सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

प्रार्थना में पहाड़

साहित्य और इतिहास की इस जीवन जगत में क्या भूमिका है और अपने उत्तरदायित्व में ये कितने सफल हैं, इस पर टिप्पड़ी करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। इतना ज़रूर देखा और समझा है कि इतिहास महत्वपूर्ण घटनाओं और व्यक्तियों को ही वरीयता देता है, जबकि साहित्य उन बंद सुरंगों की भी खोज करता है जहाँ हाशिये पर पड़े हुए , इतिहास द्वारा उपेक्षित और नगण्य सिद्ध कर दिए गए व्यक्तियों या सभ्यता के अवशेष दबे होते हैं।
भालचंद्र जोशी का पहला उपन्यास " प्रार्थना में पहाड़" ( जो इसी वर्ष विश्व पुस्तक मेले के दौरान प्रकाशित हुआ) पढ़ते समय ये विचार प्रायः मेरी चेतना से टकराते रहे। उनकी लंबी कहानियों के पाठकों/ प्रशंसकों को इस उपन्यास की प्रतीक्षा लंबे समय से थी। यह ऐसी विधा है जो किसी भी कथाकार को स्थायित्व और उन्हें अपने भीतर छुपी हुई अनंत संभावनाओं को बाहर लाने का एक अवसर देती है।

इस उपन्यास का कथानक एक ऐसे आदिवासी क्षेत्र पर केंद्रित है जो दो पड़ोसी जनपदों खैरागढ़ और सम्बलपुर की सीमा पर स्थित है।
एक बहुत बड़े धनकुबेर मिस्टर बजाज की शराब फैक्ट्री का वेस्ट लिक्विड, जिसमें प्राणघातक अल्कोहल भी होता है, हर वर्ष बारिश के दिनों में नदी में छोड़ दिया जाता था और तेज बहाव में ये सारा लिक्विड बह जाता था। इस बार भी समय से बारिश आती तो किसी को पता न चलता। किन्तु इस बार अनुमानित तिथि पर वर्षा हुई नहीं और नदी का पानी इतना जहरीला हो गया कि इसके तट पर बसे हुए गाँव के अधिकांश मनुष्य और पशु मौत का शिकार बन गए। जंगल और नदी का किनारा लाशों से पट गया।
सूचना मिलते ही धनकुबेर और प्रशासन के बीच लेन देन की शाश्वत प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है, जिसमें दोनों जनपदों के कलेक्टर, विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। मालामाल होने के इस सुअवसर का लाभ सब उठाते हैं, सिवाय उस गाँव के जहाँ डेढ़ सौ की आबादी में बमुश्किल पच्चीस लोग बचे हैं और वो भी पीने के पानी के लिए तरसते हुए। मरे हुए जानवरों की सड़ती लाशों से उत्पन्न बीमारियाँ आये दिन किसी न किसी को अपने घातक पंजों में जकड़ रही हैं। बजाज अपने पी.ए. से कहता है कि "इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश में सौ डेढ़ सौ मर भी जाएँ तो चिन्ता की क्या बात। बस, अपने बिजनेस पर कोई आँच न आये।" प्रशासन को भी सुदूर बसे इन आदिवासियों की कोई चिंता नहीं। रही सही कसर तब पूरी हो जाती है जब ये मालूम पड़ते ही कि जो गाँव अब तक इस जनपद की सीमा में था, नए परिसीमन में अब वह दूसरे जनपद में चला गया है, सारे गुनहगार निश्चिंत होकर बैठ जाते हैं।

दोनों निकटस्थ शहरों से इसकी दूरी क्रमशः100 और 150 किलोमीटर । इस बीहड़ रास्ते पर बीस से तीस किलोमीटर तक की पैदल यात्रा भी है जिसका कोई और विकल्प नहीं। आरम्भ में सम्बलपुर का पी.आर.ओ. कलेक्टर के आदेश पर कुछ पत्रकारों के साथ उस गाँव तक जाकर रिपोर्ट तैयार करता है और अगले दिन समाचारपत्रों में ये ख़बर प्रकाशित भी हो जाती है किंतु मीडिया वालों को एक शानदार पार्टी की दावत देकर इस खबर को यहीं ख़त्म कर दिया गया और आने वाले दिनों में इसके अलग अलग संस्करण अखबारों में छपते रहते रहे, जिनका आख़िरी लब्बोलुआब ये था कि आदिवासियों ने मरे जानवर नदी में फेंक दिए जिससे बीमारी फैल गयी।
इधर जिस अंधे कुएँ से थोड़ा थोड़ा पानी पीकर लोग किसी तरह जीवन और मृत्यु से जूझ रहे हैं, उसका पानी धीरे धीरे कम हो रहा है। प्रदूषित और संक्रामक माहौल के कारण बीमारियाँ इस कदर फैली हैं कि जीवित लोगों की संख्या भी निरंतर कम हो रही है। सेवानिवृत्त अध्यापक नंदू माटसाहब जो कुछ दिनों से बाहर थे, खबर पाते ही राशन की बोरियाँ उठवाकर इन लोगों के पास आ जाते हैं क्योंकि उन्हें इन के बीच ही अच्छा लगता है। इंसान अपनी उम्र चाहे जैसे दुखों में बिता ले किन्तु वह अपने आख़िरी दिनों को सुखद बनाना चाहता है।

