सोमवार, 22 अप्रैल 2019

मुक़म्मल नहीं, खूबसूरत सफर हो (भाग 1) : पराग मांदले

“आपने तो कमाल कर दिया मै’म!”  अनन्या लगभग दौड़ती हुई मेरे केबिन में घुसी थी। उत्तेजना से उसका चेहरा लाल हो गया था और साँसें बहुत तेज़ चल रही थीं। अपने हाथ का मोबाइल उसने मेरी ओर बढ़ाया हुआ था।
“दो मिनट जरा बैठ जाओ आराम से, फिर बताओ क्या हुआ।”
बैठ तो गई वह तुरंत मगर दो मिनट आराम के लिए वह राजी नहीं थी।
“अब तक तो सोशल मीडिया से सामग्री लेकर अख़बारों में छपते देखा है मैंने, मगर आपने इस सिलसिले को पूरा उलटा दिया है मै’म!” उसके स्वरों की उत्तेजना अभी भी कायम थी, “आज देखिए कितने लोगों ने हमारे #MeToo कॉलम के शॉट्स अपने फेसबुक पर लगाए हैं। वाट्सअप और ट्विटर पर भी इसके पिक्स बड़ी तेजी से वायरल हो रहे हैं।”
“चलो अच्छा है, इसके बहाने ये कहानियां उन लोगों तक भी पहुँच रही है, जिन तक हमारा अख़बार नहीं पहुँचता।” अनन्या की बातों से उसकी तरह मैं उत्तेजना से बिलकुल नहीं भर उठी, मगर एक संतुष्टि का अहसास जरूर हुआ मुझे।
“हाँ मै’म, और जानती है मेरे इनबॉक्स में ऐसी कहानियों की बाढ़ आ गई है। उनमें से कितनों ने तो बाकायदा अपना और कल्प्रिट का नाम भी लिखा है साफ़-साफ़। आपने ऐसी कहानियों को इस कॉलम में जगह देने का निर्णय लिया, यह वास्तव में बहुत दूरदर्शी कदम था। कितनी लड़कियों को, औरतों को और तो और पुरुषों को भी इससे हौंसला मिला अपने बुरे अनुभवों को व्यक्त करने का।”
“मिनिस्टर के रिज़ाइन के बाद इन कहानियों का काउंट बहुत फास्ट ग्रो किया है।”
“अच्छा....! ” मुझे आश्चर्य हुआ। मिनिस्टर एक प्रख्यात पूर्व संपादक थे। उनके खिलाफ यौन-दुराचार के आरोप लगाने वाली सहकर्मियों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी।
“यह तो अच्छा है मै’म कि इस न्यूज़पेपर की एडिटर आप हैं। इस वजह से हम बिलकुल सेफ फील करते हैं। अगर कोई मेल एडिटर होता तो शायद हमें भी इसी तरह का एक्सपिरियेंस होता।”
“ऐसा नहीं है अनन्या। सारे पुरुष खराब ही होते हैं, ऐसा भी नहीं है।”
“मै’म, मेरे इनबॉक्स में इस तरह के इंसिडेंट्स की जितनी ज्यादा मेल्स आ रही हैं, उससे तो लगता है कि इस सोसाइटी में हर तरफ भेड़िये ही भेड़िये भरे पड़े हैं।” कुछ पलों को रूकी अनन्या और फिर अचानक उसने पूछा, “एक बात बताइये मै’म, आपको तो बहुत साल हो गये हैं इस फील्ड में। आपको कभी ऐसा एक्सपिरियेंस नहीं हुआ?”
“मेरे साथ......?” अनन्या के सवाल ने चौंकाया था मुझे। पुरानी यादों की बाढ़-सी आ गई मेरे भीतर। अनन्या के सवाल का कोई जवाब दिए बिना टाल दिया उस वक्त मैंने उसे। मगर मेरी आँखों के सामने उस दिन के चित्र दौड़ने लगे, जब मैं पहली बार मेरठ से दिल्ली आई थी।

2
“हम्म....... तो तुम हो काव्या!” सागर सर ने एक गहरी निगाह से मुझे ऊपर से नीचे तक देखा।
उनके इस देखने ने मुझे थोड़ा-सा असहज कर दिया। यूँ तो किसी जवान लड़की को पहली नज़र में ही ऊपर से नीचे तक स्कैन करने की पुरुषों की आदत की आदी हूँ मैं। इस बात की भी कि चेहरे से नीचे तक फिसलने वाली उनकी निगाहों के स्कैनर के पड़ाव कौन-कौन से होते हैं और उन पड़ावों पर उस स्कैनर की लाइट कैसे अचानक तेज़ हो जाती है। वैसे ही जैसे वोल्टेज बढ़ने पर किसी बल्ब की रोशनी तेज़ हो जाती है। इन निगाहों से सोलह-सत्रह साल की उम्र में बहुत असहज होती थी मैं, मगर पिछले तीन-चार सालों से इनसे प्रभावित होना छोड़ दिया है मैंने। अपने जेहन से इन निगाहों को ठीक वैसे ही झटक दिया करती हूँ मैं, जैसे कोई अपने लिबास पर चढ़ी धूल झाड़ दिया करता है।
लेकिन इतना तो मुझे भी ध्यान में आया कि सागर सर की निगाहें ठीक-ठीक वैसी नहीं थीं, जिनकी मैं आदी थी। यह तो नहीं कह सकती मैं कि उनमें पुरुषी फितरत का पूरी तरह से अभाव था, मगर सिर्फ शरीर की रेंज से भी परे कुछ देख पाने की कुव्वत थी उस निगाह में। क्या-क्या देखा होगा इन निगाहों ने भला? मैंने सोचा।
