शनिवार, 10 अगस्त 2019

ज़ोरबा द ग्रीक : निकोस कज़ानज़ाकिस

◆ ज़ोरबा द ग्रीक : निकोस कज़ानज़ाकिस
◆ संवाद प्रकाशन, आई-499, शास्त्री नगर, मेरठ-250004
◆ मूल्य : ₹ 250

" मैं जितना ज़्यादा जिऊँगा, उतना ज़्यादा प्रतिरोध करूँगा। मैं हार नहीं मानने वाला।"
" मुझे किसी चीज पर विश्वास नहीं है। अगर मैं इंसान पर विश्वास करूँगा तब मैं भगवान पर भी विश्वास करूँगा और शैतान पर भी। तब सारी चीजें अव्यवस्थित हो जाती हैं।"

यह आत्म स्वीकृति है विश्व प्रसिद्ध उपन्यास 'ज़ोरबा द ग्रीक' के नायक की। इस उपन्यास का शुमार विश्व साहित्य की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली कृतियों में होता है। निकोस कज़ानज़ाकिस का यह अमर उपन्यास 1946 में प्रकाशित हुआ था। प्रकाशन के साथ ही लोकप्रिय होने के बावजूद इसका अंग्रेजी अनुवाद अगले छह वर्षों तक नहीं हो सका था। 1964 में इसी कथानक पर आधारित एक फ़िल्म का निर्माण हुआ जिसे विश्व सिनेमा की यादगार और धरोहर फिल्मों माना जाता है।

'ज़ोरबा द ग्रीक' का प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद संवाद प्रकाशन मेरठ से इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है। अनुवादक हैं श्रुति अग्रवाल।
दूसरे पृष्ठ पर इसी किताब के कुछ वाक्यांश दिए गए हैं जिन्हें पढ़कर यह अनुमान हो जाता है कि इस किताब के साथ शुरू होने वाली पठन यात्रा साधारण यात्रा नहीं होगी--
" जब आपकी ज़िन्दगी में सब कुछ ग़लत हो रहा हो, तब उस बात का आनन्द अलग होता है। आपकी आत्मा आपके धैर्य और साहस की परीक्षा लेती है। हमारा जीवित और जुझारू होना हमारी जीत है।"

एथेंस के एक शहर पिराइस में उपन्यास का आरम्भ होता है जहाँ घनघोर बारिश के कारण जनजीवन अस्तव्यस्त हो चला है। इस कहानी के सूत्रधार और युवा ग्रीक विद्वान अपने एक अज़ीज़ दोस्त की व्यंगात्मक टिप्पणी, जिसमें उसने इन्हें किताबी कीड़ा कहा था, से आहत होकर जिस वैचारिक/बौद्धिक यात्रा पर निकले हैं वह वस्तुतः बुद्ध की राह है।

उनके मित्र ने कहा था - "आख़िर कब तक तुम यूँ ही काग़ज़ चबाते रहोगे? अंगुलियों को स्याही में डुबोते रहोगे? यहाँ से निकलो। हजारों लोग मर रहे हैं। उन्हें हमारी ज़रूरत है।"
हालाँकि इस टिप्पणी की अंतिम पंक्ति बेहद मानीखेज़ थी-
" हो सकता है हम किसी को न बचा पाएँ लेकिन तुमने सुना होगा कि--'अपने आप को बचाने के लिए ज़रूरी है हम दूसरों को बचाने की कोशिश करें।' "

अंततः वह मित्र इन्हें यथास्थिति छोड़कर अपने गंतव्य पर आगे बढ़ जाता है और इनके जेहन में तमाम उथलपुथल जारी रहती है--" इंसानी रूह हमेशा असमंजस की स्थिति में रहती है। एक अनाड़ी की तरह हाड़ माँस के गोले में क़ैद, लेकिन संवेदनाओं से भरी हुई। वह कितनी भी सख़्त होने की कोशिश करे, अन्त में आवेग अपना बाँध तोड़ देता है। अगर मानव मन यह समझ पाता कि बिछड़ने की वेदना कितनी पीड़ादाई होती है तो यह बिछड़ना शायद कुछ अलग होता।"

