शनिवार, 4 अगस्त 2018

हम यहाँ थे- मधु काँकरिया

" मुक्ति कभी अकेले की नहीं होती। अकेले का सुख बेहद हल्का होता है। जब तक पेड़ पर घुन लगा है, एकाध डाल सँवर भी जाय तो कोई फायदा नहीं। असली चीज है अपने को बचाये रखना क्योंकि जीवन में प्रेम होता है, प्रेम में जीवन नहीं। जीवन रहा तो प्रेम शायद फिर भी मिल जाय।"

सकारात्मक विचारधारा के ऐसे क्षण मधु काँकरिया जी की रचनाओं में बार बार हमारे सामने उपस्थित होते हैं। उनके पात्र सिर्फ़ अपने सुख के लिए लड़ते नहीं दिखते, बल्कि उनकी चिन्ता के दायरे में धूप, हवा, पानी, पहाड़ और हाशिये पर पड़े वो साधारण इंसान हैं जिन्हें हमारा सभ्य समाज इंसान मानने को ही तैयार नहीं होता।

मधु काँकरिया का आख़िरी उपन्यास- "सूखते चिनार" लगभग 6 वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ था। बीच के इस लम्बे अंतराल की लेखकीय साधना का साकार स्वरूप है उनका उपन्यास "हम यहाँ थे" ....
पिछले तीस वर्षों के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की यादगार जीवन गाथा!!

उपन्यास का आरंभ होता है "क्योंकि तुम कर्म नहीं हो" नामक छोटे से अध्याय से। कहानी के उत्तरार्द्ध में आने वाले नायक जंगल कुमार का पत्र मिलता है और उसके जवाब में नायिका दीपशिखा उन्हें अपनी डायरी के कुछ पन्ने भेजती है। वो पन्ने जिनमें दर्ज है उसके समय का इतिहास, उसका जीवन संघर्ष, और साथ ही समाज में फैले अनगिनत अंधविश्वासों और  अमानवीय परिस्थितियों की अनेकानेक कहानियाँ।

डायरी के इन पन्नों के जरिये ही पाठक कई दशकों तक फैली उस यात्रा पर निकल पड़ते हैं जहाँ दीपशिखा की ज़िन्दगी हर्फ़ दर हर्फ़ हमारे सामने खुलती है। परिवर्तन के हाथों मजबूर और अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बचाने में नाकाम कोलकाता शहर एक बेबस पात्र की तरह हमारे सामने इस किताब में मौजूद है।

असफल वैवाहिक जीवन जीती हुई नायिका दीपशिखा को जब एक दिन एहसास होता है कि पति के हिंसक व्यवहार की प्रतिक्रिया में उसके बेटे के बचपन की सहजता ख़त्म हो रही है तो वह घर छोड़ने का निर्णय कर मायके आ जाती है। कोई विवाहित लड़की यदि हमेशा के लिए मायके आ जाय तो हमारे साधारण परिवारों में कई तरह की अवांछित स्थितियाँ उसके सामने आती हैं। दीपशिखा को भी अंततः इन विडंबनाओं से तो जूझना ही था। इनसे निस्तार कहाँ..
माँ की निम्न मध्यवर्गीय नैतिकता, पुरातन मानसिकता और उनके निरंतर हस्तक्षेप बार बार उसके सामने कठिनाइयाँ खड़ी करते हैं। दीपशिखा के उस बुरे वक़्त में सबसे अच्छी भूमिका निभाते हैं उसके बड़े भैया और उन्हीं की ये सलाह कि "सबसे पहले अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करो" उसके आगामी जीवन के लिए लाभदायक सिद्ध होती है।
पहले कंप्यूटर शिक्षा और फिर नौकरी के आरंभिक वर्षों के दौरान बेहद कठोर और हौसलों को तोड़ने की हद तक मिले अनुभव दीपशिखा की जीवन डगर को एक मायने में आसान ही करते हैं। घर और बाहर के ये दोनों युद्ध उसे अपने व्यक्तित्व को मजबूत बनाने में सहायक सिद्ध होते हैं।

दीपशिखा के मानसिक द्वंदों को दर्शाते ये प्रभावी अंश....