सामान्य चेहरा मगर आकर्षक देहयष्टि, आँखों में प्रतिभा का तेज, अस्थिर चित्त, कपड़ों को लेकर केजुअल अप्रोच, नाज़ुक-सुंदर होंठ और ........। बहुत बाद में सागर सर ने एक दिन बताया था मुझे कि उस दिन एक निगाह में क्या-क्या देखा था उन्होंने। और के बाद का शब्द उन्होंने तब बोलकर नहीं, इशारे से बताया था। उनकी उस सकुचाहट ने मुझे एक साथ गुदगदाया भी था और शरमाया भी था।
मगर यह तो बहुत बाद की बात है। उस समय तो उन्होंने एक पूरी निगाह से मुझे देखा और फिर अपना ध्यान दूसरी तरफ करते हुए बोले, “बैठो।”
उस मध्यम आकार के क्यूबिक में सागर सर की टेबल के सामने दो कुर्सियां रखी हुई थीं, उन्हीं में से एक को सरका कर बैठ गई थी मैं।
टेबल पर कम्प्युटर की स्क्रीन, पेपरवेट के नीचे दबे हुए कुछ कागज़, पानी से भरा एक गिलास और अलग-अलग रंगों के कुछ पेन रखे हुए थे। पास में रखी एक साइड टेबल पर ढेर सारी किताबें रखी हुई थीं। कुछ अंग्रेजी की, मगर ज्यादातर हिन्दी किताबें। कुछ पल मुझे उन किताबों के नाम पढ़ने में लगे। फिक्शन, ग़ज़ल, यात्रा वृत्तांत, आत्मकथा और अध्यात्म – ये पाँच प्रकार वहाँ प्रॉमिनेंट थे। उन किताबों ने मुझे सागर सर की ओर एक बार फिर ध्यान से देखने के लिए मजबूर किया।
यहाँ आने से पहले ही सागर सर के बारे में अपने कार्यालय में जो जानकारियां हासिल की थीं मैंने, उनके मुताबिक सागर सर शायद देश के तमाम अख़बारों में कार्यरत बेहतरीन फीचर एडिटरों में से एक थे। अपने काम के प्रति हद से ज्यादा समर्पित मगर उतने ही ज्यादा मूडी भी। आमतौर पर धीमे स्वरों में बात करने वाले मगर परले दर्जे के स्पष्टवादी। इसी साल फरवरी में उम्र के 40 बरस पूरे किए थे। यह यदि मुझे पता ना होता तो उन्हें देखने के बाद मैं कसम खा के कह सकती थी कि उनकी उम्र बत्तीस-तैंतीस से ज्यादा नहीं। हद से हद पैंतीस। सिर के बाल छोटे, करीने से कटे हुए। बहुत ध्यान से देखने पर कहीं-कहीं चांदी की चमक चौंधियाती थी। हल्की दाढ़ी, मगर पूरी काली। डेनिम की जींस और खादी का आधी बाजुओं वाला शर्ट। चेहरे और अवतार से तो पत्रकार से ज्यादा कवि और बुद्धिजीवी टाइप के लग रहे थे।
“तुम्हारे लेख पढ़े हैं मैंने। अच्छा लिखती हो। तुम्हारी नज़र साफ है। सोच संतुलित। किसी मुद्दे का विश्लेषण भी अच्छा कर लेती हो।” कम्प्युटर पर ही नज़रे गढ़ाए हुए कहा सागर सर ने।
मैं एक पल को खुशी से उछल पड़ी थी। उस खुशी की उत्तेजना शायद मेरे स्वरों में भी छलक आई थी, “आपने पढ़े हैं मेरे लेख, सर?”
सागर सर ने कम्प्युटर से निगाह हटाकर मेरी ओर इस तरह देखा जैसे कोई बचकानी बात करने वाले किसी बच्चे की तरफ देखता हो। फिर मुस्कुराकर बोले, “अख़बार का फीचर संपादक हूँ मैं। अख़बार में छपने वाला हर लेख कम से कम एक बार तो मेरी निगाहों से गुज़रता ही है। मगर वर्तनी की बहुत गलतियां करती हो तुम। भाषा को भी थोड़ा माँजने की जरूरत है।”
झेंप गई थी मैं। अपने बचकाने सवाल की वजह से भी और अपनी भाषाई कमियों की वजह से भी।
“पर मेरठ से दिल्ली आकर अच्छा किया तुमने। वहाँ तुम्हारी पूरी प्रतिभा दो कौड़ी की ख़बरें बनाने में खर्च हो जाती। यहाँ तुम्हारे लिए सीखने और आगे बढ़ने – दोनों का अच्छा स्कोप है।”
मैं मन ही मन मुस्कुराई। सीखने और आगे बढ़ने की चाहत ही तो खींच लाई थी मुझे दिल्ली तक। इस अख़बार के मेरठ संस्करण में रिपोर्टर की नौकरी करते हुए दो साल हो गए थे मुझे। पत्रकार होना शुरू से मेरा सपना था। यही वजह थी कि पत्रकारिता की डिग्री करने के दौरान ही मैंने इस अख़बार में रिपोर्टर के रूप में काम शुरू कर दिया था। हालाँकि मेरी रूचि शुरू से रिपोर्टिंग से ज्यादा संपादन में थी, मगर संपादकीय विभाग में कोई जगह खाली ना होने के कारण दो साल तक मजबूरी में मुझे रिपोर्टिंग ही संभालनी पड़ी। मगर इस कमी को मैंने विभिन्न विषयों पर लेख लिखकर पूरा करने की कोशिश की। अख़बार के स्थानीय संपादक भी मुझे इसके लिए बहुत प्रोत्साहित करते थे। सारे लेख अख़बार के दिल्ली कार्यालय को भेजने होते थे, जहाँ से मुख्य संस्करण प्रकाशित होता था। मेरे भेजे लेखों में से ज्यादातर को अख़बार के फीचर पृष्ठों में नियमित रूप से जगह मिलती रही। इसी बीच जब दिल्ली कार्यालय के फीचर विभाग में एक जगह खाली हुई तो मेरे स्थानीय संपादक ने मैंनेजमेंट से मेरे नाम की सिफारिश की। सागर सर की सहमति के बाद मैनेजमेंट ने मुझे दिल्ली कार्यालय ज्वाइन करने का ऑफर दिया और मैंने इस मौके को लपकने में देर नहीं लगाई।
