सोमवार, 14 मई 2018

ये दिन वे दिन एवं बरगद की छाँव में

ये दिन....वे दिन

और

बरगद की छाँव में

उषा भटनागर के कहानी संग्रह " ये दिन वे दिन" के फ्लैप पर सूर्यबाला जी लिखती हैं कि " कथा लेखन उषा जी के लिए कोई कैरियर नहीं, सिर्फ़ केनवास पर चलते उनके ब्रश और कलम के बीच की आवाजाही है।"
इसी पृष्ठ पर सुधा अरोड़ा जी कहती हैं-- "जब रेखांकन उनके मन की व्यथा को उकेरने में अधूरा लगने लगता है संभवतः तभी वह शब्दों की शरणस्थली में जाती हैं।"

उषा भटनागर जी की कहानियों में उनकी पेंटिंग्स की ही तरह एक विशिष्ट सी चित्रात्मकता दिखाई देती है। जिस तल्लीनता से वो अपनी तस्वीरों में रंग भरती हैं उसी सहजता से अपनी कहानियों के पात्रों और घटनाओं को चित्रित करते हुए उनमें जीवन के विविध रंगों का समावेश करती हैं।

"स्पीड ब्रेकर" कहानी का चौंकाने वाला अंत और भयावह सच हो, या
प्रयाग मेले में बेटे और बहू द्वारा छोड़ दी गयी माँ की इस अमानवीय अवहेलना से पैदा हुई जिजीविषा को दर्शाती अद्भुत कहानी "हम जिंदा हैं!"
जीवन के उत्तरार्ध में हाथों से धीरे धीरे खिसकते अधिकार को अनुभव करती माँ की विवशता का बयान करती "काँसे का थाल", हो  या
"रास्ते में" कहानी का वह गरीब युवक जो अपने परिजनों के लिए अरसे से एक एक कर जुटाए सामान को बैग की अदलाबदली में खो चुका है, बनावटीपन से दूर उनकी सरल किन्तु सशक्त भाषा और उतना ही सहज प्रस्तुतिकरण पाठकों को अद्भुत पाठकीय सुख देता है। कई दशकों का सफर तय कर चुकी उषा भटनागर जी की रचना यात्रा हमें एक ही साथ आनंदित और विस्मित करती है।

दोनों संग्रहों में ऐसी कितनी ही कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़ते हुए हम निरायास उनके पात्रों के दुख सुख के सहभागी बनते जाते हैं। कल्पना और हकीकत की वही दही और जामन जितनी मात्रा !
उनकी कहानियों की रचनाभूमि और इनके किरदार स्वाभाविक और जानेपहचाने से लगते हैं क्योंकि इनके सृजन की प्रेरणा प्रायः वास्तविक घटनाओं और जीवन में शामिल चरित्रों से प्राप्त हुई है।

आजकल चित्रकला के प्रति ज्यादा सहज और सक्रिय उषा जी की इन किताबों को पढ़ते हुए ये सोचकर अफ़सोस होता रहा कि इन दिनों उनका लिखना लगभग बंद है।
वे सूर्यबाला जी और मालती जोशी जी की उस परंपरा की कथाकार हैं जिनकी कहानियों की प्रासंगिकता और पठनीयता समय के किसी भी परिवर्तन से परे अक्षुण्ण रहती है।

बहुत बहुत धन्यवाद उषा जी!! आपने इन किताबों को पढ़ने के लिये उपलब्ध कराया। वो बारिश का दिन याद आ रहा है, जब गौरैया चावल बीनने के लिये नीचे नहीं उतर पा रही थीं और उस दुख को यहाँ साझा किया तो उसी पोस्ट पर आपसे भेंट हुई। संयोग इसी तरह निर्मित होते हैं वरना हमें परस्पर परिचित होने में जाने कितना वक़्त लग जाता।

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