जीवन की वास्तविक वर्णमाला की तलाश करते इस सूत्रधार की अपनी यात्रा आरम्भ होती है और इसी यात्रा के क्रम में उसकी मुलाक़ात होती है ज़ोरबा से, जो उन्हें बॉस कहता है। ज़ोरबा के जीवन में कायदे, कानून, नैतिकता, अनैतिकता और किसी मान्यता का कोई महत्व नहीं है। उसके निकट बस वही पल सत्य है, जिसे वह जी रहा है। अपने बारे में बताते हुए वह स्मृति आख्यान के रूप में एक घटना का उल्लेख इस युवा ग्रीक लेखक से करता है- "दादाजी 90 की उम्र में बादाम का पेड़ लगा रहे थे। मैंने पूछा - 'इस वक़्त क्यों?' तो वे बोले - ' मैं इस तरह जीता हूँ जैसे कभी मरूँगा ही नहीं।' मैंने कहा- 'और मैं इस तरह जीता हूँ कि अगले ही पल मर जाऊँ तो अफ़सोस न हो।' "
यह छोटा सा प्रसंग ही उसके जीवन दर्शन का निदर्शन करने के लिए पर्याप्त है। वह जीवन दर्शन जो सिर्फ़ वर्तमान में जीने को तरजीह देता है। ज़िन्दगी के अन्य मुद्दों पर भी उसके विचार इसी तरह बेलाग और संशय रहित हैं। उसकी दृष्टि में विवाह उसी तरह बेस्वाद है जैसे काली मिर्च के बिना भोजन। वह स्वीकार करता है कि " जब मैं युवा था तो मुझे हर महिला अच्छी लगती थी। मैं उनके महकते बालों को अपने साथ याद के रूप में रखता था। बालों का वह संग्रह मेरा रजिस्टर था जिसमें मेरी ज़िन्दगी में आने वाली हर महिला के किस्से दर्ज़ थे। युवतियाँ वसंत की तरह हैं। आप उन पर झुकते हैं। फिर दूसरी युवती आती है नया वसंत लेकर। फिर तीसरी। आपकी प्यास बढ़ती जाती है और आप उसे बुझाने की लगातार कोशिश करते हैं।"

73 वर्ष पूर्व लिखी गई इस किताब में महिला विमर्श पर भी सार्थक परिचर्चा दिखाई पड़ी जब ज़ोरबा ने कहा- " यदि मुझे कानून बनाने का अधिकार दे दिया जाए तो मैं पुरुषों के लिए सख़्त और महिलाओं के लिए लचीला कानून बनाऊँ। भगवान हम पुरुषों को उन्हें समझने के लिए बुद्धि दें। हमें महिलाओं के प्रति सहृदय होना होगा।"

निकोस कज़ानज़ाकिस ने अनोखे पात्रों और घटनाओं से भरपूर इस उपन्यास में प्राकृतिक दृश्यों का जीवंत चित्रण किया है। चाहे ज़ोरबा के कोयला खदानों का दृश्य हो या फिर तूफ़ानी हवाओं और बारिश का...." शरद ऋतु की ठंडी हवाएँ चल रही थीं। बिखरे-छितरे से बादल धीरे धीरे धरती के ऊपर से गुज़र रहे थे। उनकी छाया से प्रकृति का नज़ारा बेहद सुन्दर लग रहा था। सूरज लगातार लुका-छिपी खेल रहा था। धरती की सतह कभी उज्ज्वल होती तो कभी काली।"

'ज़ोरबा द ग्रीक' वस्तुतः एक ऐसी यात्रा है जिसमें जीवन के विभिन्न आयाम समानांतर रूप से चलते दिखाई देते हैं। ज़ोरबा के जीवन पर ध्यान दें तो एक तरफ जिद की हद तक निवृत्ति और दूसरी तरफ़ भौतिकता और शरीर के प्रति उतनी ही गहन आसक्ति और संलग्नता! इससे पहले कि हम इसे सांस्कृतिक असंतुलन समझें, उसके तर्क और वैचारिकता का एक बिल्कुल नया स्वरूप हमें किसी अन्य धरातल पर ले जाकर पुनः सोचने के लिए बाध्य कर जाता है। अपने विचार और सरोकारों पर अडिग और ईमानदार ज़ोरबा! न कहीं कोई दुराव, न छिपाव- " सभी समझदार लोग अपने जीवन में ब्रेक का प्रयोग अवश्य करते हैं लेकिन अब मैंने अपने जीवन से इस ब्रेक को पूरी तरह से हटा दिया है।"

हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक परम्पराएँ हमसे कहती हैं कि कभी न कभी हमारे जीवन से सारे दुःख, अभाव और कष्ट अदृश्य हो जायेंगे। हमारा मन दो पाटों में विभक्त हो जाता है। एक हिस्सा इन मान्यताओं में विश्वास करना चाहता है, दूसरा कर्म में। इस बिन्दु पर दोनों में अनेकों बार बहस होती है और ज़ोरबा अपनी बात पर पूरी दृढ़ता से कायम रहता है कि महज धर्म और ईश्वर के आश्रय पर जीवन-आनन्द की प्राप्ति सम्भव नहीं।
निकोस कज़ानज़ाकिस की इस अद्भुत कथा यात्रा में कई उल्लेखनीय पड़ाव आते हैं। उन्होंने इन दोनों मुख्य पात्रों के मध्य होने वाले वार्तालाप के बहाने धर्म, संस्कृति, भूख, पूंजीवाद, साम्यवाद, मानवीय स्वप्नों एवं महत्वाकांक्षाओं पर उच्चकोटि के दार्शनिक चिन्तनपरक विचारों को प्रस्तुत किया है। व्यावसायिक कारणों से मठों और भिक्षुओं की दुनिया का भ्रमण करते ज़ोरबा और उसके बॉस इस दुनिया के अँधेरों और प्रपंचों से भी रुबरू होते हैं।