आज मेरा दिल्ली कार्यालय में पहला दिन था। सागर सर मेरे इमीडिएट बॉस थे। फीचर विभाग में उनके अलावा एक सब एडिटर थे। इसके अलावा एक ग्राफिक आर्टिस्ट और एक कम्पोजिटर।
फीचर विभाग की जो संरचना थी उसमें दो क्यूबिक थे। एक मध्यम आकार का, जिसमें सागर सर बैठते थे। एक थोड़ा छोटा, जिसमें ग्राफिक आर्टिस्ट शिशिर दत्ता बैठते थे। क्यूबिक के सामने चार टेबल थे, जिनमें से एक पर सब एडिटर सुबोध कुमार बैठते थे और दूसरी टेबल पर कम्पोजिटर दिनेश यादव। एक टेबल अब मेरे नाम थी, जो सागर सर के क्यूबिक के ठीक सामने थी। कोने की चौथी टेबल पर लेखों की फाइलों का ढेर लगा हुआ था।

3
सागर सर के काम करने का अंदाज़ बहुत अलग था। बहुत कुछ अपारम्परिक। बनी हुई लीक को तोड़ना उनका शगल नहीं, उनकी आदत में शुमार था। हर बार कुछ नया, कुछ अलग सोचना और करना उन्हें भाता था। वे खुद हर बार अपने लिए नई चुनौतियां खड़ी करते थे और खुद हर बार उन चुनौतियों का पूरे जोश-खरोश से सामना किया करते थे। कभी यह भी होता कि किसी स्टोरी के पीछे पूरा दिन ऑफिस ही नहीं आते और कभी यह होता कि एक सुबह ऑफिस आने के बाद काम में इस तरह डूबे हैं कि फिर अगले दिन ही घर पहुँचते। यूँ तो ऑफिस में आने-जाने का समय दर्ज करने के लिए पंचिंग मशीन लगी हुई थी, मगर सागर सर के कार्ड की तरफ कभी ध्यान नहीं दिया जाता था। कई बार तो अपनी धुन में वह कार्ड पंच करना ही भूल जाते थे।
कहते हैं कि शुरू में एडमिन ऑफिसर ने इस बात पर आपत्ति जताई थी। मगर सागर सर ने मैनेजिंग एडिटर को साफ कह दिया कि उनके काम की गुणवत्ता पर ही ध्यान दिया जाए तो बेहतर। वैसे भी यदि ऑफिस में उनकी अनियत उपस्थिति की ही गिनती की जाए तो वह पूरे ऑफिस के औसत से ज्यादा ही निकलेगी, कम नहीं। यूँ भी सागर सर को बहुत मनुहार कर इस अख़बार में लाया गया था। उनके जाने का जोख़िम नहीं उठाया जा सकता था। सो एडिमन ऑफिसर को समझा दिया गया।
खुद मेरे काम के मामले में उनका तरीका बहुत अलग था। मुझे लगा था कि मुझे लेख लिखने या उनको एडिट करने का काम सौंपा जाएगा। मगर शुरू का एक महीना मुझे फीचर विभाग के ग्राफिक आर्टिस्ट शिशिर दत्ताजी के साथ बैठाया गया। फीचर पेज का लेआऊट कैसे बनाया जाता है, उसके लिए सामग्री के अनुरूप तस्वीरें कैसे खोजी जाती हैं, लेखों के शीर्षकों की लेटरिंग किस तरह कराई जाए कि वह उभरकर और सुंदर दिखें, उनका रंग और प्लेसमेंट कैसी हो। यही सब मेरे शुरुआती प्रशिक्षण का हिस्सा था। उस एक माह के दौरान सागर सर हर शाम मेरा काम खत्म होने के बाद मुझे बुलाते और यह पूछते कि उस दिन मैंने क्या नया सीखा। मेरे बताने के बाद संतुष्टि से सर हिलाते और अपने काम में लग जाते, जो मेरे लिए जाने का इशारा होता। हाँ, कभी-कभी जरूर उन्हें कुछ बताने जैसा लगता तो बताते। उस एक महीने के दौरान मेरी ज्यादातर बातें शिशिर दत्ता जी से ही हुईं। दुबले-पतले, छोटे कद के शिशिर दा एक हँसमुख व्यक्ति थे। हर बात बहुत प्यार से समझाते। इस वजह से मेरा वह समय मजेदार बीता।
एक माह बाद एक दिन सागर सर ने मुझे बुलाकर मेरे हाथ में कुछ लेख, एक कहानी, कुछ कविताएं और कुछ अन्य सामग्री थमाई और कहा कि इस सारी सामग्री के हिसाब से ‘झरोखा’ का लेआऊट मैं तैयार करूं। मैं समझ गई कि इतने दिनों के प्रशिक्षण के बाद यह मेरा पहला बड़ा इम्तिहान है। ‘झरोखा’ हमारे अख़बार का रविवारीय परिशिष्ट था और खूब चर्चित था। राजनीति हो, साहित्य हो, संस्कृति हो, खेल हो, समाजकार्य हो या कोई और विषय। हर बार उसमें बहुत विचारोत्तेजक लेख छपा करते थे। उनकी समाज में चर्चा होती थी। ‘झरोखा’ दरअसल सागर सर का बहुत बड़ा वीक पॉइंट था। उसके लिए वे दिन-रात मेहनत करते थे।