अन्न और कुएँ के जल की मात्रा दिन ब दिन घट रही है।
एक दिन परस्पर सहमति बनती है कि कुछ लोग यहाँ से निकलकर थोड़े दिन कहीं नौकरी करें ताकि बचे हुए लोगों को जीवित रखने का कोई उपाय हो सके। नायक रतन अपने एक दो मित्रों के साथ बस्ती की तरफ रुख करता है। कॉमरेड परितोष जैसे ज़िंदादिल व्यक्ति से वहीं परिचय होता है रतन का, जो कहानी में आगे जाकर इस किताब के यादगार चरित्रों में शामिल हो जाते हैं।

इधर शतरंज की बिसात पर सारे मोहरे फिट हैं, किन्तु अचानक एक ट्विस्ट आ जाता है कहानी में जब एक बहुत बड़े अंग्रेजी अखबार का प्रसिद्ध पत्रकार समीर इसी तरफ़ का रुख करता है। बजाज अपनी खूबसूरत पी.ए. और अन्य भौतिक सुख सुविधाओं के जरिये इस नई समस्या को निबटाने में लग जाते हैं।
क्या समीर उस गाँव तक पहुँचकर वांछित तथ्यों को इकट्ठा करने में सफल हो पाता है? प्रशासन और अभियोगी पक्ष उसे रोक पाते हैं या नहीं? रतन कुछ पैसे जोड़कर अपने मित्रों के साथ पुनः अपने देस ( आदिवासी अपने गाँव को अपना देस ही कहते हैं) लौटता है या नहीं? भूख और प्यास से जूझते हुए गाँव के शेष लोगों के भाग्य में जीवन है या मृत्यु , इन प्रश्नों का उत्तर किताब पढ़ने के बाद ही मिल पायेगा। भालचन्द्र जोशी ने एक प्राचीन मिथकीय आख्यान का वर्तमान संदर्भों में पुनर्लेखन करते हुए जिस तरह इस उपन्यास के अंतिम अध्याय को समेटा है, वह यादगार है। पात्रों और स्थितियों के अनुरूप जिस सहजता से उनकी भाषा बदलती है वह इस रचना का मुख्य आकर्षण है। दृश्यों की संरचना हो, या किसी विषय पर उनका नजरिया, वे कहीं भी असंतुलित नहीं होते। एक दो ऐसे प्रसंग थे जो थोड़ी सी छूट पाकर साधारण बनकर रह जाते, किन्तु उनका निर्वाह ऐसी स्वाभाविक गरिमा से किया गया है कि वे अंश कथ्य की ताकत बन जाते हैं।
किताब पढ़ते समय बहुत से स्थानों पर रुककर उन्हें चिन्हित करना पड़ा। उन्हीं की एक बानगी नीचे प्रस्तुत है......

"आदमी खानपान से नहीं दुःख से बलवान बनता है।"

"संकट आता है तो सबसे पहले रिश्तों की तंग गलियों से निकलता हुआ , रिश्तों का इम्तहान लेने आता है।"

"कहते हैं कि मृत्यु आती है तो सबसे पहले उसकी आहट जानवर पहचान लेता है। वह मृत्यु से लड़ नहीं पाता और अपनी लाचारी में रोता है।"

"लोग कहते हैं कि इंसान उम्र के साथ सयाना होता है, दरअसल आदमी उम्र के साथ नहीं, जीवन में दुःखों के आने से सयाना होता है।"

"उम्मीद शब्द न होता तो दुनिया में आदमी किसके सहारे जीता? साहस और जोश के लिए भी पहले उम्मीद की उपस्थिति ज़रूरी है।"

"प्रायः लोग कहते हैं कि आदिवासी जाहिल, हिंसक और आक्रामक होते हैं लेकिन इतिहास उस समय की क्रूरता उन्हें विरासत में देकर जाता है। असीम यातनाएँ, असंख्य दुःख और समय का क्रूर बर्ताव उन्हें एक अनाम क्रोध और अजानी आक्रामकता से भर देते हैं।"

"दुख का भार आदमी सह लेता है, लेकिन सपनों का मर जाना दुनिया के सबसे आत्मीय का मर जाना होता है।"

"अतीत इतना चतुर होता है कि ठीक मार्मिक अवसर पर प्रकट होता है और मन के दरवाजों पर दस्तक देता है।"

"जीवन बहुत अजीब होता है। जो माँगो यह देता तो है लेकिन माँगने वाले की इच्छा से नहीं, अपनी शर्तों पर।"

"धर्म का ग़लत सिरा पकड़ में आ जाये तो आदमी कुटिल हो सकता है, लेकिन आस्थाएँ सिर्फ़ अच्छा मनुष्य बने रहने में मदद करती है।"

प्रार्थना में पहाड़ ( उपन्यास )

Bhalchandra Joshi

प्रकाशक- आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड
Desh Nirmohi
पंचकूला, हरियाणा

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जिगरी

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