ज़ोरबा धीरे धीरे अपने अतीत के तमाम ऐसे अध्यायों पर से पर्दा हटाता है जिसके लिए आज उसके मन में अफ़सोस है। देशभक्ति के नाम पर किये गए नरसंहार की मार्मिक स्मृतियों को साझा करते हुए वह कहता है - " मेरा देश, देशभक्ति, क्या आप इन वाहियात बातों पर विश्वास करते हैं? आपकी किताबें यही सीख देती हैं। इन सीखों को मैं भी सच मानता था। जब तक हमारे ज़ेहन में देश होता है, हम मनुष्य की जगह जानवर होते हैं। एक दूसरे के साथ बर्बरता का व्यवहार करते हैं। मुझे इन सब बातों से मुक्ति मिल चुकी है। ईश्वर को धन्यवाद कि यह सब ख़त्म हो चुका है।"
इसी संदर्भ में किसी अन्य अवसर पर वो कहता है -- " यह सम्मान की बात नहीं है कि युद्ध के समय हम पर कैसा पागलपन सवार होता है। हम स्वयं को किसी व्यक्ति पर हावी होने देते हैं और ईश्वर से इस कार्य में सहायता के लिए प्रार्थना भी करते हैं।"

ग्रीक विद्वान उसके इन जीवन अनुभवों से गुज़रते हुए स्वयं को एक अलग वैचारिक स्तर पर पाते हैं। वे ज़ोरबा से प्रभावित होने की प्रक्रिया में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इस व्यक्ति ने अपनी नकारात्मकता पर विजय पाकर ख़ुद को पहाड़ों की हवा की तरह शुद्ध और निर्मल बना लिया है।

ईस्टर के उत्सव पर पार्टी के दौरान ज़ोरबा मालिक द्वारा चिढ़ाने पर कहता है- " भगवान कभी कभी ख़ुद अन्याय करता है। वह इंसानों को आपस में लड़वाता है। शैतान और भगवान अलग अलग नहीं, दोनों एक हैं।"

समाज निर्मित सारे बन्धनों और मान्यताओं को ठुकराने वाला ज़ोरबा अपने बुद्ध पथानुगामी बॉस और मित्र की मनःस्थिति पर प्रायः हँसता है और उन्हें पलायन की बजाय जीवन की सहज इच्छाओं, चाहना और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने पर जोर देता है। उसकी अटल मान्यता है कि मुक्त होकर जीवन जीने का आनन्द ही कुछ और है और भूत, भविष्य की अनावश्यक चिंताओं को भूलकर वर्तमान में जीना ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। वह उनसे कहता है कि " चलिए, ज़िन्दा होने का जश्न मनाते हैं। अब रुकना ठीक नहीं। जीवन का उत्सव मनाते हैं।"

ग्रीक विद्वान द्वारा बुद्ध पर लिखी जा रही एक किताब अब तक अपूर्ण थी। अंततः ज़ोरबा की बातों से प्रेरित वे  संतरों के बाग तक पहुँच जाते हैं। विधवा के बगीचे में उसके सानिध्य में बीती रात और नारंगी तथा नीबू के फूलों की खुशबू ने उसके जेहन को तरोताज़ा कर दिया था। इस रात के परमानन्द ने जीवन के जाने कितने अदृश्य राज खोल दिये। आनन्द से सराबोर धरती, आत्मा, शरीर और मस्तिष्क... इन्हीं पलों में बुद्ध पर लिखी जा रही किताब की पाण्डुलिपि वे उठाते हैं और उस किस्सागोई को अंजाम तक पहुँचा देते हैं।

यह उपन्यास पाठक को आंतरिक उल्लास और ऊर्जा देते हुए नवीन वैचारिकता और जीवन की अनोखी व्याख्या से कई स्तरों पर समृद्ध करता है। इस अमर कृति का अनोखापन ही इसकी अपार प्रसिद्धि का मूल कारण है।
श्रुति अग्रवाल का अनुवाद अच्छा है। हालाँकि यह और बेहतर हो सकता था। प्रूफ़ की बहुतेरी अशुद्धियाँ पढ़ते समय खटकती हैं। प्रकाशक को ऐसी विशिष्ट कृतियों के अनुवाद के समय थोड़ा ज़्यादा सतर्क रहना चाहिए। इन चंद विसंगतियों के बावजूद 'ज़ोरबा द ग्रीक' अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। इसी उपन्यास के कुछ और उल्लेखनीय अंश जिनसे पाठक समृद्ध होंगे---

" इस दुनिया में हर चीज के पीछे कोई छिपा हुआ अर्थ है। आदमी, जानवर, पेड़, सितारे सब चित्रलिपि हैं। उनके लिए दुःख होता है जो इनका अर्थ निकालने की कोशिश करते हैं और अनुमान लगाते हैं। "

" मानवीय जीवन की पीड़ा चरम पर आकर समाप्त हो जाती होगी। संगीत, कविता और पवित्र विचार सभी अपना जादू खो देते होंगे। दुनिया के आख़िरी व्यक्ति के लिए एकांत ही सर्वोपरि होगा। हर संगीत मूक और मौन! "

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