मुझे दो दिन लगे। जब मैं एक रफ लेआऊट बनाकर सागर सर के पास ले गई तो उन्होंने बड़े ध्यान से पूरा लेआऊट देखा। इसके बाद उसे टेबल पर फैलाकर हाथ में पेंसिल ली और फिर पूरे एक घंटे तक उस लेआऊट पर उनका लेक्चर-डेमोस्ट्रेशन चलता रहा। इस एक घंटे के दौरान मैं जैसे आँखें और कान – बस शरीर के इन दो हिस्सों में सिमट गई थी। मेरी आँखें कभी उस लेआऊट पर पेंसिल चलाती सागर सर की ऊंगलियों पर टिकी रहतीं और कभी तल्लीन होकर बोलते उनके चेहरे पर। और मेरे कान उनकी आवाज़ मंत्रमुग्ध हो सुन रहे थे। सच कहूँ तो पिछले एक महीने में मैंने जितना सीखा था, उससे कहीं ज्यादा मुझे उस एक घंटे में सीखने को मिला था।
इसके बाद मुझे पहले छोटे-छोटे फिलर तैयार करने का काम दिया गया, जिनका उपयोग संपादकीय पृष्ठ पर या फीचर परिशिष्ट में होता था। कुछ दिनों बाद झरोखा का प्रारंभिक लेआऊट तैयार करने की जिम्मेदारी भी मुझे सौंप दी गई। मेरे द्वारा तैयार लेआऊट में सागर सर अपने हिसाब से करेक्शन करते। तीन-चार सप्ताह में उनके द्वारा किए जाने वाले करेक्शनों को देखकर मोटे तौर पर मुझे सागर सर की सोच और रूचि का अंदाज़ा लग गया था। इसका नतीज़ा यह हुआ कि मैं उसी हिसाब से लेआऊट तैयार करने की कोशिश करने लगी और सागर सर के करेक्शन लगातार कम होते गए। सागर सर ने इस बदलाव को जल्द ही नोटिस किया। उन्होंने कुछ कहा नहीं सीधे तौर पर, मगर मैं इतना समझ ही गई थी कि इससे वह खुश हुए थे।
पत्रकारिता के क्षेत्र में जो सपना लेकर मैं आई थी, सागर सर उसके मूर्तिमंत आदर्श थे। जैसे-जैसे समय गुजरता गया, मेरी यह धारणा और-और दृढ़ होती गई कि मुझे अंततः सागर सर जैसा ही बनना है। मैं उनकी हर बात को, हर काम को बहुत बारीकी से देखती और समझने की कोशिश करती थी। और यथासंभव उसे अपने भीतर उतारने की कोशिश भी करती थी। उनकी काम के प्रति दिवानगी ने मुझे भी अपने आगोश में ले लिया था। हालाँकि सागर सर ने मुझे कभी रात आठ बजे के बाद ऑफिस में नहीं रूकने दिया, मगर ऐसा कई बार होता कि मैं सुबह आठ बजे ही ऑफिस पहुँच जाती और फिर जब रात आठ बजे सागर सर जबरन मुझे उठाकर घर जाने को कहते, तभी रवाना होती। कई बार ऐसा होता कि मैं सुबह से किसी काम में लगी रहती तो खाना खा लेने का ध्यान भी नहीं रहता। जिस दिन झरोखा को फायनल करके प्रिंट के लिए देना होता, उस दिन तो निश्चित रूप से ऐसा होता ही था। ऐसे में जब सागर सर का इस बात पर ध्यान जाता तो फिर वे मुझे अख़बार की कैंटिन में नहीं जाने देते। अपने साथ बैठा लेते और अपने लंच में से जबरन मुझे भी खिलाते। सच कहूँ तो ऐसे समय मैं संकोच से भर उठती थी और बार-बार इस बात का यह कहते हुए प्रतिरोध करने की कोशिश करती थी कि मेरी वजह से सागर सर को भूखा रह जाना पड़ता है। इसका परिणाम यह हुआ कि हर शुक्रवार को सागर सर याद से मेरे लिए भी अतिरिक्त खाना लेकर आने लगे। मैंने कई बार इसके लिए उन्हें ना कहा, मगर उन्होंने कभी सुना नहीं। इसके कारण एक ओर जहाँ मेरा संकोच गहरा जाता, वहीं यह बात मुझे कहीं सुकून भरी गुदगुदाहट भी देती थी कि सागर सर मेरा कितना ध्यान रखते हैं।
4
उस दिन जब मैं ऑफिस पहुँची तो देखा, सागर सर पहले से ही अपनी जगह पर विराजित थे। इधर पिछले कुछ समय से, जब से सागर सर की मेरे ऊपर निर्भरता बढ़ गई थी, ऐसा बहुत कम होता था। मैं अपना बैग टेबल पर रखकर बैठने ही जा रही थी कि सागर सर ने आवाज़ लगाई। मैं सर की टेबल के सामने जा खड़ी हुई।
“अरे बैठो, तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है।” सर ने मेरी नमस्ते का जवाब देते हुए एक निगाह मुझ पर डाली और फिर कम्प्युटर के की-बोर्ड पर उंगलियां चलाने लगे। थोड़ी देर बाद उन्होंने कम्प्युटर स्क्रीन से निगाह और की-बोर्ड से अपनी उंगलियां हटाईं। टेबल पर रखे गिलास से पानी के दो घूँट पिये और इंटरकॉम का रिसीवर उठाते हुए मुझसे पूछा, “चाय पियोगी?”