" ज़िन्दगी का सबसे बड़ा दुःख शायद यही है- न समझा जाना।"

" अंधेरा ओढ़कर सोने से कहीं अच्छा है कि एक बार अपनी जड़ता को पीछे धकियाते हुए चादर उठाकर देखा तो जाए.. शायद पूरे हो जाएँ उड़ान के सपने! क्योंकि जब कर्म ज़िन्दगी की अनिवार्य नियति बन ही जाय तो क्यों न ऐसे कर्म किये जाएँ जो उसे भी बचाए और उसकी आदमीयत को भी, उसके सपने को भी और आत्मसंतोष को भी।"

मधु जी ने इस कहानी में अनथक संघर्ष करते मध्यवर्ग के सामाजिक और पारिवारिक जीवन के अत्यंत प्रामाणिक और वास्तविक चित्र प्रस्तुत किये हैं।
दीपशिखा की डायरी हमें कुछ ऐसी अवान्तर कथाओं तक ले जाती है, जिन्हें पढ़कर हम स्तब्ध रह जाते हैं, जैसे जीवन की बिसात पर अपना सब कुछ गँवा चुके लालबहादुर नाम के एक शख़्स की दास्तान। भुखमरी और गरीबी के कगार पर खड़े एक नेपाली परिवार के सोलह वर्षीय युवक लालबहादुर को एक परिचित कलकत्ता लाकर जमनालाल के यहाँ नौकर रख देते हैं। कुछ समय बाद उन सज्जन की मौत हो जाती है और फिर लालबहादुर कभी अपने गाँव नहीं लौट पाता। चूँकि उसे अपने गाँव का नाम तक मालूम नहीं था, सो जमनालाल निश्चिन्त हो उसे अपनी गृहस्थी में झोंक देते हैं। चालीस वर्ष बाद अपने जीवन के अंतिम क्षणों में  जमनालाल को ये बात कसकने लगती है कि उन्होंने लालबहादुर के साथ न्याय नहीं किया। इन दिनों उनके बच्चों का अत्याचार भी उसके साथ बढ़ गया था। जिस परिवार को सुख देने के प्रयास में उन्होंने उस निरीह इंसान को उसकी पत्नी और घर से वंचित रखा, उसी घर में आज कोई उनकी सुनने वाला नहीं। अपने ही दिए स्वार्थी संस्कारों से जूझते जमनालाल की तड़प और उनके प्रायश्चित के प्रयासों का मार्मिक चित्रण मन को अंदर तक भिगो जाता है।

घर से भाग चुकी जवान बेटी की माँ
की मानसिक स्थिति हो या दीपशिखा की माँ द्वारा प्रताड़ित होती मेहनतकश औरतें, ग़लत विवाह में फँसकर अपनी स्वाभाविक रौनक और उल्लास खो चुकी उसकी सहेली तवलीन हो या उसके कलीग का अवसादग्रस्त भाई ( जिसे अपनी कंपनी में नौकरी दिलाकर उसके पूरे व्यक्तित्व को बदल देती है दीपशिखा ) मधु काँकरिया जी की संवेदनापूर्ण दृष्टि से ये तमाम किरदार और घटनाएँ मर्मस्पर्शी बन जाती हैं।

अपनी माँ को देखकर दीपशिखा सोचती है--

" जाने क्यों लगता है कि घर अन्याय और सामंतवाद सिखाने की सबसे बड़ी पाठशाला है। बचपन से इस तरह के अन्याय देखते देखते हमारी आँखें इतनी अभ्यस्त हो जाती हैं कि दुखियों और गरीबों पर होने वाला कोई अन्याय हमें अन्याय ही नहीं लगता।"

कथ्य के अनुरूप उनकी भाषा का लचीलापन भी देखते ही बनता है। कहीं सम्वेदना और कहीं व्यंग्य के स्वर----

" बाँझ वह नहीं जिसने संतान को जन्म न दिया बल्कि बाँझ वह है जिसने अपनी ममता, प्रेम और करुणा को जन्म और विस्तार नहीं दिया।"

" ज़िन्दगी गुड़ है तो रिश्तेदार मक्खियां जिन्हें उड़ाने में बहुत ऊर्जा जाया हो जाती है।"

और...

