दिन स्मृतियों का अमिट हिस्सा है। उन्हें सुनना और उनके सामने बैठना एक ऐसा अनुभव है जो किसी भी दिन को खास बना जाय।

पिछले दिनों रतन कुमार पाण्डेय सर और हूबनाथ पाण्डेय जी द्वारा संपादित पत्रिका "अनभै" का हस्ती साहब पर केंद्रित विशेषांक जब मिला तो उसे देखकर अच्छा लगा। देश के जाने माने शायरों , गीतकारों, लेखकों और ग़ज़लकारों द्वारा उन पर लिखे लेखों और संस्मरणों के सहारे उनके व्यक्तिगत जीवन, संघर्षों और सफलताओं के बारे में काफी कुछ जानने को मिलता है। हालाँकि इस तरह के आयोजन प्रायः एकरसता के शिकार भी हो जाते हैं, पर इस पत्रिका के संपादकद्वय की प्रशंसा करनी चाहिये कि उन्होंने भिन्न विधाओं के संयोजन से इस अंक को न केवल एकरसीय होने से बचाया बल्कि रोचक और संग्रहणीय बना दिया। कवियत्री रीता दास राम द्वारा लिया गया एक विस्तृत साक्षात्कार इस आयोजन को समृद्ध करता है।
आख़िर में उनकी कुछ चुनिंदा ग़ज़लें और दोहे भी शामिल हैं जो इस विशेष अंक को न सिर्फ़ वैविध्य प्रदान करते हैं बल्कि उनके रचनात्मक सफर की एक झलक भी दिखाते हैं।
हिन्दी और उर्दू के सीधे सरल लफ़्ज़ों में ग़ज़ल के सुनिश्चित बह्र को कायम रखते हुए इस तरह का सार्थक लेखन बहुत कम लोगों ने किया है। जीवन के हर पहलू के प्रति गहरी समझ, संवेदना और नज़र का निखार उनकी शायरी में जगह जगह मिलता है।

"ख़ुद चराग बन के जल वक़्त के अंधेरों से
भीख के उजालों से रौशनी नही होती "

जैसा एक छोटा सा शेर हमें रुककर सोचने और अपने आप को बदलने पर मजबूर कर सकता है।

उनकी ग़ज़लों में आपको अपने चारों तरफ़ बिखरी हुई विषमताओं और राजनीतिक/ सामाजिक विडंबनाओं के दर्शन तो होंगे ही, उन तमाम बातों का ज़िक़्र भी मिलेगा जिनसे ये दुनिया आज भी खूबसूरत है।

हस्ती साहब के कुछ दोहे और शेर आप सब के लिए प्रस्तुत हैं जिनमें जीवन के कई रूपों और रंगों से आपका परिचय होगा।

बूँदें दिखतीं पात पर, यूँ बारिश के बाद
रह जाती है जिस तरह, किसी सफ़र की याद।

अदालतों में बाज हैं, थानों में सय्याद
राहत पाए किस जगह, पंछी की फरियाद।

मेरे हिंदुस्तान का है फ़लसफ़ा अजीब
ज्यों ज्यों आयी योजना, त्यों त्यों बढ़े गरीब।

कभी प्यार, आँगन कभी, बाँटी हर इक चीज
अब तक जीने की हमें आयी नहीं तमीज़।

रहा सफ़लता का यहाँ , हस्ती यही उसूल
गहरे में पानी मिला, ऊपर मिट्टी धूल।

वही गणित हिज्जे वही, मुश्किल वही हिसाब
सुख पहले भी ख़्वाब था, सुख अब भी है ख़्वाब।

**** *****

सारी चमक हमारे पसीने की है जनाब
बिरसे में हमको कोई भी जेवर नही मिला

घर से हमारी आँख-मिचौली रही सदा
आँगन नही मिला तो कभी दर नही मिला।

हम लड़ रहे हैं रात से, लेकिन उजालों पर
होगा तुम्हारा नाम ये मालूम है मुझे

जब तक हरा भरा हूँ उसी रोज़ तक हैं बस
सारे दुआ सलाम ये मालूम है मुझे।

शायरी है सरमाया खुशनसीब लोगों का
बाँस की हरेक टहनी बाँसुरी नही होती

Hastimal Hasti

1 टिप्पणी:

मेरी बस्ती में रौशनी है अभी- हृदयेश मयंक

" वर्तमान भारतीय समाज अनेक प्रजातीय तत्वों व संस्कृतियों के सम्मिश्रण से बना है। इसकी बृहद और व्यापक सांस्कृतिक परम्पराएँ रही हैं। सैकड़...