“नहीं, कॉफ़ी।” मुझे चाय पीना आमतौर पर पसंद नहीं था।
“अरे देवी, सुनो एक मेरी चाय भेज दो और एक कॉफी भी।” उन्होंने कैंटीन के मैनेजर देवीप्रसाद को आर्डर दिया।
सागर सर की चाय स्पेशल होती थी। वे बिना दूध की चाय पीते थे। वह भी काँच के गिलास में। कत्थई रंग का वह पेय पारदर्शी ना हो तो वापस कर देते। साफ पानी में चाय पत्ती और चीनी। साथ में आधा कटा नींबू और थोड़ा नमक होता है, जिसे वे अपने हाथ से मिलाते।
मुझे दिल्ली आए छः महीने हो गए थे। इतनी अवधि में सर के आग्रह पर मैंने सिर्फ एक बार उनकी वाली चाय पीकर देखी थी। मुझे बहुत अच्छी नहीं लगी। कॉफ़ी का स्वाद मुझे ज्यादा पसंद था। चाय कभी-कभार पी लेती, मगर दूध वाली।
“अच्छा सुनो, मैं चार दिन के लिए बाहर जा रहा हूँ। कविता की एक्जिबिशन है मुंबई में। पहली बार उसकी पेंटिंग्स की एक्जीबिशन जहाँगीर आर्ट गैलेरी में लग रही है, इसलिए बहुत एक्साइटेड है। उसकी जिद है कि मुझे भी उसके साथ जाना चाहिए।”
“जी, यह तो बहुत अच्छी बात है।” मैंने खुशी जताई। सागर सर ने बताया था कि उनकी पत्नी कविता एक बहुत अच्छी चित्रकार है। देश में कई जगहों पर उनके चित्रों की प्रदर्शनी लग चुकी है। देश के उभरते हुए चित्रकारों में उनका नाम शुमार किया जाता है।
“हम्म...... और दूसरी अच्छी बात यह है कि इस बार ‘झरोखा’ का पूरा काम तुम्हें देखना है, समझी।” सागर सर ने मुस्कुराते हुए कहा।
मैं चौंकी। यह ऐसी बात थी, जिसके इस समय होने की मैंने सपने में भी ना उम्मीद की थी और ना ही कल्पना।
“क्या है ना कि कुछ सामग्री तो पहले से तैयार है। सभी स्थायी स्तंभ कम्पोज हो चुके हैं। बस लीड स्टोरी और एक-दो लेख बाकी हैं। मैंने कहा हुआ है। आज-कल में आ जाएंगे। वैसे भी आज सोमवार है। तुम्हारे पास शुक्रवार शाम तक का समय है। मुझे उम्मीद है, तुम सब संभाल लोगी।” मेरी आँखों में आँखें डालकर बोले सागर सर।
“मैं.....मैं कैसे कर पाऊंगी सर यह। मैं तो अभी बहुत नयी हूँ। आप.....आप सुबोध जी को कहिए ना। मैं उनकी पूरी मदद करूंगी।” मैंने हड़बड़ाते हुए प्रतिरोध किया।
“एक बात बताओ.....।” सर का स्वर अचानक गंभीर हो गया था। “तुम क्या खुद को मुझसे ज्यादा बुद्धिमान मानती हो?”
इस सवाल से मैं सन्न रह गई। हड़बड़ाकर बोली, “क्या..... क्या बात कर रहे हैं सर! भला मैं ऐसा सोच भी कैसे सकती हूँ?”
“मगर मेरे निर्णय पर अविश्वास जताकर और मुझे दूसरी व्यवस्था का सुझाव देकर तो तुम यही साबित कर रही हो ना।” चाय आ चुकी थी। उसमें नींबू निचोड़ते हुए सर ने कहा।
मैं स्तब्ध, मौन बैठी रही।
“देखो काव्या, यदि मुझे यह विश्वास ना होता कि तुम यह जिम्मेदारी उठा पाओगी तो क्या मैं भूलकर भी तुमसे इसका आग्रह करता?”  चाय का घूँट भरते हुए सर ने पूछा। उनका चेहरा गंभीर था।
मैंने इंकार में सिर हिलाया।
“एक तो कविता ने अचानक यह जिद पकड़ ली है कि मुझे भी उसके साथ जाना चाहिए। मुझे पहले पता होता तो मैं उस हिसाब से कुछ तैयारी करके रखता। एक-आध बार पहले भी ऐसी स्थिति आई है। मगर तब मैंने बाहर होने के बावजूद लीड स्टोरी तैयार करके भेजी थी।”
“तो इस बार भी वैसा ही कीजिए ना सर।”  मेरे स्वरों में चिरोरी थी।
“नहीं, इस बार मैं वैसा नहीं करने वाला। और इसकी दो वजहें हैं।”  सागर सर के स्वरों में थोड़ा आग्रह था और थोड़ा रहस्य।
“कौन-सी दो वजहें सर? ”  इसके सिवा कोई और प्रश्न बनता ही नहीं था।
“एक तो मुझे पता है कि तुम यह कर लोगी। और दूसरे मैं चाहता हूँ कि तुम ऐसा करो।”  सागर सर मुस्कुराए।
“पर सर.......।”  मैं अभी भी असमंजस में थी।
सागर सर ने चाय का आखिरी घूँट पीकर गिलास टेबल पर रखा। टेबल के पीछे से अपनी रिवाल्विंग चेयर सरकाकर टेबल की बायीं ओर लेकर आये और बोले, “सुनो, अपने हाथ आगे बढ़ाओ।”
मैं कुछ समझ ही नहीं पाई। अचरज से उन्हें देखती रही।
“अरे, अपने हाथ आगे करो।”  सर थोड़ा और आगे सरककर बोले।
मैंने यंत्रवत् अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए। उन्होंने मेरी दोनों हथेलियों को ऊपर की ओर कर हाथ अपनी गोद में रखे। मैं थोड़ा आगे झुक गई। उन्होंने अपनी हथेलियों से मेरी हथेलियों को ढँका और बोले, “अब अपनी आँखें बंद करो और अपना पूरा ध्यान अपनी हथेलियों पर केंद्रित कर लो।”
मैं समझ नहीं पा रही थी कि सर आखिर करना क्या चाहते हैं। अब तक सर का जैसा व्यवहार रहा था मेरे साथ, उसकी वजह से उनके बारे में किसी तरह की कोई आशंका नहीं थी मेरे मन में। असमंजस को परे रखकर मैंने उनके आदेश का पालन किया। कुछ क्षण किंकर्तव्यविमूढ रहने के बाद मैंने अपनी हथेलियों पर ध्यान केंद्रित किया।