" सिल-बट्टा उपेक्षित सा बरामदे
के एक कोने में अंतिम साँस लेते लेते एक दोपहर वीरगति को प्राप्त हो गया।

दुर्गा पूजा के समय पंडाल की तैयारी में व्यस्त लोगों की भीड़ में दीपशिखा को आशीष दा दिखाई पड़ते हैं, जो आठवें दशक में धुर नक्सलवादी के रूप में मशहूर थे और इस आंदोलन के चलते उनका पूरा कैरियर तो ख़त्म हो ही गया, पुलिसिया पूछताछ में उन पर इतने टॉर्चर हुए कि वे एक पैर से लंगड़े हो गए। उनकी दुखद परिणिति और नक्सलवादी आंदोलन की विफलता देखकर दीपशिखा सोचती है--

"कहीं पढ़ा था कि क्रांति अपनी ही सन्तानों को खा जाती है और जो बचे रह जाते हैं वे क्रान्ति की अवैध संतानें होती हैं।"

यहीं पर प्रसंगवश कुछ ऐसे चरित्रों का ज़िक़्र भी है जो एक समय अपने आदर्शों के लिए मर मिटने की हद तक तैयार थे किन्तु आज वक़्त के साथ इतने सुविधाभोगी और समझौतावादी हो गए हैं कि ग़लत और सही का भेद ही ख़त्म हो चला है।

उपन्यास की स्वाभाविक विकास प्रक्रिया में ही हर्षद मेहता और बाबरी मस्जिद प्रकरण का ज़िक़्र भी आता है। हर्षद मेहता की चपेट में आकर भारतीय अर्थ व्यवस्था रसातल की ओर अग्रसर थी तो विश्व हिन्दू परिषद के आह्वान एवं साध्वी ऋतंभरा के गली गली में बज रहे भड़काऊ भाषण देश के भविष्य को आतंकवाद के कभी न ख़त्म होने वाले अनंत सिलसिले की ओर धकेल रहे थे।

अनिश्चितता और एकाकीपन के नीरस जीवन क्रम में नौ वर्ष बीतते बीतते दीपशिखा के मन में जीवन, प्रेम और सौंदर्य को जानने की इच्छाएँ पुनः जागृत होने लगती हैं। संयोग से उसी समय "वनमित्र परिषद" नाम की संस्था आदिवासी संस्कृति और जीवन से लोगों का परिचय कराने हेतु तीन दिन की वन यात्रा आयोजित करती है। दीपशिखा अवसर का फायदा उठाते हुए आदिवासी अंचल की यात्रा पर निकलने में सफल हो जाती है। गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड पहुँचने के दौरान रास्ते में जगह जगह टंगे नारों पर उसका ध्यान जाता है। " हों न यदि जंगली स्थान, देश बन जाये रेगिस्तान"
" आधी रोटी खायेंगे , स्कूल फिर भी जायेंगे "
यहाँ आदिवासियों को प्रत्यक्ष देखकर उसे एहसास होता है कि फ़िल्मों और किताबों में देखे गए चित्रों से कितनी भिन्न है यह असली तस्वीर। चाँदनी रात में जंगल की मादक सुगन्ध, गोल घेरा बनाकर नाचते स्त्री पुरुषों की टोली और लोक गायन की सुर लहरियों के बीच जीवन, प्रकृति और संगीत का यह अंतःसंबंध देखकर निस्तब्ध रह जाती है दीपशिखा। प्रकृति के इस महाकाव्यात्मक परिवेश में यहाँ के घर, जंगल, जानवर, दुःख, दैन्य के साथ ही उसे प्रकृति, पेड़ पौधों
और मानव संबंधों की पवित्रता का आभास होता है। साथ ही पहली बार उसकी मुलाक़ात होती है खुशहाल भारती संस्था के संस्थापक जंगल कुमार से.... जो इस कथा के महानायक हैं।
युवा सन्यासी जैसे वाह्य स्वरूप और सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी जंगल कुमार वहाँ के आदिवासियों के लिए मसीहा के समान हैं, जिन्हें बिशुनपुर का गाँधी भी कहते थे लोग। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और विगत इतिहास भी उतना ही अविश्वसनीय!
जमींदार परिवार के पोस्टग्रेजुएट महेन्द्र राय अपने आई.आई.टी. इंजीनियर मित्र के साथ यहाँ कुछ कर गुजरने के उद्देश्य से आये और यहाँ के अभाव , दैन्य, अंधविश्वास से जूझती ज़िंदगियों, जमींदारों का अमानवीय आतंक, युवावस्था में ही बुढ़ापे को अभिशप्त जवानों को देखकर उनकी सारी महत्वाकांक्षी योजनाएँ धरी रह गयी थीं। उन्होंने अपने वर्तमान को विसर्जित कर प्रतिज्ञा किया कि "जब तक एक भी आदिवासी भूखा और नंगा है, उनकी आंखों में आँसू और जीवन में पीड़ा है, तब तक मेरे लिए कोई भी सुख हराम है। अब मैं यहीं रहकर अपने पूर्वजों के पापों का प्रायश्चित करूँगा। "

