शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

गूदड़ बस्ती- प्रज्ञा रोहिणी

" ज़िन्दगी अपने भीतर अनेक कहानियाँ लिए चलती है जिनके किरदार कभी ठूँठ में कोंपल रच देते हैं तो कभी अपनी गुमनामी में जीकर ऐसे निकल जाते हैं, मानो वो कभी थे ही नहीं।" ( गूदड़ बस्ती, पृष्ठ 1)

प्रज्ञा रोहिणी ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान कहानीकार के रूप में अपना एक अलग मुकाम खड़ा किया है। विमर्शों के अनावश्यक बोझ को परे रखकर उन्होंने अपनी रचनाओं में निरंतर सार्थक मुद्दों को उठाया है और बड़ी गंभीरता और सहजता से उनका निर्वाह किया है। नारीवाद के स्वर उनकी रचनाओं में भी हैं किन्तु कुछ समकालीन महिला कथाकारों की तरह उनमें किसी विषय के प्रति कोई अनावश्यक पूर्वाग्रह नहीं दिखता। उनकी अब तक पढ़ी गयी कुछ कहानियों के वैविध्य ने आश्वस्त किया है। कल्पनाजन्य चमत्कारिक या सनसनी फैलाने वाले कथानक उनके यहाँ अनुपस्थित हैं। "उलझी यादों के रेशम" जैसी संवेदनशील कहानी हो या फिर "मन्नत टेलर" और "स्याह घेरे" जैसे  सामयिक विषयों पर लिखी कहानियाँ , प्रज्ञा पूरी विश्वसनीयता से इन्हें हमारे सामने रखती हैं, जिनमें हमारे समय और समाज की विद्रूपताओं की धारदार उपस्थिति है।

उनका पहला उपन्यास "गूदड़ बस्ती" इसी वर्ष "साहित्य भंडार इलाहाबाद" से प्रकाशित हुआ है।इस उपन्यास का शीर्षक पाठकों को पहली नज़र में थोड़ा अजीब लग सकता है किन्तु एक बार पढ़ना शुरू करें तो ये सारी बाधाएँ गायब हो जाती हैं। उनके लेखन का प्रवाह इतना असरदार है कि इसे एक बैठक में पूरा पढ़ सकते हैं।

जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है यह उपन्यास एक ऐसी बस्ती के लोगों की जीवन गाथा है जो हाशिये पर गुजर करने को बाध्य हैं। यहाँ उनकी गरीबी और असमर्थता है तो समाज के चमकदार पक्ष द्वारा की जा रही अवहेलना और अपमान भी है। स्कूल और कॉलेज के स्तर पर भी स्थितियाँ कुछ बेहतर नहीं हैं। बावजूद इन विषमताओं के कुछ परिवारों के बच्चे अपने परिजनों के सहयोग और त्याग के चलते एक रौशन भविष्य की उम्मीद में अपने अँधेरों से लड़ रहे हैं। बाधाएँ और अपमानित होने की परंपरा हर मोड़ पर उनसे पहले मौजूद हैं, फिर भी आगे बढ़ने की जिद और जुनून कमजोर नहीं पड़ता। कहानी के मुख्य पात्रों की माँ का चरित्र इसी जिद और जुनून का एक प्रबल चेहरा है।

बीमार पिता की मृत्यु के बाद घर की स्थिति का बयान करती उनकी ये पंक्तियाँ पढ़ते हुए हम भी उस दुख के सहभागी बन जाते हैं....

"पापा के जाने के बाद हमने उनके होने का मतलब जाना। उनका होना यानी घर की इच्छाओं का पूरा होना। उनका होना यानी हँसी में एक साथी और दुख में एक सहारा होना। उनका होना यानी घर का घर होना।"

प्रसंगवश इस कहानी में 1984 के अमानवीय दंगों के समय का वर्णन भी आता है। प्रज्ञा चूँकि दिल्ली से हैं अतः बहुत सारे अनुभव उनके देखे सुने होंगे। उस घोर अराजक दौर की स्मृति के प्रामाणिक दृश्य स्तब्ध कर जाते हैं।

हमारे आसपास और विद्यालयों में फैलते ड्रग नामक मौत के धंधे और स्थानीय पुलिस की सहयोगी भूमिका का वर्णन भी बहुत प्रभावी है।

चूँकि पूरी कहानी मुख्य किरदार द्वारा सुनाई जाती है अतः इसे पढ़ते हुए प्रायः ऐसा आभास होता है जैसे कोई आत्मकथा पढ़ रहे हों। कहानी का फलक बड़ा है, और किरदार भी बहुत से , अतः घटनाएँ तेजी से घटती हैं। कथानक के इस प्रवाह से किताब में रोचकता तो बढ़ जाती है किंतु कहीं कहीं घटनाओं को विस्तार नहीं मिल पाता। फिर भी प्रज्ञा का ये पहला प्रयास मुझे सराहनीय लगा क्योंकि उन्होंने अपने लिए प्रेम कहानी या स्त्री विमर्श के किसी हल्के कथानक की आसान राह नहीं चुनी। आज के शॉर्टकट वाले दौर में किसी नवोदित रचनाकार द्वारा इस तरह का कथानक चुनना किसी दुस्साहस से कम नहीं। अपने पात्रों को भी बड़ी सतर्कता से गढ़ा है उन्होंने। इस गढ़न में हर पात्र के गुण दोष और उनकी स्वाभाविक विशेषताएँ निखर कर सामने आती हैं। अपने पात्रों पर उनकी इस पकड़ और संवेदना के संतुलन ने उपन्यास को कहीं पर हल्का नहीं होने दिया।
प्रज्ञा रोहिणी जी को इस उपन्यास के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ। उनके लेखन की गुणवत्ता और विकास की प्रक्रिया निरंतर कायम रहे, यही दुआ है ।

गूदड़ बस्ती
प्रज्ञा रोहिणी
2017
साहित्य भंडार
मूल्य- 50 रुपये मात्र

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