सागर सर की हथेलियों का स्पर्श बहुत मुलायम, बहुत कोमल था। चंद सेकंडों में मुझे लगा जैसे उनकी हथेलियों से उष्मा की एक लहर निकलकर मेरी हथेलियों के माध्यम से मेरे शरीर में प्रवेश कर रही है। सर्दियों की सुबह की कुँवारी धूप के बुलबुले मेरी देह में फूट रहे थे। मेरी पूरी देह एकबारगी काँप उठी। कुछ समय तक यह सिलसिला यूँ ही जारी रहा, फिर धीरे-धीरे उस उष्मा की तीव्रता में वृद्धि होने लगी। वह उष्मा मेरी नसों के माध्यम से पूरे शरीर में प्रवाहित हो रही थी। ऊर्जा का एक विस्मयकारी नर्तन अपनी नसों में मैं महसूस कर रही थी। कुछ देर बाद मेरे लिए स्थिर बैठे रह पाना मुश्किल हो गया। जब भी मैं अपनी हथेलियों पर सागर सर के स्पर्श पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करती, एक सौम्य करंट-सा मुझे लगता। आख़िरकार मैंने घबराकर आँखें खोल दीं।
सागर सर की आँखें अब भी बंद थीं। उनके चेहरे पर एक मासूम मुस्कराहट थी। समंदर के किनारे अपने पाँव पर रेत थापकर घरोंदा बनाने में तन्मय किसी छोटे बच्चे की-सी मासूम मुस्कराहट। साथ में एक अलग किस्म का तेज और शांति भी। मैं मंत्रमुग्ध-सी उन्हें देखती रही। मैं अजीब-सी द्विधा मनःस्थिति में थी। एक ओर हथेलियों से शरीर में प्रवाहित होती उष्मा मुझे बेचैन कर रही थी और मैं अपनी हथेलियां हटा लेना चाहती थी। वहीं सागर सर को देखते हुए मुझे लग रहा था कि मैं अनंत काल तक उन्हें इसी तरह देखती रहूँ। ये पल ऐसे ही स्थिर हो जाएं। किसी विशाल जल प्रपात से एक विशाल धारा नीचे गिरे और धरती को छूते ही स्थिर हो जाए। और मैं अपलक उस धारा की हजारों लड़ियों की माला को जी भर के देखूं, उनके साथ खेलूं, उनमें भीगूं और फिर उनसे अछूती परे होकर फिर उन्हें अपलक देखूं। मगर न उस धारा का प्रवाह ठहरता है कभी, न समय की धारा का।
कुछ क्षणों बाद सागर सर ने आँखें खोल दीं। हल्के-से मेरी हथेलियों को थपथपाया और कुर्सी सरकाकर अपनी जगह पर लौट गए। अंतरिक्ष के कैनवास पर तारों के विस्फोटों का सिलसिला मानो अचानक थम गया था। आकाश ने फिर अपनी बेदाग नीली चादर ओढ़ ली थी। पृथ्वी सहित सारे ग्रह जो अब तक अविकल उन विस्फोटों की आतिशबाजी को स्थिर होकर साँस रोके देख रहे थे, फिर अपनी-अपनी गति के रथ पर सवार होकर चल पड़े थे।
मैंने सिर उठाकर देखा, वे मेरी ओर ही देख रहे थे। मैंने न जाने क्यों नज़रें झुका लीं।
“अब बताओ, तुम यह जिम्मेदारी पूरी कर पाओगी या नहीं?”  उनका सवाल फिर एक बार सामने आ गया था।
“एक बात पूछूँ सर?”  बहुत हिचकिचाते हुए मैंने यह सवाल किया था।
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं।”  उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।
उसके अगले कुछ क्षणों में कई बार मैंने कुछ पूछने के लिए मुँह खोला और फिर बिना एक शब्द भी बोले बंद कर लिया। उन कुछ क्षणों में सही शब्दों के चुनाव में असफल रहने के चलते सकुचाकर ना जाने कितनी बार पलकें झपकायीं।
“यह क्या किया था आपने?”  आखिरकार थूक निगलते हुए पूछ ही लिया मैंने।
“अरे ये..... पता है, जब मैं छोटा था और किसी भी काम को करने के लिए यह कहकर मना करता था कि मैं छोटा हूँ, यह नहीं कर पाऊंगा तो मेरी माँ ऐसा ही किया करती थी। वह मेरी हथेलियों को अपनी गोद में लेकर अपनी हथेलियों से ढँकती थी और मुझे आँखें बंद करके इसे महसूस करने के लिए कहती थी। मुझे ऐसा महसूस होता था जैसे उन हथेलियों के माध्यम से ढेर सारी ऊर्जा मेरे शरीर में भर गई है। वह ऊर्जा मेरे भीतर की पूरी नकारात्मकता को, अस्वीकार को धो देती थी। फिर मैं किसी काम के लिए ना नहीं कहता था।
“ओह.....।”  मैं सिर्फ इतना ही कह पाई। मेरे चारों ओर पसरे हुए गुलाबी बुलबुले अचानक एक साथ फूट गए थे। अब उनका कहीं नामोनिशान नहीं था।
“अच्छा, तुम बताओ, तुम्हें कैसा लगा?”  सागर सर ने उत्सुक होकर पूछा।
“मुझे......।”  कुछ पल मैं सोच में पड़ गई। “आपकी हथेलियों से ढेर सारी उष्मा बहती हुई महसूस हुई मुझे भी। मगर पता नहीं क्यों, जब भी मैं आपकी हथेलियों पर ध्यान केंद्रित करती थी, मुझे एक करंट-सा लगता था।”
“क्या!”  सागर सर कुछ देर तक मुझे आश्चर्यचकित होकर देखते रहे। उनकी हलकी भूरी आँखों के रंग मानो इस बीच कई बार बदले। फिर उन्होंने एक गहरी साँस ली और पूछा, “अच्छा अब यह बताओ कि तुम इस बार झरोखा संभालोगी या नहीं?”