सिले वस्त्रों और जूतों को भी त्याग महेन्द्र जंगल कुमार बन गए। उनके कार्यालय के बाहर लगी मूर्तियों से दीपशिखा को जननायक बिरसा मुंडा और तिलका माँझी जैसे अमर इतिहास पुरुषों के बारे में भी जानकारी मिलती है।

तीन दिनों की यह यात्रा दीपशिखा को जीवन के कई ऐसे अर्थ समझा चुकी थी जिनसे अब तक उसका कोई परिचय नहीं था। उसका शरीर तो कोलकाता वापस लौटता है किन्तु आत्मा कहीं पीछे झारखंड के उन जंगलों में ही छूट गयी जहाँ आकर उसका प्रकृति के पावन सौंदर्य, मानवीय करुणा और जंगल कुमार से साक्षात्कार हुआ था।

कशमकश लगातार बना हुआ था। खुशहाल भारती की तरफ़ पुनः निकलने से पहले माँ के कहने पर घरवालों के साथ जोधपुर यात्रा पर निकल जाती है दीपशिखा। वहाँ के भव्य किले को देखते समय एक ऐसी घटना की जानकारी होती है जिससे अपनी महान विरासत और संस्कृति की रही सही साख भी उसके मन से बिखर जाती है। बड़े भैया कहते हैं- " जोधपुर ही नहीं हमारे अधिकांश किलों, महलों, दुर्ग, राजमहलों, ताजमहल आदि से अमानवीयता के तार जुड़े हुए हैं।" उसे जंगल कुमार की बात याद आती है- " हमारी सभ्यता का ज्यादातर सफर स्त्री, निर्बल, दबे कुचले और साधारण इंसानों का विरोधी रहा है।"

अपनी अगली जंगल यात्रा के दौरान एक आदिवासी स्त्री से बातचीत के दौरान दीपशिखा सोचती है-

"गरीबी सूखी रोटी खिलाती है, अमीरी घी चुपड़ी। यह तो मैं जानती थी। लेकिन गेंहू अमीर है। दाल और चाय अमीर है, सब्जी अमीर है.. गरीबी का यह रंग मेरी कल्पना के बाहर था।"

फिर एक बार कोलकाता वापसी ! इस बार दीपशिखा के मन में ये स्पष्ट था कि उसका असली ठौर कोलकाता नहीं है और आखिरकार उसे यहीं लौटकर आना है। ढलती उम्र में माँ को अकेले छोड़ना उसके लिए बहुत कठिन था किन्तु निर्णय लिया जा चुका था। घर, परिवार और अपने प्यारे शहर को छोड़ने के अथाह दुःख के बीच दीपशिखा सोचती है कि-
" मैं दुःख को महिमामंडित नहीं करती क्योंकि दुखी रहना कोई अच्छी बात नहीं, फिर भी सुख और केवल सुख जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए।"