मैं कुछ पल सोचती रही। इस बीच मेरी निगाहें लगातार सागर सर के चेहरे पर टिकी रहीं। वह उत्सुकता से मेरे उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके चेहरे पर वैसे ही भाव थे, जैसे किसी स्पर्धा के परिणाम घोषित होते समय किसी स्पर्धक के चेहरे पर होते हैं।
कुछ क्षण बाद एक निश्चय मेरे चेहरे पर उभरा। मैंने पूरे विश्वास से भरकर कहा, “हाँ संभाल लूंगी।”
सागर सर की आँखें चमक उठीं। बोले, “चिंता ना करो, मैं इस बीच फोन पर तुमसे संपर्क में रहूँगा।”
मैंने दृढ़तापूर्वक कहा, “आप चिंता ना करें सर। आपके लिए सुविधाजनक रहे तो ठीक है। वरना यदि आप फोन ना भी करेंगे तो भी मैं सब ठीक से कर लूंगी।”
सागर सर हँसकर तुरंत बोले, “इतना भी अच्छे से मत कर लेना कि मैं जब लौटूँ तो मैनेजमेंट मुझे बुलाकर कहे कि अब हमें आपकी जरूरत नहीं है।”
इस बात पर मैं पहले झेंपी और फिर सागर सर के साथ खिलखिलाकर हँस पड़ी।

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आमतौर पर पिता लगभग हर बेटी के पहले हीरो होते हैं। मेरे भी थे। मुझे तो दिखते भी वे किसी हीरो की तरह ही थे। लम्बाकार चेहरा, चौड़ा माथा, छोटी मगर पानीदार आँखें, करीने से तराशी हुई मूंछें और होठों से कुछ दूर गाल पर बायीं ओर एक छोटा-सा मस्सा जो किसी बड़े तिल की तरह लगता था। अपने बिजनेस के सिलसिले में उन्हें कई-कई दिन बाहर रहना पड़ता था। मगर जब भी लौटते अपनी अनुपस्थिति की पूरी कसर निकालने के लिए हमेशा तत्पर। मेरे साथ बेहद बातूनी। हर समय उनके पास सुनाने के लिए ढेरों कहानियां होती थीं। गीतों और कविताओं के चहेते। माँ कहती हैं कि बचपन से लोरी से ज्यादा उन्होंने मुझे कविताएं और गीत ही सुनाएं हैं। खासकर बच्चन का गीत – “इस पार प्रिये मधु है तुम हो, उस पार ना जाने क्या होगा”  उन्हें बेहद प्रिय था। इस गीत को सस्वर जब गाते थे तो सारी दुनिया मानो ठहर जाती थी मेरे लिए। उस पार का यह डर था या आकर्षण पता नहीं। शायद आकर्षण ही होगा, तभी तो बहुत जल्दी हो गई थी उन्हें उस पार जाने की। मेरा तेरहवां जन्मदिन बहुत धूमधाम से मनाया था उन्होंने। कहते थे, मेरी बेटी बड़ी हो गई है। अब उसकी उम्र के आँकड़े के साथ टीन लग गया है। इतना महत्वपूर्ण मौका क्या बिना धूमधाम के जाने दूंगा मैं। तमाम रिश्तेदार, दोस्त, परिचितों के जमावड़े के बीच मैं उस दिन दुनिया की सबसे खुश और सबसे भाग्यशाली लड़की थी।
उस दिन देर रात जब पार्टी की सारी धूमधाम खत्म हो गयी और थक के चूर होकर मैं सोने जा रही थी तब पापा आए थे मेरे पास। मेरे माथे को चूमकर बोले, “गिफ्ट का तो ढेर लगा है मन्नू तुम्हारे पास। बहुत कीमती भी हैं उसमें कई गिफ्ट। मगर मैं आज तुम्हें बहुत अलग और बहुत विशिष्ट गिफ्ट दूंगा।”
मेरी नींद भरी आँखों में उत्सुकता तैर गई थी।
“आज तक तुमसे सम्बन्धित किसी भी निर्णय का दायित्व मेरा या तुम्हारी माँ ने संभाला हुआ था। तुम्हारे लिए हमारे चुनावों ने या हमारी पसंद ने चाहे-अनचाहे कई बार तुम्हें निराश या उदास भी किया है। मगर आज मैं तुम्हारे जीवन से सम्बन्धित हर निर्णय को लेने का अधिकार तुम्हें सौंपता हूँ।”
मैंने कुछ असमंजस और कुछ अचरज से उनकी ओर देखा।
“इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे अच्छे-बुरे की ओर हमारी दृष्टि नहीं रहेगी। या किसी भी मामले में हमारी राय या सलाह तुम्हें उपलब्ध नहीं होगी। मगर किसी भी मामले में आखिरी निर्णय तुम्हारा होगा। यदि तुम्हारे निर्णय से हमारी सहमति नहीं होगी तब भी हम अपनी राय तुम पर थोंपेंगे नहीं।”