दीपशिखा की डायरी के पन्ने यहीं समाप्त हो जाते हैं। उत्तरार्द्ध नामक खंड आरंभ होता है और आगे की कहानी जंगल कुमार द्वारा सुनाई जाती है। इसी खंड में जंगल कुमार अपने जीवन की उस दुर्घटना का ज़िक़्र भी करते हैं जिसकी वजह से घर परिवार त्यागकर वे यहाँ आये और फिर यहीं के होकर रह गए। वे कहते हैं कि " मैंने ये समझ लिया था कि दुनिया में सबसे डरावनी चीज यदि कुछ है तो वह है भूख, पेट की आग। मैंने उसी से लड़ने की ठान ली। यहाँ की जीवनदायिनी हवाओं, प्रकृति की विराटता,और तारों भरी रातों की दिव्यता ने मेरी घायल आत्मा को सहलाया और फिर मैंने पाया कि मेरे भीतर अभी भी जज्बात बचे हुए हैं। मेरे आँगन में मानवता की भोर हो चुकी थी।"

आदिवासियों के मध्य कार्यरत दीपशिखा के जुनून और समर्पण की कहानियाँ सुनाते जंगल कुमार उसके प्रति उठ रहे अपने दुर्दम्य आकर्षण को भी उतनी ही सहजता से स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि " उसके संपर्क में आने के बाद मैंने जाना कि भूख के समान ही एक और भयानक चीज इस दुनिया में है और वह है- प्रेम की प्यास।
दुनिया की सारी प्रेमकथाओं की त्रासदी बस कुछ पलों के विचलन ही होती है।

दीपशिखा के व्यक्तित्व की प्रखरता इस आकर्षण का मूल कारण थी। आदिवासियों के धर्मांतरण के मुद्दे पर जंगल कुमार चाह रहे थे कि वो उन गाँवों में जाकर मिशनरियों की इन चालाकियों को समझे और कुछ कार्य करे किंतु उसके मस्तिष्क में मदर टेरेसा का प्रभाव हावी था। जंगल कुमार कहते हैं कि- यदि उनका यह धर्मांतरण किसी आत्मिक उत्कर्ष या तत्व ज्ञान के कारण होता तो चिन्ता नहीं थी क्योंकि धर्म का सम्बन्ध मन से है। आदिवासी की शक्ति उसकी सामूहिकता में है। सुख दुःख, हर्ष विषाद, राग द्वेष सब कुछ साझेदारी में। ऐसे में यदि उन्होंने कोई अन्य रास्ता चुना तो अकेले पड़ जाएंगे।
भारत ही नहीं, दुनियाभर के आदिवासी अपनी सामूहिकता के लिए जाने जाते हैं। एक बार एक अमेरिकी मानव विज्ञानी अफ्रीका की एक जनजाति कबीले में बच्चों के साथ खेल रहा था। उसने एक पेड़ के नीचे फलों से भरी टोकरी रखी और बच्चों से कहा कि जो भी दौड़कर फल उठाएगा उसे फलों की पूरी टोकरी मिल जाएगी। उसकी बात सुनते ही सारे बच्चों ने एक दूसरे का हाथ कसकर पकड़ लिया और उबुन्तु शब्द का उद्घोष करते हुए टोकरी की ओर दौड़े।  उसने उनसे पूछा कि आप लोग एक साथ क्यूँ दौड़े जबकि आप चाहते तो सारे फल खुद ले सकते थे। उन्होंने जवाब दिया- 'उबुन्तु।' यानी जब बहुत से बच्चे उदास हों तो कोई अकेला बच्चा कैसे ख़ुश रह सकता है।

इसी बीच एक दिन उनकी संस्था धरती रक्षा वाहिनी के प्रांतीय संयोजक इतवारी को पुलिस नक्सलवादी कहकर उठा ले जाती है। जितनी देर में जंगल कुमार भागकर थाने पहुँचते हैं उतने ही समय में पुलिस थर्ड डिग्री का ऐसा प्रयोग कर चुकी थी कि जंगली गैंडे जैसे मजबूत और बहादुर इतवारी को सूजी आंख और बिगड़े चेहरे के साथ जमीन पर उकडूँ बैठे थर थर काँपते देखकर उनके होश उड़ जाते हैं। उसे छुड़ाने की उनकी सारी कोशिशें पुलिस नाकाम कर देती है।