“मगर मैं जानती हूँ कि आप मुझे बहुत प्यार करते हैं और जो भी निर्णय लेते हैं वह मेरे भले के लिए ही लेते हैं, इसलिए मुझे ऐसे किसी अधिकार की जरूरत नहीं है पापा। मुझे नहीं बनना है अभी बड़ा। और सच कहूँ तो इतना बड़ा कभी भी नहीं बनना है कि आपकी सहमति के बिना मुझे कोई निर्णय लेना पड़े।” पापा के गले में बाँहे डालते हुए कहा मैंने।
पापा ने मुझे अपने सीने से भींच लिया और बड़ी देर तक मेरी पीठ सहलाते रहे। फिर बोले, “अब दी हुई चीज तो वापस नहीं लूंगा मैं। पर चलो, कुछ समय के लिए एक डील करते हैं कि तुम्हारे जीवन से सम्बन्धित हर निर्णय हम दोनों मिलकर लिया करेंगे।”
मैंने कोई उत्तर नहीं दिया। बस पापा की गरदन को चूम लिया। पापा की बाँहों में कब मुझे नींद आई, पता ही नहीं चला।
इसके ठीक एक सप्ताह बाद अचानक चले गए थे वे उस पार। फिर कभी लौट के ना आने के लिए।
इसके बाद महीनों तक अक्सर रात को आँसुओं में डूबी हुई मैं इस बात पर विचार किया करती थी कि आखिर उस दिन क्या किसी अंतर्बोध से प्रेरित होकर उन्होंने मुझे अपने जीवन से जुड़े सब निर्णय लेने का अधिकार देने की बात कही थी। क्या उन्हें कहीं इस बात का अहसास था कि इसके बाद अपने जीवन से जुड़े सारे निर्णय मुझे ही लेने होंगे। मैं कभी किसी नतीजे तक नहीं पहुँची। मगर हर बार मैं खूब रो-रोकर पापा से शिकायत किया करती थी कि जब उन्होंने मिलकर निर्णय लेने की डील की थी तो उसे इतनी जल्दी तोड़ क्यों दिया था।
मेरा जीवन इसके बाद बहुत तेजी से बदला।
मम्मी की उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी, इसलिए एक साल बाद सारे रिश्तेदारों ने मनुहार करके उनकी दूसरी शादी करा दी थी। मैं चाहकर भी पापा की जगह किसी और को देने को राजी नहीं थी। मैंने निर्णय लिया कि मैं आगे की पढ़ाई होस्टल में रहकर करूंगी।
इसके बाद जीवन में एक अजीब-सा सन्नाटा आ गया था। मेरे चारों ओर बड़े पैमाने पर कोलाहल था। स्कूल हो या होस्टल, लड़कियों की चहचहाट से गुलजार रहते थे। मगर मैं कभी उस कोलहाल का हिस्सा नहीं हो पाई। स्कूल की पढ़ाई के बाद जो समय मिलता, वह किताबों के साथ गुजरता। किताबों के साथ रहना मेरे लिए पापा के साथ रहना था। कोई कविता पढ़ती तो यह कल्पना करती कि पापा मुझे अपनी गोदी में लिए कविता गाते हुए टहल रहे हैं। उनकी सस्वर आवाज़ देर तक मेरे कानों में गूंजती रहती। कोई कहानी पढ़ती तो पापा से जिद करती कि अब वो अपनी स्टाइल में मुझे कहानी सुनाएं। पापा हर बार मेरी जिद पूरी करते। मैं अपनी कॉट पर बैठी उन्हें मंत्रमुग्ध-सी देखती रहती और वे होस्टल के मेरे कमरे में घूम-घूमकर मुझे कहानी सुनाते। हर पात्र के संवाद के साथ उनकी आवाज़ बदल जाती। प्रंसगानुरूप उनके स्वर के उतार-चढ़ाव में एक रूहानी कशिश होती।

पहले दो-तीन साल मैं साल में एक बार मम्मी के पास जाती। मगर कुछ ही दिनों में ऊबकर लौट आती। उसके बाद यह जाना भी बहुत अनियमित हो गया। पापा ने मुझे जो अपने जीवन का हर निर्णय लेने का अधिकार दिया था, मैंने आने वाले सालों में उसका पूरी तरह से उपयोग किया। मैंने अपने जीवन का हर निर्णय खुद लिया। शुरू में मम्मी इस बात से दुःखी हुईं, मगर बाद में वे अपने नये परिवार और संसार में व्यस्त हो गईं। उनके प्रति मेरे मन का प्रेम कम नहीं हुआ, बस मैं उनके नये परिवेश में अपने आप को कभी फिट नहीं कर पाती थी। मेरी इस असहजता का उन्हें जल्द ही अहसास हो गया। इसके बाद उन्होंने भी मुझसे मेरे मन के खिलाफ कुछ करने की कभी अपेक्षा नहीं की। हर रविवार फोन करके वे आज भी मेरी खोज-ख़बर लेती रहती हैं।

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