वेंकटेश ग्रुप की पावर परियोजना का विरोध कर रहे जंगल कुमार के हौसलों को तोड़ने के लिए बहुत तैयारी के साथ ये चाल प्रशासन ने चला था।  सत्ता, प्रशासन, पुलिस सब पूँजीपतियों के हाथों बिक गए थे। इतवारी को छुड़ाने के लिए जितना तड़प रहे थे जंगल कुमार उतना ही यह कार्य कठिन होता जा रहा था। असफलताओं और बेचैनियों के इसी समन्दर में एक सुबह सुख की एक छोटी सी लहर आती है जब जंगलकुमार और दीपशिखा के बीच मोहब्बत और अपनत्व की वो छुपी चिनगारी दुःख के गहन क्षणों में सुलग उठती है जिसे अरसे से दोनों ने दबाकर रखा था।

" वह प्रेम ही क्या जो एकाधिकार , स्वीकृति, और संरक्षण न चाहें"
और यही सम्भव नहीं था। जंगल कुमार के सामने पहले से सुनिश्चित प्राथमिकताएँ थीं, बढ़ती उम्र का संकोच और नकारात्मक लोगों की ओर से मिलने वाले तानों का ख़याल भी था।

" जो मुहब्बत दिव्यता की एक झलक भर दिखलाकर उड़ जाए वह खंजर की तरह आजीवन सीने में गड़ी रहती है। ज़िन्दगी एक साथ इतनी मेहरबान नहीं होती कि मुहब्बत और मकसद दोनों एक साथ हासिल हो जाएँ। कुछ न कुछ हाथों से छूट ही जाता है।"

अन्ततः दोनों अपने मन को व्यक्तिगत सुखों और चाहतों से ऊपर ले जाने की कोशिश करते हुए उस लड़ाई में ख़ुद को झोंक देते हैं जो उनकी पहली प्राथमिकता है। इधर सत्ता का दमन भी खतरनाक रूप से उग्र हो चुका था। करीब साल भर बाद इतवारी के ख़िलाफ़ कोई सुबूत न मिलने पर कोर्ट उसे बरी करती है लेकिन जेल से बाहर आते ही पहले से तैयार खड़ी पुलिस उस पर धारा 309 का केस लगाते हुए पुनः उठा ले जाती है।
अब यह लड़ाई और ज्यादा गम्भीर हो उठती है। पुलिस का अगला टॉरगेट है दीपशिखा। यानी अवांछित घटनाओं की अंतहीन श्रृंखला ! किन्तु एक पक्षीय नहीं।

उपन्यास के अंतिम कुछ पृष्ठ अत्यंत रोचक और मानीखेज़ हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद ही पाठक को पता चलेगा कि प्रकृति की रक्षा के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा चुके जंगल कुमार एवं दीपशिखा और अपने राह की हर बाधा को समूल मिटा देने के लिए तत्पर सत्ता का यह संघर्ष किन किन मोड़ों से गुज़रता है।

उपन्यास का समापन भी प्रेरक शब्दों से हुआ है---
" सफलता-असफलता कुछ नहीं होती। असली चीज होती है, आपके जीवन का ताप कितनों तक पहुंचा। जीवन का अर्थ है अपने पीछे कुछ निशान छोड़ जाना।"

मधु काँकरिया जी को इस अनुपम कथा कृति के लिए हार्दिक बधाई। अपनी हर नई रचना के साथ उन्होंने खुद के बनाये मापदंडों को ध्वस्त कर जिस तरह के प्रतिमान रचे हैं, वह सिद्ध करते हैं कि एक रचनाकार के पास निरंतर विकसित होने के अलावा कोई शॉर्टकट नहीं होता। घर परिवार, व्यक्तिगत सम्बन्धों और निजी संवेदनाओं के साथ ही देश, दुनिया, समाज और सृष्टि के अन्य जीवों की चिंता और समष्टि के प्रति संवेदना भी उतनी ही आवश्यक है। जो लेखक अपनी वैचारिकता और संवेदना का विस्तार नहीं कर पाते वे जीवनभर एक ही तरह की कहानियाँ लिखते हैं और फिर एक निश्चित अवधि के बाद वही चीजें बार बार पढ़कर उनके पाठक भी ऊब जाते हैं।

*हम यहाँ थे*

*मधु काँकरिया*

प्रकाशक - किताबघर प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष- 2018
पृष्ठ- 295
मूल्य-₹ 300

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मुख़बिर : राजनारायण बोहरे

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